अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
युद्धकाण्ड - सर्ग १०: रावणका यज्ञ-विध्वंस तथा उसका मन्दोदरीको समझाना
| ३८२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १० |
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गृहं जगामाशु शुचा विमूढधीः<br>पुनः सभां च प्रययौ सुहृद्वृतः ॥६८॥ | अपने घर गया और फिर दूसरे दिन अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ सभामें आया ॥६८॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे नवमः सर्गः ॥९॥
दशम सर्ग
रावणका यज्ञ-विध्वंस तथा उसका मन्दोदरीको समझाना।
श्रीमहादेव उवाच
स विचार्य सभामध्ये राक्षसैः सह मन्त्रिभिः।
निर्ययौ येऽवशिष्टास्तै राक्षसैः सह राघवम् ॥ १ ॥
शलभः शलमैर्युक्तः प्रज्वलन्तमिवानलम् ।
ततो रामेण निहताः सर्वे ते राक्षसा युधि ॥ २ ॥
स्वयं रामेण निहतस्तीक्ष्णबाणेन वक्षसि ।
व्यथितस्त्वरितं लङ्कां प्रविवेश दशाननः ॥ ३ ॥
दृष्ट्वा रामस्य बहुशः पौरुषं चाप्यमानुषम् ।
रावणो मारुतेश्चैव शीघ्रं शुक्रान्तिकं ययौ ॥ ४ ॥
नमस्कृत्य दशग्रीवः शुक्रं प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
भगवन् राघवेणैवं लङ्का राक्षसयूथपैः ॥ ५ ॥
विनाशिता महादैत्या निहताः पुत्रबान्धवाः ।
कथं मे दुःखसन्दोहस्त्वयि तिष्ठति सद्गुरौ ॥ ६ ॥
इति विज्ञापितो दैत्यगुरुः प्राह दशाननम् ।
होमं कुरु प्रयत्नेन रहसि त्वं दशानन ॥ ७ ॥
यदि विघ्नो न चेद्धोमे तर्हि होमानलोत्थितः ॥ ८ ॥
महान् रथश्च वाहाश्च चापतूणीरसायकाः ।
सम्भविष्यन्ति तैर्युक्तस्त्वमजेयो भविष्यसि ॥ ९ ॥
गृहाण मन्त्रान्मद्दत्तान् गच्छ होमं कुरु द्रुतम् ।
इत्युक्तस्त्वरितं गत्वा रावणो राक्षसाधिपः ॥१०॥
गुहां पातालसदृशीं मन्दिरे स्वे चकार ह ।
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! फिर रावण सभा-में अपने राक्षस-मन्त्रियोंके साथ विचार कर पतङ्ग जिस प्रकार अन्यान्य पतङ्गोंके साथ प्रज्वलित अग्निपर गिरता है उसी प्रकार बचे-खुचे राक्षसोंको लेकर रघुनाथजीके पास चला; किन्तु श्रीरामचन्द्रजीने उन समस्त राक्षसोंको युद्धमें मार डाला ॥१-२॥ और स्वयं रावण भी हृदयमें भगवान् रामका तीक्ष्ण बाण लगनेसे व्याकुल हो तुरन्त लङ्कामें लौट आया ॥३॥
भगवान् राम और हनुमान्जीके बहुत-से अतिमानुष पौरुष देखकर रावण अतिशीघ्रतासे शुक्राचार्यजीके पास गया ॥४॥ और उन्हें नमस्कार कर वह हाथ जोड़कर कहने लगा—"भगवन् ! रामने समस्त राक्षस-यूथपोंके सहित लङ्कापुरी नष्ट कर दी और जितने बड़े-बड़े दैत्य और मेरे बन्धु-बान्धव थे वे सभी मार डाले ! आप-जैसे सद्गुरुके रहते हमें यह महान् दुःख क्यों देखना पड़ा ?" ॥५-६॥ रावणके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दैत्यगुरु शुक्राचार्यजीने उससे कहा— "हे दशानन ! तुम जैसे होसके वैसे किसी एकान्त देशमें हवन करो ॥७॥ यदि तुम्हारे हवनमें कोई विघ्न न हुआ तो उस होमाग्निसे एक बहुत बड़ा रथ, घोड़े, धनुष, तरकश और बाण उत्पन्न होंगे । उन्हें पाकर तुम अजेय हो जाओगे ॥८-९॥ मेरे दिये हुए मन्त्रोंको ग्रहण करो और इनसे तुरन्त जाकर हवन करो।"
शुक्राचार्यजीके इस प्रकार कहनेपर राक्षसराज रावणने तुरन्त ही जाकर अपने महलमें एक पातालके
| सर्ग १० ] | युद्धकाण्ड | २८३ |
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| लङ्काद्वारकपाटादि बद्ध्वा सर्वत्र यत्नतः ॥११॥<br><br>होमद्रव्याणि सम्पाद्य यान्युक्तान्याभिचारिके।<br>गुहां प्रविश्य चैकान्ते मौनी होमं प्रचक्रमे ॥१२॥ | समान गम्भीर गुहा तैयार करायी और बड़ी सावधानीसे लङ्काके सब द्वारोंके फाटक आदि बन्द करा दिये १०-११ तथा शास्त्रोंमें अभिचार कर्मोंकी जो-जो हवन-सामग्रियाँ बतायी गयी हैं वे सब एकत्रित कीं और गुहामें घुसकर एकान्तमें मौनावलम्बनपूर्वक होम करने लगा ॥ १२ ॥ |
| उत्थितं धूममालोक्य महान्तं रावणानुजः ।<br>रामाय दर्शयामास होमधूमं भयाकुलः ॥१३॥<br><br>पश्य राम दशग्रीवो होमं कर्तुं समारभत् ।<br>यदि होमः समाप्तः स्यात्तदाऽजेयो भविष्यति ॥१४॥<br><br>अतो विघ्नाय होमस्य प्रेष्याशु हरीश्वरान् ।<br>तथेति रामः सुग्रीवसम्मतेनाङ्गदं कपिम् ॥१५॥<br><br>हनूमत्प्रमुखान्वीरानादिदेश महाबलान् ।<br>प्राकारं लङ्घयित्वा ते गत्वा रावणमन्दिरम् ॥१६॥<br><br>दशकोटयः प्लवङ्गानां गत्वा मन्दिररक्षकान् ।<br>चूर्णयामासुरश्वांश्च गजांश्च न्यहनन् क्षणात् ॥१७॥ | तब रावणके छोटे भाई विभीषणने बड़ा भारी धुआँ उठते देख अति भयभीत हो उसे श्रीरामचन्द्रजीको दिखाया ॥१३॥ (और कहा—)"हे राम ! देखिये, दशशीशने हवन करना आरम्भ किया है; यदि यह हवन (निर्विघ्न) समाप्त हो गया तो वह अजेय हो जायगा ॥१४॥ अतः इसमें विघ्न डालनेके लिये शीघ्र ही वानर-सेनापतियोंको भेजिये ।" तब रघुनाथजीने 'अच्छा' कहकर सुग्रीवकी सम्मतिसे कपिवर अंगद और हनुमान् आदि महाबलवान् वानर-वीरोंको आज्ञा दी। वे सब नगरके परकोटेको लाँघकर रावणके महलपर पहुँचे ॥ १५-१६ ॥ इन दश करोड़ वानरोंने वहाँ पहुँचकर महलके द्वारपालोंको चूर्ण कर डाला और एक क्षणमें ही बहुत-से घोड़ों तथा हाथियोंका संहार कर दिया ॥ १७॥ |
| ततश्च सरमा नाम प्रभाते हस्तसंज्ञया ।<br>विभीषणस्य भार्या सा होमस्थानमसूचयत् ॥१८॥<br><br>गुहापिधानपाषाणमङ्गदः पादघट्टनैः ।<br>चूर्णयित्वा महासत्त्वः प्रविवेश महागुहाम् ॥१९॥<br><br>दृष्ट्वा दशाननं तत्र मीलिताक्षं दृढासनम् ।<br>ततोऽङ्गदाज्ञया सर्वे वानरा विविशुर्द्रुतम् ॥२०॥<br><br>तत्र कोलाहलं चक्रुस्ताडयन्तश्च सेवकान् ।<br>सम्भारांश्चिक्षिपुस्तस्य होमकुण्डे समन्ततः ॥२१॥<br><br>स्रुवमाच्छिद्य हस्ताच्च रावणस्य वलाद्रुषा ।<br>तेनैव सञ्जघानाशु हनूमान् प्लवगाग्रणीः ॥२२॥<br><br>घ्नन्ति दन्तैश्च काष्ठैश्च वानरास्तमितस्ततः ।<br>न जहौ रावणो ध्यानं हतोऽपि विजिगीषया ॥२३॥ | (इस प्रकार लङ्कामें रातभर बड़ा भारी कोलाहल मचा रहा)। प्रातःकाल होते ही विभीषणकी भार्या सरमाने हाथके संकेतसे होमस्थान बतला दिया ॥१८॥ गुहाको ढँकनेके लिये उसके मुखपर रखे हुए पत्थरको महापराक्रमी अंगद पैरकी ठोकरसे चूर-चूरकर उस महाकन्दरामें घुस गये ॥ १९ ॥ वहाँ उन्होंने रावणको नेत्र मूँदे, दृढ़ आसन लगाये बैठे देखा। तदनन्तर अंगदजीकी आज्ञासे समस्त वानरगण तुरन्त उस गुहामें घुस गये ॥ २० ॥ गुहामें घुसकर वे सेवकोंको पीटने और बड़ा भारी कोलाहल करने लगे, तथा जहाँ-तहाँ रखी हुई यज्ञ-सामग्रीको उन्होंने हवनकुण्डमें डाल दिया ॥ २१ ॥ वानराग्रणी हनुमान्जीने अति रोषपूर्वक बलात्कारसे रावणके हाथसे स्रुवा छीनकर उसीसे उसपर आघात किया ॥ २२ ॥ वानरगण रावणपर इधर-उधरसे दाँतों और लकड़ियोंसे प्रहार कर रहे थे; किन्तु उसने विजयकी कामनासे इस प्रकार आहत होनेपर भी अपना ध्यान नहीं छोड़ा ॥ २३ ॥ |
२८४ अध्यात्मरामायण [सर्ग १०
प्रविश्यान्तःपुरे वेश्मन्यङ्गदो वेगवत्तरः । समानयत्केशबन्धे धृत्वा मन्दोदरीं शुभाम् ॥ २४ ॥ रावणस्यैव पुरतो विलपन्तीमनाथवत् । विद्ददाराङ्गदस्तस्याः कञ्चुकं रत्नभूषितम् ॥ २५ ॥ मुक्ता विमुक्ताः पतिताः समन्ताद्रत्नसञ्चयैः । श्रोणिसूत्रं निपतितं त्रुटितं रत्नचित्रितम् ॥ २६ ॥ कटिप्रदेशाद्विस्रस्ता नीवी तस्यैव पश्यतः । भूषणानि च सर्वाणि पतितानि समन्ततः ॥ २७ ॥ देवगन्धर्वकन्याश्च नीता हृष्टैः प्लवङ्गमैः । मन्दोदरी रुरोदाथ रावणस्याग्रतो भृशम् ॥ २८ ॥ क्रोशन्ती करुणं दीना जगाद दशकन्धरम् । निर्लज्जोऽसि परैरेवं केशपाशे विकृष्यते ॥ २९ ॥ भार्या तवैव पुरतः किं जुहोषि न लज्जसे । हन्यते पश्यतो यस्य भार्या पापैश्च शत्रुभिः ॥ ३० ॥ मर्त्तव्यं तेन तत्रैव जीवितान्मरणं वरम् । हा मेघनाद ते माता क्लिश्यते बत वानरैः ॥ ३१ ॥ त्वयि जीवति मे दुःखमीदृशं च कथं भवेत् । भार्या लज्जा च सन्त्यक्ता भर्त्रा मे जीविताशया॥ ३२ ॥ श्रुत्वा तद्देवितं राजा मन्दोदर्या दशाननः । उत्तस्थौ खड्गमादाय त्यज देवीमिति ब्रुवन् ॥ ३३ ॥ जघानाङ्कदमव्यग्रः कटिदेशे दशाननः । तदोत्सृज्य ययुः सर्वे विध्वंस्य हवनं महत् ॥ ३४ ॥ रामपार्श्वमुपागम्य तस्थुः सर्वे प्रहर्षिताः ॥ ३५ ॥ रावणस्तु ततो भार्यामुवाच परिसान्त्वयन् । दैवाधीनमिदं भद्रे जीवता किं न दृश्यते ।
तत्र अत्यन्त वेगवान् अंगदजी अन्तःपुरमें जाकर तुरन्त ही शुभलक्षणा मन्दोदरीको चोटी पकड़कर ले आये ॥ २४ ॥ और रावणके सामने ही उन्होंने अनाथके समान विलाप करती हुई मन्दोदरीकी रत्न-जटित कञ्चुकी (चोली) फाड़ डाली ॥ २५॥ उसके मोती टूट-टूटकर रत्नसमूहके सहित सब ओर बिखर गये, (इसी प्रकार) मन्दोदरीकी रत्नजटित करधनी भी टूटकर पृथिवीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥ रावणके देखते-देखते ही उसके अधोवस्त्रका बन्धन ढीला पड़कर कटि-प्रदेशसे खिसक गया और समस्त आभूषण जहाँ-तहाँ गिर गये ॥ २७ ॥ ऐसे ही अन्यान्य वानरगण भी कुतूहलवश देव और गन्धर्व आदिकी कन्याओंको (जो रावणकी पत्नियाँ थीं) पकड़ लाये । तब मन्दोदरी रावणके सामने अत्यन्त विलाप करने लगी ॥ २८ ॥ और करुणावश अति दीन होकर रावणसे कहने लगी, "अहो! तुम बड़े निर्लज्ज हो । तुम्हारे सामने ही शत्रुगण तुम्हारी भार्याको चोटी पकड़कर खींच रहे हैं, और फिर भी तुम हवन कर रहे हो ! क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती ? जिसकी भार्याको उसीके सामने पापी शत्रुगण मारते हों उसे तो वहीं मर जाना चाहिये । उसके जीनेसे तो मरना ही अच्छा है । हा मेघनाद ! आज तेरी माता वानरोंके हाथोंमें पड़कर क्लेश पा रही है ? ॥ २९-३१ ॥ बेटा ! तेरे जीते रहनेपर मुझे यह दुःख क्यों देखना पड़ता ? मेरे पतिने तो अपना जीवन बचानेके लिये अपनी स्त्री और लज्जासे भी मुँह मोड़ लिया है !" ॥ ३२ ॥
मन्दोदरीका यह विलाप सुनकर राक्षसराज रावण हाथमें खड्ग लेकर 'अरे देवीको छोड़ो' यों कहता हुआ उठा ॥ ३३ ॥ रावणने उठते ही अंगदजीकी कमरमें प्रहार किया । तब समस्त वानरगण उसका महायज्ञ विध्वंस कर वहाँसे चल दिये ॥ ३४॥ और सबके सब अति प्रसन्न हो रघुनाथजीके पास आ उपस्थित हुए ॥ ३५॥
तब रावण अपनी भार्या मन्दोदरीको ढाँढस बँधाते हुए बोला—"हे कल्याणि ! ये सुख-दुःखादि दैवके अधीन हैं—जीता हुआ प्राणी क्या नहीं देखता ?
