यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पूर्वार्ध सातवां अध्याय लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे अपान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे उदान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे मन में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी वाणी में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कर्म में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे नेत्र में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कानों को वर्चस्व दीजिए. ( २७ ) आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वौजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वायुषे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्.. ( २८ ) आप हमारी आत्मा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे ओज में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी आयु में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी सारी प्रजा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी पृथ्वी के सभी साधनों को वर्चस्व दीजिए. ( २८ ) कोसि कतमोसि कस्यासि को नामासि. यस्य ते नामामन्महि यं त्वा सोमेनातीत्पाम. भूर्भुवः स्वः सुप्रजाः प्रजाभिः स्या ७ष सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः.. ( २९) हे सोम! आप कौन हैं ? आप कहां से हैं ? आप किस के हैं ? आप का क्या नाम है, जिसे जान कर हम आप को सोमरस से तृप्त कर सकें. आप सर्वत्र व्याप्त हैं. आप की कृपा से हम अच्छी संतान वाले, वीरों वालें हों एवं अच्छे पोषण से पुष्ट हों. ( २९ ) उपयामगृहीतोसि मधवे त्वोपयामगृहीतोसि माधवाय त्वोपयामगृहीतोसि शुक्राय त्वोपयामगृहीतोसि शुचये त्वोपयामगृहीतोसि नभसे त्वोपयामगृहीतोसि नभस्याय त्वोपयामगृहीतोसीषे त्वोपयामगृहीतोस्यूर्जे त्वोपयामगृहीतोसि सहसे त्वोपयामगृहीतोसि सहस्याय त्वोपयामगृहीतोसि तपसे त्वोपयामगृहीतोसि तपस्याय त्वोपयामगृहीतोस्य ७ष हसस्पतये त्वा.. ( ३० ) हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मधु के लिए कलश से ग्रहण किया गया है. आप को माधव हेतु ग्रहण किया गया है. आप को शुक्र के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को पवित्रता के लिए ग्रहण किया गया है. आप को नभ हेतु ग्रहण किया गया है. आप को ऊर्जा हेतु ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस से ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को तप के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को मर्यादा के लिए ग्रहण किया गया है. ( ३० ) इन्द्राग्नी ऽ आ गत ७ष सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्य पातं धियेषिता. उपयामगृहीतोसीन्द्राग्निभ्यां त्वैष ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा.. ( ३१ ) हे सोम! आप को इंद्र देव हेतु कलश में ग्रहण किया है. आप को अग्नि हेतु यजुर्वेद - ८९
पूर्वार्ध सातवां अध्याय उपयाम में ग्रहण किया है. आप को इंद्र देव की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया है. आप को अग्नि की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया है, कलश आप दोनों का मूल स्थान है. आप यज्ञशाला में निर्धारित स्थान पर विराजने की कृपा कीजिए. हम श्रेष्ठ वाणियों से आप की उपासना करते हैं. आप यज्ञ में अपना भाग स्वीकार कीजिए. ( ३१ ) आ घा ये ऽ अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा. उपयामगृहीतोस्यग्नीन्द्राभ्यां त्वैष ते योनिरग्नीन्द्राभ्यां त्वा.. (३२) हे सोम! आप को इंद्र देव व अग्नि की तृप्ति हेतु विधिवत ग्रहण किया गया है. यज्ञस्थल में आप दोनों देवों का कुश का आसन निर्धारित है. इंद्र आप के मित्र हैं. वे युवा हैं. सोम को इंद्र देव और अग्नि दोनों के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप ही इंद्र और अग्नि दोनों का मूल स्थान हैं. ( ३२ ) ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास ऽ आगत. दाश्वां ᳵ सो दाशुषः सुतम्. उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३३) विश्व देव यज्ञ में पधारने की कृपा करें. वे यजमानों के संरक्षक व यजमानों के पालक हैं. वे हम सब के अनुरोध पर यज्ञशाला में सोमरस का पान करने के लिए पधारने की कृपा करें. सोमरस को विश्व देव की वृत्ति के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह आप का मूल स्थान है. आप सभी देवताओं के लिए यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३३ ) विश्वे देवास ऽ आगत शृणुता म इम ᳵ हवम्. एदं बर्हिनिषीदत. उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३४) हे विश्व देव! आप हमारी प्रार्थनाएं सुनिए. आप पधारने की कृपा कीजिए. हम आप से यहां कुश के आसन पर बैठने का अनुरोध करते हैं. आप उस आसन पर विराजने की कृपा कीजिए. आप को सभी देवताओं के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यही आप का और देवताओं का मूल स्थान है. ( ३४ ) इन्द्र मरुत्व ऽ इह पाहि सोमं यथा शार्याते ऽ अपिबः सुतस्य. तव प्रणीती तव शूर शर्मन्ना विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. (३५) हे इंद्र देव! हे मरुद् देव! आप सोम की रक्षा कीजिए. जैसे आप ने शर्याति के यज्ञ में सोमरस पीने की कृपा की, वैसे ही आप इस यज्ञ में पधारिए और सोमरस ९० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सातवां अध्याय पीने की कृपा कीजिए. आप शूरवीर, सुखदाता, श्रेष्ठ यज्ञ वाले एवं अच्छे कवि हैं. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मरुद्गण देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. आप मरुद्गण के साथ यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३५ ) मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्य १४ँ शासमिन्द्रम्. विश्वासाहमवसे नूतनायोग १४ँ सहोदामिह त १४ँ हुवेम. