कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
१८४ कथासरित्सागर
१८४ कथासरित्सागर सिद्धैश्च विद्याधरचक्रवर्तिपत्नी भवित्री गदिता प्रभो सा। तन्मोचयेनां कुरु न प्रमादं यावन्न दूरं ह्रियते हठेन ॥१२६॥ इत्यार्त्तवेतालवचो निशम्य प्रयात तां मोचयतेति सोऽस्मान्। देवः समादिशदथाम्बरेण गत्वैव सास्माभिरवापि कन्या ॥१२७॥ सचक्रवर्त्तिश्रुतशर्महेतोरेनां हरामीति च तं वदन्तम्। संस्तम्भ्य तेजःप्रभवाद्रथस्था सास्माभिरानीय विमोचितीर्णा ॥१२८॥ तेनापिता च स्वजनाय कन्या दृष्टं मया काममपूर्वमेतत्। ततोऽत्र काश्चिद्दिवसानुषित्वा प्रणम्य यवं तमिहागतास्मि ॥१२९॥ इत्युक्तवाक्या खरभानना सा योगिन्यथास्माभिरपृच्छ्यतैतम्। को ब्रूहि विद्याधरचक्रवर्ती भविष्यति त्वं खलु वेत्सि सर्वम् ॥१३०॥ सूर्यप्रभो हन्त भविष्यतीति प्रोक्ते तया सिंहबलोऽब्रवीत्ती। असत्यमेतद्भगनु बद्धकक्ष्या देवा हि सेन्द्राः श्रुतशर्मपक्षे ॥१३१॥ ध्रुवन्तदार्या भवति स्म सा नो न प्रत्ययच्चेच्छृणुत ब्रवीमि। यथा भविष्यत्यचिरेण युद्धं सूर्यप्रभस्य श्रुतशर्मणश्च ॥१३२॥ हनिष्यते सिंहबलो यदाथ युष्मत्समक्षं युधि मानुषेण। युवामभिज्ञानमिदं विलोक्य विश्वास्त्यथः सत्यमिदं वचो मे ॥१३३॥ एतावदुक्त्वा किल योगिनी सा ययौ च यातानि च तान्यहानि। प्रत्यक्षमध्येह च दृष्टमेतन्मर्त्येन यत्सिंहबलो हतोऽसौ ॥१३४॥ तत्प्रत्ययान्निश्चितमेव मत्वा त्वामेव सर्वद्युचराधिराजम्। [L21: आवामिमौ पादसरोजयुग्मं समाश्रितौ शासनवर्तिनौ ते ॥१३५॥ इत्युक्तवन्तौ स मयादियुक्तः सूर्यप्रभस्तावथ खेचरेन्द्रौ। श्रद्धाय सम्मानितवाग्यथाहं दृष्टो महायानसुमायको द्वौ ॥१३६॥ संश्रुत्या श्रुतशमणोऽत्र सुतरामुद्वेगभाजो व्यधा- दाश्वासं किल दूत्यया क्षतमगं सम्प्रेष्य विद्भावसुम्। धीरस्त्वं भव सर्वदेवसहितः प्रातं करिष्यामि ते साहाय्यं रणमूर्धनीति पृथिवूरसन्दथ तत्स्नेहतः ॥१३७॥ स च परबलभेनालोकनोत्पन्नतोषः समरशिरसि दृष्ट्यारातिपक्षाक्षयञ्च। पुनरपि निजरान्ताः प्रोन्नमन् सूर्यप्रभस्मा जिनि गभिदगमेतो यामरं स्वं विवेश ॥१३८॥ इति महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके पञ्चमस्तरङ्गः।
अष्टम लम्बक १८५
अष्टम लम्बक १८५ सिद्धों का यह आदेश है कि वह कन्या भावी विद्याधर-चक्रवर्ती की पत्नी बनेगी इसलिए हे स्वामिन् आप उसे छुड़ायें ॥१२६॥ दुःखित बेताल के इस प्रकार दीन बचन सुनकर महाकाल स्वामी ने हम योगिनियों को आदेश दिया कि जाकर उसे छुड़ाओ। हम लोगों न आकाश से उड़कर उस कन्या को प्राप्त किया ॥१२७॥ उसे हरण करनेवालेतेज प्रभ ने कहा-'विद्याधर चक्रवर्ती श्रुतशर्मा के लिए मैं इसे ले जा रहा हूँ। हम लोगों ने आत्मशक्ति से उसका स्तम्भन करके उस कन्या को लाकर प्रभु (महाकाल) को अर्पित किया ॥१२८॥ किन्तु प्रभु न वह कन्या उसके बन्धुओं को दे दी यह मैंने बड़ा अपूर्व दृश्य देखा। तदनन्तर, कुछ दिन वहीं रहकर और भगवान् को प्रणाम कर यहाँ आई हूँ ॥१२९॥ इस प्रकार कहती हुई योगिनी से हम लोगों ने यह पूछा कि तुम सब कुछ जानती हो तो बताओ कि भविष्य में विद्याधर-चक्रवर्ती कौन होगा ? ॥१३० ॥ 'सूर्यप्रभ होगा' इस प्रकार योगिनी के उत्तर देने पर सिंहबल हम लोगों से कहने लगा-'यह मिथ्या है क्योंकि श्रुतशर्मा के पक्ष में इन्द्र आदि देवता कमर कसकर तैयार हैं। यह सुनकर भार्या योगिनी बोली-'तुम लोगों को विश्वास न हो तो सुनो मैं कहती हूँ-शीघ्र ही श्रुतशर्मा और सूर्यप्रभ का युद्ध होगा। उस समय यदि सिंहबल तुम लोगों के सामने मनुष्य से मारा जायगा तो तुम दोनों मेरे इस सूचना-चिह्न को देखकर मेरी बात को सत्य मानोगे' ॥१३१-१३३॥ ऐसा कहकर वह योगिनी चली गई और वे दिन भी बीत गये। आज हम लोगों ने प्रत्यक्ष देखा कि मनुष्य ने सिंहबल को मार दिया ॥१३४॥ इस विश्वास के कारण आपको ही आकाशचारियों (विद्याधरों) का चक्रवर्ती मानकर हम दोनों आपके चरणों में उपस्थित हुए हैं। और हम लोग अब आपके आज्ञाकारी हैं' ॥१३५॥ ऐसा कहते हुए विद्याधरों के राजा महायान और सुमाय का सूर्यप्रभ ने मय आदि की सम्मति लेकर समुचित सम्मान दिया ॥१३६॥ यह समाचार सुनकर अत्यन्त व्याकुल श्रुतशर्मा को आश्वासन देने के लिए इन्द्र ने विश्वा- वसु (गन्धर्व) को दूत के रूप में उसके पास भेजा और उसके द्वारा स्नेहपूर्वक उसने यह सन्देश भेजा-'तुम धैर्य रखो मैं प्रातःकाल सब देवताओं के साथ समर-भूमि में तुम्हारी सहायता करूँगा' ॥१३७॥ शत्रुपक्ष में आपसी फूट देखकर सन्तुष्ट और रणभूमि में शत्रुदल को पराजित किया हुआ सूर्यप्रभ उस रात को भी अपनी पत्नियों को छोड़ कर मन्त्रियों के साथ अपने शयन-गृह में चला गया ॥१३८॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का पंचम तरंग समाप्त ४९
१८६ कथासरित्सागरे
१८६ कथासरित्सागरे
षष्ठस्तरङ्गः सूर्यप्रभचरितम्
ततः स रात्रावस्त्रीकः शयनस्थो रणोन्मुखः। सूर्यप्रभः स्वसचिवं वीतभीतिमभाषत ॥१॥ निद्रा मे नास्ति तत्काञ्चित्सत्त्ववीराश्रितां सखे। कथामपूर्वामाख्याहि रात्रावस्यां विनोदिनीम् ॥२॥ एतत्सूर्यप्रभवचो वीतभीतिर्निशम्य स। यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा कथां कथितवानिमाम् ॥३॥
गुणशर्मणो ब्राह्मणस्य कथा
अस्त्यलङ्कृतिरेतस्यां पृथ्व्यामुज्जयिनी पुरी। रत्नेरशेषैर्निचिता सुनिर्मलगुणोन्मिषैः ॥४॥ तस्यामभून्महासेनो नाम राजा गुणप्रियः। कलानां चैकनिलयः सूर्येन्दूभयरूपभृत् ॥५॥ तस्याशोकवती नाम राज्ञी प्राणसमाभवत्। यस्या रूपेण सदृशी नासीदन्या जगत्त्रये ॥६॥ तया देव्या समं तस्य राज्यं राज्ञोऽनुशासतः। गुणशर्माभिधानोऽभूद्विप्रो भृत्यस्तथा प्रियः ॥७॥ स च शूरोऽतिरूपश्च वेदविद्यान्तगो युवा। कलाशस्त्रास्त्रविद्विप्रः सिषेवे तं नृपं सदा ॥८॥ एकदाऽन्तःपुरे नृत्तकथाप्रस्तावतः स तम्। राजा राज्ञी च पार्श्वस्थं गुणशर्माणमूचतुः ॥९॥ सर्वज्ञस्त्वं न चेलाऽत्र तदस्माकं कुतूहलम्। नर्तितुं चेद्विजानासि तत्प्रसीदाथ दर्शय ॥१०॥ एतच्छ्रुत्वा स्मितमुखो गुणशर्मा जगाद तौ। जानामि किं तु तद्युक्तमस्ति नृत्तं न संसदि ॥११॥ हासनं मूढनृत्तं तद्यावद्यं शास्त्रगर्हितम्। तत्रापि राज्ञः पुरतो राज्ञ्याश्च धिगहो त्रपा ॥१२॥ इत्युक्तवन्तं तं राजा गुणशर्माणमत्र सः। प्रत्युवाच तया राज्ञ्या प्रद्यमाणः श्रुतहसात् ॥१३॥
द्वादश लम्बक १८७
द्वादश लम्बक १८७ षष्ठ तरंग सूर्यप्रभ-चरित तदनन्तर, रात्रि में पत्नियों के बिना सोया हुआ और युद्ध के लिए उत्साहित सूर्यप्रभ शय्या पर लेटे-लेटे अपने मन्त्री वीतभीति से बोला—'मित्र मुझे नींद नहीं आ रही है, इसलिए सात्त्विक वीरता से भरी कोई कहानी सुनाओ ॥१-२॥ उस वीतभीति ने सूर्यप्रभ की बात सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर यह कहानी आरम्भ की ॥३॥ गुणशर्मा ब्राह्मण की कथा उज्जयिनी नाम की एक नगरी इस पृथ्वी का श्रृंगारस्वरूप है। वह निर्मल गुणों¹ से गूँथी गई रत्नावली के समान है ॥४॥ उस नगरी में गुणियों का प्यारा महासेन नाम का एक राजा था। वह कलाओं का प्रधान आधार था और प्रताप में सूर्य तथा शील में चन्द्रमा के समान था ॥५॥ उस राजा की प्राणों के समान प्यारी अशोकवती नाम की रानी थी जिसके समान सुन्दरी स्त्री तीनों लोकों में नहीं थी ॥६॥ उस महारानी के साथ राज्य का शासन करते हुए उस राजा का गुणशर्मा नामक आदरणीय और प्यारा मित्र था ॥७॥ वह गुणशर्मा शूर, धीर और अति रूपवान् वेद-विद्याओं का पारगामी युवक और कलाओं तथा शस्त्र-विद्याओं का ज्ञाता था ॥८॥ एक बार, रनिवास में नृत्य-कला की चर्चा के प्रसंग में राजा और रानी ने पास में बैठे हुए गुणशर्मा से कहा—॥९॥ तुम सर्वज्ञ हो इसमें सन्देह नहीं किन्तु हम दोनों के मन में एक कौतुक उत्पन्न हो रहा है कि यदि तुम नाचना जानते हो तो कृपा करो और अपना नृत्य दिखलाओ ॥१०॥ यह सुनकर मुस्कुराते हुए गुणशर्मा ने राजा और रानी से कहा—'जानता हूँ किन्तु राज सभा में नाचना उचित नहीं। ऐसा नाच मूर्खों का होता है और वह हँसी का कारण होता है। शास्त्र से भी निन्दित है फिर, वह भी राजा और रानी के सामने। यह लज्जा का विषय है। धिक्कार है! रानी के कौतूहल से प्रेरित राजा इस प्रकार कहते हुए गुणशर्मा से फिर बोला ॥११-१३॥ १ गुण—डोरा या सूत।
ततस्तं राज्यसाहाय्यसहं मत्वा द्विजोत्तमम्। संस्तुवन्बहु मेने स राजा सर्वातिशायिनम् ॥२९॥ सा स्वशोकवती राज्ञी तस्य रूपगुणांश्च तान्। दृष्ट्वा दृष्ट्वा द्विजस्याभूत्सद्यस्तद्गतमानसा ॥३०॥ एतं चेन्नाप्नुयां नाहं तर्हि मे जीवित फले। इति सञ्चिन्त्य युक्त्या सा राजानमिदमब्रवीत् ॥३१॥ आर्यपुत्र प्रसीदाज्ञां वहास्मै गुणशर्मणे। यथा मां शिक्षयत्येष वीणां वादयितुं प्रभो ॥३२॥ अस्यतदद्य दृष्ट्वा हि वीणावादननैपुणम्। उत्पन्नः कोऽप्ययं तत्र मम प्राणाधिको रसः ॥३३॥ तच्छ्रुत्वा गुणशर्माणं स राजा निजगाद तम्। वल्लकीवादनं देवीमिमां शिक्षय सर्वथा ॥३४॥ यथादिशसि कुर्मोऽत्र प्रारम्भं सुशुभेऽहनि। इत्युक्त्वामन्त्र्य स नृपं गुणशर्मा गृहं ययौ ॥३५॥ वीणारम्भावहारं तु चक्रे स दिवसान्बहून्। दृष्टिमन्यावृतां राज्ञ्याः प्रेक्ष्यापनयसङ्कटः ॥३६॥ एकस्मिंश्च दिने राज्ञो भुञ्जानस्यान्तिके स्थितः। व्यञ्जनं ददतं सूदमेकं मा भक्ष्यवारयत् ॥३७॥ किमेतदिति पृष्टश्च राज्ञा प्राज्ञो जगाद सः। सविषं व्यञ्जनमिदं मया ज्ञातं च लक्षणैः ॥३८॥ सूदेन मम दृष्टं हि व्यञ्जनं दत्ततामुना। मुहुर् भयसकम्पेन शङ्काचकितदृष्टिना ॥३९॥ दृश्यते चाधुनैवैतत्स्वैर्महिषीपतामिदम्। भोजनव्यञ्जनं यस्य निर्हरिष्याम्यहं विषम् ॥४०॥ इत्युक्ते तेन राजा स सूपकारं तमब्रवीत्। व्यञ्जनं भोजयामास भुक्त्वा तच्च मुमूर्च्छ सः ॥४१॥ मन्त्रापास्तविषस्तन तत्र च गुणशर्मणा। राज्ञा पृष्टो यथान्यायमब्रवीत्तं स सूपकृत् ॥४२॥ देवाहं गौडपतिना गता मित्रप्रकाशिना। विषं प्रदातुं प्रहितो युष्माकमिह वैरिणा ॥४३॥
अष्टम लम्बक १६१
अष्टम लम्बक १६१ तब राजा ने उस गुणी कलाकार को राज्य की सहायता के योग्य समझकर उसकी प्रशंसा करते हुए उसे सबसे अधिक मान दिया ॥२९॥ उधर रानी अशोकवती भी उस ब्राह्मण के यौवन सौन्दर्य और उन-उन कलात्मक गुणों को देखकर सर्वस्विला उस पर आसक्त हो गई ॥३० ॥ और सोचने लगी कि यदि मैं इसे न पा सकी तो मेरा जीवन ही निष्फल है। इस पर मेरा अनिर्वचनीय और प्राणों से भी अधिक प्रेम हो गया है। ऐसा सोचकर उसने युक्ति से राजा को यह कहा—'प्रियतम आज इस गुणशर्मा की वीणा-वादन में निपुणता देखकर मुझे उसमें प्राणों से भी अधिक रस (आनन्द) प्राप्त हुआ' ॥३१—३३॥ यह सुनकर राजा ने गुणशर्मा से कहा कि तुम रानी को वीणा-वादन भली भाँति सिखा दो ॥३४॥ आपकी जैसी आज्ञा किन्तु किसी शुभ दिन उसका प्रारम्भ करूँगा'—गुणशर्मा राजा को इस प्रकार उत्तर देकर अपने घर चला गया ॥३५॥ और, रानी की दृष्टि भेद भरी जानकर गुणशर्मा ने वीणा सिखाने का प्रारम्भ टाल दिया ॥३६॥ एक बार, गुणशर्मा भोजन करते हुए राजा के समीप बैठा था। उस समय राजा के आगे व्यंजन परोसते हुए रसोइये को उसने 'मत दो मत दो'—ऐसा कहकर परोसने से रोक दिया ॥३७॥ 'यह क्या बात है'—राजा के इस प्रकार पूछने पर वह बुद्धिमान् गुणशर्मा कहने लगा कि 'यह व्यंजन विषाक्त है यह मैंने रसोइये के लक्षणों से जाना; क्योंकि इसने व्यंजन देते समय भय से काँपते हुए तथा शंका से चंचल दृष्टि से मेरा मुँह देखा ॥३८—३९॥ और, अभी देखा जाता है। यह व्यंजन किसी को खिलाया जाय। मैं उसका विष दूर कर दूँगा' ॥४० ॥ गुणशर्मा के ऐसा कहने पर राजा ने वही व्यंजन उसी रसोइये को खिलाया और वह उसे खाकर तुरन्त मूर्च्छित हो गया। गुणशर्मा के मन्त्र प्रयोग द्वारा विष दूर हो जाने पर स्वस्थ रसोइये ने राजा के पूछने पर सच्ची बात कही—॥४१ ४२॥ 'राजन् तुम्हारे शत्रु गौडदेशाधिपति विक्रमशक्ति ने मुझे तुम्हें विष खिलाकर मार डालने के लिए भेजा था ॥४३॥