सर्ग १०] युद्धकाण्ड २८५
| त्यज शोकं विशालाक्षि ज्ञानमालम्ब्य निश्चितम्<br>अज्ञानप्रभवः शोकः शोको ज्ञानविनाशकृत् ॥३६॥ | अतः हे विशालनयनि ! इस निश्चित ज्ञानका आश्रयकर तुम शोक छोड़ दो ॥ ३६ ॥ शोक अज्ञानसे होता है और वह ज्ञानको नष्ट कर देता है । शरीरादि |
| अज्ञानप्रभवाऽहन्धीः शरीरादिष्वनात्मसु ॥३७॥ | अनात्म-पदार्थोंमें अहं-बुद्धि भी अज्ञानसे ही होती है ॥ ३७ ॥ इस मिथ्या अहंकारके कारण ही पुत्र, स्त्री आदिका सम्बन्ध होता है और इन सम्बन्धोंमें आस्था होनेसे ही जन्म-मरणरूप संसार तथा हर्ष, शोक, भय, क्रोध, लोभ, मोह और स्पृहा आदि होते हैं ॥ ३८ ॥ ये जन्म, मृत्यु और जरा आदि अवस्थाएँ अज्ञान-जन्य ही हैं । आत्मा तो एकमात्र, शुद्ध, सबसे पृथक् और असंग है ॥ ३९ ॥ वह आनन्दस्वरूप, ज्ञानमय और समस्त भावोंसे रहित है । उस सत्स्वरूपका कभी किसीसे संयोग-वियोग नहीं होता ॥ ४० ॥ हे अनिन्दिते ! अपने आत्माका ऐसा स्वरूप जानकर तुम शोक छोड़ दो; मैं अभी जाता हूँ, और या तो लक्ष्मणसहित रामको मार कर ही आऊँगा या श्रीराम ही अपने वज्रसदृश बाणोंसे मुझे छिन्न-भिन्न कर देंगे । तब मैं उनके पदको प्राप्त होऊँगा ॥४१-४२॥ हे प्रिये ! मेरी आज्ञासे तब तुम मेरे लिये एक काम करना; तुम सीताको मारकर उसे लेकर अग्निमें प्रवेश कर जाना" ॥ ४३ ॥ |
| तन्मूलः पुत्रदारादिसम्बन्धः संसृतिस्ततः ।<br>हर्षशोकमयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ॥३८॥ | |
| अज्ञानप्रभवा होते जन्ममृत्युजरादयः ।<br>आत्मा तु केवलः शुद्धो व्यतिरिक्तो ह्यलेपकः ॥३९॥ | |
| आनन्दरूपो ज्ञातात्मा सर्वभावविवर्जितः ।<br>न संयोगो वियोगो वा विद्यते केनचित्सतः ॥४०॥ | |
| एवं ज्ञात्वा स्वमात्मानं त्यज शोकमनिन्दिते ।<br>इदानीमेव गच्छामि हत्वा रामं सलक्ष्मणम् ॥४१॥ | |
| आगमिष्यामि नोचेन्मां दारयिष्यति सायकैः ।<br>श्रीरामो वज्रकल्पैश्च ततो गच्छामि तत्पदम् ॥४२॥ | |
| तदा त्वया मे कर्तव्या क्रिया मच्छासनात्प्रिये ।<br>सीतां हत्वा यया सार्धं त्वं प्रवेक्ष्यसि पावकम् ॥४३॥ | |
| एवं श्रुत्वा वचस्तस्य रावणस्यातिदुःखिता ।<br>उवाच नाथ मे वाक्यं शृणु सत्यं तथा कुरु ॥४४॥ | रावणके ये वचन सुनकर मन्दोदरीने अति दुःखित होकर कहा—"प्रभो ! मैं आपसे ठीक-ठीक बात कहती हूँ, आप उसे सुनकर वैसा ही कीजिये ॥४४। |
| शक्यो न राघवो जेतुं त्वया चान्यैः कदाचन ।<br>रामो देववरः साक्षात्प्रधानपुरुषेश्वरः ॥४५॥ | राम तुमसे अथवा और भी किसीसे कभी नहीं जीते जा सकते । देवाधिदेव भगवान् राम साक्षात् प्रकृति और पुरुषके नियामक हैं ॥४५॥ भक्तवत्सल रघुनाथजी ने ही कल्पके आरम्भमें मत्स्यरूप होकर वैवस्वतमनुकी समस्त आपत्तियोंसे रक्षा की थी ॥ ४६ ॥ भगवान् राम ही पूर्वकालमें एक लक्ष योजन विस्तारवाले कच्छप हुए थे और समुद्र-मन्थनके समय इन्हींने अपनी पीठपर सुमेरु पर्वतको धारण किया था ॥ ४७ ॥ किसी समय वराहरूप धारण कर पृथिवीका उद्धार करते समय इन्हीं महात्माने महादुराचारी हिरण्याक्ष दैत्यको मारा था ॥ ४८ ॥ इन रघुनन्दनने ही नृसिंह-शरीरसे त्रिलोकीके कण्टकरूप हिरण्यकशिपु दैत्यको मारा |
| मत्स्यो भूत्वा पुरा कल्पे मनुं चैवस्वतं प्रभुः ।<br>ररक्ष सकलापद्भ्यो राघवो भक्तवत्सलः ॥४६॥ | |
| रामः कूर्मोऽभवत्पूर्वं लक्षयोजनविस्तृतः ।<br>समुद्रमथने पृष्ठे दधार कनकाचलम् ॥४७॥ | |
| हिरण्याक्षोऽतिदुर्वृत्तो हतोऽनेन महात्मना ।<br>क्रोडरूपेण वपुषा क्षोणीमुद्धरता क्वचित् ॥४८॥ | |
| त्रिलोककण्टकं दैत्यं हिरण्यकशिपुं पुरा ।<br>हतवान्नारसिंहेन वपुषा रघुनन्दनः ॥४९॥ |
| २८६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १० |
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विक्रमैस्त्रिभिरेवासौ बलिं बद्ध्वा जगत्त्रयम् ।<br>आक्रम्यादात्सुरेन्द्राय भृत्याय रघूत्तमः ॥५०॥<br>राक्षसाः क्षत्रियाकारा जाता भूमेर्भरावहाः ।<br>तान्हत्वा बहुशो रामो भुवं जित्वा ह्यदान्मुनेः॥५१॥<br>स एव साम्प्रतं जातो रघुवंशे परात्परः ।<br>भवदर्थे रघुश्रेष्ठो मानुषत्वमुपागतः ॥५२॥<br>तस्य भार्या किमर्थं वा हृता सीता वनाद्वलात् ।<br>मम पुत्रविनाशार्थं स्वस्याऽपि निधनाय च ॥५३॥<br>इतः परं वा वैदेहीं प्रेषयस्व रघूत्तमे ।<br>विभीषणाय राज्यं तु दत्त्वा गच्छामहे वनम् ॥५४॥<br>मन्दोदरीवचः श्रुत्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ।<br>कथं भद्रे रणे पुत्रान् भ्रातृन् राक्षसमण्डलम् ॥५५॥<br>घातयित्वा राघवेण जीवामि वनगोचरः ।<br>रामेण सह योत्स्यामि रामबाणैः सुशीघ्रगैः ॥५६॥<br>विदार्यमाणो यास्यामि तद्विष्णोः परमं पदम् ।<br>जानामि राघवं विष्णुं लक्ष्मीं जानामि जानकीम् ।<br>ज्ञात्वैव जानकी सीता मयाऽऽनीता वनाद्वलात् ५७<br>रामेण निधनं प्राप्य यास्यामीति परं पदम् ।<br>विमुच्य त्वां तु संसाराद्गमिष्यामि सह प्रिये ॥५८॥<br>परानन्दमयी शुद्धा सेव्यते या मुमुक्षुभिः ।<br>तां गतिं तु गमिष्यामि हतो रामेण संयुगे ॥५९॥<br>प्रक्षाल्य कल्मषाणीह मुक्तिं यास्यामि दुर्लभाम् ६०<br>क्लेशादिपञ्चकतरङ्गयुतं भ्रमाढ्यं<br>दारात्मजाप्तधनबन्धुझषाभियुक्तम् ।<br>और्वानलाभनिजरोषमनङ्गजातं<br>संसारसागरमतीत्य हरिं व्रजामि ॥६१॥ | था ॥ ४९ ॥ और इन्हीं रघुश्रेष्ठने ( वामन अवतारमें ) बलिको बाँधकर सम्पूर्ण त्रिलोकीको तीन ही पगोंसे नापकर अपने सेवक इन्द्रको दे दिया था ॥ ५० ॥ जिस समय राक्षसगण क्षत्रियरूपसे उत्पन्न होकर पृथिवीके भाररूप हुए, तब इन्हींने परशुरामरूपसे उन्हें कई बार संग्राममें मारा और पृथिवीको जीत-कर उसे कश्यप मुनिको दे दिया ॥ ५१ ॥ इस समय वे ही परात्पर प्रभु रघुवंशमें रामरूपसे अवतीर्ण होकर आपके लिये मनुष्यरूप हुए हैं ॥ ५२ ॥ आपने उनकी स्त्री सीताको मेरे पुत्रके नाशके लिये और अपनी भी मौत बुलानेके लिये भला, बलात्कारसे तपोवनसे क्यों चुरा लिया ? ॥ ५३ ॥ आप अब भी जानकीको रघुनाथजीके पास भेज दीजिये; फिर विभीषणको राज्य देकर हम वनको चलेंगे" ॥ ५४ ॥<br><br>मन्दोदरीके वचन सुनकर रावण बोला—"अयि भद्रे ! युद्धमें रघुनाथजीसे अपने पुत्र, भ्राता और राक्षस-समूहका नाश कराकर भला मैं वनवासी होकर कैसे जीवन काट सकता हूँ ? अब तो मैं भी रामके साथ युद्ध करूँगा और उनके शीघ्रगामी बाणोंसे विद्ध होकर उन विष्णुभगवान्के परमधामको जाऊँगा । मैं रामको साक्षात् विष्णु और जानकीको भगवती लक्ष्मी जानता हूँ । और यह जानकर ही कि 'रामके हाथसे मरकर उनका परमपद प्राप्त करूँगा' मैं जनकनन्दिनी सीताको बलात्कारसे तपोवनसे ले आया था । हे प्रिये ! अब मैं तुम्हें छोड़कर अपने अन्यान्य राक्षस वीरोंके साथ संसारसे कूच करूँगा ॥ ५५—५८ ॥ और मुमुक्षुगण जिस परमानन्दमयी विशुद्ध गतिका सेवन करते हैं, संग्राममें भगवान् रामके हाथसे मरकर मैं उसी गतिको प्राप्त करूँगा ॥ ५९ ॥ इस प्रकार अपने समस्त पाप-पुञ्जका प्रक्षालन कर मैं दुर्लभ मोक्ष-पद प्राप्त करूँगा ॥ ६० ॥ जिसमें ( अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक ) पाँच क्लेश ही तरंगें हैं, भ्रमरूप भँवरें हैं, स्त्री पुत्र स्वजन विभव और बन्धु आदि मत्स्य हैं, अपना क्रोधरूपी बड़वानल है तथा कामरूपी जाल फैलाया हुआ है उस संसार-सागरको पारकर अब मैं श्रीहरिके निकट जाऊँगा" ॥ ६१ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
युद्धकाण्ड - सर्ग ११: राम-रावण-संग्राम और रावणका वध
सर्ग ११] युद्धकाण्ड २८७
एकादश सर्ग
राम-रावण-संग्राम और रावणका वध ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! महाराज मन्दोदरीको प्रेमपूर्वक इस प्रकार समझा-बुझाकर रावण श्रीरामचन्द्रजीके साथ युद्ध करनेके लिये रणभूमिको चला ॥ १ ॥ |
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| इत्युक्त्वा वचनं प्रेम्णा राज्ञीं मन्दोदरीं तदा।<br>रावणः प्रययौ योद्धुं रामेण सह संयुगे ॥ १ ॥ | वह महाभयंकर राक्षसोंसे घिरकर एक सुदृढ़ रथपर सवार हुआ । उस रथमें सोलह पहिये तथा वरूथ<sup>१</sup> और कूबर<sup>२</sup> लगे हुए थे ॥ २ ॥ |
| दृढं स्यन्दनमास्थाय वृतो घोरैर्निशाचरैः ।<br>चक्रैः षोडशभिर्युक्तं सवरूथं सकूबरम् ॥ २ ॥ | वह पिशाचके समान मुखवाले गदहोंके जुते रहनेसे अति भयानक जान पड़ता था तथा सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एवं समस्त युद्ध-सामग्रीसे सम्पन्न था ॥ ३ ॥ |
| पिशाचवदनैर्घोरैः खरैर्युक्तं भयावहम् ।<br>सर्वास्त्रशस्त्रसहितं सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ ३ ॥ | इस प्रकार महाभयंकर राक्षसराज रावण लंकापुरीसे निकला । |