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते. उपयामगृहीतोसि मरुतां त्वौजसे.. ( ३६ ) हे इंद्र! आप हम यजमानों की विनती पर मरुद्वान हो कर पधारिए. मरुद्गण जल की वर्षा करने वाले एवं दिव्य हैं. आप को विश्वासपूर्वक आमंत्रित करते हैं. आप नूतन और उग्र हैं. आप साथसाथ रहते हैं. आप को इंद्र देव व मरुद्गण के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल स्थान है. ओज पाने के लिए आप को कलश में ग्रहण किया गया है. ( ३६ ) सजोषा ऽ इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्. जहि शत्रूँ २ ऽ रप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः. उपयाम गृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३७ ) हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक, शूरवीर, विद्वान् हैं. मरुद्गणों के साथ इस यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप शत्रुओं को दूर एवं उन का नाश कीजिए. आप हमें सब ओर से सुरक्षा प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव व मरुद् देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल स्थान है. ( ३७ ) मरुत्वाँ २ ऽ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय. आसिञ्चस्व जठरे मध्व ऽ ऊर्मिं त्व १४ँ राजासि प्रतिपत्सुतानाम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३८ ) हे मरुद्गण! आप यजमानों के लिए जल, धन व अन्न बरसाते हैं. आप सोमरस पी कर आनंदित होइए. आप शत्रुओं से युद्ध कीजिए. सोमरस लहरदार व मीठा है. आप छक कर इस को पीजिए. आप तो सोमरस के राजा हैं. आप को इंद्र देव व मरुद्गण के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव व मरुद्गण का मूल स्थान है. ( ३८ ) महाँ २ ऽ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा ऽ उत द्विबर्हा ऽ अमिनः सहोभिः. अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्. उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. ( ३९ ) यजुर्वेद - ९१
पूर्वार्ध सातवां अध्याय हे इंद्र! आप महान्, व्यापक, सर्वज्ञ, मनोकामना पूरक हैं. आप अपने सहयोगी देवों के साथ यज्ञ में पधारने व हमारा द्रव्य व पराक्रम बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप हमारे कर्म विशाल बनाने की कृपा कीजिए. आप कर्मों के पोषक हैं. आप को महान् इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ३९ ) मँहाँ २ ऽ इन्द्रो य ऽ ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमां २ ऽ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे. उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. (४०) हे इंद्र देव! आप महान् और जल वर्षक हैं. आप हम पर ओज बरसाइए. आप उपासक यजमानों की बढ़ोतरी करते हैं. आप को महान् इंद्र देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ४० ) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्य ४ स्वाहा.. (४१) सूर्य सर्वज्ञ और दिव्य किरणें वहन करते हैं. वे अपनी किरणों की पताका फहराते हैं. वे प्राणीमात्र को दुनिया दिखाते हैं. उन के लिए स्वाहा. ( ४१ ) चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः. आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष १५ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा.. (४२) मित्र देव वरुण देव और अग्नि देवता के नेत्र हैं. स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक तथा अंतरिक्षलोक में सूर्य प्रकाश फैलाते हैं. सूर्य जगत् की आत्मा हैं. इन सब देवों के लिए स्वाहा. सूर्य मित्र देव के नेत्र हैं. वे वरुण देव के नेत्र हैं. वे अग्नि के नेत्र हैं. वे देवताओं के नेत्र हैं. वे स्वर्गलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे पृथ्वीलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे अंतरिक्ष को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे जगत् की आत्मा हैं. उन सूर्य के लिए स्वाहा. ( ४२ ) अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा.. (४३) हे अग्नि! आप हमें अच्छे पथ की ओर ले जाइए और धन प्रदान कीजिए. आप हमें अच्छा विद्वान् बनाइए. आप हम से बुराइयों को दूर कीजिए. हम बारबार आप को नमन करते हैं. हम बारबार आप के लिए प्रार्थना करते हैं. आप के लिए स्वाहा. आप हमें सुपथ पर ले चलिए. आप हमें धन दीजिए. ( ४३ ) अयं नो ऽ अग्निर्वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्. अयं वाजाञ्जयतु वाजसातावय १४ शत्रूञ्जयतु जर्हषाणः स्वाहा.. (४४) हे अग्नि! हमारे दुश्मनों का भेद दीजिए व उन को हरा दीजिए. हमारे दुश्मनों के ९२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सातवां अध्याय नगर भेद दीजिए. हमारे दुश्मनों की जमा पूंजी हमें दे दीजिए. शत्रुओं को पराजित करने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. ( ४४ ) रूपेण वो रूपमभ्यागां तुथो वो विश्ववेदा विभजतु. ऋतस्य पथा प्रेत चन्द्रदक्षिणा वि स्वः पश्य व्यन्तरिक्षं यतस्व सदस्यैः... ( ४५) हम अपने रूप से आप के रूप की ओर गमन करना चाहते हैं. देवगण सर्वज्ञ हैं. वे देवगण सभी के लिए सुख बांटने की कृपा करें. उन की कृपा से हम सत्य के पथ के पथिक बनें. जैसे चंद्र देव अंतरिक्ष से देखते हैं, वैसे ही हम भी दूर दृष्टिवान हों. ( ४५ ) ब्राह्मणमद्य विदेयं पितृमन्तं पैतृमत्यमृषिमार्येय ४७ सुधातुदक्षिणम्. अस्मद्राता देवत्रा गच्छत प्रदातारमाविशत.. (४६) देवताओं की कृपा से हम आज ब्राह्मणों, पिता, पितामह, ऋषि व आर्षगण से युक्त हों. आप दक्षिणा अच्छी तरह धारण करें. देवगण हमारे त्राता हैं. श्रेष्ठ दानदाता याजकों को श्रेष्ठ फल प्रदान करने की कृपा करें. ( ४६ ) अग्नये त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीयायुर्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे रुद्राय त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय प्राणो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे बृहस्पतये त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय त्वग्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे यमाय त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय हयो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे.. (४७) हे अग्नि! आप हमें वरुण देव को देने की कृपा कीजिए. हम अमृत पान करें. आप आयुदाता हैं. आप की कृपा से हम दीर्घायु पाएं. आप हमें रुद्र देव को देने की कृपा कीजिए. आप हमें बृहस्पति देव को देने की कृपा कीजिए. आप हमें यम देव को देने की कृपा कीजिए. ( ४७ ) कोदात्कस्मा ऽ अदात्कामोदात्कामायादात्. कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्ते.. (४८) कौन देता है ? किस को देता है ? कामना से ही कोई किसी को देता है. कामना से ही दान दिया और लिया जाता है. ( संसार में ) कामनाएं ही सब कुछ हैं. ( ४८ ) यजुर्वेद - ९३
