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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

तृतीय खण्ड


आदित्यदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति । उद्यꣳस्तमोभयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥

इसके अनन्तर अधिदैवत उपासनाका वर्णन किया जाता है—जो कि वह [आदित्य] तपता है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये। यह उदित होकर प्रजाओंके लिये उद्गान करता है, उदित होकर अन्धकार और भयका नाश करता है। जो इस प्रकार इसको जानता [इसकी उपासना करता] है वह निश्चय ही अन्धकार और भयका नाश करनेवाला होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथानन्तरमधिदैवतं देवताविषयमुद्गीथोपासनं प्रस्तुतमित्यर्थः अनेकधोपास्यत्वादुद्गीथस्य। य एवासावादित्यस्तपति तमुद्गीथमुपासीतादित्यदृष्ट्योद्गीथमुपासीतेत्यर्थः । तमुद्गीथमित्युद्गीथशब्दोऽक्षरवाची सन्कथमादित्ये वर्तते ? इत्युच्यते—इसके अनन्तर अधिदैवत अर्थात् देवताविषयक उद्गीथोपासनाका आरम्भ किया जाता है, क्योंकि उद्गीथ अनेक प्रकारसे उपासनीय है। जो कि यह आदित्य तपता है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे; अर्थात आदित्य-दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना करे। 'तमुद्गीथम्' इसमें 'उद्गीथ' शब्द अक्षरवाचक होता हुआ किस प्रकार आदित्यमें संगत होता है? यह बतलाया जाता है—

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५


| उद्यन्नुद्गच्छन्वा एष प्रजाभ्यः प्रजार्थमुद्गायति प्रजानामन्नोत्पत्त्यर्थम् । न ह्यनुद्यति तस्मिन् व्रीह्यादेर्निष्पत्तिः स्यादत उद्गायतीवोद्गायति, यथैवोद्गातान्नार्थम् । अत उद्गीथः सवितेत्यर्थः । <br><br> किं चोद्यन्नैशं तमस्तज्जं च भयं प्राणिनामपहन्ति तमेवंगुणं सवितारं यो वेद सोऽपहन्ता नाशयिता ह वै भयस्य जन्ममरणादिलक्षणस्य आत्मनस्तमसश्च तत्कारणस्य अज्ञानलक्षणस्य भवति ॥ १ ॥ | यह [आदित्य] उदित होता हुआ—ऊपरकी ओर जाता हुआ प्रजाके लिये—प्रजाओंके अन्नकी उत्पत्तिके लिये उद्गान करता है, क्योंकि उसके उदित न होनेपर व्रीहि आदिकी निष्पत्ति नहीं हो सकती; अतः जिस प्रकार उद्गाता अन्नके लिये उद्गान करता है, उसी प्रकार वह उद्गान करनेके समान उद्गान करता है। अतः सूर्य उद्गीथ है—यह इसका तात्पर्य है। <br><br> इसके सिवा, वह उदित होकर रात्रिके अन्धकार और उससे होनेवाले प्राणियोंके भयका भी नाश करता है। जो इस प्रकारके गुणसे युक्त सविताकी उपासना करता है, वह जन्म-मरणादिरूप आत्माके भय और अन्धकारका अर्थात् उसके कारणभूत अज्ञानका नाश करनेवाला होता है ॥ १ ॥ |


सूर्य और प्राणकी समानता तथा प्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना

| यद्यपि स्थानभेदात्प्राणादित्यौ भिन्नाविव लक्ष्येते तथापि न स तत्त्वभेदस्तयोः, कथम् ? | यद्यपि स्थानभेदके कारण प्राण और आदित्य भिन्न-से दिखायी देते हैं, तथापि वह उनका तात्त्विक भेद नहीं है। किस प्रकार ? [ यह बतलाते हैं— ] |

६६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १

६६ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय १


समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयममुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥

यह [प्राण] और [सूर्य] परस्पर समान ही हैं। यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है। इस [प्राण] को 'स्वर' ऐसा कहते हैं और उस [सूर्य] को 'स्वर' एवं प्रत्यास्वर' ऐसा कहते हैं। अतः इस [प्राण] और उस [सूर्य] रूपसे उद्गीथकी उपासना करे ॥ २ ॥

