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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

६५ अकबर बीरबल विनोद

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६५ अकबर बीरबल विनोद

नवीन घटना थी, सुनकर बादशाह दंग हो गया । वह इस सौदागर को भलीभाँति जानता था, वह दिल्ली नगर का बहुत प्राचीन व्योपारी था । उसने अनेक अवसरों पर अपना तन धन लगाकर सरकारी सहायता की थी जिस कारण बाद- शाह को उसकी दशा पर बड़ी तर्श आई और उसकी रक्षा का भार स्वयं अपने शिर लिया । तत्क्षण साहूकार को घर जाने की आज्ञा देकर आप दीवानखाने में पहुँचे । बीरबल स्वागत के लिये अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बादशाह उसकी बगल में एक कुर्सी पर जा बैठे । दोनों में अन्तरंग गोष्ठी होने लगी । बादशाह बीरबल को दीनदयाल का सारा कच्चा चिट्ठा सुना कर बोला-"बीरबल ! इस साहूकार का न्याय ऐसी युक्ति से करो, जिसमें उसकी जान बचे और अन्याय भी न हो, मैं इसकी दैन्य दशा पर बड़ा चिन्तित हो रहा हूँ । बीरबल बोला-"पृथ्वीनाथ ! चिन्ता करने की कोई बात नहीं है आपकी आज्ञा का यथोचित पालन करूँगा । उधर वे बीरबल को समझा कर अपनी सभा में पहुँचे इधर बीरबल उसके छुट- कारे की तरकीब सोचने लगा । एकाएक उसका चेहरा प्रफु- ल्लित हो गया और फिर अपने कार्य में दत्तचित्त हुआ । उधर केशवदास मारवाड़ी को भी नींद नहीं आती थी, वह तो दीनदयाल के पीछे हाथ धोकर पड़ा हुआ था पाँच छः दिनों की मुहलत देकर फिर बादशाह की अदालत में दावा दायर किया-"शर्त के मुवाफिक अदालत दीनदयाल से उसके शरीर का एक सेर मांस दिलवा दे ।" बीरबल इस अभियोग ५

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का न्यायाधीश बनाया गया। वह बादशाह की आज्ञा स्वीकार करते हुए बोला-"पृथ्वीनाथ ! मैं यथाशीघ्र इसका न्याय करने का प्रयत्न करूँगा।" वह मारवाड़ी को एक ठौर बैठाकर दीनदयाल को बुलाने के लिये एक कर्मचारी को भेजा। जब आया तो उसे मारवाड़ी के सामने खड़ा कराकर बीरबल ने पूछा-"क्या तुम्हें अपना रुपया लेना मंजूर नहीं है? मारवाड़ी रुपया लेना नहीं चाहता था इससे साफ इनकार कर दिया। तब बीरबलने कहा-"मुझे काजी का फैसला शर्तनामे के बमूजिब स्वीकार है अतः मारवाड़ी को हुक्म देता हूँ कि सौदागर के शरीर से एक सेर माँस का टुकड़ा अपने हाथ से निकाल ले; परन्तु ध्यान रहे; अगर टुकड़ा जरा भी छोटा बड़ा हुआ कि वह सकुदुंब जान से मारा जावेगा। घर बार तथा उसका सारा कोष उसी अपराध के कारण जब्त कर लिया जायगा।" इस विज्ञप्ति से मारवाड़ी दहल गया और उससे कुछ उत्तर देते न बना। बीरबल उसे चुप देखकर जवाब के लिये बारबार उत्तेजित करने लगा। तब वह बोला- "दीवान जी ! मुझे माँस लेने की खाहिश नहीं है, मैं केवल पाँच लाख रुपये लेकर अपने मामले को उठा लेना चाहता हूँ, सूद भी छोड़े देता हूँ।" बीरबल ने कहा-"यह हरगिज नहीं हो सकता, तुम्हें मांस का टुकड़ाही लेना पड़ेगा, क्योंकि पहले तूँ साहूकार से रुपये लेना नामंजूर कर चुका है।" यदि तूँ शर्तनामें के अनुसार माँस न लेगा तो राजाज्ञा भंग करने के अपराध में तुझे सात लाख रुपये जरबाने लगेंगे। इस बार

