कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
सुंघीमात्रकी प्राप्ति कैसे होती है
अनुरागसागर
( ७ )
भृङ्गीभावकी प्राप्ति कैसे होती है छन्द
भृङ्गि मति दिदृक गहे तो, करो निजसमओहि हो ॥ दुतियाभाव न चित व्यापे, सो लहे जिव मोहिहो ॥ गुरु शब्द निश्चय सत्यमाने, भृङ्गि मत तव पावई॥ तजि सकल आसा शब्द वासा, काग हंस कहावई॥
हंस कौन है ?
सोरठा-तज कागेकी चाल, सत्य शब्द गहि हंसहो॥ मुकता चुगे रसाल, पुरुष पच्छ गुरु मग गवन ॥५॥
मृतकके और दृष्टांत
सुनहु संत यह मृतक सुभाऊ । विरला जीवपीव मग धाऊ॥ औरै सुनहु मृतकका भेवा । मृतक होय सतगुरु पद सेवा॥ मृतक छोह निभाव उरधारै । छोह निभावहि जीव उबारै ॥
पृथ्वी का दृष्टांत
जस पृथ्वीके गंजन होई । चित अनुमान गहे गुणसोई॥ कोई चन्दन कोई विष्टा डारे । कोई कोई किरणी अनुसारै ॥ गुण औगुण तिन समकर जाना । महाविरोध अधिक सुखमाना॥
ऊखका दृष्टांत
औरो मृतक भाव सुनि लेहू । निरखिपरखिगुरुमगुपगु देहू ॥ जैसे ऊख किसान बनावे । रती रती कर देह कटावे ॥ कोल्हू मई पुनि आप पिरावे । पुनि कड़ाहमें आप उँटावे ॥ जिन तनु दाहे गुडू तब होई । बहुरि ताव दे खाँड विलोई॥ ताहू माहि ताव पुनि दीन्हा । चीनी तबै कहावन लीन्हा ॥ चीनी होय बहुरि तन जारा । ताते मिसरी है अनुसार ॥ मिसरीते जब कंद कहावा । कहे कवीर सबके मन भावा॥ यही विधिते जो शिष सहई । गुरु कृपा सहजे भव तरई ॥
मृतकभाव कौन धारण कर सकता है
( ८ )
अनुरागसागर
मृतकभाव कौन धारण कर सकता है ? छन्द
मिरतक भाव है कठिन धर्मनि, लहे विरलश्रृंखल हो ॥ कादर सुनतेहि तनमन दहै, पाछे न चितवतकूरहो ॥ ऐसे शिष्य आप सम्हारै, नाव सही गुरुज्ञानको ॥ लहै भेदी भेद निश्चय, जाय दीप अमानको ॥ ६ ॥
मृतक ही साधु होता है
सोरठा-मृतक हो सो साधु, सो सतगुरुको पावई ॥ मेटे सकल उपाध, तासु देव आसा करै ॥ ६ ॥
साधु किये कहते हैं
साधुमार्ग कठिन धर्मदासा । रहनी रहे सो साधु सुबासा ॥ पाँचों इन्द्री सम करि राखै । नाम अमीरसनिशिदिन चारखै ॥
चक्षुर्वशाकरण
प्रथमहिं चक्षु इन्द्री कहैं साधे । गुरु गम पंथ नाम अवराधे ॥ सुन्दर रूप चक्षुकी पूजा । रूप कुरुप न भावे दूजा ॥ रूप कुरुपहिं सम करजाने । दरस विदेह सदा सुख माने ॥
श्रवणवशीकरण
इन्द्री श्रवण वचन शुभ चाहे । उत्कट वचन सुनत चित दाहे ॥ बोल कुबोल दोउ सह लेखै । हृदय शुद्ध गुरुज्ञान विशेषै ॥
नासिकावशीकरण
नासिका इन्द्री बास अधीना । यहि सम राखै संत प्रवीना ॥
जिहावशीकरण
जिभ्या इन्द्री चाहे स्वादा । खट्टा मीठा मधुर सवादा ॥ सहज भावमें जो कछु आवै । रूखा फीका नहिं विलगावै ॥ जो कोई पंचामृत ले आवै । ताहि देख नहिं हरष चढ़ावै ॥ तजे न रूखा साग अलूना । अधिक प्रेमसौ पावैं दूना ॥
शिश्नवशीकरण
अनुरागसागर
( १ )
शिवनवशीकरण
इन्दी दुष्ट महा अपराधी । कुटिलकाम होई विरलेसाधी ॥ कामिनि रूप कालकी खानी । तजहु तासु सँग हो गुरुज्ञानी ॥
कामवशीकरण
