कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
२० कथासरित्सागर
२० कथासरित्सागर ततः कथञ्चित्पितरौ प्रणम्यान्तस्पुरं निजम्। गत्वा चिन्तातुरा निद्रां चिरेण कथमप्यगात् ॥१३२॥ प्रातः शुभे दिने पुत्रि वत्स वत्सेश्वरात्मजः। द्रष्टव्यः स्ववरो गत्वा कौशाम्बीं नगरीं त्वया ॥१३३॥ ततश्च स्वपुरेऽमुष्मिन्नानीय स्वपिता स्वयम्। तव तस्य च कल्याणि विवाहं संविधास्यति ॥१३४॥ इति स्वप्नेऽथ तां गौरी सानुकम्पा समादिशत्। प्रबुध्य सा च तं स्वप्नं प्रातर्मात्रे न्यवेदयत् ॥१३५॥ ततः सा तदनुज्ञाता बुद्ध्वा विद्याप्रभावतः। उद्यानस्थं वरं द्रष्टुं प्रावर्तत निजात्पुरात् ॥१३६॥ तामार्यपुत्र मामेतां वेत्थ रत्नप्रभामिति। प्राप्तामुक्त्वा क्षणेनाथ वित्थ यूयमतः परम् ॥१३७॥ एतत्तस्या वचः श्रुत्वा माधुर्यव्यक्ततामृतम्। विलोक्य नेत्रपीयूषं विद्याधर्या वपुश्च तत् ॥१३८॥ नरवाहनदत्तोऽन्तर्विधातारं निनिन्द सः। श्रोत्रनेत्रमयं कृत्स्नमकरोत्किं न मामिति ॥१३९॥ जगाद तां च धन्योऽहं जन्माद्य सफलं मम। योऽहमेवं स्वयं तन्वि स्नेहादभिसृतस्त्वया ॥१४०॥ इत्यन्योन्यनवप्रेमकृतसंलापयोस्तयोः। अकस्माद्ददृशे तत्र विद्याधरबलं दिवि ॥१४१॥ तातोऽयमागतोऽत्रेति त्राप्तरत्नप्रभोदिते। राजा हेमप्रभो व्योम्नः सपुत्रोऽवततार सः ॥१४२॥ उपाययौ च पुत्रेण सह बद्धप्रेमेण सः। नरवाहनदत्तं तं विहितस्वागतादरम् ॥१४३॥ अन्योन्यरचिताचारा यावत्तिष्ठन्ति ते क्षणात्। तावत्तत्रायायौ बुद्ध्वा वत्सराजः समन्त्रिकः ॥१४४॥ कृतातिथ्यविधिं तं च नृपं हेमप्रभाख्यं सः। यथा रत्नप्रभोक्तं तं वृत्तान्तं समबोधयत् ॥१४५॥
सप्तम लम्बक २१
सप्तम लम्बक २१ तब वह कुमारी माता-पिता को प्रणाम करके और किसी प्रकार उठकर अपने निवास भवन में चली गई और अत्यन्त चिन्ता से व्याकुल होकर किसी प्रकार बड़ी देर के बाद सो गई ॥१३४॥ तब स्वप्न में उस दयामयी पार्वती ने कहा—'बेटी ! कल शुभ दिन है। अतः तुम स्वयं कौशाम्बी में जाकर अपने पति को देखना। तब तुम्हारा पिता स्वयं वहाँ आकर तुम्हारा विवाह करेगा। पार्वती के उस प्रकार के आदेश को उसने प्रातःकाल उठकर अपनी माता से कह सुनाया ॥१३५॥ माता की आज्ञा पाकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब कुछ जानकर वह उद्यान में स्थित अपने पति को देखने के लिए अपने नगर से चली ॥१३६॥ 'हे आर्यपुत्र ! तुम मुझे वही रत्नप्रभा समझो जो उत्कण्ठित होकर तुम्हारे पास आई है। आगे तुम जैसा समझो' ॥१३७॥ इस प्रकार, उसके अमृत को नीचा दिखानेवाले मधुर वचन को सुनकर और नेत्रों के लिए अमृत के समान उस विद्याधरी के सुन्दर रूप को देखकर नरवाहनदत्त विधाता की निन्दा करने लगा कि उसने सारा शरीर ही नेत्रमय और कर्णमय क्यों नहीं बना दिया कि उसे मैं देखता ही रहता और उसके वचन सुनता ही रहता ॥१३८-१३९॥ और बोला—'मैं धन्य हूँ। आज मेरा जन्म सफल हुआ कि तुमने प्रेम से मेरे पास अभिगमन किया ॥१४०॥ इस प्रकार, उन दोनों के परस्पर नवीन प्रेम के कारण वार्तालाप करते हुए ही अकस्मात् आकाश में विद्याधरों की सेना दीख पड़ी ॥१४१॥ 'यह मेरे पिता आये'—रत्नप्रभा के इस प्रकार कहते ही राजा हेमप्रभ अपने पुत्र के साथ आकाश से तुरन्त उतरा ॥१४२॥ वह राजा हेमप्रभ अपने पुत्र वज्रप्रभ के साथ स्वागत करते हुए नरवाहनदत्त के पास आया ॥१४३॥ जबतक वे परस्पर शिष्टाचार करते हुए मिल रहे थे इतने में ही उनका आगमन जानकर वत्सराज उदयन भी अपने मन्त्री के साथ वहीं आ गया ॥१४४॥ आतिथ्य-सत्कार प्राप्त करने के बाद राजा हेमप्रभ ने उदयन को रत्नप्रभा के पूर्व वृत्तान्तानुसार सारा वृत्तान्त सुनाया ॥१४५॥
९२ कथासरित्सागर
