इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
प्राणायाम
से ही नित्य यज्ञ करने की प्रथा डाली थी और यज्ञ की हवि में चीनी, मीठा मिलाया ही जाता है।
न वै स्वयं तदशीयादितिथि यन्न भोजयेत्।
धन्य यशस्यमायुष्य स्वार्थं वाजितिथिपूजनम्॥
मनु ३/१०६
अर्थ- जो अतिथि को भेजनार्थ न दे उसमें से आप भोजन न करें, यह अतिथि पूजन धन्य है, धन हितार्थ, यश, आयु तथा स्वर्ग का देने वाला है।
अब आप समझ गये होंगे कि यह पीछों यज्ञ मनुष्य जीवन में कितने उपयोगी हैं। नित्य नियमित रूप से करने के लिए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की लिखित पंच महायज्ञ विधि में देखें।
प्राणायाम
मनुष्य शरीर में सबसे अधिक महत्व का अंग है तो वह फेफड़े हैं। फेफड़े हर समय श्वास की गति के साथ दृषित रक्त को लेकर उसे शुद्ध करके बाहर धमनियों में भेज देते हैं। जब मशीन से कार्य नहीं लिया जाता है तो उसे जंग लग जाती है। और अन्त में वह मशीन बेकार होकर समाप्त हो जाती है। यही स्थिति हमारे फेफड़ों की है। हम जो श्वास हर समय लेते हैं वह इतनी गति का नहीं होता कि वह फेफड़े के सबसे निचले भाग में वायु पहुँचा सके। सबसे निचले भाग में वायु पहुँचाने के लिए और उसे बेकार होने से बचाने के लिए पूर्वजों ने प्राणायाम को रखा है। फेफड़े के सबसे निचले भाग में जब वायु नहीं पहुँचेगी तो फेफड़े के उस भाग के छिद्रों में रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा, और जब रक्त शुद्ध होने के लिए नहीं पहुँचेगा तो वह भाग कर्महीन होता हुआ उसी प्रकार बेकार हो जायेगा जिस प्रकार
इच्छानुसार सन्तान
५३
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
प्रयोग में न आने वाली मशीन जंग लगकर बेकार हो जाती है। इसी प्रकार फेफड़े का निचला भाग बिगड़ने लगता है जिस कारण सबसे भयंकर रोग क्षय (टी॰बी॰) हो जाती है। फेफड़े के गल जाने को ही क्षय (टी॰बी॰) कहते हैं। दूसरे हमारी आयु श्वासों पर आधारित है। नित्य के कार्यों में जैसे भागना, अधिक परिश्रम का कार्य करना, सोना, मैथुन आदि में स्वभाविक श्वैसों की अपेक्षा अधिक श्वैसों का व्यय होता है। उसकी पूर्ति करने के लिए प्राणायाम करना आवश्यक है। प्राणायाम से तेज, बल, स्मृति भी प्राप्त होती है इसलिए प्रत्येक मनुष्य को नित्य कम से कम ३ प्राणायाम तो अवश्य ही करने चाहिए। यदि इससे अधिक करें तो और भी उत्तम है। नित्य प्राणायाम के अभ्यासी को फेफड़ों का कोई भी भयानक रोग नहीं लगता; प्राणायाम से क्षय (टी.बी.) श्वैस रोग, नजला जुकाम आदि अनेक रोग शरीर से दूर रहते हैं और शरीर पुष्ट रहता है।
प्रथम श्वैस को तीव्रगति से बाहर फेंकना और बाहर ही रोकना और पुनः गहरा श्वैस तीव्रगति से भीतर खींचकर रोकना। जब दम घुटने लगे तो धीरे-धीरे श्वैस को बाहर निकालना। यह एक प्राणायाम हुआ, श्वैस को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं और श्वैस को बाहर ही रोकने को रेचक कुम्भक कहते हैं। श्वैस को अन्दर खींचने को पूरक कहते हैं और श्वैस को अन्दर ही रोकने को पूरक कुम्भक कहते हैं। श्वैस खींचने में जितना समय लगे उससे चौगुना रोकने में, और उससे दुगुना श्वैस को बाहर छोड़ने में लगाना चाहिए।
शरद ऋतु में भत्रिका प्राणायाम करने से ठण्ड का विकार नहीं होता और फेफड़े सुदृढ़ होते हैं। भत्रिका प्राणायाम श्वैस को तीव्रगति के साथ लेना और छोड़ना। जैसे बाजे की धौकनी निरन्तर बिना रुके चलती है उसी प्रकार श्वैस बिना रोके जल्दी जल्दी लम्बे खींचना और छोड़ना।
इच्छानुसार सन्तान
५४
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
