योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
५०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
करके नष्ट होगा। जो यह उपाय न कर सको तो यह युक्ति करो कि जिसमें चित्त अभिलाषा करके आसक्त हो, उसी का त्याग करो। एक भाग अविद्या इस प्रकार नष्ट होगी। तीन भाग शास्त्र-विचार और अपने यत्न से शनः-शनैः नष्ट होवेगा। साधुसंग, सत्शास्त्र-विचार और अपना यत्न हो तो एकवारगी अविद्या नष्ट हो जावेगी। ये समकाल कहे हैं। एक-एक के सेवने में एक-एक भाग निवृत्त होता है। पीछे जो शेष रहता है, उसमें काम-अर्थ सब असतरूप हैं और वे अजर, अनन्त, एकरूप हैं। संकल्प के उपजने से पदार्थ भासित होते हैं और संकल्प के लीन होने पर लीन हो जाते हैं। हे विद्याधर! यह जगत संकल्प ने रचा है—जैसे आकाश में सूर्य निराधार स्थित होता है, वैसे ही देश-काल की अपेक्षा से रहित यह मननमात्र स्थित है। तीनों जगत मन के फुरने से प्रकट होते हैं और मन के लय होने से लय हो जाते हैं—जैसे स्वप्न के पदार्थ जागने में मिट जाते हैं। हे विद्याधर! ब्रह्मरूपी बन में एक कल्पवृक्ष है, जिसकी अनेक शाखाएँ हैं। उसकी एक शाखा में जगतरूपी गूलर का फल है, जिसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, पशु आदिक मच्छर हैं। वासनारूपी रस से पूर्ण मज्जा पहाड़ है। पञ्चभूत सूत द्वारा उनका निकलने का खुला मार्ग इत्यादिक सुन्दर रचना बनी है।
उसमें त्रिलोकी का ईश्वर एक इन्द्र हुआ और गुरु के उपदेश से उसका आवरण नष्ट हो गया। फिर इन्द्र और दैत्यों का युद्ध होने लगा और इन्द्र अपनी सेना को ले चला। पर उसकी निर्बलता हुई, इसलिए वह भागा और दशों दिशाओं में घूमता रहा। पर जहाँ जावे, वहीं दैत्य उसके पीछे चले आवें। जैसे पापी परलोक में शोभा नहीं पाता, वैसे ही इन्द्र ने जब शान्ति न पाई, तब अणुमात्ररूप करके सूर्य के त्रसरेणु में प्रवेश कर गया। जैसे कमल में भौंरा प्रवेश करे, वैसे ही उसने प्रवेश किया तो वहाँ उसको युद्ध का वृतान्त भूल गया। तब उसने एक मन्दिर में बैठा अपने को देखा। जैसे निद्रा से स्वप्न-सृष्टि प्रकट हो, वैसे ही उसने वहाँ रत्न और मणियों संयुक्त नगर देखा
🌸 निर्वाण प्रकरण 🌸 ४०७
वह उनमें गया और पृथ्वी, पहाड़, नदियाँ, चन्द्र, सूर्य, त्रिलोकी उनको वहाँ दिखाई देने लगी। उस जगत् का इन्द्र अपने को उनमें देखा कि दिव्य भोग और ऐश्वर्य से सम्पन्न मैं इन्द्र स्थित हूँ। वह इन्द्र कुछ काल के उपरान्त शरीर को त्यागकर निर्वाण को प्राप्त हुआ- जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण होता है। तब कुन्द नाम उसका पुत्र इन्द्र हुआ और राज्य करने लगा। फिर उसके एक पुत्र हुआ। तब कुन्द भी इन्द्र शरीर को त्यागकर परमपद को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र राज्य करने लगा। फिर उसके भी एक पुत्र हुआ। इसी प्रकार सहस्र पुत्र होकर राज्य करते रहे। उन्हीं के कुल में यह हमारा इन्द्र राज्य करता है। इससे यह जगत् संकल्पमात्र है और उस अमरेणु से यह सृष्टि है। इसलिए इस जगत् को संकल्पमात्र जानकर इसकी आस्था त्यागो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रोपाख्याने अमरेणुजगत्-वर्णननाम शताधिकसप्तविंशतितमसर्गः ॥ १३७ ॥
भुशुण्डजी बोले, हे विद्याधर ! फिर उनके कुल में एक बड़ा श्रीमान् इन्द्र हुआ, जो त्रिलोकी का राज्य करता रहा और फिर निर्वाण को प्राप्त हुआ। उसके एक पुत्र था, जिसको बृहस्पतिजी के वचनों से ज्ञानरूप प्रतिभा उदय हुई। तब वह विदितवेद होकर स्थित हुआ। यथाप्राप्ति में इन्द्र होकर राज्य करने लगा और दैत्यों को जीता। एक समय वह किसी कार्य के लिए कमल के तन्तु में घुस गया तो वहाँ उसको नाना प्रकार का जगत् दिखने लगा और अपनी इन्द्र की प्रतिभा हुई। इससे उसे इच्छा हुई कि मैं ब्रह्मतत्त्व को पाऊँ और दृश्य पदार्थ की तरह उसे प्रत्यक्ष देखूँ। इसलिए वह एकान्त में बैठकर समाधि में स्थित हुआ। तब उसको भीतर-बाहर ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ और प्रतिभा के उदय होने से यह निश्चय हुआ कि सब ब्रह्म ही है और वही पूजने योग्य है। सब उसी को पूजते भी हैं। केवल शुद्ध आत्मपद सब शब्द, रूप, अवलोक और नमस्कार से रहित है। सब ओर उसी के पाणिपाद हैं। सब सिर और मुख उसी के हैं।
४०८ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
सब ओर उसके श्रवण हैं। सब ओर उसके नेत्र हैं। आत्मतत्त्व में वही मनमें स्थित हो रहा है। सब इन्द्रियों और विषयों को वही प्रकाशित करता है। वह सब इन्द्रियों से रहित है और असक्त हुआ भी सबको धारण कर रहा है। वह निर्गुण है और इन्द्रियों के साथ मिलकर गुणों को भोगता है। वही सब प्राणियों के भीतर बाहर व्याप्त रहा है। सूक्ष्म है, इससे दुर्विज्ञेय है, और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अज्ञानी का अज्ञान के कारण दूर है और आत्मत्व द्वारा ज्ञानी को ज्ञान के कारण निकट है। वह अनन्त, सर्वव्यापी केवल शान्तरूप है, जिसमें दूसरा कोई नहीं। घट, पट, दीवार, गाय, आँदा, नाग, नर सबमें वही तत्त्व भासित है। पर्वत, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, देश, काल, वस्तु, सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं।
