कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
सप्तम लम्बक ४५
सप्तम लम्बक ४५ सच है सदाचारिणी स्त्रियां विरल होती हैं। प्रायः स्त्रियाँ चंचला (दुराचारिणी) ही होती हैं और विश्वास के योग्य भी नहीं होतीं। इस प्रसंग में यह भी एक कथा सुनें ॥२॥ संसार में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। प्राचीन समय में वहाँ निश्चयदत्त नाम का बनिया का बेटा रहता था ॥३॥ वह जुआरी था और प्रतिदिन जुए से धन जीतकर, क्षिप्रा नदी में स्नान और महाकालेश्वर शिव की पूजा करके ब्राह्मणों दीना एवं अनाथों को दान देकर चन्दन इत्र भोजन ताम्बूल आदि का व्यवहार करता था। (वह बहुत खर्चीला और शौकीन था) ॥४-५॥ वह निश्चयदत्त प्रतिदिन स्नान पूजा आदि करके महाकाल-मन्दिर के समीप श्मशान में जाकर शरीर में चन्दन लगाता था ॥६॥ वह युवक वैश्य उस श्मशान में खड़े एक पत्थर के खम्भे पर, चन्दन लगाकर उस पर अपनी पीठ रगड़ता था ॥७॥ प्रतिदिन पीठ के रगड़ने से वह खम्भा अत्यन्त चिकना और सुन्दर हो गया था। एक बार उस मार्ग से एक चित्रकार एक मूर्तिकार (संगतराश) के साथ उधर से आया ॥८॥ उसने खम्भे को खूब चिकना देखकर उस पर गौरी का चित्र बना दिया। मूर्तिकार ने भी क्रीड़ावश छेनी और हथौड़ी से उस खोदकर मूर्ति का रूप दे दिया ॥ ॥ उन दोनों के चले जाने पर महाकाल की पूजा के लिए आई एक विद्याधर-कन्या उधर आ निकली और उसने खम्भे पर पार्वती की खुदी हुई मूर्ति देखी ॥ ९ ॥ उसे बहुत चिकना देखकर और पार्वती का वास समझकर वह विद्याधरी महाकाल की पूजा करके उसी खम्भे में अदृश्य रूप से प्रवेश कर गई ॥११॥ इतने में ही वैश्य-पुत्र प्रतिदिन के नियमानुसार उस खम्भे पर आया और गौरी की खुदी हुई मूर्ति उसने देखी ॥१२॥ तब उसने शरीर पर चन्दन का लेप करके खम्भे की दूसरी ओर पीठ रगड़ना प्रारम्भ किया ॥१३॥ उसे पीठ रगड़ते हुए देखकर वह चंचलाक्षी विद्याधरी खम्भ के अन्दर बैठी हुई उस वैश्य की सुन्दरता से मोहित हो गई और सोचने लगी ऐसे सुन्दर युवक की पीठ पर चन्दन लगानेवाला कोई नहीं है। तब मैं ही इसकी पीठ पर चन्दन लगाती हूँ ॥१४ १५॥ ऐसा सोचकर और खम्भे के अन्दर से ही हाथ फैलाकर स्नेह से उसकी पीठ मलने लगी ॥१६॥
४६ कथासरित्सागर
४६ कथासरित्सागर तत्क्षणं लब्धसंस्पर्शं व्यक्तकङ्कणनिस्वनं । जग्राह हस्तं हस्तेन स तस्यास्त्वं वणिक्सुतः ॥१७॥ महाभागापराद्धं ते किं मया मुञ्च मे करम् । इत्यदृश्यैव तं विद्याधरी स्तम्भादुवाच सा ॥१८॥ प्रत्यक्षा ब्रूहि मे का त्वं ततो मोक्ष्यामि ते करम् । इति निश्चयदत्तोऽपि प्रत्युवाच स तां ततः ॥१९॥ प्रत्यक्षभूत्वा सर्वं ते वच्मीति शपथोत्तरम् । विद्याधर्या तथोक्ताञ्च करं तस्या मुमोच सः ॥२०॥ अथ स्तम्भाद्विनिर्गत्य साक्षात्सर्वाङ्गसुन्दरी । तन्मुखासक्तनयना तं जगादोपविश्य सा ॥२१॥ अस्ति प्रालेयशैलान्ते नगरी पुष्करावती । नाम्ना विन्ध्यपरस्तस्यामास्ते विद्याधराधिपः ॥२२॥ अनुरागपरा नाम तस्याहं कन्यका सुता । महाकालार्चनायाता विश्रान्तास्मीह सम्प्रति ॥२३॥ तावच्च त्वमिहागत्य कुर्वन्पृष्ठविलेपनम् । दृष्टः स्तम्भेऽत्र मारीय¹ मोहागान्त्रोपमो मया ॥२४॥ तव प्रागनुरागेण रञ्जितं स्वान्तरात्मनः । पश्चात्पृष्ठविलेपिन्या अङ्गरागेण ते करः ॥२५॥ अतः परं त्वां विदित्वा चलितुमीहे सम्प्रति । गच्छामीति तयोक्तोऽथ वणिक्पुत्रो जगाद सः ॥२६॥ स्वीकृतं तन्मया चण्डि न स्वान्तं भवतीकृतम् । अमुक्तस्वीकृतान्तान्तः कथमद्य तु गच्छसि ॥२७॥ इति तेनोदिता सा च मधुरागणवशीकृता । सङ्गमिष्ये त्वया काममप्यस्यामस्मत्पुरी यदि ॥२८॥ दुर्गमा सा न ते नाथ सेत्स्यते ते समीहितम् । नहि दुष्करमस्तीह किञ्चिद्व्यवसायिनाम् ॥२९॥ इत्युदीर्य गमुत्पत्य चानुरागपरा ययौ । अगाद्रिश्चयदत्तोऽपि ग तद्गतमना गृहम् ॥३१॥ ───────────────────────────────────────── १ माराय कामप्राय इदं मारीयं काम सम्बन्धि।
सप्तम लम्बक ४७