प्राणायाम के अनेक भेद हैं जिन्हें समझने के लिए किसी योग्य शिक्षक की आवश्यकता है। परन्तु प्रत्येक व्यक्ति को योग्य शिक्षक मिल जाय, यह सम्भव नहीं। इसी कारण अधिकांश व्यक्ति प्राणायाम के लाभ से वंचित रह जाते हैं। शुद्ध खाद्य पदार्थों के अभाव में मानव की जठराग्नि दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है जिसके कारण से मानव में 'वात और कफ' सम्बन्धी रोग बढ़ते चले जा रहे हैं। शरीर में ऊष्मा कम होने पर ही शरीर शिथिल होने लगता है। शरीर की ऊष्मा को सही अनुपात में स्थित रखने के लिए हमारे योगियों ने 'भस्त्रिका' प्राणायाम करने की व्यवस्था दी है, जिसके द्वारा शरीर में ऊष्मा उचित मात्रा में उत्पन्न होकर जठराग्नि को बलिष्ठ बनाता है और जठराग्नि के बलिष्ठ होने से पाचन क्रिया सही होती है, पाचन क्रिया सही होने से भोजन का रस उत्तम बनता है और उत्तम रस से शरीर की सभी धातुएँ पुष्ट होकर शरीर निरोगी बनता है और 'वात-कफ' सम्बन्धी समस्त रोगों से मुक्ति पाता है। 'भस्त्रिका' प्राणायाम को प्रत्येक व्यक्ति बड़ी सुामता से घर बैठे कर सकता है, यह प्राणायाम कई प्रकार से होता है उसके कुछ प्रकार हम यहाँ प्रस्तुत करते हैं।
१- पद्यासन या सुखासन में बैठ कर अपने दाहिने हाथ का अंगूठा नासिका को दाहिनी ओर रखें और बाँच की दो अंगुलियाँ नासिका के बायीं ओर रखें पहले अंगुलियों से बायें नथने को दबा कर बन्द करें और दाहिने नथने से लम्बा श्वास खींच कर अंगूठे से दबा कर बन्द करें बायें नथने से अंगुलियाँ हटाकर श्वास को लम्बाई के साथ बाहर छोड़ें, जब पूरा श्वास बाहर निकल जाये तो उसी नथने से श्वास खींचें। इसी प्रकार जिस नथने से श्वास खींचा है उससे दूसरे नथने से श्वास छोड़ें और जिससे श्वास छोड़ी है उसी से श्वास खींच कर दूसरे नथने से छोड़ें। इसी प्रकार इस क्रिया को करते रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार क्रिया को तीव्र करते रहें और पहले २ मिनट से अध्यास
इच्छानुसार सन्तान
५५
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
करें और शनैः शनैः समय बढ़ाते जायें।
२- केवल एक नथने को बन्द करके दूसरे नथने से लम्बे-लम्बे श्वैस खींचना और छोड़ना, कुछ देर पश्चात् इसी क्रिया को दूसरे नथने से करना।
३- सीधे बैठ कर नासिका को बिना हाथ लगाये दोनों नथनों से एक साथ श्वैस खींचना और छोड़ना।
४- सीधे बैठ कर बाँयें हाथ को कमर के पीछे भूमि पर पंजा खोल कर रखें हाथ का अंगूठा नितम्ब के मध्य रीढ़ की हड्डी के पास लगा दो दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका के दायें नथने को बन्द करके और ठोड़ी को बायें कन्धे के पास तक घुमाकर बायें नथने से लम्बे लम्बे श्वैस खींचें और छोड़ें इसी प्रकार दायी हाथ कमर के पीछे रखकर हाथ का अंगूठा नितम्ब के मध्य रीढ़ की हड्डी के पास लगाकर बायें हाथ के अंगूठे से बायीं नथना बन्द करके और ठोड़ी को दायें कन्धे के पास घुमाकर दायें नथने से लम्बे लम्बे श्वैस खींचें और छोड़ें।
५- सीधे बैठ कर दोनों नथनों से एक साथ सीधा श्वैस न खींच कर उसे समान बराबर के छः टुकड़ों में खींचें और इसी अनुपात के तीन टुकड़ों के समय तक रोकने के पश्चात् उपरोक्त छः टुकड़ों के समान ही छः टुकड़ों में बाहर छोड़ें और उसी अनुपात के तीन टुकड़ों के समय तक बाहर ही रोकें यह एक प्राणायाम हुआ इसी प्रकार पांच प्राणायाम करें और सामर्थानुसार बढ़ाते जायें।
यह पांचों प्रकार के प्राणायाम भक्तिका प्राणायाम ही हैं, यह दोष रहित प्राणायाम हैं, इनके करते रहने में किसी भी प्रकार की हानि पहुँचने की सम्भावना नहीं है। हर प्रकार के प्राणायाम के समय कमर, रीढ़ की हड्डी सीधी रहनी चाहिये और मूलबन्ध बराबर लगा रहना चाहिए मूलबन्ध का अर्थ है गुदा और मूत्रेन्द्रिय को ऊपर खींचे रहना। प्रत्येक प्रणायाम को पहले हल्के-हल्के
इच्छानुसार सन्तान
५६
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
आहार
करना चाहिए, कुछ दिनों के अभ्यास के पश्चात् गति और मात्रा को अपनी शक्ति और सामर्थ्यानुसार बढ़ाते रहना चाहिए। प्राणायाम का समय प्रातः काल का उचित है। यह अपने गृह पर एकाग्रता और स्वच्छ कमरे में बैठ कर करना चाहिए, ग्रीष्म ऋतु में द्वार खिड़की आदि को खोल देना चाहिए और शरद ऋतु में बन्द कर सकते हैं। प्राणायाम के अभ्यासी को घी और दूध की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
★★★
आहार
