कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
चतुर्थ लम्बक ४११
चतुर्थ लम्बक ४११ सुरापूर्ण अनेक स्फटिक के प्यालों से भरी हुई राजा की पानभूमि प्रभातकालीन सूर्य की लाल किरणों से रक्त और श्वेत कमलों से युक्त कनक-लता के समान सुशोभित हो रही थी॥१०॥ वत्सराज का मृगया-वर्णन इसी विलास-क्रीड़ा के बीच कभी-कभी राजा बहेलिया के साथ हरे पत्तों का-सा वेष धारण किये हुए और धनुष लिये हुए मृगवनों का भी सेवन करता था (अर्थात् शिकार खेलने के लिए भी जाता था) ॥११॥ इस क्रीड़ा में कीचड़ से सने हुए सूकरों के मुखों को वह बाणों से बेधकर मार देता था। उसके पीछा करने पर भय से इधर-उधर भागे हुए कृष्णसार मृग ऐसे मालूम होते थे जैसे मानों पूर्वकाल में विजय की हुई दिशाएँ उसपर कटाक्षपात कर रही हों॥१२-१३॥ जंगली भैंसों को मारने के कारण उनके रक्त से रंजित वनभूमि ऐसी मालूम होती थी कि माना वन-कमलिनी राजा की सेवा के लिए उपस्थित हुई हो॥१४॥ मुँह फाड़े हुए, अतएव भालों में बिधे (पिरोय) हुए मुखोंवाले सिंहों को देखकर राजा प्रसन्न होता था॥१५॥ अपने शस्त्र पर विश्वास रखनेवाले उस राजा की मृगया-क्रीड़ा में गड्ढों में छिपे हुए शिकारी कुत्ते और मार्ग में बिछे हुए जाल—यह परिस्थिति थी॥१६॥ वत्सराज को नारदजी का उपदेश इस प्रकार के आनन्द के दिनों में एक बार नारद मुनि सभा (दरबार) में बैठे हुए राजा के समीप आये—॥१७॥ अपनी देह के कान्ति-मंडल से आवृत वे ऐसे मालूम होते थे मानों तेजस्वी राजा के प्रेम से तेजस्वी सूर्य अवतार धारण करके आये हों॥१८॥ सादर प्रणाम करते हुए राजा से समुचित सत्कार प्राप्त करने पर प्रसन्नचेता मुनि कुछ ठहरकर बोले॥१९॥ राजा पाण्डु की कथा हे वत्सराज ! संक्षेप में ही कहता हूँ सुनो। पहले समय में पांडु नाम का राजा था जो तेरा पहला पितामह (परदादा) था॥२०॥ तुम्हारे ही समान उस महान् प्रतापी राजा के दो पत्नियां थीं—एक कुन्ती और दूसरी माद्री॥२१॥ अपने अतुल बल से सातोद्वीप पृथ्वी को विजय करके एक बार शिकार का व्यसनी होने के कारण वह पांडु वन को गया॥२२॥
तत्र किन्दमनामानं स मुनिं मुक्तसायकः। जघान मृगरूपेण सम्भार्यं सुरतस्थितम्॥२३॥ स मुनिर्मृगरूपं तत्त्यक्त्वा कण्ठविवर्तिभिः। प्राणैः शशाप तं पाण्डुं विषण्णं मुक्तकार्मुकम्॥२४॥ स्वैरन्ध्यो निर्विमर्षेण हतोऽहं यत्त्वया ततः। भार्यासंभोगकाले ते मद्धव मृत्युर्भविष्यति॥२५॥ इत्याप्तशापस्तद्भीत्या त्यक्तभोगस्पृहोऽथ सः। पत्नीभ्यामन्वितः पाण्डुस्तस्थौ शान्ते तपोवने॥२६॥ तत्रस्थोऽपि स शापेन प्रेरितेनेव नैकदा। अकस्माच्चकमे माद्रीं प्रियां प्राप च पञ्चताम्॥२७॥ तदेवं मृगया नाम प्रमादो भूप भूभृताम्। क्षपिता ह्यनयाऽयेऽपि नृपास्तं ते मृगा इव॥२८॥ घोरनाषामिषव्याप्ता रुक्षा भूत्राश्वंमूर्खता। कुलदन्ता कथं कुर्यात्प्राज्ञस्त्रीय हि सा क्षिवम्॥२९॥ तस्माद् विफळभाभास जहीहि मृगयारसम्। वन्यवाहनहन्तॄणां समानं प्राणसंक्षयः॥३०॥ त्वं च त्वत्पूर्वजप्रीत्या प्रिय कल्याणपात्र ! मे। पुत्रश्च तव कामांशो यथा भावी तथा शृणु॥३१॥ पुरानङ्गाङ्गसम्भूत्य रत्या स्तुतिभिरर्चितः। तुष्टो रहसि सङ्घपमिव तस्याः शिवोऽभ्यधात्॥३२॥ अवतीर्य निजांशेन भूमावागच्छ मां स्वयम्। गौरी पुषायिनी कामं जनयिष्यत्यसाविति॥३३॥ अतरचण्डमहासेनसुता देवी नरेन्द्र सा। माता वासवदत्तेयं सम्पन्ना महिषी च ते॥३४॥ तदेषा शम्भुमाराध्य कामांशा सोष्यते सुतम्। सर्वविद्याधराणां यश्चक्रवर्ती भविष्यति॥३५॥ इत्युक्तेनादृतवचा राजा पृथ्वीं तदर्पिताम्। प्रत्यर्प्य तस्मै स ययो मन्दारगिरिवर्धनम्॥३६॥ तस्मिन्गते धरमराजं स तद्वासवदत्तया। जातपुत्रच्छया साकं निन्ये तच्चिन्तया दिनम्॥३७॥
चतुर्थ लम्बक ४१३
चतुर्थ लम्बक ४१३ वन में किन्दम नाम का एक मुनि मृग का रूप धारण करके अपनी पत्नी के साथ आनन्द कर रहा था॥२३॥ राजा ने उसे मृग समझकर और बाण चलाकर मार डाला। उस मुनि ने प्राणों का परित्याग करते हुए, धनुष छोड़कर विप्र बैठ राजा को शाप दिया—हे राजन् ! बिना विचारे तुमने मुझे मार डाला। अत पत्नी का समागम करने पर मेरे ही समान तुम्हारी भी मृत्यु होगी॥२४-२५॥ इस प्रकार शापित और शाप के भय से सांसारिक भोगों से विरक्त राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ प्रशान्त तपोवन में रहने लगा॥२६॥ तपोवन में रहते हुए कन्दर्प से प्रेरित राजा ने अकस्मात् छोटी पत्नी माद्री के साथ समागम किया और मर गया॥२७॥ इसलिए हे राजन् ! यह शिकार राजाओं में प्रमाद करानेवाला बुरा व्यसन है। इसने और भी अनेक राजाओं का मृदा के समान नाश कर दिया है॥