६७ अकबर बीरबल विनोद

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६७ अकबर बीरबल विनोद

खूब सोच समझ कर उत्तर दो, दोनों बातों में किसे मंजूर करते हो और किसे नामंजूर ? मारवाड़ी गरदन नीची करके बोला-“दीवान जी ! मुझे कुछ भी नहीं चाहिये ।” बीरबल ने कहा-“जो तू अब कुछ भी नहीं लेना चाहता तो तुझे पहले की राजाज्ञा न मानने के अपराध में सात लाख रुपये दण्ड देने पड़ेंगे, और दूसरा अपराध यह है कि तू ने दीनदयाल को कष्ट पहुँचाने की नीयत से उसके शरीर का मांस काट लेने की शर्त करायी थी, इस कारण चार साल की सजा और भुगतनी पड़ेगी ।” मारवाड़ी का होश ठिकाने न रहा। राजदूत बीरबल की आज्ञा से उसे पकड़ लिये और वह उसी क्षण जेलखाने में बन्द कर दिया गया । मार- वाड़ी के घर वालों से सात लाख रुपये वसूल किये गये । बीरबल के इस न्याय को सुनकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और बीरबल के बुद्धि की प्रशंसा की । चूंकि दीनदयाल नेकनीयती कर पहले ही उसके पास रुपये भेज दिये था, इसलिये उसकी दूकान की प्रतिष्ठा रखने के लिये बादशाह ने उसको पारितोषिक देकर विदा किया। जो रुपये मारवाड़ी से दंड में लिये गये थे वह बीरबल को मिले ।

न स्त्री हैं न पुरुष

एक दिन बादशाह और उसके खोजे से आपस में कुछ बातें हो रही थीं, इसी बीच बीरबल की बात आई। तब

अकबर बीरबल विनोद ६८

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अकबर बीरबल विनोद ६८

खोजे ने बीरबल की बड़ी दुर्निन्द की। यह बादशाह का मुँहलगा खोजा था इसलिये खुलेआम उसकी अवहेलना करना उचित न समझकर प्रमाणों द्वारा मुहतोड़ उत्तर देना शुरू किया। वह बोले-“तुम स्वयं विचारकर देखो कि मेरे दर्बार में बीरबल सा हाजिर जवाब एक आदमी भी नहीं है।” खोजा बादशाह के मुख से बीरबल की प्रशंसा सुनकर मनही-मन भड़क उठा और बोला-“हुजूर यदि आप बीरबलको हाजिर जवाब बतलाते हैं तो वह मेरे तीन सवालों का जवाब दे। यदि ठीक २ उत्तर दे देगा तो मैं भी उसे श्रेष्ठ मान लूँगा। बादशाहने उससे सवाल पूछने को कहा। खोजा बोला-“(१) आकाश में तारों की कितनी संख्या है (२) दुनियाँ में स्त्री पुरुष अलग २ कितने हैं। (३) धरती अपना बीच कहाँ रखती है।” बादशाह खोजे को अपने पास बैठाकर बीरबल को बुलवाने के लिये सिपाही भेजा। जब वह आया तो उससे खोजे के तीनों सवालों का उत्तर माँगा। बीरबल चुपके बाजार से एक बड़ा मेढ़ा खरीद लाया और उसे बादशाह के सामने खड़ा कर बोला-“खोजा साहब ! इसके पीठ के बालों की गणना कर लेवें। इसके शरीर में जितने बाल हैं उतने ही आकाश में तारे भी हैं। फिर इधर उधर गोड़ से पड़ताल कर एक जगह जमीन में खूटी गाड़ कर बोला- “पृथ्वीनाथ ! पृथ्वी का मध्य यही है, यदि खोजे को यकीन न हो तो स्वयं नाप ले, जब पहले और तीसरे सवालों के बाद दूसरे की बारी आई तो बीरबल हँसा पड़ा परन्तु

६६ अकबर बीरबल विनोद

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६६ अकबर बीरबल विनोद अपना असली भाव छिपाकर उत्तर दिया- "गरीब परवर स्त्री पुरुषों की संख्या तो इन खोजों के कारण बिगड़ गई है क्योंकि ये न तो स्त्रियों की संख्या में आते हैं और न पुरुषों के ही। यदि सब खोजे जान से मरवा दिये जायें तो ठीक- ठीक गणना निकल सकती है।" खोजे का मुँह छोटा होगया। उसके मुँह से एक बात भी न निकली। बादशाह ने बहुत कुछ उसे भला बुरा सुनाया। बिचारा लाज का मारा, दुम दबाकर जनानखाने में चला गया। बादशाह ने बीरबल को पारितोषिक देकर बिदा किया। चार मूर्ख एक दिन मनोरंजन के समय बादशाह के मनमें यह बात आई- "संसार में मूर्खों की संख्या तो अमित है; परन्तु मैं ऐसे चार मूर्ख देखना चाहता हूँ जिनकी जोड़ के दूसरे न हों।" उसने बीरबल से कहा- "बीरबल ! चार मूर्ख इस ढंग के तलाश करो कि जिनकी जोड़ के दूसरे न मिलें।" वह बादशाह की आज्ञा मानकर नगर से बाहर निकला। ढूंढ़ने वालों को क्या नहीं मिल सकता, केवल सच्ची लगन होनी चाहिये। कुछ दूर जाकर बीरबल को एक आदमी दिखलाई पड़ा जो थाली में पान का एक जोड़ा बीड़ा और मिठाई लिये हुये बड़े उत्साह से नगर की तरफ जल्दी २ भागा जा रहा था।

अकबर बीरबल विनोद ७०

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अकबर बीरबल विनोद ७० बीरबल ने उस आदमी से पूछा—"क्यों साहब ! यह सब सामान कहाँ लिये जा रहे हो, जो आपका पैर खुशि- हाली के कारण जमीन पर नहीं पड़ता, आपके मर्म को जानने की मुझे बड़ी इच्छा है अतएव थोड़ा कष्ट कर बत- लाते जाइये ।" उस आदमी ने पहले तो इस ख्याल से कुछ हीला हवाली किया कि कहीं उचित समय पर पहुँचने में देर न हो जाय । परन्तु जब बीरबल ने उसे छेड़कर कई बार पूछा तो वह मटक कर बोला—"यद्यपि मुझे विलम्ब हो रहा है परन्तु आपके इतना आग्रह करने पर बतला देना भी जरूरी है । "मेरी औरत ने एक दूसरा खसम कर लिया है उससे उसे लड़का पैदा हुआ है, आज बरही है । मैं उसीका बधावा लिये हुए न्योते में जा रहा हूँ । बीरबल ने उसे अपना नाम बतला कर रोक लिया और बोला "तुझे मेरे साथ बादशाह के पास चलना पड़ेगा, जब मैं छुट्टी दूँगा तब जाना । वह बीरबल का नाम सुनकर डर गया और लाचार होकर उसके साथ हो लिया । वह उसको साथ में लेकर आगे बढ़ा, दैवयोग से रास्ते में एक घोड़ी सवार मिला । वह आप तो घोड़ी पर सवार था परन्तु अपने सिर पर घास का बण्डल ढो रहा था । बीरबल ने उससे पूछा—"क्यों भाई ! यह क्या मामला है, आप अपने सिर का बोझ घोड़ी पर लादकर क्यों नहीं ले जाते ?" उसने कहा—"गरीबपरवर ! इसका कारण यह है कि मेरी घोड़ी गर्भिणी है ऐसी दशा में उसपर इतना बोझ नहीं लादा जा सकता, मुझे ले जा रही है यही क्या कम गनीमत है ।

७१ अकबर बीरबल विनोद

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७१ अकबर बीरबल विनोद बीरबल इस घोड़ी सवार को भी अपने साथ ले लिया और दोनों को लिये दिये बादशाहके पास पहुँचा। तब बीरबल बोला—"पृथिवीनाथ ! चारों मूर्ख आपके सामने उपस्थित हैं।" बादशाह तो दो को ही देख रहा था अतएव बोला-"तीसरा मूर्ख कहाँ है?" बीरबल ने कहा-"तीसरा नम्बर हुजूर का है जो आपको ऐसे २ मूर्खों के देखने की इच्छा होती है। चौथा मूर्ख मैं हूँ जो उन्हें ढूंढकर आपके पास लाता हूँ।" बादशाह को बीरबल के ऐसे उत्तर से बड़ी प्रस- न्नता हुई और जब उन्हें उनकी मूर्खता का परिचय मिला तो खिलखिलाकर हँस पड़े।

बीरबल की चतुरता एक बार आश्विन के महीने में बीरबल बीमार पड़ा जिस कारण महीनों दर्बार में नहीं आया। एक दिन बादशाह को उसे देखने की इच्छा हुई। वह दो कर्म चारियों के साथ उसके मकान पर गया। बीरबल बादशाह को देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसका कुम्हिलाया हुआ हृदय- कमल कुछ खिल सा गया। ये आपस में बड़ी देर तक बार्तालाप करते रहे न बीरबल बादशाह को छोड़ना चाहता था और न बादशाह बीरबल को ही, बातचीत में कई घंटों का समय व्यतीत हो गया। इसी बीच बीरबल को पाखाना मालूम हुआ। ऐसी विवशता के कारण वह बादशाह से कुछ देर की मुहलत लेकर बगल की एक कोठरी में

अकबर बीरबल विनोद ७२

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पाखाना फिरने गया। इस बीच बादशाह के जी में बीरबल के बुद्धि-परीक्षा की बात समाई, उसने ख्याल किया कि बीरबल महीनों से बीमार है; शायद उसकी चतुरता में कुछ कमी पड़ गयी हो। जानना चाहिये कि अब यह कितना चतुर रह गया है। नौकरों द्वारा उसके पलँग के चारों पायों तले चार कागज के टुकड़े रखवा कर खामोश रहा। थोड़ी देर बाद बीरबल पाखाने से लौटकर आया और अपनी पलँग पर लेट रहा। बादशाह उसकी परीक्षा के अभिप्राय से इधर उधर की बातें छेड़कर उसे भुलावा देने लगा। बीरबल एक तरफ बादशाह की बातें सुनता जाता था दूसरी तरफ किसी चीज की खोज में व्यस्त था। वह ऊपर नीचे इस प्रकार से देख रहा था मानों किसी चीज का अनुसंधान कर रहा हो। बादशाह ने उसकी उसक पुसक का कारण पूछा। बीरबल ने कहा-"पृथिवीनाथ! जान पड़ता है कि यहाँ पर कुछ रद्दो बदल हो गया है? वे अनजान सा मुँह बनाकर बोले-"क्या रद्दो बदल हुआ है?" बीरबल ने उत्तर दिया-मुझे मालूम होता है कि या तो इस मकान की दीवाल कागज भर नीचे को दब गई है वा मेरी पलँग एक कागज ऊँची हो गई है। बादशाह ने कहा-"हाँ हाँ अक्सर देखा जाता है कि बीमारी की दशा में निर्बलता के कारण लोगोंके दिमागमें तुम्हारे समान ही फितूर आ जाता है परन्तु दरअसल में वह बात ठीक नहीं रहती।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ! ऐसा नहीं हो सकता, मैं बीमार हूँ तो मेरी बुद्धि बीमार नहीं है।" बादशाह बीरबल की