९२ कथासरित्सागर जगाद च मया ज्ञेयं ज्ञाता विद्याप्रभावतः । इहागता सुता सर्वं वृत्तान्तं चात्र वेद्म्यहम् ॥१४६॥ चक्रवर्तिविमानं हि भाव्यग्रेऽमुष्य तादृशम् ॥१४७॥ अनुमन्यस्व तद्द्रक्ष्यस्यचिरादेवैतमात्मजम् । रत्नप्रभावधूयुक्तं युवराजमिहागतम् ॥१४८॥ एवं वत्सेशमभ्यर्थ्य तेनानुमतवाञ्छितः । सपुत्रं कल्पयित्वा तद्विमानं निजविद्यया ॥१४९॥ तमारोप्य नृपानन्दसूनुं रत्नप्रभायुतम् । नरवाहनदत्तं च सहितं गोमुखादिभिः ॥१५०॥ यौगन्धरायणेनापि पित्रानुप्रषितेन च। हेमप्रभो निनाय स्वं पुरं काञ्चनशृङ्गकम् ॥१५१॥ नरवाहनदत्तश्च ददर्श प्राप्य तत्पुरम् । श्वाशुरं काञ्चनमयं हेमप्राकारभासुरम् ॥१५२॥ रश्मिप्रतानैर्निर्यद्भिर्बहरुकृतमिवाभितः । प्रसारितानेकभुजं जामातृप्रीतिसम्भ्रमात् ॥१५३॥ तत्र तां विधिवत्तस्मै राजा हेमप्रभो ददौ । रत्नप्रभां महारम्भो हरयेऽब्धिरिव श्रियम् ॥१५४॥ प्रायच्छद्रत्नराशींश्च तदा तस्मै स भास्वरान् । प्रवीप्तानेकवीबाहुवलित्रिभ्रमशालिनः ॥१५५॥ सोत्सवस्य पुरे चास्य राज्ञो वित्तानि वर्षतः । स्रग्धवस्त्रा इव बभुः सपताका गृहा अपि ॥१५६॥ नरवाहनदत्तश्च निर्व्यूढोद्वाहमङ्गलः । दिव्यभोगभुगत्रास्त स रत्नप्रभया समम् ॥१५७॥ रेमे च दिव्यान्युद्यानवापीदेवकुलानि सः । पश्यंस्तया समादृत्य तद्विद्याबस्ततो नमः ॥१५८॥ एवं च तत्र कतिचिद्दिवसानुषित्वा विद्याधराधिपपुरे स वधूसहायः । वत्सेश्वरस्य तनयः स्वपुरीं प्रयातुं यौगन्धरायणमतेन मतिं चकार ॥१५९॥
सप्तम लम्बक २३
सप्तम लम्बक २३ और कहा कि 'मैंने विद्या के प्रभाव से यह जान लिया कि मेरी कन्या यहाँ आई है और सब भी मैं जानता हूँ ॥१४६॥ यह कुमार नरवाहनदत्त जब चक्रवर्ती होगा तब इसको भी ऐसा विमान होगा। आप लोग कुछ ही समय में रत्नप्रभा के साथ अपने पुत्र को यहाँ आया हुआ देखोगे ॥१४७-१४८॥ 'इस समय हम लोगों को जाने की आज्ञा दो इस प्रकार वत्सराज से निवेदन करके और उसकी आज्ञा प्राप्त करके अपनी विद्या के प्रभाव से विमान की रचना करके पुत्र के साथ उस विमान में लज्जा से नीचा मुँह किये हुए नरवाहनदत्त को उसके मित्र गोमुख आदि के साथ विमान में बिठाकर और वत्सराज के द्वारा प्रेषित यौगन्धरायण को साथ लेकर हेमप्रभ अपने काञ्चनशृंग नगर को गया ॥१४९-१५१॥ नरवाहनदत्त ने भी सुवर्णमय और सोने की चारदीवारी से घिरे हुए श्वसुर के नगर को देखा जो चारों ओर निकलती हुई प्रकाश की किरणों से ऐसा शोभित था मानो जामाता के स्नेह से अपने हाथों को ऊंचा करके फैलाये हुआ था ॥१५२ १५३॥ उस नगर में पहुँचकर राजा हेमप्रभ ने शास्त्र-विधि के अनुसार नरवाहनदत्त को अपनी कन्या इस प्रकार दी जैसे समुद्र ने विष्णु को लक्ष्मी दी थी ॥१५४॥ कन्या के साथ उसने रत्नों के चमकते हुए ढेर दहेज में दिये जो अनेक विवाहों में प्रज्वलित अग्नियों का भ्रम उत्पन्न कर रहे थे ॥१५५॥ समस्त कांचनपुर नगर में विवाह का उत्सव इस प्रकार हुआ कि ध्वजा (पताका) वाले घर भी ऐसे नृत्य रहे थे मानों राजा से वस्त्र प्राप्त किये हुए हों ॥१५६॥ नरवाहनदत्त विवाहोत्सव के हो जाने पर पत्नी रत्नप्रभा के साथ दिव्य भोगों का भोग करता हुआ उस नगर में रहने लगा ॥१५७॥ वह उस नगरी के दिव्य बाग-बगीचों वापियों और देव-मन्दिरों में विहार करता था और विद्या के प्रभाव से रत्नप्रभा के साथ आकाश में भी विचरण करता था ॥१५८॥ इस प्रकार, पत्नी के साथ नरवाहनदत्त ने उस विद्याधरों के नगर में कुछ दिनों तक रहकर अपने पिता के पास जाने के लिए यौगन्धरायण के साथ सम्मति की ॥१५९॥
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर श्वश्र्वा ततो रचितमङ्गलसंविधान- सम्पूजितः ससचिवः श्वशुरेण भूयः। तेनैव पुत्रसहितेन सह प्रतस्थे कान्तासखस्तदधिरुह्य पुनर्विमानम् ॥१६०॥ प्राप्याशु तां प्रमदनिर्भरवत्सराज- बद्धोत्सवो स जननीनयनामृताभः। रत्नप्रभां वधूमथ स्वपुरीं विवेश हेमप्रभेण ससुतेन सहानुगेण ॥१६१॥ वत्सेश्वरोऽपि सह वासवदत्तया तं पावार्तं समभिनन्द्य सुतं वधूं च। हेमप्रभं सतनयं विभवानुरूपं सम्बन्धिर्न मवमपूजयदूर्जितश्रीः ॥१६२॥ अथ विद्याधरराजः तस्मिन्नापृच्छ्य वत्सराजादीन्। उत्पत्य नमः ससुते गतवति हेमप्रभे स्वपुरम् ॥१६३॥ नरवाहनदत्तोऽसौ रत्नप्रभया समदनमञ्जुकया। सह सुखितस्तत्रैवीदिवसः सचिवैर्निजैर्युक्तः ॥१६४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके प्रथमस्तरङ्गः।