१८८ कथासरित्सागर
१८८ कथासरित्सागर नेदं रक्षाविनुतं तद्धस्त्यायुस्सत्रपावहम् । मित्रगोष्ठी रङ्ग्येषा स्ववैदग्ध्यप्रदर्शिनी ॥१४॥ न चाहं भवतो राजा त्वं मे मित्रं निमन्त्रणम् । तन्नाद्य भोक्ष्ये भावत्कमबुद्ध्वा नृत्तकौतुकम् ॥१५॥ इति बद्धग्रहे राज्ञि स विप्रोऽङ्गीचकार तत् । कथं हि रुद्ध्यते भृत्यैर्गेहिकस्य प्रभोर्वचः ॥१६॥ ततः स गुणशर्मात्र ननर्त्ताङ्गैर्यथा तथा। राजा राज्ञी च चित्तेन तौ द्वौ ननृततुर्यथा ॥१७॥ तदन्ते च ददौ राजा वाद्यनायास्य वल्लकीम् । तस्यां च सारणामथ दददेवात्रवीन्नृपम् ॥१८॥ देवाप्रशस्ता वीजेयं तदन्या दीयतां मम । अस्यास्तन्त्र्यां यदेतस्यां शववालो विधेऽन्तरे ॥१९॥ नाहं ह्येतद्विजानामि तन्त्रीभागुरलक्षणे । इत्युक्त्वा गुणशर्म्माङ्गातां विपञ्चीं मुमोच सः ॥२०॥ ततः स छिन्त्वा तन्त्रीं तां यावद्बुद्ध्वेक्ष्य भूपतिः । वीक्षते निरगात्तावदन्तस्तत्पृशमंतः शुनः ॥२१॥ ततः सर्व्वज्ञतां तस्य प्रशंसन् सोऽतिविस्मितः । वीणामानाययामास महासेनन्नृपोज्झराम् ॥२२॥ तां स वादितवान्गायन्गुणशर्म्मा त्रिमागंराम् । गङ्गामिवौघसुभगां कर्णपावननिःस्वनाम् ॥२३॥ ततद्विस्मीयमाणाय राज्ञे तस्मै सजानये । दर्शयामास शस्त्रास्त्रविद्या अपि स सत्क्रमात् ॥२४॥ अथावोचत्स राजा तं नियुद्धं यदि वेत्सि तत् । एकं मे बन्धकरणं शून्यहस्तः प्रदर्शय ॥२५॥ गृहाण देव शस्त्राणि मयि प्रहर च क्रमात् । यावत्ते दर्शयामीति स विप्रः प्रत्युवाच तम् ॥२६॥ ततः स राजा खङ्गादि यद्यदायुधमग्रहीत् । तत्तत्प्रहरतस्तस्य गुणशर्माविहेलया ॥२७॥ तेनैव बन्धकरणेनापहृत्यापहृत्य सः । अयच्छद्राज्ञो हस्तं च गात्रं चाप्यक्षतो मुहुः ॥२८॥
अष्टम लम्बक ३८९
अष्टम लम्बक ३८९ यह रंगमंच का नाचना नहीं है कि पुरुष के लिए लज्जा का विषय हो। यह तो एक गुप्त मित्र-मंडली है, इसमें केवल अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन मात्र करना है।।१४।। मैं तुम्हारा राजा नहीं हूँ मित्र हूँ। आज मैं तुम्हारा नृत्य देखे बिना भोजन ग्रहण न करूँगा।।१५।। राजा के इस प्रकार आग्रह करने पर गुणशर्मा ने नाचना स्वीकार किया। हठी राजा की आज्ञा का उल्लंघन उसके अनुजीवी कैसे कर सकते हैं।।१६।। तदनन्तर, उस युवा गुणशर्मा ने इतना सुन्दर आंगिक नृत्य किया कि उसे देखकर राजा और रानी दोनों का चित्त नाचने लगा ।।१७।। नृत्य कर लेने के पश्चात् राजा ने उसे बजाने के लिए वीणा दी। उस पर झंकार देते ही उसने कहा-महाराज दूसरी वीणा दीजिए, यह वीणा अच्छी नहीं है। इस वीणा के भीतर कहीं कुत्ते का बाल है।।१८-१९।। तार के झंनकार से ही मैंने यह जान लिया है। इतना कहकर गुणशर्मा ने गोद से वीणा उतार दी ।।२० ।। जब राजा ने उस वीणा की खूंटी को उमेठकर देखा तब उसमें सचमुच कुत्ते का बाल उसे मिला ।।२१।। तब राजा महासेन ने अत्यन्त आश्चर्य से उसकी सर्वज्ञता की प्रशंसा करते हुए दूसरी वीणा मँगवाई ।।२२।। तब गुणशर्मा ने गंगा के प्रवाह के समान सुन्दर, तीन मागों से चलनेवाली और कानों को पवित्र करनेवाली उस वीणा को बजाकर राजा को चकित कर दिया ।।२३।। तब गुणशर्मा ने चकित होते हुए रानी के साथ राजा को क्रमशः शस्त्रास्त्र-विद्या भी दिखलाई ।।२४।। तब राजा ने कहा- 'यदि तू युद्ध-विद्या जानता है, तो बिना शस्त्र हाथ में लिये ही मुझ शस्त्रधारी को पराजित कर ।।२५।। तब गुणशर्मा ब्राह्मण ने कहा- महाराज आप शस्त्र लेकर मुझ पर प्रहार कीजिए। मैं आपको अपना कौशल दिखाता हूँ ।।२६।। तदनन्तर, राजा ने तलवार आदि शस्त्रों से उस पर प्रहार करना प्रारम्भ किया। राजा जिस-जिस शस्त्र का उस पर प्रहार करता था गुणशर्मा खेल के समान अपनी मुक्ति से उसे छीन लेता था ।।२७।। इस प्रकार, राजा के हाथ से शस्त्र छीनकर स्वयं अक्षत रहते हुए गुणशर्मा ने राजा के हाथी को और राजा को बाँध दिया ।।२८।।