७३ अकबर बीरबल विनोद

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७३ अकबर बीरबल विनोद पहले ही सी चतुरता देखकर बड़ा प्रसन्न हुए और उससे असली भेद प्रकट कर दिया । —०:***:०— अपनी मनमानी दूँगा दिल्ली का एक नागरिक बड़ा सूम था। वह अपने परिश्रम और कृपणता के कारण रत्नों का एक बड़ा कोष संग्रह किये हुए था। वह उन रत्नों को एक ऐसी साधारण सन्दूक में छिपाकर रक्खे हुए था कि जिससे देखने वाले को उसमें रत्न होने का भ्रम न हो सके। उसका घर भी साधारण गृहस्थों के समान कच्चा और टूटा फूटा हुआ था। भला ऐसे भग्न मकान में रत्न होने की कौन संभावना कर सकता था ? दैवात एक दिन मध्य रात्रि में उसके घर में आग लगी । कंजूस उस आग को बुझाने की कोई तरकीब न देख कर कुछ साधारण वस्त्रों को लेकर घर से बाहर निकल आया । ये वस्त्र उसके रोजमर्रा के काम आने वाले थे । घर जलने की चिन्ता में विचारा कंजूस छाती पीट पीटकर रुदन करने लगा। उसके रोने का शब्द सुन और आग की लपट देखकर उसके अड़ोस पड़ोस के बहुतेरे आदमी एकत्र हो गये। उन आदमियोंमें एक लोहार भी था। लोहारने कंजूस को फटकारते हुए कहा-“इस साधारण झोपड़े के लिये तूँ इतना रुदन क्यों कर रहा है, इसमें तेरा कौन सा बड़ा नुकसान हो जायगा ?” सूम बोला-“भाई तू झोपड़ा जलता देखता है और मैं अपने रत्नों को जलते देख रहा हूँ; फिर तू

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ही बता कि क्यों कर न रोकूँ ।” लोहार ने कहा-“वह धन कहाँ और किस चीज़ में रक्खा हुआ है। तब सूमड़ा उँगली से बगल की एक कोठरी दिखलाते हुए बोला-“उसी कोठरी में एक काठ की पुरानी सन्दूक रक्खी हुई है जिसमें सात लाख के जवाहरात बन्द हैं।” लोहार ने कहा-“यदि मैं उन जवाहरातों को बाहर निकाल लाऊँगा तो अपने मन मानी तुझे दूँँगा और बाकी मैं लूँगा ।” सर्वस जाता देख कंजूस ने उसकी बात मान ली । लुहार अग्नि से बचने की तरकीब जानता था इसलिये उस जलती हुई आग में साहस कर कूद पड़ा और कोठरी में पहुँच कर उस सन्दूक को बाहर निकाल लाया । इस प्रकार पिटारी को अपनी बगल में रखकर अग्नि- काण्ड देखने लगा। थोड़ी देर बाद जब अग्नि का वेग घट गया और लोगों के हृदय में शान्ति आई तो पिटारी का मामला उपस्थित हुआ। जिस वक्त लोहार और कंजूस में ऐसी शर्तें तय पाई थीं उस समय लोहार ने एक और चालाकी की थी। उस जगह के दो मनुष्यों को अपना गवाह बना लिया था। गवाहों के सामने ही वह पिटारी खोली गई। पिटारी खुलते ही जवाहरातों की चमक बाहर तक फैल गई। जैसे धन देखकर गँवारों की दशा होती है वही दशा लुहार की भी हुई। उस अमुल्य रत्नों की ढेरी को देखकर उसका मन फिर गया। वह का सारा धन तो आप ले लिया और उस खाली को विचारे कंजूस के हवाले किया। कंजूस लुहार अनीति देखकर बहुत चकराया और गिडगिडा