आठवां अध्याय
आठवां अध्याय उपयामगृहीतोस्यादित्येभ्यस्त्वा. विष्ण ऽ उरुगायैष ते सोमस्त र्थ् रक्षस्व मा त्वा दभन्.. ( १ ) हे सोम देव! आदित्य देव की तरह आप को कलश में ग्रहण करते हैं. हे विष्णु! हम आप के लिए स्तोत्र गाते हैं. आप सोमरस व हमारी रक्षा कीजिए. कोई भी आप का दमन न कर सके. ( १ ) कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे. उपोपेन्नु मघवन् भूय ऽ इन्नु ते दानन्देवेस्य पृच्यत ऽ आदित्येभ्यस्त्वा.. ( २ ) हे इंद्र देव! आप अहिंसक हैं. आप हमारे पास पधारिए. आप हवि को ग्रहण कीजिए. आप धनवान हैं. आप अपने दान से हमें भी धनवान बनाइए. हम आदित्यों जैसा स्नेह पाने के लिए इंद्र देव की उपासना करते हैं. ( २ ) कदा चन प्र युच्छस्युभे नि पासि जन्मनी. तुरीयादित्य सवनं त ऽ इन्द्रियमातस्थावमृतन्दिव्यादित्येभ्यस्त्वा.. ( ३ ) हे पात्र! हम आदित्य देव की प्रसन्नता के लिए आप को ग्रहण करते हैं. आदित्य देव शांतचित्त, आनंददाता तथा देवों और मनुष्यों का कल्याण करने वाले हैं. ( ३ ) यज्ञो देवानां प्रत्येति सुम्नमादित्यासो भवता मृडयन्तः. आ वोर्वाची सुमतिर्ववृत्याद र्थ् होशचिद्वा वरिवोवित्तरासदादित्येभ्यस्त्वा.. ( ४ ) यज्ञ देवों के प्रति ( लिए ) हैं. हे अच्छे मन वाले आदित्यगण! आप हम सब के लिए सुखकारी हों. आप की प्राचीन और श्रेष्ठ मति हमें प्राप्त हो. इस से विपरीत बुद्धि वाले भी यज्ञ भाव में रुचि लें. आदित्य देव की प्रसन्नता के लिए सोम को ग्रहण करते हैं. ( ४ ) विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथस्तस्मिन् मत्स्व. श्रदस्मै नरो वचसे दधातन यदाशीर्दा दम्पती वाममश्नुतः. पुमान् पुत्रो जायते विन्दते वस्वधा विश्वाहारप ऽ एधते गृहे.. ( ५ ) हे आदित्य! आप सोमरस पी कर प्रसन्न होइए. जो यजमान दंपती श्रेष्ठ वचनों ९४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
पूर्वार्ध आठवां अध्याय से इन की उपासना करते हैं, श्रद्धा रखते हैं उन के पुरुषार्थी पुत्र पैदा होते हैं. धनधान्य भरपूर रहते हैं. घर में सुखशांति रहती है. ( ५ ) वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवे दिवे वाममस्मभ्य ँ४ सावीः. वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम.. (६) हे सविता देव! हमारा आज सुखदायी हो. हमारा कल सुखदायी हो. हमारा प्रतिदिन सुखदायी हो. हम सुखदायी घर में रहें. हमारी बुद्धि सुखदायी हो. हम सदा सुख भोगने योग्य रहें. ( ६ ) उपयामगृहीतोसि सावित्रोसि चनोधाश्चनोधा ऽ असि चनो मयि धेहि. जिन्व यज्ञं जिन्व यज्ञपतिं भगाय देवाय त्वा सवित्रे.. (७) हम ने कलश ग्रहण कर लिया है. सविता देव अन्नदाता हैं. वह हमें अन्न प्रदान करने की कृपा करें. आप हमारे लिए अन्न धारिए व यज्ञपति का यज्ञ पूरा कराइए. हम अपने सौभाग्य के लिए सविता देव की उपासना करते हैं. ( ७ ) उपयामगृहीतोसि सुशर्मासि सुप्रतिष्ठानो बृहदुक्षाय नमः. विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (८) हे सोम! आप को कलश में ग्रहण कर लिया है. आप सुखदाता, सुप्रतिष्ठित, विशाल व कर्तव्य पालक हैं. हम आप को नमन करते हैं. सभी देवों के लिए आप की स्थापना की जाती है. आप देवों के मूल स्थान हैं. ( ८ ) उपयामगृहीतोसि बृहस्पतिसुतस्य देव सोम त ऽ इन्दोरिन्द्रियावतः पत्नीवतो ग्रहाँ २ ऋध्यासम्. अहं परस्तादहमवस्ताद्यदन्तरिक्षं तदु मे पिताभूत्. अह ँ४ सूर्यमुभयतो ददर्शाहं देवानां परमं गुहा यत्.. (९) हे सोम! आप बृहस्पति के पुत्र हैं. हम ने आप को उपयाम में ग्रहण कर लिया है. हम सोम को पत्नी के साथ ग्रहण करते हैं. हम उन की बढ़ोतरी करते हैं. अंतरिक्ष पिता तुल्य हैं. हम सब ओर से उन का संरक्षण पाए हुए हैं. हम दोनों ओर से सूर्य के दर्शन करें. हम देवताओं की परम गुहा के दर्शन करें. ( ९ ) अग्ना ३ इ पत्नीवान्त्सजूर्देवेन त्वष्ट्रा सोमं पिब स्वाहा. प्रजापतिर्वृषासि रेतोधा रेतो मयि धेहि प्रजापतेस्ते वृष्णो रेतोधसो रेतोधामशीय.. (१०) हे अग्नि! आप पत्नी सहित त्वष्टा देव की भांति सोमपान कीजिए. हम आप के लिए आहुति समर्पित करते हैं. हे प्रजापति! आप वीर्य धारक हैं. आप हमें वीर्यवान बनाइए. आप पराक्रमी हैं. आप हमारे लिए पराक्रम धारिए. हम वीर्यवान व शक्तिशाली हों. ( १० ) यजुर्वेद - ९५
पूर्वार्ध आठवां अध्याय उपयामगृहीतोसि हरिरसि हारियोजनो हरिभ्यां त्वा. हर्योर्धाना स्थ सहसोमा ऽ इन्द्राय.. (११) हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया है. आप हरे रंग के हैं. आप योजन दूर से अपने घोड़ों की सहायता से पधारिए. आप इंद्र देव के साथ हरे रंग के घोड़ों वाले रथ पर पधारिए. (११) यस्ते अश्वसनिर्भक्षो यो गोसनिस्तस्य त ऽ इष्टयजुष स्तुतस्तोमस्य शस्तोक्थस्योपहूतस्योपहूतो भक्षयामि.. (१२) हे सोम! आप उपासना योग्य हैं. हम बारबार आप को आमंत्रित करते हैं. हम उक्त मंत्र से आप की उपासना करते हैं. आप घोड़ों व गायों के प्रेरक हैं. हम यजुर्वेद के मंत्रों से आप की उपासना करते हैं. हम अपने अभीष्ट की पूर्ति चाहते हैं. (१२) देवकृतस्यैनसोवयजनमसि मनुष्यकृतस्यैनसोवयजनमसि पितृकृतस्यैनसो- वयजनमस्यात्मकृतस्यैनसोवयजनमस्येनस ऽ एनसोवयजनमसि. यच्चाहमेनो विद्वाँश्चकार यच्चाविद्वाँस्तस्य सर्वस्यैनसोवयजनमसि.. (१३) आप देवताओं के प्रति यज्ञ आदि से संबंधित पापों को दूर करने वाले हैं. आप यज्ञ आदि से संबंधित मनुष्य के पापों को दूर करने वाले हैं. पितरों के प्रति किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप अपनेआप के प्रति किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप जानेअनजाने