भोजन हर प्राणी को जीवित रहने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। भोजन से शरीर में रस, रक्त, मांस, मेष, अस्थि मज्जा और वीर्य पदार्थ बनकर मन, वाणी और तेज को प्राप्त होते हैं। भोजन से बल पुरुषार्थ और बुद्धि भी बनती है। जिस प्रकार का और जिस भावना के वातावरण के साथ मनुष्य भोजन करेगा। उसका मन, भावना और बुद्धि वैसी ही बन जायेगी। यदि भोजन करते समय मन को अन्दर काम भाव आये और आपने काम भावनाओं से युक्त चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठ कर भोजन किया है, तो आपकी काम भावना भोजन के पश्चात् पहले की अपेक्षा चौगुनी हो जायेगी। उसी प्रकार बुद्धि की तीव्रता, बल और तेज की प्राप्ति के लिए, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसी ही भावना और वैसे ही चित्रों से सुसज्जित कमरे में बैठकर भोजन करें। आपको जैसा अपना मन, बुद्धि आदि बनानी हो, भोजन से और भोजन समय की भावनाओं से वैसा ही मन बन जाता है। भोजन समय की भावनाओं द्वारा मनुष्य अपने मन, बुद्धि को जिधर ले जाना चाहे ले जा सकते हैं।
अनमशितं त्रेधा विधीयते तस्य वः छान्दोग्य स्यविस्तो धातुस्तत् पुरीष भवति, यो उपनिषद् मध्यम स्तन्मा थं सं योऽणिष्ठस्तन्मनः॥ ६/५/१
इच्छानुसार सन्तान ५७ वीरेन्द्र गुप्ताः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थ- जब 'अन्न' खाना खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है उसका सबसे स्थूल भाग मल बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस और जो सबसे सूक्ष्म भाग है वह मन बन जाता है।
आपः पीता स्नेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातु स्तन्मूर्त्रं भवति यो मध्यम • स्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः॥
छान्दोग्य ३- ६/५/२
अर्थ- जब जल पिया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, उसका जो सबसे स्थूल भाग है वह मूर्त्र बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह रुधिर और सबसे सूक्ष्म भाग है वह प्राण बन जाता है।
तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातु स्तदस्थि भवति, यी मध्यमः समज्जा योऽणिष्ठः सा वाक्॥
छान्दोग्य ३- ६/५/३
अर्थ- जब तेज (अर्थात् जो तेल घी आदि में है वा जो अन्न में मिला हो) खाया जाता है, तो वह तीन प्रकार का बन जाता है, जो स्थूल भाग है वह हृद्धी बन जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा और सबसे सूक्ष्म भाग है वह वाणी बन जाता है।
प्रत्येक वस्तु अन्न जल और तेज, तीनों की बनी हुई है, इस लिए जो कोई वस्तु खाता है, उसमें इन तीनों का भाग पाया जाता है, चाहे उनका न्यूनाधिक भाग कुछ ही हो।
उपरोक्त प्रणाली से आप अनुमान लगालें कि अन्न, जल और घी आदि भोजन से क्या-क्या बनता है। इसलिए संस्कारित शुद्ध और ताजा भोजन खाना चाहिए, बासी भोजन आलस्य उत्पन्न और बुद्धि को मन्द कर देता है।
इच्छासम्पन्न संततः तीर्थेन्द्र गुप्तः CC-0 Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
पुजितं हृशन नित्यं बलमूर्ज च यच्छति। अपुजितं तु तद भुक्तमुभयं नाशयेदितम्।।
मनु २/५५
अर्थ- संस्कृत अन्न वीर्य को देता है और असंस्कृत अन्न बल, सामर्थ्य इन दोनों का नाश करता है। (इसलिए शुद्ध पवित्र भोजन बलिवैश्य यज्ञ करके खाना चाहिए)
भोजन का स्थान एकात्म, स्वच्छ, पवित्र और सुन्दर होना चाहिए। क्रोध तथा शोक के समय में खाया हुआ भोजन शरीर में रस के स्थान पर विष बनाता है। इसलिये क्रोध और शोक के समय भोजन न करना चाहिए। भोजन के पात्र सुन्दर, आकर्षक और स्वच्छ हों।
भोजन के समय माता, पिता, वैद्य, मित्र, परिवार जन और पाककर्ता के अतिरिक्त अन्य किसी को समीप न रहने दो तथा मोर, चकोर, वानर, मुर्गा की दृष्टि के अतिरिक्त अन्य का दृष्टिपात योग्य नहीं।
भोजन करने के प्रथम अदरक और लवण की बनी चटनी खा लेनी चाहिए, इससे रुचि बढ़ती है और ग्रन्थियां खूब रस देने लगती हैं। यह रस पाचन में विशेष स्थान रखता है। तत्पश्चात् मधुर चिकना हलन्गरी घी, चावल, मीठा, फल, दही, रोटी उत्तम शाक के साथ धीरे-धीरे खाना चाहिए और अन्त में रुचिपूर्वक मिश्री युक्त दूध पियें। भोजन के आदि में जल पीने से मन्दाग्नि तथा भोजन के अन्त में जल पीने से विष सद्गुण और कफ को बढ़ाने वाला होता है। इसलिए भोजन के मध्य में थोड़ा सा जल धीरे-धीरे पीना चाहिए। जो अमृत के तुल्य है। भोजन के उपरान्त एक घण्टे के पश्चात् जल पीने से बल बढ़ता है।
