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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

७५० योगवाशिष्ठ।

जिस पुरुष ने अविद्या को जाना है वह फिर उसकी संगति नहीं करता और जिस ब्राह्मण ने चाण्डालों की सभा जानी फिर वह उनकी संगति नहीं करता, तैसे ही आत्मविचार से मन को चूर्ण किया तब फिर वह नहीं स्फुरता। जिस पुरुष ने अविद्यारूप जगत् को जाना है वह फिर जगत् के पदार्थों में आसक्त नहीं होता। हे रामजी! विष जो मधुर जल से मिला हो तो जबतक जाना नहीं तब तक उसको कोई पान करता है और जब उसको जाना तब फिर पान नहीं करता तैसे ही जब तक इस संसार को ज्यों का त्यों नहीं जाना तब तक इसके पदार्थों की इच्छा करता है पर जब जाना कि यह मायामात्र है तब इसकी इच्छा नहीं करता। हे रामजी! सुन्दर स्त्री जो नाना प्रकार के वस्त्र और भूषणों सहित दृष्टि आती है उनको ज्ञानवान् जानता है कि ये अस्थि, मांस, रुधिर आदिक की पुतलियाँ बनी हैं और कुछ नहीं जो उनकी इच्छा त्यागता है तो वह विरक्त हो जाता है। जैसे मूर्ति पर नील, पीत, श्यामरङ्ग लिखे होते हैं तैसे ही उनके वस्त्र और केश हैं। हे रामजी! जिस पुरुष को आत्मा का साक्षात्कार होता है उसको जगत् में वस्तु-बुद्धि नहीं होती। अवस्तु में वस्तुबुद्धि तब होती है जब वस्तु का विस्मरण होता है सो ज्ञानवान् को तो सदा स्वरूप का स्मरण है उसको अवस्तु में वस्तुबुद्धि कैसे हो? जिसको आत्मबुद्धि हुई है उसको विस्मरण नहीं होता। जैसे किसी पुरुष ने किसी के पास गुड़ रखा हो और वह खा जावे तो उसको वह दण्ड आदि दे सकेगा परन्तु उसका रस दूर नहीं कर सकता, तैसे ही जिसको आत्मा का अनुभव हुआ है उसको कोई कुछ नहीं कर सकता। हे रामजी! जैसे कुलटा नारी का किसी पुरुष से चित्त लगता है तो वह गृह का कार्य भी करती है परन्तु चित्त उसका सदा उसमें ही रहता है, तैसे ही ज्ञानवान् क्रिया करता है परन्तु उसका चित्त सदा आत्मपद में रहता है और जैसे परव्यसनी नारी को उसका भर्त्ता दण्ड भी देता है पर तो भी स्पर्श का सुख उसके हृदय से दूर नहीं कर सकता, तैसे ही जिसको आत्मानुभव हुआ है उसको कोई दूर नहीं कर सकता और जो देवता और दैत्य दूर नहीं कर सकते

उपशम प्रकरण । ७५१

तो औरों की क्या वार्त्ता है। जो बड़े सुख अथवा दुःख का प्रवाह आन पड़े तो भी उनको स्पर्श नहीं कर सकता, कर्त्ता हुआ भी वह अकर्त्ता है। जैसे परव्यसनी नारी परपुरुष के संयोग से सुख पाती है परन्तु उसको स्पर्श के सुख का अनुभव हुआ है उसके संकल्प से अखण्ड अनुभव करती है उससे उसको दुःख कुछ नहीं भासता, तैसे ही जिसको आत्मसुख हुआ है उसको दुःखसुख कुछ नहीं भासते। हे रामजी! सम्यक्ज्ञान से जिसकी अविद्या नष्ट हुई है वह दुःख नहीं देखता। जो उसके अंग काटे जावें तो भी उसको दुःख नहीं होता और शरीर के नष्ट हुए वह नष्ट नहीं होता सुख दुःख उसके नष्ट हो गये हैं और सदा वह आत्मपद में निश्चय रखता है। संकटवान् भी वह दृष्ट आता है परन्तु उसका संकट कोई नहीं। वह वन में रहे अथवा गृह में रहे, व्यवहार करे अथवा समाधि करे, वह सदा ज्यों का त्यों रहता है उसको खेद कष्ट किसी प्रकार से नहीं होता।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे नीरास्पदमौनविचारो नामैकोनसप्ततितमस्सर्गः ॥ ६९ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! राजा जनक राजव्यवहार करता था परन्तु आत्मपद में स्थित था इससे उसको कलङ्क न हुआ और सदा विगतज्वर ही रहा, तुम्हारा पितामह राजा दिलीप भी सर्व आरम्भों को करता रहा परन्तु रागद्वेष को न प्राप्त हुआ और जीवन्मुक्त होके चिर-पर्यन्त पृथ्वी का राज्य करता रहा, राजा अज नाना प्रकार के युद्ध और राजव्यवहार की पालना करता हुआ सदा जीवन्मुक्त स्वभाव में स्थित था, राजा मानधाता नाना प्रकार की युद्ध चेष्टा करता था परन्तु सदा परमपद में स्थित रहा और कदाचित् मोह को न प्राप्त हुआ, राजा बलि महात्यागी पाताल में राजव्यवहार को करता भी दृष्ट आया परन्तु स्वरूप के ज्ञान से सदा शान्तरूप जीवन्मुक्त होकर विचरता था, नभचर दैत्यों का राजा सदा नाना युद्ध आदिक क्रिया में रहा करता था और देवताओं के साथ सदा विरोध रखता था परन्तु हृदय में उसके कुछ ताप न था। इन्द्र ने युद्ध में वृत्रासुर दैत्यों को मारा, सदा शीतल रहा कदाचित् क्षोभ को न

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योगवाशिष्ठ ।

प्राप्त हुआ और दैत्यों का राजा प्रह्लाद पाताल में राज्य करता रहा परन्तु हृदय में उसे कुछ क्षोभ न आया । हे रामजी ! सम्बर नामक दैत्य अपनी सृष्टि के रचने को उदय हुआ पर रचने में बन्धवान् था वह सदा साम्बरी मायापरायण रहा और माया से एक मायावीरूप होकर स्थित हुआ। हे रामजी! यह संसार जो साम्बरी मायारूप है उसको साम्बरीवत् त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो । विष्णु भगवान् सदा दैत्यों को मारते और युद्ध करते रहते हैं पर हृदय में अलेपबुद्धि है इससे सदा सुखी जीवन्मुक्त हैं और मुर दैत्य ने विष्णु से युद्ध में शरीर छोड़ा परन्तु हृदय में उसका कुछ सम्बन्ध न था इससे जीवन्मुक्त सुखी रहा और पीड़ा को न प्राप्त हुआ । हे रामजी ! सब देवताओं का मुख अग्नि है सो यज्ञलक्ष्मी को चिरकाल पर्यन्त भोगता है परन्तु ज्ञानवान् है इससे क्षोभवान् नहीं होता, सदा शीतल रहता है । देवता सदा चन्द्रमा की किरणों से अमृत पान करते हैं परन्तु चन्द्रमा को कुछ क्षोभ नहीं होता और देवगुरु बृहस्पति ने स्त्री के लिये चन्द्रमा से युद्ध किये और देवताओं के निमित्त नाना प्रकार के कर्म करते हैं परन्तु रागद्वेष को नहीं प्राप्त होते इससे जीवन्मुक्त हैं । हे रामजी ! दैत्यों के गुरु शुक्रजी दैत्यों के निमित्त सदा यत्न करते रहते हैं और लोभी की नाईं अर्थ चिन्तते हैं परन्तु जीवन्मुक्त हैं। जो हृदय से सदा शीतल रहता है वह कदाचित् खेद नहीं पाता । पवन प्राणियों के अंगों को चिरकाल फेरता है और चेष्टा करता है पर खेद को नहीं प्राप्त होता इससे जीवन्मुक्त है। ब्रह्मा सदा लोकों को उत्पन्न करता है और प्रलयपर्यन्त इसी क्रिया में रहता है परन्तु उसे स्वरूप का साक्षात्कार है इससे जीवन्मुक्त है । विष्णु भगवान् युद्धादिक द्वन्द्वों में रहते हैं और जरामृत्यु आदिक भावों को प्राप्त होते हैं परन्तु सदा मुक्तस्वरूप हैं सदाशिव त्रिनेत्र अर्द्धाङ्गधारी हैं परन्तु हृदय में संयुक्त नहीं हैं इससे जीवन्मुक्त हैं । गौरी मोतियों की माला कण्ठ में धारती हैं और त्रिनेत्र को सदा मालावत् कण्ठ में रखती हैं परन्तु हृदय से शीतल रहती हैं इससे जीवन्मुक्त हैं। स्वामिकार्तिक दैत्यों के साथ युद्ध करते रहे परन्तु ज्ञानरूपी रत्नों के समुद्र थे और हृदय से शीतल थे।

