भारतकोश
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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अयोध्याकाण्ड - सर्ग ६: गङ्गोत्तरण तथा भरद्वाज और वाल्मीकिजीसे भेंट

६६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६
७०


नैषादराज्यमेतत्ते किङ्करस्य रघूत्तम ॥ ६५ ॥
त्वदधीनं वसन्नत्र पालयास्मान् रघूद्वह ।
आगच्छ यामो नगरं पावनं कुरु मे गृहम् ॥ ६६ ॥
गृहाण फलमूलानि त्वदर्थं सञ्चितानि मे ।
अनुगृहीष्व भगवन् दासस्तेऽहं सुरोत्तम ॥ ६७ ॥

हुआ है । हे रघुवर ! आपके दासका यह नैषाद-राज्य आपहीका है इसलिये हे रघुनाथजी ! आप यहाँ रहकर हमलोगोंकी रक्षा कीजिये । चलिये नगरमें पधारकर मेरा घर पवित्र कीजिये ॥ ६५-६६ ॥ हे भगवन् ! आपके लिये मैंने जो कुछ फल-मूलादि एकत्रित किये हैं उन्हें स्वीकार कीजिये । हे सुरश्रेष्ठ ! मैं आपका दास हूँ, आप मुझपर कृपा कीजिये" ॥ ६७ ॥


रामस्तमाह सुप्रीतो वचनं शृणु मे सखे ।
न वेक्ष्यामि गृहं ग्रामं नव वर्षाणि पञ्च च ॥ ६८ ॥
दत्तमन्येन नो भुञ्जे फलमूलादि किञ्चन ।
राज्यं ममैतत्त्वे सर्वं त्वं सखा मेऽतिवल्लभः ॥ ६९ ॥

तब रामचन्द्रजीने अति प्रसन्न होकर उससे कहा—"मित्र ! सुनो, मैं चौदह वर्षतक किसी घर या गाँवमें नहीं जा सकता ॥ ६८ ॥ और न किसी औरके दिये हुए फल-मूलादि ही खा सकता हूँ । मित्र ! तुम्हारा यह सम्पूर्ण राज्य मेरा ही है और तुम भी मेरे अत्यन्त प्रिय सखा हो" ॥ ६९ ॥


वटक्षीरं समानाय्य जटामुकुटमादरात् ।
बबन्ध लक्ष्मणेनाथ सहितो रघुनन्दनः ॥ ७० ॥
जलमात्रं तु सम्प्राश्य सीतया सह राघवः ।
आस्तृतं कुशपर्णाद्यैः शयनं लक्ष्मणेन हि ॥ ७१ ॥
उवास तत्र नगरप्रासादाग्रे यथा पुरा ।
सुष्वाप तत्र वैदेह्या पर्यङ्क इव संस्कृते ॥ ७२ ॥
ततोऽविदूरे परिगृह्य चापं
सवाणतूणीरधनुः स लक्ष्मणः ।
ररक्ष रामं परितो विपश्यन्
गुहेन सार्धं सशरासनेन ॥ ७३ ॥

तदनन्तर रघुनाथजीने वटका दूध मँगाकर लक्ष्मणके सहित भली प्रकार सँवारकर जटाजूट बाँधे ॥ ७० ॥ लक्ष्मणजीने कुश और पत्तोंकी एक शय्या बना दी, उसीपर केवल जल पीकर सीताके सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हुए और पहले जिस प्रकार अयोध्यापुरीके महलमें जनकनन्दिनीके सहित सुसज्जित पलंगपर पौढ़ते थे उसी प्रकार सो गये ॥ ७१-७२ ॥ उनके पास ही धनुष, बाण और तरकश लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी धनुषधारी गुहके सहित धनुष चढ़ाकर इधर-उधर देखते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी रखवाली करने लगे ॥ ७३ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठ सर्ग

गंगोत्तरण तथा भरद्वाज और वाल्मीकिजीसे भेंट ।

श्रीमहादेव उवाच

सुप्तं रामं समालोक्य गुहः सोऽश्रुपरिप्लुतः ।
लक्ष्मणं प्राह विनयाद् भ्रातः पश्यसि राघवम् ॥ १ ॥
शयानं कुशपत्रौघसंस्तरे सीतया सह ।
यः शेते स्वर्णपर्यङ्के स्वास्तीर्णे भवनोत्तमे ॥ २ ॥

श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! उस समय रामजीको सोते देख गुहने आँखोंमें आँसू भरकर नम्रतापूर्वक लक्ष्मणजीसे कहा—"भाई ! देखते हो, जो रघुनाथजी अपने भव्य-भवनमें सुन्दर बिछौनेसे युक्त सुवर्ण-निर्मित पलंगपर पौढ़ते थे वे ही आज सीताजीके सहित कुश और पत्तोंकी साथरीपर पड़े

सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७१


कैकेयी रामदुःखस्य कारणं विधिना कृता । मन्थराबुद्धिमाश्रित्य कैकेयी पापमाचरत् ॥ ३ ॥

तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणः प्राह सखे शृणु वचो मम । कः कस्य हेतुर्दुःखस्य कश्च हेतुः सुखस्य वा ॥ ४ ॥ स्वपूर्वार्जितकर्मैव कारणं सुखदुःखयोः ॥ ५ ॥ सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा । अहं करोमीति वृथाऽभिमानः स्वकर्मसूत्रग्रथितो हि लोकः ॥ ६ ॥ सुहृन्मित्रार्युदासीनद्वेष्यमध्यस्थबान्धवाः । स्वयमेवाचरन्कर्म तथा तत्र विभाव्यते ॥ ७ ॥ सुखं वा यदि वा दुःखं स्वकर्मवशगो नरः । यद्यद्यथागतं तत्तद् भुक्त्वा स्वस्थमना भवेत् ॥ ८ ॥ न मे भोगागमे वाञ्छा न मे भोगविवर्जने । आगच्छत्वथ मागच्छत्वभोगवशगो भवेत् ॥ ९ ॥ यस्मिन् देशे च काले च यस्माद्वा येन केन वा । कृतं शुभाशुभं कर्म भोक्तव्यं तत्तत्र नान्यथा ॥ १० ॥ अलं हर्षविषादाभ्यां शुभाशुभफलोदये । विधात्रा विहितं यद्यत्तदलङ्घ्यं सुरासुरैः ॥ ११ ॥ सर्वदा सुखदुःखाभ्यां नरः प्रत्यवरुध्यते । शरीरं पुण्यपापाभ्यामुत्पन्नं सुखदुःखवत् ॥ १२ ॥ सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । द्वयमेतद्धि जन्तूनामलङ्घ्यं दिनरात्रिवत् ॥ १३ ॥ सुखमध्ये स्थितं दुःखं दुःखमध्ये स्थितं सुखम् । द्वयमन्योन्यसंयुक्तं प्रोच्यते जलपङ्कवत् ॥ १४ ॥ तस्माद्धैर्येण विद्वांस इष्टानिष्टोपपत्तिषु । न हृष्यन्ति न मुह्यन्ति सर्वं मायेति भावनात् ॥ १५ ॥

गुहलक्ष्मणयोरेवं भाषतोर्विमलं नभः । बभूव रामः सलिलं स्पृष्ट्वा प्रातः समाहितः ॥ १६ ॥


हुए हैं ॥ १-२ ॥ विधाताने रामजीके इस दुःखका कारण कैकेयीको बना दिया। मन्थराकी बुद्धिपर विश्वास करके कैकेयीने यह बड़ा पापका काम किया !” ॥ ३ ॥

यह सुनकर लक्ष्मणजीने कहा-“भाई ! मेरी बात सुनो; किसीके दुःख अथवा सुखका कारण दूसरा कौन है ? अर्थात् कोई भी नहीं है। मनुष्यका पूर्वकृत कर्म ही उसके सुख अथवा दुःखका कारण होता है ॥४-५॥ सुख और दुःखका देनेवाला कोई और नहीं है; 'कोई अन्य सुख-दुःख देता है' यह समझना कुबुद्धि है। 'मैं करता हूँ' यह वृथा अभिमान है, क्योंकि लोग अपने-अपने कर्मोंकी डोरीमें बँधे हुए हैं ॥ ६ ॥ यह मनुष्य स्वयं ही पृथक्-पृथक् आचरण करके उसके अनुसार सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, द्वेष्य, मध्यस्थ और बन्धु आदिकी कल्पना कर लेता है ॥ ७ ॥ अतः मनुष्यको चाहिये कि प्रारब्धानुसार सुख या दुःख जो कुछ भी जैसे-जैसे प्राप्त हो उसे वैसे ही भोगते हुए सदा प्रसन्नचित्त रहे ॥ ८ ॥ हमें न तो भोगोंकी प्राप्तिकी इच्छा है और न उन्हें त्यागनेकी । भोग आयें या न आयें हम भोगोंके अधीन नहीं हैं ॥९॥ जिस देश अथवा जिस कालमें जिस-किसीके द्वारा शुभ अथवा अशुभ कर्म किया जाता है, उसे निसन्देह उसी प्रकार भोगना पड़ता है ॥ १० ॥ अतः शुभ अथवा अशुभ कर्मफलके उदय होनेपर हर्ष अथवा दुःख मानना व्यर्थ है, क्योंकि विधाताकी गतिका देवता अथवा दैत्य कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता ॥ ११॥ मनुष्य सदा ही सुख और दुःखसे घिरा रहता है क्योंकि मनुष्य-शरीर पाप और पुण्यके मेलसे उत्पन्न होनेके कारण सुख-दुःखमय ही है ॥ १२ ॥ सुखके पीछे दुःख और दुःखके पीछे सुख आता है। ये दोनों ही दिन और रात्रिके समान जीवोंसे अनुल्लङ्घनीय हैं ॥१३॥ सुखके भीतर दुःख और दुःखके भीतर सुख सर्वदा वर्तमान रहता है। ये दोनों ही जल और कीचड़के समान आपसमें मिले हुए रहते हैं ॥ १४ ॥ इसलिये विद्वान् लोग ‘सब कुछ माया ही है' इस भावनाके कारण इष्ट या अनिष्टकी प्राप्तिमें धैर्य रखकर हर्ष या शोक नहीं मानते” ॥ १५ ॥

गुह और लक्ष्मणके इस प्रकार बातचीत करते-करते आकाशमें उजाला हो गया। तब रामचन्द्रजीने

६६ ७२ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ६


उवाच शीघ्रं सुदृढां नावमानय मे सखे ।
श्रुत्वा रामस्य वचनं निषादाधिपतिर्गुहः ॥ १७ ॥

स्वयमेव दृढां नावमानिनाय सुलक्षणाम् ।
स्वामिन्नारुह्यतां नौकां सीतया लक्ष्मणेन च ॥ १८ ॥

वाहये ज्ञातिभिः सार्धमहमेव समाहितः ।
तथेति राघवः सीतामारोप्य शुभलक्षणाम् ॥ १९ ॥

गुहस्य हस्तावालम्ब्य स्वयं चारोहदच्युतः ।
आयुधादीन् समारोप्य लक्ष्मणेऽप्यारुरोह च ॥ २० ॥

गुहस्तान्वाहयामास ज्ञातिभिः सहितः स्वयम् ।
गङ्गामध्ये गता गङ्गां प्रार्थयामास जानकी ॥ २१ ॥

देवि गङ्गे नमस्तुभ्यं निवृत्ता वनवासतः ।
रामेण सहिताहं त्वां लक्ष्मणेन च पूजये ॥ २२ ॥

इत्युक्त्वा परकूलं तौ शनैरुत्तीर्य जग्मतुः ॥ २३ ॥

गुहोऽपि राघवं प्राह गमिष्यामि त्वया सह ।
अनुज्ञां देहि राजेन्द्र नोचेत्प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥ २४ ॥

श्रुत्वा नैषादिवचनं श्रीरामस्तमथाब्रवीत् ।
चतुर्दश समाः स्थित्वा दण्डके पुनरप्यहम् ॥ २५ ॥

आयास्याम्युदितं सत्यं नासत्यं रामभाषितम् ।
इत्युक्त्वाऽऽलिङ्ग्य तं भक्तं समाश्वास्य पुनः पुनः ॥

निवर्तयामास गुहं सोऽपि कृच्छ्राद्ययौ गृहम् ॥ २७ ॥

ततो रामस्तु वैदेह्या लक्ष्मणेन समन्वितः ॥ २८ ॥

भरद्वाजाश्रमपदं गत्वा बहिरुपस्थितः ।
तत्रैकं वटुकं दृष्ट्वा रामः प्राह च हे वटो ॥ २९ ॥

रामो दाशरथिः सीता लक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
आस्ते बहिर्वनस्येति ह्युच्यतां मुनिसन्निधौ ॥ ३० ॥

तच्छ्रुत्वा सहसा गत्वा पादयोः पतितो मुनेः ।
स्वामिन् रामः समागत्य वनाद्वहिरवस्थितः ॥ ३१ ॥


सावधानतापूर्वक आचमन कर प्रातःक्रिया की ॥ १६ ॥ और बोले—"मित्र ! शीघ्र ही मेरे लिये एक सुदृढ़ नौका लाओ।" रामके ये वचन सुनकर निषादराज गुह स्वयं ही एक सुलक्षण-सम्पन्न सुदृढ़ नौका ले आये और बोले—"स्वामिन् ! सीता और लक्ष्मणके सहित नावपर चढ़िये ॥ १७-१८ ॥ अपने ज्ञाति-भाइयोंके साथ स्वयं इसे सावधानतापूर्वक चलाऊँगा।" तब रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह प्रथम शुभलक्षणा सीताजीको उसपर चढ़ाया ॥ १९ ॥ फिर गुहका हाथ पकड़कर श्रीअच्युत भगवान् रघुनाथजी स्वयं चढ़े। तदनन्तर अपने आयुधादिकों रख श्रीलक्ष्मणजी नौकारूढ़ हुए ॥ २० ॥