में किए गए पापों को दूर करने वाले हैं. आप हमें सभी पापों से मुक्त करने की कृपा कीजिए. (१३) सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन. त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१४) हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले और मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा देव हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन देने व कष्ट विहीन करने की कृपा कीजिए. (१४) समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः स ँ४ सूरिभिर्मघवन्तस् ँ४ स्वस्त्या. सं ब्रह्मणा देवकृतं यदस्ति सं देवाना ँ४ सुमतौ यज्ञियाना ँ४ स्वाहा.. (१५) हे इंद्र देव! आप हमें अच्छा मन, इष्ट गाएं व वीरता वाली भावना दीजिए. आप हमें कल्याणकारी भावनाओं से भरिए. आप ब्राह्मणों द्वारा देवताओं के लिए किए गए कार्यों के प्रति श्रेष्ठ बुद्धि से जोड़िए. यजमानों की ओर से भेंट की गई आहुति स्वीकार कीजिए. (१५) सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा स ँ४ शिवेन. त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्ष्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (१६) ९६ - यजुर्वेद 632/6
पूर्वार्ध आठवां अध्याय हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा देव! हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन दीजिए. आप हमें कष्ट विहीन करने की कृपा कीजिए. ( १६ ) धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपा देवो अग्निः. त्वष्टा विष्णुः प्रजया स १४ रराणा यजमानाय द्रविणं दधात स्वाहा.. (१७) हे सविता देव! आप धन धारणकर्ता हैं. हम आप के लिए यज्ञ करते हैं. प्रजापति निधिवान व पालक हैं. अग्नि, त्वष्टा देव विष्णु यजमान के लिए श्रेष्ठ संतान व धन धारने की कृपा करें. हम इन सब देवताओं के लिए आहुतियां भेंट करते हैं. ( १७ ) सुगा वो देवाः सदना ऽ अकर्म य ऽ आजग्मेद १४ सवनं जुषाणाः. भरमाणा वहमाना हवी १४ ष्यस्मे धत्त वसवो वसूनि स्वाहा.. (१८) हे देवो! यज्ञ सदन आप के लिए सुगम बना दिए हैं. आप आसानी से यज्ञ- सेवन करने का काम कर सकते हैं. आप के लिए पात्र हवि से भरे हैं. आप के लिए हवि वहन कर रहे हैं. आप हमारे लिए धन धारिए. ये सभी आहुतियां धन के लिए अर्पित हैं. ( १८ ) याँ २ आवह ऽ उशतो देव देवाँस्तान् प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे. जक्षिवा १४ सः पपिवा १४ सश्च विश्वेसुं घर्म १४ स्वरातिष्ठतानु स्वाहा.. (१९) हे अग्नि! आप ने जिन का आह्वान किया है, उन देवों को अपनेअपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ में दी गई हवि सारे यज्ञ की आहुतियां ग्रहण करने की कृपा कीजिए. हम आप के लिए आहुतियां अर्पित करते हैं. ( १९ ) वय १४ हि त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन्नग्ने होतारमवृणीमहीह. ऋधगया ऽ ऋधगुताशमिष्ठाः प्रजानन् यज्ञमुपयाहि विद्वान्स्वाहा.. (२०) हे अग्नि! जिस यज्ञ के लिए आप को यहां आमंत्रित किया गया है, उसे आप ने अच्छी तरह पूरा किया. इसलिए अब ज्ञान संपन्न आप अपने स्थान की ओर प्रस्थान करते हुए यह आहुति स्वीकार करें. ( २० ) देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित. मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञ १४ स्वाहा वाते धाः.. (२१) हे देवतागण! आप यज्ञ के ज्ञाता हैं. आप अपने ज्ञात स्थान की ओर गमन कीजिए. आप मन के स्वामी हैं. इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. आप हमारे लिए शुद्ध वायु धारिए. ( २१ ) यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपतिं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहा. एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः सर्ववीरस्तं जुषस्व स्वाहा.. (२२) यजुर्वेद - ९७
पूर्वार्ध आठवां अध्याय हे यज्ञ देव! आप यज्ञ की ओर जाइए. आप यज्ञपति को प्राप्त होइए. आप अपने मूल स्थान को जाइए. यह आप का यज्ञ है. आप यज्ञपति के पास जाइए. हम आप को आहुति भेंट करते हैं. हम हजारों वाणियों से आप की स्तुति करते हैं. आप सर्वाधिक वीर हैं. हम इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. ( २२ ) माहिर्भूर्मा पृदाकुः. उरु १७ हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ. अपदे पादा प्रतिधातवेकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्. नमो वरुणायाधिष्ठितो वरुणस्य पाशः.. ( २३) आप पृथ्वी पर अजगर के समान खतरनाक मत बनिए. सूर्य के प्रस्थान के लिए वरुण देव मार्ग को सुगम बनाने की कृपा करें. वरुण देव जहां पैर न रखे जा सकते हैं, वहां भी मार्ग बना देते हैं, प्रतिघात कर देते हैं. हृदय के कष्ट दूर करते हैं. उन के पाश दुष्टनाशी हैं. वे प्रतिष्ठित देव हैं. हमारा उन्हें नमन. ( २३ ) अग्नेरनीकमप ऽ आ विवेशापां नपात् प्रतिरक्षन्नसुर्यम्. दमेदमे समिधं यक्ष्यग्ने प्रति ते जिह्वा घृतमुच्चरण्यत् स्वाहा.. (२४) हे अग्नि! आप जल में प्रवेश कीजिए. ताकि जलधार नीचे न गिर पाए. आप असुरों से यज्ञ की रक्षा कीजिए. आप समिधा को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. आप की जिह्वा यज्ञ का घी धारण करने के लिए प्रेरित हो. हम अग्नि के लिए आहुति अर्पित करते हैं. ( २४ ) समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तः सं त्वा विशन्त्वोषधीरुपताः. यज्ञस्य त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके विधेम यत् स्वाहा.. (२५) हे सोम! आप का हृदय समुद्र व जलमय हैं. आप को हम वहां स्थापित करते हैं. आप की ओषधियां और जल हमारे लिए प्रवाहित होते रहें. हे यज्ञपति! हम आप के लिए सूक्त उच्चारते हैं. विधिविधानपूर्वक आहुति अर्पित करते हैं. आप के लिए नमन. ( २५ ) देवीराप ऽ एष वो गर्भस्त १७ सुप्रीत १७ सुभृतं बिभृत. देव सोमैष ते लोकस्तस्मिञ्छं च वक्ष्व परि च वक्ष्व.. (२६) हे दिव्य जल! यह सोमपात्र आप का गर्भ है. आप प्रेम से व इस का पोषण करते हुए ग्रहण करें. हे सोम! जल आप का लोक है. आप उस की इच्छा करिए. आप भी सुखी रहिए. हमें भी सुखी रखिए. संरक्षण दीजिए. ( २६ ) अवभृथ निचम्पुण निचेरुरसि निचम्पुणः. अव