अजीर्णं भैषजं वारि जीर्णं वारि बलप्रदम्।
भोजने चामृत वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।
चाणक्य नीति ८/७
इच्छानुसार सन्तान
५९
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थ- जल अजीर्ण (कब्जा) में औषधि है, पच जाने पर बल देने वाला है भोजन के मध्य में जल अमृत के समान है, और वही भोजन के अन्त में विष का फल देता है।
भोजन करते समय इस बात का ध्यान रखना उचित है कि आधा पेट भोजन से भर लें और चतुर्थ भाग जल से तथा शेष चतुर्थ भाग वायु के लिए रिक्त रहने दें। इस प्रकार की मात्रा से भोजन कभी अजीर्ण नहीं करता और सदैव सुख देता है। अधिक प्यास लगी होने पर भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन करने से गुल्म रोग हो जाता है, इसलिए जल पीकर एक घण्टे पश्चात् भोजन करें। भूख लगने पर जल नहीं पीना चाहिए। जल पी लेने से जलोदर हो जाता है। भोजन सदैव सादा हल्का शीघ्र ही पच जाने वाला खाना चाहिए। अधिक मसालेदार भोजन से हानि होती है। भोजन को भली प्रकार चबा-चबाकर खाना चाहिए। एक-एक ग्राम को ३२ बार चबाना चाहिए जिससे उसमें लार गिल्हियों का रस पूरी मात्रा में मिलकर पाचन क्रिया को ठीक रखे। प्रभु ने दंत भोजन पीसने को दिये हैं और आँतें पचाने के लिए। जो मनुष्य दंतों का काम आँतों से लेते हैं वह सदैव रोगी रहते हैं। उनकी आँतें शक्ति हीन होकर अपना भी कार्य करने में असमर्थ हो जाती हैं। भोजन सदैव निश्चित समय पर ही करना उचित है। कहावत है कि हजार काम छोड़ कर नहाना और सौ काम छोड़कर खाना। भोजन हाथ पैर और मुख थोकर करना चाहिए इससे आयु और बल बढ़ता है।
शतं विहाय भोकव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्। लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजेत्॥
महाभारत
अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़कर स्नान करना चाहिये, लाख काम छोड़कर दान और करोड़ों कामों को त्यागकर प्रभु चिन्तन अर्थात् सन्ध्यापासनादि करना चाहिये।
इच्छानुसार सन्तान
६०
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
आर्त्तादास्तु भुंजीत नाद्रपदास्तु सविशोत्। आद्रपदिस्तु भुजानो दीर्घमायुखात्नयात्।।
मनु ४/७६
अर्थ- गीले पैर भोजन करे, किन्तु गीले पैर सोवे नहीं। क्योंकि गीले पैर भोजन करने वाला दीर्घायु पाता है। न स्नानमाचरेद्भुक्त्वा नातुरो न महानिधि। न वासोभिः सुहजस्त्रं नाडविज्ञाते जलाशये।।
मनु ४/१२९
अर्थ- भोजन करके, रोग में, मध्य रात्रि में, कपड़ों के साथ और जहाँ पानी गहरा हो और विदित न हो ऐसे जलाशय तथा समय में स्नान न करे।
भोजन के पश्चात् हाथ मुख धोकर दोनों हाथों को मसल कर नेत्र और मुख पर फेरने से तेज और ज्योति बढ़ती है। मस्तिष्क और सर पर हाथ फेरने से बुद्धि बढ़ती है। भोजन करके १०० कदम टहलो कार्यवश बैठे रहने से शरीर भारी होता है, सीधे खाट पर लेटे रहने से अन्न नहीं पचता और दौड़ने वाले के साथ तो मानो मृत्यु ही दौड़ती है। रात्रि को सोते समय दूध अवश्य ही पीना चाहिए। क्योंकि दूध पीने से जो दिन में विदाही लवण, कटु, तिक आदि पदार्थ खाये जाते हैं, उनका विदाह शान्त होकर मीठा हितकारी पाक होता है।
★★★
इच्छानुसार सन्तान
६१
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
संध्या समय
संध्या समय
कुर्वैलिन दन्तलोपधारिणं
बाहवशिणं निष्कुरभाषिणं च।
सूर्यादये चास्तिमिते शयान
विमुञ्चति श्रीयदि चक्रपाणिः॥
चाणक्य नीति १५/४
अर्थ- मलीन वस्त्र वाले को, दांतों के मल को दूर न करने वाले को, बहुत भोजन करने वाले को कटुभाषी को और सूर्य के उदय और अस्त के समय में सोने वाले को लक्ष्मी छोड़ देती है। चाहे वह विष्णु भी हों।
संध्या समय १. भोजन २. मैथुन ३. अध्ययन और ४. निद्रा यह चार कार्य मत करो, क्योंकि संध्या के भोजन से रोग मैथुन से भयंकर सन्तान होती है।