१९० कथासरित्सागर
१९० कथासरित्सागर ततस्तं राज्यसाहाय्यसहं मत्वा द्विजोत्तमम्। सस्तुवन्बहु मेने स राजा सर्वातिशायिनम्॥२९॥ सा त्वशोकवती राज्ञी तस्य रूपं गुणांश्च तान्। दृष्ट्वा श्रुत्वा द्विजस्याभूत्सद्यस्तद्गतमानसा॥३०॥ एवं चेन्नाप्नुयां नाहं तत्किं मे जीविते फलम्। इति सञ्चिन्त्य युक्त्या सा राजानमिदमब्रवीत्॥३१॥ आर्यपुत्र प्रसीदाज्ञां देह्यस्मै गुणधर्मणे। यथा मां शिक्षयत्येष वीणां वादयितुं प्रभो॥३२॥ अस्यैतदद्य दृष्ट्वा हि वीणावादननैपुणम्। उत्पन्नः कोऽप्ययं सद्य मम प्राणाधिको रसः॥३३॥ तच्छ्रुत्वा गुणशर्माणं स राजा निजगाद तम्। वत्सस्त्रीवादनं देषीमिमां शिक्षय सर्वथा॥३४॥ यथादिशसि कुर्मोऽत्र प्रारम्भं शुभेऽहनि। इत्युक्तवामन्त्र्य स नृपं गुणशर्मा गृहं ययौ॥३५॥ वीणारम्भावहारं तु चक्रे स दिवसान्बहून्। दृष्टिमप्यादृशीं राज्ञ्याः प्रेक्ष्यापममशङ्कितः॥३६॥ एकस्मिंश्च दिने राज्ञो भुञ्जानस्यान्तिके स्थितः। व्यञ्जनं ददतं सूदमेकं मा मेत्यवारयत्॥३७॥ किमेतदिति पृष्टश्च राज्ञा प्राज्ञो जगाद सः। सविषं व्यञ्जनमिदं मया ज्ञातं न संशयः॥३८॥ सूदेन मम दृष्टे हि व्यञ्जनं ददतामुना। मुहुः भयसकम्पेन दृष्टाशङ्कितदृष्टिना॥३९॥ दृश्यतां पातुमवैतत्कर्मणेज्जिहीमतामिदम्। भोजनव्यञ्जनं यस्य निर्हरिष्याम्यहं विषम्॥४०॥ इत्युक्तस्तं राजा स सूपकारं तमेव तत्। व्यञ्जनं भोजयामास भुक्त्वा तच्च मुमूर्च्छ सः॥४१॥ मन्त्रापास्तविषस्तत्र सतः स गुणशर्मणा। राजा पृष्टो यथातत्त्वमथं वक्ति स्म सूपकृत्॥४२॥ देवाहं गौडपतिना राज्ञा विक्रमशक्तिना। विषं प्रदातुं प्रहितो युष्माकमिह वैरिणा॥४३॥
तब राजा ने उस गुणी कलाकार को राज्य की सहायता के योग्य समझकर उसकी प्रशंसा करते हुए उसे सबसे अधिक मान दिया ॥२९॥ उधर रानी असोकवती भी उस ब्राह्मण के यौवन सौन्दर्य और उन-उन कलात्मक गुणों को देखकर सर्वात्मना उस पर आसक्त हो गई ॥३०॥ और सोचने लगी कि यदि मैं इसे न पा सकी तो मेरा जीवन ही निष्फल है। इस पर मेरा अनिर्वचनीय और प्राणों से भी अधिक प्रेम हो गया है। ऐसा सोचकर उसने युक्ति से राजा को यह कहा— 'प्रियतम आज इस गुणशर्मा की वीणा-वादन में निपुणता देखकर मुझे उसमें प्राणों से भी अधिक रस (आनन्द) प्राप्त हुआ' ॥३१-३३॥ यह सुनकर राजा ने गुणशर्मा से कहा कि तुम रानी को वीणा-वादन भली भाँति सिखा दो ॥३४॥ 'आपकी जैसी आज्ञा किन्तु किसी शुभ दिन उसका प्रारम्भ करूँगा'—गुणशर्मा राजा को इस प्रकार उत्तर देकर अपने घर चला गया ॥३५॥ और, रानी की दृष्टि भेद भरी जानकर गुणशर्मा ने वीणा सिखाने का प्रारम्भ टाल दिया ॥३६॥ एक बार, गुणशर्मा भोजन करते हुए राजा के समीप बैठा था। उस समय राजा के आगे व्यञ्जन परोसते हुए रसोइये को उसने 'मत दो मत दो'—ऐसा कहकर परोसने से रोक दिया ॥३७॥ 'यह क्या बात है'—राजा के इस प्रकार पूछने पर वह बुद्धिमान् गुणशर्मा कहने लगा कि 'यह व्यञ्जन विषाक्त है। यह मैंने रसोइये के लक्षणों से जाना क्योंकि इसने व्यंजन देते समय भय से काँपते हुए तथा शंका से चंचल दृष्टि से मेरा मुँह देखा ॥३८-३९॥ और, अभी देखा जाता है। यह व्यंजन किसी को खिलाया जाय। मैं उसका विष दूर कर दूँगा' ॥४०॥ गुणशर्मा के ऐसा कहने पर राजा ने वही व्यंजन उसी रसोइये को खिलाया और वह उसे खाकर तुरन्त मूर्च्छित हो गया। गुणशर्मा के मन्त्र प्रयोग द्वारा विष दूर हो जाने पर स्वस्थ रसोइये ने राजा के पूछने पर सच्ची बात कही—॥४१-४२॥ 'राजन् तुम्हारे शत्रु गौडदेशाधिपति विक्रमशक्ति ने मुझे तुम्हें विष खिलाकर मार डालने के लिए भेजा था ॥४३॥
