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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

८२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८२४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

और यदि वह गीतवाद्यसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही गीत-वाद्य वहाँ प्राप्त हो जाते हैं। उस गीतवाद्य-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ८ ॥

अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो महीयते॥९॥

और यदि वह स्त्रीलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्प-मात्रसे ही स्त्रियाँ उसके पास उपस्थित हो जाती हैं। उस स्त्रीलोकसे सम्पन्न हो वह महिमान्वित होता है ॥ ९ ॥

| समानमन्यत्। मातरो जनयित्र्योऽतीताः सुखहेतुभूताः सामर्थ्यात्। न हि दुःखहेतुभूतासु ग्रामसूकरादिजन्मनिमित्तासु मातृषु विशुद्धसत्त्वस्य योगिन इच्छा तत्सम्बन्धो वा युक्तः ॥ २–९ ॥ | शेष सब इसीके समान है। मातृगण अर्थात् अतीत जन्म देनेवाली माताएँ जो योग्यताके अनुसार सुखकी हेतुभूता हैं, क्योंकि दुःखकी हेतुभूत ग्रामसूकरादि जन्मोंकी कारणस्वरूपा माताओंके प्रति विशुद्धचित्त योगीकी इच्छा अथवा उनसे सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है ॥२-९॥ |

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यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥१०॥

वह जिस-जिस प्रदेशकी कामना करनेवाला होता है और जिस-जिस भोगकी इच्छा करता है वह सब उसके संकल्पसे ही उसको प्राप्त हो जाता है। उससे सम्पन्न होकर वह महिमाको प्राप्त होता है ॥१०॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२५


| यं यमन्तं प्रदेशमभिकामो भवति । यं च कामं कामयते यथोक्तव्यतिरेकेणापि सोऽस्यान्तः प्राप्तुमिष्टः कामश्च संकल्पादेव समुत्तिष्ठत्यस्य । तेनेच्छाविघाततयाभिप्रेतार्थप्राप्त्या च सम्पन्नो महीयत इत्युक्तार्थम् ॥ १० ॥ | वह जिस-जिस अन्त यानी प्रदेशकी कामना करनेवाला होता है और उपर्युक्त भोगोंसे भिन्न जिस भोगकी इच्छा करता है वह इसका पानेके लिये अभिमत प्रदेश और भोग इसे संकल्पमात्रसे प्राप्त हो जाता है। उससे अर्थात् इच्छाके अविघात और अभिमत पदार्थकी प्राप्तिसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है—इस प्रकार यह अर्थ पहले कहा ही जा चुका है ॥ १० ॥ |

—:०:—

इति च्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये द्वितीयखण्ड
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥

तृतीय खण्ड

असत्यसे आवृत सत्यकी उपासना और नामाक्षरोपासना

यथोक्तात्मध्यानसाधनानुष्ठानं प्रति साधकानामत्साहजननाथमनुक्रोशन्त्याह—कष्टमिदं खलु वर्तते यत्स्वात्मस्थाः शक्यप्राप्या अपि—उपर्युक्त आत्मध्यानरूप साधनके अनुष्ठानकें प्रति साधकोंमें उत्साह पैदा करनेके लिये दया करनेवाली श्रुति कहती है—यह बड़े ही कष्टकी बात है कि अपने आत्मामें ही स्थित और प्राप्त होने योग्य भी—

त इम सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषाꣳ सत्यानाꣳसतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥ १ ॥

वे ये सत्यकाम अनृताच्छादनयुक्त हैं। सत्य होनेपर भी अनृत (मिथ्या) उनका अपिधान (आच्छादन करनेवाला) है, क्योंकि इस प्राणीका जो-जो [सम्बन्धी] यहाँसे मरकर जाता है वह-वह उसे फिर देखनेके लिये नहीं मिलता ॥ १ ॥

त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषामात्मस्थानां स्वाश्रयाणामेव सतामनृतं बाह्यविषयेषु स्त्र्यन्नभोजनाच्छादनादिषु तृष्णा तन्निमित्तं च स्वेच्छाप्रचारत्वं मिथ्याज्ञाननिमित्तत्त्वादनृतमित्यु-वे ये सत्यकाम अनृतापिधान (मिथ्यारूप आच्छादनवाले) हैं। अपने ही आश्रित रहनेवाली उन आत्मस्थित कामनाओंका अनृत [अपिधान है]—स्त्री, अन्न भोजन और वस्त्रादि बाह्य विषयोंमें जो तृष्णा है उसके कारणहोनेवाला स्वेच्छाचार मिथ्याज्ञानजनित होनेके कारण 'अनृत' कहा जाता है; उनके