उपशम प्रकरण ।
७५३

सदाशिव के शृङ्गीगण अपना रक्त मांस माता को देते थे परन्तु धैर्य में
थे इससे खेद को न प्राप्त हुए और नाना प्रकार की क्रिया करते थे परन्तु
जीवन्मुक्त थे इससे सदा सुखी थे। नारद मुनि सदा मुक्तस्वभाव हैं और
सदा जगत् की क्रियाजाल में रहते हैं परन्तु क्षोभ नहीं पाते इससे जीव-
न्मुक्त हैं। मनमौन जो विश्वामित्र हैं वे वेदोक्त कर्म करते फिरते रहते हैं
इससे जीवन्मुक्त हैं। सूर्य भगवान् को दिन प्रकाश करते हैं और फिरते
रहते हैं परन्तु जीवन्मुक्त और सदासुखी रहते हैं। यह सदा जीवों को
दण्ड करते रहते हैं और क्षोभ में रहते हैं परन्तु जीवन्मुक्त हैं। इन्द्र कुबेर से
आदि लेकर त्रिलोकी में बहुत जीवन्मुक्त हैं जो व्यवहार में शीतल हैं।
कोई मूढ़ शिलावत् हो रहे हैं, कोई परम बोधवान् वन में जा स्थित हुए
हैं—जैसे भृगु, भारद्वाज और विश्वामित्र, बहुतेरे चिरकालपर्यन्त राज-
पालन करते रहते हैं—जैसे जनक, मान्धाता आदि, कोई आकाश में
बड़ी कान्ति धारकर बृहस्पति, चन्द्रमा, शुक्र, सप्तर्षि आदि का स्थित हुए
हैं, कोई स्वर्ग में अग्नि, वायु, कुबेर, यम, नारदादिक हैं, पाताल में
जीवन्मुक्त प्रह्लादादिक हुए हैं। कोई देवतारूप धारकर आकाश में स्थित
हैं कोई मनुष्यरूप धारकर मनुष्यलोक में स्थित हैं और कोई तिर्यक्यौनि
में स्थित हैं उनको सर्वथा सर्वप्रकार सर्व में सर्वात्मारूप हो भासता है, कुछ
भिन्न नहीं भासता। नाना प्रकार का व्यवहार है सो भी अद्वैत से किया
है। हे रामजी ! दिव्य विष्णु, विधाता, सर्व ईश्वर और शिव आदिक सब
आत्मा के ही नाम हैं। वस्तुरूप में जो अवस्तु है और अवस्तु में जो
वस्तु है सो अवस्तु से वस्तु तब निकलता है जब युक्ति होती है और
वस्तु से अवस्तु भी युक्ति से ही दूर होती है। जैसे अवस्तुरूप, रेत से
सुवर्ण युक्ति से निकलता है और वस्तुरूपी सोने से मैल युक्ति से दूर
होता है तैसे ही अवस्तुरूप देहादिकों में वस्तुरूप आत्मा शास्त्रों की
युक्ति से पाता है और वस्तुरूप आत्मा से दृश्यरूप अवस्तु भी शास्त्रों
की युक्ति से दूर होती है। हे रामजी ! जो पापों से भय करता है वह
जब धर्म में प्रवर्तता है तब निर्भय होता है और दुःखों के भय से जीव
आत्मपद की ओर प्रवर्तता है तब भावना के वश से असत् से सत् पाता
७५४योगवाशिष्ठ ।

है । ध्यान और योग भी सूक्ष्म है यत्न के बल से उनसे सत् को पाता है और जो असत् है वह उदय होकर सत् भासता है । जैसे बाजीगर की बाजी और शश के सींग भासि आते हैं तैसे ही आत्मा में अद्रूप जो जगत् है सो अज्ञान से दृढ हो भासता है परन्तु कल्प के अन्त में यह भी नष्ट हो जाता है । हे रामजी ! वह जो सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रादिक हैं उनके नाम भिन्न-भिन्न रहेंगे और बड़े सुमेरु आदिक पर्वत, समुद्र और भाव पदार्थ जो उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ भासते हैं वे सब नाश हो जावेंगे, क्योंकि सब मायामात्र है, कोई न रहेगा । ऐसे विचार करके इनके भाव अभाव में हर्ष शोक मत करो और समताभाव को प्राप्त हो । हे रामजी ! जो असत् है वह सत् की नाईं भासता है और जो सत् है वह असत् की नाईं भासता है इससे यथार्थ विचारकर सद्रूप आत्मपद में स्थित हो रहो और असद्रूप जगत् की आस्था त्याग के समताभाव को ग्रहण करो । इस लोक में जो अविवेक मार्ग में विचरता है वह मुक्त नहीं होता । इस प्रकार कोटि जीव संसारसमुद्र में डूबते हैं और जो विवेक में प्रवर्तते हैं वे मुक्त होते हैं । हे रामजी ! जिसका मन क्षय हुआ है उनको मुक्तरूप जानो और जिसका मन क्षय नहीं हुआ वह बन्धन में है । इससे जिसको सर्व दुःख से मुक्ति की इच्छा हो सो आत्मा का विचार करे उसी से सब दुःख नष्ट हो जावेंगे । हे रामजी ! दुःखों का मूल चित्त है और जब तक चित्त है तब तक दुःख है, जब चित्त नष्ट हो जाता है तब दुःख सब मिट जाते हैं । हे रामजी ! जब आत्मज्ञान होता है तब चित्त का अभाव हो जाता है, दुःख सब मिट जाता है और राग, इच्छा सब भय मिटकर केवल शान्तरूप होता है । जनक आदि जो जीवन्मुक्त हुए हैं सो निराग और निसन्देह होकर महाबोधवान् व्यवहार भी करते रहे परन्तु सदा शीतल चित्त रहे । इससे तुम भी विवेक से चित्त को लीन करो। हे रामजी ! मुक्त भी दो प्रकार की है-एक जीवन्मुक्ति है और दूसरी विदेहमुक्ति । जो पुरुष सब पदार्थों में असंसक्त है और जिसका मन शान्त हुआ है वह मुक्ति कहाता है और जिस पुरुष का ज्ञान से सब पदार्थों में स्नेह नष्ट हुआ है और व्यवहार करता दृष्ट आता है तो भी शीतलचित्त है वह जीवन्मुक्त

