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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

अष्टम लम्बक ३२५

अष्टम लम्बक ३२५ तेजप्रभ नामक विद्याधरों का राजा उसे पकड़ने के लिए उठा, उसे भी अजगर ने फूंक से दूर फेंक दिया ॥६६॥ तब दुष्टदमन नामक विद्याधर उसे पकड़ने गया, उसे भी अजगर ने दूसरों के समान ही दूर फेंक दिया ॥६७॥ तदनन्तर, विक्रयरुचि नामक विद्याधरराज उसकी ओर गया और उसे भी उसने तिनके के समान दूर फेंक दिया ॥६८॥ इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी विद्याधरों के राजाओं के उसे पकड़ने का प्रयत्न करने पर उसने सभी को श्वास के झोंकों से ऐसा पटका कि उनके अंग पत्थरों से टकराकर चूर हो गये और किसी भी तरह वे फिर उठ न सके। इसके पश्चात् श्रुतशर्मा बड़े अभिमान से सर्प की ओर दौड़ा और उसे भी सर्प ने अपने श्वास से बहुत दूर फेंक दिया। पत्थरों की टक्कर से चूर-चूर हुए अंगों- वाले और लज्जित श्रुतशर्मा के फेंके जाने पर सुमह ने सूर्यप्रभ को उसे पकड़ने के लिए भेजा। 'देखो यह भी इस सर्प को पकड़ने के लिए उठा है। ये मनुष्य बन्दरों की भाँति विचारहीन होते हैं। दूसरों से जो कुछ भी किया जाता है, उसकी ये नकल करते हैं। इस प्रकार, कहते हुए सभी विद्याधर राजा सूर्यप्रभ की हँसी उड़ाने लगे ॥६९-७५॥ उनके हँसते हुए ही सूर्यप्रभ ने मुँह बन्द किये हुए उस अजगर को पकड़ लिया और बिल से बाहर खींच लिया ॥७६॥ उसी समय वह सर्प तरकस बन गया और सूर्यप्रभ के सिर पर आकाश से पुष्पवर्षा हुई ॥७७॥ तदनन्तर आकाशवाणी हुई—'हे सूर्यप्रभ तुम्हारे लिए यह तूणीर-रत्न सिद्ध हो गया इसे ग्रहण करो ॥७८॥ तब सभी विद्याधर, म्लान और लज्जित हो गये। सूर्यप्रभ ने उसे स्वीकार कर लिया। यह सुनीथ सुमेरु आदि अति प्रसन्न हुए ॥७९॥

३२६ कथासरित्सागर

३२६ कथासरित्सागर श्रुतशर्मणि यातेऽथ विद्याधरबलान्विते । एत्य सूर्यप्रभं दूतस्तदीय इदमभ्यधात् ॥८०॥ त्वां समादिशति धीमाञ्छ्रुतशर्मा प्रभुर्यथा । समर्पयेहस्तूणं मे कार्यं चेज्जीवितेन ते ॥८१॥ सूर्यप्रभोऽथ प्रत्याह दूतेव ब्रूहि गच्छ तम्। स्वचेह एव भविता तूर्णस्ते मन्दरायुधः ॥८२॥ एतत्प्रतिवचः श्रुत्वा गते दूते पराङ्मुखे । प्राहसन् रभसोक्तिं तां सर्वे ते श्रुतशर्मणः ॥८३॥ सूर्यप्रभोऽथ सानन्दमाश्लिष्योने सुमेरुणा। दिष्ट्याद्य शाम्भवं वाक्यं फलितं तदसंशयम् ॥८४॥ तूणरत्ने हि सिद्धेऽस्मिन्सिद्धा ते चक्रवर्तिता । तदेहि साधयेदानीं धनूरत्नं निराकुरु ॥८५॥ एतत्सुमेरोः श्रुत्वा ते तस्मिन्नेवाप्रयायिनि । सूर्यप्रभादयो जग्मुर्हेमकूटाचलं तत ॥८६॥ पार्श्वे तस्योत्तरे ते च मानसाख्यं सरोवरम् । प्रापुः समुद्रनिर्माभे विधातुरिव वर्णकम् ॥८७॥ मुखानि दिव्यनारीणां क्रीडन्तीनां जलान्तरे । निह्नुवानं मधूद्भूतैरुत्फुल्लैः कनकाम्बुजैः ॥८८॥ अवलोकयन्ति यावच्च सरसस्तस्य ते श्रियम् । तावत्तमाययुः सर्वे श्रुतशर्मादयोऽपि ते ॥८९॥ तत सूर्यप्रभस्ते च होमं चक्रुर्घृताम्बुजैः । क्षणाच्चात्रोग्रवायुर्धोरो मेघस्तस्मात् सरोवरात् ॥९०॥ स व्याप्य गगनं मेघो महद्वर्षमवासृजत् । तन्मध्ये च पपातैको नागः कालोऽम्बुदात्ततः ॥९१॥ सुमेर्वाक्यादुत्थाय गाढं सूर्यप्रभेण यत् । गृहीतो विध्यमानोऽपि ततः नागो भवद्धनुः ॥९२॥ तस्मिन् धनुष्ट्वमापन्ने द्वितीयोऽभ्रात्ततोऽपतत् । नागो विषाग्नित्रासात्तस्योच्चैरेववेष्टकः ॥९३॥ सोऽपि सूर्यप्रभेनाशु गृहीतस्तेन पूर्ववत्। धनुर्गुणत्वं सम्प्राप मेघश्चाशु मनाक्ष सः ॥९४॥

अष्टम लम्बक ३२७

अष्टम लम्बक ३२७ तब विद्याधरों की सेना के साथ श्रुतशर्मा के चले जाने पर उसका दूत आकर सूर्यप्रभ से इस प्रकार बोला—॥८०॥ 'जैसा कि हमारे स्वामी श्रुतशर्मा तुमको आज्ञा देते हैं कि यदि तुम्हें अपने जीवन से कार्य है, तो इस तरकस को मुझे दे दो' ॥८१॥ तब सूर्यप्रभ ने उत्तर दिया—'दूत उससे जाकर कह दो कि मेरे बाणों से छिदा हुआ तेरा शरीर ही तरकस बन जायगा' ॥८२॥ उत्तर सुनकर दूत के चले जाने पर वे सब श्रुतशर्मा की मूर्खता-पूर्ण बातों पर हँसने लगे ॥८३॥ तब सुमेरु ने सूर्यप्रभ का आलिंगन करके उससे कहा—'भाग्य से ही आज शिवजी की बात निःसन्देह सफल हुई ॥८४॥ इस तूणीर-रत्न के सिद्ध हो जाने पर तेरी चक्रवर्तिता सिद्ध हुई। अब आओ धनुष-रत्न को सिद्ध करें' ॥८५॥ सुमेरु के वचन सुनकर और उसी के आगे-आगे चलने पर सूर्यप्रभ आदि उसके पीछे-पीछे वहाँ से हेमकूट पर्वत पर गये ॥८६॥ वे उसके समीप ही उत्तर की ओर मानस-सरोवर पर पहुंचे जो सरोवर समुद्र के निर्माण के लिए मानों ब्रह्मा का साधन हो ॥८७॥ जलक्रीडा करती हुई देवांगनाओं के मुखों से मानों वह सरोवर खिले हुए स्वर्ण-कमलों से अपने को छिपा रहा था ॥८८॥ जबतक वे लोग मानस-सरोवर की शोभा देखते हैं, तबतक श्रुतशर्मा आदि विद्याधर वहाँ आ गये ॥८९॥ तब सूर्यप्रभ और वे सब विद्याधर घृत और कमलों से हवन करने लगे। उसी क्षण उस सरोवर से एक भयानक बादल निकला ॥९०॥ वह मेघ आकाश में जाकर घोर वर्षा करने लगा उसी वर्षा में मेघ से एक भीषण काला साप गिरा ॥९१॥ सूर्यप्रभ के कहने पर सुमेरु ने उसे कसकर पकड़ा। बाणों से बींधा जाता हुआ भी वह काला साप उसी क्षण धनुष बन गया ॥९२॥ उस साप के धनुष बन जाने पर दूसरा साप फिर गिरा उसके मुख से निकलते हुए विष और आग की लपटों के भय से सभी आकाशचारी विद्याधर भयभीत हो काँपने लगे ॥९३॥ पहले साप के समान ही उस साप के भी सूर्यप्रभ द्वारा पकड़े जाने पर वह (साप) धनुष की डोरी बन गया और वह मेघ भी नष्ट हो गया ॥९४॥