| निष्क्रामाथ सहसा रावणो भीषणाकृतिः ।<br>आयान्तं रावणं दृष्ट्वा भीषणं रणकर्कशम् ॥ ४ ॥ | युद्धमें अत्यन्त निष्ठुर भीषणाकार रावणको आते देख भगवान् रामसे सुरक्षित वानर-सेना भयभीत हो गयी ॥ ४-५ ॥ |
| सन्त्रस्ताऽभूत्तदा सेना वानरी रामपालिता ॥ ५ ॥ | तब हनुमान्जी रावणसे युद्ध करनेके लिये उछलकर सामने आये । |
| हनूमानथ चोत्प्लुत्य रावणं योद्धुमाययौ ।<br>आगत्य हनुमान् रक्षोवक्षस्यतुलविक्रमः ॥ ६ ॥ | वहाँ आते ही अतुलितपराक्रमी पवनकुमारने कसकर मुट्ठी बाँध और बड़े वेगसे उस राक्षसकी छातीमें प्रहार किया । |
| मुष्टिबन्धं दृढं बद्ध्वा ताडयामास वेगतः ।<br>तेन मुष्टिप्रहारेण जानुभ्यामपतद्रथे ॥ ७ ॥ | उस घूँसेके लगते ही वह रथमें घुटनोंके बल गिर गया ॥ ६-७ ॥ |
| मूर्च्छितोऽथ मुहूर्तेन रावणः पुनरुत्थितः ।<br>उवाच च हनूमन्तं शूरोऽसि मम सम्मतः ॥ ८ ॥ | एक मुहूर्त मूर्च्छित रहनेके अनन्तर रावण को फिर चेत हुआ । तब उसने हनुमान्जीसे कहा— "मैं मानता हूँ, तू वास्तवमें बड़ा शूरवीर है" ॥ ८ ॥ |
| हनूमानाह तं धिङ्मां यस्त्वं जीवसि रावण ।<br>त्वं तावन्मुष्टिना वक्षो मम ताडय रावण ॥ ९ ॥ | हनुमान्जीने कहा— "अरे रावण ! मुझे धिक्कार है कि (मेरा घूँसा खाकर भी) तू जीता रह गया । अच्छा, अब तू मेरी छातीमें घूँसा मार ॥ ९ ॥ |
| पश्चान्मया हतः प्राणान्मोक्ष्यसे नात्र संशयः ।<br>तथेति मुष्टिना वक्षो रावणेनाऽपि ताडितः ॥ १० ॥ | फिर मेरा घूँसा लगनेपर तू प्राण छोड़ देगा, इसमें सन्देह नहीं । तब रावणने 'अच्छा' ऐसा कहकर उनकी छातीमें घूँसा मारा ॥ १० ॥ |
| विघूर्णमाननयनः किञ्चित्कश्मलमाययौ ।<br>संज्ञामवाप्य कपिराट् रावणं हन्तुमुद्यतः ॥ ११ ॥ | उसके लगनेसे उनके नेत्र घूमने लगे और वे कुछ तिलमिला उठे फिर चेत होनेपर कपिराज हनुमान्जी रावणको मारनेके लिये तैयार हुए ॥ ११ ॥ |
| ततोऽन्यत्र गतो भीत्या रावणो राक्षसाधिपः।<br>हनूमानङ्गदश्चैव नलो नीलस्तथैव च ॥ १२ ॥ | तब राक्षसराज रावण भयभीत होकर कहीं अन्यत्र चला गया । हनुमान्, अंगद, नल और नील इन चारोंने एकत्र होकर अपने |
| चत्वारः समवेत्याग्रे दृष्ट्वा राक्षसपुङ्गवान् ।<br>अग्निवर्णं तथा सर्परोमाणं खङ्गरोमकम् ॥ १३ ॥ | सामने अग्निवर्ण, सर्परोमा, खड्गरोमा और वृश्चिकरोमा |
<sup>१</sup> रथकी रक्षाके लिये बना हुआ लोहे आदिका आवरण ।
<sup>२</sup> रथका वह भाग जिसपर जूआ बाँधा जाता है।
| २८८ | अध्यात्मरामायणं | [ सर्ग ११ |
|---|
तथा वृश्चिकरोमाणं निर्जघ्नुः क्रमशोऽसुरान् ।<br>चत्वारश्चतुरो हत्वा राक्षसान् भीमविक्रमान् ।<br>सिंहनादं पृथक् कृत्वा रामपार्श्वमुपागताः ॥१४॥<br><br>ततः क्रुद्धो दशग्रीवः सन्दश्य दशनच्छदम् ॥१५॥<br>विवृत्य नयने क्रूरे राममेवान्वधावत ।<br>दशग्रीवो रथस्थस्तु रामं वज्रोपमैः शरैः ॥१६॥<br>आजघान महाघोरैर्धाराभिरिव तोयदः ।<br>रामस्य पुरतः सर्वांन्वानरानपि विव्यथे ॥१७॥<br>ततः पावकसङ्काशैः शरैः काञ्चनभूषणैः ।<br>अभ्यवर्षद्रणे रामो दशग्रीवं समाहितः ॥१८॥<br>रथस्थं रावणं दृष्ट्वा भूमिष्ठं रघुनन्दनम् ।<br>आहूय मातलिं शक्रो वचनं चेदमब्रवीत् ॥१९॥<br>रथेन मम भूमिष्ठं शीघ्रं याहि रघूत्तमम् ।<br>त्वरितं भूतलं गत्वा कुरु कार्यं ममानघ ॥२०॥<br><br>एवमुक्तोऽथ तं नत्वा मातलिर्देवसारथिः ।<br>ततो हयैश्च संयोज्य हरितैः स्यन्दनोत्तमम् ॥२१॥<br>स्वर्गाज्जयार्थं रामस्य ह्युपचक्राम मातलिः ।<br>प्राञ्जलिर्देवराजेन प्रेषितोऽस्मि रघूत्तम ॥२२॥<br>रथोऽयं देवराजस्य विजयाय तव प्रभो ।<br>प्रेषितश्च महाराज धनुरैन्द्रं च भूषितम् ॥२३॥<br>अभेद्यं कवचं खड्गं दिव्यतूणीयुगं तथा ।<br>आरुह्य च रथं राम रावणं जहि राक्षसम् ॥२४॥<br>मया सारथिना देव वृत्रं देवपतिर्यथा ।<br><br>इत्युक्तस्तं परिक्रम्य नमस्कृत्य रथोत्तमम् ॥२५॥<br>आरुरोह रथं रामो लोकाँल्लक्ष्म्या नियोजयन् । | नामक चार राक्षसोंको खड़े देखा। तब उन चारोंने क्रमशः इन चारों महापराक्रमी राक्षसोंको मार डाला और फिर पृथक्-पृथक् गरजते हुए श्रीरघुनाथजीके पास आ खड़े हुए ॥ १२-१४ ॥<br><br>तदनन्तर अत्यन्त क्रूर दशग्रीव (रावण) क्रुद्ध होकर दाँतोंसे ओठ चबाता हुआ आँखें फाड़कर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर ही दौड़ा। रावण रथमें चढ़ा हुआ था (और श्रीरघुनाथजी रथहीन थे तो भी) वह, मेघ जिस प्रकार जलकी धाराएँ बरसाता है वैसे ही महाभयंकर वज्र-सदृश बाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीपर प्रहार करने लगा और भगवान् रामके सामने ही उसने समस्त वानरोंको भी व्यथित कर दिया ॥ १५-१७ ॥ तब श्रीरामचन्द्रजी भी सावधान होकर रणभूमिमें रावणपर अग्निके समान तेजस्वी सुवर्ण-भूषित बाणोंकी वर्षा करने लगे। इन्द्रने जब देखा कि रावण रथपर चढ़ा हुआ है और श्रीरघुनाथजी पृथिवीपर ही खड़े हैं तो उसने अपने सारथि मातलिको बुलाकर कहा—॥१८-१९॥ "हे अनघ ! देखो रघुनाथजी पृथिवीपर खड़े हैं, तुम तुरन्त मेरा रथ लेकर भूलोकमें उनके पास जाओ और मेरा कार्य करो" ॥ २०॥<br><br>इन्द्रकी यह आज्ञा पाकर देवसारथि मातलिने उन्हें नमस्कार किया और उनके उत्तम रथमें हरे रंगके घोड़े जोतकर भगवान् रामकी विजयके लिये स्वर्गसे चलकर उनके पास उपस्थित हुआ तथा उनसे हाथ जोड़कर बोला—"हे रघुश्रेष्ठ ! मुझे देवराज इन्द्रने भेजा है ॥ २१-२२ ॥ हे प्रभो ! यह रथ इन्द्रका ही है, इसे उन्होंने आपकी विजयके लिये भेजा है। हे महाराज ! इसके साथ ही यह अति शोभायमान ऐन्द्र धनुष, अभेद्य कवच, खड्ग और दो दिव्य तूणीर भी भेजे हैं। हे राम ! मुझ सारथीके साथ, इन्द्रने जिस प्रकार वृत्रासुरका वध किया था उसी प्रकार हे देव ! आप इस रथपर आरूढ होकर राक्षस रावणका वध कीजिये।"<br><br>मातलिके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उस रथकी परिक्रमा कर उसे नमस्कार किया ॥२३-२५॥ और सम्पूर्ण लोकोंको श्रीसम्पन्न करते हुए उसपर
सर्ग ११] युद्धकाण्ड २८९
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽभवन्महायुद्धं भैरवं रोमहर्षणम् ॥२६॥<br>महात्मनो राघवस्य रावणस्य च धीमतः ।<br>आग्नेयेन च आग्नेयं दैवं दैवेन राघवः ॥२७॥<br>अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ।<br>ततस्तु ससृजे घोरं राक्षसं चास्त्रमस्त्रवित् ॥<br>क्रोधेन महताऽऽविष्टो रामस्योपरि रावणः ॥२८॥<br>रावणस्य धनुर्मुक्ताः सर्पा भूत्वा महाविषाः ।<br>शराः काञ्चनपुङ्खाभा राघवं परितोऽपतन् ॥२९॥<br>तैः शरैः सर्पवदनैर्वमद्भिरनलं मुखैः ।<br>दिशश्च विदिशश्चैव व्याप्तास्तत्र तदाऽभवन् ॥३०॥<br>रामः सर्पांस्ततो दृष्ट्वा समन्तात्परिपूरितान् ।<br>सौपर्णमस्त्रं तद्घोरं पुरः प्रावर्तयद्रणे ॥३१॥<br>रामेण मुक्तास्ते बाणा भूत्वा गरुडरूपिणः ।<br>चिच्छिदुः सर्पबाणांस्तान्स मन्तात्सर्पशत्रवः ॥३२॥<br>अस्त्रे प्रतिहते युद्धे रामेण दशकन्धरः ।<br>अभ्यवर्षत्ततो रामं घोराभिः शरवृष्टिभिः ॥३३॥<br>ततः पुनः शरानीकै राममक्लिष्टकारिणम् ।<br>अर्दयित्वा तु घोरेण मातलिं प्रत्यविध्यत ॥३४॥<br>पातयित्वा रथो पस्थे रथकेतुं च काञ्चनम् ।<br>ऐन्द्रानश्वानभ्यहनद्रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥३५॥<br><br>विषेदुर्देवगन्धर्वाश्चारणाः पितरस्तथा ।<br>आर्त्ताकारं हरिं दृष्ट्वा व्यथिताश्च महर्षयः ॥३६॥<br>व्यथिता वानरेन्द्राश्च बभूवुः सविभीषणाः ।<br>दशास्यो विंशतिभुजः प्रगृहीतशरासनः ॥३७॥<br>ददृशे रावणस्तत्र मैनाक इव पर्वतः ।<br>रामस्तु भ्रुकुटिं बद्ध्वा क्रोधसंरक्तलोचनः ॥३८॥<br>कोपं चकार सदृशं निर्दहन्निव राक्षसम् ।<br>धनुरादाय देवेन्द्रधनुराकारमद्भुतम् ॥३९॥<br>गृहीत्वा पाणिना बाणं कालानलसमप्रभम् ।<br>निर्दहन्निव चक्षुर्भ्यां ददृशे रिपुमन्तिके ॥४०॥<br>३७ | आरूढ़ हुए। फिर महात्मा राम और बुद्धिमान् रावणका महाभयानक और रोमाञ्चकारी घोर युद्ध होने लगा । अस्त्र-विद्यामें परम कुशल श्रीरामचन्द्रजीने रावणके आग्नेयास्त्रको आग्नेयास्त्रसे और दैवास्त्रको दैवास्त्रसे काट डाला । तब अस्त्रविद्याविशारद रावणने अत्यन्त क्रोधाविष्ट हो श्रीरामचन्द्रजीपर महाभयंकर राक्षसास्त्र छोड़ा ॥२६—२८॥ रावणके धनुषसे छूटे हुए बाण, जो सुवर्णमय पंखसे भासमान हो रहे थे, महाविषधर सर्प होकर श्रीरघुनाथजीके चारों ओर गिरने लगे ॥ २९॥ जिनके मुखसे अग्निकी लपटें निकल रही थीं रावणके उन सर्पमुख-बाणोंसे उस समय सम्पूर्ण दिशा-विदिशाएँ व्याप्त हो गयीं ॥ ३० ॥ रामने जब रणभूमिमें सब ओर सर्पोंको व्याप्त देखा तो महाभयंकर गारुडास्त्र छोड़ा ॥ ३१॥ श्रीरामचन्द्रजीके छोड़े हुए वे बाण सर्पोंके शत्रु गरुड होकर जहाँ-तहाँ सर्परूप बाणोंको काटने लगे ॥ ३२॥ इस प्रकार भगवान् रामद्वारा अपने शस्त्रको नष्ट हुआ देख रावणने उनके ऊपर भयंकर बाण-वर्षा की ॥ ३३ ॥ और फिर लीलाविहारी भगवान् रामको अति तीव्र बाणावलीसे पीड़ित कर मातलिको वेध डाला ॥ ३४ ॥ (इतना ही नहीं) क्रोधसे उन्मत्त हुए रावणने रथकी सुवर्णमयी ध्वजा काट कर उसके पृष्ठ भागपर गिरा दी और इन्द्रके घोड़ोंको भी हताहत कर दिया ॥३५॥<br><br>भगवान्को इस आपत्तिमें देखकर देवता, गन्धर्व, चारण और पितर आदि विषादग्रस्त हो गये तथा महर्षिगण मन-ही-मन दुःख मानने लगे ॥ ३६ ॥ विभीषणके सहित समस्त वानर-यूथपतिगण अति चिन्तित हुए । उस समय हाथमें धनुषबाण लिये दश मुख और बीस भुजाओंवाला रावण मैनाक पर्वतके समान दीख पड़ता था । भगवान् रामके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये, उनकी त्यौरी चढ़ गयी और उस राक्षसको मानो जला डालेंगे ऐसा क्रोध करते हुए उन्होंने इन्द्र-धनुषके समान एक विचित्र धनुष उठाया तथा हाथमें एक कालाग्निके समान तेजोमय बाण लेकर अपने नेत्रोंसे समीपवर्ती शत्रु की ओर इस प्रकार निहारा मानो भस्म कर देंगे ॥३७-४०॥ काल- |