हे विद्याधर! इस प्रकार इन्द्र को ज्ञान हुआ और वह जीवन्मुक्त हुआ। तब वह सब चेष्टा करता, परन्तु अन्तःकरण में नहीं बँधता। जब कुछ काल बीता, तब इन्द्र उस निर्वाणपद को प्राप्त हुआ, जिसमें आकाश भी स्थूल है। फिर उस इन्द्र का एक बड़ा शूरवीर पुत्र सब दैत्यों को जीतकर देवताओं और त्रिलोकी का राज्य करने लगा। फिर उसको भी ज्ञान उत्पन्न हुआ। सतशास्त्र और गुरु के वचनों से कुछ काल में वह भी निर्वाण को प्राप्त हुआ। तब उसका जो पुत्र था, वह राज्य करने लगा। इसी प्रकार कई इन्द्र राज्य करते और नाना प्रकार के व्यवहारों को देखते रहे। फिर उसके कुल में कोई पुत्र था, उसको यह हमारी सृष्टि भाषित हुई तो वह भी ब्रह्मध्यानी हुआ और इस त्रिलोकी का राज्य करने लगा। अब तक विश्व का इन्द्र वही है। हे विद्याधर! इस प्रकार विश्व की उत्पत्ति संकल्पमात्र है और सब मैंने तुझसे कही। पहले उसको त्रसरेणु में सृष्टि दिखी, फिर उस सृष्टि के एक कमल के तन्तु में दिखी। फिर उसमें कई वृत्तान्त, जो संकल्पमात्र थे, उसने देखे। फिर उस अणु में अनेक अवस्थाएँ देखीं। हे विद्याधर! पर वास्तव में यह कुछ हुई नहीं। जैसे आकाश में नीलिमा भाषित होती है, पर है नहीं वैसे ही यह विश्व है। आत्मा में विश्व का अत्यन्त अभाव
# ✽ निर्वाण प्रकरण ✽
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है। यह विश्व अहंभाव से उपजा है। जब अहंभाव उठता है, तब आगे सृष्टि बनती है, और जब अहं का अभाव होता है, तब विश्व कुछ नहीं। इस विश्व का बीज अहं है, इससे तू ऐसी भावना कर कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब ऐसी भावना करेगा, तब आत्मा ही शेष रहेगा, जो प्रत्यक्ष ज्ञानरूप अपना रूप है। हे विद्याधर ! इस मेरे उपदेश को अङ्गीकार कर।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे संकल्पसंकल्पैकताप्रतिपाद- न्नमाम शताधिकअष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३८ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब अहं का उत्थान होता है, तब आगे सृष्टि बनकर भासित होता है, और जब अहं का अभाव होता है तब विश्व कुछ नहीं भासित होता, केवल शुद्ध आत्मा ही भासित होता है। हे विद्याधर ! इन्द्र ने कहा कि मैं हूँ। उसको सूर्य की किरणों के अणु में ऐसे अहं हुआ तो उसने उसमें नाना विस्तार देखा और कष्ट पाया। जो उसको अहं न होता तो दुःख न पाता। दुःखरूपी वृक्ष का अहं बीज है। आत्मविचार से इसका नाश होता है। जब अहं का नाश होता है, तब आत्मपद का साक्षात्कार होता है। आत्मपद का साक्षात्कार होने से प्रच्छन्न अहं का नाश होता है। हे विद्याधर ! आत्मारूपी एक पर्वत है, जिस पर आकाशरूपी वन है। उसमें संसाररूपी वृक्ष लगा है। उसमें वासनारूपी रस है। अज्ञानरूपी भूमि से वह उत्पन्न हुआ है। नदियाँ, समुद्र उसकी नाड़ी हैं। चन्द्रमा और तारे फूल हैं। वासनारूपी जल से वह बढ़ता है। वही अहंकाररूपी वृक्ष का बीज है। सुख-दुःखरूपी इसके फल हैं। आकाश इसकी डालें और पाताल जड़ है। तुम इस वृक्ष को ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओ और अहंरूपी वृक्ष के बीज का नाश करो। हे विद्याधर ! एक खाई है, जिसके जन्ममरणरूपी दो किनारे हैं। उसमें अनात्मारूपी जल है। वासनारूपी तरंगें उठती हैं और विश्वरूपी बुलबुले उठते हैं और मिट भी जाते हैं। शरीररूपी झाग है और अहंकाररूपी वायु है। जब वायु हुई तब तरंग और बुल-बुले सब होते हैं और जब वायु मिट गई, तब केवल स्वच्छ निर्मलरूप ही भासित होता है।
४१० ✲ योगवाशिष्ठ ✲
हे विद्याधर ! जो वायु हुई तो जल से भिन्न कुछ न हुआ और जो न हुई तो भी जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही है । वैसे ही अज्ञान के होने और निवृत्त होने पर भी आत्मपद ज्यों का त्यों है । परन्तु सम्यक्दर्शन से आत्मपद और अज्ञान से जगत् भासित होता है । अहं का होना ही अज्ञान है । जब अहं हुआ तब मम भी होता है । सो 'अहं' 'मम' नाम संसार का है । जब अहं-मम मिटता है, तब जगत् का अभाव होता है । अहं के होने दृश्य भासित होता है और दृश्य में अहं होता है । इसमें संवेदन को त्यागकर निर्वाणपद में प्राप्त हो । इतना कह भुशुण्डिजी ने मुझसे कहा कि हे वशिष्ठजी ! इस प्रकार जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया तो वह समाधि में स्थित होकर निर्वाणपद को प्राप्त हुआ । जैसे दीपक बुझ जाता है, वैसे ही उसका चित्त क्षोभ से रहित शान्ति को प्राप्त हुआ । हे ब्राह्मण ! उसका हृदय शुद्ध था, इस कारण मेरे वचन शीघ्र ही उसके हृदय में प्रवेश कर गये । जब वह समाधि में स्थित हुआ तो मैंने उसको बारम्बार जगाया परन्तु वह न जागा—जैसे कोई जलता-जलता शीतल समुद्र में जाकर बैठे और उससे कहिये कि तू निकल तो वह नहीं निकलता; वैसे ही संसारताप से जलता हुआ जीव जब आत्मसमुद्र में गोता लगाता है, तब वह संसार के अज्ञानरूपी प्रवाह को नहीं देखता । हे वशिष्ठजी ! जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़े वचन भी बहुत हो लगते हैं । जैसे तेल की एक बूंद जल में बहुत फैल जाती है, वैसे ही जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़ा वचन भी बहुत होकर लगता है । पर जिसका अन्तःकरण मलिन होता है, उस पर वचन प्रभाव नहीं डालते । जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही गुरुशास्त्र के वचन उसको नहीं लगते । जब विषयों से वैराग्य उपजे; तब जानिये कि हृदय शुद्ध हुआ ।
हे वशिष्ठजी ! जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया, तब वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त हुआ; क्योंकि उसका चित्त निर्मल था । हे मुनीश्वर ! जो तुमने मुझसे पूछा था सो मैंने कहा कि उस