द्वितीयस्तरङ्गः रत्नप्रभाकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं विद्याधरीं भार्या भव्यां रत्नप्रभां नवाम्। तस्य प्राप्तवतोऽन्येद्युस्तद्वेश्मनि तया सह ॥१॥ नरवाहनदत्तस्य स्थितस्य प्रातराययुः। दर्शनार्थमुपद्वारं सचिवा गोमुखादयः ॥२॥ द्वाःस्थया क्षणमद्येषु तेष्वत्रावेदितेष्वथ। प्रविष्टेष्वावृतवदनां द्वाःस्थां रत्नप्रभाम्यधात् ॥३॥ द्वारमेषां न रोद्धव्यमिह प्रविशतां पुनः। आर्यपुत्रवयस्यानां स्वं शरीरममी हि नः ॥४॥
सप्तम लम्बक २५
सप्तम लम्बक २५ तदनन्तर सास के द्वारा मंगल-विधान करने पर और ससुर के द्वारा सम्मानित किया गया नरवाहनदत्त पुत्र (साले) के सहित अपने ससुर के साथ अपनी पत्नी और मित्रों को लिये हुए विमान पर बैठकर कौशाम्बी की ओर चला ॥१६०॥ और, शीघ्र ही वत्सराज से किये गये उत्सव से अलंकृत राजधानी में माताओं की आँखों के लिए अमृत प्रवाहित करता हुआ नरवाहनदत्त अपने ससुर, साले और पत्नी रत्नप्रभा एवं अपने साथियों के साथ पहुँचा ॥१६१॥ वासवदत्ता के साथ उदयन ने भी पैरों पर गिरते हुए पुत्र और पुत्रवधू का अभिनन्दन किया और अपने विभव के अनुरूप अपने नये सम्बन्धी हेमप्रभ और उसके पुत्र वज्रप्रभ का स्वागत- सत्कार किया ॥१६२॥ तदनन्तर हेमप्रभ के उदयन से आज्ञा लेकर पुत्र के साथ आकाश में उड़कर अपने नगर को विदा होने पर, वह नरवाहनदत्त मदनमंचुका और रत्नप्रभा के साथ अपने मित्रों से मिलकर सुख से दिन बिताने लगा ॥ १६३-१६४ ॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग रत्नप्रभा की कथा (क्रमशः) इस प्रकार, विद्याधर-जाति की रत्नप्रभा नामक नई पत्नी को प्राप्त करके आनन्द का उपभोग करते हुए नरवाहनदत्त से मिलने के लिए उसके गोमुख आदि मित्र एक दिन प्रातः काल आये और रनिवास के द्वार पर खड़े हुए ॥१-२॥ द्वारपालिका के द्वारा कुछ समय तक रोके जाकर और फिर सूचना देकर भीतर प्रवेश पाने पर नरवाहनदत्त द्वारा उनका स्वागत-सत्कार किया गया। उसके बाद रत्नप्रभा ने द्वार- पालिका से कहा—'तुम अब इन लोगों को द्वार पर रोका न करो ये आर्यपुत्र के मित्र और हमारे ही अंग हैं ॥३-४॥ ४
२४ कथासरित्सागर
२४ कथासरित्सागर श्वश्र्वा ततो रचितमङ्गलसंविधान- सम्पूजितः ससचिवः श्वशुरेण भूयः । तेनैव पुत्रसहितेन सह प्रतस्थे कान्तासखस्तदधिरुह्य पुनर्विमानम् ॥१६०॥ प्राप्याथ तां प्रमदनिर्भरवत्सराज- बद्धोत्सवां स जननीनयनामृतौघः । रत्नप्रभां दधदथ स्वपुरीं विवेश हेमप्रभेण ससुतेन सहानुगीतः ॥१६१॥ वत्सेश्वरोऽपि सह वासवदत्तया तं पादानतं समभिनन्द्य सुतं वधूं च । हेमप्रभं सतनयं विभवानुरूपं सम्बन्धिनं समभिपूजयदूर्जितश्रीः ॥१६२॥ अथ विद्याधरराजे तस्मिन्नापृच्छ्य वत्सराजादीन् । उत्पत्य नभः ससुते गच्छति हेमप्रभे स्वपुरम् ॥१६३॥ नरवाहनदत्तोऽसौ रत्नप्रभया समदमच्छुकया । सह सुखितस्तदनेकैर्दिवसैः सखिभिर्निजैर्युक्तः ॥१६४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके प्रथमस्तरङ्गः ।
द्वितीयस्तरङ्गः रत्नप्रभाकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं विद्याधरीं भार्यां भव्यां रत्नप्रभां नवाम् । तस्य प्राप्तवतोऽन्येद्युस्तद्वेश्मनि तया सह ॥१॥ नरवाहनदत्तस्य स्थितस्य प्रातराययुः । दर्शनार्थमुपद्वारं सचिवा गोमुखादयः ॥२॥ द्वारस्थया क्षणहृदपु तेष्वत्रावेदितेष्वथ । प्रविष्टेष्वादृतश्चैतां द्वारस्थां रत्नप्रभाम्यभात् ॥३॥ द्वारमेषां न रोद्धव्यमिह प्रविशतां पुनः । मार्यपुत्रवयस्यानां स्वं शरीरममी हि नः ॥४॥
सप्तम लम्बक २७
सप्तम लम्बक २७ पतिव्रत्य पर ऐसी सङ्कल्प न होनी चाहिए—ऐसा मेरा विचार है। द्वारपालिका को ऐसा कहकर उसने अपने पति से कहा—'आर्यपुत्र ! इस प्रसंग में मैं कहती हूँ सुनो। स्त्रियों की रक्षा और नियन्त्रण का मैं सूक्ष्म नीति समझती हूँ या ईर्ष्या अथवा अज्ञानवश उसमें कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। स्त्रियों का गहन चर तथा अन्य सम्भाषण से ही हानि होती है। पंचेन्द्रियवशकरण के बिना तो ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं। मदोन्मत्ता नारी और नदी का नियमन कौन कर सकता है ! ॥५–८॥ राजा रत्नाधिप की कथा मैं इस सम्बन्ध में एक कथा कहती हूँ सुनो— गङ्गा के बीच में रत्नकूट नाम का एक विख्यात द्वीप है। वहाँ महा उत्साही और परम विष्णुभक्त पराक्रमसागर रत्नाधिपति नाम का राजा था। वह राजा पृथ्वी के सभी राजाओं की कन्याओं के साथ विवाह करता हुआ सारी पृथ्वी का विजय करने के लिए नित्य मन्त्रणा सलाह करने लगा॥ —११॥ उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वयं दर्शन देकर कहा—'राजन् ! मैं तेरे तप पर प्रसन्न हूँ। जो कहता हूँ उसे सुनो—॥१२॥ कलिङ्ग देश में कार्पटिकेश्वर के मन्दिर पास श्वेत हाथी के रूप में उत्पन्न हुआ है। वह श्वेतभीम के नाम से प्रसिद्ध है ॥१३॥ वह हाथी दुर्जय की मन्त्रसिद्धि के कारण और मेरी भक्ति के कारण सभी कामरूपधारियों और दुर्धरत्व का अन्त करवाता है ॥१४॥ मैं तेरे स्वप्न में उसे कहता हूँ कि वह ब्राह्मण-धर्मी का रूप धरकर तुम्हारा दर्शन करेगा ॥१५॥ तू सवेरे हाथी का रूप बनाए उस ब्राह्मण के दर्शन से ही कृतकृत्य हो जाओगे व बहुत-सा धन देकर फिर शहर में लौटाकर उस ब्राह्मण के साथ हाथी का पूजन और दर्शन सदा करना ॥१६॥ फिर राजा जागकर उठा और प्रातः उठकर विधिपूर्वक उसने ब्राह्मण रूप श्वेतहस्ती के दर्शन किए ॥१७॥ राजाने उसका बहुत-सा पूजन कर उसे विदा किया और फिर उसने श्वेत हाथी का बहुत-सा पूजन किया और हाथी के प्रभाव से उसने सारी पृथ्वी को अपने वश किया
रक्षा चान्तःपुरेऽप्येवंदुर्लभैवेहसम्मत मम। इति त्रास्यामुदित्वा सा स्वपतिं तमभाषीत् ॥५॥ आर्यपुत्र प्रसङ्गेन वदामि एष तच्छृणु। नीतिमात्रमहं मन्ये स्त्रीणां रक्षानिमन्त्रणम् ॥६॥ ईर्ष्याकृतोऽथवा मोहः कार्यं तेन न किञ्चन। महत्तरेण रक्ष्यन्त शीलेनैव कुलस्त्रियः ॥७॥ धातापि न प्रभुः प्रायश्चपलानां तु रक्षणे। मत्ता नदी च नारी च नियन्तुं केन पार्यते ॥८॥ राज्ञो रत्नाधिपतेः कथा तथा च श्रूयतामत्र कथां वः कथयाम्यहम्। अस्तीह रत्नकूटाख्यं द्वीपं मध्येऽम्बुधेर्महत् ॥९॥ तत्र राजा महोत्साहः पुरा परमवैष्णवः। यथार्थेनाभिधानेन रत्नाधिपतिरित्यभूत् ॥१०॥ स राजा विजयं पृथ्व्याः सर्वराजात्मजास्तथा। भार्याः प्राप्तुं तपस्तेपे विष्णोराराधनं महत् ॥११॥ सन्तुष्टस्तपसा साक्षात् भगवानादिदेश तम्। उत्तिष्ठ राजंस्तुष्टोऽस्मि तदिदं वच्मि ते शृणु ॥१२॥ कलिङ्गविषये कोऽपि गन्धर्वो मुनिशापतः। समुत्पन्नो गजः श्वेतः श्वेतरश्मिरिति श्रुतः ॥१३॥ पूर्वजन्मतपःसिद्धियोगाम्दवमखितस्तपा । ज्ञानी गगनगामी च गजो जातिस्मरण सः ॥१४॥ दत्तादेशो मया स्वप्ने स च हस्ती महांस्तव। एत्य स्वयं द्युमार्गेण वाहनत्वं प्रपत्स्यते ॥१५॥ तमारुह्य गजं श्वेतं सुरेन्द्रमिव वज्रभृत्। व्योममार्गेण यं यं त्वं राजानमभियास्यसि ॥१६॥ स स दिव्यानुभावाय भीतस्तुभ्यं प्रदास्यति। स्वप्ने मयैव दत्ताशः कन्यादाननिभास्करम् ॥१७॥ एवं विजेष्यसे कृत्स्नां पृथ्वीमन्तःपुराणि च। राजपुत्रीसहस्राणि त्वमशीतिमवाप्स्यसि ॥१८॥ इत्युक्त्वाऽन्तर्हिते विष्णौ स राजा कृतपारणः। अभ्युद्यदुरागतं व्योम्ना तं ददर्श गजं शुभम् ॥१९॥
The provided image is completely blank and does not contain any text to transcribe.