३९८ कथासरित्सागर

३९८ कथासरित्सागर सूर्यप्रभामितबल सिद्धमेतद्धनुस्तव । अच्छेद्यश्च गुणोऽप्येष रत्ने एते गृहाण तत् ॥९५॥ इत्यभावि च वाग्दिव्या पुष्पवृष्टिपुरःसरा । सूर्यप्रभश्च सगुणं धनूरत्नं तदग्रहीत् ॥९६॥ श्रुतशर्माप्यमाद्विग्नः सानुगः स तपोवनम् । सूर्यप्रभोऽथ सर्वे च हर्षमापुर्महाधियः ॥९७॥ पृष्टोऽथ धनुरुत्पत्तिं तैः सुमेरुरुवाच सः । इह कीचकवेणूनां दिव्यमस्ति वनं महत् ॥९८॥ सद्यो ये कीचकाश्छित्त्वा क्षिप्यन्तेऽत्र सरोवरे । महान्त्येतानि दिव्यानि सम्पद्यन्ते धनूंषि ते ॥९९॥ साधितानि च तान्येव दृप्तैस्तैस्तैः पुरातनैः । असुरैरथ गन्धर्वैस्तथा विद्याधरोत्तमैः ॥१००॥ भिन्नानि तेषां नामानि चक्रवर्तिष्वमूंषि तु । भत्रामृतबलाख्यानि निक्षिप्तानि पुरा सुरैः ॥१०१॥ तानि चैतैः परिक्लेशैः सिध्यन्ति शुभकर्मणाम् । कदाचिद्विश्वरेच्छातः भविष्यच्चक्रवर्तिनाम् ॥१०२॥ तच्च सूर्यप्रभस्यैतत् सिद्धमद्य महद्धनुः । स्वोचितानि वयस्यास्तत् साधयन्त्वस्य तान्यमी ॥१०३॥ येषां हि सिद्धविद्यानां वीराणामस्ति योग्यता । यथामुरूपं भव्यानां सिध्यन्त्यद्यापि तानि हि ॥१०४॥ एतद् सुमेरुवचनं श्रुत्वा सूर्यप्रभस्य ते । वयस्याः कीचकवनं तत् प्रभासाद्यो ययुः ॥१०५॥ तद्रक्षकं च राजानं चण्डदण्डं विजित्य ते । आनीय कीचकांस्तत्र निक्षिप्युः सरसोऽन्तरे ॥१०६॥ तत्तीरोपोषितानां च जपतां जुह्वतां तथा । सिध्यन्ति स्म धनूंष्येषां सप्ताहात् सत्यशालिनाम् ॥१०७॥ प्राप्तैस्तैस्तत्त्ववृत्तान्तैर्मयाद्यैश्च सहाय सः । आगात् सूर्यप्रभस्तावत् तत् सुमेरोस्तपोवनम् ॥१०८॥ तत्रोवाच सुमेरुस्तं जितो वेणुवनेश्वरः । त्वन्मित्रैश्चण्डदण्डो यवजेयोऽपि तदद्भुतम् ॥१०९॥

षष्ठ लम्बकः ३२९

षष्ठ लम्बकः ३२९ 'सूर्यप्रभ यह अनन्त फलशाली धनुष रत्न तुझे सिद्ध हो गया और इसके साथ कभी न टूटनेवाली डोरी भी तुझे प्राप्त हो गई। ये दोनों रत्न तुझे सिद्ध हुए, अब इन्हें स्वीकार कर' ॥१५-१६॥ इस प्रकार की आकाशवाणी सुनकर सूर्यप्रभ ने उन दोनों रत्नों को ग्रहण कर लिया और श्रुतशर्मा भी व्याकुल होकर अपने अनुचरों के साथ निराश होकर तपोवन को चला गया। तदनन्तर मय सुनीथ सूर्यप्रभ आदि सभी प्रसन्न हुए ॥१७॥ उस धनुष की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सुमेरु ने कहा— यहाँ पर वायु से दग्ध करनेवाले बाँसों का एक महान् और दिव्य जंगल है, उससे काटकर जो बड़े-बड़े बाँस इस सरोवर में फेंके जाते हैं, वे सभी दिव्य धनुष बन जाते हैं। उन्हीं धनुषों को पहले समय में देवताओं ने असुरों ने गन्धर्वों ने तथा विद्याधरों ने अपने लिए सिद्ध किया है ॥१८-१ ९ ॥ उनके अलग-अलग नाम हैं। इस सरोवर में पुराने समय में देवताओं ने अमृतबल नाम के धनुष भी छोड़े हैं, जो चक्रवर्तियों के धनुष हैं। वे बड़े ही कष्ट से किसी भावी चक्रवर्ती को ईश्वर की कृपा होने पर ही सिद्ध होते हैं ॥१ ९-१०२॥ वही चक्रवर्ती धनुष आज सूर्यप्रभ को सिद्ध हुआ है। उसके ये प्रभास आदि मित्र भी अपने अपने योग्य धनुषों की साधना करें ॥१ १॥ जिन सिद्धविद्य कुशाग्र वीरों की योग्यता होती है, उन्हें आज भी उन धनुषों की सिद्धि प्राप्त होती है ॥१ २॥ सुमेरु के वचन सुनकर सूर्यप्रभ के मित्र प्रभास आदि बाँसों के जंगल में गये और उस जंगल के रक्षक चंड-दंड को जीतकर वहाँ से बाँस लाये और उन्हें सरोवर में फेंक दिया ॥१०५-१ ६॥ इसके बाद सूर्यप्रभ के मित्रों ने सरोवर के किनारे बैठकर जप और हवन प्रारम्भ किया। उन शस्त्रशाली मित्रों को सात दिन में धनुष सिद्ध हो गये ॥१ ७॥ सात दिनों के पश्चात् सिद्ध हुए मित्रों से धनुष-सिद्धि का समाचार जानकर सूर्यप्रभ उन मित्रों और मय आदि के साथ सुमेरु के तपोवन में लौट आये ॥१ ८॥ वहाँ पर सुमेरु ने उनसे कहा कि तुम्हारे मित्रों ने वेणु-दंड के रक्षक चंड-दंड को जीत लिया, यह आश्चर्य की घटना है ॥१ ९॥ ४२