२९० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ११
पराक्रमं दर्शयितुं तेजसा प्रज्वलन्निव ।
प्रचक्रमे कालरूपी सर्वलोकस्य पश्यतः ॥४१॥
विकृष्य चापं रामस्तु रावणं प्रतिविध्य च ।
हर्षयन्वानरानीकं कालान्तक इवाबभौ ॥४२॥
क्रुद्धं रामस्य वदनं दृष्ट्वा शत्रुं प्रधावतः ।
तत्रसुः सर्वभूतानि चचाल च वसुन्धरा ॥४३॥
रामं दृष्ट्वा महारौद्रमुत्पातांश्च सुदारुणान् ।
त्रस्तानि सर्वभूतानि रावणं चाविशद्भयम् ॥४४॥
विमानस्थाः सुरगणाः सिद्धगन्धर्वकिन्नराः ।
ददृशुः सुमहायुद्धं लोकसंवर्तकोपमम् ।
ऐन्द्रमस्त्रं समादाय रावणस्य शिरोऽच्छिनत् ॥४५॥
मूर्धानो रावणस्याथ बहवो रुधिरोक्षिताः ।
गगनात्प्रपतन्तिस्म तालादिव फलानि हि ॥४६॥
न दिनं न च वै रात्रिर्न सन्ध्या न दिशोऽपि वा ।
प्रकाशन्ते न तद्रूपं दृश्यते तत्र सङ्गरे ॥४७॥
ततो रामो बभूवाथ विस्मयाविष्टमानसः ।
शतमेकोत्तरं छिन्नं शिरसां चैकवर्चसाम् ॥४८॥
न चैव रावणः शान्तो दृश्यते जीवितक्षयात्
ततः सर्वास्त्रविद्वीरः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥४९॥
अस्त्रैश्च बहुभिर्युक्तश्चिन्तयामास राघवः ।
यैर्येर्बाणैर्हता दैत्या महासत्त्वपराक्रमाः ॥५०॥
त एते निष्फलं याता रावणस्य निपातने ।
इति चिन्ताकुले रामे समीपस्थो विभीषणः ॥५१॥
उवाच राघवं वाक्यं ब्रह्मदत्तवरो ह्यसौ ।
विच्छिन्ना बाहवोऽप्यस्य विच्छिन्नानि शिरांसि च
उत्पत्स्यन्ति पुनः शीघ्रमित्याह भगवानजः । | रूपी भगवान् रामने अपने तेजसे प्रज्वलित-से हो सम्पूर्ण लोकोंके सामने अपना पराक्रम दिखाना आरम्भ किया ॥ ४१ ॥ उन्होंने अपना धनुष खींचकर रावण को वींध डाला । और वे सम्पूर्ण वानर-सेनाको आनन्दित करते हुए लोकान्तकारी कालके समान सुशोभित होने लगे ॥ ४२ ॥
शत्रुपर धावा करते हुए भगवान् रामका क्रोधयुक्त मुख देखकर समस्त प्राणी भयभीत हो गये और पृथिवी डगमगाने लगी ॥ ४३ ॥ रामको अति रौद्र-रूप और इन दारुण उत्पातोंको देखकर समस्त जीवोंमें त्रास छा गया और रावणके अन्तःकरणमें भी आतंक समा गया ॥ ४४ ॥ उस समय देवता, सिद्ध, गन्धर्व और किन्नरगण विमानोंपर चढ़े हुए संसारके महाप्रलयके समान इस घोर युद्धको देख रहे थे । इसी बीचमें श्रीरामचन्द्रजीने ऐन्द्रास्त्र छोड़कर रावणके शिर काट डाले ॥४५॥ तब रावणके बहुत-से शिर रुधिरसे लथपथ हो आकाश-मण्डलसे इस प्रकार गिरने लगे जैसे ताल-वृक्षसे उसके फल गिरते हैं ॥ ४६ ॥ उस समय दिन, रात, सन्ध्या अथवा दिशाएँ आदि कुछ भी स्पष्ट नहीं जान पड़ती थीं तथा उस संग्राम-भूमिमें रावणका रूप भी दिखायी नहीं देता था (केवल कटे हुए शिर ही दीख पड़ते थे) ॥ ४७ ॥
तब तो श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा ही विस्मय हुआ (वे सोचने लगे) 'मैंने समान-तेज-सम्पन्न एक सौ एक शिर काटे हैं ॥ ४८ ॥ किन्तु फिर भी रावण प्राण-नाशसे शान्त हुआ दिखायी नहीं देता ।' तब अनेक अस्त्रोंसे युक्त सर्वास्त्रविशारद धीरवीर कौशल्यानन्दन रघुनाथजीने विचारा—"मैंने जिन-जिन बाणोंसे बड़े-बड़े तेजस्वी और पराक्रमी दैत्योंको मारा था, इस रावणका वध करनेमें वे सभी निष्फल हो गये।”
भगवान् रामको इस प्रकार चिन्ताग्रस्त देख उनके पास खड़े हुए विभीषणने कहा—"भगवन् ! ब्रह्माजीने इसे एक वर दिया था । उन्होंने कहा था कि इसकी 'भुजाएँ और शिर बारम्बार काट दिये जानेपर भी फिर तुरन्त नये उत्पन्न हो जायेंगे।' इसके नाभि-
सर्ग ११] युद्धकाण्ड २९१
[संस्कृत श्लोक]
नाभिदेशेऽमृतं तस्य कुण्डलाकारसंस्थितम् ॥५३॥
तच्छोषयानलास्त्रेण तस्य मृत्युस्ततो भवेत् ।
विभीषणवचः श्रुत्वा रामः शीघ्रपराक्रमः ॥५४॥
पावकास्त्रेण संयोज्य नाभिं विव्याध रक्षसः ।
अनन्तरं च चिच्छेद शिरांसि च महाबलः ॥५५॥
बाहूनपि च संरब्धो रावणस्य रघूत्तमः ।
ततो घोरां महाशक्तिमादाय दशकन्धरः ॥५६॥
विभीषणवधार्थाय चिक्षेप क्रोधविह्वलः ।
चिच्छेद राघवो बाणैस्तां शितैर्हेमभूषितैः ॥५७॥
दशग्रीवशिरश्छेदात्तदा तेजो विनिर्गतम् ।
म्लानरूपो बभूवाथ छिन्नैः शीर्षैर्भयङ्करैः ॥५८॥
एकेन मुख्यशिरसा बाहुभ्यां रावणो बभौ ।
रावणस्तु पुनः क्रुद्धो नानाशस्त्रास्त्रवृष्टिभिः ॥५९॥
ववर्ष रामं तं रामस्तथा बाणैर्ववर्ष च ।
ततो युद्धमभूद्धोरं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥६०॥
अथ संस्मारयामास मातली राघवं तदा ।
विसृज्यास्त्रं वधायास्य ब्राह्मं शीघ्रं रघूत्तम ॥६१॥
विनाशकालः प्रथितो यः सुरैः सोऽद्य वर्तते ।
उत्तमाङ्गं न चैतस्य छेत्तव्यं राघव त्वया ॥६२॥
नैव शीर्ष्णि प्रभो वध्यो वध्य एव हि मर्मणि ।
ततः संस्मारितो रामस्तेन वाक्येन मातलेः ॥६३॥
जग्राह सशरं दीप्तं निश्वसन्तमिवोरगम् ।
यस्य पार्श्वे तु पवनः फले भास्करपावकौ ॥६४॥
शरीरमाकाशमयं गौरवे मेरुमन्दरौ ।
पर्वस्वपि च विन्यस्ता लोकपाला महौजसः ॥६५॥
जाज्वल्यमानं वपुषा भातं भास्करवर्चसा ।
तमुग्रमस्त्रं लोकानां भयनाशनमद्भुतम् ॥६६॥
[हिन्दी अनुवाद]
देशमें कुण्डलाकारसे अमृत रखा हुआ है ॥४९-५३॥ उसे आप आग्नेयास्त्रसे सुखा डालिये, तभी इसकी मृत्यु हो जायगी ।” विभीषणके वचन सुनकर शीघ्रपराक्रमी भगवान् रामने अपने धनुषपर आग्नेयास्त्र चढ़ाकर उस राक्षसकी नाभिमें मारा और फिर महाबली रघुनाथजीने क्रोधित होकर उसके शिर और भुजाएँ काट डालीं ।
इसपर रावणने अत्यन्त क्रोधातुर हो विभीषणको मारनेके लिये एक महाभयानक शक्ति छोड़ी । किन्तु रघुनाथजीने उसे तुरन्त ही सुवर्णमण्डित तीक्ष्ण बाणोंसे काट डाला ॥ ५४-५७॥ रावणके शिर काटे जानेसे उसका तेज निकल गया और वह उन भयंकर शिरोंके कट जानेसे विरूप दिखायी देने लगा ॥५८॥ अब, रावणके एक मुख्य शिर और दो भुजाएँ रह गयी थीं । किन्तु फिर भी वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर भगवान् रामपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगा । इसी प्रकार रामने भी उसपर भयंकर वाणवर्षा की । फिर तो वहाँ अत्यन्त रोमाञ्चकारी घमासान युद्ध छिड़ गया ॥ ५९-६० ॥
तब मातलिने श्रीरामचन्द्रजीको स्मरण दिलाया कि “हे रघुश्रेष्ठ ! इसका वध करनेके लिये आप शीघ्र ही ब्रह्मास्त्र छोड़िये ॥ ६१ ॥ देवताओने इसके नाशका जो समय निश्चित किया है वह इस समय वर्तमान है । हे रघुनन्दन ! आप इसका मस्तक न काटियेगा ॥ ६२ ॥ (क्योंकि) हे प्रभो ! यह शिर काटनेसे नहीं मर सकता, बल्कि (हृदयरूप) मर्मस्थानके विद्ध होनेपर ही इसका अन्त हो सकता है ।” मातलिके इन वाक्योंसे स्मरण दिलाये जानेपर भगवान् रामने फुफकारते हुए सर्पके समान एक परम तेजस्वी बाण निकाला । उसके पार्श्वभागमें पवनकी, नोंकपर सूर्य और अग्निकी, गुरुता (भारीपन) में सुमेरु और मन्दराचलकी तथा गाँठोंमें महातेजस्वी लोकपालोंकी स्थापना की गयी थी, एवं उसका स्वरूप आकाशमय था ॥६३-६५॥ उसका आकार अत्यन्त देदीप्यमान होनेके कारण वह सूर्यके समान प्रकाशमान था । महाबाहु
| ३९२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ११ |
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अभिमन्त्र्य ततो रामस्तं महेषुं महाभुजः ।
वेदप्रोक्तेन विधिना सन्दधे कार्मुके बली ॥६७॥
तस्मिन्सन्धीयमाने तु राघवेण शरोत्तमे ।
सर्वभूतानि वित्रैसुश्चचाल च वसुन्धरा ॥६८॥
संशवणाय सङ्क्रुद्धो भृशमानम्य कार्मुकम् ।
चिक्षेप परमायत्तस्तमस्त्रं मर्मघातिनम् ॥६९॥
स वज्र इव दुर्धर्षो वज्रपाणिविसर्जितः ।
कृतान्त इव घोरास्यो न्यपतद्रावणोरसि ॥७०॥
स निमग्नो महाघोरः शरीरान्तकरः परः ।
बिभेद हृदयं तूर्णं रावणस्य महात्मनः ॥७१॥
रावणस्याहरत्प्राणान्विवेश धरणीतले ।
स शरो रावणं हत्वा रामतूणीरमाविशत् ॥७२॥