जब दिति स्त्री धर्म से शुद्ध हुई तब उसने संध्या समय भोग करने की इच्छा करके कश्यप जी अपने पति के पास जाकर कहा, कि इस समय मुझे कामदेव दुःख दे रहा है व मेरे सौत के बेटे राजसिंहासन का सुख भोगते हैं। यह दुःख मुझसे सहा नहीं जाता, सो मेरी चिन्ता दूर कीजिए। यह वचन सुनकर मरीचि के बेटा कश्यप मुनि बोले हे दिति! इस समय तेरे साथ भोग व विलास, जो बहुत बुरा काम है नहीं कर सकता, संध्या से चार घड़ी रात बीते तक व चार घड़ी रात रहे से प्रातः काल तक सवाय लेने नाम व करने ध्यान परमेश्वर के दूसरा काम न करना चाहिए। इसलिए तू चार घड़ी और धैर्य रख जिसमें परमेश्वर के भजन व स्मरण का समय बीत जावे। उस समय दिति कामदेव के मद में ऐसी मतवाली हो रही थी कि अपने पति के समझाने पर भी उसने सन्तोष नहीं करके लाज व शर्म को छोड़ दिया व
इच्छानुसार सन्तान
६२
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
कश्यप जी के शरीर का कपड़ा पकड़ कर भोग करने के वास्ते हठ किया तब कश्यप जी ने हार मानकर उसके साथ भोग करके कहा- हे दिति! इस समय तुने जो यह अधर्म किया। इस पाप करने से तेरे दो पुत्र, ब्राह्मण व ऋषि आदि सब जीवों को दुःख देने वाले ऐसे बलवान् उत्पन्न होंगे कि कोई देवता या दैत्य या मनुष्य उनसे लड़ाई में सामना करने से जीत न सकेगा। दिति ने यह बात सुनते ही बहुत उदास होकर अपने पति से हाथ जोड़कर विनय की, महाराज मेरी इच्छा यह थी कि मेरे बेटे देवताओं को जीतकर अमरावती पुरी का राज्य करके सुख भोगें मुझको यह कामना नहीं थी कि मेरे बालक अधर्मी होकर ब्राह्मण आदि जीवों को दुःख देंगे, ऐसे पापी बेटे लेकर मैं क्या करूँगी। दिति का यह बचन सुनकर व उसे बहुत उदास देखकर कश्यप मुनि बोले, हे दिति! अब क्या किया जाय इस समय भोग करने का प्रभाव यही है इसी वास्ते में मना करता था परन्तु कुकर्म करने के पीछे शांच करता है। दिति के दोनों पुत्रों का नाम है- १. हिरण्याक्ष २. हिरण्यकशिपु। वास्तव में दोनों ही भयंकर सन्तानों के रूप थे।
सुखसागर तीसरा स्कन्ध,
१४ अध्याय
अध्यायन से आयु क्षय और निद्रा से दरिद्रता होती है किन्तु संध्या समय ईश्वराधना यह सर्वोत्तम कार्य सबको करना योग्य है।
नाशनीयात्संधिवेलायां न गच्छेन्नापिसिंविशैत्।
न चैव प्रलिखेदभूमिं नात्पनोपहरेत्स्वजम्॥
मनु ४/५
अर्थ- संध्याकाल में भोजन, शयन, यात्रा न करे और न भूमि पर लकीर खींचे और पहनी हुई माला को न निकाले।
★★★
इच्छानुसार सन्तान
६३
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
निद्रा
निद्रा
जिस प्रकार शरीर संचालन के लिए हमें भोजन की आवश्यकता रहती है, उसी प्रकार जब हमारे शरीर के अंग प्रत्यंग कार्य करते-करते थक जाते हैं और वे विश्राम करना चाहते हैं तब वही विश्राम हमारी निद्रा लेने से हमारे शरीर यन्त्र थकान को दूर करके पुनः नये बन जाते हैं, यदि निद्रा न हो तो थोड़े ही समय में शरीर नष्ट हो जाय। जिस प्रकार रेल का इंजिन २४ घण्टे बराबर चलने से तप्त हो जाता है, यदि वह इंजिन उस समय नहीं बदला जाय तो वह गर्मी से फट कर नष्ट हो जाय। यही स्थिति इस शरीर को है यदि निद्रा न ली जाय तो शरीर में कोई न कोई उपद्रव खड़ा होकर स्वास्थ्य को नष्ट कर डालेगा। पूर्ण निद्रा लेने से सुख, बल और जीवन की वृद्धि होती है। कम तथा अधिक निद्रा से रोग, कृशता, निर्बलता आदि होकर शरीर का नाश होने लगता है इसलिए सम्यक और योग्य समय में निद्रा का सेवन करना आवश्यक है। उत्तम निद्रा के लिए यथेष्ट चारपाई, सुन्दर बिछौना, तकिया और ऋतु अनुसार ओढ़ने का वस्त्र एवं उत्तम कमरा होना चाहिए। सोने का कमरा शान्त और हवादार हो, जहाँ चारों ओर की वायु प्रवेश हो सके, क्योंकि शुद्ध वायु मनुष्य जीवन तथा शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कमरे में रात्रि को बहुत हल्का प्रकाश रहना उत्तम है।
प्राच्योदिशि शिरस्सप्तं याम्याया मथवानुप।
सदैवस्वपतः पुंसो विपरीतं तु रोगदम्।
बिष्णु पुराण ३/११/१११
अर्थ- सदा सोते समय पूर्व या दक्षिण दिशा को सिर करके सोना चाहिए, इसके विपरीत सोने से रोग पैदा होते हैं।
स्वगृहे प्राक् शिराशोते श्वसुर्यं दक्षिणा शिरा।
प्रत्यक् शिरा प्रावासे तु न कदाचिदुदक शिरा॥ गायः
