कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक ३५५
अष्टम लम्बक ३५५ यद्यपि शत्रु की सेना में सैनिक योद्धा हमसे अधिक हैं, फिर भी शिवजी की कृपा से वे हमारी सेना के लिए पर्याप्त नहीं हैं ॥३३॥ इस प्रकार, मय दानव अपने ज्येष्ठ पुत्र सुनीथ को जब अपनी शक्ति का परिचय दे रहा था, इतने में ही श्रुतशर्मा के पिता द्वारा भेजा हुआ दूत उसके समीप आया ॥३४॥ और कहने लगा—'त्रिकूटाधिपति ने आपको यह सन्देश दिया है कि संग्राम शूर-वीरों का महोत्सव है ॥३५॥ किन्तु, इस संग्राम-महोत्सव के लिए यह भूमि छोटी है, अतः हमलोग विस्तृत मैदानवाले कलापग्राम में चलें इसलिए यहाँ से आप वहीं आवें' ॥३६॥ यह सन्देश सुनकर सुनीथ आदि ने इस बात को स्वीकार किया और सूर्यप्रभ आदि सभी कलापग्राम को गये ॥३७॥ इसी प्रकार युद्ध के लिए तत्पर श्रुतशर्मा आदि भी विद्याधर-सेना के साथ उसी स्थान पर पहुँचे ॥३८॥ श्रुतशर्मा की सेना में हाथियों को देखकर सूर्यप्रभ आदि ने विमानों द्वारा अपने हाथी मँगवाये ॥३९॥ तदनन्तर, श्रुतशर्मा के सेनापति विद्याधरराज दामोदर ने अपनी सेना में महासूचीव्यूह की रचना की ॥४०॥ उस व्यूह के पार्श्व में श्रुतशर्मा स्वयं मन्त्रियों के साथ खड़ा हुआ और उसके अग्रभाग में दामोदर सेनापति था तथा अग्रगण्य विशेष स्थानों में और और विद्याधर-राजा थे ॥४१॥ उधर सूर्यप्रभ के सेनापति प्रभास ने अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया और उसके बीच स्वयं रहा। व्यूह के दोनों कोनों पर कुम्भीरवार और प्रहस्त खड़े थे। सूर्यप्रभ और सुनीथ आदि व्यूह के पृष्ठ भाग में उनकी रक्षार्थ तत्पर हुए ॥४२-४३॥ सुमेरु और श्रुतशर्मकुमार के इन व्यूहों के समीप खड़े होने पर दोनों सेनाओं में रण भेरी बज उठी ॥४४॥ भयङ्कर युद्ध देखने के कौतुक से आये हुए चारणादि देवताओं, सिद्धगणों और अप्सराओं से स्थान भर गया ॥४५॥ पार्वती के साथ शिवजी स्वयं भी आये। उनके पीछे देवता गण, मातृगण एवं भूत प्रेत आदि भी थे ॥४६॥
१५६ कथासरित्सागर
[Page Header] १५६ कथासरित्सागर
[Main Text] आगाच्च भगवान्ब्रह्मा सावित्र्यादिभिरन्वितः । मूर्तेर्वेदैश्च शास्त्रैश्च निखिलैश्च महर्षिभिः ॥४७॥ आजगाम च देवीभिर्लक्ष्मीकीर्तिजयादिभिः । धृतचक्रामुषो देवः पक्षिराजरथो हरिः ॥४८॥ सभार्यः कश्यपोऽप्यागादादित्या वसवोऽपि च । यक्षराक्षसनागेन्द्राः प्रह्लादाद्यास्तथासुराः ॥४९॥ तैरावृते नभोभागे शस्त्रसम्पातदारुणे¹। प्रावर्त्तत महानादः संग्रामः सेनयोस्तयोः ॥५०॥ दिक्चक्रे बाणजालेन घनेनाच्छादिते तदा । अन्योऽन्यशर सङ्घर्षजातानलतडिल्लते ॥५१॥ शस्त्रक्षतगजाश्वौघरक्तधारावपूरिता । वीरकायबृहद्ग्राहा निर्ययुः शोणितापगाः ॥५२॥ नृत्यत्सु सरसं रक्ते नभतो वोत्सवाय सः । शूराणां फेरवाणां च भूतानां चाभवद्रणः ॥५३॥ शान्ते तुमुलसंग्रामे निहतासंख्यसैनिके । लक्ष्यमाणे विभागे च शनैः स्वपरसैन्ययोः ॥५४॥ प्रतिपक्षप्रवीराणां प्रयुद्धानां सुमेरुतः । नामावौ श्रूयमाणे च क्रमात्सूर्यप्रभादिभिः ॥५५॥ पूर्वं सुबाहोर्नृपतेर्विद्याधरपतेस्तथा । अट्टहासाभिधानस्य द्वन्द्वयुद्धमभून्महत् ॥५६॥ सुचिरं युध्यमानस्य तस्य विद्धस्य सायकैः । अट्टहासोऽर्धचन्द्रेण सुबाहोरच्छिनच्छिरः ॥५७॥ दृष्ट्वा सुबाहुं निहतं मुष्टिकोऽभ्यापतत्क्रुधा । सोऽपि तेनाट्टहासेन भुवि बाणहतोऽपतत् ॥५८॥ मुष्टिके निहते भूयः प्रलम्बो नाम भूपतिः । अभिभाष्याट्टहासं तं शरवर्षैरयोधयत् ॥५९॥ अट्टहासोऽपि तत्सैन्यं हत्वा हत्वा च मर्मणि । प्रलम्बमपि तं वीरं रथपृष्ठे न्यपातयत् ॥६०॥
[Footnotes] १ शस्त्राणां संपातेन दारुणः = भीषणः।