तस्य हस्तात्पपाताशु सशरं कार्मुकं महत् ।
गतासुर्भ्रमिवेगेन राक्षसेन्द्रोऽपतद्भुवि ॥७३॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ हतशेषाश्च राक्षसाः ।
हतनाथा भयत्रस्ता दुद्रुवुः सर्वतोदिशम् ॥७४॥
दशग्रीवस्य निधनं विजयं राघवस्य च ।
ततो विनेदुः संहृष्टा वानरा जितकाशिनः ॥७५॥
वदन्तो रामविजयं रावणस्य च तद्वधम् ।
अथान्तरिक्षे व्यनदत्सौम्यस्त्रिदशदुन्दुभिः ॥७६॥
पपात पुष्पवृष्टिश्च समन्ताद्राघवोपरि ।
तुष्टुवुर्मुनयः सिद्धाश्चारणाश्च दिवौकसः ॥७७॥
अथान्तरिक्षे ननृतुः सर्वतोऽप्सरसो मुदा ।
रावणस्य च देहोत्थं ज्योतिरादित्यवत्स्फुरत् ॥७८॥
प्रविवेश रघुश्रेष्ठं देवानां पश्यतां सताम् ।
देवा ऊचुरहो भाग्यं रावणस्य महात्मनः ॥७९॥
वयं तु सात्त्विका देवा विष्णोः कारुण्यभाजनाः ।
भगवान् रामने सम्पूर्ण लोकोंका भय दूर करनेवाले उस अत्यन्त उग्र और अद्भुत अस्त्रको धनुर्वेदोक्त विधिसे अभिमन्त्रित कर अपने धनुषपर चढ़ाया ॥ ६६-६७ ॥ भगवान् रामद्वारा उस उत्तम बाणके चढ़ाये जानेपर समस्त प्राणी भयभीत हो गये और पृथिवी काँपने लगी ॥ ६८ ॥ इसी समय उन्होंने अत्यन्त क्रुद्ध हो धनुषको भली प्रकार खींच बड़ी सावधानीसे वह मर्मघातक बाण रावणपर छोड़ दिया ॥ ६९ ॥ वह कालके समान अति भयंकर मुखवाला और वज्रपाणि इन्द्रद्वारा छोड़े हुए वज्रके समान अति असह्य बाण रावणके वक्षःस्थलमें लगा ॥ ७० ॥ वह शरीरान्तकारी महाभयंकर बाण उस महाकाय रावणके शरीरमें घुस गया और उसने तुरन्त ही उसका हृदय फाड़ डाला ॥ ७१ ॥ उसने रावणके प्राणोंका अन्त कर दिया और फिर पृथिवीमें घुस गया । इस प्रकार रावणका वध करनेके उपरान्त वह बाण फिर भगवान् रामके तरकशमें चला आया ॥ ७२ ॥ बाणके लगते ही रावणका बड़ा भारी धनुष बाणसहित तुरन्त उसके हाथसे गिर गया और वह राक्षसराज प्राणरहित हो चक्कर खाकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ७३ ॥ उसे पृथिवीपर गिरा देख मरनेसे बचे हुए राक्षसगण अनाथ हो जानेसे भयभीत होकर चारों ओर भाग गये ॥ ७४ ॥
तब, विजय-विभूषित वानरगण अति प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजीकी जय और रावणकी उस पराजयका बखान करते हुए 'भगवान् रामकी जय और रावणकी क्षय' का घोष करने लगे । तथा आकाश-मण्डलमें दिव्य दुन्दुभियोंका गम्भीर नाद होने लगा ॥ ७५-७६ ॥ भगवान् रामपर सब ओरसे फूलोंकी वर्षा होने लगी तथा मुनि, सिद्ध, चारण और देवगण उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७७ ॥ फिर आकाशमें सब ओर अप्सराएँ प्रसन्नतापूर्वक नाचने लगीं । (इसी समय ) रावणके देहसे एक सूर्यके समान प्रकाशमान ज्योति निकली, और वह सब देवताओंके देखते-देखते श्रीरघुनाथजीमें प्रवेश कर गयी। यह देखकर देवगण कहने लगे— "अहो ! महात्मा रावणका बड़ा भाग्य है ॥ ७८-७९ ॥ हम देवगण सत्त्वगुणप्रधान हैं और श्रीविष्णुभगवान्के
सर्ग ११] युद्धकाण्ड २९३
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भयदुःखादिभिर्व्याप्ताः संसारे परिचर्तिनः ॥८०॥<br><br>अयं तु राक्षसः क्रूरो ब्रह्महाऽतीव तामसः ।<br>परदाररतो विष्णुद्वेषी तापसहिंसकः ॥८१॥<br><br>पश्यत्सु सर्वभूतेषु राममेव प्रविष्टवान् ।<br>एवं ब्रुवत्सु देवेषु नारदः प्राह सुस्मितः ॥८२॥<br><br>शृणुतात्र सुरा यूयं धर्मतत्त्वविचक्षणाः ।<br>रावणो राघवद्वेषादहर्निशं हृदि भावयन् ॥८३॥<br><br>भृत्यैः सह सदा रामचरितं द्वेषसंयुतः ।<br>श्रुत्वा रामात्स्वनिधनं भयात्सर्वत्र राघवम् ॥८४॥<br><br>पश्यन्ननुदिनं स्वप्ने राममेवानुपश्यति ।<br>क्रोधोऽपि रावणस्याशु गुरुबोधाधिकोऽभवत्॥८५॥<br><br>रामेण निहतश्चान्ते निर्धूताशेषकल्मषः ।<br>रामसायुज्यमेवाप रावणो मुक्तबन्धनः ॥८६॥<br><br>पापिष्ठो वा दुरात्मा परधनपरदा-<br> रेषु सक्तो यदि स्या-<br>न्नित्यं स्नेहाद्भयाद्वा रघुकुलतिलकं<br> भावयन्सम्परेतः ।<br>भूत्वा शुद्धान्तरङ्गो भवशतजनिता-<br> नेकदोपैर्विमुक्तः<br>सद्यो रामस्य विष्णोः सुरवरविनुतं<br> याति वैकुण्ठमाद्यम् ॥८७॥<br><br>हत्वा युद्धे दशास्यं त्रिभुवनविषमं<br> वामहस्तेन चापं<br>भूमौ विष्टभ्य तिष्ठन्नितरकरधृतं<br> भ्रामयन्बाणमेकम् ।<br>आरक्तोपान्तनेत्रः शरदलितवपुः<br> सूर्यकोटिप्रकाशो | कृपापात्र हैं, फिर भी हम भय और दुःखादिसे व्याप्त होकर संसारमें भटका करते हैं ॥८०॥ और यह रावण महाक्रूर राक्षस है, (यही नहीं) यह ब्रह्मघाती, अत्यन्त तमोगुणी, परस्त्रीपरायण, भगवद्विरोधी और तपस्वियोंको पीड़ित करनेवाला भी है ॥८१॥ किन्तु देखो, यह सबके देखते-देखते भगवान् राममें ही लीन हो गया।”<br><br>देवगणके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने मुसकाते हुए कहा—॥८२॥ “हे देवगण ! तुमलोग धर्मके तत्त्वको भली प्रकार जाननेवाले हो, अतः (इस विषयमें मेरा मत) सुनो। रघुनाथजीसे द्वेष रहनेके कारण रावण अहर्निश अपने सेवकोंसहित द्वेषपूर्वक हृदयमें सदा श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रकी ही भावना रखता था; तथा रामके हाथसे अपना वध सुनकर सर्वत्र रामहीको देखता हुआ स्वप्नमें भी उन्हींको देखता था। इस प्रकार रावणका क्रोध भी उसके लिये गुरुके उपदेशसे कहीं अधिक उपयोगी हुआ॥८३–८५॥ अन्तमें स्वयं भगवान् रामके हाथसे मारे जानेके कारण उसके समस्त पाप धुल गये थे। अतः बन्धनहीन हो जानेसे उसने राममें सायुज्य मोक्ष प्राप्त किया॥८६॥ यद्यपि कोई पुरुष (पहलेका) महापापी, दुराचारी तथा परधन और परस्त्रीमें आसक्त भी हो तथापि यदि नित्यप्रति प्रेमसे अथवा भयसे रघुकुलतिलक भगवान् रामका चिन्तन करता हुआ प्राणत्याग करता है तो वह शुद्ध-चित्त होकर सैकड़ों जन्मके उपार्जित नाना दुःखोंसे छूटकर शीघ्र ही भगवान् विष्णुके देवता और दैत्योंसे वन्दित आदिस्थान वैकुण्ठलोकको चला जाता है॥८७॥ जो त्रिलोकीके कण्टकस्वरूप रावणको युद्धमें मारकर अपने बायें हाथसे धनुषको पृथिवीपर टेके हुए खड़े हैं, तथा दूसरे हाथमें एक बाण लेकर उसे घुमा रहे हैं, जिनके नेत्रोंके उपान्तभाग कुछ लाल हो रहे हैं, बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुआ शरीर करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रहा है और उन्नत देह वीरश्रीसे सुशोभित है, वे |
युद्धकाण्ड - सर्ग १२: विभीषणका राज्याभिषेक और सीताजीकी अग्नि-परीक्षा
| २९४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १२ |
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वीरश्रीबन्धुराङ्गस्त्रिदशपतिनुतः <br> पातु मां वीररामः ॥८८। | देवराज इन्द्रद्वारा वन्दित वीरवर राम मेरी रक्षा करें" ॥ ८८ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
द्वादश सर्ग
विभीषणका राज्याभिषेक और सीताजीकी अग्नि-परीक्षा।
| श्रीमहादेव उवाच <br> रामो विभीषणं दृष्ट्वा हनूमन्तं तथाङ्गदम् । <br> लक्ष्मणं कपिराजं च जाम्बवन्तं तथा परान् ॥ १ ॥ <br> परितुष्टेन मनसा सर्वानेवाब्रवीद्वचः । <br> भवतां बाहुवीर्येण निहतो रावणो मया ॥ २ ॥ <br> कीर्तिः स्थास्यति वः पुण्या यावच्चन्द्रदिवाकरौ । <br> कीर्तयिष्यन्ति भवतां कथां त्रैलोक्यपावनीम् ॥३॥ <br> मयोपेतां कलिहरां यास्यन्ति परमां गतिम् । | श्रीमहादेवजी बोले- हे पार्वती ! श्रीरामचन्द्रजीने विभीषण, हनुमान्, अंगद, लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, जाम्बवान् तथा अन्यान्य वीरोंकी ओर देख सभी लोगोंसे प्रसन्न-चित्तसे कहा—“आपलोगोंके बाहुबलसे आज मैंने रावणको मार दिया ॥ १-२ ॥ आप सबलोगोंकी पवित्र कीर्ति जबतक सूर्य और चन्द्र रहेंगे तबतक स्थिर रहेगी और जो लोग मेरेसहित आप सबकी कलि-कल्मष-नाशिनी त्रिलोकपावनी पवित्र कथाका कीर्तन करेंगे वे परमपदको प्राप्त होंगे।” |
| एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा रावणं पतितं भुवि ॥ ४ ॥ <br> मन्दोदरीमुखाः सर्वाः स्त्रियो रावणपालिताः । <br> पतिता रावणस्याग्रे शोचन्त्यः पर्यदेवयन् ॥५॥ <br> विभीषणः शुशोचार्तः शोकेन महताऽऽवृतः । <br> पतितो रावणस्याग्रे बहुधा पर्यदेवयत् ॥ ६ ॥ | इसी समय रावणको पृथिवीपर गिरा देख उससे सुरक्षित मन्दोदरी आदि समस्त स्त्रियाँ उसके पास (आकर) गिर गयीं तथा शोकसे विलाप करने लगीं ॥ ३-५ ॥ विभीषण भी महान् शोकाकुल हो आर्तभावसे चिन्ताग्रस्त हो गये और रावणके पास गिरकर नाना प्रकारसे विलाप करने लगे ॥ ६ ॥ तब |