जबही काम उमंग तन आवै । ताहि समय जो आप जुगावै ॥ शब्द विदेह सुरत लै राखै । गहिन मन मौन नामरसचाखै ॥ जब निहतत्त्वमें जाय समाई । तबहीं काम रहै सुरझाई ॥
कामदेव लुटेरा है । छन्द
काम परबल अति भयंकर, महा दारुण काल हो ॥ सुरदेव मुनिगणयक्षगंधर्व, सबहि कीन्ह विलास हो ॥ सबहि लूटे विरल छूटे, ज्ञान गुण निज हट गहे ॥ गुरुज्ञान दीप समीप सतगुरु, भेदमारग तिन लहे ॥ ७ ॥
कामलुटेरेसे वचने का उपाय
सोरठा-दीपक ज्ञान प्रकाश, भवन उजैरा करि रहौ ॥ सतगुरुशब्द विलास, भाज चोर अँजोरा जब ॥ ७ ॥
अनलपक्षिका दृष्टान्त
गुरु कृपासों साधु कहावै । अनलपच्छ है लोक सिधावै ॥ धर्मदास यह परखो बानी । अनलपच्छ गम कहाँ बखानी ॥ अनलपच्छ जो रहै अकाशा । निशि दिन रहै पवनकी आशा ॥ दृष्टिभाव तिनरति विधिठानी । यह विधिगरभ रहेतिहिजानी ॥ अंडप्रकाश कीन्ह पुनि तहवां । निराधार आलंबहि जहवां ॥ मारग माहिं पुष्टु भो अंडा । मारग माहिं त्रिरह नौखण्डा ॥ मारग माहिं चक्षु तिन पावा । मारग माहिं पंख पर भावा ॥ महिद्विग आवा सुधि भइताहीं । इहां मोर आश्रम नहिं आहीं ॥ सुरति सम्हार चले पुनि तहवां । मात पिताको आश्रम जहवां ॥
साधु अनलपक्षी समान कब होता है
( १० )
अनुरागसागर
अनलपच्छ तेहिलेन न आवैं । उलटचीन्हनिजघरहि सिधावैं । बहु पंछी जग माहिं रहावैं । अनलपच्छ सम नाहिं कहावैं । अनलपच्छजसपच्छिन माहीं । अस विरलेजिव नाम समाहीं । यहि विधि जो जिव चेतैभाई । मेटि काल सतलोक सिधाई ॥
साधु अनलपक्षी समान कब होता है ? छन्द
निरालंब अलंब सतगुरु, एक आसा नामकी ॥ गुरुचरणलीनअधीननिशिदिन, चाहनहिंथनधामकी सुतनारि सकल विसारिविषया, चरणगुरुदृष्टकैगहे ॥
ऐसे साधुको गुरु
सतगुरुकृपादुखदुसहनाशै, धाम अविचलसो लहे ॥
अविचल धामको प्राप्ति किससे होती है ?
सो०-मनवचक्रमगुरुध्यान, गुरुआज्ञानिरखत चले ॥ देहि मुक्ति गुरु दान, नाम विदेह लखायकै ॥ ८ ॥
नाम ध्यान माहात्म्य
जबलग ध्यान विदेह न आवे । तबलगजिवभवभटका खावे ॥ ध्यान विदेह औ नाम विदेहा । दोह खल पावे मिटे संदेहा ॥ छन इक ध्यान विदेह समाई । ताकी महिमा वरणि न जाई ॥ काया नाम सबै गोहरावे । नाम विदेह विरले कोई पावे ॥ जो युग चार रहे कोई कासी । सार शब्द विन यमपुरवासी ॥ नीमषार बंदी परधामा । गया द्वारिका प्राग अस्नाना ॥ अडसठ तीरथ भूपरिकरमा । सार शब्द विन मिटै न भरमा ॥ कहैलग कहीं नाम परभाऊ । जा सुमिरे जमत्रास नसाऊ ॥
नाम पानेवालेको क्या मिलता है
सार नाम सतगुरुसो पावे । नाम डोर रहि लोक सिधावे ॥ धर्मराय ताको सिर नावे । जो हंसा निःतत्त्व समावे ॥
सारशब्द (नाम जपनेकी विधि)
अनुरागसागर
( ११ )
सार शब्द क्या है