२८॥ यह शिकार राक्षसी के समान है। इससे किसका कल्याण हो सकता है? यह पार शब्द के साथ मांस पिशाचिनी है, रूखी है, धूलिधूसर हुए बाणोंवाली है और भाले इसके दाँत हैं, अर्थात् शिकारी दौड़ते-दौड़ते धूल में रंगा हो जाता है। उसके धूल में भरे बाण हवा में ऊपर उठे रहते हैं ॥२९॥ इसलिए व्यर्थ परिश्रमवाले इस शिकार के प्रेम को छोड़ दो। इसमें शिकार, शिकारी और वाहन तीनों के प्राणों का सन्देह मात्र ही रहता है॥३०॥ तुम्हारे पूर्वज मेरे मित्र थे उन्हीं के प्रेम से तुम भी मेरे प्यारे हो। साथ ही तुम्हारा पुत्र कामदेव के अनुरूप में उत्पन्न होनेवाला है। मूर्ता—॥३१॥ प्राचीन समय में काम का दहन होने पर उसकी पत्नी रति ने शिवजी की स्तुति द्वारा आराधना की। उनसे प्रसन्न होने पर शिवजी ने गगन से उससे कहा—पार्वती अपने अंश से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर और पुत्र की कामना से स्वयं मेरी आराधना करके उस अपने गर्भ में जन्म देगी॥३२-३३॥ इसलिए हे राजन् ! वहमहासेन की पुत्री यह वासवदत्ता गौरी के अंश से उत्पन्न हुई है और तुम्हारी महारानी है॥३४॥ यह रानी शिवजी की आराधना करके कामदेव के अनुरूप बालक का जन्म देगी जो सब विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा बनेगा॥३५॥ ऐसा सुनकर मुनि के वचन का आदर करके राजा ने गन्धर्ववृत्त्या मुनिको दान कर दी। नारद मुनि उस पुत्र उत्पन्न के लिए राजा को सौंपकर अन्तर्धान हो गए॥३६॥ मुनि के चले जाने पर राजा ने पुत्र की इच्छावाली रानी वासवदत्ता के साथ पुत्र की चिन्ता में ही दिन व्यतीत किया॥३७॥
४१४ कथासरित्सागर
४१४ कथासरित्सागर
पिङ्गलिकाब्राह्मणीकथा
अथैकद्युस्तं स वत्सपामुपेत्यास्थानवर्त्तिनम् । नित्योत्क्षिप्तस्य प्रवरः प्रतीहारो व्यजिज्ञपत् ॥३८॥ शिशुद्वयसमुद्भूता ब्राह्मणी कापि दुर्गता । द्वारि स्थिता महाराज देवदर्शनकांक्षिणी ॥३९॥ तच्छ्रुत्वाभ्यनुज्ञाते तत्क्षणं महीभृता । ब्राह्मणी सा विवेशात्र कृशपाण्डुरधूसरा ॥४०॥ माननव विशीर्णेन वाससा विधुरीकृता । दुर्दैव्यनिभावङ्के बिभ्रती बालकावुभौ ॥४१॥ कृतोचितप्रणामा च सा राजानं व्यजिज्ञपत् । ब्राह्मणी कुलजा चाहमीदृशीं दुर्गतिं गता ॥४२॥ दैवायुगपदेतौ च जातौ द्वौ तनयौ मम । तच्च नास्ति मे स्तन्यमतयोर्भोजनं बिना ॥४३॥ तनेह कृपणा माद्य शरणागतवत्सलम् । प्राप्तास्मि देवं शरणं प्रमाणमधुना प्रभुः ॥४४॥ तच्छ्रुत्वा सद्यो राजा स प्रतीहारमादिक्षत् । इयं वासवदत्तायै देव्यै नीत्वाप्यतामिति ॥४५॥ सतद्द कर्मणा स्वेन शुभेनेवाग्रयायिना । नीताऽभून्निकटं देव्याः प्रतीहारेण तेन सा ॥४६॥ राज्ञा विसृष्टां दृष्ट्वा तां प्रतीहारानुपागताम् । देवी वासवदत्ता सा ब्राह्मणीं श्लघ्नतराम् ॥४७॥ युग्मापत्यां च पश्यन्ती दीनामतां व्यचिन्तयत् । अहो वामकबुद्धित्वं किमप्येतत्प्रजापतेः ॥४८॥ अहो ! वस्तुनि मारम्यमहो भक्तिरवस्तुनि । नाद्याप्येकोऽपि मे जाता जातौ त्वस्या यमाविमौ ॥४९॥ एवं सचिन्तयन्ती च सा देवी स्नानकांक्षिणी । ब्राह्मण्याश्चेटिकास्तस्याः स्नपनादौ समादिशत् ॥५०॥ स्नपिता दत्तवस्त्रा च ताभिः स्वादु च भोजिता । ब्राह्मणी गाम्बुसिक्तेव तप्ता भूः समुदश्वसत् ॥५१॥
चतुर्थ लम्बक ४१५
चतुर्थ लम्बक ४१५ पिङ्गलिका ब्राह्मणी की कथा किसी एक दिन प्रातःकालीन सभा (दरबार) में बैठे हुए वत्सराज से नित्योदित नामक मुख्य द्वारपाल ने आकर निवेदन किया—हे महाराज दो बच्चोंवाली एक दरिद्र ब्राह्मणी आपके दर्शन की अभिलाषा से द्वार पर खड़ी है॥३८-३९॥ यह सुनते ही राजा से उसके प्रवेश की आज्ञा पाकर दुबली-पतली मैली-कुचैली एक ब्राह्मणी राजा के सम्मुख उपस्थित हुई॥४०॥ अपने सम्मान के समान फटे-पुराने वस्त्र से लिपटी हुई और दैन्य एवं दुःख के समान अपने दोनों बालकों को गोद में लिये हुई वह ब्राह्मणी राजा का समुचित अभिवादन करके बोली— मैं कुलीन घर की ब्राह्मणी हूँ और परिस्थितिवश ऐसी दरिद्रावस्था में आ गई हूँ। ये एक साथ दो अर्थात् जुड़वाँ बच्चे उत्पन्न हो गये। मेरे भोजन का ठिकाना नहीं है। इसलिए इन बच्चों को मैं दूध नहीं पिला सकती॥४१-४३॥ इसलिए हे महाराज मैं दुखिया शरण में आये हुए पर दया करनेवाले आपकी शरण में आई हूँ। अब आप जो उचित समझें करें॥४४॥ यह सुनकर दयालु राजा ने द्वारपाल को आज्ञा दी कि इसे ले जाकर महारानी वासवदत्ता को सौंप दो॥४५॥ तब वह अपने शुभकर्म के समान आगे चलनेवाले उस द्वारपाल ने उसे महारानी वासव- दत्ता के पास पहुँचा दिया॥४६॥ द्वारपाल से यह जानकर कि 'इसे महाराज ने भेजा है'—रानी वासवदत्ता ने उस ब्राह्मणी पर अत्यन्त दया प्रकट की॥४७॥ दो बच्चोंवाली उस दीन ब्राह्मणी को देखकर रानी सोचने लगी कि विधि की यह विपरीत गति है कि वन्द्य वस्तु से उसे डाह होता है और न-वस्तु से प्रेम होता है। अभी तक मुझे एक बालक भी नहीं हुआ और इसके एक साथ ही दो हो गये॥४८-४९॥ ऐसा सोचती हुई रानी स्नान करने गई और दासियों को उस ब्राह्मणी के स्नानादि के लिए आज्ञा दे गई॥५०॥ दासियों द्वारा स्नान नवीन वस्त्र और स्वादिष्ट भोजनों से सम्मानित वह ब्राह्मणी इस प्रकार आश्वस्त होकर अच्छी सांस लेने लगी जैसे संतृप्त भूमि पानी सींचने पर सोधी सुगन्ध छोड़ती है ॥५१॥
४१८ कथासरित्सागर
४१८ कथासरित्सागर तत्पार्श्वं व्रज राज्यं ते साधयिष्यति वत्स सः। इत्युक्तः स तदा मात्रा राजपुत्रो जगाद ताम् ॥६६॥ तत्र मां निष्परिकरं गतं को बहु मन्यते। तच्छ्रुत्वा पुनरप्येवं सा माता तमभाषत ॥६७॥ श्वशुरस्य गृहं गत्वा स्वं हि प्राप्य सतो धनम्। कृत्वा परिकरं गच्छ निकटं चक्रवर्तिनः ॥६८॥ इति स प्रेरितो मात्रा समन्योऽपि नृपात्मजः। तस्मात्प्रतस्थे साय च प्राप तच्छ्वशुर गृहम् ॥६९॥ पितृहीनो विनष्टार्थोबाष्पपातामिलक्षणः। अकाल नाशकच्चात्र प्रवेष्टुं लज्जया निशि ॥७०॥ निकटे सत्रशालास्य स्थितः श्वशुरमन्दिरात्। नक्तं रज्जवावरोहन्तीमकस्मात्स्त्रियमैक्षत ॥७१॥ क्षणाच्च भार्या स्वामेव तां रत्नद्युतिभास्वराम्। उल्कामिवान्ध्रपतितां परिज्ञायाभ्यतप्यत ॥७२॥ सा तु तं धूसराङ्गम दृष्ट्वाप्यपरिजानती। कोऽसीत्यपृच्छत्तच्छ्रुत्वा पान्थोऽहमिति सोऽब्रवीत् ॥७३॥ ततः सा सत्रशालान्तः प्रविष्टा वणिक्सुता। अन्वगाद्राजपुत्रोऽपि स तां गुप्तमवेक्षितुम् ॥७४॥ सा चात्र पुरुषं कञ्चिदुपागात्क्रुब्धोऽपि ताम्। स्वं चिरेणागतासीति पादघातैरताडयत् ॥७५॥ ततः सा द्विगुणीभूतरागा पापा प्रसाद्य तम्। पुरुषं तेन सहिता तत्र तस्थौ यदृच्छया ॥७६॥ तदृष्ट्वा तु स सुप्रज्ञो राजपुत्रो व्यचिन्तयत्। कोपस्यायं न कालो मे साध्यमम्यद्धि वर्तते ॥७७॥ क्व च प्रसरद्रक्तच्छद्म कृपणयोर्द्वयोः। शत्रुर्योऽयं स्त्रियामस्यामस्मिंश्च नृपशौ मम ॥७८॥ किमेतया दुष्टया वा कृत्यमेतद्धि युज्यते। मद्यैर्मासोक्तनक्रोडानेपुच्छे दुःखरूपिणः ॥७९॥ अतुल्यकुलसम्बन्धः सैषा किं वापराध्यति। मुक्त्वा वलिभुजं काकी कोकिले रमते कथम् ॥८०॥
चतुर्थ लम्बक ४१९
चतुर्थ लम्बक ४१९ माता के इस प्रकार कहने पर राजकुमार बोला कि 'बिना राजा के योग्य साज-सामान के वहाँ जाने पर कौन मेरा सम्मान करेगा। यह सुनकर माता ने बेटे से फिर कहा कि 'तुम श्वशुर के घर जाकर उससे धन लेकर अपना साज-सामान आदि ठीक करके चक्रवर्ती के पास जाओ ॥६६-६८॥ इस प्रकार माता से प्रेरित वह राजकुमार श्वशुर से धन माँगने में लज्जित होता हुआ भी गया और सायंकाल मथुराम् मे पहुँचा ॥६९॥ पितृहीन भ्रष्टराज्य और धनवासा वह राजकुमार रोने की शंका से उस समय घर में जाना उचित न समझकर श्वशुर-गृह के समीप ही एक धर्मशाला में ठहर गया ॥७० ॥ धर्मशाला में रहते हुए उसने रात को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ती हुई एक स्त्री को देखा ॥७१॥ कुछ समय में ही रत्नों की चमक से चमकती हुई अपनी स्त्री को उसने पहचान लिया और आकाश से गिरी हुई उल्का के समान उसे देखकर सन्तप्त हो गया ॥७२॥ उसकी स्त्री मार्ग रमण से दुर्बल और धूल से धूसरित उसके शरीर को देखकर भी उसे न पहचान सकी और पूछने लगी कि 'तुम कौन हो ?' उत्तर में उसने कहा—'मैं पथिक (बटोही) हूँ ॥७३॥ तब वह स्त्री धर्मशाला के अन्दर गई। राजकुमार भी रहस्य जानने की इच्छा से छिपकर उसका पीछा करने लगा ॥७४॥ वहाँ पर एक पुरुष भी आया और उसने 'तू देर से आई' ऐसा कहकर उस स्त्री को लातें मारी ॥७५॥ लात खाकर वह पापिष्ठ दूयूने प्रेम से उसे मनाकर उसके साथ विहार करने लगी ॥७६॥ उसे देखकर वह बुद्धिमान् राजकुमार सोचने लगा कि 'यह चाप करने का समय नहीं है। मुझे तो इस समय दूसरा ही कार्य सिद्ध करना है ॥७७॥ शत्रुओं के पाश अपने शस्त्र का इस पातिन स्त्री और महान् पर क्या चलाऊँ? जैसी दुष्ट स्त्री से भी क्या प्रयोजन ? यह मेरे दुर्भाग्य का ही दोष है या मेरे धैर्य की परीक्षा का स्वभाव देखने के लिए विधाता दुःखों की वर्षा कर रहा है ॥७८-३ ॥ असंसान कुला के सम्बन्ध का यह परिणाम है। इसमें उस स्त्री का क्या दोष है। कोई कौवे को छोड़कर पारवत (नर) का धैर्य १ बात गवती है ॥८४ ॥
४१६ कथासरित्सागर