| रामस्तु लक्ष्मणं प्राह बोधयस्व विभीषणम् । <br> करोतु भ्रातृसंस्कारं किं विलम्बेन मानद ॥ ७ ॥ <br> स्त्रियो मन्दोदरीमुख्याः पतिता विलपन्ति च । <br> निवारयतु ताः सर्वा राक्षसी रावणप्रियाः ॥८॥ | श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीसे कहा—“हे मानद ! विभीषणको समझाओ कि वह भाईका (और्ध्वदैहिक) संस्कार करे, अब व्यर्थ देरी करनेसे क्या लाभ है ॥ ७ ॥ और मन्दोदरी आदि स्त्रियाँ पछाड़ खा-खाकर विलाप कर रही हैं, सो उन रावणकी प्रेयसी राक्षसियोंको (समझाकर) ऐसा करनेसे रोके" ॥ ८ ॥ |
| एवमुक्तोऽथ रामेण लक्ष्मणोऽगाद्विभीषणम् । <br> उवाच मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम् ॥ ९ ॥ <br> शोकेन महताऽऽविष्टं सौमित्रिरिदमब्रवीत् । <br> यं शोचसि त्वं दुःखेन कोऽयं तव विभीषण ॥१०॥ | भगवान् रामके इस प्रकार कहनेपर श्रीलक्ष्मणजी मृतक रावणके समीप मरे हुएके समान पड़े हुए विभीषणके पास आये और उससे कहने लगे ॥९॥ इस समय विभीषण महान् शोकाकुल थे उनसे श्रीलक्ष्मणजी इस प्रकार बोले—“विभीषण ! जिसके लिये तुम |
| सर्ग १२ ] | युद्धकाण्ड | २९५ |
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| त्वं वास्य कतमः सृष्टेः पुरेदानीमतः परम् ।<br><br>यद्वत्तोयौघपतिताः सिकता यान्ति तद्वशाः ॥११॥<br><br>संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिनः ।<br><br>यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च ॥१२॥<br><br>एवं भूतेषु भूतानि प्रेरितानीशमायया ।<br><br>त्वं चेमे वयमन्ये च तुल्याः कालवशोद्भवाः ॥१३॥<br><br>जन्ममृत्यू यदा यस्मात्तदा तस्माद्भविष्यतः ।<br><br>ईश्वरः सर्वभूतानि भूतैः सृजति हन्त्यजः ॥१४॥<br><br>आत्मसृष्टैरस्वतन्त्रैर्निरपेक्षोऽपि बालवत् ।<br><br>देहेन देहिनो जीवा देहाद्देहोऽभिजायते ॥१५॥<br><br>बीजादेव यथा बीजं देहान्य इव शाश्वतः ।<br><br>देहिदेहविभागोऽयमविवेक्कृतः पुरा ॥१६॥<br><br>नानात्वं जन्म नाशश्च क्षयो वृद्धिः क्रिया फलम् ।<br><br>द्रष्टुराभान्त्यतद्धर्मा यथाग्नेर्दारुविक्रियाः ॥१७॥<br><br>त इमे देहसंयोगादात्मना भान्त्यसद्ग्रहात् ।<br><br>यथा यथा तथा चान्यद्ध्यायतोऽसत्सदाग्रहात् ॥१८॥<br><br>प्रसुप्तस्यानहम्भावात्तदा भाति न संसृतिः ।<br><br>जीवतोऽपि तथा तद्वद्विमुक्तस्यानहङ्कृतेः ॥१९॥<br><br>तस्मान्मायामनोधर्मं जह्यहम्ममताभ्रमम् ।<br><br>रामभद्रे भगवति मनो धेह्यात्मनीश्वरे ॥२०॥ | दुःखी होकर शोक कर रहे हो यह तुम्हारा कौन है ? ॥ १० ॥ तथा तुम भी अपने जन्मसे पूर्व, इस समय अथवा इससे आगे इसके क्या हो ? जिस प्रकार जलके प्रवाहमें पड़ी हुई बालू उसके अधीन आती-जाती रहती है, उसी प्रकार देहधारी प्राणी कालके वशीभूत हुए ही संयोग और वियोगको प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार बीजोंसे अन्य बीज उत्पन्न होते और नष्ट भी हो जाते हैं, उसी प्रकार भगवान्की मायासे प्रेरित समस्त प्राणी अन्य प्राणियोंसे उत्पन्न होते और मरते रहते हैं। तुम, हम, ये और अन्य सब भी समानभावसे कालके वशीभूत ही उत्पन्न हुए हैं ॥ ११–१३ ॥ जन्म और मृत्यु जिस समय जिससे होनेवाले हैं, उस समय उसीके द्वारा हो जायेंगे । अजन्मा ईश्वर ही, किसी प्रकारकी इच्छा न रहते हुए भी, बालकके समान ( केवल विनोदार्थ ) अपने रचे हुए अस्वतन्त्र प्राणियोंसे समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करता और नष्ट कर देता है। जीव देह-संयोगके कारण ही देही कहलाता है और देह अन्य ( माता-पिताके ) देहसे ही उत्पन्न होता है, जैसे कि एक बीजसे दूसरा बीज । सनातन आत्मा तो देहसे पृथक्-सा है । वास्तवमें तो यह देह और देहीका विभाग भी पहलेहीसे अविवेकके ही कारण है ॥ १४–१६ ॥ जिस प्रकार अग्निमें लकड़ीके विकार दिखायी देते हैं उसी प्रकार साक्षी आत्मामें भिन्नता जन्म, मरण, क्षय, वृद्धि, कर्म और कर्मफल आदि प्रतीत होते हैं, जो वास्तवमें उसके धर्म नहीं हैं ॥ १७ ॥ मिथ्या भ्रान्तिके कारण आत्माके साथ देहका संयोग माननेसे जिस प्रकार ये ( सब धर्म ) ( सत्यवत् ) भासते हैं वैसे ही सत्य ( आत्मा ) का निश्चय कर उसीका ध्यान करते रहनेसे ये असत्य प्रतीत होने लगते हैं ॥ १८ ॥ जिस प्रकार गाढ़ निद्रामें सोये हुए पुरुषको अहंकारका अभाव हो जानेसे प्रपञ्चकी प्रतीति नहीं होती उसी प्रकार अहंकारहीन मुक्त पुरुषको जीते हुए ही प्रपञ्चका भान नहीं होता ॥ १९ ॥<br><br>“अतः तुम अहंता-ममता एवं भ्रान्तिरूप मायामयं मनो-धर्मोंको त्यागो और इन्द्रियोंके बाह्य विषयोंसे अपने मनका . |
| २९६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग १२ |
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सर्वभूतात्मनि परे मायामानुषरूपिणि ।<br>बाह्येन्द्रियार्थसम्बन्धात्त्याजयित्वा मनः शनैः ॥२१॥<br><br>तत्र दोषान्दर्शयित्वा रामानन्दे नियोजय ।<br>देहबुद्ध्या भवेद्भ्राता पिता माता सुहृत्प्रियः ॥२२॥<br><br>विलक्षणं यदा देहाज्जानात्यात्मानमात्मना ।<br>तदा कः कस्य वा बन्धुर्भ्राता माता पिता सुहृत् ॥२३॥<br><br>मिथ्याज्ञानवशाज्जाता दारागारादयः सदा ।<br>शब्दादयश्च विषया विविधाश्चैव सम्पदः ॥२४॥<br><br>बलं कोशो भृत्यवर्गो राज्यं भूमिः सुतादयः ।<br>अज्ञानजत्वात्सर्वे ते क्षणसङ्गमभङ्गुराः ॥२५॥<br><br>अथोत्तिष्ठ हृदा रामं भावयन् भक्तिभावितम् ।<br>अनुवर्तस्व राज्यादि भुञ्जन्प्रारब्धमन्वहम् ॥२६॥<br><br>भूतं भविष्यदभजन्वर्तमानमथाचरन् ।<br>विहरस्व यथान्यायं भवदोषैर्न लिप्यसे ॥२७॥<br><br>आज्ञापयति रामस्त्ववां यद्भातृः साम्परायिकम् ।<br>तत्कुरुष्व यथाशास्त्रं रुदतीश्चापि योषितः ॥२८॥<br><br>निवारय महाबुद्धे लङ्कां गच्छन्तु माचिरम् ।<br><br>श्रुत्वा यथावद्वचनं लक्ष्मणस्य विभीषणः ॥२९॥<br><br>त्यक्त्वा शोकं च मोहं च रामपार्श्वमुपागमत् ।<br>विमृश्य बुद्ध्या धर्मज्ञो धर्मार्थसहितं वचः ॥३०॥<br><br>रामस्यैवानुवृत्त्यर्थमुत्तरं पर्यभाषत ।<br>नृशंसमनृतं क्रूरं त्यक्तधर्मव्रतं प्रभो ॥३१॥<br><br>नार्होऽस्मि देव संस्कर्र्तुं परदाराभिमर्शिनम् ।<br><br>श्रुत्वा तद्वचनं प्रीतो रामो वचनमब्रवीत् ॥३२॥<br><br>मरणान्तानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम् ।<br>क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥३३॥ | सम्बन्ध छुटाकर उसे धीरे-धीरे अपने आत्मस्वरूप सर्वभूतान्तर्यामी परमेश्वर माया-मानवरूप भगवान् राममें स्थिर करो ॥२०–२१॥ (चित्तको) बाह्य विषयोंमें दोष दिखाकर उसे रामानन्दमें नियुक्त कर दो; ये माता, पिता, भ्राता, सुहृद् और स्नेहीजन तो देह-बुद्धिसे ही होते हैं ॥२२॥ जिस समय अपने विशुद्ध अन्तःकरणद्वारा मनुष्य आत्माको देहसे पृथक् जान लेता है उस समय कौन किसीका माता, पिता, भाई, बन्धु अथवा सुहृद् है ? ॥२३॥ ये स्त्री और गृह आदि, शब्दादि विषय, नाना प्रकारकी सम्पत्ति, बल, कोश, सेवकगण, राज्य, पृथिवी और पुत्रादि तो सदा मिथ्या ज्ञानके कारण ही उत्पन्न हुए हैं और अज्ञानजन्य होनेके कारण वे सब क्षणभङ्गुर हैं ॥२४-२५॥ अतः, अब खड़े हो जाओ और हृदयमें भक्ति-भावित भगवान् रामका स्मरण करते हुए निरन्तर प्रारब्ध भोगोंमें तत्पर हो राज्यादिका पालन करो ॥२६॥ भूत और भविष्यत्की चिन्ता न करते हुए तथा वर्तमानका अनुगमन करते हुए न्यायानुकूल आचरण करो । इससे तुम संसार-दोषसे लिप्त न होगे ॥२७॥ भगवान् राम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि अपने भाईका जो कुछ और्ध्वदेहिक कर्म हो वह सब शास्त्रानुसार करो और हे महाबुद्धे ! इन रोती हुई स्त्रियोंको यहाँसे अलग करो, ये सब लङ्कापुरीको जायँ । इसमें देरी न हो ।”<br><br>लक्ष्मणजीके यथार्थ वचन सुनकर विभीषण शोक और मोहको छोड़कर भगवान् रामके पास आये । धर्मज्ञ विभीषणने चित्तमें कुछ सोच-विचारकर श्रीरामचन्द्रजीका ही अनुवर्तन करनेके लिये यों धर्मार्थयुक्त उत्तर दिया—“प्रभो ! यह रावण बड़ा दुष्ट, मिथ्यावादी, क्रूर और समस्त धर्मव्रत आदिसे रहित था । हे देव ! इस परस्त्रीगामीका संस्कार करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ ।” उसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न होकर कहा—“भैया ! वैर तो मरनेतक ही होता है, सो अब हमारा काम हो चुका; अब तो यह जैसा तुम्हारा है वैसा ही मेरा है । अतः इसका संस्कार करो” ॥२८–३३॥
सर्ग १२] युद्धकाण्ड २९७
रामाज्ञां शिरसा धृत्वा शीघ्रमेव विभीषणः ।
सान्त्ववाक्यैर्महाबुद्धिं राज्ञीं मन्दोदरीं तदा ॥ ३४॥
सान्त्वयामास धर्मात्मा धर्मबुद्धिर्विभीषणः ।
त्वरयामास धर्मज्ञः संस्कारार्थं स्वबान्धवान् ॥ ३५॥
चित्यां निवेश्य विधिवत्पितृमेधविधानतः ।
आहिताग्नेर्यथा कार्यं रावणस्य विभीषणः ॥ ३६॥
तथैव सर्वमकरोद्वन्धुभिः सह मन्त्रिभिः ।
ददौ च पावकं तस्य विधियुक्तं विभीषणः ॥ ३७॥
स्नात्वा चैवार्द्रवस्त्रेण तिलान्दर्भामिमिश्रितान् ।