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[Page-header] षष्ठम लम्बक १५७ सावित्री के साथ ब्रह्मा तथा उनके साथ मूर्तिमान् वेद और महर्षि भी आये ॥४७॥ और लक्ष्मी कीर्ति जया आदि के साथ चक्रधारी भगवान् विष्णु भी गरुड़वाहन पर बैठ- कर वहाँ आये ॥४८॥ अपनी सभी पत्नियों के साथ महर्षि कश्यप द्वादश आदित्य अष्ट वसु, यक्षों, राक्षसों और नागों के राजा एवं प्रह्लाद आदि असुरों के राजा भी युद्ध देखने के लिए वहाँ एकत्र हुए ॥४९॥ इन दर्शकों के कारण आकाश-मण्डल भर जाने पर, शस्त्रों की झनझनाहट से भीषण और महान् कोलाहल दोनों ओर की सेनाओं में फैल गया। सारी दिशाओं के आकाश बादलों के समान बाणों के जाल से छा गये। दोनों ओर से फंकते हुए बाणों के आपस में टकराने पर अग्नि-रूपी बिजली चमकने लगी ॥५०-५१॥ नीचे भूमि पर शस्त्रों से काटे गए हाथी-घोड़ों के वीरों के रक्त की नदियाँ बह चलीं। वीरों के शरीर-रूपी ग्राह उस नदी में बह रहे थे। नाचते कूदते और रक्त की नदी में तैरते तथा चिल्लाते हुए शूरों-वीरों पर टूटते हुए पियासों और भूत-प्रेतों के लिए वह युद्ध अत्यन्त उत्सव और आनन्द का कारण बन गया था ॥५२-५३॥ असंख्य सैनिकों के कट जाने और उस घोर संग्राम के शनै-शनै शान्त होने पर शेष सैनिक धीरे-धीरे अपने और शत्रु के पक्ष को भली भाँति जान सके ॥५४॥ तब सुमेरु द्वारा शत्रु-पक्ष के वीरों के नाम सूर्यप्रभ आदि ने सुने और उन्हें पहचाना ॥५५॥ सबसे पहले उत्तर के एक राजा सुबाहु तथा विद्याधरों के राजा अट्टहास का परस्पर द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥५६॥ बहुत समय तक युद्ध करते हुए और बाणों से छिदे हुए सुबाहु के सिर को अट्टहास ने अर्धचन्द्राकार बाण से काट दिया ॥५७॥ सुबाहु को मृत देखकर मुष्टिक नामक राजा अट्टहास पर टूट पड़ा। अट्टहास ने उसे भी छाती में बाण मारकर धराशायी बना दिया ॥५८॥ मुष्टिक के मारे जाने पर प्रलम्ब नामक राजा ने आगे बढ़कर अट्टहास को बाणों की वर्षा से छा दिया ॥५९॥ अट्टहास ने उसकी सेना को मारकर और उसके मर्मस्थानों पर प्रहार करके प्रलम्ब को भी रथ पर ही सुला दिया ॥६०॥
१५८ कथासरित्सागर
१५८ कथासरित्सागर वीक्ष्य प्रलम्बं निहतं मोहनो नाम भूपतिः। सक्षिप्त्याट्टहासं च सादयामास सायकैः ॥६१॥ ततोऽट्टहासस्तं छिन्नकोदण्डं हतसारथिम्। दृढप्रहाराभिहतं पातयामास मोहनम् ॥६२॥ दृष्ट्वाऽट्टहासन हतांश्चतुरश्चतुरेष्व तान्। श्रुतशर्मबलं हर्षाद्भुवनाव भयोन्मुखम् ॥६३॥ तद्दृष्ट्वा कुपितो हर्षं सूर्यप्रभवयस्यकः। ससैन्यमभ्यधावत्तमट्टहासं ससैनिकः ॥६४॥ निवार्य च शरैस्तस्य क्षरान्सैन्यं निहत्य च। व्यापाय सारथिं द्वित्रिर्धनुश्छित्वा च सभ्यजम् ॥६५॥ हर्षो यदट्टहासस्य निर्बिभेद शरैः शिरः। तेनासौ रुधिरोद्गारी निपपात रथाद्भुवि ॥६६॥ अट्टहासे हते तादृक् क्षोभोऽभूत्तत्र संयुगे। क्षणादर्धावशेषं तद्येन जज्ञे बलद्वयम् ॥६७॥ निपेतुश्चैवं निहतास्तत्राश्वगजपत्तयः। रणमूर्धनि चोतस्थुः कबन्धा एव केवलम् ॥६८॥ ततो विकृतदंष्ट्राख्यो हर्षं विद्याधरेश्वरः। एत्याट्टहासनिधनक्रुद्धो बाणैरवाकिरत् ॥६९॥ हर्षोऽपि तस्य निर्भिद्य शराञ्छत्रध्वजसारथीन्। हत्वा रथाश्वांश्चिच्छेद शिरो लुलितकुण्डलम् ॥७०॥ हते विकृतदंष्ट्रे तु चक्रवाल इति श्रुतः। राजा विद्याधरो हर्षमभ्यधावदमर्षितः ॥७१॥ स युध्यमानमवधीदसकृच्छिन्नकार्मुकम्। चक्रवालो युधि श्रान्तं हर्षं क्षीर्णपरायधम् ॥७२॥ तत्क्षेत्रेधावेक्ष्य नृपतिं प्रमाथस्तमयोभयत्। सोऽप्यहन्यत तेनाथ चक्रवालेन संयुगे ॥७३॥ तथैव तेन चात्रान्येऽप्येकशो धाविताः क्रमात्। चत्वारश्चक्रवालेन राजमुख्या निपातिताः ॥७४॥ कङ्कटश्च विशाखश्च प्रचण्डश्चास्रुरी सभा। तद्दृष्ट्वाभ्यपतत्तत्रेमाधिभर्त्तो नाम तं नृपः ॥७५॥
द्वादश लम्बक १६१
द्वादश लम्बक १६१ तदनन्तर, प्रलम्ब को मरा हुआ देखकर मोहन नामक राजा ने सामने आकर अट्टहास को बाणों की वर्षा से छा दिया ॥६१॥ अट्टहास ने धनुष काटकर और सारथी को मारकर दृढ़ प्रहारों द्वारा मोहन नामक राजा को भी गिरा दिया ॥६२॥ रण-चतुर अट्टहास द्वारा चार वीरों के मारे जाने पर श्रुतशर्मा की सेना विजय मनाती हुई हर्ष से कोलाहल करने लगी ॥६३॥ यह देखकर हर्य नामक क्रुद्ध सूर्यप्रभ के मित्र ने अपनी सेना के साथ अट्टहास का सामना किया। अपने बाणों से उसके बाणों को हटाकर दो बाणों से उसके सारथी और तीन से उसके धनुष और ध्वजा को काट दिया ॥६४-६५॥ उसके पश्चात् हर्य ने बाणों से अट्टहास का सिर काट डाला जिससे रक्त उगलता हुआ अट्टहास रथ से भूमि पर गिर पड़ा ॥६६॥ अट्टहास के मरते ही ऐसा घमासान युद्ध मचा कि क्षण-भर में ही दोनों ओर की सेना आधी आधी रह गई ॥६७॥ सारी रणभूमि में हाथी घोड़े और पैदल सैनिक कटकर मर रहे थे। केवल सिरों से हीन धड़ ही धड़ खड़े दीख रहे थे ॥६८॥ तब अट्टहास की मृत्यु से क्रुद्ध हुआ विकृतदंष्ट्र नामक विद्याधरराज ने सामने आकर हर्य को बाणों से घेर लिया ॥६९॥ हर्य ने भी उसके बाणों का जाल काटकर उसकी ध्वजा और सारथी को भी काटा और उसके घोड़ों को मारकर सुन्दर कुंडलवाले उसके सिर को भी काट डाला ॥७०॥ विकृतदंष्ट्र के मारे जाने के कारण चक्रवाल नामक विद्याधर-राजा क्रोध से हर्य के प्रति दौड़ा ॥७१॥ चक्रवाल ने भी बार-बार हर्य के धनुष को काटा और दूसरे शस्त्र को उठाने के पहले ही उसने थके हुए हर्य को मार दिया ॥७२॥ यह देखकर प्रभास नामक राजा ने चक्रवाल को ललकारा किन्तु चक्रवाल ने सामने आये हुए चार मुख्य राजाओं को क्रमशः मार डाला ॥७३-७४॥ जिनके नाम थे कंकट, विशाल प्रचंड और अंगुरी। यह देखकर निर्घात नाम का राजा क्रोध से चक्रवाल पर टूट पड़ा ॥७५॥
५५ कथासरित्सागर
५५ कथासरित्सागर तौ चक्रवालनिर्घातौ युध्यमानौ चिरं क्रमात् । अन्योन्यचूर्णितरथावभूतां पादचारिणौ ॥७६॥ असिचक्रधरौ द्वावप्याकोपाभिमुखौ च तौ। खड्गाहतिद्विधाभूतसूर्धानौ भुवि पेततुः ॥७७॥ विपक्षौ वीक्ष्य तौ वीरौ विपण्णेऽपि बलद्वये । रणाग्रमाययौ विद्याधरेन्द्रः कालकम्पनः ॥७८॥ राजपुत्रोऽभ्यधावच्च तं प्रकम्पननामकः । स कालकम्पनेनाशु क्षणात्तेन न्यपात्यत ॥७९॥ तस्मिन्निपतिते तस्य पञ्चान्यऽभ्यपतन् रथाः । जालिकश्चण्डदत्तश्च गोपकः सोमिलोऽपि च ॥८०॥ पितृशर्मा च सर्वे ते शराँस्तस्मिन् सहासृजन्। स तु पञ्चापि तान्कालकम्पनो विरथीकृतान् ॥८१॥ जघान युगपद्भिष्मशराचैर्हृदि पञ्चभिः। प्रणष्टुं खेचरास्तेन व्यषीदन् मनुजासुराः ॥८२॥ ततोऽभ्यधावन्नपरे चत्वारस्त रथाः समम् । उमसकः प्रथस्तश्च विस्रम्भकधुरन्धरौ ॥८३॥ स तानप्यवधीत्कालकम्पनो लीलयाखिलान्। तथैव धावितानन्यान्क्रुद्धांश्चिजघान सः ॥८४॥ तेजिकं गेयिकं चैव वेगिलं शालिलं तथा। भद्रङ्कुरं दण्डिनं च भूरिसैन्यान् महारथान् ॥८५॥ अपरांश्च पुनः पञ्च सोऽवधीन्मिलितान्युधि । भीमभीषणकुम्भीरविकटाक्षविलोचनान् ॥८६॥ तद्दृष्ट्वा कदनं कालकम्पनेन कृतं रणे। भयावत्सुगणो नाम राजपुत्रोऽस्य सम्मुखः ॥८७॥ स तेन तावद्विदधे समं युद्धमुभावपि । हताश्वसारथी यावद्विरथौ तौ बभूवतुः ॥८८॥ ततस्तं खड्गयुद्धेन सुगणं पादचारिणम्। स कालकम्पनः पादचार्येव भुवि जघ्निवान् ॥८९॥ तावच्च मानुषविद्याधराणां सममाहवम्। असम्भाव्यं विलोक्येव क्षिप्रमस्तं प्रययौ रविः ॥९० ॥
षष्ठम लम्बक १६१
षष्ठम लम्बक १६१ वे चक्रवाल और निर्घात परस्पर घमासान युद्ध करते हुए रथ घोड़े सारथी आदि के मारे जाने पर पैदल ही युद्ध करने लगे ॥७६॥ ढाल और तलवार से युद्ध करते हुए और क्रोध से भिड़े हुए, परस्पर के ही खड्ग प्रहार से कटे हुए सिरोंवाले दोनों ही भूमि पर गिर पड़े ॥७७॥ उन दोनों वीरों को गिरे हुए देखकर दोनों ओर की सेनाएँ निराश हो गई तब विद्याधरों का राजा कालकम्पन रणभूमि में सामने आया ॥७८॥ उधर से प्रकंपन नाम का राजकुमार उसके सामने आया। उसे कालकम्पन ने क्षण-भर में ही गिरा दिया ॥७९॥ उसके गिरते ही दूसरे पाँच महारथी मैदान में आये। वे ये—वालिक दंडदत्त नौपक, सोमिल और पितृशर्मा। सभी ने एक साथ कालकम्पन पर बाणों की बौछार की किन्तु उस काल- कम्पन ने पाँचों को रथहीन कर दिया ॥८०-८१॥ और, एक साथ ही पाँच बाणों से पाँचों के कलेजे बींध दिये। इससे खेचर (विद्याधर) तो प्रसन्न हुए और मनुष्य और असुर दुःखी हुए ॥८२॥ तब चार रथ एक साथ उसकी ओर दौड़ पड़े। वे चारों रथों में थे—उग्रतक्क प्रधस्त विप्रंचक और धुरंधर। कालकम्पन ने उन चारों को भी सहज में ही मार गिराया। और, उसी प्रकार दौड़कर आये हुए दूसरे छह महारथियों को भी मार डाला ॥८३-८४॥ तदनन्तर, कालकम्पन ने युद्ध में सामने आये हुए और पाँच महारथियों को भी मार दिया। वे पाँच महारथी थे—तेजिक मेधिक वेगिल शालित भयंकर और पंडी। इनके साथ बड़ी-बड़ी सेनाएँ भी मारी गई ॥८५॥ इसके अतिरिक्त युद्ध में आये हुए भीम भीषण कुम्भीर, विकट और विलोचन नामक पाँच महारथियों को भी धराशायी कर दिया ॥८६॥ इस प्रकार, कालकम्पन द्वारा किये जानेवाले संहार को देखकर सुपद्म नामक राजपुत्र युद्ध में उसके सामने आया ॥८७॥ वे दोनों परस्पर युद्ध करते हुए सारथी और रथ से विहीन हो गये ॥८८॥ तब पैदल युद्ध करते हुए कालकम्पन ने सुपद्म को तलवार से काटकर भूमि पर गिरा दिया ॥८९॥ इतने में ही मनुष्यों के साथ विद्याधरों के युद्ध को अयुक्त समझकर, अतएव मानों खिन्न होकर सूर्य भगवान् अस्ताचल को चले गये ॥९०॥ ४१