उपशम प्रकरण | ७५५

कहाता है। जो पुरुष सर्वभाव अभाव पदार्थों को त्यागकर केवल अद्वैत तत्त्व को प्राप्त हुआ है और जिसकी शरीर आदि कोई क्रिया दृष्टि नहीं आती वह विदेहमुक्त कहाता है जिसका स्नेह पदार्थों से दूर नहीं हुआ वह मुक्ति के अर्थ भी यत्न करता है तो भी बन्ध कहाता है जो युक्तिपूर्वक यत्न करता है उसको दुस्तर भी सुगम हो जाता है और जो युक्ति से रहित यत्न करता है उसको गोपद भी समुद्र हो जाता है। हे रामजी ! जिन्होंने आत्मविचार किया है उनको विस्तृत जगत्समुद्र गोपद हो जाता है और अज्ञानी को गोपद भी दुस्तर हो जाता है उसे कोई इष्ट अनिष्ट अल्प भी प्राप्त होता है तो उसमें डूब जाता है निकल नहीं सकता । उसको गोपद भी समुद्र है। ज्ञानी को अत्यन्त विभूति और ऐश्वर्य मिले अथवा उसका अभाव हो जावे तो भी वह उसमें रागद्वेष करके नहीं डूबता । हे रामजी ! अपने प्रयत्न के बल सब होता है, जो कोई प्रधान हुआ है वह प्रयत्न-रूपी वृक्ष के फल से ही हुआ है आत्मपद की प्राप्ति भी प्रयत्नरूपी वृक्ष का फल है । इससे और उपाय त्यागकर आत्मपद की प्राप्ति का प्रयत्न करो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे युक्तायुक्तविचारो नाम सप्ततितमस्सर्गः ॥ ७० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो कुछ जगज्जाल है वह सब आत्मा ब्रह्म का आभासरूप है, अज्ञान से स्थिरता को प्राप्त हुआ है और विवेक से शान्त हो जाता है । ब्रह्मरूपी समुद्र में जगतरूपी आवर्त्त जो फुरते हैं उनकी संख्या कोई नहीं कर सकता । आत्मरूपी सूर्य के जगतरूपी त्रसरेणु हैं । हे रामजी ! असम्यक्दर्शन ही जगत् की स्थिति का कारण है और सम्यक्दर्शन से शान्त हो जाता है—जैसे मरुस्थल में असम्यक् दर्शन से जल भासता है और सम्यकदृष्टि से अभाव हो जाता है । हे रामजी ! संसाररूपी अपार समुद्र से युक्ति और आत्मअभ्यास बिना तरना कठिन है। मोहरूपी जल से वह पूर्ण है, मरणरूपी उसमें आवर्त्त है, पापरूपी झाग है; बड़वाग्नि इसके अङ्गों में नरक समान है तृष्णारूपी भँवर है, इन्द्रियाँ और मनरूपी तेंदुए और मच्छ हैं, क्रोधरूपी सर्प है, जीवरूपी नदियाँ हैं उसमें प्रवेश करती हैं, और जन्ममरणरूपी आवर्त्त-

७५६ योगवाशिष्ठ ।

चक्र हैं उनसे जो तर जाता है वही पुरुष है । स्त्रियाँ जो सुन्दर लगती हैं उनके महाबलवान् नेत्र हैं जिनसे पहाड़ों को भी खींच सकती हैं और मोतियों की नाईं दाँत इत्यादिक जो सुन्दर अङ्ग हैं वे महादुःख के देने वाले बड़वाग्नि की नाईं हैं । जो इनसे तर जाता है वही पुरुष है । हे रामजी ! जो जहाज और मल्लाहों के होते भी इनको नहीं तरते उनको धिक्कार है । जहाज और मल्लाह कौन हैं सो सुनो । जिस मनुष्य के शरीर में विचारसहित बुद्धि है वही जहाज है और सन्तरूपी मल्लाह है । इनको पाकर जो संसारसमुद्र से नहीं तरते उनको धिक्कार है । ऐसे संसारसमुद्र को जो तर गया है उसी को पुरुष कहते हैं । हे रामजी ! जिस पुरुष ने आत्मविचार में बुद्धि लगाई है वह तर जाता है अन्यथा कोई नहीं तर सकता । जिसको आत्मअभ्यास दृढ़ हुआ है वह तर सकता है । हे रामजी ! प्रथम ज्ञानवान् पुरुषों के साथ विचार और बुद्धि से संसार-समुद्र को देखो । जब तुम इसको ज्यों का त्यों जानोगे तब विलास और क्रीड़ा करने योग्य होगे । हे रामजी ! तुम तो भगवान् हो प्रबोध संसारसमुद्र से तर जाओ । तुम तो समर्थ हो तुम्हारे पीछे और तुम्हारे स्वभाव को विचार के और भी संसारसमुद्र से तर जावेंगे । जो इस शुभ मार्ग को त्यागकर विषयमार्ग की ओर जाते हैं, वे संसारसमुद्र में डूबे हैं । हे रामजी ! ये जो विषयभोग हैं वे विषरूप हैं, जो इनको सेवेगा वह नष्ट होगा परन्तु जिसको ज्ञान प्राप्त हुआ है उसको यह जैसे गारुड़ मन्त्र पढ़नेवाले को सर्प दुःख नहीं दे सकता तैसे ही दुःख दे नहीं सकते । जिसका हृदय शुद्ध हुआ है वह विभूतिमान है बल, वीर्य और तेज यह तीनों तत्त्व के साक्षात्कार से बढ़ते हैं जैसे वसन्त ऋतु के आये से रस, फूल, फल सब प्रकट हो आते हैं । हे रामजी ! जिसे ज्ञानलक्ष्मी प्राप्त भई है वह पूर्ण अमृततुल्य, शीतल, शुद्ध और सम प्रकाशरूप है । इस लक्ष्मी को पाकर विदितवेद में स्थित हो रहते हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे संसारसागरयोगोपदेशो नामैकसप्ततितमसर्गः ॥ ७१ ॥