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विद्याधर को मैंने अज्ञान से रहित चिरकाल जीता देखा। इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे कहकर काकभुशुण्डि चुप हो रहे और मैं नमस्कार करके आकाशमार्ग से अपने घर आया। हे राम ! मेरे और काकभुशुण्डि के इस संवाद को एकादश चौकड़ी युग बीतते हैं। हे राम ! यह कोई नियम नहीं है कि थोड़े काल में ज्ञान उपजे वा बहुत काल में। यह हृदय की शुद्धता की बात है। जिसका हृदय शुद्ध होता है, उसको गुरु और शास्त्रों का वचन शीघ्र ही लगता है—जैसे जल नीचे को स्वाभाविक जाता है। हे राम ! इतना उपदेश जो मैंने तुमको क्रम से किया है, उसका तात्पर्य यही है कि वासना को त्याग करो, सोचो कि न मैं हूँ और न कोई जगत् है—तब पीछे निर्विकल्प केवल आत्मपद रहेगा, जो सबका अपना रूप है और उसका साक्षात्कार तुमको होगा। जैसे मलिन दर्पण में मुख नहीं दीखता, वैसे ही आत्मरूपी दर्पण अहंशूपी मल से ढका है। जब इसका त्याग करोगे, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी और जगत् भी अपना रूप भासित होगा। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है; क्योंकि सब केवल आत्मतत्त्वमात्र है। और जो कुछ भासित होता है, उसे मृगतृष्णा के जल सा और बन्ध्या के पुत्र सा जानो। यह जगत् आत्मा के प्रमाद से भासित होता है—जैसे आकाश में नीलिमा भासित होती है, पर है नहीं, वैसे ही जगत् प्रत्यक्ष भासित होता है और है नहीं। जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या है। जब आत्मा का ज्ञान होगा, तब जगत् का अत्यन्त अभाव होगा और केवल आत्मत्वमात्र भासित होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डि विद्याधरोपाख्यान-समाप्तिर्नाम शताधिकनवत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम अहंवेदना से रहित होओ। संसाररूपी वृक्ष का बीज अहं ही है। वासना से शुभ-अशुभरूप कर्मों का सुख-दुःख फल है, और वह वासना ही से प्रफुल्लित होता है। इससे अहंभाव को निवृत्त करो जब अहं फुरता है, तब आगे जगत् भासित
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होता है । जब अहंता से रहित होगे तब जगत् का भ्रम मिट जावेगा । अहंता आत्मबोध में नष्ट होती है । आत्मबोधरूपी खंगारी में उड़ाया अहंतारूपी पाषाण न जानोगे कि कहाँ गया । सुवर्ण मिट्टी के ढेले सा तुमको हो जावेगा । शरीररूपी पत्ते पर अहंतारूपी अणु स्थित है; जब बोधरूपी वायु चलेगी तब न जान पाओगे कि कहाँ गया । शरीर-रूपी पत्ते पर अहंतारूपी वरफ का कणका स्थित है; बोधरूपी सूर्य के उदय होने पर न जानोगे कि वह कहाँ गया । बोध बिना अहंता नष्ट नहीं होती । चाहे कीचड़ में रहे और चाहे पहाड़ में जावे, चाहे घर में रहे और चाहे स्थल में रहे, चाहे स्थूल हो और चाहे सूक्ष्म हो, चाहे निराकार हो और चाहे रूपान्तर को प्राप्त हो, चाहे भस्म हो और चाहे मृतक हो, चाहे दूर हो अथवा निकट हो, जहाँ रहेगा, वहीं अहंता इसके साथ है । हे राम ! संसाररूपी वट का बीज अहंता है । उसी से सब शाखा फैली हैं । सब अर्थों का कारण अहंता है । जब तक अहंता है, तब तक दुःख नहीं मिटता । और जब अहंभाव नष्ट होता है तब परमसिद्धि की प्राप्ति होती है । हे राम ! जो कुछ मैंने उपदेश किया है, उसका भली प्रकार विचारकर उसका अभ्यास करो, तब संसाररूपी वृक्ष का बीज जल जायगा और आत्मपद की प्राप्ति होगी ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंभावत्यागोपदेशो नाम शताधिकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४० ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम ! संसार संकल्पमात्र से सिद्ध है और भ्रम में उदय हुआ है । आत्मस्वरूप में अनेक सृष्टियाँ बनती हैं । कोई लीन होती हैं, कोई उत्पन्न होती हैं और कोई उड़ती हैं, कहीं इकट्ठी उड़ती हैं और कहीं भिन्न-भिन्न उड़ती हैं, सो सब मुझको प्रत्यक्ष भासित होती हैं, देखो, वे उड़ती जाती हैं । ये सब आकाशरूप हैं और आकाश ही में मिलती हैं । जैसे केले का वृक्ष देखने भर को सुन्दर होता है, पर उसमें कुछ सार नहीं होता, वैसे ही विश्व देखने भर को सुन्दर है, पर आकाश रूप है । जैसे जल में पहाड़ का प्रतिबिम्ब पड़ता है और हिलना जान पड़ता है, वैसे ही यह जगत् है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५१३
है कि सृष्टि मुझे प्रत्यक्ष उड़ती दिखती है—तुम भी देखो; यह तो मैंने कुछ नहीं समझा कि आप क्या कहते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अनेक सृष्टियाँ उड़ती हैं, सो सुनो। पञ्चभौतिक शरीर में प्राण स्थित हैं। प्राण में चित्त स्थित है। और उस चित्त में अपनी-अपनी सृष्टि है। जब यह पुरुष शरीर का त्याग करता है, तब लिङ्गशरीर (जो वासना और प्राण है) उड़ता है। उस लिङ्गशरीर में जो विश्व है, वह सूक्ष्मदृष्टि से मुझको भासित होता है। हे राम! आकाश में जो वायु है, उसका रूपरङ्ग कुछ नहीं। वही वायु प्राणों से मिलकर मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देती है। इसी का नाम जीव है। यथार्थ में न कोई आता है, न जाता है, परन्तु लिङ्गशरीर के संयोग से आता-जाता और जन्मता-मरता दीखता है। मनुष्य अपनी वासना के अनुसार आत्मा में विश्व देखता है। यह वासनामात्र सृष्टि है। जैसी वासना होती है, वैसा ही विश्व भासित होता है।