| समान उ एव तुल्य एव प्राणः सवित्रा गुणतः, सविता च प्राणेन। यस्मादुष्णोऽयं प्राण उष्णश्चासौ सविता किं च स्वर इतीमं प्राणमाचक्षते कथयन्ति, तथा स्वर इति प्रत्यास्वर इति चामुं सवितारम्। यस्मात्प्राणः स्वरत्येव न पुनर्मृतः प्रत्यागच्छति, सविता त्वस्तमित्वा पुनरप्यहन्यहनि प्रत्यागच्छति; अतः प्रत्यास्वरः। अस्माद्गुणतो नामतश्च समानावितरेतरं प्राणादित्यौ। अतः तत्त्वाभेदादेतं प्राणमिमममुं चादित्यमुद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ | गुणदृष्टिसे प्राण सूर्यके सदृश ही है तथा सूर्य प्राणके सदृश है, क्योंकि यह प्राण उष्ण है और वह सूर्य भी उष्ण है तथा इस प्राणको 'स्वर' ऐसा कहकर पुकारते हैं और उस सूर्यको भी 'स्वर' एवं 'प्रत्यास्वर' ऐसा कहते हैं, क्योंकि प्राण तो केवल स्वररण (गमन) ही करता है—मरनेके पश्चात् वह पुनः लौटता नहीं; किंतु सूर्य प्रतिदिन अस्तमित हो-होकर लौट आता है, इसलिये वह प्रत्यास्वर है। इस प्रकार गुण और नामसे भी ये प्राण और आदित्य एक-दूसरेके तुल्य ही हैं। अतः तत्त्वतः अभेद होनेके कारण इस प्राण और उस सूर्यरूपसे उद्गीथकी (उद्गीथावयवभूत ओंकारकी) उपासना करे ॥ २ ॥ |

—: ० :—

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


व्यानदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानः। अथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः स वाक्। तस्मादप्राणन्नपानन्वाचमभिव्याहरति ॥ ३ ॥

तदनन्तर दूसरे प्रकारसे [अध्यात्मोपासना कही जाती है—] व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करे। पुरुष जो प्राणन करता है (मुख या नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है) वह प्राण है और जो अपश्वास लेता है (वायुको भीतरकी ओर खींचता है) वह अपान है। तथा प्राण और अपानकी जो सन्धि है वही व्यान है। जो व्यान है वही वाक् है। इसीसे पुरुष प्राण और अपान क्रिया न करते हुए ही वाणी बोलता है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथ खल्विति प्रकारान्तरेणोपासनमुद्गीथस्योच्यते; व्यानमेव वक्ष्यमाणलक्षणं प्राणस्यैव वृत्तिविशेषमुद्गीथमुपासीत। अधुना तस्य तत्त्वं निरूप्यते—यद्वै पुरुषः प्राणिति मुखनासिकाभ्यां वायुं बहिर्निःसारयति, स प्राणाख्यो वायोर्वृत्तिविशेषः, यदपानित्यपश्वसिति ताभ्यामेवान्तराकर्षति वायुं सोऽपानोऽपानाख्या वृत्तिः।‘अथ खलु’—अब प्रकारान्तरसे उद्गीथकी उपासना कही जाती है। प्राणका ही वृत्तिविशेष जो आगे कहे जानेवाले लक्षणोंसे युक्त व्यान है, उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे। अब उसके तत्त्वका निरूपण किया जाता है। पुरुष जो प्राणन करता है अर्थात् मुख और नासिकाद्वारा वायुको बाहर निकालता है, वह वायुका प्राण नामक वृत्तिविशेष है; तथा वह जो अपश्वास करता है, अर्थात् उन (मुख और नासिका) के ही द्वारा वायुको भीतर खींचता है वह उसकी अपानसंज्ञक वृत्ति है।

छा० उ० ३—

६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| ततः किम्? इत्युच्यते—अथ य उक्तलक्षणयोः प्राणापानयोः सन्धिस्तयोरन्तरा वृत्तिविशेषः, स व्यानः; यः सांख्यादिशास्त्रप्रसिद्धः श्रुत्या विशेषनिरूपणान्नासौ व्यान इत्यभिप्रायः । | इससे क्या सिद्ध हुआ ? यह बतलाया जाता है—उन उपर्युक्त लक्षणवाले प्राण और अपानकी जो सन्धि है—उनके बीचका जो वृत्तिविशेष है, वह व्यान है । श्रुतिद्वारा विशेषरूपसे निरूपण किये जानेके कारण यहाँ वह व्यान अभिप्रेत नहीं है जो सांख्यादि शास्त्रमें प्रसिद्ध [ सर्वदेहव्यापी ] व्यान है ऐसा इसका तात्पर्य है । | | कस्मात्पुनः प्राणापानौ हित्वा महतायासेन व्यानस्यैवोपासनमुच्यते ? वीर्यवत्कर्महेतुत्वात् । कथं वीर्यवत्कर्महेतुत्वमित्याह—<br><br>यो व्यानः सा वाक्, व्यानकार्यत्वाद्वाचः । यस्माद्व्याननिर्वर्त्या वाक्तस्मादप्राणन्ननपानन्प्राणापानव्यापारावकुर्वन्वाचमभिव्याहरत्युच्चारयति लोकः ॥ ३ ॥ | किंतु प्राण और अपानको छोड़कर अत्यन्त परिश्रमसे व्यानकी ही उपासनाका निरूपण क्यों किया गया ? [ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—]<br>क्योंकि यह वीर्यवान् कर्मकी निष्पत्तिका कारण है । यह वीर्यवान् कर्मकी सिद्धिका कारण कैसे है ? इसपर कहते हैं—जो व्यान है, वही वाणी है, क्योंकि वाणी व्यानका ही कार्य है । वाणी व्यानसे निष्पन्न होनेवाली है, इसलिये लोक प्राण और अपानन अर्थात् प्राण और अपानकी क्रियाएँ न करता हुआ वाणीका अभिव्याहरण—उच्चारण करता है ॥ ३ ॥ |