इच्छानुसार सन्तान
६४
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थ- पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोने से धन की प्राप्ति होती है, दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से आयु बढ़ती है, पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने से चिन्ता रहती है और उत्तर दिशा को सिर करके सोने से मृत्यु होती है। पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं कि उत्तर को सिर करके सोने से नेत्रों की ज्योति नष्ट हो जाती है, वह कहते हैं कि हमारे शरीर में एक रेखा खड़ी रहती है, परन्तु उत्तर की ओर सिर करके सोने से ध्रुव की शक्ति से यह रेखा बेड़ी होकर लहराने लगती है, इससे मस्तिष्क रोग, नेत्र रोग हो जाते हैं। सदा उत्तर को सिर करके सोने वाला या तो पागल हो जायगा या अन्धा हो जायगा। जब रोगी मरणोपसन्न हो और दम घुट रहा हो तो उसका सिर उत्तर दिशा की ओर करने की प्रथा हमारे भारत वर्ष में प्रचलित है, इससे प्राण सुगमता से निकल जाता है, इससे सिद्ध होता है कि उत्तर दिशा में प्राणकर्षक कोई वस्तु अवश्य है।
पूर्वरात्रे व्यतीतेतु सङ्ख्येद्वैतमिदिरम्।
पादौपक्षालयेत्पूर्वं पश्चाच्छव्यां समाविशेत्॥
यमः
अर्थ- यमाचार्य का मत है कि एक प्रहर रात्रि व्यतीत हो जाने पर सोने के लिए अन्तःपुर में प्रवेश करे और चारपाई पर बैठकर पीवों को भली प्रकार धोकर तौलिया से साफ करके ईश्वर का स्मरण करते हुए सो जावे। ऐसा करने से निद्रा खूब आती है और स्वप्नदोषादि नहीं होते।
चारपाई पर पहले बार्यी करवट लेटक ८ शर्वास लो फिर दार्यी करवट से १६ और फिर सीधे चित होक ३२ शर्वास लेकर चाहें जिस करवट सो जाओ। पीठ के बल चित और बाई करवट सोने से पाचन शक्ति ठीक रहती है और आयु बढ़ती है।
वाम दिशायामनलो नामेरुव्यव्ति जन्तूनाम्।
तव्यात्तु वाम पार्श्वं शयति भुक् प्रपाकर्थम्।।
इच्छानुसार सन्तान
६५
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायाँ ओर आँन रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।
सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दाँतों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु स्वर्वास द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।
रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य के द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।
एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर
इच्छानुसार सन्तान
६६
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
वीर्य
काम की इच्छा करता है और उपस्थेन्द्रियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।
इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।
वीर्य
वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्न पूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।
ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
सिद्धे विन्दो महा यत्ने।
किं न सिध्यति भूतले॥
अर्थ- जिसने वीर्य विन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके
इच्छानुसार सन्तान
६७
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
अर्थ- बाई करवट सोने से भोजन शीघ्र पचता है, क्योंकि नाभि से ऊर्ध्व बायीं ओर अग्नि रहती है। पिताशय यकृत के ऊपर दाहिनी ओर होता है और वह नीचे की ओर पित्त छोड़ता है, बाई करवट सोने से पित्त ठीक गिरता रहता है और दाहिनी करवट सोने से बन्द रहता है। इसी प्रकार बृहदान्न जो दाहिनी ओर से प्रारम्भ होकर नीचे मल ले जाती है। बाई करवट लेटने से बराबर अन्न सार बृहदान्न से होकर निकलता रहता है और दाहिनी करवट लेटने से निकलने में कठिनाई होती है।
सोते समय चारपाई के पांस लाठी, खड़ाऊ और जल का लोटा अवश्य होना चाहिए। सोते समय मुख से पान, अपनी चारपाई पर से स्त्री और पुष्प माला हटा देनी चाहिए। पानादि को मुख में रख कर सोने से दीर्घों में रोग होकर कौड़ा लग जाता है और मुख से दुर्गन्ध आने लगती है। जब पुष्प कुछ कुम्हला जाते हैं। तो उन पर छोटे छोटे जन्तु आकर बैठ जाते हैं। यदि सोते समय अपने समीप से पुष्प माला न अलग की तो यह जन्तु र्वींस द्वारा शरीर में प्रविष्ट होकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।