उपशम प्रकरण । ७५७

रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! तत्त्ववेत्ता के लक्षण संक्षेप मे फिर कहिये और जिनको तत्त्व का चमत्कार हुआ है उनकी वृत्ति उदारवाणी से कहिये। ऐसा कौन है जो आपके वचन सुनके तृप्त न हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जीवन्मुक्त के लक्षण मैंने तुमको बहुत प्रकार से आगे कहे हैं पर अब फिर भी सुनो। हे महाबाहो। संसार को ज्ञानवान् सुषुप्ति की नाईं जानता है और सब एषणा उसकी नष्ट हो जाती है। वह सब जगत् को आत्मरूप देखता है और कैवल्यभाव को प्राप्त होता है। संसार उसे सुषुप्तिरूप हो जाता है और आत्मानन्द से घूर्म्म रहता है वह देता है परन्तु अपने जाने में किसी को नहीं देता । और लोकदृष्टि से प्रत्यक्ष हाथोंहाथ ग्रहण करता है परन्तु अपनीदृष्टि से कुछ नहीं लेता ऐसा जो आत्मदर्शी ज्ञानवान् उदार आत्मा है वह यन्त्र की पुतलीवत् चेष्टा करता है। जैसे यन्त्र की पुतली अभिमान से रहित चेष्टा करती है तैसे ज्ञानवान् अभिमान से रहित चेष्टा करता है। देखता, हँसता, लेता, देता है परन्तु हृदय से सदा शीतलबुद्धि रहता है। वह भविष्यत् का कुछ विचार नहीं करता भूत का चिन्तन नहीं करता और वर्त्तमान में स्थिति नहीं करता । सब कामों में वह अकर्त्ता है, संसार की ओर से सो रहा है और आत्मा की ओर जाग्रत् है। उसने हृदय से सबका त्याग किया है, बाहर सब कार्यों को करता है और हृदय में किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता । बाहर जैसे प्राकृत आचार प्राप्त होता है उसे अभिमान से रहित करता है द्वेष किसी में नहीं करता और सुख दुःख में पवन की नाईं होता है। एवम् भ्रम को त्यागकर उदासीन की नाईं सब कार्य करता है न किसी की वाञ्छा है और न किसी में खेदवान् है। बाहर से सब कुछ करता दृष्टि आता है पर हृदय से सदा असंग है। हे रामजी ! वह भोक्ता में भोक्ता है, अभोक्ता में अभोक्ता है, मूर्खों में मूर्खवत् स्थित है, बालकों में बालकवत्, वृद्धों में वृद्धवत्, धैर्यवानों में धैर्यवान्, सुख में सुखी, दुःख में धैर्यवान् है। वह सदा पुण्यकर्त्ता, बुद्धिमान्, प्रसन्न, मधुरवाणी संयुक्त और हृदय से तृप्त है उसकी दीनता निवृत्त हुई है, वह सर्वथा कोमलभाव चन्द्रमा की नाईं शीतल और पूर्ण है। शुभ कर्म करने में उसे कुछ अर्थ नहीं और अशुभ में कुछ

७५८ योगवाशिष्ठ ।

पाप नहीं, ग्रहण में ग्रहण नहीं और त्याग में त्याग नहीं, वह न बन्ध है, न मुक्त है और न उसे आकाश में कार्य है न पाताल में कार्य है, वह यथावस्तु और यथादृष्टि आत्मा को देखता है उसको द्वैतभाव कुछ नहीं फुरता और न उसको बन्ध मुक्त के निमित्त कुछ कर्त्तव्य है, क्योंकि सम्यक्ज्ञान से उसके सब संदेह जल गये हैं। जैसे पिंजरे से छूटा पक्षी आकाश में उड़ता है तैसे ही शङ्का से रहित उसका चित्त आत्मप्रकाश को प्राप्त हुआ है। हे रामजी ! जिसका मन संसारभ्रम से मुक्त हुआ है और जो समरस आत्मभाव में स्थित है उसको इष्ट अनिष्ट में कुछ रागद्वेष नहीं होता, वह आकाश की नाईं सबमें सम रहता है। जैसे पालने में बालक अभिमान से रहित अङ्ग हिलाता है तैसे ही ज्ञानी की चेष्टा अभिमान से रहित होती है और जैसे मद्यपान करनेवाला उन्मत्त हो जाता है तैसे ही आत्मानन्द में ज्ञानी घूमै हो जाता है और द्वैत की सँभाल उसको कुछ नहीं रहती, हेयोपादेय बुद्धि से रहित होता है। हे रामजी ! वह सबंकी सर्व-प्रकार ग्रहण करता है और त्याग भी करता है परन्तु हृदय से ग्रहण त्याग कुछ नहीं करता। जैसे बालकों को ग्रहण त्याग की बुद्धि नहीं होती तैसे ही ज्ञानी को नहीं होती और न उसको सब कार्यों में रागद्वेष ही फुरता है वह जगत् के पदार्थों को न सत् जानकर ग्रहण करता है और न असत् जानकर त्याग करता है, सबमें एक अनुस्यूत आत्मतत्त्व देखता है, न इष्ट में सुखबुद्धि करता है और न अनिष्ट में द्वेषबुद्धि करता है। हे रामजी ! जो सूर्य्य शीतल हो जावै, चन्द्रमा उष्ण हो जावै और अग्नि अधो को धावै तो भी ज्ञानी को कुछ आश्चर्य नहीं भासता। वह जानता है कि सब चिदात्मा की शक्ति फुरती है वह न किसी पर दया करता है, और न निर्दयता करता है, न लज्जा करता है, न निर्लज्ज है, न दीन होता है, न उदार होता है, न सुखी होता है, न दुःखी होता है, और उसे न हर्ष है, न उद्वेग है, वह सब विकारों से रहित शुद्ध अपने आपमें स्थित है। जैसे शरदकाल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही वह भी निर्मल भाव में स्थित है और जैसे आकाश में अंकुर नहीं उदय होता तैसे ही उसको रागद्वेष उदय नहीं होता। हे रामजी ! ऐसा पुरुष सुख दुःख को

उपशम प्रकरण । ७५६

कैसे ग्रहण करे ? उसको जगज्जाल ऐसे भासता है जैसे जल में तरङ्ग । ऐसे जानकर तुम भी अपने स्वभाव में स्थित हो । हे रामजी ! जैसे जाग्रत् के एक निमेष में स्वप्नसृष्टि फुर आती है और एक ही क्षण में नष्ट हो जाती है, तैसे ही जाग्रत् में भी सृष्टि उपज आती है और लीन हो जाती है । जो कुछ इच्छा, अनिच्छा, दुःख, सुख, शोक, मोह आदिक विकार हैं वे सब मन में फुरते हैं, जहाँ मन होता है वहाँ विकार भी होते हैं । जैसे जहाँ समुद्र होता है वहाँ तरङ्ग भी होते हैं तैसे ही जहाँ मन होता है वहाँ विकार भी होते हैं और जहाँ चित्त का अभाव है वहाँ विकारों का भी अभाव है । जबतक चित्त फुरता है तबतक जगद्भ्रम होता है और जब विचार-रूपी सूर्य के तेज से मनरूपी बरफ का पुतला गल जाता है तब आनन्द होता है । तब सुख दुःख की दशा शान्त हो जाती है और जब सुख दुःख का अभाव हुआ तब ग्रहणत्याग भी मिट जाता है और इष्ट अनिष्ट वाञ्छित नष्ट हो जाते हैं । जब ये नष्ट हो जाते हैं तब शुभ अशुभ भी नहीं रहते और जब शुभ अशुभ न रहे तब रमणीय अरमणीय भी नष्ट हो जाते हैं और भोगों की इच्छा भी नष्ट हो जाती है । जब भोगों की इच्छा नष्ट हो जाती है तब मन भी निराशापद में लीन हो जाता है । हे रामजी ! जब मूल से मन नष्ट हुआ तब मन में जो सङ्कल्प हैं वे कहाँ रहे ? जैसे तिलों के जले से तेल नहीं रहता तैसे ही मन में सङ्कल्प विकल्प नहीं रहते तब केवल शान्त आत्मा ही शेष रहता है । जैसे मन्दराचल के क्षोभ मिटे से क्षीरसमुद्र शान्तिमान होता है तैसे ही चित्त शान्त होता है । हे रामजी ! इससे भाव में अभाव की भावना दृढ़ करो और स्वरूप का अभ्यास करो । जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही कल्पना को त्यागकर महात्मा पुरुष निर्मल हो जाता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे जीवन्मुक्तवर्णनन्नाम द्विसप्ततमस्सर्गः ॥ ७२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे जल में द्रवता से चक्र (आवर्त) होते हैं सो असत् ही सत् होकर भासते हैं तैसे ही चित्त के फुरने से असत् जगत् सत् हो भासता है और जैसे नेत्रों के दुखने से आकाश में तरुवरे