सप्तम लम्बक ४७ सुन्दर कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए और कंगन के शब्द को सुनते हुए निश्चयदत्त ने पीछे हाथ घुमाकर उसके हाथ को पकड़ लिया ॥१७॥ उसके हाथ पकड़ने पर वह अदृश्य विद्याधरी खम्भे के भीतर से बोली— हे महाभाग ! मैंने तेरा कौन-सा अपराध किया है कि मेरा हाथ पकड़ रखा है। इसे छोड़ो' ॥१८॥ वैश्य पुत्र ने कहा— 'मेरे सामने आकर बताओ कि तुम कौन हो तब तुम्हारा हाथ छोड़ूँगा। विद्याधरी ने शपथ खाकर कहा कि मैं प्रत्यक्ष होकर तुम्हें सब कहूँगी। उसके ऐसा कहने पर उसने हाथ छोड़ दिया ॥१९ २ ॥ तदनन्तर वह सर्वांगसुन्दरी विद्याधरी वैश्य-पुत्र के मुख पर आँखें गड़ाए हुए, बैठकर बोली—॥२१॥ 'हिमालय पर्वत के शिखर पर पुष्करावती नाम की नगरी है। वहाँ विन्ध्यपर नाम का विद्याधरों का राजा है ॥२२॥ उनकी मैं अनुरागपरा नाम की कन्या हूँ। यहाँ महाकाल भगवान् की पूजा के लिए आई थी। इस खम्भे में कुछ देर के लिए विश्राम कर रही हूँ ॥२३॥ तबतक कामदेव के मोहन-मन्त्र के समान यहाँ आकर चन्दन को शरीर में घिसते हुए तुम्हें देखा ॥२४॥ तुम्हारी पीठ पर चन्दन का लेप करती हुई मेरा हाथ तुमने प्रथम अनुराग के समान पकड़ा। अब मैं जाती हूँ। उस कन्या के इस प्रकार कहने पर वैश्य-पुत्र ने कहा—'अब मुझे तुम्हारे पिता का स्थान मालूम हो गया है। अभी तक तुम से हरण किये गये अपने हृदय को मैंने वापस नहीं लिया है। लिय हुए हृदय के बिना वापस किय तुम कैसे जाओगी ? ॥२५-२७॥ उससे इस प्रकार कही गई और स्वस्थ प्रेम के वशीभूत वह विद्याधरी बोली— यदि तुम मेरी नगरी में आ जाओगे तो फिर मिलूँगी ॥२८॥ किन्तु हे नाथ ! वह नगरी अत्यन्त दुर्गम है इसलिए तुम्हारी अभिलाषा पूरी न हो सकेगी। फिर भी उद्योगी पुरुषों के लिए दुष्कर क्या है ? ऐसा कहकर वह अनुरागपरा आकाश-मार्ग से उड़कर चली गई निश्चयदत्त भी उमीप हृदय को लगाये हुए भवन पर लौट आया ॥३ ॥
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर स्मरन्दुमादिव स्तम्भादुद्भिन्नं करपल्लवम्। हा धिक्तस्या गृहीत्वापि नाप्तः पाणिग्रहो मया ॥३१॥ तद्व्रजाम्यन्तिकं तस्याः पुरीं तां पुष्करावतीम्। प्राणांस्त्यक्ष्यामि दैवं वा साहाय्यं मे करिष्यति ॥३२॥ इति सञ्चिन्तयन् नीत्वा स्मरार्तः सोऽत्र तद्दिनम्। प्रातिष्ठत ततः प्रातरवलम्ब्योत्तरां दिशम् ॥३३॥ ततः प्रक्रमतस्तस्य क्रमोऽन्ये सहयायिनः। मिलन्ति स्म वणिक्पुत्रा उत्तरापथगामिनः ॥३४॥ तैः समं समतिक्रमन् पुरग्रामाटवीनदीः। क्रमादुत्तरदिग्भूमिं प्राप स म्लेच्छभूयसीम् ॥३५॥ तत्र तैरेव सहितः पथि प्राप्यव ताजिकैः। गीत्वा परस्मै मूल्येन दत्तोऽभूत्ताजिकाय सः ॥३६॥ तेनाऽपि तावद् भृत्यानां हस्ते कोशालिकाकृते। मुखराभिधानस्य सुहृत्तस्य व्यसृज्यत ॥३७॥ तत्र नीतः स तद्भृत्यैर्युक्तैस्तैरपरैस्त्रिभिः। मुखरं मृतं बुद्ध्वा तत्पुत्राय न्यवेदयत् ॥३८॥ पितुः कोशालिका ह्येषा मित्रेण प्रेषिता मम। तत्तस्यैवान्तिकं प्रातः प्राते क्षेप्या इमे मया ॥३९॥ इत्यात्मना चतुर्थं तं तत्पुत्रोऽपि स तां निशाम्। संयम्य स्थापयामास तुरुष्को निगडैर्दृढम् ॥४०॥ ततोऽत्र बन्धने रात्रौ मरणत्रासकातरान्। सङ्क्षोभिदक्षयदंस्तस्तान् स जगाद वणिक्सुतान् ॥४१॥ का विषादेन वः सिद्धिर्धैर्यमारुह्य तिष्ठत। भीता इव हि धीराणां दूरे यान्ति विपत्तयः ॥४२॥ स्मरतैकां भगवतीं दुर्गामापद्विमोचनीम्। इति तान् धीरयन् भक्त्या देवीं तुष्टाव सोऽथ ताम् ॥४३॥ 'नमस्तेऽस्तु महादेवि पादौ ते यावकाङ्कितौ। मुदितासुरमन्थास्त्रपङ्काविव नमाम्यहम् ॥४४॥ जितं शक्त्या शिवस्यापि विदवद्वैर्यकृता त्वया। त्वदनुप्राणितं चेदं भ्रष्टतं भुवनत्रयम् ॥४५॥
सप्तम लम्बक ४९
सप्तम लम्बक ४९ और पेड़ के समान कन्धे से निकले हुए उसके पाणि-पल्लव का स्मरण करते हुए सोचने लगा 'कि मैंने उसका हाथ पकड़ने पर भी विवाह नहीं किया यह बहुत बुरा किया' ॥३१॥ अतः अब मैं पुष्करावती पुरी में उसी के समीप जाता हूँ। या तो प्राणों का त्याग करूँगा अथवा दैव ही मेरी सहायता करेगा ॥३२॥ ऐसा सोचते हुए उस काम-पीड़ित वैश्य ने उस दिन को किसी प्रकार व्यतीत किया और प्रातःकाल उठते ही उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ॥३३॥ उस ओर जाते हुए उसे मार्ग में और भी तीन बनिया सहयात्री मिले, जो उत्तरापथ की ओर जा रहे थे ॥३४॥ उनके साथ नगरों ग्रामों जंगलों और नदियों को पार करके वह म्लेच्छों से भरी हुई उत्तर दिशा में पहुँचा ॥३५॥ वहाँ पर वह उन अन्य यात्रियों के साथ ताजिक (म्लेच्छ) लोगों से पकड़ा जाकर दूसरे ताजिक के हाथ दामा पर बेच दिया गया ॥३६॥ उसने भी उन चारों को खरीद कर नौकर के हाथों उपहार-स्वरूप मुरवार नामक तुर्क के पास भिजवा दिया ॥३७॥ जब उस ताजिक के नौकर, उन तीनों के साथ निश्चयदत्त को लेकर मुरवार के पास पहुँचे तब वह (मुरवार) मर चुका था। अतः उन्हें उसके पुत्र को सौंप दिया गया ॥३८॥ 'यह मेरे मित्र ने पिता के लिए उपहार भेजा है अतः इन्हें कल प्रातः उन्हीं के पास कब्र में गाड़ दिया जायेगा'—ऐसा कहकर उस तुर्क के पुत्र ने उन्हें कसकर बाँधा और एक तरफ रख दिया ॥३९-४०॥ तदनन्तर जकड़कर बाँधे गये उन अन्य तीन वैश्य-पुत्रों का मृत्यु के भय से व्याकुल देखकर निश्चयदत्त ने उनसे कहा—॥४१॥ 'शोक और दुःख मनाने से तुम्हारा क्या बनेगा। धीरज धरकर पड़े रहो। धैर्यशाली लोगों की विपत्तियाँ माता डरकर दूर भागती हैं ॥४२॥ उस एकमात्र संकट को दूर करनेवाली जगदम्बा भगवती का स्मरण करो। इस प्रकार साथियों का धीरज बँधाकर निश्चयदत्त भगवती की स्तुति करने लगा—॥४३॥ हे महादेवि ! तुम्हारे उन चरणों में प्रणाम करता हूँ जिनमें मारे हुए असुरों का रक्त अलता (महावर) के समान शोभित होता है ॥४४॥ विश्व का ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली तुमने शिव को भी जीत लिया। ये तीनों लोक तुम्हारी ही जीवित या सक्रिय प्रेरणा हैं ॥४५॥ ७
५० कथासरित्सागर
५० कथासरित्सागर परित्रातास्त्वया ह्येका महिषासुरसूदिनि । परित्रायस्व मां भक्तवत्सले शरणागतम् ॥४६॥ इत्यादि सम्यग्देवीं तां स्तुत्वा सहचरैः सह। सोऽथ निश्चयदत्तोऽत्र श्रान्तो निद्रामगाद्द्रुतम् ॥४७॥ उत्तिष्ठत सुता यात विगत बन्धन हि वः। इत्यादिदेश सा स्वप्ने देवी तं चापरांश्च तान् ॥४८॥ प्रबुध्य च तदा रात्री दृष्ट्वा बन्धान् स्वतश्च्युतान्। अन्योन्यं स्वप्नमाख्याय हृष्टास्ते निर्ययुस्ततः ॥४९॥ गत्वा दूरमथाध्वानं क्षीणायां निशि तेऽपरे। ऊचुर्निश्चयदत्तं तं दृष्टत्रासा वणिक्सुताः ॥५०॥ मास्तां बहुम्लेच्छतया दिगेषा दक्षिणापथम्। वय यामः सखे त्वं तु यथाभिमतमाचर ॥५१॥ इत्युक्तस्तैरनुज्ञाय यथेष्टागमनाय तान्। उदीचीमेव तामाशामवलम्ब्य पुनश्च सः ॥५२॥ एको निश्चयदत्तोऽथ प्रतस्थे प्रसभं पथि। अनुरागपराप्रेमपाशाकृष्टो निरस्तधीः ॥५३॥ क्रमशः गच्छन् मिलितैः स महाव्रतिकैः सह। चतुर्भिः प्राप्य सरितं वितस्तामुत्ततार सः ॥५४॥ उत्तीर्य च कृताहारः सूर्येऽस्ताचलचुम्बिनि। विवेश तैरेव समं वनं मार्गवशागतम् ॥५५। तत्र चाप्यागता केचित्समूचुः काष्ठभारिकाः। क्व गच्छथ दिने याते ग्रामः कोऽप्यस्ति नाग्रतः ॥५६॥ एकस्तु विपिनेऽमुष्मिन्नस्ति शून्यं शिवालयम्। तत्र तिष्ठति यो रात्रावन्तर्वा बहिरैव वा ॥५७॥ तं शृङ्गोत्पादिनी नाम शृङ्गोत्पादनपूर्वकम्। मोहयित्वा पशूकृत्य भक्षयत्येव यक्षिणी ॥५८॥ एतच्छ्रुत्वापि सामर्षास्ते महाव्रतिनस्तदा। ऊचुर्निश्चयदत्तं ते चत्वारः सहगामिनः ॥५९॥ एहि किं कुरुतेऽस्माकं वराकी साऽत्र यक्षिणी। तेषु तेषु श्मशानेषु निशासु हि वयं स्थिताः ॥६०॥
हे महिषासुरमर्दनी ! तुमने सारे संसार की रक्षा की है, इसलिए हे भक्तों पर स्नेह करनेवाली ! शरण में आये हुए मेरी रक्षा करें ॥४६॥ अपने साथियो के साथ इस प्रकार देवी की स्तुति करके वह (वैश्य) भी थकान के कारण सो गया ॥४७॥ ‘उठो उठो जाओ तुम्हारे बन्धन कट गये।—इस प्रकार, देवी ने स्वप्न में उन्हें आदेश दिया। जगने पर उठकर उन लोगों ने अपने को बन्धन-मुक्त पाया। वे आपस में स्वप्न की बात करके प्रसन्न हुए और वहाँ से चल पड़े। राह में सुबह होने पर अन्य साथियों ने निश्चयदत्त से कहा कि म्लेच्छों से भरी हुई उत्तर दिशा को छोड़ो दक्षिणापथ ही अच्छा है। अतः हमलोग उधर ही जाते हैं। तुझे जो अच्छा लगे करो ॥४८—५१॥ उनसे इस प्रकार कहे गये निश्चयदत्त ने उन्हें इच्छानुसार जाने के लिए कहकर स्वयं उसी उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ॥५२॥ अकेला निश्चयदत्त विवश होकर मन्द से जा रहा था क्योंकि अनुरागपरा नामक विद्याधरी के प्रेम से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो रही थी ॥५३॥ चलते-चलते मार्ग में उसे चार महाव्रती (कापालिक) मिले। उनके साथ वह वितस्ता (झेलम) नदी को पार कर गया ॥५४॥ वितस्ता को पारकर और भोजन करके सूर्यास्त के समय वे लोग मार्ग में आये हुए एक वन में घुसे ॥५५॥ उस वन से आये हुए कुछ लकड़हारे उन्हें पहले मिले और बोले— आगे कहाँ जा रहे हो इधर कोई गाँव नहीं है ॥५६॥ इस सूने जंगल में सिर्फ एक शिवालय है। उस शिवालय के बाहर या भीतर जो ठहरता है उसे शृङ्गालोत्पादिनी नाम की यक्षिणी पशु बनाकर, सिर में कील उत्सारण करके खा जाती है ॥