२८ कथासरित्सागर
२८ कथासरित्सागर आरुह्योपनतं तं च यथादिष्टं स विष्णुना। तथा विजित्य पृथिवीमाजह्रे राजकन्यकाः ॥२०॥ सहस्राशीतिसंख्याभिस्ततस्ताभिः समं च सः। उवास रत्नकूटेऽत्र यथेच्छं विहरन्नृपः ॥२१॥ शान्त्यर्थं शीतरश्मेश्च तस्य दिव्यस्य दन्तिनः। प्रत्यहं भोजयामास विप्राणां शतपञ्चकम् ॥२२॥ कदाचिच्च समासाद्य परिभ्रम्य स भूपतिः। द्वीपान्तराणि स्वं द्वीप रत्ननाभिपत्तिराययौ ॥२३॥ तत्रावतरतस्तस्य गगनात्तु गजोत्तमम्। चञ्च्वा तार्क्ष्यावभवः पक्षी मूर्ध्नि चैवावताडयत् ॥२४॥ स च पक्षी प्रदुद्राव राज्ञा तीक्ष्णाङ्कुशाहतः। हस्ती तु भूमावपतच्चञ्च्वाघातेन मूर्च्छितः ॥२५॥ नृपेऽवतीर्णे स गजो लब्धसंज्ञोऽपि नाग्रहीत्। उत्थाप्यमानोऽप्युत्थातुं निरस्तकवलग्रहः ॥२६॥ पञ्चाहानि यथैवास्मिन्वारणे पतितस्थिते। दुःखितः स निराहारो राजा चाप्येवमब्रवीत् ॥२७॥ भो लोकपाला भूतास्मिन्नुपार्यं सङ्कटे मम। अन्यमोपहरिष्यामि छित्त्वाहं स्वशिरोऽद्य वः ॥२८॥ इत्युक्त्वैवासलग्नोऽतं स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतम्। अशरीरा जगादैवं वाणी तत्क्षणमम्बरात् ॥२९॥ मा साहस कृथा राजन्साध्वी काचित्करोति चेत्। हस्तस्पर्शं गजस्यास्य सदुत्तिष्ठति नान्यथा ॥३०॥ तच्छ्रुत्वैवामृतलतां नाम दृष्ट्वा स भूपतिः। मुख्यामानाययामास निजां देवीं सुरक्षिताम् ॥३१॥ तया स्पृष्टः स हस्तन नोत्तिष्ठद् गजो यदा। तदा सोऽन्या निजाः सर्वा देवीरानाययन्नृपः ॥३२॥ ताभिः कृतकरस्पर्शः समस्ताभिरपि क्रमात्। नैवोत्तस्थौ द्विपः सोऽत्र न तास्वेकाप्यभूत्सती ॥३३॥ १ नोऽन्येष्यासन्नपर्वः।
सप्तम लम्बक २९
सप्तम लम्बक २९ उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान् के आज्ञानुसार चढ़कर राजा ने सारी पृथ्वी को जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२०॥ वह राजा अस्सी हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ रहने लगा ॥२१॥ और उस श्वेतरश्मि¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पाँच सौ ब्राह्मणों को भोजन कराता था ॥२२॥ किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा अपने द्वीप में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुड़जातीय पक्षी ने चोंच से प्रहार किया ॥२३ २४॥ राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो मारा गया किन्तु हाथी चोंच की मार से मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥ राजा के उतर जाने पर होश में आया हुआ भी वह हाथी उठाये जाने पर भी न उठ सका और न आहार कर सका ॥२६॥ इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़ रहने पर राजा भी निराहार रहकर दुःखित हुआ और बड़ी चिन्ता में पड़कर बोला—'हे लोकपालो मुझे इस संकट में कोई उपाय बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूँगा' ॥२७-२८॥ ऐसा कहकर और तलवार खींचकर अपना गला काटने को तैयार राजा से आकाशवाणी ने अप्रत्यक्ष रूप से कहा—॥२९॥ 'हे राजन् ! ऐसा दुस्साहस कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस हाथी का स्पर्श करेगी तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ॥३०॥ यह सुनकर प्रथम राजा ने अमृतलता नाम की सुप्रतिष्ठ प्रधान रानी को बुलवाया ॥३१॥ जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा तब उसने अन्य सभी रानियों को बुलवाया ॥३२॥ उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा तब यह निश्चय हो गया कि इनमें कोई भी सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है ॥३३॥ १ किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' लिखा है। किन्तु 'श्वेतरश्मि' नाम ही उचित प्रतीत होता है।—अनु.
२८ कथासरित्सागर
२८ कथासरित्सागर आरुह्योपनतं स च यथादिष्टः स विष्णुना। तया विजित्य पृथिवीमाजह्रे राजकन्यकाः ॥२०॥ सहस्राशीतिसंख्याभिस्ततस्ताभिः समं च सः। उवास रत्नकूटेऽत्र यथेच्छं विहरन्नृपः ॥२१॥ शान्त्यर्थं शीतरश्मेश्च तस्य दिव्यस्य दन्तिनः। प्रत्यहं भोजयामास विप्राणां शतपञ्चकम् ॥२२॥ कदाचिच्च तमारुह्य परिभ्रम्य स भूपतिः। द्वीपान्तराणि स्वं द्वीपं रत्नाधिपतिराययौ ॥२३॥ तत्रावतरतस्तस्य गगनात्तु गजोत्तमम् । चञ्च्वा तार्क्ष्योद्भवः पक्षी मूर्ध्नि दैवादताडयत् ॥२४॥ स च पक्षी प्रदुद्राव राज्ञा तीक्ष्णाङ्कुशाहतः। हस्ती तु भूमावपतच्चञ्च्वाघातेन मूर्च्छितः ॥२५॥ मुपेजातीर्णं स गजो लब्धसंज्ञोऽपि माद्यकन्। उत्थाप्यमानोऽप्युत्थातुं निरस्तकबलप्रग्रहः ॥२६॥ पञ्चाहानि तथैवास्मिन्वारणे पतितस्थिते। दुःखितः स निराहारो राजा चाप्यवमब्रवीत् ॥२७॥ भो लोकपाला ब्रूतास्मिन्नुपायः सङ्कटे मम। अद्यैवोपहरिष्यामि छित्त्वाहं स्वशिरोऽथ वः ॥२८॥ इत्युक्त्वैवात्तखङ्गं तं स्वशिरश्छेत्तुमुद्यतम्। अशरीरा जगादेव वाणी तत्क्षणमम्बरात् ॥२९॥ मा साहसं कृथा राजन्साध्वी काचित्करोति यत्। हस्तस्पर्शं गजस्यास्य तदुत्तिष्ठति नान्यथा ॥३०॥ सच्छ्रुत्वैवामृतलतां नाम दृष्टः स भूपतिः। मुख्यामानाययामास निजां देवीं सुरक्षिताम् ॥३१॥ तया स्पृष्टः स हस्तेन नोदतिष्ठद् गजो यदा। तदा सोऽन्या निजाः सर्वा देवीरानाययन्नृपः ॥३२॥ ताभिः कृतकरस्पर्शः समस्ताभिरपि क्रमात्। नैवोत्तस्थौ द्विपः सोऽत्र न तास्वेकाप्यभूत्सती ॥३३॥ १ भोजनेप्यसमर्थः।
सप्तम लम्बक २१
सप्तम लम्बक २१ उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान के आज्ञानुसार चढ़कर राजा न सारी पृथ्वी को जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२ ॥ वह राजा अस्सी हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ रहने लगा ॥२१॥ और उस श्वेतरश्मि¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पाँच सौ ब्राह्मणों को भोजन कराता था ॥२२॥ किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा अपम द्वीप में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुडजातीय पक्षी ने चोंच से प्रहार किया ॥२३-२४॥ राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो भाग गया किन्तु हाथी चोंच की मार से मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥ राजा के उतर जाने पर होश में आया हुआ भी वह हाथी उठाये जाने पर भी न उठ सका और न आहार कर सका ॥२६॥ इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़े रहने पर राजा भी निराहार रहकर दुःखित हुआ और बड़ी चिन्ता में पड़कर बोला—'हे लोकपालो मुझे इस संकट में कोई उपाय बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूँगा' ॥२७-२८॥ ऐसा कहकर और तलवार खींचकर अपना गला काटने को तैयार राजा से आकाशवाणी ने अशरीर रूप से कहा—॥२९॥ 'हे राजन् ! ऐसा दुस्साहस कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस हाथी का स्पर्श करेगी तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ॥३ ॥ यह सुनकर प्रसन्न राजा ने अमृतलता नाम की सुरक्षित प्रधान रानी को बुलवाया ॥३१॥ जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा तब उसने अन्य सभी रानियों को बुलवाया ॥३२॥ उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा तब यह निश्चय हो गया कि इनमें कोई भी सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है ॥३३॥ १ किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' मिला है। किन्तु श्वेतरश्मि' नाम ही उचित प्रतीत होता है।—अनु.