१६२ कथासरित्सागरः
१६२ कथासरित्सागरः सोऽभूद्वैदेशिको भूत्वा कुशलः सूदकर्मणि। देवाद्यात्मानमाबध्य प्रविष्टोऽत्र महानसे॥४४॥ राज्ञाद्य दददेवाहे विषं व्यञ्जनमध्यगम्। लक्षितो धीमतानेन प्रभुर्जानात्यतः परम्॥४५॥ इत्युक्तवन्तं तं सूपं निगृह्य गुणशर्मणे। प्रीतो ग्रामसहस्रं स प्राणदाय ददौ नृपः॥४६॥ अथैयुष्यनुबध्नन्त्या राज्ञ्या राजा स यत्नतः। वीणायां गुणशर्माणं शिक्षारम्भमकारयत्॥४७॥ तत शिक्षयतस्तस्य वीणां सा गुणशर्मणः। राज्ञी विलासहासादि चक्रेऽशोकवती सदा॥४८॥ एकदा सा करङ्गुह्यविध्यन्ती विजने मुहुः। उवाच वारयन्तं तं धीरं स्मरशरातुरा॥४९॥ वीणावाद्यापदेशेन त्वं सुन्दर मयाश्रितः। त्वयि गाढोऽनुरागो हि जातो मे तद्भजस्व माम्॥५०॥ एवमुक्तवतीं राज्ञीं गुणशर्मा जगाद ताम्। मैवं वादीर्मम त्वं हि स्वामिदारा न नेदृशम्॥५१॥ अस्मार्दृशः प्रभुद्रोहं कुर्याद्विरम साहसात्। इत्युक्तवान्तां सा राज्ञी गुणशर्म्मानमाह तम्॥५२॥ किमिदं निष्फलं रूपं वैदग्ध्यं च कलासु ते। मामीदृशीं प्रणयिनीं नीरसोपेक्षसे कथम्॥५३॥ तच्छ्रुत्वा गुणशर्मा तां सोपहासमभाषत। सुष्ठूक्तं तस्य रूपस्य वैदग्ध्यस्य च किं फलम्॥५४॥ परदारापहारेण यशःकीर्त्तिमलीमसम्। इहामुत्र च यन्न स्यात्पाताय नरकार्णवे॥५५॥ इत्युक्ते तेन सा राज्ञी सकोपेव तमब्रवीत्। मरणं मे ध्रुवं यावन्मङ्गमभ्युपकृतं त्वया॥५६॥ तदहं मारयित्वा त्वां मरिष्याम्यपमानिता। गुणशर्मा ततोऽवादीत्कामं भवतु नाम तत्॥५७॥ वरं यद्धर्मपालन क्षणमेकं हि जीवितम्। वरं न यदधर्मेण कल्पकोटिशताम्यपि॥५८॥
अष्टम लम्बक १९१
अष्टम लम्बक १९१ अतः मैं विदेशी बनकर आया और आपसे 'भोजन-निर्माण में दक्ष हूँ' ऐसा कह कर आपके रसोईघर में प्रविष्ट हुआ ॥४४॥ हे राजन्, आज ही भोजन में विष देते हुए इस बुद्धिमान् ने मुझे पकड़ लिया। इसके आगे जो कुछ हुआ आप जानते हैं ॥४५॥ ऐसा सुनकर राजा ने उस पाचक को दंडित करके प्राण देनेवाले उस गुणधर्मा को एक हजार ग्राम पुरस्कार में दिये ॥४६॥ किसी दूसरे दिन रानी के बार-बार आग्रह किये जाने पर राजा के प्रयत्न से गुणधर्मा द्वारा रानी को वीणा सिखाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया ॥४७॥ वीणा-वादन सिखाते हुए गुणधर्मा के सामने रानी अधोक्षवती सदा कायचेष्टाएँ किया करती थी ॥४८॥ एक बार एकान्त में नाखूनों को गड़ाती हुई कामातुरा रानी गुणधर्मा द्वारा रोके जाने पर बोली- 'हे सुन्दर, वीणा बजाने के बहाने से मैंने तुम्हें पाया है। तुम्हारे प्रति मेरा घनिष्ठ प्रेम हो गया है। अतः मेरा उपभोग करो' ॥४९-५०॥ इस प्रकार कहती हुई रानी से गुणधर्मा ने कहा- 'ऐसा न कहो। तुम मेरे स्वामी की स्त्री हो, मुझ जैसा व्यक्ति इस प्रकार का स्वामिद्रोह नहीं कर सकता।' ऐसा कहते हुए गुणधर्मा से रानी ने फिर कहा- 'हे नीरस तुम्हारे इस सुन्दर रूप और कला-कौशल का क्या महत्त्व जब तुम मुझ जैसी कामातुरा प्रेयसी की उपेक्षा कर रहे हो' ॥५१-५३॥ यह सुनकर गुणधर्मा हँसी करता हुआ उससे बोला- 'ठीक कहा उस चातुर्य का क्या फल जो परदारा के अपहरण से निन्दित और मलिन हो और जो इस लोक तथा परलोक में भी नरक में पतन का कारण बने' ॥५४-५५॥ गुणधर्मा के ऐसा कहने पर वह रानी क्रोध के साथ उससे बोली- 'यदि तुम मेरी बात न मानोगे तो अवश्य ही मेरी मृत्यु हो जायगी किन्तु अपमानिता मैं पहले तुम्हें मारकर मरूँगी। मेरी बात न मानने पर तुम अपना भी मरण निश्चित समझो। गुणधर्मा ने उत्तर में कहा- 'भले ही मृत्यु हो जाय। धर्म के बन्धन से बँधकर एक क्षण का भी जीवन उत्तम है, किन्तु अधर्म के साथ प्रलयकाल तक का भी जीवन अच्छा नहीं ॥५६-५८॥ ५
श्लाघ्यश्चाकृतपापस्य मम मृत्युरगर्हितः। न पुनः कृतपापस्य गर्हितं राजशासनम्॥५९॥ एतच्छ्रुत्वापि सा राज्ञी पुनरेवमुवाच तम्। आत्मनो मम च द्रोहं मा कृथाः शृणु वच्मि ते॥६०॥ नातिक्रामति राजायामशक्यमपि मद्वचः। तदस्य कृत्वा विज्ञप्तिं विषयान्दापयामि ते॥६१॥ कारयामि च सामन्तान्सर्वांस्तवनुयायिनः। तेन सम्पत्स्यसे राजा स्वमेवेह गुणोज्ज्वलः॥६२॥ ततस्ते किं भयं कस्त्वां कथं परिभविष्यति। तन्मां भजस्व निःशङ्कमन्यथा न भविष्यसि॥६३॥ इति तां ब्रुवतीं मत्वा सानुबन्धां नृपाङ्गनाम्। गुणशर्माब्रवीद्युक्त्या तत्क्षणं स व्यपोहितुम्॥६४॥ यदि तेऽत्यन्तनिर्वन्धस्तत्करिष्ये वचस्तव। प्रतिषेधमयाद्देवि सहसा तु न युज्यते॥६५॥ सहस्व दिवसान्कांश्चित्सत्यं जानीहि मद्वचः। सर्वनाशफलेनानार्थेस्तवैतद्विरोधेन को मम॥६६॥ इत्याशया तां सन्तोष्य प्रतिपन्नवचास्तया। गुणशर्मा स निर्गत्य ययावुच्छ्वसितस्ततः॥६७॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु स महासेनभूपतिः। गत्वैव वेष्टयामास कोट्टस्थं सोमकेश्वरम्॥६८॥ तत्र प्राप्तं विदित्वा च गौडनाथः स भूपतिः। एत्य विक्रमशक्तिस्तं महासेनमवेष्टयत्॥६९॥ ततः स गुणशर्माणं महासेननृपोऽब्रवीत्। एकं रुद्ध्वा स्थिताः सन्तो रुद्धा स्मोऽन्येन शत्रुना॥७०॥ तदिदानीमपर्याप्ताः कथं युध्यामहे द्वयोः। अयुग्मे रुद्धके वीर स्थास्यामश्च कियच्चिरम्॥७१॥ तदस्मिन्त्सङ्कटेऽस्माभिः किं कार्यमिति तं सः। पृष्टः पार्श्वस्थितो राज्ञा गुणशर्माभ्यभाषत॥७२॥ धीरो भव करिष्यामि देवोपायं तथाविधम्। येनास्माभिस्तरिष्यामः सङ्कटादपि कार्यतः॥७३॥
अष्टम लम्बक १९५
अष्टम लम्बक १९५ बिना पाप किये मेरी प्रशंसनीय मृत्यु श्रेष्ठ है। किन्तु, पाप करके निन्दित राज्यासन भोगना अच्छा नहीं ॥५९॥ ऐसा सुनकर वह रानी फिर बोली—'तू मेरी और अपनी आत्मा के साथ विद्रोह मत कर। मैं कहती हूँ सुन—॥६०॥ यह राजा मेरी असंभव बात का भी नहीं टालता। इसलिए, मैं उससे निवेदन करके तुझे किसी देश का राज्य दिला दूँगी। और, सभी सामन्तों को तुम्हारा अनुयायी बना दूँगी। इससे तुम गुणों से उज्ज्वल राजा बन जाओगे ॥६१-६२॥ तब तुझे भय नहीं रहेगा। तुझे कौन और कैसे अपमानित करेगा। इसलिए, शंका छोड़ कर मेरा उपभोग कर। नहीं तो जीवित न रहूँगी' ॥६३॥ गुणशर्मा ने रानी को इतना आग्रह करती हुई देखकर उस समय को टालने के लिए युक्ति पूर्वक कहा—॥६४॥ यदि तेरा अत्यन्त आग्रह ही है तो तेरी बात सफल करूँगा किन्तु रहस्य खुलने के भय से सहसा ऐसा करना उचित नहीं। इसलिए कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करो। मेरी बात मान जाओ। तेरा विरोध करके मैं शत्रुता नहीं मोल ले सकता ॥६५-६६॥ इस प्रकार भविष्य की आशा से उसे सन्तुष्ट करके और उससे पुनर्मीलन का वचन लेकर लम्बी साँस लेता हुआ गुणशर्मा किसी प्रकार वहाँ से बाहर निकला ॥६७॥ तदनन्तर कुछ दिनों के बीतने पर राजा महासेन ने किले में बैठे हुए राजा सोमेश्वर को चढ़ाई करके घेर लिया ॥६८॥ महासेन को उधर फँसा हुआ देखकर गौड़देश के राजा विक्रमशक्ति ने चढ़ाई करके उसे (महासेन को) घेर लिया ॥६९॥ तब महासेन ने गुणशर्मा से कहा—'जबकि हम एक राजा को घेरकर बैठे हैं तभी दूसरे शत्रु द्वारा घेर लिए गये। अब दोनों से एक साथ युद्ध करने में असमर्थ हम लोग संकट में पड़ गये हैं। और बिना युद्ध किए भी कब तक घर में घिरे रहेंगे ॥७०-७१॥ अब इस संकट-काल में हमें क्या करना चाहिए ? राजा के इस प्रकार पूछने पर गुणशर्मा ने उससे कहा—॥७२॥ 'स्वामी धैर्य रखें। मैं इसका उपाय करता हूँ जिससे कि आप इस संकट को पार कर सकें ॥७३॥
१२६ कथासरित्सागर