४१६ कथासरित्सागर समाश्वस्ता च सा युक्त्या कथाञ्चाप परीक्षतुम्। क्षणान्तर निजगदे देव्या वासवदत्तया ॥५२॥ भो ब्राह्मणि ! कथा काचित्त्वया मः कथ्यतामिति । सम्परक्षा सा तथेत्युक्त्वा कथां वक्तु प्रचक्रम ॥५३॥ राजः देवदत्तस्य तद्भार्यायाश्च कथा पुराभूज्जयदत्ताख्यः सामान्य कोऽपि भूपतिः । देवदत्ताभिधानश्च पुत्रस्तस्योदपद्यत ॥५४॥ यौवनस्थस्य तस्याथ विवाहं तनयस्य सः । विधातुमिच्छन्नृपतिर्मेक्षमानित्त्यचिन्तयत् ॥५५॥ वेश्येव बलवद्भोग्या राजश्रीरतिचञ्चला । वणिजां तु कुलस्त्रीव स्थिरा लक्ष्मीरनन्यगा ॥५६॥ तन्माद् विवाहं पुत्रस्य करोमि वणिजां गृहात् । राज्येऽस्य बहुदायादे यन नापद् भविष्यति ॥५७॥ इति निश्चित्य पुत्रस्य कृते वव्रे स भूपतिः । वणिजो वसुदत्तस्य कन्यां पाटलिपुत्रकात् ॥५८॥ वसुदत्तोऽपि स ददौ श्लाघ्यसम्बन्धवाञ्छया । दूरदेशान्तरञ्ज्यस्मै राजपुत्राय तां सुताम् ॥५९॥ पूरयामास च तथा रत्नजर्मास्तर स तम्। मगलद्धहुमानोऽस्य यया स्वपितृवैभवं ॥६०॥ अवाप्ताढ्यवणिकपुत्रीसहितेनाथ तेन सः । तनयेन समं तस्थौ जयदत्तनृप सुखम् ॥६१॥ एकदा तत्र चागत्य सोत्क सम्बन्धिसद्मनि । स वणिग्वसुदत्तस्तां निनाय स्वगृहं सुताम् ॥६२॥ ततोऽकस्मात्स नृपतिर्जयदत्तो दिवं ययौ । उपभूय गोत्रजैस्तस्य तच्च राज्यमधिष्ठितम् ॥६३॥ तद्भीत्या तस्य तनयो जनन्या निजया मिलि । देवदत्तस्तु नीतोऽभूदन्यदेशमरक्षितः ॥६४॥ सत्राहु राजपुत्रं तं माता दुःखितमानसा । देवोऽस्ति चक्रवर्ती न प्रभुः पूर्वदिगीश्वरः ॥६५॥
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४१८ कथासरित्सागर
४१८ कथासरित्सागर तत्पार्श्वं व्रज राज्यं ते साधयिष्यति वत्स सः। इत्युक्तः स तथा मात्रा राजपुत्रो जगाद ताम् ॥६६॥ तत्र मां निष्परिकरं गतं को बहु मन्यते। तच्छ्रुत्वा पुनरप्येवं सा माता तमभाषत ॥६७॥ श्वशुरस्य गृहं गत्वा त्वं हि प्राप्य ततो धनम्। कृत्वा परिकरं गच्छ निकटं चक्रवर्तिनः ॥६८॥ इति स प्रेरितो मात्रा सल्लज्जोऽपि नृपात्मजः। क्रमादतस्थे सायं च प्राप तच्छ्वशुरं गृहम् ॥६९॥ पितृहीनो विनष्टश्रीर्बाष्पपाताभिशङ्कया। अकाले नाशकच्चात्र प्रवेष्टुं लज्जया निशि ॥७०॥ निकटे सत्रशालायां स्थितः श्वशुरमन्दिरात्। नक्तं रज्ज्वावरोहन्तीमकस्मात्स्त्रियमैक्षत ॥७१॥ क्षणाच्च भार्यां स्वामेव तां रत्नद्युतिभास्वराम्। उल्कामिवाभ्रपतितां परिज्ञायाभ्यतप्यत ॥७२॥ सा तु तं धूसराङ्गं दृष्ट्वाप्यपरिजानती। कोऽसीत्यपृच्छत्तच्छ्रुत्वा पान्थोऽहमिति सोऽब्रवीत् ॥७३॥ ततः सा सत्रशालान्तः प्रबिवेश वणिक्सुता। अन्वगाद्राजपुत्रोऽपि स तां गुप्तमवेक्षितुम् ॥७४॥ सा चात्र पुरुषं कञ्चिदुपागात्कुप्योऽपि ताम्। त्वं चिरेणागतासीति पादघातैरताडयत् ॥७५॥ ततः सा द्विगुणीभूतरागा पापा प्रसाद्य तम्। पुरुषं तेन सहिता तत्र तस्थौ यदृच्छया ॥७६॥ तद्दृष्ट्वा तु स सुप्रभो राजपुत्रो व्यचिन्तयत्। कोपस्यायं न कालो मे साध्यमन्यद्धि वर्तते ॥७७॥ अथ च प्रसरञ्चेत्तच्छन्नं दूषणयोर्द्वयोः। धनुर्योग्यः स्त्रियामस्यामस्मिन्वा नृपशौ मम ॥७८॥ किमेतया सुबध्वा वा शूरयमतद्धि दुर्विधः। मल्लर्याकोशमक्रोडानेपुष्य दुःस्तनपिनः ॥७९॥ अतुल्यकुलसम्बन्धं मया किं वापराध्यति। भूरन्धा बलिभुजं काकी कोकिलं रमतं वधम् ॥८०॥
चतुर्थ लम्बक ४१९
चतुर्थ लम्बक ४१९ माता के इस प्रकार कहने पर राजकुमार बोला कि 'बिना राजा के योग्य साज-सामान के वहाँ जाने पर कौन मेरा सम्मान करेगा। यह सुनकर माता ने बेटे से फिर कहा कि 'तुम श्वशुर के घर जाकर उससे धन लेकर अपना साज-सामान आदि ठीक करके चक्रवर्ती के पास जाना ॥६६-६८॥ इस प्रकार माता से प्रेरित वह राजकुमार श्वशुर से धन माँगने में लज्जित होता हुआ भी गया और सायंकाल मथुरापुर में पहुँचा ॥६९॥ पितृहीन भ्रष्टराज्य और धनचाहा वह राजकुमार रात्रि की शंका में उस समय घर में जाना उचित न समझकर श्वशुर-गृह के समीप ही एक धर्मशाला में ठहर गया ॥७०॥ धर्मशाला में रहते हुए उसने रात को रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ती हुई एक स्त्री को देखा ॥७१॥ कुछ समय में ही रत्नों की चमक से चमकती हुई अपनी स्त्री को उसने पहचान लिया और आकाश से गिरी हुई उल्का के समान उसे देखकर संतप्त हो गया ॥७२॥ उसकी स्त्री मार्ग श्रम से दुर्बल और धूल से धूसरित उसके शरीर को देखकर भी उसे न पहचान सकी और पूछने लगी कि 'तुम कौन हो'? उत्तर में उसने कहा—'मैं पथिक (बटोही) हूँ ॥७३॥ तब वह स्त्री धर्मशाला के अन्दर गई। राजकुमार भी रहस्य जानने की इच्छा से छिपकर उसका पीछा करने लगा ॥७४॥ वहाँ पर एक पुरुष भी आया और उसने 'तू देर से आई' ऐसा कहकर उस स्त्री को लातें मारीं ॥