रक्ताम्बुपूरभरितं न परं समराङ्गणम्। यावत्सन्ध्याकृतपदं ययौ व्योमापि शोणताम् ॥९१॥ कबन्धैः सह भूतेषु सन्ध्यान्नृत्तोद्यतत्विष । संहृत्य युद्धं ययतुः स्वनिवेशाय तद्वले ॥९२॥ श्रुतशर्मबलं तस्मिन्दिने वीरा हतास्त्रयः । त्रयस्त्रिंशत्प्रवीरांस्तु बले सूर्यप्रभे हताः ॥९३॥ तत बान्धवमित्रादिनिधनेन सुदुर्मना । सूर्यप्रभस्त्रियामां तामासीदन्तःपुरैर्विना ॥९४॥ अनिद्र एव सचिवैः सह सङ्ग्रामसत्कथा । तास्ताः कुर्वन्निनायतां पुनर्युद्धोन्मुखो निशाम् ॥९५॥
स्त्रीषु युद्धचर्चा सूर्यप्रभचर्चा च
तद्भार्याश्च मिलन्ति स्म हतबान्धवदुःखिताः । एकत्र तस्यां रजनावन्योन्याश्वासनागताः ॥९६॥ रुदितावसरेष्वत्र कथा नानाविधा व्यधुः । स्त्रीणां न स क्षणो यत्र न कथा स्वपराश्रया ॥९७॥ तत्प्रसङ्गेन तत्रैका राजपुत्रीदमब्रवीत् । आश्चर्यमार्यपुत्रोऽद्य कथं सुप्तो निरञ्जनः ॥९८॥ तच्छ्रुत्वा व्याजहाराया सङ्ग्रामे स्वजनक्षयात् । दुःखितो ह्यार्यपुत्रोऽद्य रमते स्त्रीजने कथम् ॥९९॥ ततोऽपरा ब्रवीति स्म प्राप्नोत्यभिनवां यदि । वरकन्यां स तद्दुःखं विस्मरेत्यधुनैव तत् ॥१००॥ अथेत्तराब्रवीन्मैवं यद्यपि स्त्रीषु लम्पटः । तथापि न स दुःखेऽस्मिन्नीदृशः स्यात्तथाविधः ॥१०१॥ इति तासु वदन्तीषु जगादैका सविस्मयम् । धूत स्त्रीलम्पटः कस्मादार्यपुत्रो यतादृशः ॥१०२॥ आहितास्वपि भार्यासु भूयसीषु नवां नवां । अनिशं राजपुत्रीर्यस्तं शृङ्गैश्चैव तुष्यति ॥१०३॥ एतच्छ्रुत्वा विदग्धैका तासु नाम्ना मनोरथी । उवाच श्रूयतां येन राजानो बहुवल्लभाः ॥१०४॥
अष्टम लम्बक १६३
अष्टम लम्बक १६३ रक्त-रूपी जल से भरी हुई युद्ध-भूमि ही केवल लाल नहीं हुई, प्रत्युत सन्ध्या के कारण आकाश भी लाल हो गया ॥ ९१ ॥ तदनन्तर भूत-प्रेत मृत-कबन्धों¹ के साथ आनन्द-नृत्य करने लगे और दोनों ओर की सेनाएँ भी युद्ध समाप्त करके अपने-अपने शिविरों को लौट गईं ॥९२॥ उस दिन के युद्ध में श्रुतशर्मा की सेना के तीन वीर मारे गये और सूर्यप्रभ की सेना के छब्बीस वीर काम आये ॥९३॥ इस प्रकार, बन्धुओं मित्रों और वीर सैनिकों के मारे जाने के कारण विप्रचित्त सूर्यप्रभ उस रात्रि को रानियों के बिना ही रह गया ॥९४॥ और, निद्रा-रहित होकर युद्ध-सम्बन्धी आवश्यक विचार करते हुए उसने रात्रि व्यतीत की ॥९५॥ रानियों द्वारा सूर्यप्रभ की तथा युद्ध की चर्चा उसी रात में मृत बन्धुओं के कारण दुःखित और एक दूसरे को आश्वासन देने के लिए आई हुई उसकी पत्नियाँ भी एक स्थान पर आकर मिलीं ॥९६॥ उस शोक मनाने और रात बीतने के समय में भी वे विभिन्न प्रकार की बातें परस्पर करने लगीं। स्त्रियों का ऐसा कोई भी क्षण नहीं जाता जिसमें वे अपनी या पराई चर्चा न करें ॥९७॥ इसी प्रकार की चर्चा के प्रसंग में एक राजकुमारी बोली—आश्चर्य है कि आज आर्यपुत्र (सूर्यप्रभ) अकेले कैसे सो गये ? ॥९८॥ यह सुनकर दूसरी ने कहा—'युद्ध में अपने प्रिय व्यक्तियों की मृत्यु हो जाने के कारण दुःखित आर्यपुत्र पत्नियों के साथ आमोद-प्रमोद कैसे करते ? ॥९९॥ यह सुनकर तीसरी बोल उठी—यदि आज ही उन्हें नवीन सुन्दरी कन्या मिल जाती तो वे सारे स्वजनों का दुःख भूल जाते ॥१००॥ तब चौथी ने कहा कि यद्यपि आर्यपुत्र स्त्रियों में अधिक आसक्ति रखते हैं किन्तु ऐसे कष्ट के समय वे ऐसा कार्य कैसे कर सकते हैं ?। वे सब परस्पर जब इस प्रकार की बातें कर रही थीं तब एक स्त्री ने आश्चर्य के साथ कहा—यह तो बताओ कि हमारे आर्यपुत्र भला इतने स्त्री-लम्पट क्यों हैं ? ॥१०१–१०२॥ बहुत-सी स्त्रियों के रहते हुए भी वे दिन-रात नई-नई स्त्रियों को ही ग्रहण करके सन्तुष्ट होते हैं ॥१०३॥ यह सुनकर उनमें से एक चतुरा मनोवती नाम की स्त्री बोली—'सुनो राजा लोग बहुत पत्नियोंवाले क्यों होते हैं यह मैं बताती हूँ ॥१०४॥ १. सिर से रहित धड़ = मृत कलेवर।
१६६ | कथासरित्सागर
यहाँ दिए गए पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
१६६ | कथासरित्सागर तत्राप्रवित्रमवच्य ता विगलत्त्रपानर्गला परस्परमुपाश्चिन् सुरतकथायतश्चाप्यपि। प्रसङ्गमिनिष्ठा कथाप्रसरसन्नविता मिथ म्पुष्विन् न किमप्यहो यदिह नाद्रमन्ति स्त्रियः ॥१२०॥ अथ कथमपि दीर्घा या कया भात्र तासा मवसितिमुपयाता सा स रात्रिः क्रमेण। तिमिरविगमवष्टादशमवामिकांक्षा रिपुबलविजिगीषास्तत्र सूर्यप्रभस्य ॥१२१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।
पञ्चमस्तरङ्गः सूर्यप्रभस्य विद्याधरैः सह युद्धवर्णनम् अथ युद्धभुवं प्रातर्जग्मुः सूर्यप्रभादयः। श्रुतशर्मादयस्ते च समदाः सशराः पुनः ॥१॥ पुनश्च सेन्द्रा सब्रह्मविष्णुशक्राः सुरासुराः॥ सयक्षारगगन्धर्वाः सङ्ग्रामं द्रष्टुमाययुः ॥२॥ श्रुतशर्मबले चक्रव्यूहं दामोदरो व्यधात्। वज्रव्यूहं प्रभासश्च सूर्यप्रमबलेऽकरोत् ॥३॥ ततः प्रवृत्तं युद्धं तयोश्चमयसेनयोः। तूर्येः सुभटनादैश्च बधिरीकृतदिङ्मुखम् ॥४॥ सम्यक्छन्नहता शूरा भिन्दन्ति मम मण्डलम्। इतीव करजालान्तश्छन्नो भानुरभूद् भिया ॥५॥ वागादरवृतं चक्रव्यूहमयतं दुर्भिदम्। भित्त्वा प्रभासः प्राविशदथ सूर्यप्रभाज्ञया ॥६॥ तं च दामोदरो व्यूहच्छिद्रमत्यावृणोत्स्वयम्॥ प्रभासो ययुधे तं च सूर्यकरश्च एष सः ॥७॥ प्रविष्टमेककं तं च दृष्ट्वा सूर्यप्रभोऽथ सः। पश्चात्स्वबलदेवस्य विससर्ज महारथान् ॥८॥
अष्टम लम्बक १६७
अष्टम लम्बक १६७ तदनन्तर, किसी प्रकार की रोक-टोक के बिना वे स्त्रियाँ स्वच्छन्द भाव से गुप्त रहस्य की बातें भी करने लगीं। किसी अवसर पर एकत्र हुई और वार्तालाप के रस में निमग्न स्त्रियाँ आपस में ऐसी कौन-सी बात है जिसे नहीं कह डालतीं ॥१२०॥ अँधेरे के बीतने की प्रतीक्षा करता हुआ और शत्रु-दल पर विजय की कामना करता हुआ सूर्यप्रभ की वह लम्बी रात्रि क्रमशः समाप्त हुई और उधर बातचीत के रस में निमग्न उसकी पत्नियों की वह लम्बी चर्चा भी क्रमशः समाप्त हो गई ॥१२१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त पञ्चम तरङ्ग सूर्यप्रभ चरित रणभूमि में संग्राम प्रभात-काल होते ही वे सूर्यप्रभ आदि तथा श्रुतशर्मा आदि तैयार होकर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ रणभूमि में आकर डट गये ॥१॥ और ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि देवता तथा असुर, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस आदि युद्ध देखने के लिए आकाश के अवकाश में विमानों में सवार होकर एकत्र हो गये ॥२॥ श्रुतशर्मा की सेना में सेनापति दामोदर ने चक्रव्यूह बनाया और सूर्यप्रभ की सेना में सेनापति प्रभास ने वज्रव्यूह की रचना की ॥३॥ व्यूह रचना के पश्चात् दोनों सेनाओं का युद्ध प्रारम्भ हुआ और रणवाद्य तथा सैनिकों के रणनादों से भारी चिल्लाहट गूँज उठी ॥४॥ भली भाँति सहायता करने योग्य वीर सूर्य मण्डल का भेदन करते हैं इसलिए भय से भगाये गये कायरों को सहायता के योग्य न समझकर छोड़ दिये ॥५॥ एकाकार व छल-रहित चक्र-व्यूह वायु-भरे चीर से आबद्ध बनकर सूर्यप्रभ की सेना में प्रवाल-कुण्डलों सहित काक-पक्ष में प्रवेश कर गया ॥६॥ प्रभास द्वारा व्यूह से वियुक्त होकर पृथक् रूप में शत्रुदल पर आक्रमण कर दिया और कहीं रथ-समूह पर तो कहीं गजदल उलट-पलट करने लगा ॥७॥ तब दामोदर ने प्रभास को जय के साधन में बाधा देखकर उसकी सहायता के लिए अन्य महारथियों को उसके पीछे भेजा ॥८॥ १. रणभूमि में मारे गए शूर-वीर और योगिनी-डाकिनी की आपस में 'सूर्य-मण्डल का भेदन करके देखने ऊपर सत्यलोक में जाती हूँ।' —अनु०
१६४ कथासरित्सागर