देवैर्देवकृतमेनोयासिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि. देवाना १७ समिदसि.. (२७) ९८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय हे अवभृथ ( स्नान यज्ञ ) ! आप निचोड़ने व निरंतर बहने वाले हैं. आप दैवकृपा से देवों के प्रति हमारे पाप दूर करने की कृपा कीजिए. आप मनुष्यों के प्रति किए गए हमारे पापों को दूर करने की कृपा कीजिए. आप परेशान करने वाले शत्रुओं को दूर करने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से देवत्व बढ़ता है. ( २७ ) एजतु दशमास्यो गर्भो जरायुणा सह. यथायं वायुरेजाति यथा समुद्र ऽ एजति. एवायं दशमास्यो अस्रज्जरायुणा सह.. ( २८) दस माह के गर्भ के जरायु के साथ जाइए. जैसे यह वायु जाती है, जैसे यह समुद्र जाता है, वैसे ही आप दस मास के जरायु के साथ उत्पन्न हुए. ( २८ ) यस्यै ते यज्ञियो गर्भो यस्यै योनिर्हिरण्ययी. अङ्गान्यहुता यस्य तं मात्रा समजीगम १७ स्वाहा.. (२९) हे देवी! इसी से आप का गर्भ यज्ञ से संबंधित भावनाएं रखने वाला है. आप की योनि इसी से स्वर्गमयी है. अंग अग्नि की तरह पवित्र हैं. मंत्रों से आप का पवित्र समागम होता है. आप के लिए यह आहुति समर्पित है. ( २९ ) पुरुदस्मो विषुरूप ऽ इत्दुरन्तर्महिमानमानञ्ज धीरः. एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीमष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ता १७ स्वाहा.. (३०) गर्भ दानी रूपवान, बुद्धिमान, महिमावान और धीर है. एक पद वाली, दो पद वाली, तीन पद वाली, चार पद वाली, आठ पद वाली, प्रार्थनाएं भुवनों में प्रसारित हों. आप के लिए यह आहुति समर्पित है. ( ३० ) मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः. स सुगोपातमो जनः.. (३१) हे मरुद्गण! आप दिव्य व विशिष्ट हैं. आप लोगों के कष्ट दूर करते हैं. आप लोगों की गायों के अच्छे रक्षक हैं. ( ३१ ) मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्. पिपृतां नो भरीमभिः.. (३२) महान् पृथ्वी, स्वर्गलोक इस यज्ञ की रक्षा करने की कृपा करें. धन पिपासुओं ( प्यासों ) को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ३२ ) आ तिष्ठ वृत्रहन्न्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी. अर्वाचीन १७ सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३३) हे इंद्र देव! आप वृत्रनाशक हैं. आप के घोड़े संकेत मात्र से चलने वाले हैं. आप अपने ब्रह्मज्ञानी घोड़ों को रथ में जोतिए. प्राचीन सोम को पत्थर से कूटने पर यजुर्वेद - ९९
पूर्वार्ध आठवां अध्याय
पूर्वार्ध आठवां अध्याय होने वाली ध्वनियों से आप का मन यज्ञ की ओर आकर्षित हो. हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप सोलह कलाओं वाले हैं. आप को इंद्र देव के लिए इस पात्र में लिया गया है. सोलह कलाओं वाले इंद्र देव के लिए आप को इस पात्र में ग्रहण किया गया है. ( ३३ ) युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा. अथा न ऽ इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३४) हे इंद्र! आप हरि नामक घोड़े हैं. आप शत्रुनाशी हैं. तेज गति वाले घोड़े आप को मनुष्यों के यज्ञ में लेने आते हैं. यजमान ऋषियों की श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से आप की उपासना करते हैं. सोमरस को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह इंद्र देव के लिए मूल स्थान है. वे सोलह कलाओं वाले हैं. हम सोलह कलाओं वाले इंद्र के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३४ ) इन्द्रमिद्धरी वहतोप्रतिधृष्टशवसम्. ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणाम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने.. (३५) हे इंद्र! आप शत्रुओं का नाश करने वाले और सोम पीने वाले हैं. तेज गति वाले दो घोड़े आप को यज्ञ स्थल तक ले जाते हैं. हे सोम! आप कलश में ग्रहण करने योग्य हैं. यह आप का आश्रय स्थल है. इसलिए हम सोलह कलाओं वाले इंद्र की प्रसन्नता हेतु आप को ग्रहण करते हैं. ( ३५ ) यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य ऽ आविवेश भुवनानि विश्वा. प्रजापतिः प्रजया स १४ रराणस्त्रीणि ज्योति १४ षि सचते स षोडशी.. (३६) इंद्र देव से परम श्रेष्ठ और कोई देव नहीं है. वे सभी लोकों में व्यापक हैं. प्रजापति प्रजा के साथ रमण करते हैं. वे सोलह कलाओं वाले हैं. तीनों ज्योतियों को अपने में धारे हुए हैं. ( ३६ ) इन्द्रश्च सम्राड् वरुणश्च राजा तौ ते भक्षं चक्रतुरग्र ऽ एतम्. तयोरहमनु भक्षं भक्षयामि वाग्देवी जुषाणा सोमस्य तृप्यतु सह प्राणेन स्वाहा.. (३७) इंद्र सम्राट् हैं. वरुण देव राजा हैं. वे दोनों देव पहले भोग लगाते हैं. उस के बाद हम उस सामग्री का सेवन करते हैं. वाग् देवी प्राण के साथ जुड़ कर सोमरस तृप्ति देने की कृपा करें. हम उन के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( ३७ ) अग्ने पवस्व स्वपा ऽ अस्मे वर्चः सुवीर्यम्. दधद्रयिं मयि पोषम्. १०० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा वर्चस ऽ एष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे. अग्ने वर्चस्विन्वर्चस्वाँस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासम्.. (३८) हे अग्नि! आप अपना काम करने में कुशल व पवित्र हैं. आप हमें पूरा वर्चस्व दीजिए. आप हमें श्रेष्ठ वीर्यवान बनाइए. आप हमारे लिए धन धारिए. आप हमें पोषण दीजिए. हे सोम! आप को अग्नि के लिए कलश में ग्रहण करते हैं. हम वर्चस्व के लिए आप को ग्रहण करते हैं. यह आप का मूल स्थान है. आप वर्चस्वियों में वर्चस्ववान देव हैं. हमें भी इसी तरह मनुष्यों में बारबार वर्चस्वी बनाइए. ( ३८ ) उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः. सोममिन्द्र चमू सुतम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वौजस ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजसे. इन्द्रौजिष्ठौजिष्ठस्त्वं देवेष्वस्योजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्.. (३९) हे इंद्र देव! आप ओज के साथ उठिए. आप सुंदर ठोड़ी वाले हैं. आप इस पेय का पान कीजिए. हे सोम! इंद्र के लिए आप को चुआ रहे हैं. सोम को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह इंद्र देव का मूल निवास है. हम ओज के लिए आप को ग्रहण करते हैं. इंद्र देव ओजवान हैं. वे देवताओं में ओजवान हैं, वैसे ही हम मनुष्यों में ओजवान हो जाएं. ( ३९ ) अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ २ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा. उपयामगृहीतोसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय. सूर्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोहं मनुष्येषु भूयासम्.. (४०) अदृश्य रश्मियों ( किरणों ) की अग्निपताका अनुकरण करती है. वह मनुष्यों को नहीं दिखाई देती है. आप को सूर्य के लिए कलश में ग्रहण किया है. आप चमकते रहिए. कलश आप का मूल स्थान है. सूर्य प्रकाशमान है. वह देवों में प्रकाशमान है, वैसे ही हम मनुष्यों में प्रकाशमान हो जाएं. ( ४० ) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्. उपयामगृहीतोसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय.. (४१) ये सूर्य की किरणें विश्वविख्यात हैं. ये दिव्यता वहन करती हैं. सूर्य की किरणें सारे संसार को दृष्टि प्रदान करती हैं. हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया है. आप को प्रकाशमान सूर्य के लिए ग्रहण किया है. यही आप का मूल स्थान है. आप सूर्य के लिए प्रकाशित होइए. ( ४१ ) यजुर्वेद - १०१
पूर्वार्ध आठवां अध्याय आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः. पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः.. (४२) हे महिमाशालिनी! आप इस कलश को पूरी तरह सूंघिए. इस के सोम आदि आप में प्रवेश करें. आप पुनः उस ऊर्जा को लौटाइए. वह ऊर्जा हमें हजारों धाराओं के रूप में मिले. हमें दुधारी गाएं व धन मिलें. (४२) इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योते ऽदिते सरस्वति महि विश्रुति. एता ते अघ्न्ये नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्.. (४३) हे गोमाता! आप हवन में काम्य हैं. आप चंद्रमा और सूर्य की ज्योति की तरह हैं. आप सरस, पृथ्वी पर विख्यात व वध योग्य नहीं हैं. आप हमारे नाम से अच्छी वाणी से देवताओं को बुलाने के लिए बोलिए. (४३) वि न ऽइन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः. यो अस्माँ २ अभिदासत्यधरं गमया तमः. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विमृध ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विमृधे.. (४४) हे इंद्र देव! आप हमारे शत्रुओं व नीचों को मारिए. जो हमें दासता और अंधकार देना चाहते हैं. आप उन्हें अंधकार में ले जाइए. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप यहां स्थित रहिए. यह आप का मूल स्थान है, आप यहां स्थित रहिए. (४४) वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम. स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४५) हे वाचस्पति! आप विश्व के कर्मों के सर्जक हैं. आप मन जैसे हैं. आज हम जो अन्न हवन कर रहे हैं. उसे स्वीकारिए. आप सज्जनता भरे काम करते हैं. आप विश्व का भरणपोषण करते हैं. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. आप को विश्वकर्मा के लिए कलश में ग्रहण किया है. यह आप का मूल स्थान है. आप को विश्वकर्मा इंद्र देव के लिए समर्पित किया जाता है. (४५) विश्वकर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम्. तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमुरो विहव्यो यथासत्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे.. (४६) हे विश्वकर्मा! हम हवि से आप की बढ़ोतरी करते हैं. आप दुःख दूर करने वाले हैं. आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, अपूर्व, उग्र व विशेष आदरणीय हैं. हम आप का विशेष १०२ – यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय आह्वान करते हैं. आप को इंद्र देव व विश्वकर्मा के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह आप का मूल स्थान है. आप को विश्वकर्मा के लिए स्थापित किया जाता है. ( ४६ ) उपयामगृहीतोस्यग्नये त्वा गायत्रच्छन्दसं गृह्णामीन्द्राय त्वा त्रिष्टुप्छन्दसं गृह्णामि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यो जगच्छन्दसं गृह्णाम्यनुष्टुप्तेभिगरः.. (४७) आप को इस अग्नि के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. हम इंद्र देव के लिए गायत्री छंद से आप को ग्रहण करते हैं. हम आप को त्रिष्टुप् छंद से ग्रहण करते हैं. हम आप को सभी देवों के लिए ग्रहण करते हैं. हम आप को सभी देवों के लिए जगती छंद से ग्रहण करते हैं. हम आप के प्रति अनुष्टुप् छंद में वाणीमय स्तुति करते हैं. ( ४७ ) व्रेेशीनां त्वा पत्मन्ना धूनोमि कुकूननानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि भन्दनानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि मदिन्तमानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि मधुन्तमानां त्वा पत्मन्ना धूनोमि शुक्रं त्वा शुक्र ऽ आ धूनोम्यह्नो रूपे सूर्यस्य रश्मिषु.. (४८) हे सोम! हम जल बरसाने के लिए आप को कंपाते हैं. हम संसार के कल्याण के लिए आप को कंपाते हैं. हम मेघों के जल के लिए आप को कंपाते हैं. आप आनंददायी हैं. हम जल बरसाने के लिए आप को कंपाते हैं. आप मधुमान ( मधुरता से लबालब भरे हुए हैं ). हम आप को मधु ( मधुरता ) बरसाने के लिए कंपाते हैं. आप प्रकाशमान हैं. हम प्रकाश की वर्षा के लिए आप को कंपाते हैं. हम दिन स्वरूप सूर्य की किरणों के लिए आप को कंपाते हैं. ( ४८ ) ककुभ ४९ रूपं वृषभस्य रोचते बृहच्छुक्रः शुक्रस्य पुरोगाः सोमः सोमस्य पुरोगाः. यत्ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै त्वा गृह्णामि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा.. (४९) सोम बलवान, प्रकाशमान, विशाल व प्रकाश के आगे गमन करने वाले हैं. सोम सोम के आगे गमन करने वाले अभयदाता व जाग्रत हैं. हम आप को ग्रहण करते हैं. इसीलिए हे सोम! हम आप के लिए आहुति भेंट करते हैं. ( ४९ ) उशिक् त्वं देव सोमाग्नेः प्रियं पाथोपीहि वशी त्वं देव सोमेन्द्रस्य प्रियं पाथोपीह्यस्मत्सखा त्वं देव सोम विश्वेषां देवानां प्रियं पाथोपीहि.. (५०) हे सोम! आप अग्नि का ( मन भाता ) आहार बनिए. आप पथ के भोजन के रूप में प्राप्त होइए. आप वंशवर्ती व सोम के प्रिय हैं. हे सोम! आप हमारे मित्र, आप सभी को प्रिय व सब के लिए तृप्तिदायी हैं. ( ५० ) इह रतिरिह रमध्वमिह धृतिरिह स्वधृतिः स्वाहा. उपसृजन् धरुणं मात्रे धरुणो मातरं धयन्. रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा.. (५१) यजुर्वेद - १०३