५७-५८॥ यह सुनकर भी उसकी परवाह न करनेवाले वे चारों कापालिक साथी निश्चय दत्त से बोले— आओ जी ! वह बेचारी यक्षिणी हम लोगों का क्या कर सकती है ? हम लोग रात में बड़े-बड़े श्मशानों में रह चुके हैं ॥५९ ॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर इत्युक्तवद्भिस्तैः साकं गत्वा प्राप्य शिवालयम्। शून्यं निश्चयदस्तत्त्वां रात्रि नेतुं विवेश सः॥६१॥ तत्राङ्गणे विधायाशु भस्मना मण्डलं महत्। प्रविश्य चान्तरे तस्य प्रज्वाल्याग्निं सहेन्धनैः॥६२॥ धीरो निश्चयदत्त स तं महाव्रतिनस्तथा। मन्त्रं जपन्तो रक्षार्थं सर्वे एवावतस्थिरे॥६३॥ अथाययौ वादयन्ती दूरात् कङ्कालकिङ्किरीम्। नृत्यन्ती यक्षिणी तत्र सा शृङ्गोत्पादिनी निशि॥६४॥ एत्य तपु चतुर्ष्वेकं सा महाव्रतिनं प्रति। वतडुकं समपठन्नृत्त मण्डलाद्बहिः॥६५॥ तेन मन्त्रेण सञ्जातशृङ्गो मोहित उत्थितः। नृत्यंस्तस्मिन्ज्वलत्यग्नौ स महाव्रतिकोऽभवत्॥६६॥ पतितं सार्धदग्धं तमाकृष्यावाग्निमध्यतः। सा शृङ्गोत्पादिनी हृष्टा भक्षयामास यक्षिणी॥६७॥ ततो द्वितीये व्रतिनि न्यस्तदृष्टिस्तथैव सा। तं शृङ्गोत्पादनं मन्त्रं पपाठ च ननर्त च॥६८॥ सोऽपि द्वितीयस्तन्मन्त्रजातशृङ्गः प्रनर्तितः। पतितोऽग्नौ तयाकृष्य पश्यत्स्वन्येष्वभक्ष्यत॥६९॥ एवं क्रमेण संमोह्य तान् महाव्रतिनो निशि। समाभक्ष्यन्त यक्षिण्या चत्वारोऽपि सशृङ्गकाः॥७०॥ चतुर्थं भक्षयन्त्या च तया मांसासृङ्मत्तया। स्वयं किङ्करिकातोद्यं दैवाद् भूमौ न्यधीयत॥७१॥ तावच्च क्षिप्रमुत्थाय तद्गृहीत्वैव वादयन्। धीरो निश्चयदत्तोऽपि प्रनृत्यन् विहसन् भ्रमन्॥७२॥ तं शृङ्गोत्पावनं मन्त्रमसकृच्छ्रुतशिक्षितम्। पापठ्यते स्म यक्षिण्यास्तस्या मस्तकेऽक्षणो भुजे॥७३॥ तत्प्रयोगप्रभावण विवशा मुग्धुङ्कुणी। उत्पातुकामशृङ्गी सा प्रह्ला तं प्राह यक्षिणी॥७४॥ १ सार्धं दग्धं = बधिरं, ताभ्यां मत्यया।
... ... ... ... ... ... ॥३८॥ ... ॥३९॥ ... ॥४०॥ ... ॥४१॥ ... ॥४२॥ ... ॥४३॥ ... के प्रभाव से तिर्यञ्च भी ऐसे ज्ञानसम्पन्न होते हैं कि जिन-धर्म के प्रभाव को भली भांति ॥४३॥
५४ कथासरित्सागर
५४ कथासरित्सागर मा वधीस्त्वं महासत्त्व ! स्त्रियं मां कृपणामिमाम् । इदानीं शरणं त्वं मे मन्त्रपाठादि संहर ॥७५॥ रक्ष मां वेद्म्यहं सर्वमीप्सितं साधयामि ते । अनुरागपरा यत्र तत्र त्वां प्रापयाम्यहम् ॥७६॥ इति सप्रत्ययं प्रोक्तस्तया धीरस्तथेति सः । चक्रे निश्चयदत्तोऽत्र मन्त्रपाठादिसंहृतिम् ॥७७॥ ततः स तस्या यक्षिण्याः स्कन्धमारुह्य तद्गिरा । नीयमानस्तया व्योम्ना प्रतस्थे तां प्रियां प्रति ॥७८॥ प्रभातायां च रजनौ प्राप्यैकं गिरिकाननम् । मत्वा निश्चयवन्तं तं गुह्यकी सा व्यजिज्ञपत् ॥७९॥ सूर्योदयेऽधुना गन्तुं शक्तिर्नास्ति ममोपरि । तदस्मिन् कानने कान्ते गमयेदं दिनं प्रभो ॥८०॥ फलानि भुङ्क्ष्व स्वादूनि निर्झराम्बु शुभं पिब । अहं यामि निजं स्थानमप्यामि च निशागमे ॥८१॥ नेष्यामि च तदैव त्वाममरागपरान्तिकम् । मौलिमालां हिमगिरेर्नगरीं पुष्करावतीम् ॥८२॥ इत्युक्त्वा तदनुज्ञाता स्कन्धात्तत्रावतार्य तम् । यक्षिणी पुनरागास्तु सत्यसन्धा जगाम सा ॥८३॥ ततो निश्चयवत्तोऽस्यां गतायामक्षतात सः । अगाधमन्तं सविषं स्वच्छशीतं बहिः सरः ॥८४॥ रागिन् स्त्रीचित्तमतावुगिरयर्कैण निदर्शनम् । प्रसारितकरजब प्रकटीकृत्य दर्शितम् ॥८५॥ स तद् विपाक्त गन्धेन बुद्ध्वा मानुपकृन्त्यतः । त्यक्त्वान्भोऽध्र्थी तृषातः सन्विक्षय तत्राश्रयद्व् गिरेः ॥८६॥ भ्रमधूतभ्रूमायं पद्मरागमणी इव । स्फुरन्तौ द्राबपश्यञ्च मुखं तां निश्चवान् च ॥८७॥ अपास्तमूसिबन्धास्य जीवतो मर्कटस्य सः । गिरो वदन्तं ते पास्य पद्मरागाविवादिनी ॥८८॥ ततो विस्मयते यावत्किमेतदिति चिन्तयन् । तावन्मनुष्यवाचाभो मकटस्तमभाषत ॥८९॥
सप्तम लम्बक ५५