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कर उससे कहने लगा- "भाई आधा धन मुझे दो और बाकी आधा आप ले लो, इसमें मेरी राजी है।" लुहार डाटकर बोला-"क्या पहले मेरे तेरे बीच ऐसी शर्ते पकी नहीं हुई थीं कि मैं तुझे अपनी मनमानी दूँगा ! अब चों चप्पड़ क्यों करता है?" दोनों में वाता विवाद होते होते सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत होगई और सूर्योदय का समय आया । सूमड़ा आधा रत्नोंको पानेकेलिये बहुतेरा प्रयास किया परन्तु लुहार उसकी एक भी सुनने को तय्यार नहीं था सूमड़े ने लाचार होकर बादशाह के पास अर्जी गुजारी । मामला पेचीला देखकर वादशाहने बीरबलको बुलाया और उनका सारा हाल सुनाकर उसे न्याय करने की आज्ञा दी । बादशाह की आज्ञा सिरोधार्य कर बीरबल ने उन दोनों से अलग अलग बयान लिया, और उन बयानों को पृथक पृथक दो कागजों पर लिखकर उस पर उनके हस्ताक्षर कराये । फिर उन दोनों से बारी बारी शाक्षी लेकर प्रमाणित कराया कि उनका कहना बिल्कुल सत्य और उन्हें मान्य है। तब बीरबल ने पहले पहल लुहार से पूछा-"तुमको इसमें से क्या क्या लेना मंजूर है?" लोहार बोला-"मेरी इच्छा जवाहरात लेने की है।" बीरबल ने तुरत निर्णय कर दिया-"तू जवाहरात इस कंजूस को दे दे और स्वयं खाली पिटारी ले ले।" यह निर्णय सुनकर लोहार ने शर्तनामें की तरफ इशारा किया । बीरबल बोला- : "तूँ पहले ही अपनी शर्तों में लिख चुका है-"मैं अपनी मन मानी दूँगा।" तो तेरे मन में जवाहरात लेने का है अतएव तेरी

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अकबर बीरबल विनोद ७१ जबान से ही निर्णय हो गया । अब जवाहरातों को इसे देकर आप खाली पिटारी लेकर चला जा । इस प्रकार लुहार के हाथ खाली पिटारी लगी और कंजूस सानन्द जवाहरातों को लेकर घर लौटा ।

बीरबल और मदिरा

दरबार के समय में बादशाह को गप्प लड़ाने का मौका नहीं मिलता था इसकारण जनाने महल में ही गप लड़ा लिया करता था और इसी समय में आपस की गोष्ठी भी हो जाया करती थी। यह बात सब पर विदित थी जिस कारण बीरबल को जनाने महल में जाने की कोई मना ही नहीं थी। जब वार्तालाप करके बादशाह संतुष्ट हो जाता तो एक ऐसी नशीली चीज का सेवन करलेता जिससे कुछ समय पश्चात उसका चेहरा बदल जाता और बातें भी और की तौर करने लगता था। बीरबल नित्य बादशाह की ऐसी दशा देखा करता; परन्तु उसकी समझ में न आता कि दरअसल वह किस वस्तु का सेवन करता है। उस चीज के सेवन से बादशाह की स्मरणशक्ति बदल जाती । ऐसी दशा में बादशाह अनेक भूलें भी कर डालता था । एक दिन बीरबल के मन में उस वस्तु की जानकारी प्राप्त करने की सूझी। वह बीमारी का बहाना कर कई दिनों तक दरबार में नहीं आया। बादशाह ने एक दो दिन तो यह समझ कर कि साधारण बीमारी होगी, उसकी कुछ

७७ अकबर बीरबल विनोद

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७७ अकबर बीरबल विनोद खोज खबर न ली। परन्तु जब सोचते सोचते तीन चार दिनों का अरसा बीता और वह नहीं आया तो उन्हें बीरबल को देखने की इच्छा हुई। वे अपने चन्द सिपाहियों के साथ बीरबल के मकान पर गये। जब उसे बादशाहके आगमन की सूचना मिली तो झट दूसरे दरवाजे से होकर बाहर निकल गया और लोगों की आंख बचाकर सीधे दरबार में जा पहुँचा। गुप्त मार्ग से जनाने महल में पहुँचकर उस नशीली चीज की तलाश करने लगा। जब बाहर उसका सुराख न लगा तो बक्स की तालीके फिराक में पड़ा, दैवात ताली मिल गई, वह एक कोने में अच्छी तरह छिपाकर रक्खी हुई थी। बक्स का ताला खोलकर उसके अन्दर की चीजों को देखा। एक तरफ कोने में एक बोतल रक्खी हुई मिली, उसे चुपके से बाहर निकाल कर अपनी शाल के अन्दर छिपा लिया और द्रुत वेग से घर की तरफ राही हुआ। बादशाह को उसके घर वालों से पूछने पर विदित हुआ. "थोड़ी देर हुआ दरबार की तरफ गये हैं।" यह सुनकर उसको कुछ चिन्ता सी हुई और बीरबल के जाने का कारण जानने के लिये व्याकुल हो उठा। मनमें सोचा-"बिना किसी अनिवार्य कारणके बीरबल ऐसी दशामें नहीं जा सकता था। वह अपने साथियों सहित लौटने लगा। अभी दो चार सीढ़ी ही उतर कर गया था कि सामने से बीरबल आता हुआ दिखाई पड़ा। बीरबल मनहीं मन सोचता हुआ आरहा था कि बादशाह के पूछने पर क्या उत्तर दूँगा। इसी बीच बादशाह की दृष्टि उसपर जो पड़ी और वह वहीं रुक गया। पास