७६०योगवाशिष्ठ ।

मोर के पुच्छवत मुक्तमाला हो भासते हैं सो असत् ही सत् भासते हैं तैसे ही चित्त के फुरने से जगत् भासता है। जैसे बादलों के चलने से चन्द्रमा चलता दृष्टि आता है तैसे ही चित्त के फुरने से जगत् भासता है। रामजी बोले, हे भगवन् ! जिससे चित्त फुरता है और जिससे अफुर होता है वह प्रकार कहिये कि उसका मैं उपाय करूँ। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे वरफ में शीतलता, तिलों में तेल, फूलों में सुगन्ध और अग्नि में उष्णता होती है तैसे ही चित्त में फुरना होती है। चित्त और फुरना दोनों एक अभेद वस्तु हैं, दोनों में जब एक नष्ट हो तब दोनों नष्ट हो जाते हैं। जैसे शीतलता और श्वेतता के नष्ट हुए वरफ नष्ट हो जाती है तैसे ही एक के नाश हुए दोनों नष्ट होते हैं। इसलिये चित्त के नाश के दो क्रम हैं—योग और ज्ञान। चित्त की वृत्ति के रोकने को योग कहते हैं और सम्यक् विचारने का नाम ज्ञान है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वृत्ति का विरोध किस युक्ति से होता है और प्राण, अपान पवन क्योंकर रोके जाते हैं किस योग से अनन्त सुख और सम्पदा प्राप्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस देह में जो नाड़ी हैं उनमें प्राणवायु फिरता है—जैसे पृथ्वी पर नदियों का जल फिरता है। वह प्राणवायु एक ही है पर स्पन्द के वश से नाना प्रकार की विचित्र क्रिया को प्राप्त होता है उससे अपान आदिक संज्ञा पाता है। योगीश्वरों की कल्पना है कि जैसे पुष्प में सुगन्ध और वरफ में श्वेतता अभेद हैं और आधार आधेय एकरूप हैं तैसे ही प्राण और चित्त अभेदरूप हैं। जब भीतर प्राणवायु फुरती है तब चित्तकला फुरकर जो संकल्प के सम्मुख होती है उसी का नाम चित्त है। जैसे जल द्रवीभूत होता है और उसमें लहर और चक्र फुर आते हैं तैसे ही प्राणों से चित्त फुर आता है। चित्त के फुरने का कारण प्राणवायु ही है जब प्राणवायु का निरोध होता है तब निश्चय करके मन भी शान्त होता है और मन में लीन हुए संसार भी लीन हो जाता है—जैसे सूर्य का प्रकाश के अभाव हुए रात्रि में मनुष्यों का व्यवहार शान्त हो जाता है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह जो सूर्य और चन्द्र निरन्तर आगमन करते हैं तो देहरूपी गृह में प्राणवायु का

उपशम प्रकरण । ७६१

रोकना किस प्रकार होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! सन्तजनों के संग, सत्शास्त्रों के विचार और विषयों के वैराग्य से योगाभ्यास होता है। प्रथम जगत् में असत्बुद्धि करनी चाहिये और वाञ्छित जो अपना इष्टदेव है उसका ध्यान करना चाहिये । जब चिरकाल ध्यान होता है तब एक तत्त्व का अभ्यास होता है उससे प्राणों का स्पन्दन रोका जाता है। रेचक, पूरक और कुम्भक जो प्राणायाम हैं उनका जब अखेदचित्त होकर अभ्यास दृढ़ करे और एक ध्यानसंयुक्त हो उससे भी प्राणों का स्पन्द रोका जाता है । ऊकार का उच्चार करने से ऊर्ध्व उसकी जो सूक्ष्मध्वनि होती है तो प्रथम शब्द बड़ी ध्वनि से होता है और फिर सूक्ष्मध्वनि शेष रहती है उसमें चित्त की वृत्ति लगावे तो सुषुप्तिरूप अवस्था में वृत्ति तद्रूप हो जाती है तभी प्राणस्पन्द रोका जाता है । रेचक प्राणायाम के अभ्यास से विस्तृत प्राण वायु से शून्यभाव आकाश में जाय लीन होता है तब भी प्राण स्पन्द रोका जाता है। कुम्भक के अभ्यास के बल से भी प्राणवायु रोका जाता है। तालूमूल के साथ यत्न से जिह्वा का तालुघण्टा से लगा खेचरीमुद्रा से वायु ऊर्श्वरन्ध्र को जाती है और ऊर्श्वरन्ध्र में गये से भी प्राणवायु का स्पन्द रोका जाता है । नासिका के अग्र में जो द्वादश अंगुल पर्यन्त अपान-रूपी चन्द्रमा का निर्मल स्थान आकाश में है उसको ज्यों का त्यों देखे तो भी प्राणस्पन्द रोका जाता है। तालु के द्वादश अंगुल ऊर्श्वरन्ध्र का अभ्यास हो तो उसके अन्त में जब प्राणों को लगावे तब उस संवित् में प्राणों का फुरना नष्ट हो जाता है । जो भ्रूमध्य त्रिपुटी में प्रकाश को त्यागकर जहाँ चेतनकला रहती है वहाँ वृत्ति लगावे तो उससे भी प्राण कला रोकी जाती है । जो सब वासनाओं को त्यागकर हृदय आकाश में चेतनसंवित् का ध्यान करे तो भी चिरकाल के अभ्यास से प्राणस्पन्द रोका जाता है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जगत् के भूतों का हृदय क्या कहाता है जिस महाआदर्श में सब पदार्थ प्रतिबिम्बित हो जाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जगत् के भूतों के दो हृदय हैं—एक ग्रहण करने योग्य है और दूसरा त्यागने योग्य । नाभि से जो दश अंगुल ऊर्ध्व है वह त्यागने योग्य है परिच्छिन्नभाव से जो देह के एक स्थान में स्थित है

७६२योगवाशिष्ठ ।

और उसमें जो संवितमात्र ज्ञानस्वरूप अनुभव से प्रकाशता है वह मनुष्य को ग्रहण करने योग्य है जो भीतर बाहर व्याप रहा है और वास्तव में भीतर बाहर से भी रहित है वही प्रधान हृदय है और सब पदार्थों का प्रतिबिम्ब धरनेवाला आदर्श है। सब सम्पदा का भण्डार और सब जीवों का संवित् हृदय वही है, एक अङ्ग का नाम हृदय नहीं। जैसे जल में एक पुरातन पत्थर पड़ा हो तो वह जल नहीं हो जाता तैसे ही संवित्मात्र के निकट संचितमात्र तो नहीं होता ? यह जड़रूप है और आत्मा चैतन्य आकाश है। इस प्रधान हृदय से बल करके संवित्मात्र की ओर चित्त लगावे तब प्राण स्पन्द भी रोका जावेगा। हे रामजी! यह प्राणों का रोकना मैंने तुमसे कहा है और भी शास्त्रों में अनेक प्रकार से कहा है पर जिस-जिस प्रकार गुरु के मुख से सुने उसी प्रकार अभ्यास करे तब प्राणों का निरोध होता है, गुरु के उपदेश से अन्यथा सिद्ध नहीं होता। जिसको अभ्यास करके निरोध सिद्ध हुआ है वह कल्याणमूर्ति है और कोई कल्याणमूर्ति नहीं होता। हे रामजी! अभ्यास करके प्राणायाम होता है और वैराग्य की दृढ़ता से वासना क्षय होती है अर्थात् वासना रोकी जाती है। जब दृढ़ अभ्यास करे तब चित्त अचित् हो जाता है। हे रामजी! भृकुटी के दश अंगुल पर्यन्त जो वायु जाता है उसका बारम्बार जब अभ्यास करते हैं तब वह क्षीण हो जाता है और खेचरीमुद्रा अर्थात् तालु से जिह्वा लगा करके जो अभ्यास करे तो भी प्राण रोके जाते हैं। इसके अभ्यास से चित्त की व्याकुलता जाती रहती है और परम उपशम को प्राप्त होता है। जो यह अभ्यास करता है वह पुरुष आत्मारामी होता है, उसके सब शोक दूर हो जाते हैं और हृदय में आनन्द को प्राप्त होता है। इससे तुम भी अभ्यास करो। जब प्राणस्पन्द मिट जाता है तब चित्त भी स्थित हो जाता है, उसके पीछे जो पद है सो ही निर्वाणरूप है। हे रामजी! जब प्राणस्पन्द मिट जाते हैं तब चित्त भी स्थित हो जाता है। और जब चित्त स्थित हुआ तब वासना नष्ट हो जाती है, जब वासना नष्ट हो जाती है तब मोक्ष की प्राप्ति होती है। जब तक चित्त वासना से लिपटा है तब तक जन्म मरण देखता है और जब मन वासना से रहित होता है तब मोक्ष होता है। हे रामजी! प्राणवायु को रोककर वासना से रहित हो