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ६९


व्यानप्रयुक्त होनेसे वाक्, ऋक्, साम और उद्गीथकी समानता

या वाक्सर्क्तस्मादप्राणन्नपानन्नृचमभिव्याहरति यर्क्तत्साम तस्मादप्राणन्नपानन्साम गायति यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्नपानन्नुद्गायति ॥ ४ ॥

जो वाक् है वही ऋक् है। उसीसे पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ऋक् का उच्चारण करता है। जो ऋक् है वही साम है। इसीसे प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ सामगान करता है। जो साम है वही उद्गीथ है। इसीसे प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ उद्गान करता है ॥ ४ ॥

तथा वाग्विषेषामृचम्, ऋक्संस्थं च साम, सामावयवं चोद्गीथम्, अप्राणन्नपानन्व्यानेनैव निर्वर्तयतीत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥इसी प्रकार वाग्विषेष ऋक्, ऋक्सि्थत साम और सामके अवयवभूत उद्गीथको भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ केवल व्यानसे ही सम्पन्न करता है—यह उसका अभिप्राय है ॥४॥
न केवलं वागाद्यभिव्याहरणमेव—केवल वाणी आदिका उच्चारण ही नहीं—

अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्नपानँस्तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ॥ ५ ॥

इसके सिवा जो और भी वीर्ययुक्त कर्म हैं; जैसे—अग्निका मन्थन; किसी सीमातक दौड़ना तथा सुदृढ़ धनुषको खींचना—इन सब कर्मोंको भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करता हुआ ही करता है। इस कारण व्यानदृष्टिसे ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥

७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

७०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| अतोऽस्मादन्यान्यपि यानि वीर्यवन्ति कर्माणि प्रयत्नाधिक्यनिर्वर्त्यानि--यथाग्नेर्मन्थनम्, आजेर्मर्यादायाः सरणं धावनम्, दृढस्य धनुष आयमनमाकर्षणम्-अप्राणन्नपानंस्तानि करोति ।<br><br>अतो विशिष्टो व्यानः प्राणादिवृत्तिभ्यः । विशिष्टस्योपासनं ज्यायः फलवत्त्वाद्राजोपासनवत् । एतस्य हेतोरेतस्मात्कारणाद्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत, नान्यद्वृत्त्यन्तरम् । कर्मवीर्यवत्तरत्वं फलम् ॥ ५ ॥ | इसके सिवा जो दूसरे भी अधिक प्रयत्नसे निष्पन्न होनेवाले वीर्ययुक्त कर्म हैं—जैसे अग्निका मन्थन, किसी सीमातक दौड़ना और सुदृढ़ धनुषको खींचना—उन्हें भी पुरुष प्राण और अपानकी क्रिया न करते हुए ही करता है ।<br><br>अतः प्राणादिवृत्तियोंकी अपेक्षा व्यान विशिष्ट है; और राजाकी उपासनाके समान फलवती होनेके कारण विशिष्टकी उपासना भी उत्कृष्टतर है । इस हेतुसे अर्थात् इस कारणसे व्यानरूपसे ही उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये—वायुकी अन्य वृत्तियोंके रूपसे नहीं । कर्मको अधिक प्रबल बनाना ही उसका फल है ॥ ५ ॥ |


उद्गीथाक्षरोंमें प्राणादिदृष्टि

अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो ह गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदँसर्वँ स्थितम् ॥ ६ ॥