सार शब्द विदेह स्वरूपा । निअच्छर वहि रूप अन्नूपा ॥ तत्त्व प्रकृतिभाव सब देहा । सार शब्द नितत्त्व विदेहा ॥ कहन सुननको शब्द चौधारा । सार शब्दसों जीव उबारा ॥ पुरुष सु नाम सार परबाना । सुमिरण पुरुष सार सहिदाना ॥ बिन रसनाके जाय समाई । तासों काल रहे सुगझाई ॥ सूच्छम सहज पन्थ है पूरा । तापर चढो रहे जन सूरा ॥ नहिं वहाँ शब्द न सुमरा जापा । पूरन वस्तु काल दिख दापा ॥ हंस भार तुम्हरे शिर दीना । तुमको कहों शब्दको चीन्हा ॥ पदम अनन्त पँखुरी जाने । अजपा जाप डोर सो ताने ॥ सुच्छम द्वार तहां तब परसे । अगम अगोचर सत्पथ परसे ॥ अन्तरशून्य महिहोय प्रकाशा । तहँवाँ आदि पुरुषको बासा ॥ ताहिं चीन्ह हंस तहँ जाई । आदि सुरत तहँ लै पहुँचाई ॥ आदि सुरत पुरुषको आदी । जीव सोहँगम बोलिये ताही ॥ धर्मदास तुम सन्त सुजाना । परखो सारशब्द निरबाना ॥
सारशब्द ( नाम ) जपनेकी विधि गुरुगमभेद छन्द
अजपा जाप हो सहजधुना, परखिगुरुगम डारिये ॥ मन पवनथिरकर शब्द निरखै, कर्ममनमथ मारिये ॥ होत धुनि रसना विना, कर माल विन निरवारिये ॥ शब्दसार विदेह निरखत, अमरलोक सिधारिये ॥ ५ ॥ सोरठा-शोभा अगम अपार, कोटिभानुशशिरोमहका ॥ षोडश रवि छिटकार, एकहंस उजियार तनु ॥ ५ ॥
धर्मदासका आनन्दोद्गार
हे प्रभु तब चरण बलिहारी । किये सुखी सब कष्ट निवारी ॥ चक्षुहीन जिमि पावे नेना । तिमि मोहि हरष सुनत तव नैना ॥
धर्मदासका आनन्दोद्गार
( १२ )
अनुरागसागर
कबीर वचन
धर्मदास तुम अंस अंकुरी । मोहि मिलेउकीन्हे दुख दूरी ॥ जस तुम कीन्हे मोमन नेहा । तजिधनधामरु सुत पितु गेहा ॥ आगेशिष्यजोअसविधिकहिहैं । गुरुचरण मननिश्चलधरिहैं ॥ गुरुके चरण प्रीत चित धारै । तन मन धन सतगुरुपर वारै ॥ सोजिवमोहिअधिक प्रिय होई । ताकहँ रोकि सकै नहि कोई ॥ शिष्य होय सरबस नहि वारे । हृदयकपट मुख प्रीतिउचारे ॥ सो जिव कैसे लोग सिधार्ई । बिन गुरुमिलै मोहि नहि पाई ॥
अवीसीकर्मधनदाता
यह सब तो प्रभु आपहि कीन्हा । नहि तो हतो मैं परम मलीना ॥ करके दया प्रभु आपहि आये । पकड़ि वाह प्रभु काल छुड़ाये ॥
सृष्टि उत्पत्ति विषय प्रश्न
अब साहब मोहि देउ बताई । अमर लोग सो कहाँ रहाई ॥ लोकदीप मोहि बरनि सुनावहु । तृषनावन्तको अमी पियावहु ॥ कौन द्रौप हंसको वासा । कौने द्रौप पुरुष रह वासा ॥ भोजन कौन हंस तहँ करई । और बानी कहँ पुनि उच्चरई ॥ कैसे पुरुष लोग रचि राखा । द्रौपहि करकैसे अभिलाखा ॥ तीन लोक उत्पत्ती भाखो । वर्णहुसकल गोय जनि राखो ॥ कालनिरंजनकेहि विधि भयऊ । कैसे घोडश सुत निर्मयऊ ॥ कैसे चार खानि विस्तारी । कैसे जीव कालवश डारी ॥ कैसे कूर्म शेष उपराजा । कैसे मीन बराहहि साजा ॥ त्रय देवा कौने विधि भयऊ । कैसे महि अकाश निरमयऊ ॥ चन्द्र सूर्य कहु कैसे भयऊ । कैसे तारागण सब ठयऊ ॥ किहि विधि भइ शरीरकी रचना । भाषो साहब उत्पत्ति बचना ॥ जाते संशय हो उच्छेदा । पाय भेद मन होय अखेदा ॥
अनुरागसागर
( १३ )
छन्द
आदि उत्पतिकहोसतगुरु, कृपाकरी निजदासको ॥ बचन सुधा सु प्रकाश कीजै,नाश हो यमत्रासको॥ एक एक विलोयबर्णहु, दास मोहि निज जानिकै॥ सत्य वक्ता सदगुरु तुम,लेव निश्चयमानिकै॥१०॥ सो० निश्चयबचनतुम्हार,मोहि अधिकप्रियताहिते॥ लीला अगम अपार,धन्यभाग दर्शन दिये॥१०॥
कबीर बचन
धर्मदास अधिकारी पाया । ताते मैं कहि भेद सुनाया ॥ अब तुम सुनहु आदिकी बीनी । भाषां उत्पति प्रलय निशानी॥
सृष्टिके आदिमें क्या था ?