तब गुहने अपने ज्ञाति-भाइयोंके सहित स्वयं नौका चलायी। जिस समय नाव गङ्गाके बीचमें पहुंची तब जानकीजीने गङ्गाजीसे प्रार्थना की—॥ २१ ॥ "देवि गङ्गे ! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ। वनवाससे लौटनेपर मैं राम और लक्ष्मणके सहित तुम्हारी पूजा करूँगी।" इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् वे शनैः-शनैः पार उतरकर आगे चलने लगे ॥ २२-२३ ॥ तब गुहने श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे राजेन्द्र ! मैं भी आपके साथ ही चलूँगा; आप मुझे आज्ञा दीजिये, नहीं तो मैं प्राण छोड़ दूँगा" ॥ २४ ॥

निषादपुत्रके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा—"मैं चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहकर यहाँ फिर आऊँगा। मैं जो कुछ कहता हूँ सत्य ही कहता हूँ, रामकी बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती।" ऐसा कह रामजीने भक्त गुहको ढाढ़स बँधा उसे बारम्बार गले लगाकर विदा किया। तब निषादराज गुह बड़ी कठिनतासे घर लौटे ॥ २५-२७ ॥

तदनन्तर जानकी और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी भरद्वाज मुनिके आश्रमके पास पहुँचकर बाहर खड़े हो गये। वहाँ एक ब्रह्मचारीको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—"हे वटो ! मुनिवरसे जाकर कहो कि दशरथका पुत्र राम सीता और लक्ष्मणके सहित आश्रमके बाहर खड़ा है" ॥ २८-३० ॥

रघुनाथजीका यह कथन सुनकर ब्रह्मचारीने तुरन्त ही मुनिवरके पास जाकर उनके चरणोंमें शिर रखकर कहा—"भगवन् ! पत्नी और छोटे भाईके सहित

सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७३


सभार्यः सानुजः श्रीमानाह मां देवसन्निभः ।<br>भरद्वाजाय मुनये ज्ञापयस्व यथोचितम् ॥ ३२ ॥श्रीमान् रामचन्द्र आये हैं और आश्रमके बाहर खड़े हैं। उन देवतुल्य श्रीरामजीने मुझसे कहा है कि मुनिवर भरद्वाजको इसकी यथायोग्य सूचना दो” ॥ ३१-३२ ॥
तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय भरद्वाजो मुनीश्वरः ।<br>गृहीत्वार्घ्यं च पाद्यं च रामसामीप्यमाययौ ॥ ३३ ॥यह सुनकर मुनिनाथ भरद्वाज सहसा उठ खड़े हुए और अर्घ्य-पाद्यादि लेकर रामके पास आये ॥ ३३ ॥
दृष्ट्वा रामं यथान्यायं पूजयित्वा सलक्ष्मणम् ।<br>आह मे पर्णशालां भो राम राजीवलोचन ॥ ३४ ॥रामको देखकर उन्होंने लक्ष्मणजीसहित उनकी नियमानुसार पूजा की और कहा—“हे राम ! हे कमलनयन
आगच्छ पादरजसा पुनीहि रघुनन्दन ।<br>इत्युक्त्वोटजमानाय्य सीतया सह राघवौ ॥ ३५ ॥रघुनन्दन ! आइये, अपनी चरण-रजसे मेरी पर्णशालाको पवित्र कीजिये।” ऐसा कह वे सीताजीके सहित दोनों रघुकुमारोंको अपनी कुटियामें ले आये ॥ ३४-३५ ॥
भक्त्या पुनः पूजयित्वा चकारातिथ्यमुत्तमम् ।<br>अद्याहं तपसः पारं गतोऽस्मि तव सङ्गमात् ॥ ३६ ॥और फिर उनका भक्तिपूर्वक पूजन कर भली प्रकार आतिथ्य-सत्कार किया तदनन्तर मुनिवर बोले—“राम ! आज आपके समागमसे मेरी तपस्या पूर्ण हो गयी ॥ ३६ ॥
ज्ञातं राम तवोदन्तं भूतं चागामिकं च यत् ।<br>जानामि त्वां परात्मानं मायया कार्यमानुषम् ॥ ३७ ॥हे रघुनन्दन ! मैं आपका भूत और भविष्यत् सम्पूर्ण वृत्तान्त जानता हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि आप साक्षात् परमात्मा हैं और कार्यकी सिद्धिके लिये ही मायासे मनुष्यरूप हुए हैं ॥ ३७ ॥
यदर्थमवतीर्णोऽसि प्रार्थितो ब्रह्मणा पुरा ।<br>यदर्थं वनवासस्ते यत्करिष्यसि वै पुरः ॥ ३८ ॥पूर्वकालमें ब्रह्माके प्रार्थना करनेसे जिसलिये आपने अवतार लिया है, जिसलिये आपको वनवास हुआ है और जो कुछ आप
जानामि ज्ञानदृष्ट्याहं जातया त्वदुपासनात् ।<br>इतः परं त्वां किं वक्ष्ये कृतार्थोऽहं रघूत्तम ॥ ३९ ॥आगे करेंगे वह सब, आपकी उपासनाद्वारा प्राप्त हुई ज्ञान-दृष्टिसे मैं जानता हूँ। हे रघुश्रेष्ठ ! आपसे मैं अधिक क्या कहूँ ? मैं तो कृतार्थ हो गया, जो
यस्त्वां पश्यामि काकुत्स्थं पुरुषं प्रकृतेः परम् ।<br>रामस्तमभिवाद्याह सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥ ४० ॥आज प्रकृतिसे परे साक्षात् पुरुषोत्तम आप ककुत्स्थनन्दनको देख रहा हूँ।”<br><br>तब सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम करके कहा—॥ ३८-४० ॥
अनुग्राह्यास्त्वया ब्रह्मन्वयं क्षत्रियबान्धवाः ।<br>इति सम्भाष्यतेऽन्योन्यमुषित्वा मुनिसन्निधौ ॥ ४१ ॥“ब्रह्मन् ! हम क्षत्रिय-कुलोत्पन्न हैं; अतः आपकी कृपाके पात्र हैं” इस प्रकार परस्पर एक दूसरेसे कहनेके उपरान्त वे मुनिके यहाँ ठहर गये ॥ ४१ ॥
प्रातरुत्थाय यमुनामुत्तीर्य मुनिदारकैः ।<br>कृताप्लवेन मुनिना दृष्टमार्गेण राघवः ॥ ४२ ॥प्रातःकाल जागनेपर श्रीरघुनाथजी मुनिकुमारोंकी बनायी हुई डोंगीपर चढ़कर यमुनाके पार हुए और मुनिवरके बताये हुए मार्गसे चित्रकूट-पर्वतकी ओर
प्रययौ चित्रकूटार्द्रिं वाल्मीकेर्यत्र चाश्रमः ।<br>गत्वा रामोऽथ वाल्मीकेराश्रमं ऋषिसङ्कुलम् ॥ ४३ ॥चले जहाँ वाल्मीकिजीका आश्रम था। उस ऋषिगणोंसे भरे हुए, नाना मृग और पक्षियोंसे समाकुल तथा सर्वदा फल-पुष्पादिसे परिपूर्ण वाल्मीकिजीके
नानामृगद्विजाकीर्णं नित्यपुष्पफलाकुलम् ।<br>तत्र दृष्ट्वा समासीनं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् ॥ ४४ ॥आश्रममें जाकर श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी बैठे हुए हैं ॥ ४२-४४ ॥ तब श्रीरामचन्द्रजीने

१०

७४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ६

ननाम शिरसा रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।<br>दृष्ट्वां रामं रमानाथं वाल्मीकिर्लोकसुन्दरम् ॥४५॥<br>जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ।<br>कन्दर्पसदृशाकारं कमनीयाम्बुजेक्षणम् ॥४६॥ | लक्ष्मण और सीताके सहित उन्हें शिर झुकाकर प्रणाम किया। तब श्रीवाल्मीकिजीने सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, कामदेवकी-सी आकृतिवाले, जटा-मुकुटधारी, त्रिलोकमोहन लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित देखा ॥ ४५-४६ ॥ दृष्ट्वैव सहसोत्तस्थौ विस्मयानिमिपेक्षणः ।<br>आलिङ्ग्य परमानन्दं रामं हर्षाश्रुलोचनः ॥४७॥ | उन्हें देखते ही श्रीवाल्मीकिजी सहसा उठ खड़े हुए, उनके नेत्र आश्चर्यसे निमेषशून्य हो गये और उन्होंने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर परमानन्दस्वरूप श्री-रामचन्द्रजीका आलिंगन किया ॥ ४७ ॥ तथा अति पूजयित्वा जगत्पूज्यं भक्त्यार्घ्यादिभिरादृतः ।<br>फलमूलैः स मधुरैर्भोजयित्वा च लालितः ॥४८॥ | भक्तिभावसे जगत्पूज्य भगवान् रामकी अर्ध्यादिसे सादर पूजा कर उन्हें मीठे-मीठे फल-मूलादि खिलाकर उनका लालन किया ॥ ४८ ॥ राघवः प्राञ्जलिः प्राह वाल्मीकिं विनयान्वितः ।<br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डकानागता वयम् ॥४९॥ | तब श्रीरघुनाथजीने अति नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रीवाल्मीकिजीसे कहा—"हम पिताजीकी आज्ञा मान कर दण्डक-वनमें आये हैं ॥ ४९ ॥ आप भवन्तो यदि जानन्ति किं वक्ष्यामोऽत्र कारणम् ।<br>यत्र मे सुखवासाय भवेत्स्थानं वदस्व तत् ॥५०॥ | सब कुछ जानते ही हैं, फिर हम आपको इसका कारण क्या बताएँ ? अब आप मुझे कोई ऐसा स्थान बताइये जहाँ मैं सुखपूर्वक रह सकूँ ॥ ५० ॥ सीतया सहितः कालं किञ्चित्त्र नयाम्यहम् ।<br>इत्युक्तो राघवेणासौ मुनिः सस्मितमब्रवीत् ॥५१॥ | आपके बताये हुए उस स्थानमें मैं सीताके साथ रहकर कुछ समय विताऊँगा ।" त्वमेव सर्वलोकानां निवासस्थानमुत्तमम् ।<br>तवापि सर्वभूतानि निवाससदनानि हि ॥५२॥ | रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर मुनिवरने मुसकरा-कर कहा—॥ ५१ ॥ "हे राम ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आप ही एकमात्र उत्तम निवास-स्थान हैं और सब जीव भी आपके निवास-गृह हैं ॥ ५२ ॥ हे रघुनन्दन ! एवं साधारणं स्थानमुक्तं ते रघुनन्दन ।<br>सीतया सहितस्येति विशेषं पृच्छतस्तव ॥५३॥ | इस प्रकार यह मैंने आपका साधारण निवास-स्थान बताया, परन्तु आपने विशेषरूपसे सीताके सहित अपने रहनेका स्थान पूछा है इसलिये हे रघुश्रेष्ठ ! अब तद्वक्ष्यामि रघुश्रेष्ठ यत्ते नियतमन्दिरम् ।<br>शान्तानां समदृष्टीनामद्वेष्टृणां च जन्तुषु ।<br>त्वामेव भजतां नित्यं हृदयं तेऽधिमन्दिरम् ॥५४॥ | मैं आपका जो निश्चित गृह है वह बताता हूँ। जो शान्त, समदर्शी और सम्पूर्ण जीवोंके प्रति द्वेषहीन हैं तथा अहर्निश आपका ही भजन करते हैं उनका हृदय आपका प्रधान निवास-स्थान है ॥ ५३-५४ ॥ जो धर्माधर्मान्परित्यज्य त्वामेव भजतोऽनिशम् ।<br>सीतया सह ते राम तस्य हृत्सुखमन्दिरम् ॥५५॥ | धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़कर निरन्तर आपका ही भजन करता है, हे राम ! उसके हृदय-मन्दिरमें सीताके सहित आप सुखपूर्वक रहते हैं ॥ ५५ ॥ जो त्वन्मन्त्रजापको यस्तु त्वामेव शरणं गतः ।<br>निर्द्वन्द्वो निःस्पृहस्तस्य हृदयं ते सुमन्दिरम् ॥५६॥ | आपहीके मन्त्रका जाप करता है, आपहीकी शरणमें रहता है तथा द्वन्द्वहीन और निःस्पृह है उसका हृदय आपका सुन्दर मन्दिर है ॥ ५६ ॥ जो अहंकारशून्य, निरहङ्कारिणः शान्ता ये रागद्वेषवर्जिताः । | शान्तस्वभाव, राग-द्वेष-रहित और मृत्पिण्ड, पत्थर

सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७५


समलोष्टाश्मकनकास्तेषां ते हृदयं गृहम् ॥ ५७ ॥
त्वयि दत्तमनोबुद्धिर्यः सन्तुष्टः सदा भवेत् ।
त्वयि सन्त्यक्तकर्मा यस्तन्मनस्ते शुभं गृहम् ॥ ५८ ॥
यो न द्वेष्ट्यप्रियं प्राप्य प्रियं प्राप्य न हृष्यति ।
सर्वं मायेति निश्चित्य त्वां भजेत्तन्मनो गृहम् ॥ ५९ ॥
षड्भावादिविकारान्यो देहे पश्यति नात्मनि ।
क्षुत्तृट् सुखं भयं दुःखं प्राणबुद्ध्योर्निरीक्षते ॥ ६० ॥
संसारधर्मैर्निर्मुक्तस्तस्य ते मानसं गृहम् ॥ ६१ ॥
पश्यन्ति ये सर्वगुहाशयस्थं
  त्वां चिद्धनं सत्यमनन्तमेकम् ।
अलेपकं सर्वगतं वरेण्यं
  तेषां हृदब्जे सह सीतया वस ॥ ६२ ॥
निरन्तराभ्यासदृढीकृतात्मनां
  त्वत्पादसेवापरिनिष्ठितानाम् ।
त्वन्नामकीर्त्या हतकल्मषाणां
  सीतासमेतस्य गृहं हृदब्जे ॥ ६३ ॥
राम त्वन्नाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ।
यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् ॥ ६४ ॥
अहं पुरा किरातेषु किरातैः सह वर्धितः ।
जन्ममात्राद्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥ ६५ ॥
शूद्रायां बहवः पुत्रा उत्पन्ना मेऽजितात्मनः ।
ततश्चौरैश्च सङ्गम्य चौरोऽहमभवं पुरा ॥ ६६ ॥
धनुर्बाणधरो नित्यं जीवानामान्तकोपमः ।
एकदा मुनयः सप्त दृष्टा महति कानने ॥ ६७ ॥
साक्षान्मया प्रकाशन्तो ज्वलनार्कसमप्रभाः ।
तानन्वधावं लोभेन तेषां सर्वपरिच्छदान् ॥ ६८ ॥


तथा सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं, उनका हृदय आपका घर है ॥ ५७ ॥ जो तुम्हींमें मन और बुद्धिको लगाकर सदा सन्तुष्ट रहता है और अपने समस्त कर्मोंको तुम्हारे ही अर्पण कर देता है उसका मन ही आपका शुभ गृह है ॥ ५८ ॥ जो अप्रियको पाकर द्वेष नहीं करता और प्रियको पाकर हर्षित नहीं होता तथा 'यह सम्पूर्ण प्रपञ्च मायामात्र है' ऐसा निश्चय कर सदा आपका भजन करता है उसका मन ही आपका घर है ॥ ५९ ॥ जो (सत्ता, जन्म लेना, बढ़ना, बदलना, क्षीण होना और नष्ट होना इन) छः विकारोंको शरीरमें ही देखता है, आत्मामें नहीं; तथा क्षुधा, तृषा, सुख, दुःख और भय आदिको प्राण और बुद्धिके ही धर्म मानता है और स्वयं सांसारिक धर्मोंसे मुक्त रहता है उसका चित्त आपका निज गृह है ॥ ६०-६१ ॥ जो लोग चिद्घन, सत्यस्वरूप, अनन्त, एक, निर्लेप, सर्वगत और स्तुत्य आप परमेश्वरको समस्त अन्तःकरणोंमें विराजमान देखते हैं, हे राम ! उनके हृदय-कमलमें आप सीताजीके सहित निवास कीजिये ॥ ६२ ॥ निरन्तर अभ्यास करनेसे जिनका हृदय स्थिर हो गया है, जो सर्वदा आपकी चरण-सेवामें लगे रहते हैं तथा आपके नाम-संकीर्तनसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं उनके हृदय-कमलमें सीताके सहित आपका निवास-गृह है ॥ ६३ ॥ हे राम ! जिसके प्रभावसे मैंने ब्रह्मर्षि-पद प्राप्त किया है, आपके उस नामकी महिमा कोई किस प्रकार वर्णन कर सकता है ? ॥ ६४ ॥ पूर्वकालमें मैं किरातोंके साथ रहता था और उन्हींके साथ रहकर बड़ा हुआ । मैं निरन्तर शूद्रोंके आचरणोंमें रत रहता था, मेरी द्विजातीयता केवल जन्ममात्रकी थी ॥ ६५ ॥ मुझ अजितेन्द्रियके शूद्राके गर्भसे बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए । उस समय चोरोंके समागमसे मैं भी पक्का चोर हो गया था ॥ ६६ ॥ जीवोंके अन्तकर्ता कालके समान मैं सदा धनुष-बाण धारण किये रहता था । एक दिन एक घोर वनमें मैंने साक्षात् सप्तर्षियोंको जाते देखा । वे अपनी प्रभासे अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशमान थे । उनके सम्पूर्ण वस्त्रादि छीननेकी इच्छासे मैं लोभके वश होकर उनके पीछे दौड़ा और बोला—'ठहरो, ठहरो।' तब मुनीश्वरोंने मेरी ओर देखकर पूछा—'हे द्विजाधम !

७६अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

ग्रहीतुकामस्तत्राहं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवम् ।
दृष्ट्वा मां मुनयोऽपृच्छन्किमायासि द्विजांधम । ६९।
अहं तानब्रवं किञ्चिद्दातुं मुनिसत्तमाः ।
पुत्रदारादयः सन्ति बहवो मे बुभुक्षिताः ॥७०॥
तेषां संरक्षणार्थाय चरामि गिरिकानने ।
ततो मामूचुरव्यग्राः पृच्छ गत्वा कुटुम्बकम् ॥७१॥
यो यो मया प्रतिदिनं क्रियते पापसञ्चयः ।
यूयं तद्भागिनः किं वा नेति वेति पृथक्पृथक् ॥७२॥
वयं स्थास्यामहे तावदागमिष्यसि निश्चयः ।
तथेत्युक्त्वा गृहं गत्वा मुनिभिर्यदुदीरितम् ॥७३॥
अपृच्छं पुत्रदारादींस्तैरुक्तोऽहं रघूत्तम ।
पापं तवैव तत्सर्वं वयं तु फलभागिनः ॥७४॥
तच्छ्रुत्वा जातानिर्वेदो विचार्य पुनरागमम् ।
मुनयो यत्र तिष्ठन्ति करुणापूर्णमानसाः ॥७५॥
मुनीनां दर्शनादेव शुद्धान्तःकरणोऽभवम् ।
धनुरादीन्परित्यज्य दण्डवत्पतितोऽस्म्यहम् ॥७६॥
रक्षध्वं मां मुनिश्रेष्ठा गच्छन्तं निरयार्णवम् ।
इत्यग्रे पतितं दृष्ट्वा मामूचुर्मुनिंसत्तमाः ॥७७॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते सफलः सत्समागमः ।
उपदेक्ष्यामहे तुभ्यं किञ्चित्तेनैव मोक्ष्यसे ।
परस्परं समालोच्य दुर्वृत्तोऽयं द्विजाधमः ॥७८॥
उपेक्ष्य एव सद्वृत्तैस्तथापि शरणं गतः ।
रक्षणीयः प्रयत्नेन मोक्षमार्गोपदेशतः ॥७९॥
इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् ।
एकाग्रमनसाऽत्रैव मरेति जप सर्वदा ॥८०॥
आगच्छामः पुनर्यावत्तावदुक्तं सदा जप ।
इत्युक्त्वा प्रययुः सर्वे मुनयो दिव्यदर्शनाः ॥८१॥
अहं यथोपदिष्टं तैस्तथाऽकरवमञ्जसा ।
जपन्नेकाग्रमनसा वाह्यं विस्मृतवानहम् ॥८२॥

क्यों आ रहा है ?” ॥ ६७–६९ ॥ मैंने कहा—"हे मुनिश्रेष्ठगण ! मेरे बहुत-से भृत्य पुत्र-कलत्रादि हैं। अतः उनके पोषणार्थ कुछ लेनेके लिये आ रहा हूँ ॥ ७० ॥ उन्हींका पालन-पोषण करनेके लिये मैं वन-पर्वतादिमें घूमता फिरता हूँ।” तब उन मुनीश्वरोंने मुझसे निर्भयतापूर्वक कहा—"अच्छा, एक बार तू अपने कुटुम्बियोंके पास जाकर प्रत्येकसे अलग-अलग पूछ कि मैं प्रतिदिन जो पाप-सञ्चय करता हूँ उनके आप लोग भी भागी हैं या नहीं ? ॥ ७१-७२ ॥ इस बातका निश्चय रख कि जबतक तू लौटकर आयेगा हम यहीं रहेंगे।” मैं 'बहुत अच्छा' कह अपने घर आया और जिस प्रकार मुनीश्वरोंने मुझसे कहा था मैंने अपने पुत्र-स्त्री आदिसे पूछा । हे रघूश्रेष्ठ ! तब वे बोले, “वह पाप तो सब तुम्हींको लगेगा, हम तो उससे प्राप्त हुए फल (धन आदि) को ही भोगनेवाले हैं” ॥७३-७४॥ यह सुनकर मुझे अति वैराग्य हुआ और मैं विचार करता हुआ, जहाँ करुणासे परिपूर्ण हृदयवाले मुनीश्वर थे, वहाँ आया ॥७५॥ तब उन मुनीश्वरोंके दर्शनमात्रसे ही मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया और मैं धनुष आदिको फेंककर दण्डके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७६ ॥ 'हे मुनिश्रेष्ठगण ! इस पाप-समुद्रमें पड़े हुए मेरी आप रक्षा कीजिये'—इस प्रकार चिल्लाते हुए मुझे अपने सामने पड़ा देख वे मुनिश्रेष्ठ मुझसे बोले— ॥ ७७ ॥ "खड़ा हो, खड़ा हो, तेरा सत्संग सफल हो गया है; तेरा अवश्य कल्याण होगा । हम तुझे थोड़ा-सा उपदेश करते हैं उसीसे तू मुक्त हो जायगा।” तब उन्होंने आपसमें मिलकर यह विचार किया कि यद्यपि यह ब्राह्मणाधम अत्यन्त दुराचारी होनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये उपेक्षाका ही पात्र है तथापि अब यह शरणमें आ गया है, इसलिये मोक्ष-मार्गके उपदेशद्वारा इसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी ही चाहिये ॥ ७८-७९ ॥ हे राम ! ऐसा विचारकर उन्होंने आपके नामाक्षरोंको उलटा करके मुझसे कहा "तू इसी स्थानपर रहकर एकाग्र-चित्तसे सदा 'मरा-मरा' जपा कर ॥ ८० ॥ जबतक हम फिर लौटकर आयें तबतक तू सर्वदा हमारे कथनानुसार इसका जाप कर।” ऐसा कहकर वे सब दिव्य-दर्शन मुनीश्वर चले गये ॥ ८१ ॥ तब उन्होंने मुझे जैसा उपदेश दिया था मैंने ठीक वैसा ही

सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
एवं बहुतिथे काले गते निश्चलरूपिणः ।<br>सर्वसङ्गविहीनस्य वल्मीकोऽभून्ममोपरि ॥८३॥<br><br>ततो युगसहस्रान्ते ऋषयः पुनरागमन् ।<br>मामूचुर्निष्क्रमस्वेति तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थितः ॥८४॥<br><br>वल्मीकान्निर्गतश्चाहं नीहारादिव भास्करः ।<br>मामप्याहुर्मुनिगणा वाल्मीकिस्त्वं मुनीश्वर ॥८५॥<br><br>वल्मीकात्सम्भवो यस्माद्वितीयं जन्म तेऽभवत् ।<br>इत्युक्त्वा ते ययुर्दिव्यगतिं रघुकुलोत्तम ॥८६॥<br><br>अहं ते राम नाम्नश्च प्रभावादीदृशोऽभवम् ।<br>अद्य साक्षात्प्रपश्यामि ससीतं लक्ष्मणेन च ॥८७॥<br><br>रामं राजीवपत्राक्षं त्वां मुक्तो नात्र संशयः ।<br>आगच्छ राम भद्रं ते स्थलं वै दर्शयाम्यहम् ॥८८॥<br><br>एवमुक्त्वा मुनिः श्रीमांल्लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>शिष्यैः परिवृतो गत्वा मध्ये पर्वतगङ्गयोः ॥८९॥<br><br>तत्र शालां सुविस्तीर्णां कारयामास वासभूः ।<br>प्राक्पश्चिमं दक्षिणोदक् शोभनं मन्दिरद्वयम् ॥९०॥<br><br>जानक्या सहितो रामो लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>तत्र ते देवसदृशा ह्यवसन् भवनोत्तमे ॥९१॥<br><br>वाल्मीकिना तत्र सुपूजितोऽयं<br>रामः ससीतः सह लक्ष्मणेन ।<br>देवैर्मुनीन्द्रैः सहितो मुदाऽऽस्ते<br>स्वर्गे यथा देवपतिः स शच्या ॥९२॥किया । इस प्रकार निरन्तर एकाग्र-चित्तसे जप करते-करते मुझे बाह्य ज्ञान नहीं रहा ॥ ८२ ॥ इस तरह बहुत समयतक निश्चलतापूर्वक रहनेसे मुझ सर्वसङ्गविहीनके ऊपर वल्मीक (मिट्टीका ढेर) बन गया ॥८३॥<br><br>तदनन्तर, एक हजार युग बीतनेपर वे ऋषीश्वर फिर लौटे और मुझसे कहा—'निकल आओ' यह सुनकर मैं तुरन्त खड़ा हो गया ॥८४॥ और जिस प्रकार कुहरेको पार करके सूर्य निकल आता है उसी प्रकार मैं वल्मीकसे निकल आया । तब मुनिगणने मुझसे कहा “हे मुनिवर ! तुम वाल्मीकि हो ॥ ८५ ॥ इस समय तुम वल्मीकसे निकले हो, इसलिये तुम्हारा यह दूसरा जन्म हुआ है ।” हे रघुश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर वे दिव्यलोकको चले गये ॥ ८६ ॥ हे राम ! आपके नामके प्रभावसे मैं ऐसा हो गया जो आज सीता और लक्ष्मणके सहित साक्षात् आप कमलनयनको देख रहा हूँ । अहा ! मैं निस्सन्देह मुक्त हो गया । हे राम ! आपका मंगल हो, आइये मैं आपको रहनेके लिये स्थान दिखलाता हूँ” ॥८७-८८ ॥<br><br>ऐसा कह शिष्योंसे घिरे हुए श्रीमान् मुनिवर वाल्मीकिजीने लक्ष्मणके सहित गंगा और पर्वतके बीचके स्थलमें जाकर वहाँ भगवान् रामके रहनेके लिये एक सुविशाल शाला बनवायी, उसमें एक पूर्व-पश्चिम और दूसरा उत्तर-दक्षिण ऐसे दो सुन्दर घर बनाये गये ॥ ८९-९० ॥ उस भव्य भवनमें जानकीके सहित श्रीराम और लक्ष्मण देवताओंके समान रहने लगे ॥ ९१ ॥ श्रीवाल्मीकिजीसे भली प्रकार सम्मान पाकर देवता और मुनिजनोंके सहित श्रीरामचन्द्रजी वहाँ सीता और लक्ष्मणके साथ इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे जैसे स्वर्गलोकमें शचीके साथ देवराज इन्द्र रहते हैं ॥ ९२ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