३३० कथासरित्सागर

३३० कथासरित्सागर तस्यास्ति मोहिनी नाम विद्या तेन स दुर्जयः। नूनं सा स्थापिता तेन प्रधानस्य रिपोः कृते॥११०॥ अत प्रयुक्ता नैतेषु स्वद्वयस्येषु सम्प्रति। सकृच्च हि सा तस्य फलदा न पुनः पुनः॥१११॥ गुरावेव हि सा तेन प्रभावावेक्षणाय भोः। प्रयुक्ताऽभूवत क्षापस्तेन वसोऽस्य तादृशः॥११२॥ तच्चिन्त्यमेतद्विद्यानां प्रभावो हि दुरासदः। तत्कारणं च भवता पृच्छ्यतां भगवान् मयः॥११३॥ अस्याग्रे किमूहं वच्मि कः प्रदीपो रखेः पुरः। एवं सुमेरुणा सूर्यप्रभस्योक्ते मयोऽब्रवीत्॥११४॥ सत्यं सुमेरूमोक्तं ते सङ्क्षेपाच्छृणु वच्म्यहम्। 'अव्यक्तात् प्रभवन्तीह तास्ताः शक्त्यनुशक्तयः॥११५॥ तत्रोद्गतः प्राणशक्तेर्नादो बिन्दुपधाश्रितः। विद्यादिमन्त्रतामेति परतत्त्वकलान्वितः॥११६॥ साक्षां च मन्त्रविद्यानां ज्ञानेन तपसापि वा। सिद्धांश्या वा सिद्धानां प्रभावो दुरतिक्रमः॥११७॥ तत्पुत्र सर्वविद्यास्ते सिद्धा द्वाभ्यां तु हीयसे। मोहिनीपरिवर्त्तिन्यौ न विद्ये साधिते त्वया॥११८॥ याज्ञवल्क्यश्च त वेत्ति तद् गच्छ प्रार्थयस्व तम्' । एव मयोक्त्या तस्यायेंययौ सूर्यप्रभोऽन्तिकम्॥११९॥ स मुनिस्तं च सप्ताहं निवास्य भुजगह्रदे। अग्निमभ्ये भ्यहं चैव तपश्चर्यमकारयत्॥१२०॥ ददौ सोढाद्बिदंशस्य सप्ताहाच्चास्य मोहिनीम्। विद्यां विसोढवह्न्यर्चि भ्याहाद्विपरिवर्त्तिनीम्॥१२१॥ प्राप्तविद्यस्य भूयोऽपि दक्षिणाद्रुतप्रधानम्। तस्यादिदेश स मुनिः स तथेत्यकरोञ्च तत्॥१२२॥ तत्तारणं च महापद्मविमानं तस्य कामगम्। अभूदुपगतं सूर्यप्रभस्य गगनचरम्॥१२३॥ अष्टोत्तरेण पत्राणां पुराणां च शतेन यत्। असङ्ख्य महारत्ननानारूपविनिर्मितम्॥१२४॥

अष्टम लम्बक २११

अष्टम लम्बक २११ उसके पास मोहिनी विद्या है, जिसके कारण वह जीता नहीं जा सकता। अनुमान है कि उस विद्या को उसने अवश्य ही प्रधान शत्रु के लिए सुरक्षित रखा होगा॥११०॥ इसीलिए, उसने तुम्हारे इन मित्र पर इस समय उसका प्रयोग नहीं किया, क्योंकि वह उस विद्या का एक ही बार प्रयोग कर सकता है, बार-बार नहीं॥१११॥ चंड-दंड ने गुरु पर ही उस विद्या का प्रभाव जानने के लिए उसका प्रयोग किया था। अतः गुरु ने ही उसे वैसा शाप दिया॥११२॥ यह विचारणीय है। ऐसी विद्याओं का प्रभाव कठिनाई से ही प्राप्त होता है। इसका कारण आप लोग मय से पूछें। उसके रहते मैं क्या कहूँ। सूर्य के सामने दीपक की क्या बात है? सूर्यप्रभ से सुमेरु के ऐसा कहने पर मय ने कहा—॥११३-११४॥ 'सुमेरु ने सच कहा है, इसे मैं बताता हूँ, सुनो। अव्यक्त परमात्मा से वे शक्तियाँ और अनुषक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। उसी अव्यक्त से बिन्दु-मात्र पर आवृत्त प्राण-शक्ति का उद्गम हुआ। वही परमात्मतत्त्व की कला से युक्त होकर विद्या के मन्त्रों का रूप धारण करती है॥११५-११६॥ उन्हीं मन्त्र-विद्याओं के ज्ञान में या तप से अथवा सिद्धा की आज्ञा से सिद्धि प्राप्त करने वालों का प्रभाव बहुत कठिन हो जाता है॥११७॥ तो हे पुत्र, तूने सभी विद्याओं की साधना तो कर ली और वे सिद्ध भी हो गईं। किन्तु, दो विद्याएँ अभी तुझे नहीं आईं—एक मोहिनी और दूसरी परिवर्त्तिनी। इनकी सिद्धि तूने नहीं की है॥११८॥ इन दोनों विद्याओं को याज्ञवल्क्य ऋषि जानता है। अतः उसके समीप जाकर उससे प्रार्थना करो। मय के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ याज्ञवल्क्य ऋषि के पास गया॥११९॥ उस मुनि याज्ञवल्क्य ने सूर्यप्रभ को सात दिनों तक अग्नि में रखकर तपस्या कराई॥१२०॥ ज्वाला के दर्शन का सहन किये हुए सूर्यप्रभ को सात दिनों में मोहिनी विद्या और तीन दिनों तक अग्नि-ताप सहन कर लेने पर विपरिवर्त्तिनी विद्या उस थी॥१२१॥ विद्या प्राप्त कर लेने पर मुनि ने उसे फिर अग्नि-कुण्ड में प्रवेश करने के लिए कहा और उसने आज्ञानुसार अग्नि में प्रवेश किया॥१२२॥ उसी क्षण सूर्यप्रभ को इच्छानुसार चलनेवाला महापद्म नामक आकाश-यान प्राप्त हुआ। यह विशाल एक सौ आठ पंगोंवाला था और एक-एक पग में एक-एक नगर था। इस प्रकार, सौ नगर उसमें बने थे। अनेक प्रकार के रत्न उसमें जड़े हुए थे और विचित्र प्रकार से उसकी रचना की गई थी॥१२३-१२४॥

३३२ कथासरित्सागर

३३२ कथासरित्सागर

चक्रवर्त्तिविमानं ते सिद्धमेतदमूष्य च। पुरेष्वन्तःपुराख्येषु सर्वेषु स्थापयिष्यसि ॥१२५॥ येन तान्यप्रधृष्याणि भविष्यन्ति भवद्विषाम्। इत्यन्तरिक्षाद्गीर् समुवाचाथ सरस्वती ॥१२६॥ ततः स याज्ञवल्क्यं स गुरुं प्रह्वो व्यजिज्ञपत्। आदिश्यतां प्रयच्छामि कीदृशीं दक्षिणामिति ॥१२७॥ निजाभिषेककाले मां स्मरेरेषैव दक्षिणा। गच्छ तावत् स्वकं सैन्यमिति तं सोऽब्रवीन्मुनिः ॥१२८॥ मत्वा ततस्तं स मुनिं विमानं चाधिरुह्य तत्। तत्सुमेरुनिवासस्थं सैन्यं सूर्यप्रभो ययौ ॥१२९॥ तत्राख्यातस्ववृत्तान्तं ससुनीथसुमेरवः। सिद्धविद्याविमानं तमभ्यनन्दन् मयादयः ॥१३०॥ ततः सुनीथः सस्मार तं सुवासकुमारकम्। स चागत्य मयादींस्ताञ्जगादैव सरात्रकान् ॥१३१॥ सिद्धं विमानं विद्याश्च सर्वाः सूर्यप्रभस्य तत्। उदासीनाः किमद्यापि स्थिताः स्थ रिपुनिर्जये ॥१३२॥ तच्छ्रुत्वा स मयोऽवादीद्युक्तं भगवतोदितम्। किन्तु प्राक्प्रेष्यतां दूतो नीतिस्तावत् प्रयुज्यताम् ॥१३३॥ एवं मयासुरेणोक्ते सोऽब्रवीन् मुनिपुत्रकः। अस्मद्देवं का क्षतिस्तर्हि प्रहस्तः प्रेष्यतामयम् ॥१३४॥ एष सप्रतिभो वाग्मी गतिज्ञः कार्यकाक्षयोः। कर्मक्षमश्च सहिष्णुश्च सर्वदूतगुणान्वितः ॥१३५॥ इति तद्वचनं सर्वे श्रद्धाय व्यसृजंस्ततः। प्रहस्तं दत्तसन्देशं वीराय श्रुतशर्मणे ॥१३६॥ तस्मिन् गतेऽब्रवीत् सूर्यप्रभस्तान्निखिलाभिजान्। श्रूयतां यन्मया दृष्टमपूर्वं स्वप्नकौतुकम् ॥१३७॥ 'जानेऽद्य क्षीयमाणायां पश्यामि रजनावहम्। यावन्महाजलौघेन वयं सर्वे ह्रियामहे ॥१३८॥ ह्रियमाणाश्च नृत्यामो न मज्जामः कथञ्चन। अथाद्य स परावृत्तः प्रतिकूलेन वायुना ॥१३९॥

अष्टम लम्बक १३३

अष्टम लम्बक १३३ इतने में आकाशवाणी हुई कि यह चक्रवर्ती विमान तुम्हें सिद्ध हुआ है। इसके सभी नगरों (पुरा) में अपनी-अपनी रानियाँ रखोगे तो वे शत्रुओं की बाधा से सुरक्षित रहेंगी ॥१२५ १२६॥ तब उसने प्रणाम करके गुरु याज्ञवल्क्य से निवेदन किया कि आज्ञा दीजिए कि किस प्रकार गुरु-दक्षिणा अर्पण करूँ ॥१२७॥ अपने चक्रवर्ती-अभिषेक के समय मुझे स्मरण करना यही मेरी दक्षिणा है। अब तुम अपने सेना शिविर में जाओ ॥१२८॥ मुनि के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ मुनि को प्रणाम कर और उस विमान पर बैठकर सुमेरु के आश्रम में स्थित अपने सेना-शिविर में आया ॥१२९॥ वहाँ सब समाचार सुनाते हुए उसे मय सुनीथ और सुमेरु ने विमान और विद्या प्राप्ति पर बधाई दी ॥१३० ॥ तब सुनीथ ने सुवासकुमार का स्मरण किया। उसने आकर मय आदि तथा अन्य राजाओं से कहा—'सूर्यप्रभ को विमान भी सिद्ध होगया और सब विद्याएँ भी सिद्ध हो गईं। अब आप लोग शत्रु पर विजय प्राप्त करने में उदासीन क्यों हो रहे हैं ? ॥१३१ १३२॥ यह सुनकर मय ने कहा— आपने सच कहा किन्तु पहले दूत भेजा जाय तो ठीक हो। यहाँ नीति का प्रयोग करना चाहिए' ॥१३३॥ यह सुनकर मुनि-पुत्र ने कहा—'ऐसा ही करो। हानि क्या है ? प्रहस्त को दूत के रूप में भेजो' ॥१३४॥ यह (प्रहस्त) प्रतिभाशाली गम्भीर भाषण करनेवाला कार्य और काल की स्थिति को जाननेवाला कठोर और सहिष्णु है। इसमें दूत के सभी गुण हैं' ॥१३५॥ इस प्रकार, सुवासकुमार के वचनों पर श्रद्धा करके मय आदि ने सन्देश देकर प्रहस्त को श्रुतशर्मा के प्रति भेजा ॥१३६॥ उसके चले जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने उन सभी साथियों से कहा— मैंने आज जो एक कौतूहलपूर्ण सपना देखा है उसे सुनिए—'आज रात के अन्त में मैंने देखा कि हम सभी प्रबल जल- धारा में बहे जा रहे हैं। बहाये जाने हुए हमलोग नाच रहे हैं पर डूबते नहीं। कुछ समय बाद उस जलका प्रवाह विपरीत वायु के कारण बदल गया ॥१३७-१३९॥

११४ कथासरित्सागर

११४ कथासरित्सागर

ततः केनापि पुरुषेणैत्य ज्वलिततेजसा। उद्धृत्य वह्नौ क्षिप्ताः स्मो न च दह्यामहेऽग्निना ॥१४०॥ एत्याथ मेघो रक्तौघं प्रवृष्टस्तेन चासृजा। व्याप्ता दिशस्ततो निद्रा नष्टा मे निशया सह ॥१४१॥ इत्युक्तवन्तं तं स्माह स मुनिकुमारकः। 'आयासपूर्वोऽभ्युदयः स्वप्नेनानेन सूचितः ॥१४२॥ यो बलीयः स संग्रामो धैर्यं सद्यदमज्जनम्। नृत्यतो ह्रियमाणानां जलैस्तत्परिवर्तकः ॥१४३॥ यो युष्माकं महत् सोऽपि शरणं कोऽपि रक्षिता। यश्चोद्धर्त्ता ज्वलत्तेजाः पुमान् साक्षात् स शङ्करः ॥१४४॥ क्षिप्ताः स्वाग्नौ च यत्तेन तच्छस्ताः स्थ महामृधे' । मेघोद्यस्ततो यच्च स भूयोऽपि भयागमः ॥१४५॥ रक्तौघवर्षर्ण यच्च तदुभयस्य विनाशनम्। दिशां यद्रक्तपूर्णत्वमृद्धिः सा महती च वः ॥१४६॥ स्वप्नश्चानेकधान्यार्थो यथार्थोऽन्यार्थ एव च। यः सद्यः सूचयत्यर्थमन्यार्थं सोऽभिधीयते ॥१४७॥ प्रसन्नदेवतावेशरूपः स्वप्नो यथार्थकः। गाढानुभवचिन्ताविष्कृतमाहुरपार्थकम् ॥१४८॥ रजोमूढेन मनसा बाह्यार्थविमुखेन हि। जन्तुर्निद्रावशः स्वप्नं तैस्तैः पश्यति कारणैः ॥१४९॥ चिरशीघ्रफलत्वं च तस्य कालविशेषतः। एष रात्र्यन्तदृष्टस्तु स्वप्नः शीघ्रफलप्रदः ॥१५०॥ एतन्मुनिकुमारात्ते श्रुत्वा तस्मात् सुनिर्वृताः। उत्थाय दिनकर्तव्यं व्यधुः सूर्यप्रभादयः ॥१५१॥ तावत् प्रहस्तः प्रत्यागाच्छ्रुतशर्मसकाशतः। पृष्टो मयादिभिश्चैवं यथावृत्तमवर्णयत् ॥१५२॥ 'इतो गतोऽहं तरसा त्रिकूटाचलवर्त्तिनीम्। तां त्रिकूटपताकाख्यां नगरीं हेमनिर्मिताम् ॥१५३॥