इसके पश्चात् उद्गीथाक्षरोंकी—‘उद्गीथ’ उस नामके अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये—‘उद्गीथ’ इस शब्दमें प्राण ही ‘उत्’ है, क्योंकि प्राणसे ही उठता है; वाणी ही ‘गी’ है, क्योंकि वाणीको ‘गिरा’ कहते हैं तथा अन्न ही ‘थ’ है; क्योंकि अन्नमें ही यह सब स्थित है ॥ ६ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथाधुना खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत भक्त्यक्षराणि मा भूवन्नित्यतो विशिनष्टि—उद्गीथ इति, उद्गीथनामाक्षराणीत्यर्थः। नामाक्षरोपासनेऽपि नामवत एवोपासनं कृतं भवेदमुकमिश्रा इति यद्वत्।<br><br>प्राण एव उत्, उदित्यस्मिन्नक्षरे प्राणदृष्टिः। कथं प्राणस्योच्चमित्याह—प्राणेन ह्युत्तिष्ठति सर्वोऽप्राणस्यावसाददर्शनात्; अतोऽस्त्युदः प्राणस्य च सामान्यम्। वाग्गीः, वाचो ह गिर इत्याचक्षते शिष्टाः। तथान्नं थम्, अन्ने हीदं सर्वस्थितमतोऽस्त्यन्नस्य थाक्षरस्य च सामान्यम् ॥ ६ ॥इसके पश्चात् अब उद्गीथके अक्षरोंकी उपासना करनी चाहिये। 'उद्गीथ' शब्दसे उद्गीथभक्तिके अक्षर न समझ लिये जायँ इसलिये 'उद्गीथ' यह विशेषण लगाते हैं। तात्पर्य यह है कि 'उद्गीथ' इस नामके अक्षरोंकी उपासना करे; क्योंकि 'अमुक मिश्र' ऐसा कहनेसे जैसे उस नामवाले व्यक्ति-विशेषका बोध होता है, उसी प्रकार नामके अक्षरोंकी उपासना करनेसे भी नामीकी ही उपासना की जाती है।<br><br>प्राण ही 'उत्' है, अर्थात् 'उत्' इस अक्षरमें प्राणदृष्टि करनी चाहिये। प्राण किस प्रकार 'उत्' है सो बतलाते हैं—सब लोग प्राणसे ही उठते हैं, क्योंकि प्राणहीनकी शिथिलता देखी गयी है; अतः उत् और प्राणकी समानता स्पष्ट ही है। वाक् 'गी' है; क्योंकि शिष्ट लोग वाक्‌को 'गिरा' ऐसा कहते हैं तथा अन्न 'थ' है, क्योंकि अन्नमें ही यह सब स्थित है; अतः अन्न और थ अक्षरकी समानता है ॥ ६ ॥

७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २

७२छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय २

उद्गीथाक्षरोंमें द्युलोकादि तथा सामवेदादिदृष्टि

त्रयाणां श्रुत्युक्तानि सामान्यानि तानि तेनानुरूपेण शेषेष्वपि द्रष्टव्यानि—इन तीनोंकी समानता श्रुतिने बतलायी है। उन्हींके अनुसार शेष स्थानोंमें भी समझनी चाहिये—

द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थँ सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीरृग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥

द्यौ ही 'उत' है, अन्तरिक्ष 'गी' है और पृथिवी 'थ' है। आदित्य ही 'उत' है, वायु 'गी' है और अग्नि 'थ' है। सामवेद ही 'उत' है, यजुर्वेद 'गी' है और ऋग्वेद 'थ' है। इन अक्षरोंको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् 'उद्गीथ' इस प्रकार इन उद्गीथाक्षरोंकी उपासना करता है उसके लिये वाणी, जो [ऋग्वेदादि] वाक्का दोह है, उसका दोहन करती है तथा वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ७ ॥

| द्यौरेव उत्, उच्चैःस्थानात् । | ऊँचे स्थानवाला होनेके कारण द्युलोक ही 'उत्' है, | | अन्तरिक्षं गीर्गिरणाल्लोकानाम् । | लोकोंका गिरण करने (निगलने) से अन्तरिक्ष 'गी' है और | | पृथिवीथं प्राणिस्थानात् । आदित्य एव उत्; ऊर्ध्वत्वात् । वायुर्गीर- | प्राणियोंका स्थान होनेके कारण पृथिवी 'थ' है। ऊँचा होनेके कारण आदित्य ही 'उत्' है, | | ग्न्यादीनां गिरणात् । अग्निस्थं यज्ञकर्मावस्थानात् । सामवेद एव उत्, स्वर्गसंस्तुतत्वात् । यजुर्वेदो | अग्नि आदिको निगलनेके कारण वायु 'गी' है और यज्ञसम्बन्धी कर्मका अवस्थान (आश्रय) होनेसे अग्नि ही 'थ' है तथा स्वर्गमें स्तुत होनेके कारण सामवेद ही 'उत्' है, यजुर्वेद 'गी' है, क्योंकि |