उपशम प्रकरण । ७६३

जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ बिचरो तो तुमको बन्धन न होगा। जब प्राण फुरता है तब मन उदय होता है और जब मन उदय हुआ तब संसारभ्रम होता है जब मन क्षीण होता है तब संसारभ्रम नष्ट हो जाता है। हे रामजी! जब मन से संसार की वासना मिट जाती है तब अशब्द पद प्राप्त होता है। जिससे यह सर्व है, और जो यह सर्व है, जिससे न सर्व है और जो न सर्व है, जो न सर्व में है और जिसमें न यह सर्व है ऐसा जो निर्गुण-तत्त्व है सो सर्वकल्पना के त्यागे से प्राप्त होता है उसको उपमा किसकी दीजे। आत्मा अविनाशी, निर्विकल्प और निर्गुण है, यह जगत् नाश-रूपी संकल्प से रचित गुप्तरूप है, उसका किस पदार्थ से दृष्टान्त दीजे ? अर्थात् दूसरा कुछ नहीं, जितने कुछ स्वाद हैं उनको स्वादकर्त्ता वही है और जितने प्रकाश हैं उनको प्रकाशकर्त्ता वही है, सर्वकल्पना का कलना रूप वही है और जितने पदार्थ हैं उन सबका अधिष्ठानरूप वही है। वह चित्त और आवरण के दूर हुए प्राप्त होता है और सब पदार्थों की सीमा वही है। ऐसा जो आत्मरूप शीतल चन्द्रमा है जब उसमें बुद्धिमान् स्थित होता है तब जीवन्मुक्त कहलाता है और उसकी सब इच्छा और आश्चर्य नष्ट हो जाता है, अहं त्वं आदिक कल्पना मिट जाती है, सर्व व्यवहार विस्मरण हो जाता है। ऐसा जो मुक्त मन है सो पुरुषोत्तम होता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे जीवन्मुक्तज्ञानबन्धो नाम त्रिंसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७३ ॥

रामजी ने पूछा, हे प्रभो ! योग की युक्ति तो आपने कही जिससे चित्त उपशम होता है अब सम्यक्ज्ञान का लक्षण भी कृपा करके कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह तो निश्चय है कि आत्मा आनन्दरूप, आदिअन्त से रहित, प्रकाशरूप, सर्व परमात्मातत्त्व है इसी निश्चय को बुद्धीश्वर सम्यक्ज्ञान कहते हैं। यह जो घट पटादिक अनेक पदार्थशक्ति है वह सब परमानन्दरूप आत्मा है उससे भिन्न नहीं। यह सम्यक्ज्ञानी की दृष्टि है और सर्वात्मा नित्य, शुद्ध, परमानन्दस्वरूप, सदा अपने आपमें स्थित है ऐसा निश्चय सम्यक्ज्ञान है और जो इससे भिन्न है सो असम्यक् ज्ञान है। हे रामजी! सम्यक्दर्शी को मोक्ष है और असम्यक्दर्शी को बन्ध है

७६४ | योगवाशिष्ठ ।

क्योंकि उसको आत्मा जगत्रूप भासता है और सम्यक्दर्शी को केवल आत्मा भासती है । जैसे रस्सी में असम्यक्दर्शी को सर्प भासता है और सम्यक्दर्शी को रस्सी ही भासती है । सर्वसंवेदन और संकल्प से रहित शुद्ध संवित् परमात्मा है उसको जो जानता है वही परमात्मा का जाननेवाला बुद्धीश्वर है । इससे भिन्न अविद्या है । हे रामजी ! आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है उसमें द्वैतकल्पना कोई नहीं । ऐसा जो यथार्थदर्शी है वही सम्यक्दर्शी है । सर्व आत्मा पूर्ण है उसमें भाव, अभाव, बन्ध, मोक्ष कोई नहीं और न एक है, न द्वैत है, ब्रह्मा ही अपने आपमें स्थित है जो सब चिदाकाश है तो बन्ध किसे कहिये और मोक्ष कौन हो ? ऐसा जिसको ज्ञान है उसको काष्ठ-पाषाण ब्रह्मा से च्यूटी पर्यन्त सम भासता है अल्पमात्र भी भेद नहीं भासता तो वह कल्पना के सम्मुख कैसे हो ? हे रामजी ! वस्तु के आदि-अन्त अन्वय व्यति-रेक करके आत्मा सिद्ध होता है अर्थात् पदार्थ है तो भी आत्मसत्ता से सिद्ध होता है और जो पदार्थ का अभाव हो जाता है तो भी आत्म-सत्ता शेष रहती है । तुम उसी के परायण हो रहो । वही अनुभवसत्ता जगत्रूप होकर भासती है और जरा-मरण आदिक जो नाना प्रकार मे विकार वस्तुरूप भासते हैं वह वस्तु अपने आपमें ही फुरती है । जैसे जल में द्रवता से नाना प्रकार के तरङ्गबुद्बुदे होते हैं सो वे जलरूप हैं । कुछ भिन्न नहीं, तैसे ही चित्त के फुरने से जो नाना प्रकार के पदार्थ भासते हैं सो आत्मरूप हैं । आत्मतत्त्व ही अपने आपमें स्थित हैं, जब उसमें स्थित होता है तब फिर दीन नहीं होता जो पुरुष दृढ़ विचारवान् है वह भोगों से चलायमान नहीं होता-जैसे मन्द पवन से सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता-और जो अज्ञानी है और विचार से रहित मूढ़ है उसको भोग ग्रास कर लेते हैं-जैसे जल से रहित मछली को बगुला खा लेता है । जिसको सर्व आत्मा भासता है वह सम्यक्दर्शी पुरुष कहलाता है-वही मुक्तरूप है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सम्यक्ज्ञानवर्णनन्नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥

उपशम प्रकरण । ७६५

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! विवेकी पुरुष को जो भोग निकट आ प्राप्त होते हैं तो भी उनकी इच्छा नहीं करता, क्योंकि उसको उसमें अर्थबुद्धि नहीं—जैसे चित्र की लिखी हुई सुन्दर कमलिनी के निकट भँवरा आन प्राप्त होता है तो भी उसकी इच्छा नहीं करता । हे रामजी ! सुख दुःख की प्राप्ति और निवृत्ति में इच्छा तब तक होती है जब तक देहाभिमान होता है, जब देहाभिमान निवृत्त हुआ तब कुछ इच्छा नहीं होती । हे रामजी ! ममता करके दुःख होता है, जब रूप को नेत्र देखता है तब उसको इष्ट मानकर प्रसन्न होता है और अनिष्ट मानकर द्वेष करता है जैसे बैल भारवाहक की चेष्टा करता है उसको लाभ और हानि कुछ नहीं और जिसको उसमें ममत्व होता है वह लाभ-हानि का हर्ष शोक करता है, तैसे ही ममत्व से जीव इन्द्रियों के विषयों में हर्ष शोकवान् होता है । जैसे गर्दभ कीचड़ में डूबे और राजा शोक करे कि मेरे नगर का गर्दभ डूबा है, तैसे ही ममत्व करके इन्द्रियों के विषयों में जीव दुःख पाता है, नहीं तो गर्दभ कीचड़ में डूबे तो राजा का क्या नष्ट होता है । हे रामजी ! यह इन्द्रियाँ तो अपने विषयों को ग्रहण करती हैं और इनमें जीव तपायमान होता है सो ही आश्चर्य है । जिन विषयों की जीव चेष्टा और इच्छा करते हैं सो क्षण में नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! जो मार्ग में किसी के साथ स्नेह हो जाता है तो ममत्व और प्यार से दुःख होता है । जो देह में ममत्व करेगा उसको दुःख क्यों न होगा ? चाहे कैसा ही बुद्धिमान् हो वा शूरमा हो तो भी संग से बन्धवान् होता ही है अर्थात् इन्द्रियों के विषयों का अहंमम भाव ग्रहण करेगा तो उनके नाश होने से वह भी नष्ट होवेगा । जिन नेत्रों का विषय रूप है सो नेत्र साक्षी होकर रूप को ग्रहण करता है और जीव ऐसा मूर्ख है कि औरों के धर्म आपमें मान लेता है और उनमें तपायमान होता है । जैसे भ्रम दृष्टि से आकाश में मोर पुच्छवत् तरुवरे और दूसरा चन्द्रमा भासता है, तैसे ही मूर्खता से जीव इन्द्रियों के धर्म अपने में मान लेता है । जैसे इन्द्रियों का साक्षी होकर जीव विषयों को ग्रहण करता है तैसे ही चित्त भी अभिमान से रहित साक्षी होकर ग्रहण करे तो रागद्वेष से तपायमान न हो जैसे जल

७६६ योगवाशिष्ठ ।

में चक्र तरङ्ग फुरते दृष्टि आते हैं तैसे ही इन्द्रियों में और इन्द्रियाँ फुर आती हैं, आधार आधेय से इनका सम्बन्ध होता है और चित्त इनके साथ मिलकर व्याकुल होता है । रूप, इन्द्रिय और मन इनका परस्पर भिन्न भाव है जैसे मुख, दर्पण और प्रतिबिम्ब भिन्न-भिन्न असंग हैं तैसे ही यह भी भिन्न-भिन्न असंग हैं परन्तु अज्ञान से मिले हुए भासते हैं । जैसे लाख से सोने, रूपे और चीनी का संयोग होता है तैसे ही अज्ञान से रूप अवलोक और मनस्कार का संयोग होता है । जब ज्ञान अग्नि से अज्ञान-रूपी लाख जल जावे तब परस्पर सब भिन्न-भिन्न हो जाते हैं और फिर किसी का दुःख सुख किसी को नहीं लगता । जैसे दो लकड़ी का संयोग लाख से होता है तैसे ही अज्ञान से विषय इन्द्रियों और मन का संयोग होता है और ज्ञानरूपी अग्नि से जब बिछुड़ जाते हैं तब फिर नहीं मिलते। जैसे माला के भिन्न-भिन्न दाने तागे में इकट्ठे होते हैं तैसे ही देह और इन्द्रियों में अज्ञान से मेल होते हैं और जब विचार करके तागा टूट पड़े तब भिन्न-भिन्न हो जावे फिर न मिले । हे रामजी ! जिन पुरुषों को आत्मविचार हुआ है वे ऐसे विचारते हैं कि हमको दुःख देनेवाला चित्त था और चित्त के नष्ट हुए आनन्द हुआ है । जैसे मन्दिर में दुःख देनेवाला पिशाच रहता है तब दुःख होता है। नहीं तो मन्दिर दुःख नहीं देता। पिशाच ही दुःख देता है, तैसे ही शरीररूपी मन्दिर में दुःख देनेवाला चित्त ही है। हे चित्त ! तूने मिथ्या मुझको दुःख दिया था । अब मैंने आपको जाना है । तू आदि भी तुच्छ है, अन्त भी तुच्छ है और वर्तमान में भी मिथ्या जीवों को दुःख देता है । जैसे मिथ्या परछाहीं बालक को बैताल होकर दुःख देती है—बड़ा आश्चर्य है ! हे चित्त ! तू तबतक दुःख देता है जबतक आत्मस्वरूप को नहीं जाना । जब आत्मस्वरूप का ज्ञान होता है तब तू कहीं दृष्टि नहीं होता । तू तो माया मात्र है। स्थिर हो अथवा जा, में अब तुझसे मोहित नहीं होता । तू तो मूर्ख जड़ और मृतक है और तेरा आकार अविचार में सिद्ध है । अब मैंने पूर्व का स्वरूप पाया है, तू तत्त्व नहीं भ्रान्तिमात्र है जो मूढ़ है वह तुझसे मोहित होता है, विचारवान् मोहित नहीं होता । जैसे दीपक से अन्धकार दृष्टि नहीं आता, तैसे ही ज्ञान से तू