३० कथासरित्सागर
३० कथासरित्सागर अन्तःपुरसहस्राणि साध्वीनीतमपि स्फुटम् । दृष्ट्वा विलब्धितान्येव स राजा जनसन्निधौ ॥३५॥ विसङ्क्य स्वपुरात्तस्मान्नानाय्य निखिलाः स्त्रियः। अशनं हस्तिनस्तस्य हस्तस्पर्शमकारयत् ॥३५॥ तथापि यस्य नोत्तस्थौ गजस्तस्तरसा भूपतिः। अस्मत् पुरे न साध्वी स्त्री नैकापीति त्रपां ययौ ॥३६॥ तावच्च दृढगुप्ताख्यस्ताम्रलिप्त्याः समागतः । वणिग्गवाक्षपो मुक्त्वा युक्तान्तं च गतोत्सुकः ॥३७॥ तस्य चामररी पश्चादाजगाम पतिव्रता। एषा शीलवती नाम सा तद्दृष्ट्वा तमब्रवीत् ॥३८॥ स्पृशाम्येष करेणैनं त्वमभूदपरो मया। मनसापि न भद्रपास्तन्मुक्तिस्त्वयं द्विपः ॥३९॥ इत्युक्त्वोरोचयद्धस्तेन सा च संस्पर्श तं गजम्। उत्तस्थौ च गजस्तस्य क्षणाच्च स ततोऽर्हणात् ॥४०॥ इमास्ताः पित्र्यतां प्राप्ता मान्त्रिन्वदवरोधमाः। गजाननन्नहारगर्मर्या जगतानन्य या ॥४१॥ इति शीलवतीं तत्र कृतकोलाहलो जनः। तां तुष्टाव गजं दृष्ट्वा स्वान्तर्गन्धे समुत्थितम् ॥४२॥ गजापि रक्षितामिति परितुष्याभिनन्द्य ताम्। प्रादूरकरोत्तदा रत्नैः शीलवतीं सतीम् ॥४३॥ नृपस्वामिन न यन्मित्रं ह्रीङ्गुणं मन्येष तवम्। अश्रूयतेऽने भाग्यं शृणु गच्छङ्गतामिव ॥४४॥ तस्मिंस्तत्त्वविदित्वा निजभार्य्यापराद्धतः। विससर्जाऽऽत्मनाऽपत्रस्तन्निनाय्यरवागतः ॥४५॥ अथैतादृक् शृङ्गालाख्यः स्वगृहस्य सन्निधौ। गच्छन् ददर्श सा च स्नात्वा विश्रान्त मूता ॥४६॥ दीक्षिताङ्गीव न चारित्रवता विशङ्कितेति। सा च राज्ञाऽब्रवीत् किं मां त्वमन्वागच्छसीति ॥४७॥ स्पृष्टा मया सा गत्वा शीलावत्युवाचतः। उपसर्गेण शङ्केयं च साध्वित्यागता मया ॥४८॥ ततस्तस्याः सा तत्र प्रच्छन्नाऽभूत् कौतुकात्।
सप्तम लम्बक ३१
सप्तम लम्बक ३१ राजा की अस्सी हजार रानियां इस घटना से जन-समाज के सामने अत्यन्त लज्जित हुई ॥३४॥ तब राजा ने भी लज्जित होकर अपने नगर की सभी स्त्रियों को बुलाकर क्रम से हाथी को छुआया ॥३५॥ फिर भी वह हाथी न उठा तो राजा को इसके लिए बड़ी लज्जा इस बात की हुई कि मेरे नगर में एक भी सदाचारिणी स्त्री नहीं है ॥३६॥ इतने में ताम्रलिप्ती (तमलुक) नगरी से आया हुआ हर्षगुप्त नाम का एक वैश्य उस तमाशे को देखने के लिए आया। उसके पीछे उसकी एक शीलवती नाम की सधवा पत्नी भी आई और उसने देखकर कहा ॥३७-३८॥ मैं इस हाथी को हाथ से छूती हूँ। यदि मैंने अपने पति के सिवाय दूसरे को मन से भी न ध्यान किया हो तो यह हाथी उठ जाय ॥३९॥ ऐसा कहकर और समीप जाकर उसने हाथी को छू दिया। उसके छूते ही हाथी उठ खड़ा हुआ और आहार करने लगा ॥४०॥ इस प्रकार, ईश्वर के समान इस संसार की सृष्टि पालन और संहार करने में समर्थ पतिव्रता स्त्रियां विरले ही हैं। इस प्रकार, कोलाहल करती हुई जनता वहाँ पर सती शीलवती की प्रशंसा करने लगी ॥४१ ४२॥ राजा ने प्रसन्न होकर सती शीलवती को असंख्य धन रत्न दिये और उसके पति हर्षगुप्त को राजभवन के समीप ही घर देकर बसा दिया और उसका बहुत सत्कार किया ॥४३ ४४॥ और तभी से उस राजा ने अपनी सभी स्त्रियों का स्पर्श तक छोड़ दिया और उनके लिए केवल भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध कर दिया ॥४५॥ तदनन्तर राजा ने हर्षगुप्त को बुलवाया। उसके साथ भोजन करने के बाद राजा ने सती शीलवती से एकान्त में कहा— ॥४६॥ 'हे शीलवती ! क्या तुम्हारे पिता के कुल में कोई कन्या है ? यदि है तो उसे मुझे दिलवाओ। मैं समझता हूँ कि वह भी तुम्हारे समान अवश्य सदाचारिणी होगी ॥४७॥ उस राजा से इस प्रकार कही गई शीलवती बोली— ताम्रलिप्ती नगरी के शंखदत्ता नाम की मेरी बहन है। महाराज यदि आप चाहते हैं तो उस सुन्दरी से विवाह कीजिए ॥४८ ४९॥