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३


| गीर्यजुषां प्रत्तस्य हविषो देवता-नां गिरणात् । ऋग्वेदस्थम्,<br><br>ऋच्यध्यूढत्वात्साम्नः ।<br><br> उद्गीथाक्षरोपासनफलमधु-नोच्यते—दुग्धे दोग्ध्यस्मै साधकाय । का सा ? वाक्, कम् ? दोहम्, कोऽसौ दोहः ? इत्याह—यो वाचो दोहः । ऋग्वेदादिशब्दसाध्यं फलमित्य-भिप्रायः, तद्वाचो दोहस्तं स्वयमेव वाग्दोग्ध्यात्मानमेव दोग्धि । किं चान्नवान्प्रभूता-न्नोऽन्नादश्च दीप्ताग्निर्भवति य एतानि यथोक्तान्येवं यथोक्त-गुणान्युद्गीथाक्षराणि विद्वान्स-नुपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥ | यजुर्वेदियोंके दिये हुए हविको देवता-लोग निगलते हैं तथा ऋग्वेद 'थ' है; क्योंकि ऋक्में ही साम अधिष्ठित है ।<br><br> अब उद्गीथाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाया जाता है—इस साधक-के लिये दोहन करती है, कौन ? वाक्, किसका दोहन करती है ? दोहका, वह दोह क्या है ? इसपर कहते हैं—जो वाणीका दोह है; अभिप्राय यह है कि जो ऋग्वेदादि शब्दसे साध्य फल है, वह वाणीका दोह है, उसे वाणी स्वयं ही दुहती है । अपनेहीको दुहती है । यही नहीं वह अन्नवान्—बहुत-से अन्न-वाला और अन्नका भोक्ता भी हो जाता है, उसकी जठराग्नि उद्दीप्त रहती है, जो इन उपर्युक्त उद्गीथा-क्षरोंकी इन्हें उपर्युक्त गुणोंसे विशिष्ट जानकर, 'उद्गीथ' इस रूपसे उपा-सना करता है ॥ ७ ॥ |


सकामोपासनाका क्रम

अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ॥ ८ ॥

अब निश्चय ही कामनाओंकी समृद्धि [ के साधनका वर्णन किया जाता है—] अपने उपगन्तव्यों (ध्येयों) की इस प्रकार उपासना

७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय १

७४छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय १

करे—जिस सामके द्वारा उद्गाताको स्तुति करना हो उस सामका [उसकी उत्पत्ति आदिके क्रमसे] चिन्तन करे ॥ ८ ॥

अथ खल्विदानीमाशीः समृद्धिराशिषः कामस्य समृद्धैर्यथा भवेत्तदुच्यत इति वाक्यशेषः। उपसरणान्युपसर्तव्यान्युपगन्तव्यानि ध्येयानीत्यर्थः; कथम्?<br><br>इत्युपासीत—एवमुपासीत;<br><br>तद्यथा—येन साम्ना येन सामविशेषेण स्तोष्यन्स्तुतिं करिष्यन् स्याद्भवेदुद्गाता तत्सामोपधावेदुपसरेच्चिन्तयेदुत्पत्त्यादिभिः॥८॥इसके अनन्तर अब निश्चय ही आशीःसमृद्धि—जिस प्रकार आशीः अर्थात् कामनाकी समृद्धि होगी वह बतलायी जानी है, इस प्रकार इस वाक्यकी पूर्ति करनी चाहिये। उपसरण—उपसर्तव्य-उपगन्तव्य अर्थात् ध्येय--इनकी किस प्रकार उपासना करनी चाहिये? इनको उपासना इस प्रकार करे; यथा—जिस सामसे अर्थात् जिस सामविशेषसे उद्गाताको स्तुति करनी हो उस सामका उसकी उत्पत्ति आदिके क्रमसे उपधावन—उपसरण अर्थात् चिन्तन करे ॥ ८ ॥

यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥

[वह साम] जिस ऋचामें [प्रतिष्ठित हो] उस ऋचाका, जिस ऋषिवाला हो उस ऋषिका तथा जिस देवताकी स्तुति करनेवाला हो उस देवताका चिन्तन करे ॥ ९ ॥

यस्यामृचि तत्साम तां चर्चमुपधावेद्देवतादिभिः। यदार्षेयं साम तं चर्षिम्। यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥वह साम जिस ऋचामें अधिष्ठित हो उस ऋचाका उसके देवतादिके सहित चिन्तन करे। तथा वह साम जिस ऋषिवाला हो उस ऋषिका और जिस देवताकी स्तुति करनेवाला हो उस देवताका भी चिन्तन करे ॥९॥

खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ७५


येनच्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तꣳस्तोममुपधावेत् ॥ १० ॥

वह जिस छन्दके द्वारा स्तुति करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका चिन्तन करे ॥१०॥

येनच्छन्दसा गायत्र्यादिना स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेत् । येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्, स्तोमाङ्गफलस्य कर्तृगामित्वादात्मनेपदं स्तोष्यमाण इति, तं स्तोममुपधावेत् ॥ १० ॥वह जिस गायत्री आदि छन्दसे स्तुति करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका चिन्तन करे। स्तोमकर्मका अङ्गभूत फल कर्ताको प्राप्त होनेवाला होनेसे यहाँ 'स्तोष्यमाणः' इस पदमें आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है* ॥१०॥
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यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥ ११ ॥