हे राम! यह पुरुष आत्मस्वरूप है, परन्तु लिङ्गशरीर के मिलने से इसका नाम जीव हुआ है। यह अपने को प्रच्छन्न जानता है; पर वास्तव में ब्रह्मस्वरूप है। देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित ब्रह्म है, पर प्रमाद से अपने को कुछ का कुछ मानता है। इसी का नाम लिङ्गशरीर है। जैसे घटाकाश भी महाकाश है, परन्तु घट के खप्पर से परिच्छिन्न हुआ है, वैसे ही यह पुरुष भी आत्मस्वरूप है, और अहंकार के संयोग से प्रच्छन्न हुआ है। जैसे घट को एकदेश से उठाकर देशान्तर में ले जाकर रखो तो आकाश तो न कहीं गया और न आया, परन्तु आता-जाता लगता है, वैसे ही आत्मा अखण्डरूप है, परन्तु प्राण चित्त से चलता भासित होता है। जब अहंकाररूप चित्त नष्ट हो तब अखण्डरूप हो। जब तक अहंकार नहीं जाता, तब तक जगत् भ्रम दीखता है और वासना करके भटकता फिरता है। वासनामय सृष्टि अपने-अपने चित्त में स्थित है। जीव जब शरीर का त्याग करता है, तब आकाश में उड़ता है, और प्राणवायु उड़कर जो आकाश में शून्यरूप वायु है उससे जा मिलता है। वहाँ सबको अपनी-अपनी
४१४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
वासना के अनुसार सृष्टि भासित होता है। सब अपनी सृष्टि लेकर इस प्रकार उड़ते हैं, जैसे वायु गन्ध को ले जाती है। वही मुझको सूक्ष्म-दृष्टि से उड़ते भासित होते हैं। हे राम! स्थूलदृष्टि में लिङ्गशरीर नहीं भासित होता; सूक्ष्मदृष्टि में दीखता है। जिस पुरुष की सूक्ष्मदृष्टि में लिङ्गशरीर देखने की शक्ति है और ज्ञान से रहित है, वह भी मेरे मत में मूर्ख और पशु है।
हे राम! जब मनुष्य वासना का त्याग करता है, अर्थात् इस अहंकार को कि मैं हूँ, त्याग करता है तो आगे विश्व नहीं दिखाई देता, केवल निर्विकल्प ब्रह्म भासित होता है। उसके प्राण नहीं उड़ते, वहीं लीन हो जाते हैं; क्योंकि उसका चित्त अचित्त हो जाता है। जब तक अहंकार का संयोग है, तब तक विश्व भी चित्त में स्थित है। जैसे बीज में वृक्ष और तिलों में तेल होता है, वैसे ही उसके हृदय में विश्व स्थित है। जैसे मृत्तिका में बड़े छोटे बर्तन, लोहे में सुई और खड्ग और बीज में वृक्षभाव स्थित है, चैतन्य अथवा जड़ हो, वैसे ही यह संकल्पकल्पना में भेद है, स्वरूप से कुछ नहीं और वैसे ही यह जगत् भी है। हे राम! विश्व संकल्पमात्र है; क्योंकि दूसरी अवस्था में इसका नाश हो जाता है। यह जाग्रत् अवस्था जो तुमको भासित होती है, मिथ्या है। जब स्वप्न देख पड़ता है, तब जाग्रत् नहीं रहती। जब जाग्रत् आती है तब स्वप्न नष्ट हो जाता है। जब मृत्यु आती है, तब सृष्टि का अत्यन्त अभाव हो जाता है और देश, काल, पदार्थसहित वासनानुसार और सृष्टि भासित होता है। हे राम! यह विश्व ऐसा है, जैसे स्वप्ननगर। जैसे संकल्पपुर होते हैं, वैसे ही ये सब संकल्प उड़ते फिरते हैं। कई सृष्टि परस्पर मिलती हैं, कई नहीं मिलतीं, परन्तु सब संकल्परूप हैं। भ्रम में और का और भासित होता है। जैसे कोई पुरुष बड़ा होता है और कोई छोटा तो, छोटे को बड़ा भासित होता है। जैसे हाथी के निकट और पशु तुच्छ लगते हैं और चींटी के निकट और सब बड़े लगते हैं, वैसे ही जो ज्ञानवान् पुरुष है, उसको बड़े पदार्थ और देश-काल-संयुक्त विश्व तुच्छ भासित होता है और वह उन्हें असत्य जानता है। पर जो अज्ञानी है,
- निर्वाण प्रकरण * ४१५
उसको संकल्पसृष्टि बड़ी होकर भासित होती है । जैसे पहाड़ बड़ा भी होता है, परन्तु जिसकी दृष्टि से दूर है, उसको महालघु और तुच्छ सा लगता है और चींटी के निकट तुच्छ मृत्तिका का ढेला भी पहाड़ के समान है, वैसे ही ज्ञानी की दृष्टि में यही जगत् नहीं, इससे बड़ा जगत् भी तुच्छ लगता है । पर अज्ञानी को तुच्छ भी बड़ा लगता है ।
हे राम ! यह विश्व भ्रम से सिद्ध हुआ है । जैसे भ्रम से सीपी में रूपा और रस्सी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के प्रमाद से यह विश्व भासित होता है, पर आत्मा से भिन्न नहीं है । जैसे निद्रादोष से जीव अपने अङ्ग भूल जाते हैं और जागने पर सब अङ्ग देख पड़ते हैं, वैसे ही अविद्यारूपी निद्रा में सोया हुआ जीव जब जागता है, तब उसे सब विश्व अपना रूप दिखाई देता है । जैसे स्वप्न से जागा हुआ पुरुष स्वप्न के विश्व को अलग ही देखता है, वैसे ही यह विश्व अपना रूप ही देख पड़ेगा । हे राम ! जब मनुष्य निद्रा में होता है, तब उसे शुभ-अशुभ विश्व में रागद्वेष कुछ नहीं होता, और जब जागता है तब इष्ट में राग और अनिष्ट में द्वेष होता है, इसी प्रकार जब तक विश्व में हेयोपादेय बुद्धि है, तब तक वह सर्वज्ञ हो तो भी मूर्ख है । हे राम ! जब जड़ हो जाय, तब कल्याण हो । जड़ होना यही है कि दृश्य से रहित आत्मा में स्थित हो । वह आत्मा चिन्मात्र है । जब तक आत्मा से भिन्न जो कुछ सत्य अथवा असत्य जानता है, तब तक स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती । जब संवित् न फुरे, तब स्वरूप का साक्षात्कार हो । इससे वासना का त्याग करो । यह स्थावर-जङ्गम जगत् जो तुमको दिखता है सो सब ब्रह्मस्वरूप है । जब तुम ऐसे निश्चय करोगे, तब सब विवर्तों का अभाव हो जावेगा, और आत्मपद ही शेष रहेगा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जीव जो आपने कहा, सो जीव का स्वरूप क्या है ? वह आकार को कैसे ग्रहण करता है ? उसका अधिष्ठान परमात्मा कैसे है ? उसके रहने का स्थान कौन है ? कहिये ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जीव शुद्ध परमात्मतत्त्व, निर्विकल्प, चिन्मात्र पद है, उसमें चैतन्योन्मुखत्व हुआ, अर्थात् 'मैं हूँ' ऐसे जो