तबकी बात सुनहु धर्मदासा । जबनहिंमहिपाताल अकाशा॥ जब नहिं कूर्म बराह और शेषा । जब नहिं शारदगौरिगणेशा ॥ जब नहिं हते निरंजन राया । जिन जीवनकहवां धिङ्गुलाया॥ तेतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊ काहीं ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश न तहिया । शास्त्र वेद पुराण न कहिया॥ तब सब रहे पुरुषके माहीं । ज्यों बट वृक्ष मध्य रह छाहीं॥
छन्द
आदि उत्पति सुनहु धर्मनि,कोइ न जानत ताहिहो॥ सबहि भो बिस्तार पाछे,खास देउँ मैं काहि हो ॥ वेदचारो नाहिं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ ॥ वेदको तब मूल नाहीं,अकथकथा बखानियाँ॥११॥ सोरठा-निशकारतैं वेद, आदिभेद जाने नहीं ॥ पण्डित करत उछेद,मते वेदके जग चले॥११॥
सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुष की रचना
( १४ )
अनुरागसागर
सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुषकी रचना
सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये । कारण करण नहीं निरमाये ॥ समपुट कमल रह गुप्त सनेहा । पुहुपमाहि रह पुरुष विदेहा ॥ इच्छा कीन्ह अंश उपजाये । हंसन देखि हरष बहुपाये ॥ प्रथमहि पुरुषशब्द परकाशा । दीपलोकरचिकीन्ह निवासा ॥ चारि कर सिंहासन कीन्हा । तापर पुहुप दीपकर चीन्हा ॥ पुरुष कला धरि बैठे जहिया । प्रगटी अगर वासना तहिया ॥ सहस अठासी दीपरचिराखा । पुरुष इच्छातैं सबअभिलाखा ॥ सवै द्वीप रह अगर समायी । अगर वासना बहुत सुहायी ॥
सोलह सुतका प्रगट होना
दूजे शब्द भयेजुपुरुषप्रकाशा । निकसे कूर्मचरण गहि आशा ॥ तीजे शब्दभयेजुपुरुष उच्चार । ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥ टेकी चरण सम्मुख है रहेऊ । आज्ञा पुरुषद्वीपतिन्ह दण्ड ॥ चौथे शब्द भये पुनि जबही । विवेकनाम सुत उपजे तबही ॥ आप पुरुष किये द्वीपनिवासा । पंचम शब्दसो तेज परकासा ॥ पांचवे शब्द जब पुरुष उच्चार । काल निरंजन भो औतारा ॥ तेज अंगते काल है आवा । ताते जीवन कह संतावा ॥ जीवरा अंश पुरुषका आही । आदिअन्त कोउ जानत नाही ॥ छठे शब्द पुरुष मुख भाषा । प्रगटे सहजनाम अभिलाषा ॥ सनयै शब्द भयो संतोषा । दीन्हो द्वीप पुरुष परितोषा ॥ अठयै शब्द पुरुष उच्चार । सुरति सुभाष द्वीप बैठारा ॥ नवमै शब्द आनन्द अपारा । दशयै शब्द क्षमा अनुसारा ॥ ग्यारहै शब्द नाम निष्कामा । बारहै शब्द जलरंगी नामा ॥ तेरहै शब्द अर्चित सुत जाने । चौदहै शब्द सुत प्रेम बखाने ॥ पन्द्रहै शब्द सुत दीन दयाला । सोलहै शब्दभे धीर्यरसाला ॥
निरंजन की तपस्या और मानसरोवर तथा शून्यकी प्राप्ति
अनुगगसागर
( १६ )
सत्रहवें शब्दसुतयोगसंतायन । एक नाल षोडषसुत पायन ॥ शब्दहिने भयो सुतन अकारा । शब्दते लोक द्वीप विस्तारा ॥ अग्र अभी दिव्य अंश अहारा । द्वीप द्वीप अंशन बैठारा ॥ अंशन शोभा कला अनन्ता । होततहां सुख सदा बसन्ता ॥ अंशन शोभा अगम अपारा । कला अनन्त को वरगै पारा ॥ सब सुत करें पुरुषको ध्याना । अमी अहार सदा सुख माना ॥ याही विधि सोलह सुत भेऊ । धर्मदास तुम चितधरि लेऊ ॥ द्वीप करी को अनत शोभा, नहि वरणतसो बने ॥ अमितकल अपार अद्भुत, सुनत शोभाको गने ॥ पुरके उजियारसे सुन, सवै द्वीप अजो रहो ॥ सत पुरुषरोम प्रकाश एकहि, चन्द्र सूर्य करो रहो ॥ सो०-सतगुरुआनैधाम, शोकमोहदुःख तहैं नहीं ॥ हंसनको विश्राम, पुरुष दरश अँचवन सुध ॥१२॥
निरंजनकी तपस्या और मानसरोवर तथा शून्यकी प्राप्ति
यहि विधि बहुत दिवस गये बीती । ता पीछे ऐसी भइ रीती ॥ धरमराय अस कीन्हतमासा । सो चरित्र बूझहु धर्मदासा ॥ युग सत्तर सेवा तिन कीन्ही । इकपद ठाठ पुरुष हर्षित दीन्ही ॥ सेवा कठिन भांति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा ॥
पुरुष वचन निरंजन प्राप्ति
पुरुष अवाज उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥ निरंजन वचन
कहै धरम तब सीस नवायी । देहु ठौर जहां बैठों जायी ॥ आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ । मानसरोवर द्वीप है जहवाँ ॥ चलयो धरम तब मानसरोवर । बहुत हरष चित करत कल्लोहर ॥
सहजका निरंजनके पास जाना
( १६ )
अनुरागसागर
मान सरोवर आये जहिया । भये आनन्द धरमपुनितहिया ॥ बहुरि ध्यान पुरुषको कीन्हा । सत्तर जुग सेवा चित दीन्हा ॥ यक पगु ठाढे सेवा लायी । पुरुष दयालु दया उर आयी ॥