जिस दिशाकी स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका चिन्तन करे ॥ ११ ॥

यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेदधिष्ठात्रादिभिः ॥ ११ ॥[ वह साम ] जिस दिशाकी स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका उसके अधिष्ठाता देवता आदिके सहित चिन्तन करे ॥ ११ ॥
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* क्योंकि 'स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार जिस क्रियाका फल कर्ताको प्राप्त होनेवाला होता है उसमें आत्मनेपदका प्रयोग हुआ करता है।

७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ ]

७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ ]


आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्र-
मत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृद्ध्येत यत्कामः
स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥

अन्तमें अपने स्वरूपका चिन्तन कर अपनी कामनाका चिन्तन करते हुए अप्रमत्त होकर स्तुति करे। जिस फलकी इच्छासे युक्त होकर वह स्तुति करता है वही फल तत्काल समृद्धिको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥

| आत्मानमुद्गाता स्वं रूपं गोत्रनामादिभिः सामादीन्क्रमेण स्वं चात्मानमन्ततोऽन्त उपसृत्य स्तुवीत। कामं ध्यायन्नप्रमत्तः स्वरोष्मव्यञ्जनादिभ्यः प्रमादमकुर्वन्। ततोऽभ्याशः क्षिप्रमेव ह यद्यत्रास्मा एवंविदे स कामः समृद्ध्येत समृद्धिं गच्छेत्। कोऽसौ ? यत्कामो यः कामोऽस्य सोऽयं यत्कामः सन् स्तुवीतेति द्विरुक्तिरादरार्था ॥ १२ ॥ | उद्गाताको चाहिये कि गोत्र और नामादिके सहित अपना—अपने स्वरूपका चिन्तन करता हुआ अर्थात् सामादि क्रमसे अन्तमें अपना स्मरण करता हुआ स्तुति करे। [किस प्रकार स्तुति करे ?] फलका चिन्तन करता हुआ अप्रमत्त होकर अर्थात् स्वर, ऊष्म एवं व्यञ्जनादि वर्णोच्चारणमें प्रमाद न करता हुआ [स्तुति करे]। इस प्रकार जाननेवाले उस उपासककी जो कामना होती है वह शीघ्र ही समृद्ध (फलवती) हो जाती है। वह कामना कौन-सी है ? वह उपासक यत्काम अर्थात् जिस कामनावाला होकर स्तुति करता है। [श्रुतिमें] 'यत्कामः स्तुवीत' इन पदोंका दो बार प्रयोग आदरके लिये है ॥ १२ ॥ |

—: ॐ :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ खण्ड

उद्गीथसंज्ञक ओंकारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥

‘ॐ’ यह अक्षर उद्गीथ है—इस प्रकार इसकी उपासना करे। ‘ॐ’ ऐसा [ उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता ] उद्गान करता है। उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥

| ओमित्येतदित्यादिप्रकृतस्याक्षरस्य पुनरुपादानमुद्गीथाक्षराद्युपासनान्तरितत्वादन्यत्र प्रसङ्गो मा भूदित्येवमर्थम्। प्रकृतस्यैवाक्षरस्यामृताभयगुणविशिष्टस्योपासनं विधातव्यमित्यारम्भः।<br><br>ओमित्यादिव्याख्यातम् ॥१॥ | पूर्व-प्रस्तावित ओंकार अक्षरका ही ‘ओमित्येतत्’ इत्यादि वाक्यद्वारा इसलिये ग्रहण किया गया है जिससे बीचमें ‘उद्गीथ’ शब्दके अक्षरोंकी उपासनासे व्यवहित हो जानेके कारण अन्यत्र प्रसङ्ग न हो जाय। उस पूर्वप्रस्तावित अक्षरके ही अमृत और अभय गुणविशिष्ट स्वरूपकी उपासनाका विधान करना है—इसीके लिये [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है। ओमित्यादि मन्त्रकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥१॥ |

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७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

७८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्यदेभिरच्छादयँस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ २ ॥