रात्रि को स्त्री के साथ सोने से स्त्री पुरुष, रजः और वीर्य के रोगों से परिक्रान्त हो अपना जीवन नष्ट करते हैं, क्योंकि 'पिताधिक्यं यतः स्त्रियाः' स्त्री जाति में पिताधिक होता है। जब वह एक साथ लेटते हैं तो जो वीर्य नवनीत की भीति समस्त शरीर में व्याप्त होता है वह स्त्री की स्पर्श, जनित ऊष्मा से द्रवित हो प्रति समय पतित होता रहता है जो मूत्र करने में जरा सी उतेजना होने पर निकल जाता है और इस कारण निर्बलता प्रति दिन बढ़ती जाती है। जिससे वीर्य को द्रवीभूत होने से सन्तान जनक शुक्र का गुण विनष्ट हो जाता है।
एक साथ सोने से प्रतिदिन मैथुन करना पड़ता है, क्योंकि स्त्रियों में ऋणात्मक, पुरुषों में धनात्मक विद्युत शक्ति होती है, जो एक दूसरे को अपनी ओर खींचती है इससे मन विवश होकर
इच्छानुसार सन्तान
६६
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
काम की इच्छा करता है और उपरस्थितियों में उत्तेजना होने लगती है। जिससे मैथुन करना ही पड़ता है।
इस कारण एक साथ सोने वाले प्रायः सन्तान हीन और निर्बल तथा नित्य नये रोगों से ग्रसित देखने में आये हैं।
★★★
वीर्य
वीर्य बड़ी अनुपम और अलभ्य वस्तु है। वीर्य शरीर का राजा है। राजा के सुदृढ़ रहने से समस्त राज्य और सेना सुदृढ़ रहती है। इसी प्रकार वीर्य के परिपक्व होने पर शरीर निरोगी और कंचनमय हो जाता है। अतएव हमको अपने राजा (वीर्य) की यत्नपूर्वक रक्षा करना अपना कर्तव्य समझना चाहिए। वीर्य की रक्षा करने को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम कम से कम युवकों के लिए २५ वर्ष और युवतियों के लिए १६ वर्ष का नियुक्त है। इसी समय में ब्रह्मचारी तथा ब्रह्मचारिणी को उचित है कि वह विद्याध्ययन का व्रत लेकर उसे यत्नपूर्वक पूरा करे। ब्रह्मचर्य ही एक ऐसा आश्रम है जिसके ठीक-ठीक पूर्ण होने से तीनों आश्रमों का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में हमारी निर्जीव लेखनी असमर्थ है।
ब्रह्मचर्य का बल पराक्रम कैसा अनुपम है इसका अनुमान अपने ग्रन्थों से भली प्रकार लग सकता है। ब्रह्मचर्य ही शरीर को दृढ़ और बलवान बनाता है। यही मनुष्य को देवता तथा मुनि बना देता है। इसी से मनुष्य के समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
सिद्धे विन्दो महा यत्ने।
किं न सिध्यति भूतले॥
अर्थ- जिसने वीर्य बिन्दु को बड़े यत्न से सिद्ध कर लिया हो (अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम विधि पूर्वक पूर्ण कर लिया हो) उसके
इच्छानुसार सन्तान
६७
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
लिपि पृथ्वी पर कोई ऐसा कार्य नहीं जिसे सिद्ध न कर सकें।
यही अकाल मृत्यु को विजय करता है। ब्रह्मचर्य पालन ही आयु बढ़ाने का सबसे सरल उपाय है। यही मनुष्य को अमर बना देता है इसी को बल प्रताप से असम्भव बातें भी सम्भव दीख पड़ने लगती हैं। भीष्म पितामह ने अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा को अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल से पूर्ण किया जो संसार में सूर्य के समान प्रकाशमान हैं। अंजनी सुत अखण्ड ब्रह्मचारी हनुमान ने अकेले ही सारी लंका को योद्धाओं के छवकें छुड़ा दिये और अन्त में सारी लंका को अग्नि के अर्पण करके माता जानकी की सुध ले वापिस लौटकर श्रीरामचन्द्र जी को समाचार दिया। आप इन घटनाओं को त्रेता और द्वापर की कहकर छोड़ देंगे, तो आप कलयुग की उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारक ऋषि दयानन्द सरस्वती को ही ले लीजिये यह उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य के बल तथा तेज का ही कारण है कि आज भारतवर्ष की काया ही पलटी दीखती है। सन् १८५७ की राज्य क्रान्ति के पश्चात् स्वतन्त्रता का शब्द लुप्त हो गया था उस समय स्वतन्त्रता शब्द को मुख से निकालना मानों मृत्यु को आमंत्रित करना था परन्तु ऐसे