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२७

| ड्यते । तन्निमित्तं सत्यानां कामानाम् अप्राप्तिरित्यापिधानमिवापिधानम् ।<br><br>कथमनृतापिधाननिमित्तं तेषामलाभः ? इत्युच्यते; यो यो हि यस्मादस्य जन्तोः पुत्रो भ्राता वेष्ट इतोऽस्माल्लोकात्प्रैति म्रियते तमिष्टं पुत्रं भ्रातरं वा स्वहृदयाकाशे विद्यमानमपीह पुनर्दर्शनायेच्छन्नपि न लभते ॥ १ ॥ | कारण सत्यकामनाओंकी प्राप्ति नहीं होती इसलिये वह अपिधानके समान अपिधान है [ वास्तविक अपिधान नहीं है ] ।<br><br>मिथ्या अपिधानके कारण उनकी प्राप्ति किस प्रकार नहीं होती, सो बतलाया जाता है; क्योंकि इस जीवका जो-जो पुत्र, भाई अथवा इष्ट इस लोकसे मरकर जाता है, अपने हृदयाकाशमें विद्यमान रहनेपर भी उस इष्ट, पुत्र अथवा भाईको वह इच्छा करनेपर भी इस लोकमें फिर देखनेको नहीं पाता ॥ १ ॥ |


-: ० :-

अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥

तथा उस लोकमें अपने जिन जीवित अथवा जिन मृतक [पुत्रादि] को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी प्राप्त नहीं करता उन सबको यह इस (हृदयाकाशस्थित ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर लेता है; क्योंकि यहाँ इसके ये सत्यकाम अनृतसे ढके हुए रहते हैं । इस विषयमें यह दृष्टान्त है--जिस प्रकार पृथिवीमें गड़े हुए सुवर्णके खजानेको

४२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

४२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

उस स्थानसे अनभिज्ञ पुरुष ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी नहीं जानते इसी प्रकार यह सारी प्रजा नित्यप्रति ब्रह्मलोकको जाती हुई उसे नहीं पाती, क्योंकि यह अनृतके द्वारा हर ली गयी है ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथ पुनर्यै चास्य विदुषो जन्तोर्जीवा जीवन्तीह पुत्रा भ्रात्रादयो वा ये च प्रेता मृता इष्टाः सम्बन्धिनो यच्चान्यदिह लोके वस्त्रान्नपानादि रत्नादि वा वस्त्विच्छन्न लभते तत्सर्वमत्र हृदयाकाशाख्ये ब्रह्मणि गत्वा यथोक्तेन विधिना विन्दते लभते । अत्रास्मिन्हार्दाकाशे हि यस्मादस्यैते यथोक्ताः सत्याः कामा वर्तन्तेऽनृतापिधानाः ।<br><br>कथमिव तदन्याय्यमित्युच्यते । तत्तत्र यथा हिरण्यनिधिं हिरण्यमेव पुनर्ग्रहणाय निधातृभिर्निधीयत इति निधिस्तं हिरण्यनिधिं निहितं भूमेरधस्तान्निक्षिप्तमक्षेत्रज्ञा निधिशास्त्रैर्निधिक्षेत्र-तथा इस विद्वान् प्राणीको जो जीव—इस लोकमें जीवित पुत्र या भ्राता आदि, अथवा जो प्रेत—मरे हुए इष्टसम्बन्धी तथा इस लोकमें जो वस्त्र एवं अन्न-पानादि और रत्नादि पदार्थ इच्छा करनेपर भी नहीं मिलते उन सबको यह इस हृदयाकाशरूप ब्रह्ममें पहुँचकर उपर्युक्त विधिसे प्राप्त कर लेता है, क्योंकि यहाँ उसके इस हृदयाकाशमें ये उपर्युक्त सत्य काम मिथ्यासे आच्छादित हुए वर्तमान रहते हैं ।<br><br>[अपने आत्मभूत ब्रह्ममें विद्यमान रहनेपर भी कामनाएँ यहाँ उपलब्ध नहीं होतीं ] यह असङ्गत बात कैसे हो सकती है ? यह बतलाया जाता है । इस विषयमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार हिरण्यनिधि—हिरण्य (सुवर्ण) ही, धरोहर रखनेवाले पुरुषोंद्वारा पुनः ग्रहण करनेके लिये धरोहररूपसे निहित किया (रख दिया) जाता है, इसलिये निधि है । भूमिके नीचे

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९


| मजानन्तस्ते निधेरुपर्य्युपरि सञ्चरन्तोऽपि निधिं न विन्देयुः शक्यवेदनमपि; एवमेवेमा अविद्यावत्यः सर्वा इमाः प्रजा यथोक्तं हृदयाकाशाख्यं ब्रह्मलोकं ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोकस्तमहरहः प्रत्यहं गच्छन्त्योऽपि सुषुप्तकाले न विन्दन्ति न लभन्ते एषोऽहं ब्रह्मलोकभावमापन्नोऽस्मीतीति । अनृतेन हि यथोक्तेन हि यस्मात्प्रत्यूढा हृताः स्वरूपादविद्यादिदोषैर्बहिरपकृष्टा इत्यर्थः । अतः कष्टमिदं वर्तते जन्तूनां यत्स्वायत्तमपि ब्रह्म न लभ्यत इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥ | निहित—निक्षिप्त ( रखी हुई ) उस सुवर्णनिधिको जिस प्रकार उस स्थानसे अनभिज्ञ—निधिशास्त्रद्वारा निधिक्षेत्रको न जाननेवाले पुरुष निधि के ऊपर सञ्चार करते हुए भी, जिसका ज्ञान प्राप्त होना सम्भव भी है उस निधिको भी नहीं जानते उसी प्रकार यह सम्पूर्ण अविद्यावती प्रजा उपर्युक्त हृदयाकाशसंज्ञक लोकको—ब्रह्म यही लोक है उस ब्रह्मलोकको सुषुप्तिकालमें प्रतिदिन जानेपर भी 'यह मैं इस समय ब्रह्मलोकभावको प्राप्त हो गया हूँ' इस प्रकार नहीं उपलब्ध करतीं, क्योंकि वह उपर्युक्त अनृतसे प्रत्यूढ—हृत है अर्थात् अविद्यादिदोषोंद्वारा—अपने स्वरूपसे बाहर खींच ली गयी है । अतः यह बड़े कष्टकी बात है कि स्वायत्त होनेपर भी जीवोंको ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥२॥ |