[ एक बार ] मृत्युसे भय मानते हुए देवताओंने त्रयीविद्यामें प्रवेश किया। उन्होंने अपनेको छन्दोंसे आच्छादित कर लिया। देवताओंने जो उनके द्वारा अपनेको आच्छादित किया वही छन्दोंका छन्दपन है। [ अर्थात् देवताओंको आच्छादित करनेके कारण ही मन्त्रोंका नाम छन्द हुआ है ] ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
देवा वै मृत्योर्मारकाद्विभ्यतः किं कृतवन्तः ? इत्युच्यते—त्रयीं विद्यां त्रयीविहितं कर्म प्राविशन् प्रविष्टवन्तो वैदिकं कर्म प्रारब्धवन्त इत्यर्थः, तन्मृत्योस्त्राणं मन्यमानाः। किं च ते कर्मण्य-विनियुक्तैश्छन्दोभिर्मन्त्रैर्जपहोमादि कुर्वन्त आत्मानं कर्मान्तरेष्वच्छादयंश्छादितवन्तः। यद्यस्मादेभिर्मन्त्रैरच्छादयंस्तत्तस्माच्छन्दसां मन्त्राणां छादनाच्छन्दस्त्वं प्रसिद्धमेव ॥ २ ॥प्रसिद्ध देवताओंने मारक मृत्युसे भय मानते हुए क्या किया ? यह बतलाया जाता है—उन्होंने त्रयी विद्यामें—वेदत्रयीद्वारा प्रतिपादित कर्ममें प्रवेश किया। अर्थात् वैदिक कर्मको ही मृत्युसे बचनेका साधन समझकर उन्होंने उसीका आरम्भ कर दिया। तथा कर्ममें जिनका विनियोग नहीं है उन छन्दों—मन्त्रों—से जप एवं होमादि करते हुए उन्होंने अपनेको कर्मान्तरोंमें आच्छादित कर दिया। क्योंकि उन्होंने अपनेको इन मन्त्रोंसे आच्छादित कर दिया था, इसलिये छादन करनेके कारण ही छन्दों यानी मन्त्रोंका छन्दपन प्रसिद्ध ही है ॥२॥
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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९


तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु विदित्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥

जिस प्रकार [मछेरा] जलमें मछलियोंको देख लेता है, उसी प्रकार ऋक्, साम और यजुःसम्बन्धी कर्मोंमें लगे हुए उन देवताओंको मृत्युने देख लिया । इस बातको जान लेनेपर उन देवताओंने ऋक्, साम और यजुः सम्बन्धी कर्मोंसे निवृत्त होकर स्वर (ॐ इस अक्षर) में ही प्रवेश किया॥ ३॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तांस्तत्र देवान्कर्मपरान्मृत्युर्यथा लोके मत्स्यघातको मत्स्यमुदके नातिगम्भीरे परिपश्येद्दण्डिशोदकस्रावोपायसाध्यं मन्यमानः, एवं पर्यपश्यद्दृष्टवान्मृत्युः; कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन इत्यर्थः। क्वासौ देवान्ददर्श? इत्युच्यते—ऋचि साम्नि यजुषि । ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकर्मणीत्यर्थः । ते नु देवा वैदिकेन कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्तो मृत्योश्चिकीर्षितं विदितवन्तः । विदित्वा च त ऊर्ध्वा व्यावृत्ताः कर्मभ्य ऋचः साम्नोजिस प्रकार लोकमें बंसी लगाने और जल उलीचने आदि उपायोंसे मछलियोंको पकड़ा जा सकता है, यह जाननेवाला मछेरा उन्हें कम गहरे जलमें देख लेता है उसी प्रकार मृत्युने कर्मपरायण देवताओंको वहाँ [छिपे हुए] देख लिया, अर्थात् मृत्युने यह समझ लिया कि देवताओंको कर्मक्षयरूप उपायके द्वारा अपने अधीन किया जा सकता है । उसने देवताओंको कहाँ देखा ? यह बतलाया जाता है—ऋक्, साम और यजुमें अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्ममें। वैदिक कर्मानुष्ठानके कारण शुद्धचित्त हुए उन देवताओंने 'मृत्यु क्या करना चाहता है ?' यह जान लिया। यह जानकर वे ऋक्, साम और यजुःसे अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्मसे निवृत्त

८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| यजुष ऋग्यजुःसामसंबद्धात्कर्मणोऽभ्युत्थायेत्यर्थः। तेन कर्मणा मृत्युभयापगमं प्रति निराशास्तदपास्यामृताभयगुणमक्षरं स्वरं स्वरशब्दितं प्राविशन्नेव प्रविष्टवन्तः; ॐकारोपासनपराः संवृत्ताः। एवशब्दोऽवधारणार्थः सन्समुच्चयप्रतिषेधार्थः। तदुपासनपराः संवृत्ता इत्यर्थः ॥३॥ | होकर ऊपरकी ओर उठे । उस कर्मसे मृत्युके भयकी निवृत्तिके प्रति निराश होनेके कारण वे उसे छोड़-कर अमृत और अभय गुणविशिष्ट अक्षर यानी स्वरमें—स्वरसंज्ञक अक्षरमें ही प्रविष्ट हो गये अर्थात् ओंकारोपासनामें तत्पर हो गये । यहाँ 'एव' शब्द अवधारणके लिये होकर [ पूर्व स्थानोंके साथ स्वरके ] समुच्चयका प्रतिषेध करनेके लिये है । तात्पर्य यह है कि वे उसीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ ३ ॥ |