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अकबर बीरबल विनोद पहुँचकर बादशाह ने पूछा- "तुम इस समय महल की तरफ क्यों गये थे और तुम्हारे बगलमें यह क्या चीज है।" बीरबल ने कहा-"कुछ तो नहीं।" फिर भी बादशाह का शक ब- ही रहा क्योंकि उसकी काख तले चदरे के भीतर से कोई चीज दिखाई पड़ रही थी। बादशाह ने दुबारा पूछा- "बीरबल ! झूठा क्यों बोल रहा है, तुम्हारी काख के भीतर कोई चीज अवश्य छिपी हुई है।" बीरबल ने कहा- "हाँ वह तोता है।" बीरबल के ऐसे रूखे उत्तर से बादशाह को सन्तोष नहीं हुआ और क्रोधित होकर बोला- "तुम्हें आज इतना मजाक क्यों सूझी है।" बीरबल अविलम्ब बोला- "पृथ्वीनाथ ! अश्व है।" बादशाह बड़ा हैरान हुआ और भौंह चढ़ाकर कहा- "मैं देखता हूँ कि आज तुम्हारा दिमाग आसमान पर चढ़ता जा रहा है।" बीरबल ने कहा- "नहीं नहीं हाथी है।" बादशाह ने कहा- "क्या तुमने भाँग तो नहीं खाई है, ठीक ठीक समझ कर उत्तर दो।" बीरबल कब चुप रहने वाला था बोला- "गधा है, गधा।" बारंबार बीरबल के टालमटोल की बातें सुनकर बादशाह बहुत ही चिढ़ गया और पूछा- "क्या आज तुमपर मृत्यु तो नहीं सवार हो गई है, काँख में की छिपी वस्तु का नाम ठीक ठीक क्यों नहीं बतलाते हो ?" इस बार बीरबल ने साफ बतला दिया-हुजूर ! शराब है !" फिर अपनी बगल से बोतल निकाल कर बादशाह के हवाले किया। बीरबल ऐसे धर्म परायण ब्राह्मण के पास शराब की बोतल देखकर बादशाह को आश्चर्य हुआ और उसका कोप कुछ शान्त हो गया। वह बीरबल को अपने साथ जनाने महल में लिवा

७६ अकबर बीरबल विनोद

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७६ अकबर बीरबल विनोद ले गया। वहाँ जाकर देखा तो उसके कमरे की सारी चीजें इधर उधर बिखरी पड़ी हैं, सन्दूक काताला भी खुला हुआ है। बादशाह तुरत ताड़ गया कि इसी को चुराने के लिये बीर- बल अकेले में यहाँ आया था, परन्तु फिर भी इतने ही से उसे शान्ति न मिली। उसने विचारा कि यह तो हुई यहाँ की बात, रास्ते में बीरबल अंटसंट क्यों बतलाता था ? तब वह बोला-“बीरबल ! मालूम होता है आज तुम कुछ नशा खा गये हो; नहीं तो ऐसी ऊटपटांग बातें कभी न करते। तुम्हारी काँख तले शराब की बोतल मौजूद थी फिर भी तुमने उसे बैल, गदहा आदि आदि कैसे बतलाया ।” बीरबल को अपना राज बादशाह पर खोलने का मौका मिल गया और उसे इस ढंग से प्रगट करना प्रारम्भ किया-“पृथिवीनाथ ! न तो मैं नशा खाये हूँ और न मेरी बुद्धि ही भ्रष्ट हुई है, मैंने जो कुछ भी कहा है वह मेरे काँख तले थी।”-“अच्छा हुजूर सुनिये-“पहले पहल मैंने आप से बतलाया था कि कुछ भी नहीं है, सो मद्यपान के प्रथम प्याले की बात थी, उस समय बात करनेवाला कुछ भी नहीं देखता। दूसरी बार मेरी जबान पर तोते का नाम आपने सुना होगा। इसका अभिप्राय यह था कि दूसरा प्याला पीलेनेपर मनुष्य तोते के समान बकने लगता है। फिर मैंने घोड़े का नाम लिया था। उसके मानी यह था कि तीसरा प्याला पी चुकने पर मद्यपी घोड़े के समान हिनहिनाना प्रारम्भ कर देता है। चौथी बार हाथी बतलाया था। सो इस कारण कि चौथे प्याले के सेवन के पश्चात् मद्यपी मस्त