उदकेन च सम्मिश्रान्प्रदाय विधिपूर्वकम् ॥ ३८॥
प्रदाय चोदकं तस्मै मूर्ध्ना चैनं प्रणम्य च ।
ताः स्त्रियोऽनुनयामास सान्त्वमुक्तवा पुनःपुनः ३९
गम्यतामिति ताः सर्वा विविशुर्नगरं तदा ।
प्रविष्टासु च सर्वासु राक्षसीषु विभीषणः ॥ ४०॥
'रामपार्श्वमुपागत्य तदाऽतिष्ठद्विनीतवत् ।
रामोऽपि सह सैन्येन ससुग्रीवः सलक्ष्मणः ॥४१॥
हर्षं लेभे रिपून्हत्वा यथा वृत्रं शतक्रतुः ।
मातलिंश्च तदा रामं परिक्रम्याभिवन्द्य च ॥४२॥
अनुज्ञातश्च रामेण ययौ स्वर्गं विहायसा ।
ततो हृष्टमना रामो लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ॥४३॥
विभीषणाय मे लङ्काराज्यं दत्तं पुरैव हि ।
इदानीमपि गत्वा त्वं लङ्कामध्ये विभीषणम् ॥४४॥
अभिषेचय विप्रैश्च मन्त्रवद्विधिपूर्वकम् ।
इत्युक्तो लक्ष्मणस्तूर्णं जगाम सह वानरैः ॥४५॥
लङ्कां सुवर्णकलशैः समुद्रजलसंयुतैः ।
अभिषेकं शुभं चक्रे राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ॥४६॥
ततः पौरजनैः सार्धं नानोपायनपाणिभिः ।
विभीषणः ससौमित्रिरुपायनपुरस्कृतः ॥४७॥
दण्डप्रणाममकरोद्रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
३८
तब विभीषणने भगवान् रामकी आज्ञा शिरपर धारणकर तुरन्त ही शान्त वचनोंसे महाबुद्धिशालिनी रानी मन्दोदरीको ढाँढस बँधाया और तदनन्तर धर्मबुद्धि धर्मात्मा धर्मज्ञ विभीषणने अपने बन्धु-बान्धवोंसे संस्कारके लिये शीघ्रता करनेको कहा ॥ ३४-३५ ॥ विभीषणने पितृमेधकी विधिसे शवको विधिपूर्वक चितापर रक्खा और जिस प्रकार अग्निहोत्रीका होना चाहिये उसी प्रकार अपने बन्धु-बान्धवों और मन्त्रियोंके साथ मिलकर उन्होंने रावणके सब (अन्त्येष्टि) संस्कार किये । तत्पश्चात् विभीषणने उसे विधिवत् अग्निदान दिया ॥३६-३७॥ फिर स्नान कर गीले वस्त्रसे तिल और दूब मिले जलसे विधिवत् जलाञ्जलि दी ॥३८॥ तथा जलाञ्जलि देनेके अनन्तर पृथिवीपर शिर रखकर उसे प्रणाम किया और उन स्त्रियोंको बारम्बार सान्त्वनाके वचन कहकर ढाँढस बँधाया ॥३९॥ (और कहा कि) 'अब तुम जाओ।' तब वे सब लङ्कापुरीको चली गयीं । समस्त राक्षसिंयोंके नगरमें चले जानेपर विभीषण भगवान् रामके पास आकर अति विनीतभावसे खड़े हो गये । सेना, सुग्रीव और लक्ष्मणके सहित भगवान् रामको भी शत्रुओंका नाश कर चुकनेपर बड़ा आनन्द हुआ, जैसा कि वृत्रासुरको मारनेके अनन्तर इन्द्रको हुआ था ।
तदनन्तर, मातलिने श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम कर उनकी आज्ञा पा आकाश-मार्गसे स्वर्गलोकको चला गया । तब, श्रीरघुनाथजीने प्रसन्नचित्तसे श्रीलक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा—॥४०-४३॥ "मैंने तो पहले ही विभीषणको लङ्काका राज्य दे दिया है, तथापि तुम इस समय भी लङ्कामें जाकर विभीषणका ब्राह्मणोंके द्वारा मन्त्र-पाठपूर्वक विधिवत् अभिषेक कराओ ।" भगवान् रामकी ऐसी आज्ञा पा वानरोंके सहित श्रीलक्ष्मणजी तुरन्त ही लङ्कापुरीको गये तथा समुद्रके जलसे भरे हुए सुवर्ण-कलशोंसे महाबुद्धिमान् राक्षसराज विभीषणका मङ्गलमय अभिषेक किया ॥४४-४६॥
तब, पुरवासियोंके साथ हाथोंमें नाना प्रकारकी भेंटें लिये लक्ष्मणजीके सहित विभीषणने बहुत-सा उपहार आगे रख लीलाविहारी भगवान् रामको दण्डवत् प्रणाम किया। विभीषणको राज्य प्राप्त हुआ देख
२९८ अध्यात्मरामायण [सर्ग १२
रामो विभीषणं दृष्ट्वा प्राप्तराज्यं मुदान्वितः ॥४८॥
कृतकृत्यमिवात्मानममन्यत सहानुजः ।
सुग्रीवं च समालिङ्ग्य रामो वाक्यमथाब्रवीत्॥४९॥
सहायेन त्वया वीर जितो मे रावणो महान् ।
विभीषणोऽपि लङ्कायामभिषिक्तो मयानघ ॥५०॥
ततः प्राह हनूमन्तं पार्श्वस्थं विनयान्वितम् ।
विभीषणस्यानुमते गच्छ त्वं रावणालयम् ॥५१॥
जानक्यै सर्वमाख्याहि रावणस्य वधादिकम् ।
जानक्याः प्रतिवाक्यं मे शीघ्रमेव निवेदय ॥५२॥
एवमाज्ञापितो धीमान् रामेण पवनात्मजः ।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां पूज्यमानो निशाचरैः ॥५३॥
प्रविश्य रावणगृहं शिंशपामूलमाश्रिताम् ।
ददर्श जानकीं तत्र कृशां दीनामनिन्दिताम्॥५४॥
राक्षसीभिः परिवृतां ध्यायन्तीं राममेव हि ।
विनयावनतो भूत्वा प्रणम्य पवनात्मजः ॥५५॥
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रह्वो भक्त्याऽग्रतः स्थितः ।
तं दृष्ट्वा जानकी तूष्णीं स्थित्वा पूर्वस्मृतिं ययौ॥५६॥
ज्ञात्वा तं रामदूतं सा हर्षात्सौम्यमुखी बभौ ।
स तां सौम्यमुखीं दृष्ट्वा तस्यै पवननन्दनः ।
रामस्य भाषितं सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥५७॥
देवि रामः ससुग्रीवो विभीषणसहायवान् ।
कुशली वानराणां च सैन्यैश्च सहलक्ष्मणः ॥५८॥
रावणं ससुतं हत्वा सबलं सह मन्त्रिभिः ।
त्वामाह कुशलं रामो राज्ये कृत्वा विभीषणम्॥५९॥
श्रुत्वा भर्तुः प्रियं वाक्यं हर्षगद्गदया गिरा ।
किं ते प्रियं करोम्यद्य न पश्यामि जगत्त्रये ॥६०॥
समं ते प्रियवाक्यस्य रत्नान्याभरणानि च ।
एवमुक्तस्तु वैदेह्या प्रत्युवाच प्लवङ्गमः ॥६१॥
श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और भाई लक्ष्मणके सहित अपनेको कृतकृत्य-सा मानने लगे । तदनन्तर भगवान् रामने सुग्रीवको हृदयसे लगाकर कहा—॥४७-४९॥
"हे वीर ! तुम्हारी सहायतासे ही मैंने महाबली रावणको जीता है और हे अनघ ! (उसीसे) विभीषणको भी लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त किया है" ॥ ५० ॥ फिर, पास ही खड़े विनीतभावसे खड़े हुए हनुमान्जीसे कहा— "तुम विभीषणकी सम्मतिसे रावणके महलमें जाओ ॥५१॥ और जानकीजीको रावणके वध आदिका समस्त वृत्तान्त सुनाओ, फिर वह जो कुछ उत्तर दें वह मुझे सुनाना" ॥५२॥
बुद्धिमान् पवननन्दनने, भगवान् रामकी ऐसी आज्ञा पा राक्षसोंसे पूजित हो, लङ्कापुरीमें प्रवेश किया ॥५३॥ फिर रावणके महलमें जाकर शिंशपावृक्षके तले बैठी हुई अति दुर्बल और दुःखिता अनिन्दिता जनक-नन्दिनीको देखा ॥५४॥ वे राक्षसियोंसे घिरी हुई थीं और एकमात्र भगवान् रामका ही ध्यान कर रही थीं। पवनकुमारने अति विनयावनत होकर उन्हें प्रणाम किया ॥५५॥ और अत्यन्त नम्रतापूर्वक भक्तिभावसे हाथ जोड़-कर सामने खड़े हो गये। उन्हें देखकर जानकीजी (पहले तो कुछ देर) चुप रहीं, फिर उन्हें पूर्व-स्मृति हो आयी ॥५६॥ और उन्हें रामका दूत जानकर उनका मुख हर्षसे खिल गया। हनुमान्जीने उन्हें प्रसन्नमुखी देख उनसे रामका सारा सन्देश कहना आरम्भ किया ॥५७॥ (वे बोले—) "देवि ! विभीषण जिनके सहायक हैं वे श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सुग्रीव और वानर-सेनाके सहित कुशलपूर्वक हैं ॥ ५८ ॥ उन भगवान् रामने पुत्र, सेना और मन्त्रियोंके सहित रावणको मारकर तथा लंकाका राज्य विभीषणको देकर तुम्हें अपनी कुशल भेजी है" ॥ ५९ ॥
पतिको यह प्रिय सन्देश सुन श्रीसीताजी हर्षसे गद्गद वाणीसे बोलीं—"भैया, मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूँ ? तुम्हारे प्रिय वाक्योंके समान मुझे त्रिलोकीमें कोई रत्न-आभूषणादि भी दिखायी नहीं देते (जिन्हें देकर तुमसे उऋण होऊँ) ।" जानकीजीके
सर्ग १२] युद्धकाण्ड २९९
| रत्नौघाद्विविधाद्धापि देवराज्याद्विशिष्यते ।<br>हतशत्रुं विजयिनं रामं पश्यामि सुस्थिरम् ॥६२॥<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मैथिली प्राह मारुतिम् ।<br>सर्वे सौम्या गुणाः सौम्य त्वय्येव परिनिष्ठिताः ॥६३॥<br>रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रं मामाज्ञापयतु राघवः ।<br>तथेति तां नमस्कृत्य ययौ द्रष्टुं रघूत्तमम् ॥६४॥<br><br>जानक्या भाषितं सर्वं रामस्याग्रे न्यवेदयत् ।<br>यन्निमित्तोऽयमारम्भः कर्मणां च फलोदयः ॥६५॥<br>तां देवीं शोकसन्तप्तां द्रष्टुमर्हसि मैथिलीम् ।<br>एवमुक्तो हनुमता रामो ज्ञानवतां वरः ॥६६॥<br>मायासीतां परित्यक्तुं जानकीमनले स्थिताम् ।<br>आदातुं मनसा ध्यात्वा रामः प्राह विभीषणम् ॥६७॥<br>गच्छ राजन् जनकजामानयाशु ममान्तिकम् ।<br>स्नातां विरजवस्त्राढ्यां सर्वाभरणभूषिताम् ॥६८॥<br><br>विभीषणोऽपि तच्छ्रुत्वा जगाम सहमारुतिः ।<br>राक्षसीभिः सुवृद्धाभिः स्नापयित्वा तु मैथिलीम् ॥६९॥<br>सर्वाभरणसम्पन्नामारोप्य शिबिकोत्तमे ।<br>याष्टीकैर्बहुभिर्गुप्तां कञ्चुकोष्णीषिभिः शुभाम् ॥७०॥<br>तां द्रष्टुमागताः सर्वे वानरा जनकात्मजाम् ।<br>तान्वारयन्तो बहवः सर्वतो वेत्रपाणयः ॥७१॥<br>कोलाहलं प्रकुर्वन्तो रामपार्श्वमुपाययुः ।<br>दृष्ट्वा तां शिबिकारूढां दूरादथ रघूत्तमः ॥७२॥<br>विभीषण किमर्थं ते वानरान्वारयन्ति हि ।<br>पश्यन्तु वानराः सर्वे मैथिलीं मातरं यथा ॥७३॥ | इस प्रकार कहनेपर वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी बोले— ॥ ६०-६१ ॥ "मातः ! मैं शत्रुके नष्ट होनेपर स्वस्थ चित्तसे विराजमान विजयशाली श्रीरामका दर्शन करता हूँ—यह मेरे लिये नाना प्रकारकी रत्नराशि और देवराज्यसे भी बढ़कर है" ॥ ६२ ॥ उनके ये वचन सुनकर मिथिलेशकुमारीने मारुतिसे कहा—"हे सौम्य ! जितने शुभ गुण हैं वे सब तुम्हींमें वर्तमान हैं ॥ ६३ ॥ अब, मैं रघुनाथजीके दर्शन करूँगी, वे शीघ्र ही मुझे भी आज्ञा दें।" तब हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह उन्हें प्रणाम कर श्रीरघनाथजीके दर्शनोंके लिये चल दिये ॥ ६४ ॥<br><br>(वहाँ पहुँचकर) हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीके आगे जानकीजीका सारा सम्भाषण कह सुनाया (और कहा—) "भगवन् ! जिनके लिये यह युद्धादि सम्पूर्ण कर्म आरम्भ हुए थे और जो उन समस्त कर्मोंकी फलरूपा हैं, अब उन शोकसन्तप्ता मिथिलेशनन्दिनी देवी जानकीको आप देखिये।" हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् रामने माया-सीताको त्यागनेके लिये और अग्निस्थिता जानकीको ग्रहण करनेके लिये मनसे विचार करते हुए विभीषणसे कहा—॥ ६५-६७ ॥ "राजन् ! तुम जाओ और तुरन्त ही जानकीको स्नान करा शुद्ध निर्मल वस्त्र पहना तथा सम्पूर्ण आभूषणोंसे सुसज्जित कर मेरे पास ले आओ ॥ ६८ ॥"<br><br>यह सुनकर विभीषण हनुमान्जीको साथ ले तुरन्त ही चले और शुभलक्षणा जानकीजीको बड़ी-बूढ़ी राक्षसीयोंद्वारा स्नान करा, सम्पूर्ण वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित होनेपर एक सुन्दर पालकीपर चढ़ाया और फिर उन्हें, जामा-पगड़ी आदिसे बने-ठने बहुत-से छड़ीदारोंसे सुरक्षित कर ले चले ॥ ६९-७० ॥ उस समय सीताजीको देखनेके लिये सब वानर दौड़ आये। उन्हें चारों ओरसे रोकते तथा (हटो-हटो कहकर) बड़ा कोलाहल करते बहुत-से छड़ीदार रामचन्द्रजीके पास ले आये। रघुनाथजीने दूरसे ही सीताजीको पालकीपर चढ़ी देखकर कहा—॥ ७१-७२ ॥ "विभीषण ! तुम्हारे ये छड़ीदार वानरोंको क्यों रोकते हैं? समस्त वानरगण जानकीका माताके समान दर्शन करें |
३०० अध्यात्मरामायण [सर्ग १२
पादचारेण साऽऽयातु जानकी मम सन्निधिम् । श्रुत्वा तद्रामवचनं शिबिकादवरुह्य सा ॥ ७४॥ पादचारेण शनकैरागता रामसन्निधिम् । रामोऽपि दृष्ट्वा तां मायासीतां कार्यार्थनिर्मिताम् ७५ अवाच्यवादान्बहुशः प्राह तां रघुनन्दनः । अमृष्यमाणा सा सीता वचनं राघवोदितम् ॥ ७६॥ लक्ष्मणं प्राह मे शीघ्रं प्रज्वालय हुताशनम् । चिक्षिासार्थं हि रामस्य लोकानां प्रत्ययाय च ॥ ७७॥ राघवस्य मतं ज्ञात्वा लक्षमणोऽपि तदैव हि । महाकाष्ठचयं कृत्वा ज्वालयित्वा हुताशनम् ॥ ७८॥ रामपार्श्वमुपागम्य तस्थौ तूष्णीमरिन्दमः । ततः सीता परिक्रम्य राघवं भक्तिसंयुता ॥ ७९॥ पश्यतां सर्वलोकानां देवराक्षसयोषिताम् । प्रणम्य देवताभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यश्च मैथिली ॥ ८०॥ बद्धाञ्जलिपुटा चेदमुवाचाग्निसमीपगा । यथा मे हृदयं नित्यं नापसर्पति राघवात् ॥ ८१॥ तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः । एवमुक्त्वा तदा सीता परिक्रम्य हुताशनम् ॥ ८२॥ विवेश ज्वलनं दीप्तं निर्भयेन हृदा सती ॥ ८३॥
दृष्ट्वा ततो भूतगणाः ससिद्धाः सीतां महावह्निगतां भृशार्ताः । परस्परं प्राहुरहो स सीतां रामः श्रियं स्वां कथमत्यजज्ज्ञः ॥ ८४॥
॥७३॥ और जानकीजी मेरे पास पैदल चलकर आयें।" रामजीके ये वचन सुन श्रीसीताजी पालकीसे उतर पड़ीं और धीरे-धीरे पैदल ही श्रीरामचन्द्रजीके पास पहुँचीं । भगवान् रामने कार्यवश रची हुई माया-सीताको देखकर उनसे बहुत-सी न कहनेयोग्य (उनके चरित्रके विषयमें सन्देहयुक्त) बातें कहीं । श्रीरघुनाथजीद्वारा कहे हुए उन वाक्योंको सहन न कर सकनेके कारण सीताजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"भगवान् रामके विश्वासके लिये और लोगोंको निश्चय करानेके लिये तुम शीघ्र ही मेरे लिये अग्नि प्रज्वलित करो" ॥ ७४-७७ ॥ श्रीरघुनाथजीकी भी सम्मति समझकर शत्रुदमन लक्ष्मणजीने उसी समय बड़ा भारी काष्ठसमूह इकट्ठा किया और उसमें अग्नि प्रज्वलित कर चुपचाप रामजीके पास आकर खड़े हो गये। तब सीताजीने भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की ॥ ७८-७९ ॥ और फिर श्रीमिथिलेशकुमारीने समस्त लोकों तथा देव और राक्षसोंकी स्त्रियोंके देखते-देखते देवता और ब्राह्मणोंको नमस्कार कर अग्निके पास जा हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—"यदि मेरा हृदय श्रीरघुनाथजीको छोड़कर कभी अन्यत्र नहीं जाता तो समस्त लोकोंके साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें" ऐसा कह सतीशिरोमणि श्रीसीताजी अग्निकी परिक्रमा कर निर्भय-चित्तसे उस प्रज्वलित अग्निमें घुस गयीं ॥ ८०-८३ ॥
उस समय सीताजीको महा प्रचण्ड अग्निमें प्रविष्ट हुई देख समस्त सिद्ध और भूतगण अत्यन्त व्याकुल हो गये और आपसमें कहने लगे—"अहो ! सब कुछ जानते हुए भी श्रीरामचन्द्रजीने अपनी लक्ष्मी सीताजीको कैसे छोड़ दिया ?" ॥ ८४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
युद्धकाण्ड - सर्ग १३: देवताओंका स्तवन, अग्निदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान
सर्ग १३ ] युद्धकाण्ड ३०१
त्रयोदश सर्ग
देवताओंका भगवान् रामकी स्तुति करना, सीताजी सहित अग्निदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान।
श्रीमहादेव उवाच
ततः शक्रः सहस्राक्षो यमश्च वरुणस्तथा।
कुवेरश्च महातेजाः पिनाकी वृषवाहनः ॥ १ ॥
ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो मुनिभिः सिद्धचारणैः ।
पितरो ऋषयः साध्या गन्धर्वाप्सरसोरगाः ॥ २ ॥
एते चान्ये विमानाग्र्यैराजग्मुर्यत्र राघवः ।
अब्रुवन्परमात्मानं रामं प्राञ्जलयश्च ते ॥ ३ ॥
कर्ता त्वं सर्वलोकानां साक्षी विज्ञानविग्रहः ।
वसूनामष्टमोऽसि त्वं रुद्राणां शङ्करो भवान् ॥ ४ ॥
आदिकर्ताऽसि लोकानां ब्रह्मा त्वं चतुराननः।
अश्विनौ घ्राणभूतौ ते चक्षुषी चन्द्रभास्करौ ॥ ५ ॥
लोकानामादिरन्तोऽसि नित्य एकः सदोदितः।
सदा शुद्धः सदा बुद्धः सदा मुक्तोऽगुणोऽद्वयः॥ ६ ॥
त्वन्मायासंवृतानां त्वं भासि मानुषविग्रहः।
त्वन्नाम स्मरतां राम सदा भासि चिदात्मकः॥ ७ ॥
रावणेन हृतं स्थानमस्माकं तेजसा सह।
त्वयाऽद्य निहतो दुष्टः पुनः प्राप्तं पदं स्वकम् ॥ ८ ॥
एवं स्तुवत्सु देवेषु ब्रह्मा साक्षात्पितामहः ।
अब्रवीत्प्रणतो भूत्वा रामं सत्यपथे स्थितम् ॥ ९ ॥
ब्रह्मोवाच
वन्दे देवं विष्णुमशेषस्थितिहेतुं
त्वामध्यात्मज्ञानिभिरन्तर्हृदि भाव्यम् ।
हेयाहेयद्वन्द्वविहीनं परमेकं
सत्तामात्रं सर्वहृदिस्थं दृशिरूपम् ॥ १०॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! इसी समय सहस्राक्ष इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, महातेजस्वी वृषभवाहन महादेवजी, मुनि, सिद्ध और चारणोंके सहित ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी, पितृगण, ऋषि, साध्य, गन्धर्व, अप्सराएँ और नागगण ये सब तथा और भी अन्यान्य देवगण श्रेष्ठ विमानोंपर चढ़कर जहाँ श्रीरघुनाथजी थे आये। और वे सब हाथ जोड़कर परमात्मा श्रीरामसे बोले— ॥ १-३ ॥
"आप समस्त लोकोंके कर्ता, सबके साक्षी और विशुद्ध विज्ञानस्वरूप हैं; तथा वसुओंमें अष्टम वसु और रुद्रोंमें श्रीमहादेवजी हैं ॥ ४ ॥
आप ही समस्त लोकोंके आदिकर्ता चतुर्मुख ब्रह्माजी हैं, अश्विनीकुमार आपकी घ्राणेन्द्रिय हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं ॥ ५ ॥
सब लोकोंके आदि (उत्पत्तिस्थान) और अन्त (लयस्थान) आप ही हैं तथा आप नित्यस्वरूप, एक, सदोदित (आविर्भाव-तिरोभावसे रहित नित्यप्रकाशस्वरूप), नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, नित्यमुक्त, निर्गुण और अद्वितीय हैं ॥ ६ ॥
हे राम ! जो लोग आपकी मायासे आच्छादित हैं उन्हें आप मनुष्यरूप प्रतीत होते हैं, किन्तु जो आपका नामस्मरण करते हैं उन्हें तो आप सर्वदा चैतन्यस्वरूप ही भासते हैं॥ ७॥
रावणने हमारे तेजके सहित हमारा स्थान भी छीन लिया था, सो आज वह दुष्ट आपके हाथसे मारा गया और हमें फिर अपना पद प्राप्त हो गया ॥ ८ ॥
देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर साक्षात् पितामह ब्रह्माजी अति विनम्र होकर सत्यपथपर स्थित भगवान् रामसे बोले— ॥ ९ ॥
ब्रह्माजी बोले— ‘हे राम ! सम्पूर्ण प्राणियोंकी स्थितिके कारण, आत्मज्ञानियोंद्वारा हृदयमें ध्यान किये जानेवाले, त्याज्य और ग्राह्यरूप द्वन्द्वसे रहित, सबसे परे, अद्वितीय, सत्तामात्र, सबके हृदयमें विराजमान, साक्षीस्वरूप आप विष्णुभगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥ मोहहीन संन्यासीगण निश्चित बुद्धिके द्वारा