भयंकर समय में जबकि भारत पर पश्चिमी शासकों का पूरा दमन चक्र चल रहा था और भारतीय जनता को खटमल और चींटी के समान मसला जा रहा था, जिसके फलस्वरूप भारतवासी अपने शब्दकोष से स्वतंत्रता शब्द को निकाल चुके थे, क्योंकि स्वतंत्रता के शब्द को उच्चारित करने वाले को गोली लगा दी जाती थी। ऐसे भयंकर समय में और यह जानते हुए भी, इस समय भारत में मेरे विचारों जैसा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं है। तिस पर भी एक अपने अखण्ड ब्रह्मचर्य बल के प्रताप और ईश्वर की अपने ऊपर छाया के ही सहारे निर्भय निःसंकोच और स्वाभिमान के साथ कलकत्ते के भरे दरबार में वायसराय के सामने ऋषि दयानन्द सरस्वती ने गरज कर कहा कि अपने राज्य में चाहे सूखे चने ही क्यों न
इच्छानुसार सन्तान
६८
विरेंद्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
खाने को मिलें, पर वह विदेशी शासन की भुंखलाओं के बीच रहते हुए घी, दूध, और हलुआ-पूरी के सामने श्रेष्ठ है। लार्ड नार्थब्रुक ऐसे शब्द सुनकर चकित हो गया, जबकि भारत की जनता अपने घर में बैठकर भी स्वतंत्रता के शब्द का उच्चारण तो दूर रहा स्मरण भी नहीं कर सकती थी, उस समय देश का यह सन्यासी निर्भय होकर स्वतंत्रता के सच्चे सुख का अनुभव करे। परन्तु उस लार्ड का साहस न हुआ कि वह ऋषि दयानन्द सरस्वती को बन्दी बना सके। क्यों? क्योंकि ऋषि दयानन्द की निर्भयता, सच्ची देश भक्ति और चेहरे के तेज से वह भयभीत हो गया। लोकमान्य तिलक आदि देश भक्तों ने ऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा उच्चारित स्वतंत्रता शब्द को अपने रक्त से सींचा और जिसके फलस्वरूप हम आज स्वतंत्र हैं। यही नहीं ऋषि दयानन्द सरस्वती की विद्वत्ता की दुंदुभी भी सारे विश्व-मण्डल में बज गई और अब बज भी रही है, उनका लिखित सत्यार्थप्रकाश संसार की २८ भाषाओं में प्रकाशित हो चुका है और संसार की शेष सभी भाषाओं में सत्यार्थप्रकाश का अनुवाद हो रहा है। फ्रांस ने सत्यार्थप्रकाश को तीसरे नम्बर पर मान्यता दी है। अतएव मुझे इतना ही कहना है कि पूर्ण ब्रह्मचर्य द्वारा ही भारतवर्ष के सारे दुःख और क्लेश दूर हो सकते हैं। संसार के आगे सिर उठाने और गौरव बढ़ाने का साहस तभी हो सकता है कि जब संमस्त भारतवासी ब्रह्मचर्य के पालन करने में पूर्ण ध्यान देंगे। ब्रह्मचर्य का अर्थ अविवाहित होना नहीं है, परन्तु हर प्रकार से कम से कम युवकों को २५ वर्ष और युवतियों को १६ वर्ष तक वीर्य को खण्डित नहीं होने देना और पूर्णरूप से वीर्य की रक्षा करने को ही ब्रह्मचर्य कहते हैं।
इच्छानुसार सन्तान
६९
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
एषां वै भूतानां पृथिवी रसः | ---|--- पृथिव्या | आपोऽपामोषधय औषधीनां | पुष्पाणि पुष्पाणां | फलानि फलानां | पुरुषः पुरुषस्य | रेतः ॥
ब्रह्मदर्पणकोपनिषद् ६/४/१
अर्थ- इन भूतों का रस (पंच भौतिक) पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियाँ हैं, औषधियों का रस पुष्प है, पुष्पों का रस फल है, फलों का रस (आधार) मनुष्य शरीर है तथा मनुष्य शरीर का रस (सार) शुक्र (वीर्य) है।
रसा इत्कं ततो मांसम्, मासात्, मेदः प्रजायते। मेद सोऽस्थि ततो मज्जा, मज्जाः शुक्रस्य सम्भवः ॥
भावप्रकाश पु- प्र- ६३
अर्थ- (जो मनुष्य अन्नादि खाता है) शरीर में प्रथम उसका रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा (मीग जो हड्डी के अन्दर होती है) और मज्जा से शुक्र (वीर्य) बनता है।
उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वीर्य भोजनादि से किस प्रकार बनता है। एक दिन का खाया हुआ अन्न ४० वें दिन रस रक्त आदि बनता हुआ वीर्य रूप में आता है। एक बार वीर्य के पात में १ तोला वीर्य का क्षय होता है जो १ सेर रक्त का सार होता है। १ सेर रक्त ४० सेर अर्थात् १ मन अन्न जल के भोजन से बनता है। एक मन अन्न ४० दिन में एक मनुष्य खाता है इसका अभिप्राय यह है कि एक बार के वीर्य क्षय होने में ४० दिन के भोजन का सार रस शरीर से निकल जाता है।
इच्छानुसार सन्तान
७०
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri