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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

१८ कथासरित्सागर

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१८ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा शापभीतेन तेनादाय सुधर्मणा। स्वकन्यान्तःपुरे गुप्ते स्त्रीति संस्थापितो युवा ॥८०॥ ततः पञ्चशिखे याते स्वप्रियान्तःपुरे वसन्। स्त्रीवेषः स द्विजस्तस्या विश्रम्भास्पदतां ययौ ॥८१॥ एकदा चोत्सुका रात्रौ तेनात्मानं प्रकाश्य सा। गुप्तं गान्धर्वविधिना परिणीता नृपात्मजा ॥८२॥ तस्यां च धृतगर्भायां तं द्विजं स गणोत्तमः। स्मृतमात्रागतो रात्रौ ततोऽप्यपवरक्षितम् ॥८३॥ ततस्तस्य समुत्सार्य यूनः स्त्रीवेषमाशु तम्। प्रातः पञ्चशिखः सोऽभूत्पूर्ववद् ब्राह्मणाकृतिः ॥८४॥ तेनैव सह गत्वा च सुधर्मानुपमभ्यधात्। अद्य प्राप्तो मया राजन्पुत्रस्तद्देहि मे स्नुषाम् ॥८५॥ ततः स राजा तां बुद्ध्वा रात्रौ क्वापि पलायिताम्। तच्छापभयसम्भ्रान्तो मन्त्रिभ्यः एवमब्रवीत् ॥८६॥ न विप्रोऽयमयं कोऽपि देवो मद्वञ्चनागतः। एवम्पाया भवन्तीह वृत्तान्ताः सततं यतः ॥८७॥ शिबिकथा तथा च पूर्वं राजाऽभूत्तपस्वी करुणापरः। दाता धीरः शिबिर्नाम सर्वसत्त्वाभयप्रदः ॥८८॥ तं वञ्चयितुमिन्द्रोऽथ कृत्वा श्येनवपुः स्वयम्। मायाकपोतवपुषं धर्ममन्वपतद्द्रुतम् ॥८९॥ कपोतश्च भयाद् गत्वा शिबेरङ्कमशिश्रियत्। मनुष्यवाचा श्येनोऽथ स च राजानमब्रवीत् ॥९०॥ राजन्भक्ष्यमिदं मुञ्च कपोतं क्षुधितस्य मे। अन्यथा मां मृतं विद्धि कस्ते धर्मस्ततो भवेत् ॥९१॥ ततः शिबिरुवाचायमेष मे शरणागतः। अत्याज्यस्तद्वदाम्यन्यं मांसमेतत्समं तव ॥९२॥ श्येनो जगाद यद्येवमात्ममांसं प्रयच्छ मे। तथेति तद्हृष्टः संस्तं राजा प्रत्यपद्यत ॥९३॥ यथा यथा च मांसं स्वमुत्कृत्यारोपयन्नृपः। तथा तथा तुलायां स कपोतोऽप्यधिकोऽभवत्।

प्रथम लम्बक १९

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प्रथम लम्बक १९ यह सुनकर राजा सुशर्मा ने ब्राह्मण के शाप के भय से उस युवा को स्त्री समझकर सुरक्षित कन्या के महल में रखवा दिया॥८०॥ पंचशिख के चले जाने पर वह ब्राह्मण-कुमार देवदत्त अपनी प्रियतमा के भवन में स्त्री-वेश धारण करके रहता हुआ अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया॥८१॥ एक बार रात को उसे अत्यन्त उत्सुक देखकर देवदत्त ने अपने को प्रकट करके गान्धर्व विधि से उससे विवाह कर लिया॥८२॥ वह राजकन्या जब गर्भिणी हो गई, तब उस ब्राह्मण ने पंचशिख-यक्ष को स्मरण किया और स्मरण करते ही वह आ गया तब देवदत्त को गुप्त रूप से ले गया॥८३॥ तब प्रातःकाल पंचशिख पहले के समान ब्राह्मण का वेश बनाकर और उस जवान के स्त्री-वेष को हटाकर राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला—'राजन् ! आज मुझे लड़का मिल गया। अब मेरी स्नुषा (पतोहू) को लौटा दो' ॥८४-८५॥ जब राजा को यह पता चला कि वह ब्राह्मण-स्नुषा कहीं भाग गई तब वह ब्राह्मण के शाप के भय से मन्त्रियों को बुलाकर परामर्श करने लगा॥८६॥ राजा ने मन्त्रियों से कहा—'यह ब्राह्मण नहीं कोई देवता है, जो मेरी परीक्षा लेने या वंचना के लिए आया है। देखा जाता है, प्रायः ऐसी बातें सर्वदा हुआ करती हैं' ॥८७॥ राजा शिबि की कथा इसी प्रकार प्राचीन युग में परम तपस्वी, दयालु, दाता धीर एवं समस्त प्राणियों को अभय देनेवाला शिबि नामक राजा हुआ। उसकी परीक्षा के लिए स्वयं इन्द्र ने बाज का रूप धारण करके कबूतर-रूपधारी धर्म का पीछा किया॥८८-८९॥ कबूतर ने बाज के भय से राजा शिबि की गोद में शरण ली। तब बाज मनुष्य की बोली में राजा से बोला—॥९० ॥ 'राजन् ! यह कबूतर मेरा भक्ष्य है। मैं भूखा हूँ। यदि तुम इसे नहीं छोड़ते तो मुझे मरा हुआ समझो। इस प्रकार मेरी हिंसा करके तुम्हें कौन-सा धर्म प्राप्त होगा ? ॥९१॥ तब शिबि ने उससे कहा कि 'यह मेरी शरण में आ गया है, इसलिए इसे अब छोड़ नहीं सकता। तुम्हारी क्षुधा-निवृत्ति के लिए इसके समान दूसरा मांस देता हूँ' ॥९२॥ बाज ने कहा— यदि ऐसी बात है, तो अपना मांस मुझे दो।' राजा ने भी प्रसन्न हो 'ऐसा ही सही' —यह कहकर इसकी बात को स्वीकार किया॥९३॥ राजा जैसे-जैसे अपना मांस काटकर तराजू पर चढ़ाता था वैसे-ही-वैसे कबूतर भारी होता जाता था॥९४॥

११० कथासरित्सागर

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११० कथासरित्सागर

स्वं शरीरं सकलं तुलां राजाध्यरोपयत् । 'साधु साधु' शमं स्वतस्त्रिव्या वागुदुभूवत ॥९५॥ इन्द्रयमौ ततस्त्यक्त्वा रूपं श्येनकपोतयो । तुष्टावतश्चतुरुद्वे तं राजानं चक्षतु शिविम् ॥९६॥ दत्त्वा चास्मै वरानन्यांस्तावन्तर्धानमीयतु । एवं मामपि कोप्येष देवो जिज्ञासुरागत ॥९७॥ इत्युक्त्वा सचिवांस्त्वैरं स सुशर्मा महीपति । समुवाच भयत्रस्तं विप्ररूपं गणोत्तमम् ॥९८॥ अभयं देहि साधो स्नुषा स हारिता निशि । माययेव गता क्वापि रहस्यमाजाप्यहर्निशम् ॥९९॥ कृच्छ्रात्स दयमेवाथ विप्ररूपो गणोऽब्रवीत् । तर्हि पुत्राय राजन् देहि स्वां समभामिति ॥१००॥ तच्छ्रुत्वा शापभीतेन राज्ञा तस्मै निजा सुता । सा दत्ता देवदत्ताय तत पञ्चशिखो ययौ ॥१०१॥ देवदत्तोऽपि तां भूय प्रकाश प्राप्य वल्लभाम् । अजृम्भेऽनन्यपुत्रस्य श्वशुरस्य विभूतिषु ॥१०२॥ कालेन तस्य पुत्रं च दौहित्रमभिषिच्य स । राज्ये महीधरं नाम सुशर्मा शिश्रिये वनम् ॥१०३॥ ततो दृष्ट्वा सुतैश्वर्यं कृतार्थ स तपोवनम् । राजपुत्र्या तया साकं देवदत्तोऽप्यशिश्रियत् ॥१०४॥ तत्राराध्य पुरं शम्भुं त्यक्त्वा मर्त्यकलेबरम् । तत्प्रसादेन तस्यैव गणभावमुपागत ॥१०५॥ प्रियादन्तोऽस्मिन्मातृपुष्पारसर्गा न ज्ञातवान्यत । अत स पुष्पदन्ताख्य सम्पन्नो गणसंसदि ॥१०६॥ तद्भार्या च प्रतीहारी देव्या जाता जयाभिधा । इत्थं स पुष्पदन्ताख्यो मदाख्यामधुना शृणु ॥१०७॥

माल्यवतः पूर्वकथा

य स गोविन्ददत्ताख्यो देवदत्तपिता द्विज । तस्यैव सोमदत्ताख्य पुत्रोऽहमभवं पुरा ॥१०८॥ तेनैव मन्युना गत्वा तपश्चाहं हिमाचले । अकार्ये बहुभिर्मास्यैः शङ्कर नन्दमन्ववा ॥१०९॥

प्रथम लम्बक १११

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प्रथम लम्बक १११ तब राजा ने अपना सारा शरीर तराजू पर चढ़ा दिया और 'साधु-साधु'—इस प्रकार की आकाशवाणी हुई ॥१९५॥ तब इन्द्र और धर्म ने बाज एवं कबूतर का रूप छोड़कर और प्रसन्न होकर राजा के शरीर को पहले ही जैसा अक्षत कर दिया ॥१९६॥ इसी प्रकार मेरी परीक्षा करने के लिए यह कोई देवता आया है ॥१९७॥ मन्त्रियों से इस प्रकार कहकर भय से नम्र राजा सुशर्मा उस ब्राह्मण-रूपी यक्ष से बोला— 'महाराज ! अभय-दान दो ! भली भाँति सुरक्षित वह तुम्हारी स्नुषा (पतोहू) आज की रात किसी माया के द्वारा हरण कर ली गई। क्षमा करो' ! ॥१९९॥ यह ब्राह्मण कठिनाई और दया भाव से बोला—'राजन् ! यदि ऐसा है तो मेरे पुत्र के लिए अपनी कन्या दो' ॥१ ॥ यह सुनकर शाप से त्रस्त राजा ने अपनी कन्या देवदत्त को दे दी और तब पंचशिख भी शिवलोक को गया ॥१ १॥ देवदत्त भी अपनी प्यारी राजकन्या को प्रयास-रूप से प्राप्त करके श्वशुर-संपत्ति का आनन्द लेने लगा क्योंकि राजा को उस कन्या के अतिरिक्त कोई दूसरी सन्तान न थी ॥१ २॥ कुछ समय के अनन्तर देवदत्त के पुत्र और अपने दौहित्र महीधर का राज्य में अभिषिक्त करके राजा सुशर्मा अन्तिम अवस्था में वन को चला गया ॥१ ३॥ कुछ समय के अनन्तर अपने बालक को राज्य करते हुए देखकर कृतार्थ होकर वह देवदत्त भी उस राजपुत्री के साथ तपोवन में गया ॥१ ४॥ देवदत्त तपोवन में पुनः शिवजी की आराधना करके शिवजी को प्रसन्न करके और इस मानव-देह को छोड़कर शिव का गण बन गया ॥१ ५॥ पिता के दोषों से फैले हुए पुण्य से वह गणेश का न समझ सका अतः उसका नाम पुण्यदन्त हुआ और उसकी पत्नी जया नाम से पार्वती की प्रतिहारी बन गई। अब मेरे नाम का कारण सुनो ॥१ ६ १ ७॥ माल्यवान् की पूर्वकथा मैं उसी देवदत्त के पिता गोविन्ददत्त का सोमदत्त नामक बालक था ॥१ ८॥ मैं भी उसी पश्चात्ताप के कारण घर से निकलकर हिमाचल पर तप करने लगा और उस समय बहुत-सी पुण्यशालाओं से शिवजी को प्रसन्न करता था ॥१ ९॥

११२ कथासरित्सागर

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११२ कथासरित्सागर तथैव प्रकटीभूतात्प्रसन्नादिन्दुशेखरात् । त्यक्तान्यमोक्षलिप्सेन त्वद्गणत्वं मया वृतम् ॥११०॥ यत् पूजितोऽस्मि भवता स्वयमाहृतेन माल्येन दुर्गवनभूमिसमुद्भवेन । सन्माल्यवानिति भविष्यसि मे गणस्त्व- मित्यादिशच्च स विभुर्गिरिजापतिर्माम् ॥१११॥ अथ मर्त्यवपुर्विमुच्य पुण्या सहसा त्वद्गणसामहं प्रपन्नः । इति धूर्जटिना कृतः प्रसादादभिधानं मम माल्यवानीतीदम् ॥११२॥ सोऽहं गतः पुनरिहाथ मनुष्यभावं । शापेन शल्यदुहितुर्वत काणभूते ! तन् कथां हरकृतां कथयाधुना त्वं येनावयोर्भवति शापद्दोषोपशान्तिः ॥११३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके सप्तमस्तरङ्गः

अष्टमस्तरङ्गः एव गुणाढ्यवचसा सा च सप्तकथामयी । स्वभाषया कथा दिव्या कथिता काणभूतिना ॥१॥ तथैव च गुणाढ्येन पैशाच्या भाषया तया । निबद्धा सप्तभिर्वर्षैर्ग्रन्थलक्षणि सप्त सा ॥२॥ मैतां विद्याधरा हार्थुरिति तामात्मशोणितैः । अटव्यां मध्यमाबाध्य लिखन्न स महाकविः ॥३॥ तया च श्रोतुमायातैः सिद्धविद्याधरादिभिः । निरन्तरमभूत्तत्र सवितानमिवाम्बरम् ॥४॥ गुणाढ्येन निबद्धां च तां दृष्ट्वैव महाकथाम् । जगाम मुक्तशापः सन्काणभूतिर्निजां गतिम् ॥५॥ पिशाचा येऽपि तत्रासन्नन्ये तत्सहचारिणः । तेऽपि प्रापुर्दिवं सर्वे दिव्यामाकर्ण्य तां कथाम् ॥६॥ प्रतिष्ठां प्रापणीयेयं पृथिव्यां मे बृहत्कथा । मयमर्त्योऽपि मे दत्त्वा शापान्तोक्तावुदीरितः ॥७॥ तत्कथं प्रापयाम्येनां कस्मै तावत्समर्पये । इति चाचिन्तयत्तत्र स गुणाढ्यो महाकविः ॥८॥

प्रथम लम्बक ११५

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प्रथम लम्बक ११५ उसी प्रकार प्रकट हुए शिवजी से मैंने सांसारिक भोगों की लिप्सा छोड़कर उनके गण होने का वर माँगा ॥११० ॥ गिरिजापति शंकर भगवान् ने मुझे यह आदेश दिया कि चूंकि तुमने वन में उत्पन्न हुए पुष्पों की मालाओं से मेरी पूजा की है, अतः तुम माल्यवान् नामक मेरे गण होओ॥१११॥ तदनन्तर पवित्र मानव-शरीर को छोड़कर मैं तुरन्त शिवजी का गण बन गया। इस प्रकार स्वयं शिवजी ने मेरा नाम माल्यवान् रखा था ॥११२॥ मैं पार्वती के शाप से इस मर्त्यलोक में पुनः मनुष्यत्व को प्राप्त हुआ। हे काणभूत ! अब तुम शिवजी की कही हुई उस कथा को कहो, जिससे मेरी और तुम्हारी—दोनों की शापावस्था समाप्त हो ॥११३॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त

अष्टम तरंग

इस प्रकार गुणाढ्य के अनुरोधसे काणभूति ने अपनी पिशाच-भाषा में सात विद्याधरोंवाली वह दिव्य कथा सुनाई जो उसने पुष्पदन्त (वररुचि) से सुनी थी ॥१॥ गुणाढ्य ने सात वर्षों में—सात लाख छन्दों में—पैशाची भाषा में कही गई कथा को लिखा ॥२॥ इस कथा को कहीं विद्याधर हरण न कर लें और घोर जङ्गल में स्याही न मिलने के कारण महाबुद्धिमान् गुणाढ्य ने उसे अपने रक्त से लिखा ॥३॥ इस कथा का सुनने के लिए आये हुए सिद्ध विद्याधर आदि से भरा हुआ आकाश ऐसा मालूम होता था जैसे चँदोवा टँगा हो ॥४॥ गुणाढ्य द्वारा उस समस्त महाकथा के लिख जाने पर उसे देखकर काणभूति शापमुक्त होकर अपनी पूर्वगति को प्राप्त हुआ अर्थात् यक्ष हो गया ॥५॥ काणभूति के साथ जो उनके साथी पिशाच इस दिव्य कथा को सुन रहे थे, वे भी इसे सुनकर स्वर्ग चले गये ॥६॥ तदनन्तर महाकवि गुणाढ्य ने यह सोचा कि इस बात को अन्य बताते हुए पार्वती ने मुझसे कहा था कि पृथ्वी पर इस कथा का प्रचार करना। सो अब मैं इसका प्रचार कैसे करूँ और इसे किसे समर्पित करूँ जो इसका प्रचार कर सके ॥७-८॥

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११४ कथासरित्सागर

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११४ कथासरित्सागर अथैको गुणदेवाख्यो नन्दिदेवाभिधः परः । तमूचतुरुपाध्याय शिष्यावनुगतावुभौ ॥९॥ तत्काव्यस्यार्पणस्थानमेकः श्रीसातवाहनः । रसिको हि वहेत्काव्यं पुष्पामोदमिवानिलः ॥१०॥ एवमस्त्विति तौ शिष्यावन्तिकं तस्य भूपतेः । प्राहिणोत्पुस्तकं दत्वा गुणाढ्यो गुणशालिनौ ॥११॥ स्वयं च गत्वा तत्रैव प्रतिष्ठानपुराद् बहिः । कृतसङ्केत उद्याने तस्थौ देवीविनिर्मिते ॥१२॥ तच्छिष्याभ्यां च गत्वा तत्सातवाहनभूपतेः । गुणाढ्यकृतिरेषेति दर्शितं काव्यपुस्तकम् ॥१३॥ पिशाचभाषां तां श्रुत्वा तौ च दृष्ट्वा तदाकृती । विद्यामदेन सासूयः स राजन्यमभाषत ॥१४॥ प्रमाणं सप्तलक्षाणि पैशाचं नीरसं वचः । शोणितेनाक्षरन्यासो धिक्पिशाचकथामिमाम् ॥१५॥ ततः पुस्तकमादाय गत्वा ताभ्यां यथागतम् । शिष्याभ्यां तद्गुणाढ्याय यथावृत्तमकथ्यत ॥१६॥ गुणाढ्योऽपि तदाकर्ण्य सद्यः खेदवशोऽभवत् । तत्त्वज्ञेन कृतावज्ञः को नामास्तं न तप्यते ॥१७॥ सशिष्यश्च ततो गत्वा नातिदूरं शिलोच्चयम् । विविक्तरम्यभूभागमग्निकुण्डं व्यधात्पुरः ॥१८॥ तत्राग्नौ पत्रमेकैकं शिष्याभ्यां साश्रु वीक्षितः । वाचयित्वा स चिक्षेप श्रावयन्मृगपक्षिणः ॥१९॥ नरवाहनदत्तस्य चरितं शिष्ययोः कृते । ग्रन्थलक्षं कथामेकां वर्जयित्वा सदीप्सिताम् ॥२०॥ तस्मिंश्च तां कथां दिव्यां पठत्यपि दहत्यपि । परित्यक्ततृणाहाराः शृण्वन्तः साश्रुलोचनाः ॥२१॥ आसन्नभ्येत्य तत्रैव निश्चला बद्धमण्डलाः । निर्जिताः पशवः सारङ्गवराहमहिषादयः ॥२२॥ अत्रान्तरे च राजाभूदस्वस्थः सातवाहनः । दोषं चास्यावदन् वैद्या दुष्कमांसोपभोगजम् ॥२३॥