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ओंकारका उपयोग और महत्त्व

कथं पुनः स्वरशब्दवाच्यत्वमक्षरस्य ? इत्युच्यते—किंतु वह अक्षर 'स्वर' शब्दका वाच्यार्थ किस प्रकार है ? यह बतलाया जाता है—

य दा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवꣲ सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥

जिस समय [ उपासक अध्ययनद्वारा ] ऋक्‌को प्राप्त करता है उस समय वह ॐ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुःको भी प्राप्त करता है । यह जो अक्षर है, वह अन्य स्वरोंके समान स्वर है । यह अमृत और अभयरूप है, इसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१


| यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्ये- <br> वातिस्वरत्येवं सामैवं यजुः। एष <br> उ स्वरः। कोऽसौ ? यदेतदक्षरमे- <br> तदमृतमभयम्, तत्प्रविश्य यथा- <br> गुणमेवामृता अभयाश्चाभवन् <br> देवाः ॥ ४ ॥ | जिस समय [ उपासक ] ऋक्‌को प्राप्त करता है उस समय वह ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुको भी प्राप्त करता है । यही स्वर है; वह स्वर कौन है ? यह जो अक्षर है, यह अमृत और अभयरूप है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान देवगण भी अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥ |

ओंकारोपासनाका फल

स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरँ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥

वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी स्तुति (उपासना) करता है, इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रवेश कर जाता है तथा इसमें प्रविष्ट होकर जिस प्रकार देवगण अमर हो गये थे, उसी प्रकार अमर हो जाता है ॥ ५ ॥

| स योऽन्योऽपि देववदेवैतदक्ष- <br> रमेवममृतमभयगुणं विद्वान्प्रणौ- <br> ति स्तौति–उपासनमेवात्र स्तुति- | उन देवताओंके समान ही जो दूसरा उपासक भी इस अक्षरको इसी प्रकार अमृत और अभयगुणसे विशिष्ट जानता हुआ उसकी स्तुति करता है– यहाँ स्तुतिका अभिप्राय उपासना |

८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| रभिप्रेता—स तथैवैतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति ।<br><br>तत्प्रविश्य च राजकुलं प्रविष्टानमिव राज्ञोऽन्तरङ्गबहिरङ्गतावन्न परस्य ब्रह्मणोऽन्तरङ्गबहिरङ्गताविशेषः, किं तर्हि ?<br><br>यदमृता देवा येनामृतत्वेन यदमृता अभूवंस्तेनैवामृतत्वेन विशिष्टस्तदमृतो भवति न न्यूनता नाप्यधिकतामृतत्व इत्यर्थः ॥५॥ | ही है—वह उसी प्रकार ( उन देवताओंके ही समान ) इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रविष्ट हो जाता है ।<br><br>तथा उसमें प्रविष्ट होनेपर, जिस प्रकार राजकुलमें प्रवेश करनेवालोंमें कोई राजाके अन्तरङ्ग रहते हैं और कोई बहिरङ्ग रहते हैं, इस प्रकार परब्रह्मके अन्तरङ्ग-बहिरङ्गताका भेद नहीं रहता । तो फिर क्या रहता है ? जिस अमृतत्वसे देवगण अमर हो गये थे उसी अमृतत्वसे विशिष्ट होकर यह भी उन्हींके समान अमर हो जाता है । इसके अमृतत्वमें न तो न्यूनता रहती है और न अधिकता ही ॥ ५ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥४॥

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पञ्चम खण्ड

ओंकार, उद्गीथ और आदित्यका अभेद

प्राणादित्यदृष्टिविशिष्टस्योद्गीथ-<br>स्योपासनमुक्तमेवानूद्य प्रणवोद्गी-<br>थयोरेकत्वं कृत्वा तस्मिन्प्राण-<br>रश्मिभेदगुणविशिष्टदृष्ट्याक्ष-<br>रस्योपासनमनेकपुत्रफलमिदानीं<br>वक्तव्यमित्यारभ्यते—पूर्वोक्त प्राण और आदित्यदृष्टिसे विशिष्ट उद्गीथोपासनाका ही अनुवाद (पुनरुल्लेख) कर प्रणव और उद्गीथकी एकता करते हुए अब उसी प्रसङ्गमें प्राण और रश्मियोंके भेदरूप गुणसे युक्त दृष्टिसे उस अक्षरकी (उद्गीथावयवभूत ओंकारकी) अनेक पुत्ररूप फलवाली उपासनाका निरूपण करना है—इसीलिये [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है—

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥

निश्चय ही जो उद्गीथ है वही प्रणव है और जो प्रणव है वही उद्गीथ है। इस प्रकार यह आदित्य ही उद्गीथ है, यही प्रणव है; क्योंकि यह (आदित्य) 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है ॥ १ ॥

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो बह्वृचानाम्, यश्च प्रणव-निश्चय ही जो उद्गीथ है वही ऋग्वेदियोंका प्रणव है तथा उनका