७५॥ लातें खाकर वह चारित्र दुष्टा ने उसे मनाकर उसके साथ विहार करने लगी ॥७६॥ उसे देखकर वह बुद्धिमान् राजकुमार सोचने लगा कि यह क्रोध करने का समय नहीं है। अतः तो इस समय इसका ही कार्य सिद्ध करना है ॥७७॥ शत्रुओं के योग्य अपने राज्य का इस चारित्र स्त्री और शङ्खलूट रूप क्या बनाऊँ? ऐसी दुष्टा स्त्री से भी क्या प्रयोजन? यह मेरे दुर्भाग्य का ही काम है या मेरे धैर्य की परीक्षा का प्रमाण देखने के लिए मुझपर दुःखों की वर्षा कर रहा है ॥७८-७९॥ प्रच्छन्न दुष्टा के सम्बन्ध का यह परिणाम है। इसमें उस स्त्री का क्या दोष है। खोटी गाँठ का ग्राहक काष्ठ (नर) का दोष थाम सकती है ॥८०॥
४२० कथासरित्सागर
४२० कथासरित्सागर इत्यालोच्य स तां भार्यामुपेक्षत सकामुकाम् । मत्वा गुरु भिगोप्ये हि चेतसि स्त्रीत्वम् कियत् ॥८१॥ तत्कालं च रतावेगवशात्तस्याः किलापतत् । वणिक्सुतायाः श्रवणात् समुक्तानयं विभूषणम् ॥८२॥ तच्च सा न ददर्शैव सुरतान्ते च सत्वरा । ययौ यथागतं गेहमापुंश्च्योपपति स्ततः ॥८३॥ तस्मिन्नपि गते क्वापि द्रुतं प्रच्छन्नकामुके । स राजपुत्रो दृष्ट्वा तद्रत्नमाभरणमग्रहीत् ॥८४॥ स्फुरद्रत्नशिखाजाल भान्त्रा मोहतमोपहम् । हस्तदीपमिव दत्तं प्रनष्टस्त्रीयवेषणे ॥८५॥ महार्हं च तदालोक्य राजपुत्रः स तत्क्षणम् । निर्गत्य सिद्धकार्यः सन्कान्यकुब्जं ततो ययौ ॥८६॥ तन्न बन्धाय दत्त्वा तत्स्वर्गसक्षेण भूषणम् । क्रीत्वा हस्त्यश्वमगमत्स पार्श्वं चक्रवर्तिनः ॥८७॥ तद्दत्तेन बले साकमत्य हत्वा रिपून् रणे । प्राप तत्पैतृकं राज्यं कृती मात्रामिनन्दितः ॥८८॥ तन्न बन्धाद् विनिर्मोक्ष्य भूषणं स्वश्वशुरान्तिकम् । प्राहिणोत् प्रकटीकर्त्तुं रहस्यं तदधङ्कितम् ॥८९॥ सोऽपि तच्छ्वशुरो दृष्ट्वा स्वसुताकर्णभूषणम् । तत्तमोपागतं तस्मै सम्भ्रान्तं समदर्शयत् ॥९०॥ सापि पूर्वपरिभ्रष्टं चारित्रमिव वीक्ष्य तत् । बुद्ध्वा च भर्त्रा प्रहितं व्याकुलञ्च समस्मरत् ॥९१॥ इव मे पतिन तस्यां रात्रौ सत्रगृहान्तरे । यस्यां सत्र स्थितो दृष्टः स कोऽपि पथिको मया ॥९२॥ तन्नूनं सोऽत्र भर्त्ता मे धीमन्विज्ञामयाययौ । मया तु न म विज्ञातस्तनेदं प्रापि भूषणम् ॥९३॥ इत्येवं धिग्तयस्त्यान्यं पुर्नयव्यक्तिविह्वलम् । वणिक्सुताया हृदयं तस्याः कातरमस्फुटत् ॥९४॥ ततस्तस्या रहस्यज्ञां पृष्ट्वा चटीं स्वयुक्तिभिः । तत्पिता स वणिग्बुद्ध्या तत्त्वं तत्पात्र तज्जुदुपम् ॥९५॥
चतुर्थ लम्बक ४२१
चतुर्थ लम्बक ४२१ ऐसा सोचकर उसने उपपति के साथ उस स्त्री की उपेक्षा कर दी। शत्रु-विजय की प्रबल इच्छा रखनेवाले सज्जनों के हृदय में स्त्री-रूपी तृण का क्या महत्त्व है॥८१॥ उसी समय विहार की हलबल में उस बनिये की बेटी का मणियों से जड़ा हुआ कान का बहुमूल्य आभूषण (तरङ्गी) कहीं गिर पड़ा। जाने की शीघ्रता में उसने गिरे हुए कान के आभूषण को नहीं देखा और वह अपने प्रेमी से आज्ञा लेकर अपने घर चली गई॥८२-८३॥ कुछ समय के उपरान्त उस प्रेमी के भी चले जाने पर राजकुमार ने उस जड़ाऊ गहने को उठा लिया॥८४॥ चमकीले रत्नों की चमचमाती हुई किरणात्मक बहुमूल्य मणियों से जड़ा हुआ वह आभूषण विनष्ट राज्यलक्ष्मी को ढूंढ़ने में सहायक हाथ के दीपक के समान दैव ने मानो राजकुमार के हाथ में दे दिया था॥८५॥ गृहगमनोत्सुक राजकुमार वहाँ से निकलकर उसी समय कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश को चला गया॥८६॥ राजकुमार कन्नौज जाकर कान के उस आभूषण का एक भाग मुहरों पर बन्धक (गिरवी) रखकर उस धन से हाथी घोड़े आदि खरीदकर राजोचित ठाट-बाट से कान्यकुब्ज के चक्रवर्ती के समीप गया॥८७॥ उनसे मिलकर और सहायता-स्वरूप उनकी सेनाओं को लेकर वह शत्रुओं पर चढ़ आया। कठिन युद्ध में विजयी होकर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया और माता ने भी उसका अभिनन्दन किया॥८८॥ राज्य प्राप्त करने पर उसने बन्धक का रुपया देकर पत्नी के उस कर्णाभूषण को छुड़ा लिया और अपनी पत्नी का रहस्य प्रकट करने के लिए उस आभूषण को अपने श्वशुर के पास भेज दिया। वह वैश्य इस प्रकार अपनी कन्या के कर्णाभूषण को पाकर घबराया हुआ उसके पास गया और उसे दिखाया॥८९ ॥ वह वैश्यपुत्री उसे देखकर और वह भी पति के द्वारा भेजा हुआ जानकर, अत्यन्त व्याकुल हुई॥ ९० ॥ 'मेरे कान का यह आभूषण उस दिन रात को धर्मशाला के भीतर गिर गया था जिस दिन जैन किसी अज्ञात पथिक का डेरा था॥ ९१ ॥ अवश्य ही वह मेरा पति था जो मेरा चरित्र जानने की इच्छा से छिपकर आया था। मैंने उसे नहीं पहिचाना। बस उसी ने यह कर्णाभूषण वहाँ पाया होगा॥ ९२॥ इस प्रकार सोचते हुए पश्चात्ताप से व्याकुल उस वैश्य-कन्या का हृदय उसी समय फट गया और वह मर गई॥ ९३॥ तदनन्तर उसके रहस्य को जाननेवाली उसकी अंगरक्षक दासी से युक्तिपूर्वक सब वृत्तान्त कहकर उसके पिता ने भी उसके मरने पर दुःख नहीं मनाया। प्रत्युत उसका अच्छा कल्याण ही मनाया॥ ९४ ॥