उपशम प्रकरण । | ७६७

दृष्टि नहीं आता । हे मूर्ख चित्त ! तू बहुत काल इस देहरूपी गृह में रहा है और तू वैतालरूप है । जैसे अपवित्र और शमशान आदिक स्थानों में वैताल रहता है तैसे ही सत्संग से रहित देहरूपी गृह शमशान के समान सदा अपवित्र है वहाँ तेरे रहने का स्थान है । जहाँ सन्तों का निवास होता है यहाँ तुझ सरीखे ठौर नहीं पाते सो अब मेरे हृदयरूपी गृह में सत् विचार सन्तोषादिक सन्तजन आन स्थित हुए हैं तेरे बसने का ठौर नहीं । हे चित्त पिशाच ! तू पूर्वरूपी तृष्णा पिशाचिनी और काम क्रोधा-दिक गुह्यक अपने साथ लेकर चिरपर्यन्त विचरा है अब विवेकरूपी मन्त्र से मैंने तुझको निकाला है तब कल्याण हुआ । हे चित्त ! पिशाचरूप तू प्रमादरूपी मद्य पानकर मत्त हुआ था और चिरपर्यन्त नृत्य करता था । अब मैंने विवेकरूपी मन्त्र से तुझको निकाला है तब देहरूपी कन्दरा शुद्ध हुई है और शुद्धभाव पुरुषों ने निवास किया है । हे चित्त ! मैंने तुझको विवेकरूपी मन्त्रद्वारा वश किया है । अब तेरा क्या पराक्रम है ? तब तक दुःख देता था जबतक विचाररूपी मन्त्र न पाया था । अब तेरा बल कुछ नहीं चलता । अब मैं महाकेवल भाव में स्थित हूँ । आगे भी मैं तुझको जगाता था, आपसे ही तू सब रूप है । जैसे कच्चे मन्त्रवाला सिंह को जगाता है और आप कष्ट पाता है तैसे ही मैं तुझको जगाकर कष्ट पाता था । अब मैंने आत्मविचार से परिपक्व मन्त्र से तुझे वश किया है तब शान्ति-मान् हुआ हूँ । अब ममता और मान मेरे कुछ नहीं रहे । मोह अहंकार सब नष्ट हो गये हैं और इनका कलत्र भी नष्ट हो गया है मैं निर्मल और चैतन्य आत्मा हूँ । मेरा मुझको नमस्कार है । न मेरे में कोई आशा है, न कर्म है, न संसार है, न कर्तृत्व है, न मन है, न भोक्तृत्व है और न देह है, ऐसा मेरा निर्गुणरूप आत्मा है । मेरा मुझको नमस्कार है। न कोई आत्मा है, न अनात्मा है, न अहं है, न त्वं है, किसी शब्द का वहाँ प्रवेश नहीं ऐसा निगशब्द है । प्रकाशरूप, निर्मल आत्मा मैं अपने आपमें स्थित हूँ । ऐसा जो मैं आत्मा हूँ मेरा मुझको नमस्कार है । मैं विकारी नहीं हूँ, मैं तो नित्य हूँ, निराश हूँ, सर्वकार्यों में अनुस्यूत हूँ, अंशांशीभाव से रहित हूँ । ऐसा सर्वात्मा जो मैं हूँ सो मेरा तुझको

७६८ योगवाशिष्ट ।

नमस्कार है। मैं सम सर्वगत, सूक्ष्म और अपने स्वभाव में स्थित हूँ और पृथ्वी, पर्वत, आकाश आदिक जगत् में नहीं और मैं ही सर्व पदार्थ होकर भासता हूँ। ऐसा मैं सर्वात्मा हूँ। अब मैं सर्वभाव को प्राप्त हुआ हूँ और मननभाव मुझको दूर हुआ है। मेरे प्रकाश से विश्व भासता है, मैं अजर, अमर और अनन्त हूँ और गुणातीत अद्वैत हूँ। मनन जिससे दूर हुआ है ऐसा जो मैं सुन्दररूप हूँ जिससे विश्व प्रकट है और स्वरूप से अविनाशी हूँ उस अनन्त, अजर, अमर, गुणातीत ईश्वररूप को नमस्कार है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे चित्तोपशम- नाम पञ्चसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार विचारकर तत्त्ववेत्ता आत्मा को सम्यक् जानते हैं। तुम भी आत्मविचार का आश्रय करके आत्मपद के आश्रय ही रहो। यह जगत् सब आत्मरूप है, ऐसे जानकर चित्त से जगत् की सत्यता को त्याग करो। जब ऐसे विचार करे तब चित्त कहाँ है ? बड़ा आश्चर्य्य है कि जो चित्त स्वरूप दिखाई देता था सो अविदित मायामात्र अस्तरूप था। जैसे आकाश के फूल कहनेमात्र हैं तैसे ही चित्त कहनेमात्र है और अविचार से दिखाई देता है। विचारवान् को चित्त असत् भासता है, क्योंकि अविचार से सिद्ध है। जैसे नौका पर बैठे बालक को तट के वृक्ष चलते भासते हैं पर बुद्धिमान को चलने में सद्भाव नहीं होता तैसे ही मूर्ख को चित्त सच्चा भासती है और विचारवान् का चित्त नष्ट हो जाता है। जब मूर्खतारूप भ्रम शान्त होता है तब चित्त कहीं नहीं पाया जाता। जैसे बालक चक्र पर चढ़ा हुआ फिरता है तो पर्वत आदिक पदार्थ उसको भ्रमते भासते हैं और जब चक्र ठहर जाता है तब पर्वत आदि पदार्थ अचल भासते हैं तैसे ही चित्त के ठहरने से द्वैत कुछ नहीं भासता। आगे मुझको द्वैत भासता था इससे चित्त के फुरने से नाना प्रकार की तृष्णा (इच्छा) उठती थी अब चित्त के नष्ट हुए इन पदार्थों की भावना नष्ट हुई हैं और सब संशय और शोक नष्ट हो गये हैं। अब मैं विगतज्वर स्थित हूँ, जैसे मैं स्थित हूँ तैसे हूँ, एषणा कोई नहीं। जब चित्त का चैत्यभाव नष्ट हुआ तब इच्छा आदिक गुण कहाँ रहे ? जैसे

उपशम प्रकरण ।

७६६

प्रकाश के नष्ट हुए वर्णज्ञान नहीं रहता तैसे ही चित्त के नाश हुए इच्छा आदिक नहीं रहते। अब चित्त नष्ट हुआ, तृष्णा नष्ट हो गई और मोह का पिंजड़ा टूट पड़ा अब मैं निरहंकार बोधवान् हूँ, सब जगत् शान्तरूप आत्मा है और नानात्व कुछ नहीं। मैं निराभास, आदि-अन्त से रहित आनन्दपद को प्राप्त हुआ हूँ। मेरा सर्वगत सूक्ष्म आत्मतत्त्व अपना आप है और उसमें मैं स्थित हूँ। इन विचारों से अब क्या प्रयोजन है ? जब तक आपको मैं देह जानता था तब तक ये विचार मूर्ख अवस्था में थे अब मैं अमित, निराकार और केवल परमानन्द सच्चिदानन्द को प्राप्त हुआ हूँ। आगे मैं चित्तरूपी वैताल को आप ही जगाता था और आप ही दुःखी होता था, अब विचाररूपी मन्त्र से मैंने इसको नष्ट किया है और निर्णय से अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ। मैं शान्तात्मा अपने आपमें स्थित हूँ। हे रामजी ! जिसको यह निश्चय प्राप्त हुआ है वह निर्द्वन्द्व रागद्वेष से रहित होकर स्थित होता है और प्रकृत कर्म करता है पर मानमद से रहित आनन्द करके पूर्ण होता है जैसे शरत्काल की रात्रि को पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से पूर्ण होता है तैसे ही प्रकृत आचार कार्यकर्त्ता ज्ञानवान् का हृदय शान्तपूर्ण आत्मा है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे चित्तशान्तिप्रतिपादन-नाम षट्सप्ततितमसर्गः ॥ ७६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह विचार वेदविदों ने कहा है पूर्व मुझसे ब्रह्माजी ने यही विचार विन्ध्याचल पर्वत पर कहा था। इसी विचार से मैं परमपद में स्थित हुआ हूँ। इसी दृष्टि का आशय करके आत्मविचार होकर तमरूपी संसारसमुद्र से तर जाओ। हे रामजी ! इस पर एक और परम दृष्टि सुनो वह दृष्टि परमपद के प्राप्त करनेवाली है। जिस प्रकार वीतव मुनीश्वर विचार करके निःशङ्क स्थित हुआ है सो सुनो। महातेजवान् वीतव मुनीश्वर ने संसार के आधिव्याधि रोग से वैराग्य किया और नंगा होके पर्वतों की कन्दराओं में विचरने लगा। जैसे सूर्य सुमेरु पर्वत के चौफेर फिरता है तैसे ही वह विचरने लगा और संसार की क्रिया ॥ दुखरूप विचारता था कि बड़े भ्रम देनेवाली है। ऐसे जानकर वह दृग