सप्तम लम्बक ५५ हे महाभाग ! तुम मुझ दीन स्त्री को न मारो। इस समय में मैं तुम्हारी शरण में हूँ। और, मन्त्रपाठ बन्द कर यक्षिणी ने निश्चयदत्त से फिर इस प्रकार कहा—॥७५॥ मेरी रक्षा करो। मैं सब जानती हूँ। तुम्हारा अभिप्राय समझती हूँ। अनुरागपरा जहाँ रहती है, वहाँ तुम्हें पहुँचा देती हूँ ॥७६॥ इस प्रकार विश्वास के साथ कहने पर निश्चयदत्त ने मन्त्र-पाठ बन्द कर दिया ॥७७॥ तदनन्तर, उस यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर वह निश्चयदत्त प्रिया अनुरागपरा की ओर चला ॥७८॥ रात बीतने होने पर सबेरे एक पर्वतीय जंगल में पहुँचकर वह विनम्रा यक्षिणी निश्चयदत्त से बोली—'हे महाभाग ! अब सूर्योदय होने पर ऊपर जाने के लिए मेरी शक्ति नहीं है। इसलिए, तुम इसी रमणीय जंगल में दिन बिताओ। मीठे-मीठे फल खाओ। झरनों का सुन्दर-स्वच्छ जल पियो। मैं अपने घर को जाती हूँ। रात होने पर फिर आऊँगी ॥७९—८१॥ उसी समय तुम्हें हिमालय के शिखर की माला के समान पुष्करावती नगरी में अनुरागपरा के समीप पहुँचा दूँगी। ऐसा कहकर और निश्चयदत्त को कन्धे से उतारकर उसकी यात्रा फिर जाने के लिए सच्ची प्रतिज्ञा करके वह यक्षिणी चली गई ॥८२-८३॥ उसके चले जाने पर निश्चयदत्त ने वहाँ पर एक अथाह और अन्दर से विषैले एवं बाहर से स्वच्छ तालाब को देखा। 'स्त्रियों का चित्त इसी प्रकार भीतर से विषमय और बाहर से स्वच्छ दीखता है' सूर्य मानो अपनी करा (किरणों) से निश्चयदत्त को यह कहते हुए तालाब दिखा रहा था ॥८४-८५॥ प्यासा निश्चयदत्त मनुष्य के कृत्य से उस तालाब को जहरीला समझकर पानी के लिए उस दिव्य पर्वत पर इधर-उधर घूमने लगा ॥८६॥ घूमते हुए उसने पहाड़ की ऊँची भूमि में मिट्टी के अन्दर पद्मराग मणि के समान चमकती हुई दो आँखें देखीं। उसके बाद वह उस भूमि को खोदने लगा ॥८७॥ मिट्टी को हटाते ही उसने जीवित बन्दर का सिर देखा। जैसे ही वह उसके लिए सोचने लगा इतने में ही वह बन्दर मनुष्य की वाणी में बोला—॥८८-८९॥
५६ कथासरित्सागर
५६ कथासरित्सागर मानुषो मर्कटीभूतो विप्रोऽहं मां समुद्धर । कथयिष्यामि ते साद्यो स्ववृत्तान्तं ततोऽखिलम् ॥९० एतच्छ्रुत्वैव साश्चर्यो मृत्तिकामपनीय स । भूमेर्निश्चयदत्तस्तमुज्जहाराथ मर्कटम् ॥९१ उद्धृत पादपतितस्तं भूयोऽपि स मर्कटः । उवाच दत्ता प्राणा मे कृच्छ्रादुद्धरता त्वया ॥९२ तदेहि यावच्छ्रान्तस्त्वमुपयुङ्क्ष्व फलाम्बुनी । स्वप्रसादादहं चापि करिष्ये पारणं चिरात् ॥९३ इत्युक्त्वा तमनेषीत्स दूरं गिरिनदीतटम् । कपि स्वाधीनसुस्वादुफलसञ्छायपादपम् ॥९४ तत्र स्नात्वापभुक्ताम्बुफलः स कृतपारणम् । कपिं निश्चयदस्तस्तं प्रत्यागम्य ततोऽब्रवीत् ॥९५ कथं त्वं मर्कटीभूतो मानुषोऽप्युच्यतामिति । ततः स मर्कटोऽवादीच्छृण्विदानीं वदाम्यहम् ॥९६ वानररूपिणः सोमस्वामिब्राह्मणस्य कथा चन्द्रस्वामीति नाम्नास्ति वाराणस्यां द्विजोत्तमः । तस्य पत्न्यां सुवृत्तायां जातोऽस्म्येथ सुत सखे ॥९७ सोमस्वामीति पित्रा च कृतनामा क्रमादहम् । [L20: प्राप्तो मदनव्यालगज मर्दनिरङ्कुशम् ॥९८ सो मां कदाचिदद्राक्षीद्वारादूर्ध्वावातायनाग्रगा । श्रीगर्भाख्यस्य वणिजस्तत्पुरीवासिनः सुता ॥९९ तरुणी बन्धुदत्ताख्या माथुरस्य वणिक्पतेः । भार्या वराहदत्तस्य पितुर्गेहमवस्थिता ॥१०० सा मदालोकसञ्जातमन्मथान्विष्य नाम मे । वयस्यां प्राहिणोदाप्तां मह्यं मत्सङ्गमाथिनी ॥१०१ सा तद्वयस्या कामान्धामुपगम्य ममान्तिकम् । आख्याततदभिप्राया मामनैषीन्निजं गृहम् ॥१०२ तत्र मां स्थापयित्वा च गत्वा गुप्तं तदैव सा । तां बन्धुदत्तामानैषीदौत्सुक्यागणितत्रपाम् १॥१०३ १ औत्सुक्येनकामावेशतया न गणिता त्रपा यया सा।
सप्तम लम्बक ५७
सप्तम लम्बक ५७ 'हे सज्जन ! मैं मनुष्य हूँ। बन्दर बनाया गया ब्राह्मण हूँ। मुझे निकालो। तब मैं अपना सारा वृत्तान्त तुमसे कहूँगा' ॥९०॥ यह सुनकर आश्चर्य-चकित निश्चयदत्त ने भली भाँति भूमि खोदकर उसे बाहर निकाला ॥९१॥ भूमि से निकला हुआ बन्दर उसके पैरों पर गिरकर फिर बोला—'तुमने कष्ट से मुझ बचाते हुए मेरे प्राण दिये। तुम भी मेरे साथ थक गये हो। फल और जल ग्रहण करो। तुम्हारी कृपा से मैं भी चिरकाल के बाद आज पारण करूँगा' ॥ ९२॥ ऐसा कहकर बन्दर उसे वहाँ से दूर एक पहाड़ी नदी के किनारे ले गया जहाँ स्वच्छ एवं स्वादिष्ट फल और छायावाला एक वृक्ष था ॥९४॥ वहाँ स्नान करके मीठे फल खाया हुआ निश्चयदत्त जलपान किए हुए बन्दर के पास आकर बोला—॥९५॥ 'तू मनुष्य होकर भी बन्दर कैसे बना। तब बन्दर बोला कि सुनो अब मैं यह कहता हूँ॥९६॥ बन्दर बने सोमस्वामी की कथा मित्र ! वाराणसी नगरी में चन्द्रस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसकी पतिव्रता स्त्री से उत्पन्न यह मैं उसका पुत्र हूँ ॥९७॥ मेरे पिता ने मेरा नाम सोमस्वामी रखा था। क्रमशः बड़ा होकर मैं कामकला नाम की नगरी हाथी पर चढ़कर प्रयाण कर गया ॥ ८॥ किसी समय वाराणसी-निवासी धीरचे नाम के वैश्य की कन्या ने घर की खिड़की से मुझे आते हुए देख लिया॥ ९ ॥ वह युवती मथुरा के प्रधान वैश्य शंखदत्त की पत्नी थी जो उस समय अपने पिता के घर में रह रही थी ॥१० ॥ वह नेत्रों से उत्पन्न काम से विह्वल होकर उस वैश्य-कन्या ने मेरे सम्मुख खिन्न अपनी विश्वस्त दूती को भेजा ॥११ ॥ उसने आकर मुझे दावानल जलाया दिखाया व उसके घर का कष्ट अपने कहकर व। करने का सन्देश ॥ १२ ॥ इसके बाद उसने उस विश्वासपात्र दूती को उस दावानल से जलाए हुए अपने हृदय की सान्त्वना के लिए शीघ्र उसे भेजा ॥१३ ॥ ८