पुरुषवचन सहजप्रति
विकस्योपुरुषउठचोजब बानी । बोलत बचन उठचो अथरानी ॥ जाहु सहज तुम धरमकेपासा । अबकसध्यानकीन्ह परकासा ॥ सेवा बहु कीन्हा धर्मराऊ । दियो ठौर वहि जहाँ रहाऊ ॥ तीन लोग तब पलमें दीन्हा । लखिसेवकाइ दया अस कीन्हा ॥ तीन लोक कर पायो राजू । भयो अनन्द धरम मन गाजू ॥ अवका चाहें पूछो जाई । जो कुछ कह सो देउ सुनाई ॥
सहजका निरंजनके पास जाना
चले सहज तब सील नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥ कहे सहज सुनु आता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥ अवका मांगहु सो कह मोही । पुरुष अवाज दीन्हा यह तोही ॥
निरंजनवचन सहजप्रति
अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिन्ती जाई ॥ इतना ठाव न मोहि सुहाई । अब मोहिबकसि देहहुठकुराई ॥ मोरे चित असभौ अनुरागा । देउ देश मोहि करहु सभागा ॥ कै मोहि देवलोक अधिकारा । कै मोहि देहु देश यक न्यारा ॥
सहजवचन सत्पुरुषप्रति
चले सहज सुन धर्मकी बाता । जाय पुरुषसो कहे विरुषाता ॥ जो कहु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥
पुरुषवचन सहजप्रति । छन्द
सुन्यो सहजके वचन, जबही पुरुष वैन उच्चारेऊ ॥ धरमसे सन्तुष्ट हैं हम, वचन मम उर धारेऊ ॥
निरंजनको सृष्टि रचनाका साज
अनुरागसागर
( १७ )
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश वसावहू ॥ करहु रचना जाय तहैंवा, सहज वचन सुनावहू ॥१३॥ सो०-जाहु सहज तुम वेग, अस कहि आवो धर्मसो॥ दियो शून्यकर थोग, रचना रचहु बनाइके ॥ १३ ॥
निरंजनको छुटि रचनाका साज मिलानेका वृत्तान्त
सहज वचन निरंजन प्रति
आये सहज वचन सुनावा । सत्यपुरुषजसकहिसमुझावा॥
कबीर वचन धर्मराज प्रति
सुनतहि वचन धर्म हरषाना । कछुकर्हकछुविस्मय आना॥
निरंजनवचन सहज प्रति
कहे धर्म सुनु सहज पियारा । कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहिं राजू । जानु न भेद करौं किमि काजू॥
गम्य अगम मोहे नहिं आयी । करौं दया सो युक्ति बतायी॥
विन्ती करौं पुरुषसों मोरी । अहो आत बलिहारी तेरी ॥
किहि विधिरचैनवखण्ड बनाई । हे आत सो आज्ञा पाई ॥
मो कहैं देहु साज प्रभु सोई । जातैं रचना जगत्की होई ॥
सहजका लोकको जाना
तबही सहज लोक पग धारा । कीन्ह दंडवत बारम्बारा ॥
पुरुषवचन सहज प्रति
अहो सहज कस इहैंवा आई । सो हमसो तुम शब्द सुनाई॥
कबीर वचन धर्म दास प्रति
कहो सहज तब धर्मकी बाता । जो कछु धर्म कही विरुयाता॥
धर्मराज जस विन्ती लायी । तैसे सहज सुनायउ जायी ॥
पुरुषकी आज्ञा सहजसे
आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि वारा । सुनौ सहज तुम वचन हमारा॥
सहजका धर्मरायके निकट आकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना
( १८ )
अनुरागसागर
कूर्मके उदर आदि सब साजा । सो ले धर्म करे निजकाजा ॥ विनती करे कूर्म सौ जाई । मांगि लेति तेहि माथ नवाई ॥
सहज धर्मरायके निकट जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना
गये सहज पुनि धर्मके पास । आज्ञापुरुष दीन्ह परकासा ॥ विनती करो कूर्मसो जाई । मांगि लेहु सीस नवाई ॥ जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं कृपा बहुत तव पावहु ॥
निर्जनको कूर्मके पास साज लेनेको जाना
कबीरवचन धर्मदास प्रति
जलिभोधरम हरष तब बाढो । मनहिकीन जुमान अतिगाढो ॥ जाय कूर्मके सम्मुख भयऊ । दंडपरनाम एक नहिं कियऊ ॥ अमी स्वरूप कर्म सुखदाई । तपननतनिको अतिशितलाई ॥ करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाना ॥ बारह पल्लंग कूर्म शरीरा । छै पल्लंग धरम बलवीरा ॥ धायै चहुँ दिशि रहै रिसाई । किहि विधिली जैउत्पति भाई ॥ कीन्हो कालसीस नख घाता । उदरते निकसे पवन अघाता ॥ तीन सीसके तीनहु अंशा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर वंशा ॥ पांच तत्व धरती आकाशा । चन्द्र सूर्य उडगन रहिवासा ॥ विसरचो नीर अग्नि शशि सूर। निसरचो नभठाकन महिथूरा ॥ मीन शेष बराह महिथम्भन । पुनि पृथ्वीको भयो अरम्भन ॥ छीना सीस कूर्मको जबही । चले प्रसेव ठाँव पुनि तबही ॥ जबही प्रसेव बुंद जल दीन्हा । उंचासकोट पृथ्वीको चीन्हा ॥ क्षीर तोय जस परत मलाई । अस जलपर पृथ्वी ठहराई ॥ बारह दंत राहु महिकरमूला । पवन प्रचण्ड महीस्थूला ॥ अंडस्वरूप आकाशको जानौं । ताके बीच पृथ्वी अनुमानौं ॥
बहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट भेजना
अनुरागसागर
( ११ )
कूर्म उदर सुत कूर्म उत्पानो । तापर शेष वराहको थानो । शेष सीस या पृथ्वी जानो । ताके हेठ कूर्म विरयानो ॥ किरतम कूर्म अण्डके मांही । कूर्म अंश सो भिन्न रहाही ॥ आदि कूर्म रह लोक मैझारा । तिनपुनिपुरुषध्यानअनुसारा॥
कूर्मवचन सत्पुरुषप्रति
निरंकार कीन्हो बरियाया । कालकलाधरि मो पहुँ आया॥ उदर विदार कीन्ह उन मोरा । आज्ञा जानीकीन्ह नहिं थोरा॥
पुरुष वचनकूर्मप्रति
पुरुषअवाज कीन्ह तेहिवारा । छोटे बंधु वह आहि तुम्हारा॥ आही यही बडनकी रीती । औगुन ठावैं करहिं वह प्रीती॥
कवीरवचन धर्मप्रति
पुरुषवचन मुनि कूर्म आनंदा । अमीसरूप सो आनंदकंदा ॥ पुरुषध्यानपुनि कीन्हनिरंजन । जुग अनेक किय सेवा संजन ॥ स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई । करि रचना बैठे पछताई ॥ धर्मराय तब कीन्ह विचारा । कहवालो त्रयपुर विस्तारा ॥ स्वर्ग मृत्यु कीन्हो पाताला । विनाबीजकिमिकीजै रूयाला॥ कौन भांति कस करव उपाई । किहि विधि रचों शरीर बनाई॥ कर सेवा मांगों पुनि साई । तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥ करि विचार असहठ तिनधारा । लाग्यो करने पुरुष विचारा ॥ एक पांव तब सेवा कियेऊ । चौंसठ युगलों ठाढे रहेऊ ॥
बहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट भेजना । छन्द
दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सुसेवाके भये ॥ बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब याचत नये ॥ जाहु सहज निरंजनापहैं, देउ जो कुछ मांगई ॥ करहि रचना पुरुष वचना, छल मता सब त्यागई ॥
सहजका निरंजनके निकट पहुँचना
( २० )
अनुरागसागर
सहजका निरंजनके निकट पहुँचना
सो० सहज चलेसिरनाय, जबहिं पुरुष आज्ञा कियो॥
तहैंवा पहुँचे जाय, जहाँ निरंजन ठाढ़रह ॥१४॥
देखत सहज धर्म हरषाना । सेवा वस पुरुष तब जान् ॥
सहजवचन
कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारण अब सेवा लाया॥
निरंजनवचन
धर्म कहै तब सीस नवायी । देहु ठौर जहैं बैठौं जायी ॥
सहजवचन
तब सहज अब भाषै लीन्हा । सुनहु धर्म तेही पुरुष सब दीन्हा॥
कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा॥
तीनों लोक राजा तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना॥
निरंजनवचन
तवैं निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूं बनायी ॥
पुरुषहिं कहौं जोर युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहिं जानी॥
पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजै खेत बाज निज सारा ॥
मैं सेवक दुतिया नहीं जानूँ । ध्यान पुरुषको निशिदिन आनूँ॥
पुरुषहिं कहा जाय यह बानी । देहु बाज अम्मर सहिदानी॥
कबोरवचन धर्मदासप्रति
सहज कह्यो पुनि पुरुषहिं जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई॥
गयो सहज निजदीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हे अनुशासन॥
सेवा वश सत्पुरुष दयाला । गुण औ गुण नहिं चित किरपाला॥
अबाकी उत्पति
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अछुंगी कन्या उपचारा ॥
अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥
अबाकी उत्पति
माथ नाय पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई॥
सत्यपुरुषका अद्याको मूलबीज देना
अनुरागसागर
( २१ )
सत्य पुरुषका आधाको मूलबीज देना
पुरुष वचन अधाप्रति
तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरमके पास । ॥ देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्तपतिवारी ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सुहंग जीव कर होई ॥ जीव सोहंगम दूसर नाहीं । जीवसों अंश पुरुष को आहीं ॥ शक्ति पुनि तीन पुरुष उत्पाना । चेतनि उलंघनि अभया जाना ॥
छन्द
पुरुष सेवावश भये तब, अष्ट अंगहि दीन्ह हो ॥ मानसरोवर जाहु कहिया, देह धर्महि चीन्ह हो ॥ अष्टङ्गी कन्या हती जेहि, रूप शोभा अति बनी ॥ जाहुकन्या मानसरवर, करहु रचना अति घनी ॥ सोरठा-चौरासी लखजीव, मूलबीज तेहिसंग दे ॥
रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिरनायके ॥ यह सब दीन्हो आदि कुमारी । मानसरोवर चलिभई नारी ॥ ततछिन पुरुष सहज देरावा । धावत सहजपुरुष यहि आवा ॥