स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तꣳहृद्यमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमिति ॥३॥

वह यह आत्मा हृदयमें है 'हृदि अयम्' ( यह हृदयमें है ) यही इसका निरुक्त ( व्युत्पत्ति ) है । इसीसे यह 'हृदय' है । इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वर्गलोकको जाता है ॥ ३ ॥

८३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| स वै यः 'आत्मापहतपाप्मा' इति प्रकृतो वैशब्देन तं स्मारयति, एष विवक्षित आत्मा हृदि हृदयपुण्डरीक आकाशशब्देनाभिहितः । तस्यैतस्य हृदयस्यैतदेव निरुक्तं निर्वचनं नान्यत् । हृद्ययमात्मा वर्तत इति यस्मात्तस्माद्धृदयम् । हृदयनामनिर्वचनप्रसिद्ध्यापि स्वहृदय आत्मेत्यवगन्तव्यमित्यभिप्रायः । अहरहर्वे प्रत्यहमेवंविद्धृद्ययमात्मेति जानन् स्वर्गं लोकं हार्दं ब्रह्मैति प्रतिपद्यते । | वह जो आत्मा है, 'आत्मापहतपाप्मा' इस प्रकार जिसका प्रकरण है उस आत्माका ही श्रुति 'वै' शब्दसे स्मरण कराती है । यह विवक्षित आत्मा हृदय-पुण्डरीकमें 'आकाश' शब्दसे कहा गया है । उस इस हृदयका यही निरुक्त-निर्वचन (व्युत्पत्ति) है, अन्य नहीं । क्योंकि यह आत्मा हृदयमें विद्यमान है इसलिये यह हृदय है । इस प्रकार 'हृदय' इस नामके निर्वचनकी प्रसिद्धिसे भी 'आत्मा अपने हृदयमें है' ऐसा जानना चाहिये—ऐसा इसका अभिप्राय है । अहरहः—प्रतिदिन इस प्रकार जाननेवाला अर्थात् 'यह आत्मा हृदयमें है' इस प्रकार जाननेवाला पुरुष स्वर्गलोक—हृदयस्थ ब्रह्मको प्राप्त होता है । | | नन्वनेवंविदपि सुषुप्तकाले हार्दं ब्रह्म प्रतिपद्यत एव सुषुप्तकाले सता सोम्य तदा सम्पन्न इत्युक्तत्वात् । | **शङ्का—**किंतु इस प्रकार न जाननेवाला भी सुषुप्तकालमें ब्रह्मको प्राप्त होता ही है, क्योंकि सुषुप्तकालमें 'हे सोम्य ! उस समय यह सत्‌से सम्पन्न हो जाता है' ऐसा कहा गया है । | | बाढमेवं तथाप्यस्ति विशेषः । | **समाधान—**ठीक है, ऐसा ही है । तो भी कुछ विशेषता है । | | यथा जानन्नजानंश्च सर्वो जन्तुः | जिस प्रकार विद्वान् और अविद्वान् |

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३१


सद्ब्रह्मैव तथापि तत्त्वमसीति प्रतिबोधितो विद्वान्सद्देव नान्योऽस्मीति जानन्सद्देव भवति । एवमेव विद्वानविद्वांश्च सुषुप्ते यद्यपि तत्सम्पद्यते तथाप्येवंविदेव स्वर्गं लोकमेतीत्युच्यते । देहपातेऽपि विद्याफलस्यावश्यंभावित्वादित्येष विशेषः ॥ ३ ॥सभी जीव सद्ब्रह्म ही हैं, तथापि 'तू वह है' इस प्रकार घोषित किया हुआ विद्वान् 'मैं सत् ही हूँ, और कुछ नहीं' इस प्रकार जानता हुआ सत् ही हो जाता है। इसी प्रकार यद्यपि सुषुप्तमें विद्वान् और अविद्वान् दोनों ही सत्‌को प्राप्त होते हैं, तो भी केवल इस प्रकार जाननेवाला ही स्वर्गलोकको प्राप्त होता है—ऐसा कहा जाता है, क्योंकि देहपात होनेपर भी विद्याका फल अवश्यम्भावी है। यही इसकी विशेषता है ॥ ३ ॥

अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥ ४ ॥

यह जो सम्प्रसाद है वह इस शरीरसे उत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे युक्त हो जाता है। यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका 'सत्य' यह नाम है ॥ ४ ॥

सुषुप्तकाले स्वेनात्मना सतासुषुप्तकालमें अपने आत्मा सत्से सम्पन्न हुआ पुरुष सम्यक् रूपसे प्रसन्न होता है, अतः वह जाग्रत् तथा स्वप्नके विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे प्राप्त हुई
सम्पन्नः सन्सम्पक् प्रसीदतीति
जाग्रत्स्वप्नयोर्विषयेन्द्रियसंयोग-

८३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

८३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
जातं कालुष्यं जहातीति सम्प्रसादशब्दो यद्यपि सर्वजन्तूनां साधारणस्तथाप्येवं वित्स्वर्गं लोकमैतीति प्रकृतत्वादेष सम्प्रसाद इति संनिहितवद्यत्नविशेषात् ।कालिमाको त्याग देता है; इसलिये यद्यपि 'सम्प्रसाद' शब्द सम्पूर्ण जीवोंके लिये साधारण है, तो भी 'इस प्रकार जाननेवाला स्वर्गलोकको प्राप्त होता है' ऐसा [विद्वत्सम्बन्धी] प्रकरण होनेके कारण 'एष सम्प्रसादः' यह प्रयोग इस विद्वान्‌के लिये ही आया है; क्योंकि यहाँ संनिहितके समान विशेष यत्न किया गया है। *
सोऽथेदं शरीरं हित्वास्माच्छरीरात्समुत्थाय शरीरात्मभावनां परित्यज्येत्यर्थः । न त्वासनादिव समुत्थायेतीह युक्तम्; स्वेन रूपेणेति विशेषणात् । न ह्यन्यत उत्थाय स्वरूपं सम्पत्तव्यम् । स्वरूपमेव हि तन्न भवति प्रतिपत्तव्यं चेत्स्यात् । परं परमात्मलक्षणं विज्ञप्तिस्वभावं ज्योति-इस प्रकारका विवेक होनेके पश्चात् वह विद्वान् इस शरीरको त्यागकर इस शरीरसे उत्थान कर अर्थात् देहात्मबुद्धिको त्यागकर—यहाँ 'आसनसे उठनेके समान शरीरसे उठकर' ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है, क्योंकि 'स्वेन रूपेण' (अपने स्वरूपसे ) ऐसा विशेषण दिया गया है और अपने स्वरूपकी प्राप्ति किसी अन्य स्थानसे उत्थान करके की नहीं जाती, क्योंकि यदि वह प्राप्तव्य हो तो स्वरूप ही नहीं हो सकता—पर अर्थात् परमात्म-लक्षण विज्ञप्तिस्वरूप ज्योतिको प्राप्त

* 'एष सम्प्रसादः' में जो 'एषः' शब्दका प्रयोग किया हुआ है वही यत्न-विशेष है। जो वस्तु समीप होती है उसीके लिये 'एषः' ( यह ) का प्रयोग किया जाता है, अतः 'सम्प्रसाद' शब्दसे यद्यपि सामान्यतः सभी जीवोंका ग्रहण हो सकता है तथापि 'एषः' रूप विशेष यत्न होनेके कारण तीसरे मन्त्रमें कहे हुए प्रकरण-प्राप्त विद्वान्‌के लिये ही प्रयुक्त हुआ है क्योंकि वही समीप है।

खण्ड ३ ]शाङ्करभाष्य८३३
संस्कृतहिन्दी
रूपसम्पद्य स्वास्थ्यमुपगम्येत्ये-<br>तत् । स्वेनात्मीयेन रूपेणाभि-<br>निष्पद्यते। प्रागेतस्याः स्वरूपसम्प-<br>त्तेरविद्यया देहमेवापरं रूपमा-<br>त्मत्वेनोपगत इति तदपेक्षयेद-<br>मुच्यते स्वेन रूपेणेति ।हो अर्थात् आत्मस्थितिमें पहुँचकर स्वकीय अर्थात् अपने रूपसे सम्पन्न हो जाता है। इस स्वरूपप्राप्तिसे पूर्व वह अपररूप देहको ही अविद्याके कारण आत्मभावसे समझता था । उसीकी अपेक्षासे 'स्वेन रूपेण' (अपने स्वरूपसे) ऐसा कहा गया है।
अशरीरता ह्यात्मनः स्वरूपम् । यत्स्वं परं ज्योतिःस्वरूपमापद्यते सम्प्रसाद एष आत्मेति होवाच । स ब्रूयादिति यः श्रुत्या नियुक्तोऽन्तेवासिभ्यः । किञ्चैतदमृतमविनाशि भूमा "यो वै भूमा तदमृतम्” (छा० उ० ७।२४।१) इत्युक्तम् । अत एवाभयं भूम्नो द्वितीयाभावादत एतद्ब्रह्मेति ।अशरीरता ही आत्माका स्वरूप है। जिस अपने परञ्ज्योतिःस्वरूपको सम्प्रसाद प्राप्त होता है वही आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा । तात्पर्य यह है कि श्रुतिने जिसे नियुक्त किया है उस आचार्यको शिष्योंके प्रति ऐसा कहना चाहिये। तथा यही अमृत—अविनाशी भूमा है, क्योंकि “जो भूमा है वही अमृत है” ऐसा कहा जा चुका है। इसीसे यह अभय है, क्योंकि भूमासे भिन्न दूसरी वस्तुका अभाव है; इसलिये यह ब्रह्म है।
तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नामाभिधानम् । किं तत् ? सत्यमिति । सत्यं ह्यवितथं ब्रह्म । तत्सत्यं स आत्मेति ह्युक्तम् ।उस इस ब्रह्मका यह नाम—अभिधान है। वह क्या है?—सत्य । सत्य ही अवितथ (असद्विलक्षण) ब्रह्म है, क्योंकि 'वह सत्य है, वह आत्मा है' ऐसा पहले (छा० ६।८।७ में) कहा जा