१ महासंग्रामे।

अष्टम लम्बक ११५

अष्टम लम्बक ११५

तब किसी जाज्वल्यमान पुरुष ने आकर हमलोगों को जल से निकालकर आग में फेंक दिया। किन्तु, वहाँ पर भी हम आग में जले नहीं ॥१४०॥

इसके बाद घटा घिर आई और उसने रक्त की वर्षा की जिससे सारी दिशाएँ रक्तमय हो गईं। और, रात के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई, प्रातःकाल हो गया' ॥१४१॥

ऐसा कहते हुए सूर्यप्रभ से सुवासकुमार ने कहा—'इस स्वप्न से कठिन परिश्रम द्वारा अभ्युदय की सूचना मिलती है ॥१४२॥

जो पानी का प्रवाह था वह संग्राम का सूचक था। नहीं डूबना धैर्य का सूचक था। जो नाचते हुए और बहते हुए तुम लोगों को वायु ने विपरीत दिशा में बदल दिया वह तुम्हें कोई शरण देनेवाला रक्षक है। जो ऊर्ध्वरेता तेज से जलते हुए पुरुष थे वह साक्षात् शंकर भगवान् हैं। उसने तुम्हें अग्नि में फेंका वह तुम्हें महासंग्राम में झोंका। मेघों का उमड़ना किसी भय का सूचक था और रक्त-वृष्टि का होना भय के विनाश का सूचक था। इसी प्रकार, दिशाओं का लाल हो जाना तुम्हारी समृद्धि या अभ्युदय का सूचक हुआ ॥१४३-१४६॥

स्वप्न कई प्रकार के होते हैं—जैसे अपार्थ यथार्थ और अपार्थ। जिसका फल तुरन्त होता है, वह अयथार्थ है। प्रसन्न हुए देवता आदि का आदेश यथार्थ होता है। गम्भीर अनुभव और चिन्ता आदि से होनेवाला स्वप्न अपार्थ है ॥१४७-१४८॥

रजोगुणप्रधान और बाह्य विषयों से विमूढ़ प्राणी निद्रा के वश में होकर उन-उन कारणों से स्वप्न देखता है ॥१४९॥

स्वप्नों का विलम्ब से अथवा तुरन्त फल मिल जाना समय-भेद से होता है। रात्रि के अन्त में देखा हुआ यह स्वप्न शीघ्र फल देनेवाला है' ॥१५०॥

मुनि-कुमार से यह सुनकर सूर्यप्रभ आदि प्रसन्न हुए और उठकर अपने-अपने दैनिक कार्यों में लग गये ॥१५१॥

इतने में ही श्रुतशर्मा के पास से प्रहस्त लौट आया और मय आदि के पूछने पर वहाँ जो कुछ हुआ कहन लगा—॥१५२॥

यहाँ से मैं वेग के साथ त्रिकूट पर्वत स्थित सोने की बनी विद्युत्प्रभाका नाम की नगरी को गया ॥१५३॥

१६४ कथासरित्सागर

१६४ कथासरित्सागर तस्यां प्रविश्य चापश्यमहं क्षत्तृनिवेदितः। वृतं च श्रुतशर्माणं तैस्तैर्विद्याधराधिपैः ॥१५४॥ पित्रा त्रिकूटसेनेन तथा विक्रमशक्तिना। पुरन्धरेण चान्यैश्च शूरैर्दामोदरादिभिः ॥१५५॥ उपविष्टामथ तमहं श्रुतशर्माणमभ्यधाम्। श्रीमता प्रहितं सूर्यप्रभेणाहं स्वदन्तिकम् ॥१५६॥ सन्दिष्टं तन् चेद ते प्रसादाद् धूर्जटेर्मया। विद्या रत्नानि भार्याश्च सहायाश्चैव साधिताः ॥१५७॥ तदेहि मिल सैन्ये मे सहेतैः खेचरेश्वरैः। निहन्ताहं विरुद्धानां रक्षिता नमतां पुनः ॥१५८॥ या चागम्या हृतास्ताते सुनीथतनया त्वया। कामचूडामणिः कन्या मुञ्च तामशुभं हि तत् ॥१५९॥ एव मयोक्ते सर्वे ते क्रुद्धास्तत्रैवमभ्यधुः। को नाम स यदस्मासु दर्पात् संदिशतीदृशम् ॥१६०॥ मर्त्येषु सन्दिग्धत्वेव कस्तु विद्याधरेषु सः। वराको मानुषो भूत्वाप्येवं दृप्यन्विनङ्क्ष्यति ॥१६१॥ तच्छ्रुत्वोक्तं मया किं किं को नाम स निशम्यताम्। स हरेणेह युष्माकं चक्रवर्ती विनिर्मितः ॥१६२॥ मर्त्यो वा यदि तन्मर्त्यैर्देवत्वमपि साधितम्। विद्याधरैश्च मर्त्यस्य तस्य दृष्टः पराक्रमः ॥१६३॥ माशङ्केहागते तस्मिन् कदाचिद् वो हि दृप्यते। इत्यवोक्ते मया क्रुद्धा सा सभा क्षोभमाययौ ॥१६४॥ अधावतां च हन्तुं मां श्रुतशर्मधुरन्धरौ। एवं पश्यामि शौर्यं वामित्यवोचमहं च तौ ॥१६५॥ ततो दामोदरेणैताबुत्थाय विनिवारितौ। शान्तं दूतश्च विप्रश्च न वध्य इति जल्पता ॥१६६॥ ततो विक्रमशक्तिर्मामब्रवीद् गच्छ दूत भोः। स्वस्वामीव हि सर्वेऽपि वयमीश्वरनिर्मिताः ॥१६७॥ तदायातु स पश्यामस्तस्यातिथ्यक्षमा वयम्। एवं सगर्वं तेनोक्ते विहसन्नहमब्रुवम् ॥१६८॥

अष्टम लम्बक १३७

[header] अष्टम लम्बक १३७ [/header]

वहाँ जाकर प्रतीहार से सूचित और सभागृह में गए हुए मैंने उन विद्याधर-राजाओं से घिरे हुए श्रुतशर्मा को देखा ॥१५४॥

पिता त्रिकूट, सेनापति विक्रमशक्ति और दामोदर आदि शूरवीर उसके समीप बैठे थे। तदनन्तर, आसन पर बैठकर मैंने श्रुतशर्मा से कहा—'मुझे श्रीमान् सूर्यप्रभ ने दूत के रूप में आपके पास भेजा है और आपके लिए उन्होंने सन्देश दिया है कि मैंने शिवजी की कृपा से विद्या, रत्न, भार्या और सहायक सिद्ध कर लिये। इसलिए, तुम भी इन विद्याधरों के साथ मेरी सेना में आकर मिलो। मैं विरोधियों का घातक और नम्रों का रक्षक हूँ ॥१५५-१५८॥

तुमने अनजान में मुनीश की अगम्या कन्या कामचूडामणि का जो अपहरण किया है, उसे मुक्त करो। यह कार्य तुम्हारे लिए अशुभ है॥१५९॥

मेरे ऐसा कहने पर वे सब क्रुद्ध होकर बोले—'वह कौन होता है, जो घमंड के साथ हमें यह सन्देश भेजता है॥१६०॥