प्रथम लम्बक ११५

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प्रथम लम्बक ११५ तदनन्तर गुणदेव और नन्दिदेव नामक गुणाढ्य के दो शिष्यों ने गुरु गुणाढ्य से कहा ॥९॥ इस काव्य के समर्पण का एकमात्र स्थान राजा सातवाहन है। वह रसिक है। वह, फूलों की सुगन्ध को वायु जिस प्रकार फैला देती है उसी प्रकार इसका प्रसार और प्रचार कर सकता है ॥१० ॥ 'यही ठीक है'—ऐसा कहकर गुणाढ्य ने पुस्तक देकर उन दोनों गुणी शिष्यों को राजा सातवाहन के पास भेज दिया ॥११॥ और स्वयं प्रतिष्ठान-नगर के बाहर देवी-उद्यान में मिलने का संकेत करके ठहर गया ॥१२॥ गुणाढ्य के दोनों शिष्यों ने राजा सातवाहन के पास जाकर 'यह गुणाढ्य की रचना है' ऐसा कहकर वह उत्तम काव्य दिखाया ॥१३॥ उस पिशाच-भाषा को सुनकर और उन दोनों शिष्यों को पिशाचाकार देखकर विद्या- मदान्ध राजा ने द्वेष के साथ कहा—सात लाख छन्द, नीरस पिशाच-भाषा और रक्त से अक्षरों का लेखन—ऐसी इस पिशाच-कथा को धिक्कार है ! ॥१४-१५॥ तब उन शिष्यों ने पुस्तक ले जाकर, जो कुछ हुआ था सब उस गुणाढ्य को सुना दिया ॥१६॥ यह सब सुनकर गुणाढ्य को अत्यन्त खेद हुआ। तत्वज्ञ गुणग्राही व्यक्ति के द्वारा अपमान होने पर किसका हृदय संतप्त नहीं होता ॥१७॥ गुणाढ्य भी शिष्यों को साथ लेकर समीपवर्ती पर्वत पर चला गया और एक साफ़-सुथरे एकान्त स्थान में उसने एक अग्निकुण्ड बनाया ॥१८॥ गुणाढ्य बृहत्कथा के एक-एक पत्र को पढ़कर और मृग-पक्षियों को सुनाकर उसे आग में बहा देता था। शिष्य आँखों से आँसू बहाकर उसकी ओर देखते थे ॥१९॥ शिष्यों के अनुरोध से नरवाहनदत्त-चरित नामक एक भाग को उसने बचा लिया जो एक लाख श्लोकों में था ॥२०॥ जब गुणाढ्य उस दिव्य कथा के एक-एक पत्र को पढ़ रहा और जला रहा था उस समय जंगल के सभी पशु-हिरन सूअर, भैंसे आदि—झुंड में निश्चल होकर और घास चरना छोड़ कर आँसू बहाते हुए कथा को सुन रहे थे ॥२१-२२॥ इसी बीच राजा सातवाहन अस्वस्थ हो गया। वैद्यों ने बताया कि इसका कारण सूखे मांस का भोजन है ॥२३॥

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आक्षिप्तास्तन्निमित्तं च सूपकारा बभाषिरे। अस्माकमीदृशं मांसं ददते लुब्धका इति ॥२४॥ पृष्टाश्च लुब्धका ऊचुर्नातिदूरे गिरावितः। पठित्वा पत्रमेकैकं कोऽप्यग्नौ क्षिपति द्विजः ॥२५॥ तत्समेत्य निराहारा शृण्वन्ति प्राणिनोऽखिलाः। नान्यतो यान्ति तन्तेषां शुष्कं मांसमिदं क्षुधा ॥२६॥ इति व्याधवचः श्रुत्वा कृत्वा तानेव चाग्रतः। स्वयं स कौतुकाद्राजा गुणाढ्यस्यान्तिकं ययौ ॥२७॥ ददर्श स समाकीर्णं जटाभिरनवभासतः। प्रशान्तशेषदापाग्निधूमिकाभिरिवाभितः ॥२८॥ अथैनं प्रत्यभिज्ज्ञाय सवाष्पमृगमध्यगम्। नमस्कृत्य च पप्रच्छ तं वृत्तान्तं महीपतिः ॥२९॥ सोऽपि स्वं पुष्पदन्तस्य राज्ञे शापादिवेष्टितम्। ज्ञानी कथावतारं समाचख्यौ भूतभाषया ॥३०॥ ततो गणावतारं च मत्वा पादानतो नृपः॥ ययाचे तां कथां तस्माद्दिव्यां हरमुखोद्गताम् ॥३१॥ अथोवाच स तं भूपं गुणाढ्यः सातवाहनम्। राजन् षड्ग्रन्थलक्षानि मया दग्धानि षट् कथाः ॥३२॥ लक्षमेकमिदं त्वस्ति कथैका सैव गृह्यताम्। मच्छिष्यौ तव चात्रतौ व्याख्यातारौ भविष्यतः ॥३३॥ इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य त्यक्त्वा योगेन तां तनुम्। गुणाढ्यः शापनिर्मुक्तः प्राप दिव्यं निजं पदम् ॥३४॥ अथ तां गुणाढ्यदत्तामादाय कथां बृहत्कथां नाम्ना। नृपतिरगाद्निजनगरं नरवाहनदत्तचरितमयीम् ॥३५॥ गुणाढ्यनन्दिदेवौ तत्र च तौ तत्कथाकवेः शिष्यौ। स्थिति-कनक-वस्त्र-वाहन-भवन-धनैः सर्वभजत् सः ॥३६॥ ताभ्यां सह च कथां तामाश्वास्य च सातवाहनस्तस्याः। तद्भाषायावतारं वक्तुं पत्र प्रथापीठम् ॥३७॥ सा च चित्ररसनिर्भरा कथा विस्मृतामरकथा कुतूहलात्। तद्विधाय नगरे निरन्तरां ख्यातिमत्र भुवनत्रये गता ॥३८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके अष्टमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं कथामुखलम्बकः प्रथमः।