८३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| अथ किमर्थमिदं नाम पुनरुच्यते ?<br><br>तदुपासनविधिस्तुत्यर्थम् ॥ ४ ॥ | चुका है । किंतु यह नाम किस-लिये कहा गया है ? [ इसपर कहते हैं—] उसकी उपासना-विधिकी स्तुतिके लिये ॥ ४ ॥ |

तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति तद्यत्सत्तदमृतमथ यत्ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥ ५ ॥

वे ये 'सकार', 'तकार' और 'यम्' तीन अक्षर हैं । उनमें जो 'सकार' है वह अमृत है, जो 'तकार' है वह मर्त्य है और जो 'यम्' है उससे वह दोनोंका नियमन करता है; क्योंकि इससे वह उन दोनोंका नियमन करता है इसलिये 'यम्' इस प्रकार जाननेवाला प्रतिदिन ही स्वर्गलोकको जाता है ॥ ५ ॥

| तानि ह वा एतानि ब्रह्मणो नामाक्षराणि त्रीण्येतानि सतीयमिति सकारस्तकारो यमिति च । ईकारस्तकार उच्चारणार्थोऽनुबन्धः;ह्रस्वेनैवाक्षरेण पुनः प्रतिनिर्देशात् । तेषां तत्तत्र यत्सत्सकारस्तदमृतं सद्ब्रह्म; अमृतवाचकत्वादमृत एव सकारस्तकारान्तो निर्दिष्टः । अथ यत्ति तका- | वे ये ब्रह्मके तीन नामाक्षर हैं 'स', 'ती' और 'यम' अर्थात् सकार, तकार और यम् हैं । तकारमें जो ईकार है वह उच्चारणमात्रके लिये अनुबन्ध है, क्योंकि पीछे ह्रस्व [ इकार ] से ही उसका निर्देश किया गया है । उनमेंसे वहाँ जो सत् यानी सकार है वह अमृत है—सद् ब्रह्म है । अमृतका वाचक होनेके कारण अमृतरूप सकारका ही तकारान्त निर्देश किया गया है । तथा जो 'ति' यानी तकार है |

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३५


रस्तन्मर्त्यम् । अथ यद्यमक्षरं तेनाक्षरेणामृतमर्त्याख्ये पूर्वे उभे अक्षरे यच्छति यमयति नियमयति वशीकरोत्यात्मनेत्यर्थः ।वह मर्त्य है और जो 'यम्' अक्षर है उस अक्षरसे अमृत और मर्त्यसंज्ञक पहले दोनों अक्षरोंका प्रयोग करनेवाला उनका नियमन करता है अर्थात् उसके नियमन स्वभावसे उन्हें वशीभूत करता है ।
यद्यस्मादनेन यमित्येतेनोभे यच्छति तस्माद्यम् । संयते इव ह्येतेन यमा लक्ष्येते ब्रह्मनामाक्षरस्यापीदममृतत्वादिधर्मवत्त्वं महाभाग्यं किमुत नामवत इत्युपास्यत्वाय स्तूयते ब्रह्मनामनिर्वचनेनैव । नामवतो वेत्तैवंवित् । अहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेतीत्युक्तार्थम् ॥ ५ ॥क्योंकि इस अक्षरके द्वारा इन दोनोंको नियमन करता है इसलिये यह 'यम्' है । इस 'यम्' अक्षरके द्वारा वे पूर्वोक्त दोनों अक्षर संयत-से दिखायी देते हैं । ब्रह्मके नामके अक्षरोंका भी यह अमृतत्वादि धर्मवान् होना परम सौभाग्य है, फिर नामीके विषयमें तो कहना ही क्या है ? इस प्रकार उसके उपास्यत्वके लिये ब्रह्मके नामका निर्वचन करके ही उसकी स्तुति की जाती है । उस नामीको जाननेवाला 'एवंवित्' कहलाता है । वह एवंवित् ( इस प्रकार जाननेवाला ) नित्यप्रति स्वर्गलोकको जाता है—ऐसा अर्थ पहले कहा ही जा चुका ह ॥५॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये तृतीयखण्ड- भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

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छा० उ० २७—

चतुर्थ खण्ड

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सेतुरूप आत्माकी उपासना

अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसम्मेदाय नैतꣳसेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतꣳसर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥ १ ॥