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर आनीतेव च सा मेऽत्र कण्ठाश्लेषमुपागमत्। एकवीरो हि नारीणामतिभूमिं गतः स्मरः ॥१०४॥ एवं दिने दिने स्वैरमागत्यात्र पितुर्गृहात् । अरस्त बन्धुदत्ता सा मया सह सखीगृहे ॥१०५॥ एकदा तां निजगृहं नेतुं तत्र चिरस्थिताम् । आगतः स पतिम्मन्या मधुरातो महावणिक् ॥१०६॥ तत पित्राभ्यनुज्ञाता पत्या तेन निनीषिता । रहस्यज्ञां द्वितीयां सा बन्धुदत्ताऽब्रवीत् सखीम् ॥१०७॥ निश्चितं सखि नेतव्या भर्त्राहं मधुरां पुरीम् । न च जीवाम्यहं तत्र सोमस्वामिबिनाकृता ॥१०८॥ तदत्र कोऽप्युपायो मे कथ्यतामुचिता तथा। सखी सुलशया नाम योगिनी तां जगाद सा ॥१०९॥ द्वौ स्तो मन्त्रप्रयोगौ मे ययोरेकेन सूत्रके । कण्ठबद्धे क्षणादेव मानुषो मर्कटो भवेत् ॥११०॥ द्वितीयेन च मुक्तेऽस्मिन्सूत्रके सैष मानुषः । पुनर्भवत्कपित्वे न नास्य प्रज्ञा विलुप्यते ॥१११॥ यद्यदीच्छति सुश्रोणि सोमस्वामी प्रियः स सं । तवैतं मर्कटंक्षिप्रं सम्प्रत्येव करोम्यहम् ॥११२॥ तत क्रीडानिभादेतं गृहीत्वा मधुरां व्रज । [L21: मन्त्रयुक्तिद्वयं चैतद् भवतीं शिक्षयाम्यहम् ॥११३॥ संविधास्यसि येनैतं पार्श्वस्थं मर्कटाकृतिम् । रहःस्थाने च पुरुषं प्रियं सम्पादयिष्यसि ॥११४॥ एवमुक्ता तया सख्या बन्धुदत्ता तथैव सा । रहस्यानय्य सस्नेहं सर्वर्थं मामबोधयत् ॥११५॥ कृतानुज्ञं च मां बद्धमन्त्रसूत्रं गले क्षणात् । तत्सखी सा सुलशया व्यधाम्मर्कटपोतकम् ॥११६॥ तद्रूपञ्च स्वभर्त्रे सा बन्धुदत्तोपनीय माम् । सख्या मह्यं विनोदाय दत्तोऽसावित्यदर्शयत् ॥११७॥ अतुष्यत् स च मां दृष्ट्वा क्रीडनीयं तदङ्गजम् । अहञ्च कपिरेवासं प्राशोऽपि व्यक्तवागपि ॥११८॥
सप्तम लम्बक ५९
सप्तम लम्बक ५९ वहाँ जाते ही वह मेरे गले से चिपट गई। स्त्रियों का उग्र रूप से चढ़ा हुआ काम एकमात्र भीर होता है ॥११४॥ इस प्रकार, वह बन्धुदत्ता प्रतिदिन पिता के घर से सखी के घर आकर मेरे साथ क्रीडा करती रही ॥११५॥ एक बार उसका पति बहुत दिनों से पिता के घर रही हुई उसे अपने साथ ले जाने के लिए मथुरा से आया। तदनन्तर पिता की आज्ञा से ले जाने के लिए उत्सुक पति को जानकर बन्धुदत्ता अपने रहस्य को जाननेवाली सखी से बोली—॥११६-११७॥ मेरा पति मुझे अवश्य ही मथुरा ले जायगा और मैं सोमस्वामी के बिना जी नहीं सकती ॥११८॥ इस विषय में अब कौन-सा उपाय किया जाय यह बताओ। इस प्रकार कही गई बन्धुदत्ता की सुलसका नाम की योगिनी सखी बोली ॥११९॥ 'मेरे पास दो मन्त्र हैं। एक मन्त्र से गले में डोरा बाँधने से मनुष्य तुरन्त बन्दर बन जाता है ॥१२०॥ और, दूसरे मन्त्र से डोरा खोल देने पर फिर वह मनुष्य बन जाता है। बन्दर बन जाने पर या पुनः मनुष्य बन जाने पर उसका ज्ञान नष्ट नहीं होता ॥१२१॥ अत हे सुन्दरी ! यदि तू चाहती है तो तेरे प्यार सोमस्वामी को मैं अभी बन्दर का बच्चा बना देती हूँ। तू इसे खिलौना बनाकर साथ लेकर मथुरा चली जा। मैं दोनों मन्त्र और उसकी युक्ति तुझे बता देती हूँ। इससे तुम एकान्त में इसे प्रिय पुरुष बनाकर इच्छानुसार संगम कर सकोगी' ॥१२२—१२४॥ उस सखी से इस प्रकार कही गई बन्धुदत्ता ने मुझे बुलाकर यह योजना प्रेमपूर्वक समझाई ॥१२५॥ मेरी सम्मति पाने पर उसकी सखी सुलसया ने मुझे मन्त्रित करके गले में डोरा बाँधकर तुरन्त बन्दर बना दिया ॥१२६॥ मुझे बन्दर के रूप में ले जाकर बन्धुदत्ता अपने पति से बोली कि मेरी सखी ने मुझे मन-बहलाव के लिए यह बन्दर दिया है ॥१२७॥ उसकी गोद में बैठे हुए उस खिलौने को देखकर उसका पति प्रसन्न हुआ। मैं सब समझता हुआ और स्पष्ट बोलता हुआ भी बन्दर ही रहा ॥१२८॥
The provided image is completely blank (white) and contains no text.