वह मनुष्यों के लिए ऐसा सन्देश दे। विद्याधरों में इस प्रकार का सन्देश देनेवाला वह कौन होता है। मनुष्य होकर ऐसा घमंड करता हुआ वह बेचारा नष्ट हो जायगा' ॥१६१॥

यह सुनकर मैंने कहा—'क्या कहा वह कौन होता है? तो सुनो, शिवजी ने अब उन्हें तुम लोगों का चक्रवर्ती बनाया है॥१६२॥

यदि वे मनुष्य हैं तो क्या? मनुष्यों ने तो देवत्व भी सिद्ध कर लिया है और विद्याधरों ने उस मनुष्य का पराक्रम देख लिया है॥१६३॥

उसके यहाँ आने पर तुम लोगों का विनाश होगा, यह निश्चित है। मेरे ऐसा कहने पर वह सारी सभा क्षुब्ध होगई ॥१६४॥

और, श्रुतशर्मा तथा शूरवीर मुझे मारने के लिए दौडे। 'यही आपकी वीरता है?' इस प्रकार मेरे कहने पर दामोदर ने उन्हें रोका तथा शान्त किया और कहा—दूत और ब्राह्मण दोनों अवध्य हैं। उन्हें न मारना चाहिए' ॥१६५-१६६॥

तब विक्रमशक्ति ने मुझसे कहा—'हे दूत, तुम जाओ। तुम्हारे स्वामी के ही समान हम सब भी ईश्वर के बनाये हुए हैं॥१६७॥

'वह आवे। हम सब उसका आतिथ्य करने में समर्थ हैं।' गर्व के साथ उसके इस प्रकार कहने पर मैंने हँसते हुए कहा—॥१६८॥

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३३८ कथासरित्सागर

३३८ कथासरित्सागर शंखाः पश्यन्ते तावन्मात्र कुर्वन्ति सुस्थिताः । यावत् पश्यन्ति नायान्तं मेघमाच्छादिताम्बरम् ॥१६९॥ इत्युक्त्वोत्थाय सावक निर्गत्याहमिहागतः । एवम् प्रहस्ताच्छ्रुत्वा तैस्तुष्टिः प्रापि मयादिभिः ॥१७०॥ निश्चित्य चाह्वोद्योगं सर्वे सेनापति व्यधुः । प्रभासमथ ते सूर्यप्रभाद्या रणदुर्मदम् ॥१७१॥ सर्वे च रणदीक्षायां ते सुवासकुमारातः । निदेशं प्राप्य तवह प्राविशन्नियतव्रताः ॥१७२॥ रात्री सूर्यप्रभश्चात्र शतंरम्यागृहान्तरम् । प्रविष्टामीक्षतापूर्वमिन्द्रो वरकन्यकाम् ॥१७३॥ सा तस्य व्याजसुप्तस्य प्रसुप्तसखिस्य च। स्वैरं निकटमागत्य सखीमाह सहस्मिताम् ॥१७४॥ यदि सुप्तस्य विश्रान्तविलासा'पीयमीदृशी । रूपशोभास्य तत् कीदृक् प्रबुद्धस्य भवेत् सखि ॥१७५॥ तवस्तु न प्रबोध्योऽसौ पूरितं कौतुकं दृशोः । अधिकं हि निमज्जेत किमत्र हृदयेन मे ॥१७६॥ भविष्यत्यस्य संग्रामः समं हि श्रुतशर्मणा । तत्तत्र को विजानाति भाविता किल कस्य किम् ॥१७७॥ प्राप्तव्ययाय शूराणां जायते हि रणोत्सवः । तत्रास्यास्तु शिवं तावत् ततो ज्ञास्यामहे पुनः ॥१७८॥ कामचूडामणियेन किं च व्योमविहारिणा । दृष्टा तस्यास्य हृदयं मादृशी का नु रञ्जयेत् ॥१७९॥ एव तयोक्ते साचावीत् तद् सखी किं ब्रवीष्यतः । असङ्गो हृदयस्यास्मिन्नायत्तश्चण्डि किं तव ॥१८०॥ येन दृष्टेन हृदयं कामचूडामणेह तम् । सोऽप्यस्या न हरेत् कस्या यदि साक्षादरुन्धती ॥१८१॥ विद्याबलाच्च कल्याणं वेत्सि किमास्य सङ्गरे । एतस्य भार्यादृषोक्ताः स्वं सिद्धं सम्भ्रमातिनः ॥१८२॥ १ विश्रान्तः व्यपगतः, विलासो यस्याः, रूपशोभाया विशेषचन् ।

'हंस पद्मवन में तभी तक निश्चिन्तता से बोलते हैं, जबतक आकाश को ढकनेवाले मेघ उन्हें नहीं दीखते ॥१६९॥ वज्रप्रभ के साथ ऐसा कहकर और उठकर मैं चला आया। प्रहस्त द्वारा यह समाचार सुनकर मय आदि ने सन्तोष प्रकट किया ॥१७०॥ तदनन्तर, युद्ध की तैयारी का निश्चय करके सूर्यप्रभ आदि ने युद्ध में पूर्वम प्रभास को सेनापति बनाया ॥१७१॥ अन्य सभी सुवासकुमार से आज्ञा लेकर उस दिन नियम के साथ (विधि-पूर्वक) रण-दीक्षा में दीक्षित हुए ॥१७२॥ नियमानुसार रात्रि में शयन-गृह में जाकर सूर्यप्रभ ने निद्रा-रहित रहकर एक सुन्दरी कन्या को वहाँ देखा ॥१७३॥ वह कन्या जान-बूझकर सोये हुए मन्त्रियोंवाले सूर्यप्रभ के पास आकर साथ खड़ी हुई सखी से कहने लगी—॥१७४॥ 'हे सखि यदि सोये हुए अतएव विकास-रहित (निश्चेष्ट) इसकी रूपशोभा ऐसी है, तो जगी हुई दशा की शोभा कैसी होगी ॥१७५॥ अब रहने दो इसे मत जगाओ आँखों का कौतूहल पूरा हो गया। इसके साथ अधिक दृग्मयता से हृदय को बाँधने से क्या काम है ? ॥१७६॥ श्रुतिधर्मा के साथ होनेवाले युद्ध में कौन जानता है कि किसका क्या होगा ? ॥१७७॥ युद्धोत्सव शूरों के प्राण विनाश के लिए होता है। इसका (सूर्यप्रभ का) भी जाने क्या होगा। इसका कल्याण हो ॥१७८॥ जिस इस आकाशचारी ने कामचूड़ामणि को देखा है, वहाँ मुझ जैसी इसका क्या हृदय- रंजन कर सकती है ? ॥१७९॥ उसके ऐसा कहने पर उसकी सखी ने कहा—'सखि ऐसा क्या कह रही हो क्या तुम्हारा हृदय उसके प्रति आसक्त नहीं हुआ ? ॥१८०॥ जिसने देखते ही कामचूड़ामणि का हृदय हरण कर लिया वह किसका हृदय हरण नहीं कर सकता। भले ही वह सरस्वती क्यों न हो। क्या तू अपनी विद्या के प्रभाव से युद्ध में होनेवाले इसके कल्याण को नहीं जानती ? सिद्धों ने तुम सभी को इसी चक्रवर्ती की भार्या बनाया है ॥१८१ १८२॥