जो आत्मा है वह इन लोकोंके असम्भेद (पारस्परिक असंघर्ष) के लिये इन्हें विशेषरूपसे धारण करनेवाला सेतु है। इस सेतुका दिन-रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त हो सकते हैं। सम्पूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापशून्य है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ य आत्मेति। उक्तलक्षणो यः सम्प्रसादस्तस्य स्वरूपं वक्ष्यमाणैरुक्तैरनुक्तैश्च गुणैः पुनः स्तूयते ब्रह्मचर्यसाधनसम्बन्धार्थम्। य एष यथोक्तलक्षण आत्मा स सेतुरिव सेतुः। विधृतिर्विधरणः। अनेन हि सर्वं जगद्वर्णाश्रमादिक्रियाकारकफलादिभेदनियमैःउपर्युक्त लक्षणवाला जो सम्प्रसाद है उसके स्वरूपकी आगे कहे जानेवाले, पहले कहे हुए तथा बिना कहे हुए गुणोंसे ब्रह्मचर्यरूप साधनसे सम्बन्ध करानेके लिये पुनः स्तुति की जाती है। यह जो उपर्युक्त लक्षणोंवाला आत्मा है वह सेतुके समान सेतु है; विधृति—विशेषतः धारण करनेवाला है। कर्ता (जीव) के अनुरूप विधान करनेवाले इस आत्माके द्वारा ही सारा जगत् वर्णाश्रमादि क्रिया, कारक और

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३७


शाङ्करभाष्यशाङ्करभाष्यार्थ
कर्तुरनुरूपं विदधता विधृतम् । अध्रियमाणं हीश्वरेणेदं विश्वं विनश्येद्यतस्तस्मात्स सेतुर्विधृतिः।फलादि भेदके नियमोंद्वारा धारण किया गया है; क्योंकि ईश्वरद्वारा धारण न किये जानेपर यह विश्व नष्ट हो जाता, इसलिये वह इसे धारण करनेवाला सेतु है ।
किमर्थं स सेतुरित्याह—एषां भूरादीनां लोकानां कर्तृकर्मफलाश्रयाणामसंभेदायाविदारणायाविनाशायेत्येतत् । किंविशिष्टश्चासौ सेतुरित्याह । नैतं सेतुमात्मानमहोरात्रे सर्वस्य जनिमतः परिच्छेदके सती नैतं तरतः । यथान्ये संसारिणः कालेनाहोरात्रादिलक्षणेन परिच्छेद्या न तथायं कालपरिच्छेद्य इत्यभिप्रायः । “यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते” (बृ० उ० ४ । ४ । १६) इति श्रुत्यन्तरात् ।वह सेतु क्यों है ? इसपर श्रुति कहती है कि कर्ता और कर्मफलके आश्रयभूत इन भूलोक आदि लोकोंके असम्भेद-अविदारण अर्थात् अविनाश ( रक्षा ) के लिये यह सेतु है । यह सेतु किस विशेषणवाला है ? इसपर श्रुति कहती है—इस आत्मारूप सेतुको दिन और रात सम्पूर्ण उत्पत्तिशील पदार्थोंके परिच्छेदक होनेपर भी अतिक्रमण नहीं करते । जिस प्रकार अन्य संसारी पदार्थ अहोरात्रादिरूप कालसे परिच्छेद्य हैं उस प्रकार यह कालपरिच्छेद्य नहीं है—ऐसा इसका अभिप्राय है; जैसा कि “जिस ( परमात्मा ) से नीचे संवत्सर दिनोंके रूपमें परिवर्तित होता रहता है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
अत एवैनं न जरा तरति न प्राप्नोति तथा । न मृत्युर्न शोकोइसीसे इसे जरा नहीं तरती; अर्थात् प्राप्त नहीं होती। इसी प्रकार न मृत्यु, न शोक, न सुकृत-दुष्कृत