सप्तम लम्बक ६१
सप्तम लम्बक ६१ और, मन में स्त्री चरित्र को सोचकर हंसता तथा आश्चर्य करता रहा ॥११९॥ दूसरे दिन सुहेली से मन्त्र सीखकर बन्धुदत्ता पति के साथ पिता के घर से मथुरा को चली ॥१२० ॥ उसके पति ने बन्धुदत्ता की प्रसन्नता के लिए मुझे भी एक नौकर के कन्धे पर बिठाकर साथ ले लिया ॥१२१॥ इस प्रकार, मार्ग में जाते हुए हम सब लोग दो-तीन दिनों में बहुत-से बन्दरों से भरे हुए जंगल में जा पहुँचे ॥१२२॥ मुझे देखकर वे जंगली बन्दर झुण्ड बनाकर चारों ओर से घेरकर मुझ पर टूट पड़े। जिस नौकर के कन्धे पर मैं था उसे उन्होंने घेर लिया ॥१२३॥ बन्दरों के आक्रमण से व्याकुल वह नौकर भय से मुझे जमीन पर छोड़कर भाग गया। पर, वानरों ने मुझे पकड़ लिया। मेरे प्रेम से बन्धुदत्ता और उसके पति ने लाठियों और ढेलों से बन्दरों को भगाने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु वे उनपर विजय न पा सके ॥१२४—१२६॥ मुझे पकड़कर उन बन्दरों ने मानों मेरे कुकर्मों पर क्रुद्ध होकर मेरे अंग-अंग और रोम-रोम को नोच डाला। गले में पड़े हुए डोरे और शिवजी की कृपा से मैं कुछ बल पाकर उनसे छूटकर भाग गया ॥१२७-१२८॥ उनकी दृष्टि से ओझल होकर मैं घने जंगल में पहुँच गया और जंगल से जंगल होता हुआ क्रमशः इस वन में पहुँच गया ॥१२९॥ बन्धुदत्ता से छूटे हुए मुझे इस जन्म में ही परदार-समागम का फल बन्दरपन मिला ॥१३० ॥ इस प्रकार, दुःख के तम से अन्धे हुए और वर्षाकाल में घूमते हुए मुझे असन्तुष्ट दैव ने एक दूसरा दुःख भी दे दिया ॥१३१॥ एक बार बैठे हुए मुझे सहसा एक हथिनी ने आकर सूँड़ से लपेट लिया और वर्षा से (भीगी बाँबी जंगल में दीमकों के रहने का स्थान मृत्तिका-स्तूप) के अन्दर घुसा दिया ॥१३२॥ मेरे भवितव्य के कारण न जाने वह हथिनी कोई देवता बनकर आई थी कि मेरे लाख यत्न करने पर भी मैं उस कीचड़ से जकड़ा हुआ हिल भी नहीं सका ॥१३३॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर आश्वास्यमाने चैतस्मिन् न मृतोऽस्मि न केवलम्। यावज्ज्ञानं ममोत्पन्नमनिशं ध्यायतो हरम्॥१३४॥ तावत्कालश्च नैवासीत् क्षुत्तृष्णा च सखे मम। यावदद्योद्धृतः पुष्करपङ्ककूटादहं त्वया॥१३५॥ ज्ञाने प्राप्तेऽपि शक्तिर्मे तावती नैव विद्यते। मोचयेयं ययात्मानमितो मर्कटभावतः॥१३६॥ कण्ठसूत्रं यदा कापि तमन्त्रेष्वव मोक्ष्यति। योगिनी मे तदा भूयो भवितास्मीह मानुषः॥१३७॥ इत्येष मम वृत्तान्तस्त्वं स्वगम्यमिदं वनम्। किमागतः कथं चेति ब्रूहीदानीं वयस्य मे॥१३८॥ एव मर्कटरूपेण सोमस्वामिद्विजेन स । उक्तो निश्चयदत्तः स्वं तस्मै वृत्तान्तमब्रवीत्॥१३९॥ यथा विद्याधरीहेतोश्चोज्जयिन्याः समागतः। आनीतो धैर्यजितया यक्षिण्या च तथा निशि॥१४०॥ ततः श्रुततदाश्चर्यवृत्तान्तः कपिरूपधृत् । धीमान्निश्चयदत्तं तं सोमस्वामी जगाद सः॥१४१॥ अनुभूतं त्वया दुःखं मयेव स्त्रीकृतं महत्। न च श्रियः स्त्रियस्नेहः कदाचित्कस्यचित् स्थिराः॥१४२॥ सन्ध्याभ्रक्षणरागिण्यो नदीवत्कुटिलाशयाः। भुजङ्गीवदविश्वास्या विद्युदुज्ज्वलरूपाः स्त्रियः॥१४३॥ तस्सा विद्याधरी रक्ताप्यनुरागपरा क्षणात्। प्राप्य कञ्चित् स्वजातीयं विरज्येत् त्वयि मानुषे॥१४४॥ तदलं स्त्रीनिमित्तेन प्रयासेनामुनाधुना। किम्पाकफलतुल्येन विपाकविरसं ते॥१४५॥ मा मा विद्याधरपुरीं तां सखे पुष्करावतीम्। यक्षिणीस्कन्धमारुह्य तामेवोज्जयिनीं व्रज॥१४६॥ कुरु मद्वचनं मित्र पूर्वं मित्रवचो मया। न कृतं रागिणा तेन परितप्येऽधुनाव्यहम्॥१४७॥ बन्धूद्वसानुरक्तं हि सुस्निग्धा ब्राह्मणास्तदा। वारयन् भवशर्माख्यः सङ्गमामेवमब्रवीत्॥१४८।
सप्तम लम्बक ६३
सप्तम लम्बक ६३ हृदय को अनेक प्रकार से आश्वासन देने पर और भगवान् का ध्यान करने के कारण मैं मरा नहीं ॥१३४॥ जबतक तुमने मुझे उस मिट्टी के ढेर से नहीं निकाला तबतक मुझे भूख और प्यास नहीं लगी ॥१३५॥ ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी मुझ में अभी तक ऐसी शक्ति नहीं आई कि मैं उस बानर-योनि से छुटकारा पाऊँ ॥१३६॥ जब कोई योगिनी उसके मन्त्र द्वारा मेरे गले के डोरे को खोलेगी तभी मैं मनुष्य बन जाऊँगा ॥१३७॥ यही मेरी कहानी है। मित्र ! अब तू बता कि इस अगम्य वन में कैसे आया ? ॥१३८॥ इस प्रकार, बानर-रूपी सोमस्वामी नामक ब्राह्मण से कहा गया निश्चयदत्त उसने किए अपना वृत्तान्त कहने लगा—॥१३९॥ कि कैसे वह विद्याधरी अनुरागपरा के कारण उज्जैन से यहाँ तक चला आया। और द्यूत से जीती हुई—वश की हुई—यक्षिणी के द्वारा रात में कैसे यहाँ पहुँचाया गया— इत्यादि सब वृत्तान्त उसने बन्दर से कहा ॥१४०॥ उसके आश्चर्य-भरे समाचार को सुनकर बन्दर बना हुआ बुद्धिमान् सोमस्वामी उससे बोला—॥१४१॥ 'तुमने भी मेरे ही समान स्त्री के पीछे कष्ट भोगा है किन्तु याद रखो किसी की स्त्री और श्री (लक्ष्मी) कभी स्थिर नहीं रही। सन्ध्या के समान क्षणिक राग (प्रेम) वाली होती हैं। नदी के समान इनका हृदय कुटिल (ऊँचा-नीचा) रहता है और नागिन की तरह ये अविश्वसनीय तथा बिजली की तरह चंचल होती हैं ॥१४२-१४३॥ इसलिए, वह अनुरागपरा विद्याधरी तुम्हारे ऊपर आसक्त होकर भी किसी विद्याधर जाति के कामी को पाकर तुम मनुष्य से विरक्त हो जायगी ॥१४४॥ इसलिए, तुम स्त्री के लिए यह परिणाम-नीरस व्यर्थ प्रयत्न मत करो। हे मित्र ! तुम विद्याधरों की पुण्डरीकवती नगरी में न जाओ। यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर अपनी उज्जयिनी नगरी लौट जाओ ॥१४५-१४६॥ हे मित्र ! मेरी बात मानो। मैंने भी पहले अपने मित्र की बात नहीं मानी इसीलिए अब पश्चात्ताप कर रहा हूँ ॥१४७॥ जब मैं बन्धुदत्ता में अनुरक्त था तब मेरे एक परम स्नेही ब्राह्मण भवशर्मा ने मुझे इसी प्रकार रोका और कहा था—॥१४८॥
६४ कथासरित्सागर
६४ कथासरित्सागर स्त्रियाः सखे वशं मा गाः स्त्रीचित्तं ह्यतिदुर्गमम्। तथा च मम यद्वृत्तं तदिदं वच्मि ते शृणु ॥१४९॥ वाराणस्यामिहैवासीत्तरुणी रूपशालिनी। ब्राह्मणी सोमदा नाम चपला गुप्तयोगिनी ॥१५०॥ तया च सह मे दैवात् समभूत्सङ्गमो रहः। तत्सङ्गमक्रमात्तस्यां मम प्रीतिरवर्धत ॥१५१॥ एकदा तामहं स्वैरमीर्ष्याकोपादताडयम् । तन्नासहिष्ट सा क्रूरा कोपं प्रच्छाद्य तत्क्षणम् ॥१५२॥ अन्येद्युः प्रणयक्रीडाव्याजाच्च मम सूत्रकम्। गले बद्धावहं ध्वान्तस्तत्क्षणं बलवोऽभवम् ॥१५३॥ ततोऽहं बलदीभूतस्तया दान्तोष्ट्रजीविनः। एकस्य पुंसो विक्रीतो गृहीताभीष्टमूल्यया ॥१५४॥ समारोपितभारं मां क्लिश्यमानमवेक्षत। बन्धमोचनिका नाम योगिन्यथ कृपान्विता ॥१५५॥ सा ज्ञानतः सोमदया विदित्वा मां पशूकृतम्। मुमोच कण्ठात् सूत्रं मे मद्गोस्वामिन्यपश्यति ॥१५६॥ ततोऽहं मानुषीभूतः स च क्षिप्राद्विलोक्यमाम्। पलायितं मां मन्वानो मत्स्वामी प्राभ्रमद्दिशः ॥१५७॥ अहं च बन्धमोचिन्या तया सह ततो व्रजन्। दैवादागतया दूराद्दृष्टः सोमदया तया ॥१५८॥ सा क्रोधेन ज्वलन्ती तां ज्ञानिनीं बन्धमोचिनीम्। अवादीत्किमय पापस्तिर्यक्त्वान्मोचितस्त्वया ॥१५९॥ धिग्प्राप्स्यसि दुराचारे फलमस्य कुकर्मणः। प्रातस्त्वां निहनिष्यामि सहितां पाप्मनामुना ॥१६०॥ इत्युक्त्वैव गतायां च तस्यां सा सिद्धयोगिनी। तत्प्रतीघातहेतोर्मामवाचद्वन्धमोचिनी ॥१६१॥ हन्तुं मां कृष्णतुरगीरूपेणाभ्युपेष्यति। मया च घोषबडवारूपमत्राभियिष्यते ॥१६२॥ ततो युद्धे प्रवृत्ते नौ पृष्ठतः खड्गपाणिना। सोमदायां प्रहर्त्तव्यं त्वयास्यामप्रमादिना ॥१६३॥