४१६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
चित्कला अज्ञानरूप फुरी, उसको देह का सम्बन्ध हुआ है। उसी का नाम जीव है। वह जीव न सूक्ष्म है, न स्थूल है, न शून्य है, न अशून्य है, न थोड़ा है, न बहुत है, केवल शुद्ध आत्मतत्त्वमात्र है। वह न अणु है, न स्थूल है, अनन्त चैतन्य आकाशरूप है। उसी को जीव कहते हैं। स्थूल से स्थूल और सूक्ष्म से सूक्ष्म वही है। अनुभव चैतन्य सर्वगत जीव है। उसमें वास्तव शब्द कोई नहीं। और जो कोई शब्द है सो प्रतियोगी में मिलकर हुआ है। जीव अद्वैत है। उसका प्रतियोगी कैसे हो? यह जीव का स्वरूप है। चैत्य के संयोग से जीव हुआ है। उसका अधिष्ठान चैतन्य आकाश, निर्विकल्प, चैत्य से रहित, शुद्ध, चैतन्य परमात्मतत्त्व है। उसमें जो संवित् फुरी है, उसी का नाम जीव है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल और सबका बीज है। उसी को विराट् कहते हैं। उनका शरीर मनोमय है। वह आदि परमात्मतत्त्व में फुरा है और अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ, अर्थात् अस्वच्छता को नहीं प्राप्त हुआ। वह अपने को सबका आत्मा जानता है। इसका नाम विराट् है। उसका प्रथम शरीर मनोमात्र और शुद्ध प्रकाशरूप गगनरूपी मल से रहित अनन्त आत्मा है, वह मन, कर्मों और देहों का बीज है; सबमें व्याप्त रहा है और सब जीवों का अधिष्ठाता है। उसी ने संकल्प से ये जीव रचे हैं, और पञ्चज्ञान इन्द्रिय, अहंकार, मन और संकल्प, ये आठों आकार ग्रहण किये हैं। परमार्थरूप को छोड़ फुरने में जो आकार उत्पन्न हुए हैं, उनको ग्रहण करने का नाम पुर्यष्टका है। फिर इन इन्द्रियों के छिद्र रचे और स्थूल रूप रचकर उनमें आत्मा प्रतीत किया। जैसे जीव शयनकाल में जाग्रत् शरीर को त्यागकर स्वप्न-शरीर अङ्गीकार करता है, वैसे ही शुद्ध, चिन्मात्र, निर्विकार, अद्वैतस्वरूप को त्यागकर उसने वासनामय शरीर अङ्गीकार किया है। पर वास्तव स्वरूप का त्याग नहीं किया और स्वरूप से नहीं गिरा। शुद्ध निर्विकल्प भाव को त्यागकर विराट्-भाव ग्रहण किया है।
इसी प्रकार आगे उस पुरुष ने ज्ञान से चारों वेद रचे और नीति को
❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ४१७
निश्चित किया। नीति इसे कहते हैं कि यह पदार्थ ऐसे हो और इतने काल तक रहे। निदान यह रचना रची और जो-जो संकल्प करता गया सो सो देश, काल, पदार्थ, दिशा, ब्रह्माण्ड सब होते गये। ईश्वर, विराट्, आत्मा, परमेश्वर इत्यादि सब जीव के नाम हैं। पर जीव का वासनामय स्वरूप झूठ नहीं। वासना के शरीर ग्रहण करने से वासनारूप कहा है, पर उसका वास्तवरूप शुद्ध, निर्विकार और अद्वैत है और कभी स्वरूप में अन्य अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ; सदा ज्ञानरूप, अद्वैत और परमशुद्ध है। उसको अपने चैतन्य स्वभाव से चैत्य का संयोग हुआ है। इसी से कहा कि उसका वपु वासनारूप है। उसी आदि-जीव में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता, दैत्य, आकाश, मध्यलोक, पाताल और त्रिलोकी उत्पन्न हुई है। जैसे दीपक से दीपक जलता है और जल में जल होता है, वैसे ही सब विराट्स्वरूप हैं। महाआकाश उस विराट् का उदर है; समुद्र रुधिर है; नदियाँ नाड़ी हैं और दिशा वपु है। उसके उदर में सुमेरु पर्वत सहित कई ब्रह्माण्ड समाये रहते हैं। पवन उसका सिर है। उच्छ्वास पवन प्राणवायु है; पृथ्वी मांस है; सुमेरु आदिक पर्वत हाथ हैं; तारे रोमावली हैं; सहस्र शीश नेत्र हैं। वह अनन्त और अनादि है। चन्द्रमा उसका कफ है, जिसमे अमृत स्रवता है और प्राणी उपजते हैं। सूर्य पित्त है, जो सबको उत्पन्न करनेवाला है और सब मन, सब कर्मों और सब शरीरों का आदि-बीज विराट् है। हे राम! जीव इस चित्त के सम्बन्ध से तुच्छ हुआ है, पर वास्तव में परमात्मस्वरूप है। जैसे महाकाश घट के संयोग से घटाकाश होता है, वैसे ही विराट् परमात्मा ने फुरने से सृष्टि रची है और उसमें अहं प्रत्यय किया है, इससे तुच्छ हुआ है। यह इसको मिथ्या भ्रम हुआ है। जैसे स्वप्न में कोई अपना मरना देखता है, वैसे ही वह अपने को दृश्य देखता है। लघुता भी आत्मा की अपेक्षा से है; दृश्य में विराट् है और आत्मा में इसका अनुभव है।
हे राम! इसी प्रकार उसने उपजकर सृष्टि रची है। जैसे एक विराट् पुरुष ने आदि में निश्चय किया है, वैसे ही अब तक है। यह आप ही
४१८ ✴ योगवाशिष्ठ ✴
उपजा है और आप ही लीन हो जाता है । हे राम ! जिस प्रकार आत्मा में विराट् की उत्पत्ति हुई है, वैसे ही सब जीवों की हुई है । यह सब विराट्रूप है, परन्तु जो स्वरूप से उपजकर दृश्य में तद्रूप हुए हैं और जिनकी वास्तवस्वरूप भूल गया है, वे तुच्छरूप जीव हुए और जो स्वरूप में फुरकर स्वरूप में न गिरा और जिसे आगे अपना ही संकल्प-रूप विश्व देखकर प्रमाद न हुआ, उसका नाम विराट् आत्मा है । हे राम ! जीव चैतन्य और निराकाररूप है । उसको शरीर का संयोग कल्पना में हुआ है । यह जब अपने को दृश्य-संयुक्त देखता है, तब महाआपदा को प्राप्त होता है, और जब द्वैत से रहित निर्विकल्प होकर देखता है, तब शुद्ध चैतन्य आत्मपद को प्राप्त होता है । हे राम ! यह विराट् सबको उत्पन्न करता है । ऐसे कई विराट् आत्मपद से उदय हुए हैं; कई मिट गये हैं और कई आगे होंगे । जैसे समुद्र में कई तरङ्ग, बुलबुले