अकबर बीरबल विनोद ८०

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अकबर बीरबल विनोद ८० हाथी की तरह झूमना प्रारम्भ करता है। पाँचवीं बार गधा बना देता है। छठवें में मद्यपी नशे में गुप्त हो जाता है, यहाँ तक कि उसको अपने शरीर तक की भी सुधि बुध नहीं रहती। यही कारण था कि अन्त में मैंने शराब का नाम लिया था।" एक बोतल में केवल छः प्याला शराब रहती है। प्रत्येक प्याला सेवन के पश्चात् मनुष्य की पृथक पृथक दशाएँ हो जाती हैं। बादशाह बीरबल की इन बातों को बड़े ध्यान पूर्वक सुन रहा था कारण कि उसे इस बात का पहले ही से विश्वास था कि बीरबल जो कुछ भी कहे वा करेगा उसके अच्छे के लिये ही। बीरबल का अभिप्राय भी बादशाह का मद्य पान छुड़ाना ही था। उस की इस शुभ कांक्षा से बादशाह बड़ा हर्षित हुआ और उसे उचित पुरस्कार देकर बिदा किया। शिर के बाल मुड़वा दूँगा। दिल्ली नगर में एक बड़े सुप्रतिष्ठित और विद्वान ब्राह्मण रहते थे, उनके श्रेष्ठाचरण से दरबार में उनका बड़ा सम्मान था। पंडित जी का स्वभाव था कि वे बिना समझे बूझे किसी कार्य्य में हाथ नहीं डालते थे और जिस बात को मुख से एक बार कह देते उसको प्राणप्रण से पालन करते थे। उनसे उनका भृत्य समुदाय सदा भयभीत रहता। एक दिन ऐसी घटना घटी, जब उक्त पंडित जी चौके में

८१ अकबर बीरबल विनोद

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८१ अकबर बीरबल विनोद में बैठकर भोजन कर रहे थे। उनकी थाली में परोसे खाद्य पदार्थ में एक बाल निकला जिसकारण पंडितजी को बड़ा रंज हुआ और अपनी स्त्रीको संबोधित कर बोले-"देखो ! आज तो मैं तुम्हारी पहली चूकके कारण तुम्हें क्षमा करता हूँ परन्तु फिर यदि ऐसी असावधानी करोगी (खाद्य पदार्थ में बाल निकलेगा) तो तुम्हारे शिर के बाल मूड़ लूँगा।" "हरि इच्छा भावी बलवाना।" यद्यपि बिचारी स्त्री अपने स्वामी का जिद्दी स्वभाव समझ कर बराबर भयभीत रहा करती थी और भोजन बनाने वा परोसने के समय अपने बालों को खूब सम्भार कर बाँधे रहती थी, परन्तु होनी को कौन रोक सकता है, वह तो होकर ही रहती है। कुछ दिनोपरान्त एक दिन जब युक्त पंडितजी फिर भोजन करने बैठे तो उनकी खाद्यसामग्री में एक बाल निकला, पंडितजी बहुत नाराज हुए और अपने स्त्री का बाल मुड़ा देने के लिये नाई को बुलवाया। अपने स्वामी को नितान्त क्रोधित देखकर स्त्री ने भीतर से किवाड़ बन्द कर लिया। पंडित जी ने हजार हूँ डाट फटकार सुनाई परन्तु स्त्री ने किवाड़ नहीं ही खोला। इतना सब होजाने पर भी पंडित जी अपनी जिद्द पर तुले ही रहे। स्त्री ने सोचा "अब इस प्रकार काम चलना कठिन दीख पड़ता है, कोई उपाय तत्काल करनी चाहिये। उसने एक आदमी को पोहर भेजकर अपने भाइयों को सहायता के लिये बुलवाया। उसके चार भाई थे, अपनी बहिन को इस प्रकार अपमानित होते सुन उन्हें अपने बहनोई के हठवादिता पर बड़ा खेद हुआ और उसके उद्धार का उपाय सोचने लगे। इतने में उसके बड़े ३

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अकबर बीरबल बिनोद ८२

भाई को बीरबल से पुराना परिचय होने का स्मरण हो आया । वह तत्क्षण बहन के उद्धार का उपाय पूछने के लिये बीरबल के घर पहुँचा । उस समय बीरबल चारपाई पर पड़े २ पुस्तक पढ़ रहा था, अपने मित्र का सन्देशा सुन उसे पास बुलाकर उसका कुशल समाचार पूछा । वह अपने बहिन की दुर्दशा का आद्योपान्त कारण बतलाकर बोला- "मैं आपसे अपने बहिन के उद्धार की तरकीब बूझने आया हूँ । मेरी मदद कीजिये ।” बीरबल बोला—"तुम चारो भाई नंगे सिर होकर अपने बहनोई के पास इस ढंग से जावो मानो कोई मर गया हो; तब तक मैं भी आ पहुँचता हूँ। उधर पंडितजी स्त्री के द्वार न खोलने पर क्रुद्ध होकर नौकरों से कहा- "अभी बढ़ई को बुला लाकर दरवाजे को तोड़ डालो। इसी बीच वे चारो भी नंगधड़ंग सिर खोले आ पहुँचे। इनके आनेके थोड़ी देर पश्चात बीरबल भी शवदाह का सब सामान लिये हुए आया और पंडितजी के ऐन द्वार पर टिकठी बाँधने लगा। उधर स्त्री के भाइयों ने पंडितजी को जबरन चारोतरफ से कपड़े से ढक कर कफनि- याना प्रारम्भ किया, जब पंडितजी ने चींचप्पड़ मचाया तो वे क्रोधित होकर बोले-“खबरदार ! चुपचाप पड़े रहो, बिना पहले तुम्हें कफनियाये किसकी मजाल है जो मेरी बहन को हाथ लगाये।” वे पंडितजी को बाँध कर बीरबल के पास ले गये। इस नवीन कौतूहल को देखने के लिये वहाँ पर आदमियों की जमघट सी लग रही थी । अपने पड़ोसियों के सामने अपनी ऐसी दुर्गति देख पंडितजी का शिर लज्जा के बोझ से दब गया और अपनी रिहाई के लिये चारो सालों से अनुनय