३१० कथासरित्सागरः

३१० कथासरित्सागरः साक्षाद्ब्रह्माभिगम्यश्च मन्त्रना चक्षुरादयः। यावच्च गणिताश्चात्र निष्पन्नेन सुरासुराः॥१८३॥ मर्त्याणामाधिपं यद्ध नहि सिद्धवधो मृषा। किं चादृष्टं श्रुतंमया विस्मयस्यास्य तन्महत् ॥१८४॥ माहात्म्यं भवती यं हि रूपेणाभ्यधिकानघे। मानवाकारता वा मे प्रियस्या यदि तत् सत् ॥१८५॥ ततो हि निखिला भाग्य गतीनामस्ति बाधकः। एतत्तद्भाषितं श्रुत्वा सावाधद्धरकन्यका ॥१८६॥ सखे येन समो भर्त्ता मयार्य मेऽन्यवद्युभिः। मर्त्यं मानुषगोत्रोत्थं जगं जाने स्वविद्यया ॥१८७॥ भिन्दन्मि धारणे ग्लानिं शिक्षाणाञ्चापि किं पुनः। नैतद्योग्यञ्च विज्ञातेण मे दूयते मनः ॥१८८॥ पश्चात्पश्चाद्गिरौ तस्मिं स्तर्सा सार्धं रतिं गुहान्तरे। चित्रार्पित गुणाभाजनं ननर्तिता एव सा ॥१८९॥ रामेण सागरेणू गत्वा सत्र शचींपीयैदि। सत्र तत् प्रभातवत्तारा प्रातरग यदाह्वयः ॥१९०॥ एतच्छ्रुत्वासित सखना व्याजगाद्रौ स वत्सितः। सूर्यप्रभं समिगत्य तामुपाचात वचफाम् ॥१९१॥ दर्शितोऽस्मिन् शुभानि पञ्चाशतो मयि त्वया। तद्येव तत्र गच्छामि कापि लम्बिति संशये ॥१९२॥ एतच्छ्रुत्वा भूतै सर्वगतोऽति प्रपानता। तूष्णीं बभूव सा कन्या तत्सखी तु जगाद सा ॥१९३॥ एषा विद्याधरेन्द्रस्य सुमेरोरनुजात्मजा। कन्या विलासिनी नाम त्वद्दर्शनमकौतुका ॥१९४॥ एवमुक्तवतीमेव तां सखीं सा विलासिनी। 'एहि सम्प्रति गच्छाम' इत्युक्त्वा प्रययौ ततः ॥१९५॥ ततः प्रभासाविभ्यस्तद् प्रबोध्य तदुदीरितम्। सूर्यप्रभः स्वमन्त्रिभ्यः शशंसौषधिसाधनम् ॥१९६॥ चिरायन्ते प्रहस्तं च योग्यं तत्साधनाय सः। तदाख्यातं सुनीथस्य सुमेरोश्च मयस्य च ॥१९७॥

अष्टम लम्बक ३४१

अष्टम लम्बक ३४१

कामचूडामणि तू और सुप्रभा एक ही गोत्र में उत्पन्न हुई हो। इसने इन्हीं दिनों में सुप्रभा का विवाह किया है। तो क्या युद्ध में इसका कल्याण नहीं होगा। सिद्धों की वाणी व्यर्थ नहीं जाती। फिर, सुप्रभा ने इसका चित्त-हरण किया है, तो उससे इसका क्या ? ॥१८४-१८७॥ क्या तू इसका चित्त हरण नहीं कर सकती ? क्योंकि तू रूप में उससे अधिक सुन्दरी है। अपने बन्धु-बान्धवों के कारण यदि तुझे सन्देह है, तो यह ठीक नहीं ॥१८५॥ सती स्त्रियों का पति के सिवाय और कोई बन्धु नहीं है। सखी की यह बात सुनकर वह सुन्दरी कन्या बोली—॥१८६॥ 'हे सखि तूने सच कहा। मुझे अन्याय्य बन्धु-बान्धवों से क्या प्रयोजन ? मैं अपनी विद्या के प्रभाव से जान रही हूँ कि युद्ध में आर्यपुत्र की जीत होगी ॥१८७॥ उसे विद्याधर-चक्रवर्ती होने के कारणभूत सभी रत्न सिद्ध हो चुके हैं और विद्याएँ भी सिद्ध हो गई हैं, किन्तु ओषधियाँ उसे अभी सिद्ध नहीं हुई हैं। इससे मन कुछ व्याकुल है ॥१८८॥ वे सभी ओषधियाँ चन्द्रपाद नामक पर्वत पर गुफा के अन्दर रखी हैं। वे ओषधियाँ किसी पुण्यात्मा चक्रवर्ती को ही सिद्ध होती हैं ॥१८९॥ यदि यह अभी जाकर उन सब ओषधियों को सिद्ध करे, तो इसका कल्याण हो। क्योंकि प्रातःकाल ही इसका युद्ध प्रारम्भ होगा' ॥१९०॥ यह सुनकर, जान-बूझकर सोया हुआ सूर्यप्रभ उठकर उस कन्या से नम्रता के साथ बोला—'हे सुलोचने तून मुझपर अत्यधिक पक्षपात प्रकट किया है। इसलिए मैं अभी वहीं (चन्द्रपाद गिरि पर) जाता हूँ। अब सुबता कि कौन है? ॥१९१-१९२॥ उसकी बातें सुनकर वह कन्या इसलिए लजा गई कि सूर्यप्रभ ने उसकी सारी बातें सुन लीं। अतः वह चुप हो गई। तब उसकी सखी ने सूर्यप्रभ से कहा—॥१९३॥ 'यह विद्याधरों के राजा सुमेरु के छोटे भाई की कन्या विलासिनी है। तुम्हें देखने को बहुत उत्सुकता थी' ॥१९४॥ वह विलासिनी इस प्रकार कहती हुई सहेली को 'आओ चलें' कहकर वहाँ से चली गई ॥१९५॥ तब सूर्यप्रभ ने प्रभास आदि मन्त्रियों को जगाकर ओषधियों की सिद्धि की चर्चा उनसे की ॥१९६॥ और, इनकी सिद्धि के लिए योग्य प्रहस्त को सुमेरु, मय और सुनीथ के समीप भेजा ॥१९७॥