३२ कथासरित्सागर
३२ कथासरित्सागर इत्युक्तः स तया राजा प्रतिपेदे नृपतिः तत् ॥४९॥ निश्चित्य च तदन्वेद्युः शीलवत्या तया सह। तेनापि हर्षगुप्तेन समारुह्य खगामिनम् ॥५०॥ श्वेतरश्मिं स्वयं गत्वा ताम्रलिप्तीं स भूपतिः। विवेश हर्षगुप्तस्य वणिजस्तस्य मन्दिरम् ॥५१॥ तत्र पप्रच्छ तदहर्लग्नं शीलवतीस्वसुः। विवाहे राजदत्ताया गणकानातमनस्तथा ॥५२॥ गणकाश्चोभयोः पृष्ट्वा नक्षत्राण्येवमब्रुवन्। लग्नौ वां शोभनो राजन्नस्ति मासेष्वितस्त्रिषु ॥५३॥ अद्य वा विद्यते यादृक्स्तेनैषा चेद्विवाह्यते। राजदत्ता ततोऽवश्यमसाध्वी भवति प्रभो ॥५४॥ गणकैरेवमुक्तोऽपि कमनीयवधूत्सुकः। एकाकी चिरमप्यास्तु स राजा समचिन्तयत् ॥५५॥ अलं विचारेणाद्यैव राजदत्तामिहोद्वहे। शीलवत्याः स्वसा ह्येषा निर्दर्पा नासती भवेत् ॥५६॥ यतत्समुद्रमध्येऽस्ति द्वीपलब्धममानुषम्। एकशून्यचतुःशालं तत्रैतां स्थापयामि च ॥५७॥ दुर्गेऽेऽत्र परीवारं स्त्रीरेवास्याः करोमि च। पुरुषादर्शनादेवमसती स्यादियं कथम् ॥५८॥ इति निश्चित्य तदहः परिणिन्ये स भूपतिः। तां राजदत्तां सहसा शीलवत्या समर्पिताम् ॥५९॥ कृतोद्वाहः कृताचारो हर्षगुप्तेन तां वधूम्। आदाय प्रेमैव समं शीलवत्या तया च सः ॥६०॥ श्वेतरश्मिं समारुह्य क्षणेन नभसा निजम्। मार्गोन्मुखेन द्वीपं रत्नकूटं तदाययौ ॥६१॥ सविमेने च तां भूयस्तया शीलवतीं यथा। प्राप्तसाध्वीव्रतफला कृतार्था समपादि सा ॥६२॥ ततस्तमेव करिणि श्वेतरश्मौ नभश्चरे। आरोप्य तां नववधू राजदत्तां स चिन्तिते ॥६३॥ नीत्वा सप्ताब्धिमध्यस्थे द्वीपे मानुषदुर्गमे। आस्खापयच्चतुःशाले नारीमयपरिच्छदाम् ॥६४॥
सप्तम लम्बक ६३
सप्तम लम्बक ६३ उसके ऐसा कहने पर राजा ने उसे स्वीकार किया ॥४९॥ दूसरे दिन शीलवती से निश्चय करके उस हर्षगुप्त वैश्य के साथ आकाशगामी श्वेतरश्मि हाथी पर बैठकर वह राजा स्वयं ताम्रलिप्ती नगरी में गया और हर्षगुप्त के यहाँ आकर ठहरा ॥५०-५१॥ वहाँ जाकर उसने ज्योतिषियों से शीलवती की बहन से विवाह करने का लग्न पूछा। गणकों ने दोनों के नक्षत्र पूछकर कहा—'राजन् ! तुम दोनों का विवाह आज से तीन महीने के बाद ठीक बनता है। आज ही यदि इसका विवाह किया जायगा तो यह कन्या अवश्य दुराचारिणी हो जायगी' ॥५२-५४॥ गणकों के इस प्रकार कहने पर भी उस सुन्दरी कन्या के लिए उत्सुक और इतने दिनों तक अकेले रहने में असमर्थ राजा ने सोचा ॥५५॥ अधिक सोच-विचार क्या करें। आज ही राजवला से विवाह करता हूँ क्योंकि यह शीलवती की बहन है शान्त और सती ही होगी। और, रत्नद्वीप के समीप ही जो बिना मनुष्यों का एक छोटा-सा टापू है उसमें एक चौसाला (चतुःशाल) बनाकर इसे रखता हूँ ॥५६-५७॥ उस दुर्गम द्वीप में इसके नौकर-चाकरों में सभी स्त्रियाँ रहेंगी। पुरुष का जब दसन ही नहीं होगा तब यह व्यभिचारिणी कैसे होगी ॥५८॥ ऐसा सोचकर राजा ने उसी दिन शीलवती से दान की गई उस राजवला से विवाह कर लिया ॥५९॥ इस प्रकार, विवाह करके हर्षगुप्त द्वारा वैवाहिक रीति-रिवाजों के किये जाने पर, राजा उस नववधू, शीलवती और वैश्य के साथ हाथी पर चढ़कर आकाश-मार्ग से रत्नकूट द्वीप म आया जहाँ जनता उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥६०-६१॥ राजधानी में आकर राजा न शीलवती को फिर से पर्याप्त धन मान आदि स सत्कार दिया। उसे भी पतिव्रता-पालन का सच्चा फल मिला ॥६२॥ तदनन्तर राजा उस नववधू को उसी आकाशगामी हाथी पर बिठाकर पूर्वनिर्धारित समुद्र के मध्य में स्थित मनुष्यों से अगम्य द्वीप में ले गया और अनेक दासियों के साथ उस वहीं चौशाल में रख दिया ॥६३ ६४॥ ९
३४ कथासरित्सागर