पुरुषवचन सहजप्रति
जाही सहज धरम यह कहेहु । दीन्ह वस्तु जस तुम चहेहु ॥ मूल बीज तुमपहँ पठवावा । करहु सृष्टिजस्तुवमनभावा ॥ मानसरोवर जाहि रहाहु । ताते होइ है सृष्टि उराहु ॥
पुनि सहजका निरंजनके दिग जाना
चले सहज तहवाँ तब आये । धर्म धीर जहँ ठाढ़ रहाये ॥ कहेउ सुवचन पुरुषको जबहीं । धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥
निरंजनका अद्याको निगल जाना और सत्यपुरुषका उसे शाप देना
( २२ )
अनुरागसागर
निरंजनका मानसरोवरमें अद्याको पाकर मोहवश हो उसे निगल जाना और सत्यपुरुषका शाप पाना
पुरुष वचन सुन तबही गाजा । मानसरोवर आन विराजा ॥ आवत कामिनी देख्यो जबही । धर्मराय मन हरष्यो तबही॥ कहा देखि अष्टंगी केरी । धर्मराय इतरान्यो हेरी ॥ कहा अनन्त अंत कछु नाहीं । काल मगन है निरखत ताहीं॥ निरखत धर्मसु भयो अधीरा । अंग अंग सब निरख शरीरा॥ धर्मराय कन्या कहै ग्रासा । कालस्वभाव सुनो धर्मदासा॥ कीन्हों ग्रास काल अन्याई । तब कन्या चित विस्मय लाई॥ तत छण कन्या कीन्ह पुकारा । कालनिरंजन कीन्ह अहारा॥ तबही धर्म सहज लग आई । सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई॥ पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार । मोसनकाल कीन्ह अधिकारा॥ तानशीश मम भच्छण कीन्ह्यो । हो सत पुरुष दया भल चीन्ह्यो॥ यही चरित्र पुरुष भल जानी । दीन्ह शापसो कहों बखानी ॥
पुरुषका शाप निरंजनप्रति
लच्छ जीव नि ग्रासन करहू । सवालच्छ नितप्रति विस्तरहू॥
छन्द
पुनिकीन्हपुरुषतियानतिही, किमिमेटिडारोकालहो कठिन काल कराल जीवन, बहुत करइ बिहाल हो॥ यहि मेटत अबना बनै मुहि, नालाइक सुत षोडसा॥ एक मेटत सबै मिटिहै, वचन डोल अडोलसा॥१६॥ सोरठा-डोल वचन हमार, जो अब मेटा धरमका॥ वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं॥१६॥
सत्यपुरुषका जोगजीतजीको निरंजनके पास उसे मानसरोवरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना
अनुरागसागर
( २३ )
सत्पुरुषका जोगजीतका निरंजनके पास उसे मानसरोवरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना
जोगजीत कह पुरुष बुलावा । धर्मचरित सब कहि समुझावा॥
सत्पुरुष वचन जोगजीत प्रति
जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥
मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देशकाल नहिं आवै॥
धर्मके उदर माहिं है नारी । तासो कहो निजशब्द सम्हारी॥
जाकर रहो धर्म वहि देश । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेशा ॥
उदर फारिकै बाहर आवै । धर्मविदार उदार फल पावे॥
धर्मरायसों कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हारी होई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
जोगजीत चल भे शिर नार्ई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥
जोगजीत कहै देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥
निरंजनवचन जोगजीतप्रति
पूछा काल कौन तुम आई । कौन आज तुम यहां सिधार्ई॥
जोगजीतवचन निरंजन प्रति
जोगजीत अस कहै पुकारी । अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी॥
आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारो तोही ॥
जोगजीतवचन अधा प्रति
जोगजीत कन्या सो कहिया । नारी कहे उदरमहैं रहिया ॥
उदरफारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुनिके धर्म कोध उर जरेऊ । जोगजीत सौ सन्मुखभिरेऊ॥
जोगजीत तब कीन्है ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना॥
पुरुष आज्ञा भई तेहि काला । मारहु माझ लिलार कराला॥
जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा । जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा॥
( २४ )
अनुरागसागर
छन्द
गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकत न्यारहो॥ भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो॥ निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अतिडरी॥ अब नाहिंदेखोदेश वह, कहौ कौनविधिकहवाँपरी १७ सोरठा-कामिनिरहीसकाय, त्रासितकालकडर अधिक रही सो सीस नवाय, आसपासचितवत खड़ी ॥१७॥
निरंजनवचन अध्याप्रति