१४२ कथासरित्सागर

१४२ कथासरित्सागर

तैरागतैः सह्याने समं स सचिवान्वितः । निशि सूर्यप्रभः प्रायाच्चन्द्रपादाचलं प्रति ॥१९८॥ गच्छतां च श्रमात्तेषामुतस्थुर्मार्गरोधिनः । यक्षगुह्यककूष्माण्डा विघ्ना नानायुधोद्यताः ॥१९९॥ कांश्चिच्छस्त्रैर्विमोह्यास्थान् कांश्चित् संस्तभ्य विद्यया । चन्द्रपादगिरिं तं ते प्रापुः सूर्यप्रभादयः ॥२००॥ तत्रैषां तद्गुहाद्वारप्राप्तानां शाङ्करा गणाः । एत्य प्रवेशं रुरुधुर्विचित्रविकृताननाः ॥२०१॥ एतैः सह न योद्धव्यं कुप्येद्धि भगवान् हरः । तस्मादष्टसहस्रेण तमथ वरदं स्तुमः ॥२०२॥ तेनैव ते प्रसीदन्ति तद्गणा इत्यवोचत । स सुवासकुमारस्तानथ सूर्यप्रभाविकान् ॥२०३॥ ततस्तथेति सर्वे ते समेत्य हरमस्तुवन् । स्वामिस्तुतिप्रसन्नाश्च तान् वदन्ति स्म ते गणाः ॥२०४॥ मुक्तैषा भो गुहास्माभिर्गृहीतास्यां महौषधीः । सूर्यप्रभेण स्वेनैत्या न प्रवेष्टव्यमात्मना ॥२०५॥ प्रभासः प्रविशत्वेतामेतस्य सुगमा ह्यसौ । एतद्गणवचः सर्वे ते तथेत्यनुमेनिरे ॥२०६॥ ततः प्रविशतस्तस्य प्रभासस्य तदैव सा । गुहा बह्वन्धकारापि सुप्रकाशा किमप्यभूत् ॥२०७॥ उत्थाय च महाघोररूपा अप्यत्र राक्षसाः । चत्वारः निष्ठुरा ऊचुः प्रणता प्रविशेति तम् ॥२०८॥ अथ प्रविश्य संगृह्य दिव्याः सप्तौषधीः स ताः । प्रभासो निर्गतः सूर्यप्रभाय निखिला ददौ ॥२०९॥ महाप्रभावाः सप्तैताः सिद्धाः सूर्यप्रभस्य ताः । ओषध्य इति तत्कालं गगनादुदनादयत् ॥२१०॥ तच्छ्रुत्वा मुदिताः सूर्यप्रभाद्याः सर्व एव ते । स्वसैन्यमायुः क्षिप्रं सुमेर्वास्पदमश्रितम् ॥२११॥ तत्रापृच्छत् सुनीतोऽथ तं सुवासकुमारकम् । मुने सूर्यप्रभं हित्वा प्रभासः किं प्रवेशितः ॥२१२॥

अष्टम लम्बक १४१

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इस बात पर विश्वास करके उन सब के जाने पर उनके वीर मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ रात्रि में ही चन्द्रपाद गिरि पर गया ॥१९८॥ जाते हुए उनके मार्ग में शस्त्र उठाये हुए यक्ष गुह्यक कूष्मांड आदि विघ्न करने के लिए खड़े हो गये ॥१९९॥ उनमें से कुछ को शस्त्रों से विवश करके और कुछ को विद्या-प्रभाव से मोहित करके सूर्यप्रभ आदि चन्द्रपाद गिरि पर पहुँच गये ॥२००॥ वहाँ गुफा के द्वार पर पहुँचने पर विचित्र आकृतिवाले शिवजी के गणों ने उन्हें गुफा में आने से रोका ॥२०१॥ 'इसके साथ युद्ध न करना चाहिए क्योंकि इससे भगवान् शिव क्रुद्ध हो जायेंगे। इसलिए शिव के अष्टोत्तर शत नाम के पाठ से उन्हीं वरदायक की स्तुति करते हैं। ये उनके गण इसी से प्रसन्न होते हैं' सुबाहुकुमार ने इस प्रकार सूर्यप्रभ आदि से कहा ॥२०२-२०३॥ तब वे इसी प्रकार शिव की स्तुति करने लगे। स्वामी की स्तुति से प्रसन्न होकर वे गण उनसे बोले—'हमने इस गुफा को छोड़ दिया है। आपलोग महौषधियों को लें किन्तु सूर्यप्रभ स्वयं उसमें प्रवेश न करें ॥२०४-२०५॥ केवल प्रभास ही उसमें जाय यह गुफा उसके लिए सुगम है। गणों की बातें सुनकर उन सब ने उसे स्वीकार किया ॥२०६॥ तदनन्तर प्रभास के प्रवेश करते ही वह अँधेरी गुफा कुछ प्रकाशित हो गई ॥२०७॥ गुफा के अन्दर बैठे हुए अति भयंकर रूपवाले चार राक्षस उठकर प्रणाम करते हुए उससे बोले—'आइए' ॥२०८॥ तब प्रभास ने अन्दर जाकर और उन दिव्य सात ओषधियों को लेकर और बाहर आकर उन्हें सूर्यप्रभ को दिया ॥२०९॥ उसी समय आकाशवाणी हुई कि ये सातों ओषधियाँ महाप्रभावशालिनी हैं। हे सूर्यप्रभ ये ओषधियाँ तुम्हें सिद्ध हो गई ॥२१०॥ यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न वे सभी वहाँ से चलकर सुमेध के आश्रम में स्थित अपने सेना शिविर में लौट आये ॥२११॥ वहाँ आकर सुनीथ ने सुबाहुकुमार से पूछा कि 'गुफा में सूर्यप्रभ को रोककर प्रभास को क्यों जाने दिया इन दोनों में क्या अन्तर है ?॥२१२॥

१४२ कथासरित्सागर

१४२ कथासरित्सागर

तैरागते तदह्नाने समं स सचिवान्वितः। निशि सूर्यप्रभः प्रायाच्चन्द्रपादाचलं प्रति॥१९८॥ गच्छतां च क्रमात्तेषामुत्तस्थुर्मार्गरोधिनः। यक्षगुह्यककूष्माण्डा विघ्ना नानायुधोद्यताः॥१९९॥ कांश्चिदस्त्रैर्विमोह्यैतान् कांश्चित् संस्तभ्य विद्यया। चन्द्रपादगिरिं तं ते प्रापुः सूर्यप्रभादयः॥२००॥ तत्रत्यां तद्गुहाद्वारप्राप्तानां शाङ्करा गणाः। एत्य प्रवर्त्त रुरुधुर्विचित्रविकृताननाः॥२०१॥ एतैः सह न योद्धव्यं कुप्येद्धि भगवान् हरः। तस्मादष्टसहस्रेण तमद्य परव स्तुमः॥२०२॥ येनैव ते प्रसीदन्ति तद्गणा इत्यबोचत। स सुवासकुमारस्तानथ सूर्यप्रभादिकान्॥२ ३॥ ततस्तथेति सर्वे त तथैव हरमस्तुवन्। स्वामिस्तुतिप्रसन्नाश्च तान् वदन्ति स्म ते गणाः॥२०४॥ मुक्तेयं भो गुहास्माभिर्गृहीतास्यां महौषधीः। सूर्यप्रभेण त्वेतस्यां न प्रवेष्टव्यमात्मना॥२०५॥ प्रभासः प्रविशत्वेतामेतस्य सुगमा ह्यसौ। एतद्गणवचः सर्वे ते तथेत्यनुमेनिरे॥२ ६॥ ततः प्रविशतस्तस्य प्रभासस्य तदैव सा। गुहा बद्धान्धकारापि सुप्रकाशा किमप्यभूत्॥२०७॥ उत्थाय च महाघोररूपा अप्यत्र राक्षसाः। चत्वारः किङ्करा ऊचुः प्रणताः प्रविशेति तम्॥२०८॥ अथ प्रविश्य संगृह्य दिव्याः सप्ताौषधीः स ताः। प्रभासो निर्गतः सूर्यप्रभाय निखिला ददौ॥२ ९॥ महाप्रभावाः सप्तैताः सिद्धाः सूर्यप्रभश्च ते। ओषध्य इति तत्कालं गगनादुदगाद्वाक्॥२१०॥ सञ्जातहर्षा मुदिताः सूर्यप्रभाद्याः सर्वे एव ते। स्वसैन्यमाययुः क्षिप्रं सुमेर्वास्पदमाश्रितम्॥२११॥ तत्रापृच्छत् सुनीतोऽथ तं सुवासकुमारकम्। मुने सूर्यप्रभं हित्वा प्रभासः किं प्रवेशितः॥२१२॥