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राजा को सूखा मांस खिलाने के लिए डाँटे गये रसोईदारों ने कहा कि इसमें हमारा क्या अपराध है? बहेलिये जैसा मांस लाते हैं वही हम पकाते हैं ॥२४॥ शिकारी बहेलियों ने पूछने पर कहा कि यहाँ से समीप ही एक पहाड़ की चोटी पर कोई ब्राह्मण एक-एक पत्र पढ़कर अग्नि में फेंक रहा है ॥२५॥ इसलिए जंगल के समस्त प्राणी एकत्र होकर और निराहार रहकर उसे सुनते हैं। कहीं चरने के लिए नहीं जाते इसीलिए उनका मांस सूख गया है ॥२६॥ राजा व्याधों के इस प्रकार के वचन सुनकर और उन्हें ही आगे करके अत्यन्त कौतूहल के साथ गुणाढ्य के पास गया ॥२७॥ राजा ने वनवास के कारण बढ़ी हुई जटाओं से आवृत गुणाढ्य को इस प्रकार देखा मानों भस्मलेप धारण-रूपी अग्नि की पतली धूम-रेखाएँ लटक रही हैं ॥२८॥ आँसू बहाते हुए मृग-पक्षियों के मध्य बैठे हुए गुणाढ्य को पहचानकर राजा ने नमस्कार किया और सब समाचार पूछा। गुणाढ्य द्वारा बृहत्कथा का वृत्तान्त सुनकर और गुणाढ्य को माल्यवान् नामक शिव-गण का अवतार जानकर राजा पैरों पर गिर पड़ा और उसने शिवजी के मुख से निकली हुई वह दिव्य कथा उससे माँगी ॥३०-३१॥ गुणाढ्य ने राजा सातवाहन से कहा—'राजन्, छह लाख श्लोकों में लिखी गई छह कथाएँ मैंने जला दीं ॥३२॥ एक लाख श्लोक की एक कथा यह बची है—इसे ले लो। मेरे ये दोनों शिष्य इस कथा के व्याख्याता होंगे ॥३३॥ ऐसा कहकर और योग-समाधि द्वारा अपने मानव-शरीर का त्याग कर शाप-मुक्त गुणाढ्य ने अपने पूर्व पद को प्राप्त किया ॥३४॥ तदनन्तर राजा सातवाहन गुणाढ्य द्वारा दी गई नरवाहनदत्त-चरितमयी बृहत्कथा नामक वह कथा प्रसन्नतापूर्वक लेकर अपने नगर में आया ॥३८॥ राजा ने नगर में आकर, गुणाढ्य के शिष्य गुणदेव और नन्दिदेव को भूमि धन वस्त्र वाहन भवन धन आदि देकर उनकी सेवा की ॥३९॥ राजा सातवाहन ने उन दोनों शिष्यों की सहायता से उस कथा के प्रचार के लिए उसका देश-भाषा में अनुवाद कराकर कथापीठ की रचना की ॥४०॥ विचित्र रसों से परिपूर्ण एवं देव-कथाओं को भुला देनेवाली यह कथा नगर में निरन्तर प्रसिद्ध होती हुई क्रमशः सारे भूमण्डल में प्रसिद्ध हो गई ॥४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त कथासरित्सागर का प्रथम लम्बक समाप्त

कथामुख नाम द्वितीयो लम्भकः

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कथामुख नाम द्वितीयो लम्भकः ५८ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धोदयं धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्गः सहस्रानीककथा गौरीनखपरिश्वङ्ग विमो स्वेदाम्बु पातु वः। नेत्रान्निमील्या कामेन बाणशास्त्रमिवाहितम्॥१॥ कैलासे धूर्जटेर्वक्त्रात्पुष्पदन्तं गणोत्तमम्। तस्माद् वररुचीभूतात् काणभूतिं च भूतले॥२॥ काणभूतेर्गुणाढ्यं च गुणाढ्यात्सातवाहनम्। यत्प्राप्तं शृणुतै तच्च विद्याधरकथाद्भुतम्॥३॥ अस्ति वत्स इति ख्यातो देशो दर्पोच्छ्रितश्रिये। स्वर्गस्य निर्मितो धात्रा प्रतिमल्ल इव क्षितौ॥४॥ कौशाम्बी नाम तत्रास्ति मध्यभागे महापुरी। लक्ष्मीविलासवसतिर्भूतलस्येव कर्णिका॥५॥ तस्यां राजा शतानीकः पाण्डवान्वयसम्भवः। जनमेजयपुत्रोऽभूत्पौत्रो राज्ञः परीक्षितः॥६॥ अभिमन्युप्रपौत्रश्च यस्याविपुष्टयोर्जुनः। त्रिपुरारि भुजस्तम्भ दृष्ट दोर्दण्डविक्रमः॥७॥ अभवद् भूरिभूतस्य राज्ञी विष्णुमती तथा। एका रत्नानि सुपुवे न तावदपरा सुतम्॥८॥

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक

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कथामुख नामक द्वितीय लम्बक (मङ्गल-श्लोक का अर्थ ग्रन्धारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए) प्रथम तरङ्ग राजा सहस्रानीक की कथा पार्वती के प्रथम आलिङ्गन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करें जो स्वेद-कण ऐसे मालूम होते हैं मानों कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर वारुणास्त्र छोड़ा हो¹॥१॥ कैलाश में शिवजी के मुख से पुष्पदन्त गण को, पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुण्य दन्त से काणभूति को, काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः प्राप्त इस विद्याधर-कथा² रूपी अमृत को सुनिए ॥२, ३॥ स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा सची के समान पृथ्वी पर निर्माण किया गया वत्स नामक देश है॥४॥ उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कर्णिका (कर्णभूषण) के समान है॥५॥ उस नगरी में पाण्डव-वंश में उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था जो जनमेजय का पुत्र, परीक्षित् का पौत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदण्डों का पराक्रम देखा था॥६-७॥ उस शतानीक की दो रानियां थीं। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी, किन्तु दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया॥८॥ १ शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्नि-ज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुनः उनके संवग के समय उसने आप बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी वारुणास्त्र का रखना आवश्यक समझा जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है। अतः, कवि ने उस पर जलमय वारुणास्त्र की सुन्दर उत्प्रेक्षा की है। २ श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं, ऐसी शिष्ट-परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर-कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी महत्त्वपूर्व परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं प्रत्युत इसका उद्गम भगवान् शिव के मुख से हुआ है।—अनु.

कथामुखं नाम द्वितीयो लम्बकः

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कथामुखं नाम द्वितीयो लम्बकः १५ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति य विगतविघ्नलब्धर्द्धय धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ये ॥

प्रथमस्तरङ्गः सहस्रानीककथा गौरीनवपरिष्वङ्गे विभो र्स्वेदाम्बु पातु वः। नेत्राग्निभीरुणा कामेन वारुणास्त्रमिवाहितम् ॥१॥ कैलास धूर्जटेर्वक्त्रात्पुष्पदन्त गणोत्तमम्। तस्माद् वररुचीभूतात् काणभूतिं च भूतले ॥२॥ काणभूतेर्गुणाढ्यं च गुणाढ्यात्सातवाहनम्। यत्प्राप्तं शृणुतेदं तच्च विद्याधरकथामृतम् ॥३॥ अस्ति वत्स इति ख्यातो देशो दर्पोपशाम्यये। स्वर्गस्य निर्मितो धात्रा प्रतिमल्ल इव क्षितौ ॥४॥ कौशाम्बी नाम तत्रास्ति मध्यभागे महापुरी। लक्ष्मीविलासकसतिर्भूतलस्येव कर्णिका ॥५॥ तस्यां राजा शतानीकः पाण्डवान्वयसम्भवः। जनमेजयपुत्रोऽभूत्पौत्रो राज्ञः परीक्षितः ॥६॥ अभिमन्युप्रपौत्रश्च यस्यादिपुरुषोऽर्जुनः। त्रिपुरारि भुजस्तम्भ धृष्ट दोर्दण्डविक्रमः ॥७॥ कलत्रं भूरभूत्तस्य राज्ञी विष्णुमती तथा। एका रहसि सुषुवे स तावदपरा सुतम् ॥८॥