पूर्वार्ध आठवां अध्याय हे गौओ! इन यज्ञ करने वालों के प्रति आप की प्रीति बनी रहे. घी से भरी हुई यह आहुति आप के लिए अर्पित है. आप इसे अपने लिए धैर्य से ग्रहण कीजिए. जगत् को धारण करने वाली पृथ्वी माता के लिए जल धारण करें और उन के लिए उस जल को बरसाएं. आप हमारे लिए पौष्टिक धन धारिए. आप के लिए स्वाहा. (५१) सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता ऽ अभूम. दिवं पृथिव्या ऽ अध्यारुहामाविदाम देवान्त्स्वर्ज्योति:... (५२) हे सोम! आप यज्ञ की समृद्धि करने वाले हैं. आप की कृपा से हम प्रकाशित हों. आप की कृपा से हम अमरता पाएं. पृथ्वी से स्वर्गलोक तक आरोहण करें. हम देवताओं के ज्योतिर्मय लोक को देखने में समर्थ हों. (५२) युवं तमिन्द्रापर्वता पुरोयुधा यो नः पृतन्यादप तं तमिद्धतं वज्रेण तं तमिद्धतम्. दूरे चत्ताय छन्तसद्गहनं यदिनक्षत्. अस्माक १४ शत्रून्परि शूर विश्वतो दर्मा दर्षीष्ट विश्वतः. भूर्भुवः स्वः सुप्रजाः प्रजाभिः स्याम सुवीरा वीरैः सुपोषः पोषैः.. (५३) हे इंद्र देव! आप युवा, पर्वतवासी व श्रेष्ठ योद्धा हैं. आप शत्रुओं को पूरी तरह तपाइए और उन पर वज्र से प्रहार करिए. आप हमें शत्रुओं द्वारा घेरे जाने व छिपाए जाने से दूर ही रखिए. आप हमारे शत्रुओं पर सब ओर से आक्रमण कीजिए. आप पृथ्वी, स्वर्ग आदि सब जगह व्याप्त हैं. आप हमें अच्छी व श्रेष्ठ पराक्रमी संतान दीजिए. हमें वीर बनाइए और अच्छी तरह पुष्ट कीजिए. (५३) परमेष्ठ्यभिधीतः प्रजापतिर्वाचि व्याहृतायामन्धो अच्छेतः. सविता सन्यां विश्वकर्मा दीक्षायां पूषा सोमक्रयण्यामिन्द्रश्च.. (५४) परमेष्ठी नामक यज्ञ में प्रजापति के लिए मंत्र से आहुति दी जा रही है. सोम के लिए अंधसा नामक मंत्र से आहुति दीजिए. सविता देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. विश्वकर्मा देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. पूषा देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. (५४) इन्द्रश्च मरुतश्च क्रयायोपोत्थितोसुरः पण्यमानो मित्रः क्रीतो विष्णुः शिपिविष्ट ऽ ऊरावासन्नो विष्णुर्न्रन्धिषः.. (५५) खरीद के लिए इंद्र और मरुत् को उन के नाम से आहुति दीजिए. खरीद के लिए असुर के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. खरीदे हुए मित्र के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. गोद में बैठे विष्णु के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. अरु पर बैठे विष्णु के लिए नरंधिष मंत्र से आहुति दीजिए. (५५) प्रोह्यमाणः सोम ऽ आगतो वरुण ऽ आसन्द्यामासन्नोग्निराग्नीध्र ऽ इन्द्रो हविर्धाने थर्वोपावहियमाणः.. (५६) १०४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध आठवां अध्याय गाड़ी से लाए जाने वाले और आसन पर बैठे हुए सोम हेतु उन के नाम से आहुति दीजिए. अगिंध में स्थित सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. इंद्र देव के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए अथवा नाम से ले जाए जा रहे सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. (५६) विश्वे देवा ऽ अ १४ शुषु न्युप्तो विष्णुराप्रीतपा ऽ आप्याय्यमानो यमः सूयमानो विष्णुः सम्भ्रियमाणो वायुः पूयमानः शुक्रः पूतः शुक्रः क्षीरश्रीर्मन्थी सक्तुश्रीः.. (५७) विश्वे देव को उन के नाम से आहुति दीजिए. हमारे प्रति प्रेम रखने वाले और पालनहार विष्णु को उन के नाम से आहुति दीजिए. सोम से सींचे जा रहे यम को उन के नाम से आहुति दीजिए. सोम से अभिषिक्त किए जा रहे विष्णु को उन के नाम से आहुति दीजिए. पवित्र किए जा रहे वायु को उन के नाम से आहुति दीजिए. पवित्र शुक्र के लिए नाम से आहुति दीजिए. दूध में गूंधे हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. सत्तू मिला कर तैयार किए हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दे कर शोभा बढ़ाइए. (५७) विश्वे देवाश्चमसेषूनीतोसुर्होमायोद्यतो रुद्रो हूयमानो वातोभ्यावृत्तो नृचक्षाः प्रतिख्यातो भक्षो भक्ष्यमाणः पितरो नाराश १४ साः.. (५८) विश्वे देव के लिए चमस में रख कर आहुति दीजिए. मायावी असुर के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. रुद्र के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. घिर जाने पर वात देव के नाम से आहुति दीजिए. नृचक्ष के लिए उस के नाम से आहुति दीजिए. खाने से बचे हुए सोम हेतु उस के नाम से आहुति दीजिए. (५८) सन्नः सिन्धुरवभृथायोद्यतः समुद्रोभ्यवहियमाणः सलिलः प्रप्लुतो ययोरोजसा स्कभिता रजा १४ सि वीर्यैर्भीवीरतमा शविष्ठा. या पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन्वरुणा पूर्वहूतो.. (५९) स्नान के लिए तैयार (उद्यत) सोम सिंधु है. उन्हें उन के नाम से आहुति दीजिए. समुद्र (घड़े) में रखे हुए सोम के लिए उन के नाम से आहुति दीजिए. जल में व्याप्त सोम को उन के नाम से आहुति दीजिए. जिन दोनों देवों (वरुण-विष्णु) के ओज से ओजवान हैं, उन्हें उन के नाम से आहुति दीजिए. जिन के पराक्रम से पराक्रमी हैं. जिन की क्षमता से सामर्थ्यवान हैं, यज्ञ में प्रथम आहुति पाने वाले देवों के लिए यह आहुति अर्पित की जा रही है. (५९) देवान्दिवमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु मनुष्यानन्तरिक्षमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु पितॄन्पृथिवीमगन्द्यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु यं कं च लोकमगन्द्यज्ञस्ततो मे भद्रमभूत्.. (६०) जो यज्ञ स्वर्ग में देवों के पास जाता है, वह यज्ञ (फल) हमें प्राप्त कराइए. हमें इष्ट द्रव्य (धन) प्राप्त कराइए. अंतरिक्ष को मिलने वाला यज्ञ फल मनुष्यों यजुर्वेद - १०५