१६४ कथासरित्सागर देशरूपवयश्चेष्टाविज्ञानादिविभेदतः । भिन्ना गुणा वरस्त्रीणां नैका सर्वगुणान्विता ॥१०५॥ कर्णाटलाटसौराष्ट्र मध्यदेशाविदेशजाः । योषा देशसमाचारे रञ्जयन्ति निजेनिजः ॥१०६॥ काश्चिद्धरन्ति सुवृत्तैः शारदेन्दुनिभैर्मुखैः । अन्याः कनककुम्भाभैः स्तनैरुन्नतसंहतैः ॥१०७॥ स्मरसिंहासनप्रख्यैरपरा जघनस्थलैः । इतराश्चतरैरङ्गैः स्वसौन्दर्यमनोरमैः ॥१०८॥ काचित्काञ्चनगौराङ्गी प्रियङ्गुश्यामलापरा । अन्या रक्तावदाता च दृष्ट्वैव हरतीक्षणे ॥१०९॥ काचित्प्रत्यग्रसुभगा काचित्सम्पूर्णयौवना । काचित्प्रौढत्वसुरसा प्रसरद्विभ्रामोज्ज्वला ॥११०॥ हसन्ती शोभते काचित्काचित्कोपेऽपि हारिणी । व्रजन्ती गजवत् कापि हंसवत् कापि राजते ॥१११॥ आलपन्त्यमृतेनेव काचिदासिश्चति श्रुतिम् । सभ्रूविलासं पश्यन्ती स्वभावाद् भाति काचन ॥११२॥ नृत्तेन रोचते काचित् काचिद्गीतेन राजते । वीणादिवादनज्ञानेनान्या कान्ता च रोचते ॥११३॥ काचित् बाह्यरताभिज्ञा काचिदाम्यन्तरप्रिया । प्रसाधनोज्ज्वला काचित् काचिद्वैदग्ध्यशोभिता ॥११४॥ भर्तृचित्तग्रहाभिज्ञा चान्या सौभाग्यमश्नुते । कियद्वा वच्मि बहवोऽप्यन्योन्यासां पृथग्गुणाः ॥११५॥ तदेवमिह कस्याश्चिद् गुणः कोऽपि वरस्त्रियः । न तु सर्वगुणाः सर्वास्त्रैलोक्यामपि काश्चन ॥११६॥ अहो नानारसास्वादसम्व्यवस्थाम् किलेश्वराः । माहृत्याप्याहरन्त्येव भार्या नवनवाः सदा ॥११७॥ उत्तमास्तु न वाञ्छन्ति परदारान् कथञ्चन । तन्नायंयुक्तरूपैय स्याद्दोपो नेर्ध्या च नः क्षमा ॥११८॥ एवमाद्या मनोवत्या प्रोक्ता सूर्यप्रभाङ्गनाः । अन्या मदनसेनाद्यास्तत्तदोचुः कथाः क्रमात् ॥११९॥
अष्टम लम्बक ११५
अष्टम लम्बक ११५ देश रूप अवस्था चेष्टा विज्ञान आदि के भेद से अच्छी स्त्रियाँ भिन्न-भिन्न गुणावाली होती हैं। एक ही स्त्री सर्वगुण-सम्पन्न नहीं हुआ करती ॥१०५॥ कर्णाट, लाट, सौराष्ट्र मध्यदेश आदि की स्त्रियाँ अपनी-अपनी विशेषताओं से पति का मनोरञ्जन करती हैं ॥१०६॥ कुछ सुन्दरियां शरत्कालीन चन्द्रमा के समान मुख से मन हरण करती हैं, कुछ सोने के घड़ों के समान उठे और बने स्तनो से चित्त रंजन करती हैं कुछ स्त्रियाँ काम के सिंहासन के समान जघनस्थल से आकर्षण करती हैं और कुछ दूसरे-दूसरे सौन्दर्य से तथा आकर्षक अंगों से मनोहरण करती हैं। कोई तपे हुए स्वर्ण के समान वर्णवाली होती हैं कुछ प्रियंगु पुष्प के समान साँवले वर्ण की होती हैं और कुछ रुखाई लिये हुए गौर वर्ण की होती हैं, जो देखते ही मन को मोहित कर देती हैं॥१०७-१०९॥ कुछ नई अवस्था के कारण सुन्दर होती हैं, तो कुछ यौवन के पूर्ण विकसित होने पर मनोरम हो जाती हैं। कुछ स्त्रियां प्रौढ़ता के कारण सरस होती हैं और कुछ अपने हाव-भाव-विलास से अपने सौन्दर्य की छटा दिखाती हैं॥११०॥ कोई हँसती हुई प्यारी लगती हैं तो कोई क्रुद्ध होने पर मनोहरण करती हैं। कोई गज गामिनी होती हैं और कोई हंसगामिनी होने के कारण अच्छी लगती हैं॥१११॥ कुछ स्त्रियां मधुर भाषण के अमृत से कानों को सिक्त करती हैं और कोई सहज भ्रू विलास से देखती हुई अच्छी लगती हैं ॥११२॥ कोई नाचने में निपुण होती हैं तो कोई गाने में कुशल होती हैं। कोई वाद्य-कला में पारंगत होने के कारण श्लाघ्य होती हैं ॥११३॥ कोई स्त्री बाहरी रति विलास में दक्ष होती हैं, तो कोई अन्तरंग रति विलास में चतुर होती हैं। कोई श्रृंगार करने में निपुण होती हैं तो कोई बात करने में चतुर ॥११४॥ और, कोई पति के चित्त को वश में करके सौभाग्य प्राप्त करती हैं। कहाँ तक कहूँ भिन्न भिन्न स्त्रियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के गुण होते हैं ॥११५॥ इन सब गुणों में से किसी में कोई और किसी में कोई अपना विशिष्ट गुण होता है। किन्तु, तीनों लोकों में भी कोई स्त्री सर्व-गुण-सम्पन्न नहीं मिलती ॥११६॥ इसलिए, भिन्न-भिन्न रसों के आस्वाद लेने के लोभी राजा लोग सदा नई-नई स्त्रियों से विवाह किया करते हैं ॥११७॥ उच्च कोटि के व्यक्ति दूसरों की स्त्रियों को नही चाहते। इसलिए, हमारे आर्यपुत्र (अशिष्ट विवाह करके) दोषी नहीं हैं और न हमलोगों को इसमें ईर्ष्या ही करनी चाहिए ॥११८॥ इस प्रकार मनोवती के कहने पर सूर्यप्रभ की मदनसेना आदि स्त्रियाँ क्रमशः इसी प्रकार की चर्चा करने लगीं ॥११९॥