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक

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कथामुख नामक द्वितीय लम्बक (मङ्गल-श्लोक का अर्थ ग्रन्थारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए) प्रथम तरंग राजा सहस्रानीक की कथा पार्वती के प्रथम आलिङ्गन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करें जो स्वेद-कण ऐसे मालूम होते हैं मानो कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर बाणत्रास छोड़ा हो¹॥१॥ कैलास में शिवजी के मुख से पुण्यवन्त गण को पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुण्य गण से काणभूति को काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः प्राप्त इस विद्याधर-कथा² रूपी अमृत को सुनिए ॥२-३॥ स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा उसी के समान पृथ्वी पर निर्माण किया गया वत्स नामक देश है ॥४॥ उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कर्णिका (कर्णभूषण) के समान है॥५॥ उस नगरी में पाण्डव-वंश में उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था जो जनमेजय का पुत्र परीक्षित का पौत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदण्डों का पराक्रम देखा था ॥६-७॥ उस शतानीक की दो रानियाँ थीं। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी किन्तु दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया ॥८॥ १ शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्नि-ज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुनः उनके संगम के समय उसने आग बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी बाणशस्त्र का रचना आवश्यक समझा जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है। अतः, कवि ने उस पर जलमय बाणशस्त्र की सुन्दर उत्प्रेक्षा की है। २ श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं ऐसी शिष्ट-परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर-कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी शृङ्खलापूर्ण परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं प्रत्युत इसका उद्गम भगवान् शिव के मुख से हुआ है।—अनु.

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एकदा मृगयासङ्गाद् भाग्यवशाच्चास्य भूपतेः । अभूच्छाण्डिल्यमुनिना समं परिचयो वने ॥९॥ सोऽप्य पुत्रार्थिनो राज्ञः कौशाम्बीमेत्य साक्षितम् । मन्त्रपूतं चरं राज्ञीं प्राधायन्मुनिसत्तमः ॥१०॥ सनस्तस्य सुतो जज्ञे सहस्रानीकसंज्ञकः । शुशुभे स पिता तेन विनयन गुणो यथा ॥११॥ यवराज्ञं क्रमात्कृत्वा शतानीकोऽथ तं सुतम् । सम्भोगैरैव राजाभून्न तु भूभारखिन्नधीः ॥१२॥ अथासुरैः समं युद्धे प्राप्ते साहाय्यकञ्च्छया । दूतमस्त्यं विमुञ्चोभूदिन्द्रो यत्प्रण मातलिः ॥१३॥ सतां युगन्धराख्यस्य हस्ते धूपम्य मन्त्रिणः । सुप्रतीकाभिधानस्य मुख्यमन्तान्तरस्य च ॥१४॥ समर्प्य पुत्रं राज्यं च निहन्तुममुरान् रणे । शक्रान्तिकं शतानीकः सह मातलिना ययौ ॥१५॥ अगुणन् यमदंष्ट्रानीन्यहन्प्रत्यति यागवे । हत्वा तत्रत्यं गत्वाशं प्राप भूत्युं स भूपतिः ॥१६॥ मातन्यानोयवेहं च देवी तं नृपमन्वगात् । राज्यलक्ष्मीश्च तत्पुत्रं सहस्रानीकमश्रयत् ॥१७॥ पित्र्यं तस्मिन्गतान्द्रे पित्र्यं सिंहासनं नृपः । भरन् शक्ता गजा दिक्षु भनिमाययुः ॥१८॥ सन्तं चरा गृह्णन्तु वियोगिप्रशयोगतम् । न्यस्य गङ्गाशनात्स विनाय प्रत्यं मातलिम् ॥१९॥ स तत्र मन्दनं दक्षान् क्रीडन् कामिनीगणान् । दृष्ट्वा वियोगिनिभार्यार्थी राजा शर्मविवाविन्दत् ॥२०॥ विद्याधामभिश्राय गन्धर्वाणां यागवे । गन्धर्वश्च विशाखः प्रादुर्बभूव तव योगतः ॥२१॥ उत्पन्ना किरिणो भार्या तुल्या सा पूर्वनिर्मिता । इयं च शृणु वृत्तान्तमथ स वक्तुमारभत् ॥२२॥ मृगावतीविवाहप्रबन्धः पुरं त्रिभुवने श्लाघ्यामलकाख्यं जगत्त्रयम् । रिपुभ्यो नाम यस्याश्च ममरूश्चाप्युपागमत् ॥२३॥

द्वितीय लम्बक १२१

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द्वितीय लम्बक १२१ एक बार शिकार खेलने के सिलसिले में उस राजा का वन में शाण्डिल्य मुनि के साथ परिचय हुआ ॥९॥ शाण्डिल्य मुनि ने कौशाम्बी में आकर पुत्र की इच्छावाले राजा की रानी को मन्त्र से पवित्र चरु¹ खिलाया ॥१०॥ शाण्डिल्य मुनि की कृपा से शतानीक को सहस्रानीक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उससे पिता ऐसा शोभित हुआ जैसे विनय से गुण शोभित होता है ॥११॥ क्रमशः शतानीक सहस्रानीक को युवराज बनाकर, केवल राज्यसुख भोगने के लिए राजा रह गया। राज्यकार्य की चिन्ता से मुक्त हो गया था ॥१२॥ कुछ समय के अनन्तर असुरों के साथ युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्द्र ने सहायता की इच्छा से उसके लिए अपने सारथी मातलि को दूत बनाकर भेजा ॥१३॥ तब शतानीक राज्य-शासन का समस्त भार युगन्धर नाम के मुख्यमन्त्री सुप्रतीक नामक प्रधान सेनापति तथा युवराज सहस्रानीक पर देकर मातलि के साथ इन्द्र के समीप गया ॥१४-१५॥ इन्द्र के देखते-देखते यमदंष्ट्र आदि बहुत-से असुरों को उस युद्ध में मारकर वह राजा शतानीक स्वयं भी मर गया ॥१६॥ मातलि द्वारा उसका शव राजधानी में ले आने पर महारानी उसके साथ सती हो गई और राजलक्ष्मी ने उसके पुत्र सहस्रानीक का आश्रय किया। (अर्थात् सहस्रानीक राजा बन गया) ॥१७॥ आश्चर्य है कि सहस्रानीक के पिता के सिंहासन पर बैठते ही भार से राजाओं के सिर झुक गये अर्थात् सिंहासन को भग्न होना चाहिए, किन्तु राजाओं के सिर नम्र हो गये यह आश्चर्य है ॥१८॥ असुर-विजय के उपलक्ष्य में किये गये उत्सव के समय इन्द्र ने अपने मित्र के पुत्र सहस्रानीक को मातलि द्वारा (रथ भेजकर) स्वर्ग में बुलवाया ॥१९॥ स्वर्ग में रहते हुए सहस्रानीक प्रियतमाओं के साथ नन्दन-वन में विहार करते हुए देवताओं को देखकर, अपने लिए अनुरूप पत्नी की चाह में कुछ शोकयुक्त-सा हो गया ॥२०॥ इन्द्र ने राजा शतानीक के मनोभाव को समझकर कहा—'राजन्! शोक न करो तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी ॥२१॥ राजन् ! तुम्हारे पूर्वजन्म की भार्या जो तुम्हारे अनुरूप है, पृथ्वी पर जन्म ले चुकी है। इस वृत्तान्त को कहता हूँ सुनो' ॥२२॥ रानी मृगावती के विवाह की कथा प्राचीन समय में पितामह (ब्रह्मा) का दर्शन करने के लिए मैं उनकी सभा में गया था। मेरे ही पीछे विधूम नाम का एक वसु भी सभा में आ गया ॥२३॥ १ चावल, चीनी और दूध मिला हुआ हवन-द्रव्य। १६