८३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

८३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| न सुकृतं न दुष्कृतं सुकृतदुष्कृते धर्माधर्मौ। प्राप्तिरत्र तरणशब्देनाभिप्रेता नातिक्रमणम्। कारणं ह्यात्मा। न शक्यं हि कारणातिक्रमणं कर्तुं कार्येण। अहोरात्रादि च सर्वं सतः कार्यम्। अन्येन ह्यन्यस्य प्राप्तिरतिक्रमणं वा क्रियेत। न तु तेनैव तस्य। न हि घटेन मृत्प्राप्यतेऽतिक्रम्यते वा। | और न धर्माधर्म ही प्राप्त होते हैं। यहाँ 'तरण' शब्दसे प्राप्ति अभिप्रेत है, अतिक्रमण नहीं; क्योंकि आत्मा कारण है और कार्यके द्वारा कारणका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। दिन और रात्रि आदि ये सब सत्के ही कार्य हैं; और अन्यके द्वारा अन्यकी ही प्राप्ति अथवा अतिक्रमण किया जाता है, अपने द्वारा अपनी ही प्राप्ति या अतिक्रमण नहीं किया जाता—घटके द्वारा मृत्तिका प्राप्त या अतिक्रान्त नहीं की जा सकती। | | यद्यपि पूर्वं य आत्मापहतपाप्मेत्यादिना पाप्मादिप्रतिषेध उक्त एव तथापीहायं विशेषो न तरतीति प्राप्तिविषयत्वं प्रतिषिध्यते। तत्राविशेषेण जराद्यभावमात्रमुक्तम्। अहोरात्राद्या उक्ता अनुक्ताश्चान्ये सर्वे पाप्मान उच्यन्तेऽतोऽस्मादात्मनः सेतोर्निवर्तन्तेऽप्राप्यैवेत्यर्थः। अपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक उक्तः ॥ १ ॥ | यद्यपि पहले 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि वाक्यसे पाप आदिका प्रतिषेध कर दिया गया है तथापि यहाँ यह विशेषता है कि 'न तरति' इस वाक्यसे आत्माके प्राप्ति-विषयत्वका प्रतिषेध किया जाता है। उसमें सामान्यरूपसे जरादिका अभावमात्र बतलाया गया है। पूर्वोक्त दिन और रात्रि आदि तथा अन्य अनुक्त पदार्थ सभी पाप कहे जाते हैं। अतः वे इस आत्मारूप सेतुसे इसे प्राप्त किये बिना ही निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक—जिसमें ब्रह्म ही लोक है—अपहतपाप्मा कहा गया है ॥ १ ॥ |

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३९

यस्माच्च पाप्मकार्यमान्ध्यादि-<br>शरीरवतः स्यान्न त्वशरीरस्य—क्योंकि पापके कार्य अन्धत्वादि<br>शरीरवान्‌को ही होते हैं, अशरीर-<br>को नहीं—

तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥

इसलिये इस सेतुको तरकर पुरुष अन्धा होनेपर भी अन्धा नहीं होता, विद्ध होनेपर भी अविद्ध होता है, उपतापी होनेपर भी अनुपतापी होता है, इसीसे इस सेतुको तरकर अन्धकाररूप रात्रि भी दिन ही हो जाती है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है॥ २ ॥

तस्माद्वा एतमात्मानं सेतुं तीर्त्वा प्राप्यानन्धो भवति देहवत्त्वे पूर्वमन्धोऽपि सन्। तथा विद्धः सन्देहवत्त्वे स देहवियोगे सेतुं प्राप्याविद्धो भवति। तथोपतापी रोगाद्युपतापवान्सन्ननुपतापी भवति। किञ्च यस्मादहोरात्रे न स्तः सेतौ तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वा प्राप्य नक्तमपि तमोरूपं रात्रिरपि सर्वमहरेवा-इसीसे सेतुरूप इस आत्माको तरकर-प्राप्त होकर देहवान् होनेके समय पहले अन्धा होनेपर भी-अनन्ध हो जाता है। इसी प्रकार देहवान् होनेके समय विद्ध होनेपर भी देहका वियोग होनेपर इस सेतुको प्राप्त होकर अविद्ध हो जाता है तथा [ देहवान् होनेके ही समय ] उपतापी-रोगादि उपताप वाला होनेपर भी अनुपतापी हो जाता है। इसके सिवा क्योंकि इस [ आत्मारूप ] सेतुमें दिन-रातका अभाव है इसलिये इस सेतुको तरकर-प्राप्त होकर नक्त-तमोरूपा रात्रि भी सम्पूर्ण दिन ही

८४० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ८

८४०छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ८

| भिनिष्पद्यते । विज्ञप्त्यात्मज्यो-<br>तिःस्वरूपमहरिवाहः सदैकरूपं<br>विदुषः सम्पद्यत इत्यर्थः । सकृ-<br>द्विभातः सदा विभातः सदैकरूपः<br>स्वेन रूपेणैष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥ | हो जाती है । तात्पर्य यह है कि<br>विद्वान्‌के लिये वह दिनके समान<br>विज्ञानात्मज्योतिःस्वरूप दिन अर्थात्<br>सर्वदा एक रूप ही हो जाता है,<br>क्योंकि यह ब्रह्मलोक अपने<br>स्वाभाविकरूपसे सकृद्विभातः — सदा<br>भासमान अर्थात् सदा एक रूप<br>है ॥ २ ॥ |


तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामे-<br>वैष ब्रह्मलोकस्तेषाग्ँ सर्वेषु लोकेषु कामचारो<br>भवति ॥ ३ ॥

वहाँ ऐसा होनेके कारण जो इस ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्यके द्वारा [शास्त्र एवं आचार्यके उपदेशके अनुसार] जानते हैं उन्हींको यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता है तथा उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति हो जाती है ॥ ३ ॥