४२२ कथासरित्सागर
४२२ कथासरित्सागर राजपुत्रोऽप्य सम्प्राप्तराज्यो लब्ध्वा गुणाधिकाम् । स चक्रवर्त्तितनयां भार्या भेजेऽपरां धियम् ॥९६॥ तदित्थं साहसं स्त्रीणां हृदयं वज्रकर्कशम् । सत्त्वं साध्वसावगसम्पाते पुण्यपलभ्यम् ॥९७॥ तास्तु काश्चन सद्धंशजाता मुक्ता इवाङ्गनाः । या सुवृत्ताच्छहृदया यान्ति भूपणतां भुवि ॥९८॥ हरिणीव च राजश्रीरेव विप्लुविनी सदा । धयपातन घटु च तामेके जानत बुधाः ॥९९॥ तस्मादापद्यपि त्याज्यं न सत्त्वं सम्यगेविभिः । अयमेवात्र वृत्तान्तो ममात्र च निदर्शनम् ॥१००॥ यन्मया विवुरेऽप्यस्मिंश्चारित्रं देवि ! रक्षितम् । युष्मद्दर्शनकल्याणप्राप्त्या तत्फलितं हि मे ॥१०१॥ इति तस्या मुखाच्छ्रुत्वा ब्राह्मण्यास्तत्क्षणं कथाम् । देवी वासवदत्ता सा सादरा समचिन्तयत् ॥१०२॥ ब्राह्मणी कुलवत्येषा ध्रुवमस्या ह्युदारताम् । भङ्क्तिं स्वशीलोपशपं वज्रप्रौढिश्च शंसति ॥१०३॥ राजसत्प्रभवेणास्या भावीष्यन्वत एव च । इति सञ्चिन्त्य देवी तां ब्राह्मणीं पुनरब्रवीत् ॥१०४॥ भार्या त्वं कस्य को वा ते वृत्तान्तः कथ्यतां त्वया । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणी भूयः साथ वक्तुं प्रचक्रमे ॥१०५॥ पिङ्गलिकाया आत्मकथा मालवे ऽस्ति धात्र्यागीदग्निदत्त इति द्विजः । निष्प्रयो धीमरस्तथ्यो स्वयमाप्तमनोरथेष्वि ॥१०६॥ तस्य च स्यानुरुणो द्वावालश्री शनयो क्रमात् । ज्येष्ठः पतुर्दत्ताख्या नाम्ना शान्तिवरस्ततः ॥१०७॥ तया शान्तिवरस्तस्माद् विद्यार्थी स्वपितुर्गृहात् । स बाल एव निर्गत्य गतः काश विद्याथिने ॥१०८॥ चिन्तयन्तः स तद्भ्राता ज्येष्ठो मां परिणायतवान् । अनयोर्यशसाऽनल्प महायभूतसम्पदा ॥१०९॥
चतुर्थ लम्बक ४३१
चतुर्थ लम्बक ४३१ राजकुमार भी अपने पैतृक राज्य को प्राप्त कर और अपने गुणों से प्राप्त चक्रवर्ती की कन्या को पत्नी-रूप में स्वीकार कर परम आनन्द का उपभोग करने लगा। अर्थात् काम्पि- ल्यनगरेन्द्र ने उसकी वीरता से प्रसन्न होकर उसे अपनी कन्या दे दी ॥१९६॥ इस प्रकार साहसिक काल में स्त्रियों का जो हृदय वज्र के समान कठिन होता है, वही आकस्मिक व्याकुलता होने पर पुष्प से भी कोमल हो जाता है ॥१९७॥ अन्तःपुर में वल्लभ मन्त्री के समान चरित्रवती और स्वच्छ हृदयवाली स्त्रियाँ तो इनी- गिनी ही होती हैं जो संसार का भूषण होती हैं ॥१९८॥ राजलक्ष्मी हरिणी के समान सदा उछलती-कूदती और छलाँगें मारती रहती है। उसे धैर्य-रूपी पाश में बाँधना कुछ ही बुद्धिमान् जानते हैं, सभी नहीं ॥१९९॥ इसलिए सम्पत्ति बाहुल्यवाले को घोर विपत्ति में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए ॥२००॥ मैंने भी इस घोर विपत्ति काल में अपने चरित्र की जो रक्षा की है, आपका दर्शन उसी का परिणाम है ॥२०१॥ इस प्रकार ब्राह्मणी के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी वासवदत्ता उसके प्रति आदर की भावना से सोचने लगी— ॥२०२॥ अवश्य ही यह ब्राह्मणी उच्चकुल-प्रसूता है। इसकी उदारता और अपने चरित्र को प्रकट करने का ढंग और वार्तालाप की शैली यह बात बता रही है ॥२०३॥ इसी प्रकार राजसभा में आने की चतुरता भी इसकी उच्चता बता रही है। ऐसा सोचकर रानी ब्राह्मणी से फिर बोली— 'तुम किसकी स्त्री हो और क्या विशेष परिस्थिति है, कहो। यह सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी ॥२०४-२०५॥ पिंगलिका की आत्मकथा हे महारानी! मालवदेश में अग्निदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। वह लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का आश्रय था, याचकों का स्वयं धन देनेवाला था ॥२०६॥ उसीके समान उसके क्रमशः दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम शंकरदत्त और छोटे का नाम शान्तिकर था ॥२०७॥ छोटा पुत्र शान्तिकर, बाल्यकाल में ही विद्याध्ययन के लिए पिता के घर से कहीं चला गया ॥२०८॥ बड़े पुत्र शंकरदत्त ने यज्ञ के लिए सम्पत्ति एकत्र करनेवाले यज्ञदत्त की कन्या (मुझसे) विवाह कर लिया ॥२०९॥
४२४ कथासरित्सागर