अयोध्याकाण्ड - सर्ग ७: सुमन्त्रका प्रत्यागमन, राजा दशरथका स्वर्गवास तथा भरतजीका आगमन

७८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

सप्तम सर्ग

सुमन्त्रका प्रत्यागमन, राजा दशरथका स्वर्गवास तथा भरतजीका ननिहालसे आना और वसिष्ठजीके आदेशसे पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करना ।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**इधर सायंकालके समय
सुमन्त्रोऽपि तदाऽयोध्यां दिनान्ते प्रविवेश ह।<br>वस्त्रेण मुखमाच्छाद्य बाष्पाकुलितलोचनः ॥ १ ॥सुमन्त्रने भी वस्त्रसे मुख ढाँपकर नेत्रोंमें जल भरे हुए अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ १ ॥ रथको बाहर ही
बहिरेव रथं स्थाप्य राजानं द्रष्टुमाययौ।<br>जयशब्देन राजानं स्तुत्वा तं प्रणनाम ह ॥ २ ॥खड़ाकर वे राजाको देखनेके लिये अन्तःपुरमें गये और जय-शब्दसे उनकी स्तुतिकर उन्हें प्रणाम किया ॥ २ ॥
ततो राजा नमन्तं तं सुमन्त्रं विह्वलोऽब्रवीत् ।<br>सुमन्त्र रामः कुत्रास्ते सीतया लक्ष्मणेन च ॥ ३ ॥राजाने सुमन्त्रको नमस्कार करते देख दुःखसे व्याकुल होकर कहा—"सुमन्त्र ! सीता और लक्ष्मणके सहित राम कहाँ हैं ? ॥ ३ ॥ तुमने रामको कहाँ
कुत्र त्यक्तस्त्वया रामः किं मां पापिनमब्रवीत् ।<br>सीता वा लक्ष्मणो वाऽपि निर्दयं मां किमब्रवीत् ४छोड़ा है ? उन्होंने मुझ पापीके लिये क्या कहा ? तथा सीता और लक्ष्मणने भी मुझ निर्दयीके लिये क्या कहा है ? ॥ ४ ॥ हा राम ! हा गुणनिधे ! हा
हा राम हा गुणनिधे हा सीते प्रियवादिनि ।<br>दुःखार्णवे निमग्नं मां म्रियमाणं न पश्यसि ॥ ५ ॥प्रिय-वादिनि सीते ! क्या तुम मुझको दुःख-समुद्रमें डूबकर मरते हुए नहीं देखते हो?" ॥ ५ ॥
विलप्यैवं चिरं राजा निमग्नो दुःखसागरे ।<br>एवं मन्त्री रुदन्तं तं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥इस प्रकार बहुत देरतक विलाप करके राजा दुःख-समुद्रमें डूब गये । महाराजको इस प्रकार रोते देख मन्त्रीने हाथ जोड़कर कहा—॥ ६ ॥ "महाराज !
रामः सीता च सौमित्रिर्मया नीता रथेन ते ।<br>शृङ्गवेरपुराभ्याशे गङ्गाकूले व्यवस्थिताः ॥ ७ ॥मैं राम, सीता और लक्ष्मणको आपके रथमें बैठाकर ले गया था । वे श्रृंगवेरपुरके पास गंगाजीके किनारे जाकर टिके ॥ ७ ॥ वहाँ निषादराज गुह कुछ फल-
गुहेन किञ्चिदानीतं फलमूलादिकं च यत् ।<br>स्पृष्ट्वा हस्तेन सम्प्रीत्या नाग्रहीद्विससर्ज तत् ॥८॥मूलादि ले आया, किन्तु रामजीने उन्हें ग्रहण नहीं किया, केवल प्रीतिपूर्वक हाथसे छूकर ही छोड़ दिया ॥ ८ ॥ तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने गुहसे वटका
वटक्षीरं समानाय्य गुहेन रघुनन्दनः ।<br>जटामुकुटमाबद्ध्य मामाह नृपते स्वयम् ॥ ९ ॥दूध मँगवाकर अपनी जटाओंका मुकुट बनाया और फिर वे स्वयं मुझसे बोले—॥ ९ ॥ "सुमन्त्र ! महाराज-
सुमन्त्र ब्रूहि राजानं शोकस्तेऽस्तु न मत्कृते ।<br>साकेतादधिकं सौख्यं विपिने नो भविष्यति ।१०।से कहना वे हमारे लिये शोक न करें; हमें वनमें अयोध्यासे भी अधिक सुख प्राप्त होगा ॥ १० ॥ मातासे
मातुर्मे वन्दनं ब्रूहि शोकं त्यजतु मत्कृते ।<br>आश्वासयतु राजानं वृद्धं शोकपरिप्लुतम् ॥११॥भी मेरा प्रणाम कहकर कहना कि मेरेलिये शोक करना छोड़ दें । महाराज वृद्ध और शोकाकुल हैं, उन्हें भली प्रकार ढाँढस बँधाना" ॥ ११ ॥ हे नृपश्रेष्ठ !
सीता चाश्रुपरीताक्षी मामाह नृपसत्तम ।<br>दुःखगद्गदया वाचा रामं किञ्चिदवेक्षती ॥१२॥तदनन्तर नेत्रोंमें जल भरकर कुछ-कुछ रामकी ओर देखते हुए सीताने दुःखसे गद्गद-कण्ठ हो मुझसे कहा—॥ १२ ॥ "दोनों सासुओंके चरण-

सर्ग ७ ] 'अयोध्याकाण्ड ७९


साष्टाङ्गं प्रणिपातं मे ब्रूहि श्वश्वोः पदाम्बुजे ।
इति प्ररुदती सीता गता किञ्चिदवाङ्मुखी ॥१३॥
ततस्तेऽश्रुपरीताक्षा नावमारुरुहुस्तदा ।
यावद्गङ्गां समुत्तीर्य गतास्तावदहं स्थितः ॥१४॥
अतो दुःखेन महता पुनरेवाहमागतः ।
ततो रुदन्ती कौसल्या राजानमिदमब्रवीत् ॥१५॥
कैकेय्यै प्रियभार्यायै प्रसन्नो दत्तवान्वरम् ।
त्वं राज्यं देहि तस्यैव मत्पुत्रः किं विवासितः ॥१६॥
कृत्वा त्वमेव तत्सर्वमिदानीं किं नु रोदिषि ।
कौसल्यावचनं श्रुत्वा क्षते स्पृष्ट इवाग्निना ॥१७॥

पुनः शोकाश्रुपूर्णाक्षः कौसल्यामिदमब्रवीत् ।
दुःखेन म्रियमाणं मां किं पुनर्दुःखयस्यलम् ॥१८॥
इदानीमेव मे प्राणा उत्क्रमिष्यन्ति निश्चयः।
'शप्तोऽहं बाल्यभावेन केनचिन्मुनिना पुरा ॥१९॥
पुराहं यौवने दृप्तश्चापबाणधरो निशि ।
अचरं मृगयासक्तो नद्यास्तीरे महावने ॥२०॥
तत्रार्धरात्रसमये मुनिः कश्चित्तृषार्दितः ।
पिपासार्दितयोः पित्रोर्जलमानेतुमुद्यतः ।
अपूरयज्जले कुम्भं तदा शब्दोऽभवन्महान् ॥२१॥
गजः पिबति पानीयमिति मत्वा महानिशि ।
बाणं धनुषि सन्धाय शब्दवेधिनमक्षिपम् ॥२२॥
हा हतोऽस्मीति तत्राभूच्छब्दो मानुषसूचकः ।
कस्यापि न कृतो दोषो मया केन हतो विधे ॥२३॥
प्रतीक्षते मां माता च पिता च जलकाङ्क्षया ।
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्तस्ततोऽहं पौरुषं वचः ॥२४॥
शनैर्गत्वार्थ तत्पार्श्व स्वामिन् दशरथोऽस्म्यहम् ।
अजानते मया विद्धस्त्रातुमर्हसि मां मुने ॥२५॥


कमलोंमें मेरा साष्टांग प्रणाम कहना।” ऐसा कह कुछ शिर झुकाकर रोती हुई वे वहाँसे चली गयीं ॥ १३ ॥ इसके पीछे वे सब नेत्रोंमें जल भरे हुए नावपर चढ़े । जबतक वे गङ्गाजीको पार कर उस पार पहुँचे तबतक मैं वहीं खड़ा रहा ॥ १४ ॥ फिर वहाँसे चलकर बड़े दुःखसे मैं यहाँ पहुँचा हूँ।”

तब कौसल्याने रोते हुए राजासे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥ “राजन् ! आपने यदि प्रसन्न होकर अपनी प्रिया कैकेयीको वर दिया तो भले ही आपने उसीके पुत्रको राज्य दिया होता, किन्तु मेरे पुत्रको देशनिकाला क्यों दिया ? ॥ १६ ॥ और अपने आप ही यह सारी करतूत करके अब आप रोते क्यों हैं ?” कौसल्याके ये वचन सुनकर महाराजको ऐसी वेदना हुई मानो घावमें अग्निका स्पर्श हो गया हो ॥ १७ ॥

तब महाराजने नेत्रोंमें शोकाश्रु भरकर कौसल्यासे कहा— “मैं तो आप ही दुःखसे मर रहा हूँ, फिर इस प्रकार मुझे और दुःख क्यों देती हो ? इससे क्या लाभ है ? ॥ १८ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि मेरे प्राण अभी निकलनेवाले हैं। पूर्वकालमें मेरी मूर्खताके कारण मुझे एक मुनीश्वरने शाप दिया था ॥ १९ ॥

(वह कथा इस प्रकार है—) पहले एक बार मैं युवावस्थाके मदसे उन्मत्त हुआ मृगयामें आसक्त होकर रात्रिके समय धनुष और बाण लिये एक घोर वनमें नदीके किनारे घूम रहा था ॥ २० ॥ उस आधी रातके समय किन्हीं प्यासे मुनीश्वरने अपने तृषित माता-पिताके निमित्त जल ले जानेके लिये जलमें घड़ा डुबोया; उस समय उसका महान् शब्द हुआ ॥ २१ ॥ तब यह सोचकर कि इस घोर रात्रिमें कोई हाथी जल पी रहा है मैने अपने धनुषपर शब्दवेधी बाण चढ़ाकर छोड़ा ॥ २२ ॥ वहाँपर मनुष्यकी सूचना देनेवाला यह शब्द हुआ 'हाय! मैं मारा गया ! हे विधे ! मैंने तो किसीका भी कोई अपराध नहीं किया था, फिर मुझपर यह वार किसने किया ? ॥ २३ ॥ हाय ! मेरे माता-पिता भी जलकी आकांक्षासे मेरी बाट देख रहे होंगे।' यह मानुष-वचन सुनकर मैं अत्यन्त भयभीत हुआ और धीरेसे उनके पास जाकर बोला— “प्रभो ! मैं दशरथ हूँ, मैंने ही अनजानमें यह बाण छोड़ा है; हे मुने ! आप मेरी रक्षा कीजिये” ॥ २४-२५ ॥

८०अध्यात्मरामायण[सर्ग ७

इत्युक्त्वा पादयोस्तस्य पतितो गद्गदाक्षरः।
तदा मामाह स मुनिर्मा भैषीर्नृपसत्तम ॥२६॥
ब्रह्महत्या स्पृशेन्न त्वां वैश्योऽहं तपसि स्थितः।
पितरौ मां प्रतीक्षेते क्षुत्तृड्भ्यां परिपीडितौ ॥२७॥
तयोस्त्वमुदकं देहि शीघ्रमेवाविचारयन्।
न चेत्त्वां भस्मसात्कुर्यात्पिता मे यदि कुप्यति॥२८॥
जलं दत्त्वा तु तौ नत्वा कृतं सर्वं निवेदय।
शल्यमुद्धर मे देहात्प्राणांस्त्यक्ष्यामि पीडितः॥२९॥