कहै धर्म सुनि आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥ पुरुषा रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा॥ हम हैं पुरुष तुमहि ही नारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी॥
अध्यावचन निरंजनप्रति
कहै कन्या कस बोलहु बानी । आता जेठ प्रथम हम जानी॥ कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधिजनिबोलहु बाता॥ अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । ताते उदरमांझलियो डारी॥ जेष्ठ बन्धु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता॥ निरमलदृष्टिजब चितवहु मोहीं । नहिं तो पाप होय अब तोहीं॥ मन्द दृष्टिजनिचितवहु मोही । ना तो पाप होय अब तोही॥
निरंजनवचन अध्याप्रति
कहै निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी॥ पाप पुण्य डर हम नहिं डरता । पाप पुण्यके हमहीं करता ॥ पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा मोर न लेहै कोई ॥ पाप पुन्य हम करब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥ ताते तोहि कहौ समुझाई । सिख हमार लो सीस चढ़ाई॥ पुरुष दीनतोहि हमकहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥
भवसागरकी रचना (प्रारम्भ)
अनुरागसागर
( २६ )
कबीरवचन धर्मदास प्रति
विहैंसी कन्या सुन अस वाता । इक मति होय दोई रंगराता॥ रहस वचन बोली मृदु बानी । नारिनीचबुधिरतिविधिठानी॥ रहसवचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना॥
बुन्द
मन नहिं कन्या कहती असचरितकीन्ह निरंजना॥ नख घातकियेभगद्वारततछिण, घाटउत्पतिगंजना॥ नखं रेषशो नितचल्या, तिहुँको खब खासआरंभनी॥ आदिउत्पत्तिमुनहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी॥ त्रियावार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेशहो॥ जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीज शंभु शेष हो॥१८॥ सोरठा-उत्पति आदिप्रकाश, यहि विधि तेहि प्रसंगभो॥ कीन्हो भोगविलास, इकमनि कन्या काल है॥१८॥
भवसागरकी रचना
तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करौ विवेका॥ निरंजनवचन अध्याप्रति
अग्निपवनजलमहि आकाशा । कूर्म उदरते भयो प्रकाशा॥ पाँचौ अंस ताहि सन लीन्हा । गुण तीनों सीसनसों कीन्हा॥ यहि विधि भयेतत्त्वगुण तीनों । धर्मराज तब रचना कीनों॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
गुणतसम कर देविहि दीन्हा । आपन अंश उत्पने कीन्हा॥ बुन्द तीन कन्या भग डारा । तासँग तीनों अंग सुधारा॥
? यह तो पुरानी प्रतियोंमें ऐसाही है किन्तु नवीन प्रतियोंमें उपर्युक्त दोनों पंक्ति नहीं हैं जो विचारपूर्वक प्रसंगोंके पढ़नेसे ठीक नहीं जान पड़ता ।
तीन सुतको उत्पन्न कर निरंजनका गुप्त हो जाना
( २६ )
अनुरागसागर
पांच तत्त्व गुण तीनों दीन्हा । यहिबिधिजनकीरचना कीना॥ प्रथम बुन्दते ब्रह्म जो भयऊ । रजगुणपंचतत्त्व तेहि दयऊ ॥ द्वजो बुन्द विष्णु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्त्वतिन पयऊ॥ तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्त्व तेहि साने॥ पंच तत्त्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो शरीरा ॥ ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई॥ कहै धर्म कामिनि सुनबानी । जो मैं कहूँ लेहु सोमानी ॥ जीव बीज आहे तुव पास। सो ले रचना करहु प्रकाशा॥ कर्ण निरञ्जन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदि भवानी ॥ त्रय सुतसौप तोहि कहँ दीन्हा । अबहमपुरुषसेवचित लीन्हा॥ राज करहु तुम ले तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥ मोर दरस त्रय सुत नहिं पैहैं । जो मुहि खोजत जन्म सिरै हैं॥ ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥ त्रयसुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधुमथन दे पठहु निदाना॥
कवीरवचन धर्मदासप्रति
कहेउ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो॥ शून्य गुफहि निवास कीन्हों, भेद लहको ताहिहो॥ वह गुप्त भा पुनि सङ्ग सबके, मन निरंजन जानिये ॥ मन पुरुष भेद उच्छेद देवे, आप परगट आनिये ॥ सो०-जीवभयेमतिहीन, परिसि अगमसो कालको॥ जनम जनम भये खीन, मुरुचा कर्म अकर्मको १८ जीव सतावै काल, नाना कर्म लगायके ॥ आप चलावै चाल, कष्ट देय पुनि जीवको ॥ २० ॥