४२४ कथासरित्सागर कालेन तस्य मद्भर्त्तुः सोऽग्निवत्ताभिधः पिता। वृद्धो लोकान्तरं यातो भार्यानुगतः स्वया ॥११०॥ तीर्थोद्देशाच्च मद्भर्त्ता मृतगर्भं विमुच्य माम्। गत्वा सरस्वतीपूरे शोकेनान्धो जहौ तनुम् ॥१११॥ वृत्तान्ते कथित चास्मिन्नेत्य तत्सहयायिभिः। स्वजनभ्यो मया लब्धं नानुगन्तुं सगर्भया ॥११२॥ ततो मय्यार्त्तशोकायामकस्मादेत्य दस्युभिः। अस्मन्निवाससकलोऽप्यप्रहारो विलुष्ठितः ॥११३॥ तत्क्षणं तिसृभिः सार्धं ब्राह्मणीभिरहं ततः। भीरुर्भ्रशभयाद्रातस्वल्पवस्त्रा पलायिता ॥११४॥ देशभङ्गाद् विदूरं च गत्वा देशं सान्विता। मासमात्रं स्थिताऽभूवं कृच्छ्रकर्मोपजीविनी ॥११५॥ श्रुत्वा चानाथशरणं लोकाद् वत्सेश्वरं सतः। सब्राह्मणीका शीलैकपाथेयाहमिहागता ॥११६॥ आगत्यच प्रसूतास्मि युगपत्त नयावुभौ। स्थितासु भासु तिसृषु ब्राह्मणीषु सखीष्वपि ॥११७॥ शोको विदेशो दारिद्र्यं द्विगुणः प्रसवोऽप्ययम्। अहो अपावृतं द्वारमापदां मम वेधसा ॥११८॥ तदेतयोगतिर्नास्ति बालपोषर्णनाय मे। इत्यालोच्य परित्यज्य लज्जां योषिद्विभूषणम् ॥११९॥ मया प्रविश्य वत्सेशो राजा सदसि याचितः। न शक्तः सोढुमापन्नवासार्त्यार्तिवर्धनम् ॥१२ ०॥ तदादेशेन च प्राप्तं मया स्वम्वरजान्तिकम्। विपदश्च निवृत्ता मे द्वारात्प्रतिहता इव ॥१२१॥ इत्येष मम वृत्तान्तो नाम्ना पिङ्गलिकाऽस्म्यहम्। माबाल्याग्निक्रियाधूमैर्यन्मे पिङ्गलितं दृशौ ॥१२२॥ स तु क्षान्तिकरो देवि देवरो मे विदेशगः। कुत्र तिष्ठति वेद्योऽसाविति नाद्यापि बुद्ध्यते ॥१२३॥ एवम्भूतस्ववृत्तान्ता कुलीनेत्यवधार्य ताम्। प्रीतैर्ना ब्राह्मणीं देवी सा वित्यर्थैवमब्रवीत् ॥१२४॥
चतुर्थ लम्बक ४२५
चतुर्थ लम्बक ४२५ समय के अनुसार मेरे पति के पिता वह्निदत्त वृद्धावस्था के कारण परलोक सिधार गये और उनकी पत्नी (मेरी सास) उनके साथ सती हो गई॥११० ॥ मेरे पति ने तीर्थयात्रा के उद्देश्य से मुझ गर्भवती को घर पर छोड़कर और पितृशोक से अन्धे होकर सरस्वती नदी के प्रवाह में अपना शरीर-त्याग कर दिया ॥१११॥ उसके साथी अन्यान्य यात्रियों द्वारा उसका समाचार कहने पर गर्भवती होने के कारण मैंने अपने बन्धुओं से सती होने की आज्ञा नहीं प्राप्त की॥११२॥ जब मैं पति के शोक में मग्न ही थी कि एकाएक लुटेरा ने हमारे निवास-स्थान गांव को ही नष्ट किया॥११३॥ उस समय मैं गांव की तीन ब्राह्मणियों के साथ चरित्र नष्ट होने के भय से थोड़े-से वस्त्रों को साथ लेकर घर से भाग गई॥११४॥ अपना देश नष्ट हो जाने पर उन तीनों के साथ दूर देश को चली गई और एक मास तक परिश्रम के कार्य करके जीवन-निर्वाह करती रही॥११५॥ यहाँ आकर यह सुना कि 'वत्स देश के राजा अनाथों की रक्षा करते हैं तो मैं उन ब्राह्मणियों के साथ एकमात्र चरित्र के सहारे यहाँ आ गई॥११६॥ यहाँ आते ही एक साथ दो बालकों को उत्पन्न किया। उस समय वे तीनों ब्राह्मणी सहेलियाँ मेरे साथ थीं॥११७॥ पति का नाश विदेश दरिद्रता और दूना प्रसव आदि—यह सब देखकर भाग्य ने मेरी विपत्तियां का द्वार खोल दिया है॥११८॥ इन दोनों बच्चों के पालन-पोषण के लिए मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं है यह सोचकर, इसीलिए स्त्रियों के भूषण—लज्जा—को छोड़कर मैंने दरबार में आकर वत्सराज से प्रार्थना की। सच है, निरीह शिशुओ की वेदना को कौन सहन कर सकता है॥११ ९२ ॥ उन्हीं की आज्ञा से मैंने तुम्हारे चरणों में स्थान पाया है। फलतः मेरी सारी विपत्तियां मानो राजद्वार से टकराकर पीछे लौट गईं ॥१२१॥ यह मेरा वृत्तान्त है। मेरा नाम पिंगलिका है। बाल्यपन में अग्निहोत्र के धूम से मेरी आंखें पीली हो गईं इसीलिए मेरा नाम पिंगलिका हुआ॥१२२॥ विदेश गया हुआ मेरा देवर शान्तिकर, किस देश में है इसका अभी तक मुझे पता नहीं है॥१२३॥ इस प्रकार अपना वृतान्त कहती हुई उस ब्राह्मणी को कुलीन समझकर रानी प्रेमपूर्वक कहने लगी—॥१२४॥ ५४
४३६ कथासरित्सागर
४३६ कथासरित्सागर इह शान्तिकरो नाम स्थितोऽस्माकं पुरोहितः । गवेषकः स जानंस्तु ववरस्तं भविष्यति ॥१२५॥ इत्युक्त्वा ब्राह्मणीमुक्तां नीत्वा रात्रिं तत्रैव ताम् । देवी शान्तिकरं प्रातरानाय्यापृच्छदन्वयम् ॥१२६॥ उक्तान्वयाय तस्मै च सा सञ्जातसुनिश्चया । इयं स भ्रातृभार्येति ब्राह्मणीं तामदर्शयत् ॥१२७॥ ज्ञातायां च परिज्ञातो ज्ञातबन्धुक्षयोऽथ सः । ब्राह्मणीं भ्रातृभार्यां तां निन्ये शान्तिकरो गृहम् ॥१२८॥ तत्रानुशोच्य पितरौ भ्रातरं च यथोचितम् । आश्वासयामास स तां बालकद्वितयान्विताम् ॥१२९॥ देवी वासवदत्तापि तस्यास्तौ बालकौ सुतौ । पुरोहितौ स्वपुत्रस्य भाविनः पर्यकल्पयत् ॥१३०॥ ज्येष्ठस्तयोः शान्तिसोमो नाम्ना वैश्वानरोऽपरः । कृतस्तथैव देव्या च वितीर्णबहुसम्पदा ॥