१२२ कथासरित्सागर

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१२२ कथासरित्सागर

स्थितेष्वस्मासु तत्रैव विरिञ्चि द्रष्टुमप्सराः। आगादलम्बुषा नाम वातविस्रंसितांशुका ॥२४॥ तां दृष्ट्वैव स कामस्य वशं वसुरपागमत्। साप्यप्सरा भगिर्यासीत्तद्रूपाकृष्टलोचना ॥२५॥ तदालोक्य ममापद्यन्मुखं कमलसम्भवः। अभिप्रायं विदित्वास्थ तावहं शप्तवान् क्रुधा ॥२६॥ मर्त्यलोकेऽवतारेऽस्तु युवयोरविनीतयोः। भविष्यथश्च तत्रैव युवां भार्यापती इति ॥२७॥ स वसुस्त्वं समुत्पन्नः सहस्रानीकभूपते ! शतानीकस्य तनयो भूषणं शशिनः कुले ॥२८॥ साप्यप्सरा ह्ययोध्यायां कृतवर्मनृपात्मजा। जाता मृगावती नाम सा ते भार्या भविष्यति ॥२९॥ इतीन्द्रवाक्यपवनेनेद्धभूतो हृदि भूपतेः। हृत्स्नेहे तस्य भृगिति प्राज्वलन्मदनानतः ॥३०॥ सतं सम्मान्य शक्रेण प्रेषितस्तद्रथेन सः। सह मातलिना राजा प्रतस्थे स्वां पुरीं प्रति ॥३१॥ गच्छन्तं चाप्सरा प्रीत्या समुवाच तिलोत्तमा। राजन्वक्ष्यामि तं किञ्चित्प्रतीक्षस्व मनागिति ॥३२॥ तदश्रुत्वैव हि ययौ स तां ध्यायन्मृगावतीम्। ततः सा लज्जिता कोपात्तं शशाप तिलोत्तमा ॥३३॥ यया हृतमना राजन्न शृणोषि वचो मम। तस्याश्चतुर्वत्सरसमा वियोगस्ते भविष्यति ॥३४॥ मातलिस्तच्च शुश्राव न च राजा प्रियोत्सुकः। ययौ रथेन कौशाम्बीमयोध्यां मनसा पुनः ॥३५॥ ततो युगन्धरादिभ्यो मन्त्रिभ्यो वासवाच्छ्रुतम्। मृगावतीगतं सर्वं शशंसोत्सुकया धिया ॥३६॥ याचितुं तां स कन्यां च ह्यतिष्ठतु कृतवर्मणः। मयोध्यां प्राहिणोद्दूतं बास्नेपासहो नृपः ॥३७॥ कृतवर्मा च तद्भूताच्छ्रुत्वा सम्पदामभ्यधात्। हृपदेिव्य शतावत्यै ततः साप्यममब्रवीत् ॥३८॥

द्वितीय लम्बक १२५

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द्वितीय लम्बक १२५ हमारे वहाँ बैठे रहते ही अलम्बुषा नाम की एक अप्सरा ब्रह्मा के दर्शनार्थ वहाँ आई, उसका वस्त्र वायु से कुछ खिसक गया इधर-उधर हो गया ॥२४॥ उसे देखकर वह विभूम वसु कामातुर हो गया और वह (अलम्बुषा) भी उसके रूप की ओर आँखों के खिंच जाने से स्तब्ध-सी (ठगी-सी) रह गई ॥२५॥ उन दोनों की इस स्थिति को देखकर ब्रह्मा ने मेरी ओर देखा। मैंने भी उनके अभिप्राय को समझकर, क्रुद्ध होकर उन दोनों को शाप दिया ॥२६॥ शाप यह दिया कि 'तुम्हारा जन्म मर्त्यलोक में पति-पत्नी के रूप में होगा। इस शाप के कारण हे राजन्, तुम चन्द्रवंश में राजा शतानीक के पुत्र हुए और वह अप्सरा अयोध्या के राजा कृतवर्मा की मृगावती नामक कन्या के रूप में अवतीर्ण हुई है। वही तुम्हारी पत्नी होगी' ॥२७-२८-२९॥ राजा के स्नेहयुक्त हृदय में पहले से ही सुलगता हुआ मदनानल इन्द्र की बातों से प्रेरित होकर तुरन्त प्रज्वलित हो उठा ॥३०॥ तदनन्तर इन्द्र के द्वारा भली भाँति स्वागत प्राप्त करके इन्द्र के ही रथ से भेजा गया राजा सहस्रानीक मातलि के साथ अपनी नगरी को लौट आया ॥३१॥ जाते हुए राजा से तिलोत्तमा नाम की अप्सरा ने प्रेमपूर्वक कहा—'हे राजन् ! जरा ठहरो, मैं तुमसे कुछ कहूँगी' ॥३२॥ मृगावती के ध्यान में निमग्न राजा ने तिलोत्तमा का कथन नहीं सुना। इसलिए उसने कुपित होकर राजा को शाप दिया ॥३३॥ 'हे राजन् ! जिस मृगावती में आकृष्टचित्त होकर तू मेरी बात नहीं सुन रहा है, उसका तुझे चौदह वर्षों तक वियोग होगा' ॥३४॥ तिलोत्तमा के शाप को मातलि ने सुना, राजा ने नहीं। प्रिया के लिए उत्सुक वह राजा रथ से कौशाम्बी और मन से अयोध्या पहुँचा ॥३५॥ राज्य में पहुँचकर राजा ने मृगावती के सम्बन्ध में इन्द्र से सुना हुआ समस्त वृत्तान्त उत्सुक मन से युगन्धर आदि मन्त्रियों को कह सुनाया ॥३६॥ और विलम्ब को न सहन कर सकनेवाले राजा ने उस कन्या (मृगावती) की मैंगनी के लिए अयोध्या में राजा कृतवर्मा के समीप दूत भेजा ॥३७॥ दूत द्वारा सहस्रानीक के सन्देश को सुनकर राजा कृतवर्मा ने हर्ष में यह संवाद अपनी रानी कलावती से कहा ॥३८॥