इत्युक्तो मुनिना शीघ्रं बाणमुत्पाट्य देहतः।
सजलं कलशं धृत्वा गतोऽहं यत्र दम्पती ॥३०॥
अतिवृद्धावन्धदृशौ क्षुत्पिपासादितौ निशि।
नायाति सलिलं गृह्य पुत्रः किं वाऽत्र कारणम्॥३१॥
अनन्यगतिकौ वृद्धौ शोच्यौ तृट्परिपीडितौ।
आवामुपेक्षते किं वा भक्तिमानावयोः सुतः॥३२॥
इतिचिन्ताव्याकुलौ तौ मत्पादन्यासजं ध्वनिम्।
श्रुत्वा प्राह पिता पुत्र किं विलम्बः कृतस्त्वया।३३।
देह्यावयोः सुपानीयं पिव त्वमपि पुत्रक।
इत्येवं लपतोर्भीत्या सकाशमगमं शनैः ॥३४॥
पादयोः प्रणिपत्याहमब्रुवं विनयान्वितः।
नाहं पुत्रस्त्वयोध्याया राजा दशरथोऽस्म्यहम्।३५।
पापोऽहं मृगयासक्तो रात्रौ मृगविहिंसकः।
जलावचाराद्दूरेऽहं स्थित्वा जलगतं ध्वनिम्।३६।
श्रुत्वाहं शब्दवेधित्वादेकं बाणमथात्यजम्।
हतोऽस्मीति ध्वनिं श्रुत्वा भयात्तत्राहमागतः ॥३७॥
जटा विकीर्य पतितं दृष्ट्वाहं मुनिदारकम्।
भीतो गृहीत्वा तत्पादौ रक्ष रक्षेति चाब्रवम् ॥३८॥

"ऐसा कहकर मैं गद्गद-कण्ठ हो उनके चरणोंमें गिर पड़ा। तब उन मुनीश्वरने मुझसे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ! डरो मत ॥२६॥ तुम्हें ब्रह्महत्या नहीं लगेगी, क्योंकि मैं तपस्यामें लगा हुआ वैश्य हूँ। मेरे माता-पिता भूख और प्याससे व्याकुल हुए मेरी बाट देखते होंगे ॥२७॥ इसलिये अब बिना कुछ सोच-विचार किये शीघ्र ही तुम उन्हें जल दे आओ, नहीं तो यदि मेरे पिता कुपित हो गये तो तुम्हें भस्म कर डालेंगे ॥२८॥ उन्हें जल देकर और नमस्कार कर अपना सारा कृत्य सुना देना। मुझे अत्यन्त पीड़ा हो रही है, तुम मेरे शरीरमेंसे बाण निकाल दो, अब मैं प्राण छोड़ूँगा' ॥२९॥

"मुनिके ऐसा कहनेपर मैंने तुरन्त ही उनके शरीरमेंसे बाण निकाल दिया और जलका घड़ा लेकर जहाँ उनके माता-पिता थे वहाँ गया ॥३०॥ उस समय वे इस प्रकार चिन्तामें व्याकुल हो रहे थे—'हम अत्यन्त वृद्ध और आँखोंसे लाचार हैं तथा भूख-प्याससे पीड़ित हो रहे हैं; क्या कारण है कि इस रात्रिके समयमें हमारा पुत्र अभीतक जल लेकर नहीं लौटा, हमारा और कोई सहारा नहीं है, हम वृद्ध, शोचनीय और प्याससे व्याकुल हैं। क्या कारण है कि ऐसी अवस्थामें हमारा पितृभक्त पुत्र हमारी उपेक्षा कर रहा है?' इसी समय मेरे पैरोंकी आहट सुनकर पिताने पूछा—"बेटा! आज तुमने इतनी देरी कैसे की? ॥३१-३३॥ लाओ, शीघ्र ही हमें पवित्र जल पिलाओ और तुम भी पिओ।" उनके इस प्रकार कहनेपर मैं डरते-डरते धीरेसे उनके पास गया ॥३४॥ और उनके चरणोंमें प्रणाम करके अति नम्रतापूर्वक कहा—'मैं आपका पुत्र नहीं हूँ, बल्कि अयोध्याका राजा दशरथ हूँ ॥३५॥ मैं पापात्मा मृगयाकी आसक्तिके कारण रात्रिके समय पशुओंका वध करता फिरता था। यद्यपि मैं उस समय जलके तीरसे दूर था किन्तु शब्दवेधी होनेके कारण जलमें हुए शब्दको सुनकर वहाँ मृग समझकर उसे मारनेके लिये मैंने एक बाण छोड़ दिया। पर जब मैंने यह शब्द सुना कि—'मैं मारा गया' तो डरता हुआ वहाँ आया ॥३६-३७॥ वहाँ आनेपर जब मैंने एक मुनिकुमारको जटा बिखेरे हुए पड़े देखा तो भयसे उसके चरण पकड़कर कहा 'रक्षा

सर्ग ७ ] अयोध्याकाण्ड ८१


माभैषीरिति मां प्राह ब्रह्महत्याभयं न ते ।
मत्पित्रोः सलिलं दत्त्वा नत्वा प्रार्थय जीवितम्॥३९॥
इत्युक्तो मुनिना तेन ह्यागतो मुनिहिंसकः ।
रक्षेतां मां दयायुक्तौ युवां हि शरणागतम् ॥४०॥

इति श्रुत्वा तु दुःखार्तौ विलप्य बहु शोच्य तम् ।
पतितौ नौ सुतो यत्र नय तत्राविलम्बयन् ॥४१॥
ततो नीतौ सुतो यत्र मया तौ वृद्धदम्पती ।
स्पृष्ट्वा सुतं तौ हस्ताभ्यां बहुशोऽथ विलेपतुः॥४२॥
हाहेति क्रन्दमानौ तौ पुत्रपुत्रेत्यवोचताम् ।
जलं देहीति पुत्रेति किमर्थं न ददास्यलम् ॥४३॥
ततो मामूचतुः शीघ्रं चितिं रचय भूपते ।
मया तदैव रचिता चितिस्तत्र निवेशिताः ।
त्रयस्तत्राग्निनुत्सृष्टे दग्धास्ते त्रिदिवं ययुः ॥४४॥
तत्र वृद्धः पिता प्राह त्वमप्येवं भविष्यसि ।
पुत्रशोकेन मरणं प्राप्स्यसे वचनान्मम ॥४५॥

स इदानीं मम प्राप्तः शापकालोऽनिवारितः ।
इत्युक्त्वा विललापाथ राजा शोकसमाकुलः ॥४६॥
हा राम पुत्र हा सीते हा लक्ष्मण गुणाकर ।
त्वद्वियोगादहं प्राप्तो मृत्युं कैकेयिसम्भवम् ॥४७॥

वदन्नेवं दशरथः प्राणांस्त्यक्त्वा दिवं गतः ।
कौसल्या च सुमित्रा च तथान्या राजयोषितः ।४८।
चुक्रुशुश्च विलेपुश्च उरस्ताडनपूर्वकम् ।
वसिष्ठः प्रययौ तत्र प्रातर्मन्त्रिभिरावृतः ॥४९॥
तैलद्रोण्यां दशरथं क्षिप्त्वा दूतानथाब्रवीत् ।
गच्छत त्वरितं साश्वा युधाजिन्नगरं प्रति ॥५०॥
तत्रास्ते भरतः श्रीमाञ्छत्रुघ्नसहितः प्रभुः ।
१६


करो, रक्षा करो' ऐसा कहने लगा ॥ ३८ ॥ तब उन्होंने मुझसे कहा— "डरो मत, तुम्हें ब्रह्महत्याका भय नहीं है। मेरे माता-पिताको जल देकर उन्हें प्रणाम कर जीवनदान माँगो" ॥ ३९ ॥ मुनिकुमारके ऐसा कहनेपर यह मुनिहिंसक आपके पास आया है। आप दोनों बड़े दयाशील हैं, मैं आपकी शरण आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें" ॥ ४० ॥

"यह सुनकर वे दुःखार्त होकर उसके लिये अत्यन्त शोक करते और रोते हुए पृथिवीपर गिर पड़े और बोले—"जहाँ हमारा बेटा है, हमें तुरन्त ही वहाँ ले चलो" ॥ ४१ ॥ तब, जहाँ वह लड़का पड़ा था वहीं उन वृद्ध-दम्पतिको मैं ले गया और वे उसे हाथोंसे स्पर्श कर अत्यन्त विलाप करने लगे ॥४२॥ वे 'हा पुत्र ! हा पुत्र !' कहकर रोते हुए बोले— "बेटा ! हमें जल दो, हमें जल दो ! आज जल क्यों नहीं देते हो ?" ॥ ४३ ॥ फिर उन्होंने मुझसे कहा— "राजन् ! शीघ्र ही चिता बनाओ।" मैने तुरन्त ही वहाँ चिता बना दी। तब वे तीनों उसपर चढ़ गये और अग्नि लगानेपर उसमें भस्म होकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४४ ॥ उस समय वृद्ध पिताने मुझसे कहा— "तुम्हारे लिये भी ऐसा ही होगा, तुम भी मेरे वचनसे पुत्र-शोकसे ही मरोगे" ॥ ४५ ॥

"वही अनिवार्य शापकाल इस समय उपस्थित हुआ है।" ऐसा कहकर राजा दशरथ अत्यन्त शोकाकुल होकर विलाप करने लगे—॥ ४६ ॥ "हा पुत्र राम ! हा सीते ! हा गुणाकर लक्ष्मण ! तुम्हारे वियोगसे मैं कैकेयीसे उपस्थित की हुई मृत्युको प्राप्त हो रहा हूँ" ॥ ४७ ॥

इस प्रकार कहते हुए महाराज दशरथ प्राण त्याग-कर स्वर्गलोकको चले गये। उस समय कौसल्या, सुमित्रा और अन्यान्य रानियाँ छाती पीट-पीटकर रोने और विलाप करने लगीं। प्रातःकाल होनेपर वहाँ मन्त्रियोंके सहित मुनिवर वसिष्ठजी आये ॥ ४८-४९॥ और राजा दशरथके शवको एक तैल-पूर्ण नौकामें रखवाकर दूतोंसे बोले— "तुमलोग शीघ्र ही घोड़ोंपर चढ़कर युधाजित्की राजधानीको जाओ ॥५०॥ वहाँ शत्रुघ्नके सहित श्रीमान् महाराज भरत विराजमान हैं। उनसे मेरी आज्ञासे जाकर इस प्रकार कहना

८२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

उच्यतां भरतः शीघ्रमागच्छेदिति ममाज्ञया ॥५१॥
अयोध्यां प्रति राजानं कैकेयीं चापि पश्यतु ।
इत्युक्तास्त्वरितं दूता गत्वा भरतमातुलम् ॥५२॥
युधाजितं प्रणम्योचुर्भरतं सानुजं प्रति ।
वसिष्ठस्त्वाऽब्रवीद्राजन् भरतः सानुजः प्रभुः ॥५३॥
शीघ्रमागच्छतु पुरीमयोध्यामविचारयन् ।
इत्याज्ञप्तोऽथ भरतस्त्वरितं भयविह्वलः ॥५४॥
आययौ गुरुणादिष्टः सह दूतैस्तु सानुजः ।
राज्ञो वा राघवस्यापि दुःखं किञ्चिदुपस्थितम् ॥५५॥
इति चिन्तापरो मार्गे चिन्तयन्नगरं ययौ ।
नगरं भ्रष्टलक्ष्मीकं जनसम्बाधवर्जितम् ॥५६॥
उत्सवैश्च परित्यक्तं दृष्ट्वा चिन्तापरोऽभवत् ।
प्रविश्य राजभवनं राजलक्ष्मीविवर्जितम् ॥५७॥
अपश्यत्कैकेयीं तत्र एकामेवासने स्थिताम् ।
ननाम शिरसा पादौ मातुर्भक्तिसमन्वितः ॥५८॥

आगतं भरतं दृष्ट्वा कैकेयी प्रेमसम्भ्रमात् ।
उत्थायालिङ्ग्य रभसा स्वाङ्कमारोप्य संस्थिता ५९
मूर्द्धन्यवघ्राय पप्रच्छ कुशलं स्वकुलस्य सा ।
पिता मे कुशली भ्राता माता च शुभलक्षणा ॥६०॥
दिष्ट्या त्वमद्य कुशली मया दृष्टोऽसि पुत्रक ।

इति पृष्टः स भरतो मात्रा चिन्ताऽऽकुलेन्द्रियः ॥६१॥
दूयमानेन मनसा मातरं समपृच्छत ।
मातः पिता मे कुत्रास्ते एका त्वमिह संस्थिता ॥६२॥
त्वया विना न मे तातः कदाचिद्रहसि स्थितः ।
इदानीं दृश्यते नैव कुत्र तिष्ठति मे वद ॥६३॥
अदृष्ट्वा पितरं मेऽद्य भयं दुःखं च जायते ।
अथाह कैकेयी पुत्रं किं दुःखेन तवानघ ॥६४॥
या गतिर्धर्मशीलानाम्श्वमेधादियाजिनाम् ।


कि भरत शीघ्र ही अयोध्यापुरीमें आकर महाराज दशरथ और कैकेयीका दर्शन करें।"

वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर दूतोंने तुरन्त ही आकर भरतके मामा युधाजित् और छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित भरतको प्रणाम करके कहा—"राजन् ! वसिष्ठजीने आपके लिये यह कहा है कि छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित महाराज भरत तुरन्त ही बिना कुछ आगा-पीछा सोचे अयोध्यापुरीमें चले आयें।" ऐसी आज्ञा सुनकर श्रीभरतजी भयसे व्याकुल हो तुरन्त ही गुरुजीके आदेशसे छोटे भाईके सहित दूतोंके साथ चले। और यह सोचकर कि 'अवश्य ही महाराज या श्रीरघुनाथजीपर कोई घोर संकट उपस्थित हुआ है' ॥५१–५५॥ मार्गमें मन-ही-मन चिन्ता करते नगरमें पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि नगर शोभाहीन, जनसमूहसे रहित तथा उत्सवहीन हो रहा है। यह देखकर वे अत्यन्त चिन्तित हुए। राजभवनमें जाकर देखा तो वह राजलक्ष्मीसे शून्य हो रहा है और वहां अकेली कैकेयी एक आसनपर बैठी हुई है। माताको देखकर उन्होंने भक्तिपूर्वक उनके चरणोंमें शिर रखकर प्रणाम किया ॥५६-५८॥

भरतजीको आये देख माता कैकेयीने उन्हें प्रेमवश शीघ्रतासे उठाकर हृदय लगाया और अपनी गोदमें बैठा लिया ॥५९॥ फिर उनका शिर सूंघकर अपने कुलकी कुशल पूछी। वह बोलीं—"मेरे पिता, भाई और शुभलक्षणा माता कुशलपूर्वक हैं न ? ॥६०॥ बेटा ! आज बड़े भाग्यसे मैंने तुम्हें सकुशल देख पाया है।"

माताके इस प्रकार पूछनेपर भरतजीने चिन्ताकुल होकर दुःखी चित्तसे मातासे पूछा—"मां ! मेरे पिताजी कहाँ हैं जो तुम यहाँ अकेली बैठी हो ? ॥६१-६२॥ माँ ! तुम्हारे बिना तो पिताजी एकान्तमें कभी नहीं रहते थे; किन्तु इस समय वे दिखायी नहीं देते, सो बताओ तो कहाँ हैं ? ॥६३॥ पिताजीको न देखनेसे आज मुझे अत्यन्त भय और दुःख हो रहा है।"

तब कैकेयीने कहा "हे अनघ ! तुम्हारे लिये दुःखकी क्या बात है? ॥६४॥ हे पितृवत्सल ! अश्वमेधादि

सर्ग ७] अयोध्याकाण्ड ८३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तां गतिं गतवानद्य पिता ते पितृवत्सल ॥६५॥यज्ञ करनेवाले धर्मपरायण पुरुषोंकी जो गति होती है उसीको आज तुम्हारे पिता भी प्राप्त हुए हैं" ॥६५॥
तच्छ्रुत्वा निपपातोर्व्यां भरतः शोकविह्वलः ।<br>हा तात क्व गतोऽसि त्वं त्यक्त्वा मां वृजिनार्णवे॥६६<br>असमर्प्यैव रामाय राज्ञे मां क्व गतोऽसि भोः।<br>इति विलपितं पुत्रं पतितं मुक्तमूर्धजम् ॥६७॥<br>उत्थाप्यामृज्य नयने कैकेयी पुत्रमब्रवीत् ।<br>समाश्वसिहि भद्रं ते सर्वं सम्पादितं मया ॥६८ ॥यह सुनते ही भरत शोकाकुल होकर पृथिवीमें गिर पड़े; और बोले—"हा तात ! हा तात ! मुझे दुःख-समुद्रमें छोड़कर आप कहाँ चले गये ? ॥ ६६ ॥ हाय ! महाराज रामको मुझे सौंपे बिना ही आप कहाँ चले गये ?" इस प्रकार विलाप करते और बिखुरे हुए केशोंसे पृथिवीपर पड़े अपने पुत्रको उठाकर कैकेयीने उसके आँसू पोंछकर कहा—"बेटा ! धीरज रखो; तुम्हारा कल्याण हो । मैने तुम्हारे लिये सब कुछ ठीक कर लिया है" ॥ ६७-६८ ॥
तामाह भरतस्तातो म्रियमाणः किमब्रवीत् ।<br>तमाह कैकेयी देवी भरतं भयवर्जिता ॥६९॥<br>हा राम राम सीतेति लक्ष्मणेति पुनः पुनः ।<br>विलपन्नेव सुचिरं देहं त्यक्त्वा दिवं ययौ ॥७०॥तब भरतजीने पूछा—"मरते समय महाराजने क्या कहा था ?" इसपर कैकेयीदेवीने निर्भय होकर भरतजीसे कहा—॥६९॥ "वे 'हा राम ! हा राम ! हा सीते ! हा लक्ष्मण !' इस प्रकार बहुत समयतक बारम्बार विलाप करते हुए अपना (शरीर) त्यागकर स्वर्गको गये हैं" ॥७०॥
तामाह भरतो हेऽम्ब रामः सन्निहितो न किम् ।<br>तदानीं लक्ष्मणो वापि सीता वा कुत्र ते गताः॥७१॥तब भरतजीने पूछा—"माता ! तो क्या उस समय राम, सीता और लक्ष्मण भी उनके पास नहीं थे ? वे तीनों उस समय कहाँ गये थे ?" ॥७१॥
कैकेय्युवाच<br>रामस्य यौवराज्यार्थं पित्रा ते सम्भ्रमः कृतः ।<br>तव राज्यप्रदानाय तदाऽहं विघ्नमाचरम् ॥७२॥<br>राज्ञा दत्तं हि मे पूर्वं वरदेन वरद्वयम् ।<br>याचितं तदिदानीं मे तयोरेकेन तेऽखिलम् ॥७३॥<br>राज्यं रामस्य चैकेन वनवासो मुनिव्रतम् ।<br>अतः सत्यपरो राजा राज्यं दत्त्वा तवैव हि ॥७४॥<br>रामं सम्प्रेषयामास वनमेव पिता तव ।<br>सीताप्यनुगता रामं पातिव्रत्यमुपाश्रिता ॥७५॥<br>सौभ्रात्रं दर्शयन् राममनुयातोऽपि लक्ष्मणः ।<br>वनं गतेषु सर्वेषु राजा तानेव चिन्तयन् ॥७६॥<br>प्रलपन् रामरामेति ममार नृपसत्तमः ।<br>इति मातुर्वचः श्रुत्वा वज्राहत इव द्रुमः ॥७७॥<br>पपात भूमौ निःसंज्ञस्तं दृष्ट्वा दुःखिता तदा ।कैकेयी बोली— तुम्हारे पिताने रामको युवराज बनानेकी तैयारी की थी, उस समय तुम्हें राज्य दिलानेके लिये मैने उसमें विघ्न खड़ा कर दिया ॥७२॥ पूर्वकालमें एक बार प्रसन्न होकर राजाने मुझे दो वर देनेको कहा था । इस समय उनमेंसे एकके द्वारा मैने तुम्हारे लिये सम्पूर्ण राज्य और दूसरेसे रामके लिये मुनिव्रतपूर्वक वनवास माँग लिया । इसलिये तुम्हारे पिता सत्यसंध महाराज दशरथने तुम्हें ही राज्य देकर रामको वनमें भेज दिया । पातिव्रत्यका पालन करनेवाली सीता भी रामके साथ ही वनमें चली गयीं ॥७३–७५॥ तथा लक्ष्मण भी भ्रातृस्नेह प्रकट करते हुए रामके अनुगामी हुए । इस प्रकार इन सबके वनको चले जानेपर उन्हींका स्मरण करते हुए और 'राम ! राम !' करके विलाप करते हुए नृपश्रेष्ठ महाराजने शरीर छोड़ दिया । माताके ये वचन सुनकर भरतजी वज्राहत वृक्षके समान अचेत होकर पृथिवीपर गिर पड़े ।
८४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७
कैकेयी पुनरप्याह वत्स शोकेन किं तव ॥७८॥<br>राज्ये महति सम्प्राप्ते दुःखस्यावसरः कुतः ।<br>इति ब्रुवन्तीमालोक्य मातरं प्रदहन्निव ॥७९॥<br>असम्भाष्यासि पापे मे घोरे त्वं भर्तृघातिनी ।<br>पापे त्वद्गर्भजातोऽहं पापवानस्मि साम्प्रतम् ।<br>अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि विषं वा भक्षयाम्यहम् ॥८०॥<br>खड्गेन वाथ चात्मानं हत्वा यामि यमक्षयम् ।<br>भर्तृघातिनि दुष्टे त्वं कुम्भीपाकं गमिष्यसि ॥८१॥उन्हें ऐसी दशामें देख कैकेयीने दुःखित होकर फिर कहा—"बेटा ! तुम शोक क्यों करते हो ? ॥ ७६-७८॥ ऐसे महान् राज्यको पाने-पर दुःखका कारण ही कहाँ रह जाता है ?" माताको इस प्रकार कहती देख भरतजीने क्रोधमे जलते हुए-से कहा—॥ ७९ ॥ "अरी पापिनी ! तू बात करनेयोग्य नहीं है ! अरी घोरे ! तू अपने पतिकी हत्या करनेवाली है ! अरी पापे ! तेरे गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण अब तो मैं भी प्रत्यक्ष ही महापापी हूँ । मैं या तो अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा या विष खा लूँगा ॥८०॥ अथवा खड्गसे आत्मघात करके यमलोकको चला जाऊँगा। हे भर्तृघातिनि ! हे दुष्टे ! तू भी कुम्भीपाकनरकमें पड़ेगी" ॥८१॥
इति निर्भर्त्स्य कैकेयीं कौसल्याभवनं ययौ ।<br>साऽपि तं भरतं दृष्ट्वा मुक्तकण्ठा रुरोद ह ॥८२॥<br>पादयोः पतितस्तस्या भरतोऽपि तदाऽरुदत् ।<br>आलिङ्ग्य भरतं साध्वी राममाता यशस्विनी ।<br>कृशाऽतिदीनवदना साश्रुनेत्रेदमब्रवीत् ॥८३॥<br>पुत्र त्वयि गते दूरमेवं सर्वमभूदिदम् ।<br>उक्तं मात्रा श्रुतं सर्वं त्वया ते मातृचेष्टितम् ॥८४॥<br>पुत्रः सभार्यो वनमेव यातः<br>  सल्लक्ष्मणो मे रघुरामचन्द्रः ।<br>चीराम्बरो बद्धजटाकलापः<br>  सन्त्यज्य मां दुःखसमुद्रमग्नाम् ॥८५॥<br>हा राम हा मे रघुवंशनाथ<br>  जातोऽसि मे त्वं परतः परात्मा ।<br>तथापि दुःखं न जहाति मां वै<br>  विधिर्बलीयानिति मे मनीषा ॥८६॥कैकेयीको इस प्रकार डाँटकर वे कौसल्याके घर गये । भरतको देखते ही माता कौसल्या मुक्तकण्ठसे रोने लगीं ॥८२॥ तब भरतजी भी उनके चरणोंमें पड़कर रोने लगे । उन्हें गले लगाकर (चिन्तासे) महा दुर्बल और दीनबदना यशस्विनी राममाता कौसल्याने नेत्रोंमें जल भरकर कहा—॥८३॥ "बेटा ! तुम्हारे बाहर चले जानेसे जो-जो अनर्थ हुए हैं अपनी माता-की वे सब करतूतें तुमने उसके मुखसे सुन ही लीं होंगी ॥८४॥ मेरा पुत्र रघुश्रेष्ठ रामचन्द्र अपनी पत्नी सीता और लक्ष्मणके सहित चीर-वस्त्र धारण कर और जटाजूट बाँधकर मुझे दुःख-समुद्रमें डुबोकर वनको चला गया ॥८५॥ हा राम ! हा मेरे रघुवंशशिरोमणि ! आप साक्षात् परम पुरुष परमात्माने मेरे गर्भसे जन्म लिया, तथापि दुःखने मेरा पल्ला नहीं छोड़ा । इससे मेरा विचार है कि विधाता ही बलवान् हैं" ॥८६॥
स एवं भरतो वीक्ष्य विलपन्तीं भृशं शुचा ।<br>पादौ गृहीत्वा प्राहैदं शृणु मातर्वचो मम ॥८७॥<br>कैकेय्या यत्कृतं कर्म रामराज्याभिषेचने ।<br>अन्यद्वा यदि जानामि सा मया नोदिता यदि ॥८८॥<br>पापं मेऽस्तु तदा मातर्ब्रह्महत्याशतोद्भवम् ।<br>हत्वा वसिष्ठं खड्गेन अरुन्धत्या समन्वितम् ॥८९॥भरतजीने उन्हें इस प्रकार शोकसे अत्यन्त विलाप करती देख उनके चरण पकड़कर कहा--"माता ! मेरी बात सुनो—॥ ८७ ॥ कैकेयीने श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकके समय जो कुछ करतूत की है, अथवा उसने और भी जो कोई कार्य किया है उसे यदि मैं जानता होऊँ अथवा उसमें मेरी सम्मति हो ॥८८॥ तो हे मातः ! मुझे सौ ब्रह्महत्याओंका पाप लगे ! अथवा अरुन्धतीके सहित श्रीवसिष्ठजीको खड्गसे मारनेसे जो पाप होता है वही पाप मुझे भी लगे ।"

सर्ग ७ ] अयोध्याकाण्ड . ८५


भूयात्तत्पापमखिलं मम जानामि यद्यहम् ।
इत्येवं शपथं कृत्वा रुरोद भरतस्तदा ॥ ९० ॥
कौसल्या तमथालिङ्ग्य पुत्र जानामि मा शुचः ।
एतस्मिन्नन्तरे श्रुत्वा भरतस्य समागमम् ॥ ९१ ॥
आसन्नो मन्त्रिभिः सार्धं प्रययौ राजमन्दिरम् ।
रुदन्तं भरतं दृष्ट्वा वसिष्ठः प्राह सादरम् ॥ ९२ ॥
वृद्धो राजा दशरथो ज्ञानी सत्यपराक्रमः ।
भुक्त्वा मर्त्यसुखं सर्वमिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः ॥ ९३ ॥
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्लब्ध्वा रामं सुतं हरिम् ।
अन्ते जगाम त्रिदिवं देवेन्द्राद्धासनं प्रभुः ॥ ९४ ॥
तं शोचसि वृथैव त्वमशोच्यं मोक्षभाजनम् ।
आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्धो जन्मनाशादिवर्जितः ॥ ९५ ॥
शरीरं जडमत्यर्थमपवित्रं विनश्वरम् ।
विचार्यमाणे शोकस्य नावकाशः कथञ्चन ॥ ९६ ॥
पिता वा तनयो वाऽपि यदि मृत्युवशं गतः ।
मूढास्तमनुशोचन्ति स्वात्मताडनपूर्वकम् ॥ ९७ ॥
निःसारे खलु संसारे वियोगो ज्ञानिनां यदा ।
भवेद्वैराग्यहेतुः स शान्तिसौख्यं तनोति च ॥ ९८ ॥
जन्मवान्यदि लोकेऽस्मिंस्तर्हि तं मृत्युरन्वगात् ।
तस्मादपरिहार्योऽयं मृत्युर्जन्मवतां सदा ॥ ९९ ॥
स्वकर्मवशतः सर्वजन्तूनां प्रभवाप्ययौ ।
विजानन्नप्यविद्वान्वैः कथं शोचति बान्धवान् १००
ब्रह्माण्डकोटयो नष्टाः सृष्टयो बहुशो गताः ।
शुष्यन्ति सागराः सर्वे कैवास्था क्षणजीविते ॥ १०१ ॥
चलपत्त्रान्तलम्बाम्बुबिन्दुवत्क्षणभङ्गुरम् ।
आयुस्त्यजत्यवेलायां कस्तत्र प्रत्ययस्तव ॥ १०२ ॥
देही प्राक्तनदेहोत्थकर्मणा देहवान्पुनः ।


इस प्रकार शपथ करके भरतजी रो उठे ॥ ८९-९० ॥
तब कौसल्याने उन्हें हृदयसे लगाकर कहा—"बेटा ! मैं यह सब जानती हूँ, तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो।"

इसी समय भरतजीका आना सुनकर मन्त्रियोंके सहित वसिष्ठजी राजभवनमें आये और भरतको रोते देखकर आदरपूर्वक बोले— ॥ ९१-९२ ॥ "महाराज दशरथ वृद्ध, ज्ञानी और सत्य-पराक्रमी थे । वे मनुष्य-जन्मके समस्त सुख भोगकर, बहुत-सी दक्षिणाके सहित अश्वमेधादि यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन कर और रामचन्द्रके रूपमें साक्षात् विष्णुभगवान्‌को पुत्र-रूपसे पाकर अन्तमें स्वर्गलोकमें जाकर देवराज इन्द्रके आधे आसनके अधिकारी हुए हैं ॥ ९३-९४ ॥ वे सर्वथा अशोचनीय और मोक्षके पात्र हैं, उनके लिये तुम वृथा ही शोक करते हो; देखो, आत्मा तो नित्य, अविनाशी, शुद्ध और जन्म-नाशादिसे रहित है ॥ ९५ ॥ और शरीर जड, अत्यन्त अपवित्र और नाशवान् है । इस प्रकार विचार करनेपर शोकके लिये कोई स्थान नहीं रह जाता ॥ ९६ ॥ यदि कोई पिता या पुत्र मर जाता है तो मूढ़जन ही उसके लिये छाती पीटकर रोते हैं ॥ ९७ ॥ किन्तु, इस असार संसारमें यदि ज्ञानियोंको किसीसे वियोग होता है तो वह उनके लिये वैराग्यका कारण होता है और सुख तथा शान्तिका विस्तार करता है ॥ ९८ ॥ यदि किसीने इस लोकमें जन्म लिया है तो मृत्यु भी अवश्य ही उसके साथ लगी हुई है । अतः जन्म लेनेवालोंके लिये मृत्यु सर्वदा अनिवार्य है ॥ ९९ ॥ 'अपने कर्मानुसार ही सब प्राणियोंके जन्म-मरण होते हैं' यह जानकर भी देखो मूढ़लोग अपने बन्धु-बान्धवोंके लिये कैसे शोक करते हैं ॥ १०० ॥ करोड़ों ब्रह्माण्ड नष्ट हो गये, अनेकों सृष्टियाँ बीत गयीं, ये सम्पूर्ण समुद्र एक दिन सूख जायँगे, फिर इस क्षणिक जीवनमें भला क्या आस्था की जाय ? ॥ १०१ ॥ यह आयु हिलते हुए पत्तेकी नोकपर लटकती हुई जलकी बूँदके समान क्षणभंगुर है, असमय ही छोड़कर चली जाती है; उसका तुम क्या विश्वास करते हो ? ॥ १०२ ॥ इस जीवात्माने अपने पूर्व-देह-कृत कर्मोंसे यह शरीर धारण किया है और फिर इस देहके कर्मोंसे यह और शरीर धारण

८६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

तद्देहोत्थेन च पुनरेवं देहः सदात्मनः । १०३।
यथा त्यजति वै जीर्णं वासो गृह्णाति नूतनम् ।
तथा जीर्णं परित्यज्य देही देहं पुनर्नवम् । १०४।
भजत्येव सदा तत्र शोकस्यावसरः कुतः ।
आत्मा न म्रियते जातु जायते न च वर्धते । १०५।
षड्भावरहितोऽनन्तः सत्यप्रज्ञानविग्रहः ।
आनन्दरूपो बुद्ध्यादिसाक्षी लयविवर्जितः । १०६।
एक एव परो ह्यात्मा ह्यद्वितीयः समः स्थितः ।
इत्यात्मानं दृढं ज्ञात्वा त्यक्त्वा शोकं कुरु क्रियाम् ॥
तैलद्रोण्याः पितुर्देहमुद्धृत्य सचिवैः सह ।
कृत्यं कुरु यथान्यायमसमाभिः कुलन्दन । १०८।
इति सम्बोधितः साक्षाद्गुरुणा भरतस्तदा ।
विसृज्याज्ञानजं शोकं चक्रे स विधिवत्क्रियाम् १०९
गुरुणोक्तप्रकारेण आहिताग्नेर्यथाविधि ।
संस्कृत्य स पितुर्देहं विधिदृष्टेन कर्मणा । ११०।
एकादशेऽहनि प्राप्ते ब्राह्मणांर्वेदपारगान् ।
भोजयामास विधिवच्छतशोऽथ सहस्रशः । १११।
उद्दिश्य पितरं तत्र ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु ।
ददौ गवां सहस्राणि ग्रामान् रत्नाम्बराणि च । ११२।
अवसत्स्वगृहे तत्र राममेवानुचिन्तयन् ।
वसिष्ठेन सह भ्रात्रा मन्त्रिभिः परिवारितः । ११३।
रामेऽरण्यं प्रयाते सह जनकसुता-
लक्ष्मणाभ्यां सुघोरं
माता मे राक्षसीव प्रदहति हृदयं
दर्शनादेव सद्यः ।
गच्छाम्यारण्यमद्य स्थिरमतिरखिलं
दूरतोऽपास्य राज्यं
रामं सीतासमेतं स्मितरुचिरमुखं
नित्यमेवानुसेवे ॥११४॥
| करेगा । इसी प्रकार आत्माको सदा पुनः-पुनः देहकी प्राप्ति होती रहती है ॥ १०३ ॥ मनुष्य जिस प्रकार पुराने वस्त्रोंको उतारकर फिर नये वस्त्र पहन लेता है उसी प्रकार देहधारी जीव पुराने शरीरको छोड़कर नवीन शरीर धारण कर लेता है । अतः इसमें शोकका क्या कारण है ? क्योंकि आत्मा तो न कभी मरता है, न जन्मता है और न बढ़ता ही है ॥ १०४-१०५ ॥ वह षड्-भाव-विकारोंसे रहित, अनन्त, सच्चिद्रूप, आनन्दरूप, बुद्धि आदिका साक्षी और अविनाशी है ॥ १०६ ॥ यह परमात्मा एक, अद्वितीय और समभावमें स्थित है । इस प्रकार तुम आत्माका दृढ़ ज्ञान प्राप्त कर शोकरहित हो समस्त कार्य करो ॥ १०७ ॥ हे कुलन्दन भरत ! अपने पिताका शरीर तैलकी नावमेंसे निकालकर मन्त्रियों और हम सब ऋषियोंके साथ उसका विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार करो ॥ १०८ ॥<br><br>तब गुरुजीके इस प्रकार समझानेपर भरतजीने अज्ञानजन्य शोकको छोड़कर राजाका विधिवत् अन्त्य कृत्य किया ॥ १०९ ॥ गुरुजीके कथनानुसार जैसे अग्निहोत्रीका अन्तिम संस्कार करना चाहिये उसी प्रकार विधिपूर्वक पिताके देहका शास्त्रानुकूल संस्कार कराकर ॥ ११० ॥ फिर एकादशाह आनेपर सैकड़ों-हजारों वेदज्ञ ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराया ॥ १११ ॥ तथा पिताके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन, हजारों गौएँ, अनेकों गाँव और रत्न तथा वस्त्रादि दिये ॥ ११२ ॥<br><br>फिर श्रीरामचन्द्रजीका ही स्मरण करते हुए वे गुरु वसिष्ठजी, भाई शत्रुघ्न और मन्त्रियोंके साथ अपने घरमें रहने लगे ॥ ११३ ॥ घरमें रहते हुए वे मन-ही-मन सोचा करते थे कि 'जनकनन्दिनी महारानी सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीके भयंकर वनमें चले जानेसे माता कैकेयी अपने दर्शनमात्रसे ही राक्षसीके समान मेरे हृदयमें दाह उत्पन्न करती है । अतः अब मैं निस्सन्देह शीघ्र ही सब राज-पाट छोड़कर वनको जाऊँगा और मधुर मुसकानसे जिनका मुखारविन्द अति शोभित हो रहा है उन राम और सीताकी नित्य-प्रति सेवा करूँगा' ॥ ११४ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

अयोध्याकाण्ड - सर्ग ८: भरतजीका वनको प्रस्थान, गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूट-दर्शन

'सर्ग ८] अयोध्याकाण्ड ८७


अष्टम सर्ग

भरतजीका वनको प्रस्थान, मार्गमें गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूटदर्शन ।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
वसिष्ठो मुनिभिः सार्धं मन्त्रिभिः परिवारितः ।<br>राज्ञः सभां देवसभासन्निभामविशद्विभुः ॥ १॥हे पार्वति ! एक दिन गुनीश्वरोंके सहित मन्त्रियोंसे घिरे हुए भगवान् वसिष्ठजी देवसभाके सदृश राजसभामें आये ॥ १॥
तत्रासने समासीनश्चतुर्मुख इवापरः ।<br>आनीय भरतं तत्र उपवेश्य सहानुजम् ॥ २॥वहाँ दूसरे ब्रह्माजीके समान आसनपर विराजमान श्रीवसिष्ठजीने भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजीको बुलाकर आसनपर बैठाया ॥ २ ॥
अब्रवीद्वचनं देशकालोचितमरिन्दमम् ।<br>वत्स राज्येऽभिषेक्ष्यामस्त्वामद्य पितृशासनात् ॥ ३॥और उन शत्रुदमन भरतजीसे इस प्रकार देशकालोचित वाक्योंमें कहा—"वत्स ! तुम्हारे पिताके कथनानुसार आज हम तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त करेंगे ॥ ३॥
कैकेय्या याचितं राज्यं त्वदर्थे पुरुषर्षभ ।<br>सत्यसन्धो दशरथः प्रतिज्ञाय ददौ किल ॥ ४॥हे पुरुषश्रेष्ठ ! कैकेयीने तुम्हारे लिये राजा दशरथसे राज्य माँगा था । राजा सत्यपरायण थे, इसलिये प्रतिज्ञा करनेके कारण उन्होंने उसे दे दिया ॥ ४॥
अभिषेको भवत्वद्य मुनिभिर्मन्त्रपूर्वकम् ।अतः मुनिजनोंद्वारा मन्त्रोच्चारपूर्वक आज तुम्हारा अभिषेक होना चाहिये ।"
तच्छ्रुत्वा भरतोऽप्याह मम राज्येन किं मुने ॥ ५॥यह सुनकर भरतजी बोले—"हे मुनिनाथ ! राज्यसे मेरा क्या प्रयोजन है ? ॥ ५॥
रामो राजाधिराजश्च वयं तस्यैव किङ्कराः ।<br>श्वःप्रभाते गमिष्यामो राममानेतुमञ्जसा ॥ ६॥महाराज राम ही राजाधिराज हैं, हम तो उन्हींके दास हैं । कल प्रातःकाल रामजीको लानेके लिये हम शीघ्र ही वनको जायँगे ॥ ६॥
अहं यूयं मातरश्च कैकेयीं राक्षसीं विना ।<br>हनिष्याम्यधुनैवाहं कैकेयीं मातृगन्धिनीम् ॥ ७॥मैं, आप सबलोग और राक्षसी कैकेयीके सिवा अन्य सब माताएँ—ये सभी वनको चलेंगे । मैं क्या करूँ ? मैं तो इस नाममात्रकी माता कैकेयीको अभी मार डालता,
किन्तु मां नो रघुश्रेष्ठः स्त्रीहन्तारं सहिष्यते ।<br>तच्छ्वोभूते गमिष्यामि पादचारेण दण्डकान् ॥ ८॥किन्तु श्रीरघुनाथजी मुझ स्त्री-हत्यारेको क्षमा न करेंगे । अतः कुछ भी हो, कल प्रातःकाल होते ही, आप लोग चलें या न चलें, मैं तो शत्रुघ्नके सहित पैदल ही दण्डकारण्यको जाऊँगा ।
शत्रुघ्नसहितस्तूर्णं यूयमायान्तु वा न वा ।<br>रामो यथा वने यातस्तथाऽहं वल्कलाम्बरः ॥ ९॥हे मुने ! जिस प्रकार रामजी गये हैं उसी प्रकार जबतक रामचन्द्रजी न लौटेंगे तबतक मैं भी, शत्रुघ्नके सहित वल्कल-वस्त्र और जटाजूट धारणकर कन्द-मूल-फलादिका भोजन करूँगा और पृथिवीपर शयन करूँगा" ॥ ७–१०॥
फलमूलकृताहारः शत्रुघ्नसहितो मुने ।<br>भूमिशायी जटाधारी यावद्रामो निवर्तते ॥ १०॥
इति निश्चित्य भरतस्तूष्णीमेवावतस्थिवान् ।<br>साधुसाध्विति तं सर्वे प्रशंसुर्मुदान्विताः ॥ ११॥ऐसा निश्चयकर भरतजी मौन हो गये । तब सबलोग प्रसन्न होकर 'साधु-साधु' कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ११॥
ततः प्रभाते भरतं गच्छन्तं सर्वसैनिकाः ।<br>अनुजग्मुः सुमन्त्रेण नोदिताः साश्वकुञ्जराः ॥ १२॥तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर भरतजीके कूच करते समय हाथी और घोड़ोंके सहित समस्त सैनिक सुमन्त्र-
८८अध्यात्मरामायण[सर्ग ८]

कौसल्याद्या राजदारा वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः ।<br>छादयन्तो भुवं सर्वे पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः ॥१३॥<br>शृङ्गवेरपुरं गत्वा गङ्गाकूले समन्ततः ।<br>उवास महती सेना शत्रुघ्नपरिचोदिता ॥१४॥<br>आगतं भरतं श्रुत्वा गुहः शङ्कितमानसः ।<br>महत्या सेनया सार्धमागतो भरतः किल ॥१५॥<br>पापं कर्तुं न वा याति रामस्याविदितात्मनः ।<br>गत्वा तद्धृदयं ज्ञेयं यदि शुद्धस्तरिष्यति ॥१६॥<br>गङ्गां नोचेत्समाकृष्य नावास्तिष्ठन्तु सायुधाः ।<br>ज्ञातयो मे समात्ताः पश्यन्तः सर्वतोदिशम् ॥१७॥<br>इति सर्वान्समादिश्य गुहो भरतमागतः ।<br>उपायनानि संगृह्य विविधानि बहून्यपि ॥१८॥<br>प्रययौ ज्ञातिभिः सार्धं बहुभिर्विविधायुधैः ।<br>निवेश्योपायनान्यग्रे भरतस्य समन्ततः ॥१९॥<br>दृष्ट्वा भरतमासीनं सानुजं सह मन्त्रिभिः ।<br>चीराम्बरं घनश्यामं जटामुकुटधारिणम् ॥२०॥<br>राममेवानुशोचन्तं रामरामेति वादिनम् ।<br>ननाम शिरसा भूमौ गुहोऽहमिति चाब्रवीत् ॥२१॥<br>शीघ्रमुत्थाप्य भरतो गाढमालिङ्ग्य सादरम् ।<br>पृष्ट्वानामयमव्यग्रः सखायमिदमब्रवीत् ॥२२॥<br>भ्रातस्त्वं राघवेणात्र समेतः समवस्थितः ।<br>रामेणालिङ्गितः सार्द्रनयनेनामलात्मना ॥२३॥<br>धन्योऽसि कृतकृत्योसि यत्त्वया परिभाषितः ।<br>रामो राजीवपत्राक्षो लक्ष्मणेन च सीतया ॥२४॥<br>यत्र रामस्त्वया दृष्टस्तत्र मां नय सुव्रत ।<br>सीतया सहितो यत्र सुप्तस्तद्दर्शयस्व मे ॥२५॥<br>त्वं रामस्य प्रियतमो भक्तिमानसि भाग्यवान् ।<br>इति संस्मृत्य संस्मृत्य रामं साश्रुविलोचनः ॥२६॥ | की प्रेरणासे उनके साथ चले ॥ १२ ॥ कौसल्या आदि महारानियाँ तथा वसिष्ठ आदि द्विजगण पृथिवीको आच्छादन कर उनके आगे-पीछे और इधर-उधर यथा-योग्य रीतिसे चलने लगे॥ १३ ॥ इस प्रकार शृंगवेरपुर पहुँचनेपर वह महान् सेना शत्रुघ्नकी प्रेरणासे गंगातट-पर जहाँ-तहाँ ठहर गयी ॥ १४ ॥<br>भरतका आगमन सुन गुहको यह शंका हुई कि भरत बड़ी सेना लेकर आये हैं अतः ये रामके अनजान-में उनका कोई अनिष्ट करनेके लिये न जाते हों ? मुझे उनके पास जाकर उनका मर्म जानना चाहिये । यदि उनका भाव ठीक हो तब तो वे भले ही पार चले जायें ॥ १५-१६ ॥ नहीं तो ( इसके विपरीत उपाय करना पड़ेगा अतः ) मेरे जातिवाले अस्त्र-शस्त्र लेकर सावधानी-से सब ओर चौकस रहें और सब नावोंको खींचकर गंगाके बीचमें खड़ी कर दें ॥ १७ ॥<br>इस प्रकार सबको आज्ञा दे गुह नाना प्रकारकी बहुत-सी भेंटें लेकर अपने बहुत-से हथियारबन्द जाति-भाइयोंके साथ भरतजीके पास आया। वहाँ उनके सामने सब सामग्री रखकर इधर-उधर देखते हुए उसने देखा कि मेघश्याम भरत चीर-वस्त्र और जटाजूट धारण किये मन्त्रियोंके साथ बैठे हैं ॥ १८-२० ॥ वे राम-हीका स्मरण कर रहे हैं और 'राम-नाम' का ही जप कर रहे हैं। यह देखकर उसने पृथिवीपर शिर रखकर भरतजीको प्रणाम किया और बोला 'मैं गुह हूँ' ॥ २१ ॥<br>भरतजीने उसे शीघ्र ही उठाकर आदरपूर्वक गाढ़ आलिंगन किया और प्रसन्न-मुखसे उसकी कुशल पूछ-कर उससे सखा-भावसे इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥ "भैया ! तुम यहाँ श्रीरामचन्द्रजीके साथ रहे थे और निर्मलहृदय श्रीरामने नेत्रोंमें जल भरकर तुम्हारा आलिंगन किया था ॥ २३ ॥ तुमसे सीता और लक्ष्मण-के सहित कमल-नयन रामने वार्तालाप की अतः तुम धन्य हो, तुम्हारा जीवन सफल है ॥ २४ ॥ हे सुव्रत ! तुमने श्रीरामचन्द्रजीको जहाँ देखा था मुझे वहीं ले चलो, जहाँ वे सीताके सहित सोये थे वह स्थान मुझे दिखाओ ॥ २५ ॥ तुम रामके प्रियतम सखा और भाग्यवान् भक्त हो ।” इस प्रकार पुनः-पुनः रामका स्मरण करनेसे भरतजीके नेत्रोंमें जल भर आया ॥२६॥

सर्ग ८ ]अयोध्याकाण्ड८९
गुहेन सहितस्तत्र यत्र रामः स्थितो निशि ।<br>ययौ ददर्श शयनस्थलं कुशसमास्तृतम् ॥२७॥<br>सीताऽऽभरणसंलग्नस्वर्णबिन्दुभिरञ्चितम् ।<br>दुःखसन्तप्तहृदयो भरतः पर्यदेवयत् ॥२८॥<br>अहोऽतिसुकुमारी या सीता जनकनन्दिनी ।<br>प्रासादे रत्नपर्यङ्के कोमलास्तरणे शुभे ॥२९॥<br>रामेण सहिता शेते सा कथं कुशविष्टरे ।<br>सीता रामेण सहिता दुःखेन मम दोषतः ॥३०॥<br>धिङ् मां जातोऽस्मि कैकेय्यां पापराशिसमानतः।<br>मन्निमित्तमिदं क्लेशं रामस्य परमात्मनः ॥३१॥<br>अहोऽतिसफलं जन्म लक्ष्मणस्य महात्मनः।<br>राममेव सदान्वेति वनस्थमपि हृष्टधीः ॥३२॥<br>अहं रामस्य दासा ये तेषां दासस्य किङ्करः।<br>यदि स्यां सफलं जन्म मम भूयान्न संशयः ॥३३॥<br>भ्रातर्जानासि यदि तत्कथयस्व ममाखिलम्।<br>यत्र तिष्ठति तत्राहं गच्छाम्यानेतुमञ्जसा ॥३४॥इस प्रकार विरहव्याकुल हुए वे गुहके साथ उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रात्रिके समय श्रीरामने निवास किया था। वहाँ जाकर उन्होंने उस कुशा बिछे हुए शयन-स्थानको देखा ॥ २७॥ वह सीताजीके आभूषणोंसे झड़े हुए सुवर्णकणोंसे सुशोभित था। उसे देखकर भरतजीका हृदय दुःखसे भर आया और वे इस प्रकार विलाप करने लगे—॥ २८ ॥ “अहो ! जो अति सुकुमारी जनकदुलारी सीता राजमहलमें कोमल बिछौनेसे युक्त अति सुन्दर रत्नपर्यङ्कपर श्रीरघुनाथजीके साथ शयन किया करती थीं वे ही मेरे दोषसे श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस कुशाओंकी साथरीपर किस प्रकार क्लेशपूर्वक सोती होंगी ? ॥ २९-३० ॥ मुझे धिक्कार है ! जो मैं मूर्त्तिमान् पापपुञ्जके समान कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ । हाय ! मेरेलिये ही परमात्मा रामको यह क्लेश उठाना पड़ा ! ! ॥ ३१ ॥ अहा ! महात्मा लक्ष्मणका जन्म अत्यन्त सफल है जो भगवान् रामके वनमें रहते समय भी सदा प्रसन्नमनसे उन्हींका अनुसरण करते हैं ॥३२॥ जो लोग रामके दास हैं उनके दासोंका दास भी यदि मैं हो जाऊँ तो मेरा जन्म सफल हो जाय—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ भाई ! यदि तुम्हें मालूम हो तो मुझे यह सब बताओ कि राम कहाँ हैं ? वे जहाँ कहीं भी होंगे, मैं उन्हें तुरन्त लानेके लिये वहीं जाऊँगा” ॥३४॥
गुहस्तं शुद्धहृदयं ज्ञात्वा सस्नेहमब्रवीत् ।<br>देव त्वमेव धन्योऽसि यस्य ते भक्तिरीदृशी ॥३५॥<br>रामे राजीवपत्राक्षे सीतायां लक्ष्मणे तथा।<br>चित्रकूटाद्रिनिकटे मन्दाकिन्यविदूरतः ॥३६॥<br>मुनीनामा श्रमपदे रामस्तिष्ठति सानुजः।<br>जानक्या सहितो नन्दन्सुखमास्ते किल प्रभुः॥३७॥<br>तत्र गच्छामहे शीघ्रं गङ्गां तर्तुमिहार्हसि ।<br>इत्युक्त्वा त्वरितं गत्वा नावः पञ्चशतानि ह ॥३८॥<br>समानयत्तत्सैन्यस्य तर्तुं गङ्गां महानदीम् ।<br>स्वयमवानिनायैकां राजनावं गुहस्तदा ॥३९॥<br>आरोप्य भरतं तत्र शत्रुघ्नं राममातरम् ।<br>वसिष्ठं च तथान्यत्र कैकेयीं चान्ययोषितः ॥४०॥<br>तीर्त्वा गङ्गां ययौ शीघ्रं भरद्वाजाश्रमं प्रति।गुहने उनका चित्त शुद्ध देखकर स्नेहपूर्वक कहा—“स्वामिन् ! आपकी कमलनयन राम, सीता और लक्ष्मणमें ऐसी विशुद्ध भक्ति है, अतः आप ही धन्य हैं। छोटे भाई लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्र चित्रकूट-पर्वतके पास मन्दाकिनी नदीके समीप मुनियोंके आश्रममें रहते हैं। वहाँ जानकीके सहित भगवान् राम आनन्द और सुखपूर्वक विराजमान हैं ॥ ३५—३७॥ चलिये, शीघ्र ही हमलोग वहाँ चलें। पहले आपलोग यहाँ गङ्गाजी पार कर लें।” ऐसा कहकर उसने तुरन्त ही सेनाके सहित भरतजीको गङ्गाजीसे पार करनेके लिये पाँच सौ नावें मँगवायीं और स्वयं एक राजनौका ले आया ॥ ३८-३९ ॥ उसमें भरत, शत्रुघ्न, रामकी माता कौसल्या और वसिष्ठजीको चढ़ाया तथा एक दूसरी नावमें कैकेयी आदि अन्य राजमहिलाओंको सवार किया ॥४०॥<br><br>इस प्रकार शीघ्र ही गङ्गाजीको पार कर वे भरद्वाज

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