१३१॥ अन्वस्यैवास्य लोकस्य फलभूमिः स्वकर्मभिः । पुरोर्गमीयमानस्य हेतुमात्रं स्वपौरुषम् ॥१३२॥ यदेत्य लब्धविभवास्तत्र सर्वेऽपि सङ्गताः । बालकौ तौ तयोः सा च माता शान्तिकरश्च सः ॥१३३॥ ततो गच्छत्सु दिवसेष्वेकदा पञ्चभिः सुतैः । सहागतामुपादाय शशवान्कुम्भकारिकाम् ॥१३४॥ दृष्ट्वा स्वमन्दिरे काञ्चिदृष्ट्या वासवदत्तया । सा ब्राह्मणी पिङ्गलिका जगदे पार्श्ववर्तिनी ॥१३५॥ पञ्चैतस्याः सुतोऽद्यापि नैको मे सक्ति दृश्यताम् । पुण्यानामीदृशां पात्रमीदृग्यपि न मादृशी ॥१३६॥ ततः पिङ्गलिकावादीद्देवि दुःखाय जायते । प्रजायं पापभूयिष्ठा दरिद्रेष्वेव भूयसी ॥१३७॥ युष्मादृशेषु जायत यः स कोऽप्युत्तमो भवेत् । तदलं त्वरया प्राप्स्यस्यचिरात्स्वोचितं सुतम् ॥१३८॥ इति पिङ्गलिकाक्तापि सोत्सुका सुतजन्मनि । अभूद् वासवदत्ता सा तच्चिन्तात्राण्तमानसा ॥१३९॥ -
चतुर्थ लम्बक ४९७
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण है:
चतुर्थ लम्बक ४९७ यहाँ शान्तिकर नाम का हमारा एक पुरोहित रहता है, वह इस देश का नहीं, परदेशी है। मैं समझती हूँ, वह तुम्हारा देवर होगा॥१२५॥ ऐसा कहकर उत्कण्ठित ब्राह्मणी की रात्रि में उसी प्रकार व्यवस्था करके प्रातःकाल ही रानी ने पुरोहित को बुलाकर उसके कुल और देश का पता पूछा॥१२६॥ उसके अपने कुल का पता बताने पर भली भाँति निश्चय कर रानी ने 'यह तुम्हारी भाभी है'—ऐसा कहकर उस ब्राह्मणी को उसे दिखाया॥१२७॥ परिचय होने पर और अपने भाई की मृत्यु का समाचार जानने पर शान्तिकर अपनी भाभी को अपने घर ले गया॥१२८॥ घर जाकर पिता और भाई के लिए समुचित शोक प्रकट करके दोनों बच्चों-सहित भाभी को उसने धैर्य प्रदान किया॥१२९॥ रानी वासवदत्ता ने भी उन दोनों बालकों को उत्पन्न होनेवाले अपने पुत्र का पुरोहित नियुक्त कर दिया॥१३०॥ रानी ने ही उन दोनों पुत्रों में से बड़े का नाम शान्तिसोम और छोटे का नाम वैश्वानर रखा। साथ ही उनके लिए प्रचुर सम्पत्ति प्रदान की॥१३१॥ अन्धे के समान जीव के आगे-आगे चलनेवाला और अपने कर्मों द्वारा फल की ओर ले जानेवाला भाग्य ही होता है, पुरुषार्थ तो एक निमित्तमात्र है॥१३२॥ यही कारण है कि वह ब्राह्मणी दोनों बालक और शान्तिकर इधर-उधर से आकर प्रचुर राज-संपत्ति पाकर परस्पर मिल गये॥१३३॥ इस प्रकार कुछ दिन बीतने पर एक बार एक कुम्हारिन अपने पाँच पुत्रों को साथ लेकर मिट्टी के कुछ पात्रों-सहित वहाँ आई॥१३४॥ उसे अपने भवन में देखकर रानी ने समीप बैठी हुई पुरोहितानी ब्राह्मणी से कहा— 'सखि! देखो इसके पाँच-पाँच लड़के हैं और मुझे अभी तक एक भी नहीं है, वह इतनी पुण्यवती है। गरीब होकर भी यह मेरी जैसी निपूती नहीं है॥१३५-१३६॥ तब पिंगलिका बोली—'महारानी! पाप के फलस्वरूप अधिक सन्तान कष्ट देती है और दरिद्रा के ही होती है॥१३७॥ तुम्हारे समान उच्च लोगों की अल्पकाल सन्तान होती है, वह उत्तम होती है। जल्दी न करो। शीघ्र ही अपने कुल के योग्य सन्तान प्राप्त करोगी॥१३८॥ पिंगलिका के इस प्रकार कहने पर भी पुत्र के लिए उत्कण्ठित रानी चिन्ता करने लगी॥१३९॥
४२८ कथासरित्सागर
४२८ कथासरित्सागर
गिरिशाराधनप्राप्यः पुत्रस्ते नारदोऽभ्यधात् । तद्देवि वरदोऽवश्यमाराध्यः स शिवोऽत्र नः ॥१४०॥ इत्युक्ता वत्सराजेन तत्कालं चागतं सा । देवी सम्भाव्यमेवास्तु चकार व्रतनिश्चयम् ॥१४१॥ तस्यामात्तव्रतायां तु स राजापि समन्त्रिकः । सराष्ट्रश्चापि विदधे शङ्कराराधनव्रतम् ॥१४२॥ त्रिरात्रोपोषितौ तौ च दम्पती स विमुस्ततः । प्रसादप्रकटीभूतः स्वयं स्वप्ने समादिशत् ॥१४३॥ उत्तिष्ठतं स युवयोः कामांशो जनिता सुतः । नाथो विद्याधराणां यो भविता मत्प्रसादतः ॥१४४॥ इति वचनमुदीर्य चन्द्रमौलौ सपदि तिरोहिततां गते प्रबुध्य । अधिगतवरमाशु दम्पती तौ प्रमदमकृत्रिममापतुः कृतार्थौ ॥१४५॥ उत्थाय चोषसि ततः प्रकृतीर्विधाय । तत्स्वप्नकीर्तनसुधारसतर्पितास्ताः । देवी च सा नरपतिश्च सवन्धुभृत्यौ । बद्धोत्सवौ विदधतुर्व्रतपारणामि ॥१४६॥ कतिपयदिबसापगमे तस्याः स्वप्ने जटाधरः पुरुषः । कोऽप्यथ देव्या वासवदत्तायाः फलमुपेत्य ददौ ॥१४७॥ ततः स विनिवेदितस्फुटपवित्रस्वप्नया सह गृहं प्रमुदितस्तया समभिनन्दितो मन्त्रिभिः । विचिन्त्य शशिमौलिनो फलनिभं दत्तं सुतं । मनोरथमदूरगं गणयति स्म वत्सेश्वरः ॥१४८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे नरवाहनदत्तजनन लम्बके प्रथमस्तरङ्गः ।
द्वितीयस्तरङ्गः (पूर्वानुवृत्ता) वत्सराजकथा - मुखबन्धः अथ वासवदत्ताया वत्ससहृदयोत्सवः । सम्बभूवाचिराद् गर्भः कामांगावतरोज्ज्वलः ॥१॥