३६६ कथासरित्सागर
३६६ कथासरित्सागर ततोऽप्रतिरसस्तृप्तस्ता विगतयन्त्रणार्गलाः परस्परमुपाविशन् सुरतायतश्राम्यपि। प्रसङ्गान्मिलिताः कथाप्रसरसक्तचित्ता मिथः स्वपन्ति न किमप्यहो यदिह नोद्वमन्ति स्त्रियः ॥१२०॥ अथ कथमपि दीर्घा सा कथा धात्र तासा- मवसितिमुपयाता सा च रात्रिः क्रमेण। तिमिरविगमवेलावेक्षणैकाभिकाङ्क्षी रिपुबलविजिगीषोस्तत्र सूर्यप्रभस्य ॥१२१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।
पञ्चमस्तरङ्गः सूर्यप्रभस्य विद्याधरैः सह युद्धवर्णनम् अथ युद्धभुवं प्रातर्जग्मुः सूर्यप्रभादयः। श्रुतशर्मादयस्ते च सन्नद्धाः सबलाः पुनः ॥१॥ पुनश्च सेन्द्राः सब्रह्मविष्णुरुद्राः सुरासुराः ॥ समयोरगगन्धर्वाः संग्रामं द्रष्टुमाययुः ॥२॥ श्रुतशर्मबले चक्रव्यूहं दामोदरो व्यधात्। पद्मव्यूहं प्रभासश्च सूर्यप्रभबलेऽकरोत् ॥३॥ ततः प्रवृत्ते युद्धे तयोरुभयसैन्ययोः। तूर्यैः सुभटनादैश्च बधिरीकृतदिस्तटम् ॥४॥ सम्यक्छस्त्रहताः शूरा भिन्दन्ति मम मण्डलम्। इतीव धरजाक्रान्तच्छन्नो भानुरभूद् भिया ॥५॥ दामोदरकृतं चक्रव्यूहमन्थेन दुर्भिदम्। भित्त्वा प्रभासः प्राविशदथ सूर्यप्रभाज्ञया ॥६॥ स च दामोदरो व्यूहच्छिद्रमप्यावृणोत्स्वयम् ॥ प्रभासो ययधे तं च तत्रैकरथ एव सः ॥७॥ प्रविष्टमेकं तं च दृष्ट्वा सूर्यप्रभोऽथ सः। पश्चात्पक्ष्बदधोतस्य विससर्ज महारथान् ॥८॥
अष्टमं लम्बकं १६७
अष्टमं लम्बकं १६७ तदनन्तर किसी प्रकार की रोक-टोक के बिना वे स्त्रियाँ स्वच्छन्द भाव से गुप्त रहस्य की वार्ताएँ भी करने लगीं। किसी अवसर से एकत्र हुई और वार्तालाप के रस में निमग्न स्त्रियाँ आपस में ऐसी कौन-सी बात है, जिसे नहीं कह डालतीं ॥१२०॥ अँधेरे के बीतने की प्रतीक्षा करते हुए और शत्रु-दल पर विजय की कामना करते हुए सूर्यप्रभ की वह लम्बी रात्रि क्रमशः समाप्त हुई और उधर बातचीत के रस में निमग्न उसकी पत्नियों की वह लम्बी चर्चा भी क्रमशः समाप्त हो गई ॥१२१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त पञ्चम तरंग सूर्यप्रभ चरित रणभूमि में संग्राम प्रभात-काल होते ही वे सूर्यप्रभ आदि तथा श्रुतशर्मा आदि तैयार होकर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ रणभूमि में आकर डट गये ॥१॥ और ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि देवता तथा असुर, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस आदि युद्ध देखने के लिए आकाश के अवकाश में फिर से आकर एकत्र हो गये ॥२॥ श्रुतशर्मा की सेना में सेनापति दामोदर ने चक्रव्यूह बनाया और सूर्यप्रभ की सेना में सेनापति प्रभास ने वज्रव्यूह की रचना की ॥३॥ व्यूह रचना के पश्चात् दोनों सेनाओं का युद्ध प्रारम्भ हुआ और रणवाद्य तथा सैनिकों के दम्भा से सारी दिशाएँ गूँज उठीं ॥४॥ भली भाँति शस्त्रों से मारे गये शूर-वीर 'मेरे मंडल का भेदन' करते हैं, इसलिए भय से मानों सूर्य भगवान् बाणों के जाल के अन्दर ढक गये ॥५॥ दामोदर के बनाये हुए चक्र-व्यूह को दूसरे वीर से अभेद्य जानकर सूर्यप्रभ की आज्ञा से प्रभास उसका भेदन करके व्यूह में प्रवेश कर गया ॥६॥ प्रभास द्वारा व्यूह में किये गये छेद के मुँह पर दामोदर स्वयं आकर डट गया और वहीं एक-मात्र रथ से ही प्रभास उससे युद्ध करने लगा ॥७॥ तब सूर्यप्रभ ने प्रभास को अकेले व्यूह में घुसा देखकर उसकी सहायता के लिए पन्द्रह महारथियों को उसके पीछे भेजा ॥८॥ १ रणभूमि में मारे गए शूर-वीर और योगी-परिव्राजक की आत्माएँ सूर्य-मण्डल का भेदन करके उसके ऊपर सत्यलोक में जाती हैं।—अनु
६६८ कथासरित्सागर
६६८ कथासरित्सागर