८३ अकबर बीरबल विनोद

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८३ अकबर बीरबल विनोद

विनय करने लगे। उसकी स्त्री समीप की कोठरी से छिपकर सारी दुर्दशाएँ देख रही थी, पति को भाइयों से गिड़गिड़ाते देख उसे दया आ गई और उसका पवित्र हृदय धर्म-सागर में गोते मारने लगा। स्त्री ने कहा-“चाहे जो हो, मैं पति की ऐसी दुर्दशा अपनी आँखों नहीं देख सकती। वह मेरा देवता है, उसके कोप करने से मेरा सर्वनाश हो जायगा। पतिकी हँसी कराकर कुल्टाएँ भलेही प्रसन्न हो सकती हैं; परन्तु पतिपरायणा नहीं। वह कपाट खोलकर बाहर आई और अपने भाइयों से उसे छोड़ देने का आग्रह करने लगी। भाइयों को बहन कहने पर अमल न करते देख बीरबल स्वयं उनसे क्षमा- प्रार्थी हुआ और उसके पति को छोड़ देने की आज्ञा दी। पण्डितजी छोड़ दिये गये। अन्त में उन्हें अपनी हठधर्मी पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। इस स्वाँग से बीरबल का अभिप्राय था कि पति के जीवितावस्था में स्त्री का मुंडन नहीं हो सकता था। पहले पति मर ले तो स्त्री का मुंडन किया जाय। बीरबल पंडितजी को छोड़वा और उनकी स्त्री का कष्ट निवारण कर लौट गया। चारो भाई अपनी बहन के घर मिहमानी करने के लिये टिकरहे। धन्य है हमारी उन भारत ललनाओं को जो आने पर कठिन संकट उठा कर भी पतिव्रत की रक्षा करती हैं। ऐ देवियों ! पति से कष्ट उठाकर भी पति सेवा करना तेरा ही काम है! अपने पति को कष्ट में देख; भला तुम कैसे सहन कर सकती हो। पति को ईश्वर तुल्य मानकर पूजन करने वाली संसार प्रसिद्ध एक मात्र भारतललना ही है।

अकबर बीरबल विनोद

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अकबर बीरबल विनोद ८४ संदेह की निवृत्ति एक दिन बीरबल और बादशाह में बहुत देर तक वार्ता- लाप होने पर भी उसबीच कोई हँसीकी बात नहीं आई, जिस कारण बादशाह ने अपने मनमें सोचा-“कुछ नहीं, बीरबल स्वाभाविक बुद्धिमान नहीं है, बल्कि इधर उधरसे कुछ व्योहार की बातें संग्रह कर बुद्धिमान बन बैठा है। एक स्वाभाविक बुद्धिमान को इतने देर की बार्तालाप में हास्यरस लादेना कोई बड़ी बात न थी। अगर वह ऐसा किये होता तो वार्तालाप के साथ ही साथ मेरा मनोरंजन भी हो जाता। ऐसे मूर्ख को अपने पास रखने से कोई लाभ नहीं है।” मनमें ऐसी दृढ़ धारणा बनाकर वह प्रकट रूप से बोला-“बीरबल ! आज मुझे तेरी बुद्धि काथाह लग गया ।” बीरबल उड़ती चिड़िया का दुम पहचानने वाला व्यक्ति था । इतने ही उद्गार से उसे निश्चित हो गया कि बादशाह मनोरंजन चाहता था जो उसको अभी तक नहीं मिला। उसकी बात काटकर बोला-“पृथ्वीनाथ ! अब मेरे शरीर में आपको बुद्धिका लेशमात्र भी नहीं दिखाई पड़ेगा, आप उसे क्योंकर देख सकेंगे। मेरी बुद्धिका निवासस्थान तो एकमात्र मेरा दिमाग है । यदि आप उसे देखने के लिये अकुला रहे हों तो आपकी मंशा पूरी हो जायगी, केवल पहले सा पागल बन जाइये । इतना सुनते ही बादशाह का भ्रम निवारण हो गया, वे संगति के प्रभाव से बहुत कुछ सुधर गये थे। वह उसकें प्रति दुर्बुद्धि का प्रयोग करना उचित न समझ कर चुप हो गये।