| तत्तत्रैवं यथोक्तं ब्रह्मलोकं ब्रह्मच-<br>र्येण स्त्रीविषयतृष्णात्यागेन शास्त्रा-<br>चार्योपदेशमनुविन्दन्ति स्वात्म-<br>संवेद्यतामापादयन्ति ये तेषामेव<br>ब्रह्मचर्यसाधनवतां ब्रह्मविदामेष<br>ब्रह्मलोकः । नान्येषां स्त्रीविषय-<br>सम्पर्कजाततृष्णानां ब्रह्मविदाम- | वहाँ ऐसा होनेके कारण जो<br>इस पूर्वोक्त ब्रह्मलोकको ब्रह्मचर्य—<br>स्त्रीविषयक तृष्णाके त्यागद्वारा<br>शास्त्र एवं आचार्यके उपदेशके<br>अनन्तर जानते हैं अर्थात् स्वात्मसं-<br>वेद्यताको प्राप्त कराते हैं उन<br>ब्रह्मचर्यरूप साधनसम्पन्न ब्रह्मो-<br>पासकोंको ही यह ब्रह्मलोक प्राप्त<br>होता है। अन्य स्त्रीविषयक सम्पर्क-<br>जनित तृष्णावालोंको ब्रह्मोपासक<br>होनेपर भी इसकी प्राप्ति नहीं |

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१


पीत्यर्थः । तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवतीत्युक्तार्थम् । तस्मात्परमेतत् साधनं ब्रह्मचर्यं ब्रह्मविदामित्यभिप्रायः ॥ ३ ॥होती—ऐसा इसका तात्पर्य है । उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें स्वेच्छागति हो जाती है—इस प्रकार इसका अर्थ पहले कहा जा चुका है । अतः अभिप्राय यह है कि यह ब्रह्मचर्य ब्रह्मोपासकोंका परम साधन है ॥ ३ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये चतुर्थ-
खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥

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पञ्चम खण्ड

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यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यदृष्टि

य आत्मा सेतुत्वादिगुणैः स्तुतस्तत्प्राप्तये ज्ञानसहकारिसाधनान्तरं ब्रह्मचर्याख्यं विधातव्यमित्याह । यज्ञादिभिश्च तत्स्तौति कर्तव्यार्थम्—जिस आत्माकी सेतुत्वादि गुणोंसे स्तुति की गयी है उसकी प्राप्तिके लिये ज्ञानसे इतर ज्ञानके सहकारी साधन ब्रह्मचर्यका विधान करना आवश्यक है; इसीसे श्रुति कहती है; तथा उसकी कर्तव्यताके लिये यज्ञादिरूपसे उसकी स्तुति करती है—

अथ यद्यज्ञं इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥

अब, [ लोकमें ] जिसे 'यज्ञ' ( परमपुरुषार्थका साधन ) कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है वह ब्रह्मचर्यके द्वारा ही उस ( ब्रह्मलोक ) को प्राप्त होता है । और जिसे 'इष्ट' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा पूजन करके ही पुरुष आत्माको प्राप्त होता है ॥ १ ॥

अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते लोके परमपुरुषार्थसाधनं कथयन्ति शिष्टास्तद्ब्रह्मचर्यमेव । यज्ञस्यापिअब, जिसे 'यज्ञ' ऐसा कहा जाता है अर्थात् लोकमें जिसे शिष्ट पुरुष परम पुरुषार्थका साधन बतलाते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है ।

खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ८४३


यत्फलं तद्ब्रह्मचर्यवाँल्लभतेऽतो यज्ञोऽपि ब्रह्मचर्यमेवेति प्रतिपत्तव्यम् । कथं ब्रह्मचर्यं यज्ञ इत्याह । ब्रह्मचर्येणैव हि यस्माद्यो ज्ञाता स तं ब्रह्मलोकं यज्ञस्यापि पारम्पर्येण फलभूतं विन्दते लभते ततो यज्ञोऽपि ब्रह्मचर्यमेवेति । यो ज्ञातेत्यक्षरानुवृत्तेर्यज्ञः ब्रह्मचर्यमेव ।<br><br>अथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् । कथम्; ब्रह्मचर्येणैव साधनेन तमीश्वरमिष्ट्वा पूजयित्वाथवैषणामात्मविषयां कृत्वा तमात्मानमनुविन्दते । एषणादिष्टमपि ब्रह्मचर्यमेव ॥ १ ॥यज्ञका भी जो फल है उसे ब्रह्मचर्यवान् पुरुष प्राप्त करता है, इसलिये यज्ञको भी ब्रह्मचर्य ही समझना चाहिये । ब्रह्मचर्य यज्ञ किस प्रकार है ? —इसपर श्रुति कहती है—क्योंकि जो ज्ञानवान् है वह उस ब्रह्मलोकको, जो कि परम्परासे यज्ञका भी फलस्वरूप है, ब्रह्मचर्यसे ही प्राप्त करता है; अतः यह भी ब्रह्मचर्य ही है। 'यो ज्ञाता' इन अक्षरोंकी अनुवृत्ति होनेके कारण ब्रह्मचर्यको ही यज्ञ कहा गया है ।<br><br>तथा जिसे 'इष्ट' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है । किस प्रकार ? —पुरुष उस ईश्वरको ब्रह्मचर्यरूप साधनसे ही यजन कर-पूजकर अथवा आत्मविषयक एषणा कर उस आत्माको शास्त्र एवं आचार्यके उपदेशानुसार साक्षात् जानता है । उस एषणाके कारण इष्ट भी ब्रह्मचर्य ही है ॥ १ ॥

अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्य वात्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