प्रकम्पनं धूमकेतुं कालकम्पनकं तथा। महामायं मरुद्वेगं प्रहस्तं वज्रपञ्जरम् ॥९॥ कालचक्रं प्रमथनं सिंहनादं सकम्बलम्। विकटाक्षं प्रवहणं तं कुञ्जरकुमारकम् ॥१०॥ तं च प्रहृष्टरोमाणमसुराधिपसत्तमम्। ते प्रभाष्य ययुः सर्वे व्यूहद्वारं महारथाः ॥११॥ तत्र दामोदरः पूर्वं स्वपौरुषमदर्शयत्। यदेक एव युयुधे तैः पञ्चदशभिः सह ॥१२॥ तद्दृष्ट्वा नारदमुनिं पार्श्वस्थं वासवोऽभ्यधात्। सूर्यप्रभाद्या असुरावतारा अस्तिभास्तथा ॥१३॥ श्रुतशर्मा मरुच्छ्रोत्रः सर्वे विद्याधरा इमे। देवांशास्तदयं युक्त्या मुने देवासुराहवः ॥१४॥ तस्मिंश्च पश्य देवानां सहायः सर्वदा हरिः। दामोदरस्तदंशोऽयमेष तदिह युध्यते ॥१५॥ एवं शक्रे वदत्यस्य दामोदरचमूपतेः। महारथाः समाजग्मुः साहाय्याय चतुर्दश ॥१६॥ ब्रह्मगुप्तो वायुबलो यमदंष्ट्रः सुरोषणः। रोषावरोहोऽतिबलस्तेजःप्रभधुरन्धरौ ॥१७॥ कुबेरदत्तो वरुणशर्मा कम्बलिकस्तथा। वीरश्च दुष्टदमनो दोहनारोहणावुभौ ॥१८॥ दामोदरयुतास्तेऽपि वीराः पञ्चदशैव तान्। सूर्यप्रभीयान् रुन्धुर्वीरान् व्यूहाग्रयोधिनः ॥१९॥ ततोऽत्र द्वन्द्वयुद्धानि तेषामासन् परस्परम्। दामोदरेणास्त्रयुद्धं समं चक्रे प्रकम्पनः ॥२०॥ ब्रह्मदत्तेन च समं धूमकेतुरयुध्यत। महामायस्तु युयुधे सहैवातिबलेन च ॥२१॥ तेजःप्रभेण युयुधे दानवः कालकम्पनः। सह वायुबलेनापि मरुद्वेगो महासुरः ॥२२॥ यमदंष्ट्रेण च समं युयुधे वज्रपञ्जरः। समं सुरोषणेनापि कालचक्रे सुरोसमः ॥२३॥
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प्रकम्पनं धूमकेतुं कालकम्पनकं तथा। महामायं मरुद्वेगं प्रहस्तं वज्रपञ्जरम् ॥९॥ कालचक्रं प्रमथनं सिंहनादं सकम्बलम्। विकटाक्षं प्रवहणं तं कुञ्जरकुमारकम् ॥१०॥ तं च प्रहृष्टरोमाणमसुराधिपसत्समम्। ते प्रथाम्य ययुः सर्वे व्यूहद्वारं महारथाः ॥११॥ तत्र दामोदरः पूर्वं स्वपौरुषमदर्शयत्। यथैक एव युयुधे तैः पञ्चदशभिः सह ॥१२॥ तद्दृष्ट्वा नारदमुनिं पार्श्वस्थं वासवोऽभ्यधात्। सूर्यप्रभाद्या असुरावतारा अखिलास्तथा ॥१३॥ श्रुतशर्मा मवशश्च सर्वे विद्याधरा इमे। देवांशास्तदयं युक्त्या मुने देवासुराहवः ॥१४॥ तस्मिंश्च पक्षे देवानां सहायः सर्वदा हरिः। दामोदरस्तदंशोऽयमेवं तदिह युज्यते ॥१५॥ एवं शक्रे वदत्यस्य दामोदरचमूपतेः। महारथाः समाजग्मुः साहाय्याय चतुर्दश ॥१६॥ ब्रह्मगुप्तो वायुबलो यमदंष्ट्रः सुरोषणः। रोपावरोहौप्रतिबलस्तेजःप्रभधुरन्धरौ ॥१७॥ कुबेरदत्तो वरुणशर्मा कम्बलिकस्तथा। वीरश्च दुष्टदमनो रोहनारोहणावुभौ ॥१८॥ दामोदरयुतास्तेऽपि वीराः पञ्चदशैव तान्। सूर्यप्रभीयान् रुरुधुर्वीरान् व्यूहाग्रयोधिनः ॥ ततोऽत्र द्वन्द्वयुद्धानि तदामासन् परस्परम्। दामोदरेणास्त्रयुद्धं समं चक्रे प्रकम्पनः। प्रह्लाददत्तेन च समं धूमकेतुरयुध्यत। महामायस्तु युयुधे सहवातिबलेन च। तेजःप्रभेण युयुधे दानवः कालकम्पना सह वायुबलेनापि मरुद्वेगो महासुरः। यमदंष्ट्रेण च समं युयुधे वज्रपञ्जरः। समं सुरोषणापि कालचक्रे सुरोत्तमः।
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१७२ कथासरित्सागर
[Header] १७२ कथासरित्सागर
प्रभासः पत्रिणा छत्रोवच्छितादद्भुतलाघवः ॥३९॥ एवं प्राङ्निहितानेकप्रवीरोत्थेन मन्युना । प्रभासो निग्रहं कालकम्पनस्य व्यधादिव ॥४० ॥ दृष्ट्वा च तं हतं विद्याधरेन्द्रं मनुजासुरैः । नादश्चक्रे विषादश्च जग्रमे सपदि खेचरैः ॥४१॥ ततो विद्युत्प्रभो नाम कारञ्जरगिरीश्वरः । प्रभासमभ्यधावत्त क्रुधा विद्याधराधिपः ॥४२॥ तस्यापि युध्यमानस्य प्रभासः स महाध्वजम् । छित्त्वा चकर्त कोदण्डमात्तमात्तं पुनं पुनः ॥४३॥ ततः स माययोत्पत्य च्छन्नो विद्युत्प्रभो नभः । प्रभासस्योपरि ह्रीतो ववर्षासिगदादिकान् ॥४४॥ प्रभासोऽपि विधूयास्त्रैस्तदायुधपरम्पराम् । कृत्वा प्रकाशनास्त्रेण प्रकाशं च नभश्चरम् ॥४५॥ दत्त्वा महास्त्रमाग्नेयं सत्तेजोदग्धमम्बरात् । विद्युत्प्रभं भूमितले गतजीवमपातयत् ॥४६॥ तद्दृष्ट्वा श्रुतधर्मा तानभिजगाव महारथान् । पश्यतानेन निहतौ द्वौ महारथयूथपौ ॥४७॥ तत्किं सहध्वं सम्भूय युष्माभिर्हं यतामयम् । उच्छ्रुत्वाष्टौ रथाः क्रुद्धा प्रभासं पर्यवारयन् ॥४८॥ एकः कूटकाद्रीन्द्रनिवासी रथयूथपः । ऊर्ध्वरोमंति विख्यातो विद्याधरमहीपतिः ॥४९॥ धरणीधरशैलाधिपतिर्विक्रेशनामिधः । विद्याधराजामधिपो द्वितीयश्च महारथः ॥५० ॥ इन्दुमाली तृतीयश्च लीलापर्वतकेतनः । वीरोऽग्रिमरथयूथस्य पतिर्विद्याधरप्रभुः ॥५१॥ मध्याद्रिनिवासी च काकाण्डक इति श्रुतः । रथयूथपती राजा चतुर्थः खेचरोत्तमः ॥५२॥ निकूटाद्रिपतिर्नाम्ना दर्पबाहुश्च पञ्चमः । षष्ठश्च मूर्तवहनो नाम्नाञ्जनगिरीश्वरः ॥५३॥