पूर्वार्ध आठवां अध्याय को प्राप्त कराइए. पितरों और पृथ्वी वाला यज्ञ फल मनुष्यों को प्राप्त कराइए. इष्ट धन प्राप्त कराइए. जोजो यज्ञ फल जिसजिस लोक में गया है, उस से हमारा कल्याण हो. ( ६० ) चतुस्त्रि ᳵ शतन्तवो ये वितत्निरे य ऽ इमं यज्ञं ᳵ स्वधया ददन्ते. तेषां छिन्न ᳵ सम्वेतद्दधामि स्वाहा घर्मो अप्येतु देवान्.. ( ६१ ) चौंतीस देव जो इस यज्ञ का विस्तार करते हैं, जो यजमानों को पौष्टिक पदार्थ प्रदान करते हैं, उन देवताओं के लिए ये आहुतियां अर्पित हैं. यज्ञ जैसे कार्यों से हम जो धन धारण करते हैं, वह हम ऐसे ही शुभ कार्यों में खर्च करते हैं. यह आहुति देवों को तृप्त प्रसन्न करने की कृपा करे. ( ६१ ) यज्ञस्य दोहो विततः पुरुत्रा सो अष्टधा दिवमन्वाततान. स यज्ञ धुक्ष्व महि मे प्रजाया ᳵ रायस्पोषं विश्वमायुरशीय स्वाहा.. ( ६२ ) हम यज्ञ का दोहन व उस का विस्तार करें. वह सभी का दुःख दूर करें. यह यज्ञ आठ प्रकार से ( संपूर्ण ब्रह्मांड में ) विस्तार पाए. यह यज्ञ स्वर्गलोक तक विस्तृत हो. यह यज्ञ हमें श्रेष्ठ संतान प्रदान करे. यह यज्ञ हमें धन प्रदान करे. यह यज्ञ हमें पोषकता दे. यह यज्ञ हमें पूर्णायु प्रदान करे. इस यज्ञ हेतु यह आहुति अर्पित है. ( ६२ ) आ पवस्व हिरण्यवदश्ववत्सोम वीरवत्. वाजं गोमन्तमा भर स्वाहा.. ( ६३ ) हे सोम! आप आइए. आप इस यज्ञ को पवित्र करने की कृपा कीजिए. आप हमें सोना, घोड़े, गौ, धन आदि भरपूर वैभव दीजिए. आप के लिए हम यह आहुति अर्पित करते हैं. ( ६३ ) १०६ – यजुर्वेद
नौवां अध्याय
नौवां अध्याय देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय. दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाजं नः स्वदतु स्वाहा.. (१) हे सविता! हम आप की कृपा से इस यज्ञ को विधिवत पूरा करें. आप यज्ञपति को सौभाग्यवान बनाने की कृपा कीजिए. आप की किरणें दिव्य हैं. आप उन किरणों से हमारे अन्न को पवित्र कीजिए. हमारा वह अन्न वाचस्पति देव को भी बलवान बनाने वाला हो. वाचस्पति देव के लिए स्वाहा. वह अन्न हमें भी स्वादिष्ट लगे. ( १ ) ध्रुवसदं त्वा नृषदं मनःसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्. अप्सुषदं त्वा घृतसदं व्योमसद्मुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्. पृथिविसदं त्वान्तरिक्षसदं दिविसदं देवसदं नाकसदमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (२) हे सोम! आप ध्रुव ( स्थिर ) रूप से प्रतिष्ठा प्राप्त हैं. आप मनुष्यों के मन में रमते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. इंद्र देव भी आप को ग्रहण करते हैं. आप उपयाम ( पात्र ) में पधारिए. आप सर्वाधिक चाहे गए देव हैं. आप जल, घी व व्योम ( आकाश ) में वास करते हैं. हम आप को इंद्र के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव की योनि व इष्टतम हैं. आप बरतन में पधारने की कृपा कीजिए. आप पृथ्वी, अंतरिक्ष व स्वर्गलोक में निवास करते हैं. आप देवों के योग्य हैं. आप सोम को इंद्र देव के लिए ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव की योनि और आप इष्टतम हैं. ( २ ) अपा ँश रसमुद्वयस ँश सूर्ये सन्त ँश समाहितम्. अपा ँश रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टमम्.. (३) हे सोम! आप जल और रसों के सार, सूर्य में समाए व जल के सार के भी सार हैं. उस रस को हम पात्र में ग्रहण करते हैं. हम आप को इंद्र देव के लिए बरतन में ग्रहण यजुर्वेद - १०७
पूर्वार्ध नौवां अध्याय करते हैं. हम आप को वायु के लिए बरतन में ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव के इष्टतम और इंद्र की योनि हैं. हम यजमान इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३ ) ग्रहा ऽ ऊर्जाहुतयो व्यन्तो विप्राय मतिम्. तेषां विशिप्रियाणां वोहमिषमूर्ज ꣳ समग्रभमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्. सम्पृचौ स्थः सं मा भद्रेण पृङ्क्तं विपृचौ स्थो वि मा पाप्मना पृङ्क्तं.. (४) हे सोम और सोमरस के पात्रो! हम ऊर्जा पाने के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप ब्राह्मणों की बुद्धि विस्तृत करते हैं. आप यजमानों के लिए ऊर्जस्वी रस को भलीभांति स्थापित करते हैं. हम आप दोनों को इंद्र देव के लिए उपयाम पात्र में स्थापित करते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. आप दोनों इंद्र देव के अभीष्ट हैं. आप दोनों संपृक्त ( साथसाथ ) रह कर हमारा कल्याण व हमें सुख प्रदान कीजिए. आप दोनों पृथक् ( अलग ) रह कर हमें पापों से दूर करने की कृपा कीजिए. ( ४ ) इन्द्रस्य वज्रोसि वाजसास्त्वयायं वाज ꣳ सेत्. वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे. यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म ꣳ साविषत्.. (५) आप इंद्र देव के वज्र और अन्नमय हैं. आप से यजमान को भी अन्न प्राप्त हो. हम अपनी ( मंत्रमय ) वाणी से धरती को अन्न उपजाने के लिए प्रेरित करते हैं. पृथ्वी को देवों की माता अदिति के समान प्रेरित करते हैं. सारा संसार ( लोक ) सविता देव के वश में है. सविता हमें धार्मिक बनाएं. वे हमें गतिशील बनाने की कृपा करें. ( ५ ) अप्सवन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तिष्वश्वा भवत वाजिनः. देवीरापो यो व ऽ ऊर्मिः प्रकूर्त्तिः ककुन्मान् वाजसास्तेनायं वाज ꣳ सेत्.. (६) जल के भीतर अमृत व ओषधियां हैं. हम उन का सेवन कर के घोड़े की तरह बलवान हो जाएं. हे जल समूह! आप की तरंगें ऊंची हैं और लहरें वेगशाली हैं. आप की ऊंचीऊंची तरंगें हमें अन्न प्रदान करने की कृपा करें. ( ६ ) वातो वा मनो वा गन्धर्वाः सप्तवि ꣳ शतिः. ते अग्रेऽश्वमयुञ्जँस्ते अस्मिञ्जवमादधुः.. (७) वायु, मन, गंधर्व आदि ने पहले ही सात से तिगुने यानी सत्ताईस घोड़े अपने साथ जोत लिए हैं. वे आगेआगे ( जल्दीजल्दी ) आ कर हमारे यज्ञ की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. ( ७ ) वातर ꣳ हा भव वाजिन्युज्यमान ऽ इन्द्रस्येव दक्षिणः श्रियैधि. युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस ऽ आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (८) १०८ - यजुर्वेद