३४ कथासरित्सागर यद्यद्वस्तूपयुक्तं च तस्यास्तत्तदविलम्बयन् । व्योम्नैव प्रापयामास तत्र तेन गजेन स ॥६५॥ स्वयं तदनुरक्तश्च तत्रैवासीत्सदा निशि । आययौ राजकार्यार्थं रत्नकूटे दिवा पुनः ॥६६॥ एकदा स तया साकं प्रत्यूषे राजसत्तमः । राजा प्रतिघ्नन्सुस्वप्नं सिषेवे पानमङ्गलम् ॥६७॥ तेन मत्ताममुञ्चन्तीमपि मुक्त्वा स तां ययौ । रत्नकूटं स्वकार्यार्थं नित्यस्निग्धा हि राजता ॥६८॥ तत्र तस्थौ सशङ्कन कुर्वन्कार्याणि चेतसा । क्षीबा किमकरोन्मुक्ता सा मयेतीव त्रसता ॥६९॥ तावच्च राजवत्ता सा स्थाने तत्रातिदुर्गमे । महानसादिब्यप्रासु वासीष्वेकाकिनी स्थिता ॥७०॥ द्वारे निधिमिवान्यं तत्तद्रक्षाविजिगीषया । आगतं पुरुषं कञ्चिदृष्ट्वाश्चर्यदायकम् ॥७१॥ कस्त्वं कथमिदं स्थानमगम्यं चागतो भवान् । इति च भ्रान्तिकप्राप्तं क्षीबा पप्रच्छ सा किल ॥७२॥ ततः स दृष्टबहुलक्लेशस्तां पुंस्कोऽब्रवीत् । मुग्धे पवनसेनाख्यो वणिक्पुत्रोऽस्मि माथुरः ॥७३॥ हृतस्वो गोत्रजैः सोऽह्रमनाथः प्रमयात्पितुः । गत्वा विदेशे कृपणां परसेवामशिश्रियम् ॥७४॥ ततः कृच्छ्रेण सम्प्राप्य धनलेशं वणिग्मया । गच्छन्देशान्तरं मार्गे मुषितोऽस्म्येत्य तस्करैः ॥७५॥ ततो भिक्षां भ्रमंस्तुल्यैः सहायैर्गतवानहम् । रत्नानामाकरस्थानं कनकक्षेत्रसञ्ज्ञकम् ॥७६॥ तत्राङ्गीकृत्य भूपस्य भागं संवत्सरावधि । खातं ननक्षिति रत्नं नैकमप्यस्मि लब्धवान् ॥७७॥ मन्दत्सु लब्धरत्नेषु मन्विधेष््वपरेषु च । गत्वाम्भोतीरे दुःखात्तं काष्ठान्यहमुपाहरम् ॥७८॥ अग्निप्रवेशाय चितां यावत्तत्र करोमि तैः । धीवदताभिधस्तावत्कोऽप्यत्र वणिगाययौ ॥७९॥
वहाँ जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती थी उन्हें राजा आकाशगामी हाथी से भेजता था। किसी पुरुष का विश्वास न करता था॥६५॥ स्वयं भी उसके प्रेम के कारण प्रति रात्रि को हाथी से वहाँ जाता था और दिन में फिर रत्नकूट चला आता था॥६६॥ एक बार राजा ने बुरे स्वप्न की शान्ति के लिए प्रभात-काल में ही उसके (राजदत्ता के) साथ मद्यपान कर लिया। मद्यपान से मत्त उस रानी के बार-बार मना करने पर भी वह राजा राजकार्यों को देखने के लिए रत्नकूट चला आया। क्योंकि राजकार्य दैनिक प्रिय कर्तव्य है॥६७-६८॥ वहाँ राजकार्य करते हुए भी राजा मदोन्मत्ता अकेली पत्नी की चिन्ता करते हुए, अनमने भाव से कार्य कर रहा था॥६९॥ इतने में ही वह रानी राजदत्ता दासियों के भोजन-विश्राम आदि कार्यों में व्यस्त हो जाने पर, उस दुर्गम द्वीप के भवन के द्वार पर अकेली ही निकल आई ॥७०॥ उसके द्वार पर आते ही उसकी रक्षा भंग करने के लिए मानों दैव से प्रेरित कोई पुरुष आया उसे मदोन्मत्ता राजदत्ता ने देखा और पास आने पर पूछा—'तुम कहाँ से आये हो कौन हो और इस दुर्गम स्थान पर किस प्रकार आ सके ? ॥७१-७२॥ अनेक कष्टों को झेले हुए उस पुरुष ने कहा—'हे सुन्दरी ! मैं मथुरावासी पवनसेन नामक बनिये का पुत्र हूँ। पिता की मृत्यु होने पर कुटुम्बियों द्वारा सब धन हरण कर लेने पर विदेश जाकर दीन चाकरी करने लगा॥७३-७४॥ तब बड़ी कठिनाई से व्यापार द्वारा धन कमाकर दूसरे देश को जाता हुआ राह में चोरों से लूट लिया गया॥७५॥ तब अपने ऐसे लोगों के साथ रत्नों की खदानोंवाले कनक-क्षेत्र में गया॥७६॥ वहाँ पर राजा को हिस्सा देने का निर्णय करके एक साल तक रत्न-प्राप्ति के लिए जमीन खोदता रहा। गहरे गड्ढों के खोदने पर भी रत्न न मिला॥७७॥ और, मेरे साथी रत्नों को पाकर प्रसन्न हो रहे थे इसलिए मैंने दुःख से पीड़ित होकर समुद्र के किनारे लकड़ियाँ एकत्र करके जल मरने के लिए चिता बनाई। जब मैं चिता में प्रवेश कर ही रहा था कि इतने में जीवदत्त नामक जहाजी बनिया दैवयोग से आया॥७८-७९॥