उठते हैं और लीन होते हैं, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र में कई विराट् उठते हैं; कई लीन होते हैं और कई उपजेंगे । ऐसा परमात्मा सबका अधिष्ठान है और सबमें भीतर-बाहर पूर्ण ज्ञानस्वरूप व्याप्त है । सोई तुम्हारा अपना रूप अनुभवरूप है । हे राम ! इस संवेदन को त्यागकर देखो, वही परमात्मस्वरूप है । यह जो कुछ तुमको भासित होता है, उसको विचारकर त्यागो । जब तुम इसका त्याग करोगे, तब तुम्हारा चिन्मात्र परम शुद्ध स्वरूप तुमको भासित होगा—उसके आगे चैतन्य ही आवरणरूप है । जैसे सूर्य के आगे बादलों का आवरण होता है, और जब तक बादल होते हैं, तब तक सूर्य का प्रकाश ज्यों का त्यों नहीं भासित होता, पर जब बादल दूर होते हैं, तब प्रकाश स्वच्छ दिखता है, वैसे ही जब वासना निवृत्त होवेगी, तब शुद्ध आत्मा ही प्रकाशमान होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विराडात्मवर्णनं नाम शताधिकैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह परमात्मा पुरुष स्फुरण में जीवसंज्ञा को प्राप्त हुआ है । स्फुरण में भी वही है, पर अपने स्वरूप को नहीं
- निर्वाण प्रकरण * ४१६
जानता, इसी से दुःख पाता है। जैसे पवन चलता है तो भी वही है और जब ठहरता है तो भी वही है—दोनों में तुल्य है। वैसे ही आत्मा सर्वदा एकरस है, कभी परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त हुआ। जीव प्रमाद से दृश्य की कल्पना करता है और अपने को दृश्य जानता है, इसी से दुःख पाता है। पर जो इसको अपना स्वरूप स्मरण रहे तो दृश्य में भी अपना रूप भासित हो, और जो निःसंकल्प हो तो भी विश्व अपना रूप भासित हो। विश्व भी इसी का रूप है, परन्तु अविचार से भिन्न-भिन्न भासित होता है। जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्नवाले का रूप है, परन्तु निद्रादोष से वह नहीं जानता और जब जागता है तब जानता है कि वह मैं ही था, वैसे ही यह प्रपञ्च सब तुम्हारा स्वरूप है। तुम अपने स्वरूप में निरहंकार स्थित होकर देखो तो कुछ नहीं बना। जो आत्मा से भिन्न तुम कुछ बनोगे तो प्रपञ्च विश्व भासित होगा और जो आत्मस्वरूप में स्थित हो तो अपना ही रूप भासित होगा और प्रपञ्च का अभाव हो जावेगा। हे राम! शून्य-अशून्य, जड़-चेतन, किंचन निष्किंचन, सत्य-असत्य सब आत्मा ही पूर्ण है, तब निषेध किसका करिये? हे राम! वह ऐसा अनुभवरूप है, जिसमें सब पदार्थ सिद्ध होते हैं; पर ऐसे आत्मा को मूर्ख लोग नहीं जानते। जैसे जन्म का अन्धा मार्ग को नहीं जानता, वैसे ही महाअन्ध अज्ञानी जाग्रती-ज्योति आत्मा को नहीं जानते। जैसे उलूकादिक उदय हुए सूर्य को नहीं जानते, वैसे ही वासना से घिरे हुए अपने को नहीं जान सकते। जैसे जाल में पक्षी फँसा होता है, वैसे ही ये जीव माया में फँसे हुए हैं। इसी का नाम बन्धन है। वासना के वियोग का नाम मुक्ति है।
हे राम! विषमता से जीव संज्ञा हुई है। जब सम हुआ तब ब्रह्म है। वह ब्रह्म अहंकार को त्यागकर होता है जैसे खप्पर के संयोग से घटाकाश कहलाता है, और जब खप्पर टूट जाता है, तब महाकाश हो जाता है, वैसे ही जब अहंकार नष्ट होता है, तब आत्मस्वरूप हो जाता है। हे राम! अज्ञान से जीव
४२० * योगवाशिष्ठ *
एकदेशी हुआ है। जब परिच्छिन्नता का वियोग हो, तब आत्मस्वरूप होता है। हे राम ! अपने वास्तव निर्गुणस्वरूप में गुणों का संयोग उपाधि से भानित होता है, वही अनर्थरूप है। जब निर्गुण और सगुण की गाँठ छूटेगी, तब अपना केवल अद्वैततत्त्व आप भानित होगा। वह अनामय और दुःख से रहित है, सत् असत् से परे ज्ञानरूप और आदि-अन्त से रहित है। उसके पाने से फिर कुछ पाना शेष नहीं रहता और उसको जानने से फिर कुछ जानना नहीं रह जाता। ऐसा जो उत्तम पद है, उसको आत्मतत्त्व में प्राप्त होगे। हे राम ! यह जो ज्ञान तुमसे कहा है, उसका आश्रय लेकर तुम ज्ञानवान् होना; ज्ञानबन्ध न होना। ज्ञानबन्ध से तो अज्ञानी भला है; क्योंकि अज्ञानी भी साधुओं के संग और सत्शास्त्रों को सुनने से ज्ञानवान् होता है; पर ज्ञानबन्ध मुक्त नहीं होता। जैसे रोगी कहे कि मुझको कोई रोग नहीं है, मैं नीरोग हूँ, तो वह वैद्य की औषध भी नहीं खाता क्योंकि वह अपने को नीरोग जानता है; वैसे ही जो ज्ञानबन्ध है वह सन्तों का संग और सत्शास्त्रों का श्रवण भी नहीं करता, इससे वह अन्धतम को प्राप्त होता है।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान और ज्ञानबन्ध का लक्षण क्या है और ज्ञानबन्ध का फल क्या है, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष ने आत्मा के विशेषण शास्त्रों में श्रवण किये हैं कि आत्मा नित्य शुद्ध, ज्ञानस्वरूप और तीनों शरीरों से भिन्न है, और ऐसे सुनकर अपने को वही मानता है, पर विषयों को भोगने की सदा तृष्णा रहता है कि किसी प्रकार इन्द्रियों के विषय मुझे प्राप्त हों, ऐसा पुरुष ज्ञानबन्ध है। वह बोधशिल्पी है, जो कर्मफल के विचार से रहित है अर्थात् भला-बुरा विचार नहीं करता और उन्हें करता है। और जो मुख से शुभ-अशुभ निरूपण करता है, वह शास्त्रशिल्पी है और फल के लिए कर्म करता है। कोई ऐसा है कि अपने को शास्त्रोक्त उत्तम मानता है; शास्त्रों के बहुत प्रकार से अर्थ भी कहता है, पढ़ता और पढ़ाता भी है, पर विषयों में बँधा हुआ है और सदा विषयों का चिन्तन करता है-
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
४२१