१२४ कथासरित्सागर

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१२४ कथासरित्सागर राजन्महस्रानीकाय देयावश्यं मृगावती। इममर्थं च मे स्वप्ने जाने कोऽप्यवदद्द्विजः ॥३९॥ अथ दृष्टो मृगावट्या नृत्तगीतादिकौशलम्। रूपं चाप्रतिमं तस्मै दूतायादर्शयन्नृपः ॥४०॥ ददौ तां च स कान्तानां वल्लभा मेकमास्पदम्। कृतवर्मा सुतां तस्मै राज्ञे मूर्तिमिवेद्वीम् ॥४१॥ परस्परगुणावाप्त्यै स श्रुतप्रज्ञयोरिव। अभूत्सहस्रानीकस्य मृगावट्याश्च सङ्गमः ॥४२॥ अथ तस्याचिराद्राज्ञो मन्त्रिणां जज्ञिरे सुताः। जज्ञे युगन्धरस्यापि पुत्रो यौगन्धरायणः ॥४३॥ सुप्रतीकस्य पुत्रश्च रुमण्वानित्यजायत। योऽन्य नर्मसुहृत्तस्य पुत्रोऽजनि वसन्तकः ॥४४॥ ततस्तस्यापि विवसे सहस्रानीकभूपतेः। बभार गर्भमापाण्डुमुखी राज्ञी मृगावती ॥४५॥ ययाचे साच भर्तारं दर्शनावृतलोचनम्। दोहदं रुधिरापूर्णशीलावापीनिमज्जनम् ॥४६॥ स चेच्छां पूरयन् राज्ञ्या लाक्षाविरसनिर्भरम्। चकार धार्मिको राजा बापीं रक्तामृतामिव ॥४७॥ तस्यां स्नान्तीमकस्माच्च लाक्षालिप्तां निषत्य ताम्। गरुडान्त्रयः पक्षी जहाराभिपदङ्कया ॥४८॥ पक्षिणा क्वापि नीतां तामन्वेष्टुमिव तत्क्षणम्। ययौ सहस्रानीकस्य धैयं विह्वलचेतसः ॥४९॥ प्रयानुरक्तं चेतोऽपि नूनं तस्य पतत्रिणा। जह्रे यन्न स निस्सञ्ज्ञः पपात भुवि भूपतिः ॥५०॥ क्षणाच्च व्यध्वसन्नेऽस्मिन् राज्ञि बुद्ध्या प्रमावतः। अवतीर्य द्युमार्गेण तं मातलिराययौ ॥५१॥ स राजानं समाश्वास्य सर्वार्थं प्राग्यथा धृतम्। तस्मै तिलोत्तमाशापं कथयित्वा ततोजगम् ॥५२॥ हा प्रिये पूर्णकामा सा जाता पापा तिलोत्तमा। इत्यादि च स शोकार्तो विप्रलाप महीपतिः ॥५३॥

द्वितीय लम्बक १९५

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द्वितीय लम्बक १९५ रानी ने भी कहा कि 'राजन् ! मृगावती को सहस्रानीक के लिए अवश्य देना चाहिए। यह बात स्वप्न में मुझे किसी ब्राह्मण ने कही है ऐसा मालूम होता है' ॥३९॥ रानी की सम्मति प्राप्त कर प्रसन्नचित्त राजा ने दूत को मृगावती का याचना माना तथा उसका अप्रतिम रूप दिखाया ॥४०॥ अनुकूल समय में राजा कृतवर्मा ने कमनीय ललित कलाओं की एकमात्र आधार चन्द्रमा की मूर्तिमयी प्रतिमा के समान सुन्दरी उस कन्या मृगावती को विधिपूर्वक राजा शतानीक के लिए दे दिया ॥४१॥ जिस प्रकार शास्त्र और बुद्धि का संगम परस्पर आदान-प्रदान के लिए होता है उसी प्रकार सहस्रानीक और मृगावती का समागम भी परस्पर गुणों के आदान-प्रदान के लिए हुआ ॥४२॥ कुछ समय के अनन्तर राजा के मन्त्रियों के पुत्र उत्पन्न हुए। प्रधान मन्त्री युगन्धर का पुत्र यौगन्धरायण सेनापति सुप्रतीक का पुत्र रुमण्वान् और राजा के नर्म सचिव (विदूषक) का पुत्र वसन्तक नामक हुआ ॥४३-४४॥ कुछ दिनों के अनन्तर राजा सहस्रानीक की पीत मुखवाली पत्नी मृगावती ने भी गर्भ धारण किया ॥४५॥ गर्भ-धारण के अनन्तर रानी ने रुधिर से भरी हुई तड़ाग-वापी में गोता लगाने की इच्छा उस राजा से प्रकट की जिस (राजा को) देखते-देखते उसकी आँखें तृप्त नहीं होती थीं ॥४६॥ धार्मिक राजा सहस्रानीक ने रानी की इच्छा-पूर्ति के लिए लाख आदि लाल वस्तुओं के लाल रस से भरी बावली बनवाई जो रक्त से भरी मालूम होती थी ॥४७॥ उस लाल वापी में स्नान करती हुई लाल लाख के रस से लिपटी हुई रानी को देखकर गरुड़-वंश के किसी पक्षी १ ने मांसपिंड समझकर उठा लिया ॥४८॥ महावीर्यवान पक्षी द्वारा उड़ाकर ले जाई गई रानी को ढूंढ़ने के लिए व्याकुलचित्त राजा सहस्रानीक का धैर्य नष्ट हो गया ॥४९॥ उस पक्षी ने केवल रानी को ही नहीं रानी के प्रति अनुरक्त राजा के चित्त का भी हरण कर लिया। इसी कारण राजा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गया ॥५०॥ कुछ समय के अनन्तर राजा के सचेत होने पर अपने प्रभाव से स्थिति को समझकर मातलि आकाश-मार्ग से उतरकर राजा के पास आया ॥५१॥ मातलि ने राजा को आश्वासन देते हुए पूर्व समय में तिलोत्तमा द्वारा दिये गये शाप का वृत्तान्त और चौदह वर्ष की अवधि का समाचार सुनाया। राजा के कुछ स्वस्थ होने पर मातलि पुनः स्वर्ग को चला गया ॥५२॥ 'हा प्रिये अब उस पापिन तिलोत्तमा का मनोरथ पूर्ण हो गया'—इस प्रकार शोक-विह्वल राजा विलाप करता रहा ॥५३॥ १ अरेबियन नाइट्स में सिंदबाद जहाजी की कहानी में ऐसे पक्षी का वर्णन आता है। कुछ लोग इसे कल्पित पक्षी मानते हैं। पर्वतों में ऐसे पक्षी दीखते हैं; जो बड़े-बड़े साँपों और पशुओं के बच्चों को उठा ले जाते हैं। —अनु.