ऐसा पुरुष ज्ञानबन्ध है। इसी कारण वह अर्थशिल्पी भी कहलाता है अर्थात् चितेरा करने को समर्थ है और धारण करने को समर्थ नहीं। हे राम ! एक प्रवृत्तिमार्ग है और दूसरा निवृत्तिमार्ग है। प्रवृत्ति संसारमार्ग है और निवृत्ति आत्मज्ञानमार्ग है। जिस पुरुष ने निवृत्तिमार्ग ग्रहण किया है, पर प्रवृत्तिमार्ग में अर्थात् बहिर्मुख विषयों की ओर प्रवृत्त होता है; इन्द्रियों के विषयों की चाह करता और विषयों से उपरत नहीं होता एवम् उनसे संतुष्ट होकर स्वरूप का अभ्यास नहीं करता, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है।
हे राम ! जो पुरुष श्रुति के कहे शुभकर्म फल की कामना हृदय में रखता है, वह पुरुष ज्ञान के निकटवर्ती है, तो भी ज्ञानबन्ध है। जिसको आत्मा में प्रीति भी है, पर जो विषय का चिन्तन करता है और अपने को उत्तम मानता है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है। और जो आत्मतत्त्व का यथार्थ निरूपण करता है और स्थित नहीं है, वह ज्ञान-आभास है और उसको ज्ञान का फल नहीं मिलता। जिस पुरुष ने सिद्धि और ऐश्वर्य पाया है और उससे अपने को बड़ा जानता है, पर आत्मज्ञान से रहित है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है। हे राम ! निदि-ध्यास से ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे शान्ति का प्रकाश होता है। जब तक शान्ति नहीं प्राप्ति होगी, तब तक अपने को बड़ा ज्ञानी न माने। हे राम ! मनुष्य ज्ञान से बड़ा होता है। जब तक ज्ञान न उपजे तब तक आत्मपरायण हो; अभ्यास और यत्न करे; शुभ व्यवहार में प्राणों की रक्षा के निमित्त उपजीविका उत्पन्न करे और ब्रह्मजिज्ञासा के लिए प्राणों की धारणा करे। ब्रह्मजिज्ञासा दुःखरूप संसार-सागर से मुक्त होने के लिए है। फिर संसारी न हो और आत्म-परायण हो। जब आत्मपरायण होगे, तब सब दुःख मिट जावेंगे। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मपद के प्राप्त होने पर सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। उस पद के प्राप्त होने का उपाय यह है कि सत्शास्त्रों में जो विशेषण सुने हों उसको समझकर बारम्बार अभ्यास करे; दृश्य से उपरत हो और उनको
४२२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
मिथ्या जानकर विरक्त बने। इसी से आत्मपद की प्राप्ति होती है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानबन्धयोगो नाम शताधिकद्विचत्वारिंशत्तमःसर्गः ॥ १४२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिज्ञासु होकर ज्ञाननिष्ठ होना और जो कुछ गुरुशास्त्रों में आत्मविशेषण सुने हैं उनमें अहं प्रत्यय करके स्थित होना, इसी का नाम ज्ञाननिष्ठा है। जीव इस ज्ञाननिष्ठा से परम उच्च पद को प्राप्त होता है, जो सबका अधिष्ठान है। जब उसमें स्थित हुआ, तब कर्मों के फल का ज्ञान नहीं रहता; क्योंकि शुभकर्मों के फल में राग नहीं रहता और अशुभ कर्मों के फल में द्वेष नहीं होता। ऐसा पुरुष ज्ञानी कहलाता है। वह शान्त-चित्त रहता है, अकृत्रिम शान्ति को प्राप्त होता है, किसी विषय के सम्बन्ध में नहीं फँसता। उसकी वासना की गाँठ टूट जाती है। हे राम ! बोध वही है जिसको पाने से फिर जन्म न हो, और जो जन्ममरण से रहित हो उसी को ज्ञानी कहते हैं। जब संसार से विमुख हो और संसार की सत्यता न भासित हो, तब जानिये कि फिर जन्म न पावेगा; क्योंकि उसकी संसार की वासना नष्ट हो गई है। हे राम ! जिससे ज्ञानी की वासना नष्ट होती है, वह भी सुनो। वह इस संसार का कारण नहीं देखता। जो पदार्थ कारण से उत्पन्न नहीं हुआ, वह सत्य नहीं होता; इससे संसार मिथ्या है। जैसे रस्सी में सर्प भासित होता है तो उसका कारण कोई नहीं, वह भ्रम से सिद्ध हुआ है, वैसे ही यह विश्व कारण के बिना दिखता है, इससे मिथ्या है। जो मिथ्या है तो उसकी वासना कैसे हो ? हे राम ! जो प्रवाहपतित काय प्राप्त हो, उसमें ज्ञानी विचरता है और संकल्प से रहित होकर अपना अभिमान कुछ नहीं करता कि इस प्रकार हो और इस प्रकार न हो। वह हृदय से आकाश की तरह संसार से न्यारा रहता है और वासना से शून्य होता है। ऐसा पुरुष पण्डित कहलाता है।
हे राम ! यह जीव परमात्मारूप है। जब अचेतन अर्थात् संसार की वासना से रहित हो, तब आत्मपद को प्राप्त हो। जैसे आम का
ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ४२३
वृक्ष फल से रहित होने पर भी उसका नाम आम है, परन्तु निष्फल है, वैसे ही यह जीव आत्मस्वरूप है, परन्तु चित्त के सम्बन्ध से इसका नाम जीव है। जब चित्त को त्याग करे, तब आत्मा हो। जैसे आम के पेड़ में फल लगने से वह शोभित होता है और सफल कहलाता है। वैसे ही जब जीव आत्मपद को प्राप्त होता है, तब महाशोभा से विराजता है। हे राम ! ज्ञानवान् पुरुष कर्म के फल की स्तुति नहीं करता अर्थात् इन्द्रियों के इष्ट विषय की चाह नहीं करता, जैसे जिस पुरुष ने अमृत-पान किया हो वह मद्यपान करने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिसको आत्मसुख प्राप्त होता है, वह विषयों के सुख की इच्छा नहीं करता। जो किसी पदार्थ को पाकर सुख मानते हैं, वे मूढ़ हैं। जैसे कोई पुरुष कहे कि बन्ध्या के पुत्र के काँधे पर चढ़कर नदी के पार उतरते हैं तो वह पुरुष महामूढ़ है; क्योंकि जब बन्ध्या के पुत्र है ही नहीं तो उसके काँधे पर कैसे चढ़ेगा, वैसे ही जो कोई कहे कि मैं संसार के किसी पदार्थ को लेकर मुक्त हूँगा तो वह महामूढ़ है। हे राम ! ऐसा पुरुष ज्ञान से शून्य है। उसकी इन्द्रियाँ स्थिर नहीं होतीं। वह शास्त्रों के अर्थ प्रकट भी करता है, पर परमात्मा के ज्ञान से रहित है। उसको इन्द्रियाँ बलपूर्वक विषयों में गिरा देती हैं। जैसे चील पक्षी आकाश में उड़ता-उड़ता मांस को देखकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है, वैसे ही अज्ञानी विषय को देखकर गिर पड़ता है। इससे मन सहित इन इन्द्रियों को वश करो और युक्ति से तत्परायण और अन्तर्मुख बनो। यह जो संवेदन उठता है, उसका त्याग करो। जब इसका स्फुरण निवृत्त होगा, तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा। जब परमात्मा का साक्षात्कार होगा, तब रूप, अवलोक और मनस्कार की जो त्रिपुटी है, उसके अर्थ की सब भावना जाती रहेगी; केवल आत्मतत्त्व ही प्रत्यक्ष भासित होगा और संसार का अत्यन्त अभाव हो जावेगा।
हे राम ! संसार का आदि परमात्मतत्त्व है और अन्त भी वही है। जैसे स्वर्ण गलाइये तो भी स्वर्ण है और जो न गलाइये तो भी स्वर्ण है, वैसे ही जब सृष्टि का अभाव होता है तब भी आत्मा ही शेष रहता
४२४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है, जब सृष्टि उपजी न थी तब भी आत्मा ही था और मध्य भी वही है। परन्तु यह सम्यक्दर्शी को भासित होता है, असम्यक्दर्शी को आत्मसत्ता नहीं भासिते होती। हे राम ! विश्व आत्मा का परिणाम नहीं, चमत्कार है। जैसे सुवर्ण गलता है तो उसकी रैनीसंज्ञा होती है अथवा शलाका कहाती है। यद्यपि उसमें भूषण नहीं हुए तो भी उसका चमत्कार ऐसा ही होता है कि उससे भूषण उपजकर लीन हो जाता है। जैसे सूर्य की किरणें जल का आभास देती हैं, वैसे ही विश्व आत्मा का चमत्कार है। बना कुछ नहीं, आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है और उसका चमत्कार विश्व होकर स्थित हुआ है। हे राम ! जब तुमने ऐसे जाना कि केवल आत्मसत्ता है, तब वासना का क्षय हो जावेगा और चेष्टा स्वाभाविक होगी। जैसे वृक्ष के पत्ते पवन से हिलते हैं, वैसे ही शरीर की चेष्टा प्रारब्धवेग से होगी। हे राम ! देखने भर को तुम्हारे शरीर में क्रिया होगी और हृदय में शून्य भासित होगा। जैसे यन्त्र की पुतली संवेदन बिना तागे से चेष्टा करती है, वैसे ही शरीर की चेष्टा प्रारब्ध से स्वाभाविक होगी और तुमको उसका अभिमान न होगा। जैसे कोई पुरुष दूध के लिए अहीर के पास बर्तन ले जाय और उसको दूध दुहने में कुछ विलम्ब हो तो कहे कि बर्तन यहाँ रखा है, मैं घर से कोई काम शीघ्र ही कर आऊँ तो यद्यपि वह घर का काम करने लगता है, पर उसका मन दूध की ओर ही रहता है कि शीघ्र ही जाऊँ, ऐसा न हो कि वह दुहता हो, वैसे ही तुम्हारी क्रिया प्रारब्धवेग से होगी, पर मन आत्मतत्त्व में रहेगा और तुम अहंकार से रहित होगे। जबतक अहंकार उठता है, तबतक परिछिन्न अर्थात् तुच्छ जीव है, उसको शरीर मात्र का ज्ञान होता है। पर अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित जो जीव है, उसको नखशिखपर्यन्त शरीर का ज्ञान होता है। इसी में आत्माभिमान होता है। ज्ञान नहीं होता, इससे जीव है। जो पहले तुमसे कहा है, वह विराट् ही ईश्वर है। वह सब शरीर और अन्तःकरण का ज्ञाता, सब लिंग शरीर का अभिमानी, सबको अपना रूप जानता है।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४२५
हे राम ! यद्यपि वह विश्वरूप है, तो भी अहंकार से तुच्छ-सा हुआ है । जैसे घनघटा से भिन्न हुआ एक मेघ बादल कहाता है, और घट से अनन्त आकाश घटाकाश कहाता है, पर वह बादल भी मेघ है और घटाकाश भी महाकाश है, वैसे ही अहं के स्फुरण से जीव परिच्छिन्न हुआ है, सो फुरना दृश्य में हुआ है, और दृश्य फुरने में हुआ है । जैसे फूलों में गन्ध और तिलों में तेल है, वैसे ही फुरने में दृश्य है । हे राम ! आत्मा में बुद्धि आदिक स्फुरण है, अर्थात् जब 'मैं हूँ' ऐसे फुरता है, तब आगे दृश्य होता है और जब अहंकार होता है, तब आगे देह इन्द्रियादिक विश्व रचता है । इससे फुरने में दृश्य हुआ और फुरना दृश्य में हुआ । देह, इन्द्रियाँ, मन आदिक जो दृश्य हैं, उनमें जीव के अहंप्रत्यय से फुरना हुआ है; इसी कारण इसकी जीवसंज्ञा हुई है । जब फुरना या अहंभाव नष्ट हो जावे तब आत्मा का साक्षात्कार हो । यह जन्म, मरण, आना, जाना आदि विकारों से युक्त प्रपञ्च भासित होता है तो भी मिथ्या है; क्योंकि विचार करने से कुछ नहीं रहता । जैसे केले के खम्भे में कुछ सार नहीं; वैसे ही विचार करने से प्रपञ्च नहीं रहता । जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना जन्म, मरण, आना, जाना देखता है, परन्तु वह सब मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत् की सब क्रिया भी मिथ्या है ।
हे राम ! जो परावरदर्शी है, वह इन सब अवस्थाओं में निर्विकल्प है । वह जन्मता भी है । परन्तु नहीं जन्मता; और सब क्रिया करता भी है, परन्तु नहीं करता । वह सबको स्वप्नवत् समझता है; क्योंकि स्वरूप से कभी कुछ नहीं हुआ । हे राम ! ज्ञानी जाग्रत् में भी ऐसे ही देखता है । जब यह आत्मपद में जागता है, तब सब विकारों का अभाव हो जाता है, कोई विकार नहीं भासित होता । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह बँधा हुआ है; क्योंकि अभिलाषा ही दुःखदायक है । यद्यपि वह राजा हो, पर उसके हृदय में अभिलाषा है, इससे उसे दरिद्री जानो । जिस पुरुष का छादन, भोजन, शयन कष्ट से देखते हो, अर्थात् भोजन भिक्षा माँगकर अथवा किसी और यत्न से होता है, छादन भी साधारण सा पहिनता है और शयन करने