१२६ कथासरित्सागर इत्याश्वास्य नृपं दत्त्वा सोऽन्तर्धानाञ्जनं दृशोः। रात्रौ विक्रमशक्तेस्तददृश्यः कटकं ययौ ॥७४॥ प्रविश्य चान्तिकं तस्य सुप्तं च प्रतिबोध्य तम्। जगाद विद्धि मां राजन्देवदूतमुपागतम् ॥७५॥ सन्धिं कृत्वा महासेनेनृपेणापसर द्रुतम्। अन्यथा ते ससैन्यस्य नाशः स्यादिह निश्चितम् ॥७६॥ प्रेक्षिषे च त्वया दूते स सन्धिं तदनुमन्यत। इति वक्तुं भगवता विष्णुना प्रहितोऽस्मि ते ॥७७॥ भक्तस्त्वं च स भक्तानां योगक्षेममवेक्षते। सन्नुक्त्वा चिन्तितं तेन राज्ञा विक्रमशक्तिना ॥७८॥ निश्चितं सत्यमेवैतद्दुष्प्रवेशेऽन्यथा कथम्। इह यः प्रविशेत्कश्चित्सैषा मर्त्योचिताकृतिः ॥७९॥ इत्यालोच्य स तं प्राह राजा धन्योऽस्मि यस्य मे। देवः समादिशत्येवं यथाविष्टं करोमि तत् ॥८०॥ इति वादिन एवास्य राज्ञः प्रत्ययमादधत्। अञ्जनान्तर्हितो भूत्वा गुणशर्मा ततो ययौ ॥८१॥ गत्वा यथाकृतं तच्च महासेनाय सोऽभ्यधात्। सोऽप्यभ्यनन्दत्कण्ठे तं गृहीत्वा प्राणराज्यदम् ॥८२॥ प्रातर्विक्रमशक्तिश्च स दूतं प्रेष्य भूपतिः। महासेनेन सन्धाय ससैन्यः प्रययौ ततः ॥८३॥ महासेनोऽपि जित्वा तं सोमकं प्राप्य हस्तिनः। अश्वांश्चोज्जयिनीमागात्प्रभावाद् गुणशर्मणः ॥८४॥ तत्रस्थं च नवीनाने प्राहाङ्गुकपने च तम्। सर्पवंशविषाद् भूपं गुणशर्मा ररक्ष सः ॥८५॥ गतेष्वथ दिनेष्वाप्तबलो राजा स वैरिणम्। महासेनोऽभियोक्तुं तं ययौ विक्रमशक्तिकम् ॥८६॥ सोऽपि बुद्ध्वैव तस्याग्रे नृपो युद्धाय निर्ययौ। ततः प्रवृत्ते तत्र , संग्रामोऽप्रतिमहास्तयोः ॥८७॥ क्रमाच्च द्वन्द्वयुद्धेन मिलितौ तावुभावपि। राजानौ सहसाभूतामन्योन्यं विरथीकृतौ ॥८८॥
अष्टम लम्बक १९७
अष्टम लम्बक १९७ गुणशर्मा राजा को इस प्रकार आश्वासन देकर और आँखों में अन्तर्धान होने का अंजन लगाकर रात्रि के समय अदृश्य होकर विक्रमशक्ति के शिविर में गया ॥७४॥ वह उसके निजी भवन में आकर और सोये हुए विक्रमशक्ति को जगाकर बोला-'मैं देव- दूत हूँ और तुम्हारे पास आया हूँ ॥७५॥ तुम महासेन के साथ सन्धि करके शीघ्र ही यहाँ से हट जाओ नहीं तो निश्चित रूप से तुम्हारा नाश होगा। तुम्हारे दूत भेजने पर वह सन्धि स्वीकार कर लेगा ऐसा सन्देश देकर विष्णु ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है ॥७६-७७॥ क्योंकि तू विष्णु का भक्त है और वे भक्तों से प्यार करते हैं तथा उनके योग-क्षेम का ध्यान रखते हैं। यह सुनकर राजा विक्रमशक्ति ने सोचा-॥७८॥ इस देवदूत का कथन अवश्य ही सत्य है। अन्यथा कठिनता से भी यहाँ किसी का प्रवेश असम्भव है। उसका स्वरूप भी मनुष्यों का-सा नहीं है ॥७९॥ ऐसा सोचकर राजा बोला- मैं धन्य हूँ जिसे भगवान् विष्णु ने ऐसा सन्देश दिया है। मैं उनके आदेश का पालन करता हूँ ॥८०॥ ऐसा कहते हुए राजा पर विश्वास करके गुणशर्मा अंजन के प्रभाव से अदृश्य हो गया ॥८१॥ और उसने जो कुछ किया था वह महासेन से आकर कह सुनाया। महासेन ने प्राण और राज्य देनेवाले गुणशर्मा को गले से लगा लिया ॥८२॥ प्रातःकाल ही विक्रमशक्ति दूत भेजकर और महासेन के साथ सन्धि करके सेना के साथ शीघ्र ही लौट गया ॥८३॥ महासेन भी राजा गोमन्द को जीतकर गुणशर्मा के प्रभाव से हाथी और घोड़े प्राप्त करके अपनी राजधानी में लौट आया ॥८४॥ उज्जयिनी में रहते हुए महासेन को नदी में स्नान करते समय ग्राह से और उद्यान में भ्रमण करते समय सर्प के काटने से गुणशर्मा ने बचाया ॥८५॥ कुछ दिनों के बीतने पर, अपनी सेना को प्रबल बनाकर महासेन ने राजा विक्रमशक्ति पर आक्रमण कर दिया ॥८६॥ विक्रमशक्ति भी उसे आया जानकर युद्ध के लिए बाहर निकल आया और दोनों में परस्पर भयानक युद्ध हुआ। ८७॥ युद्ध में वे दोनों राजा रथरहित होकर पैदल ही द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥८८॥
१९८ कथासरित्सागर
१९८ कथासरित्सागर ततस्तयोर्भवितव्यो प्रकोपात्खड्गहस्तयोः । आकुलत्वेन चस्खाल महासेननृपः क्षितौ ॥८९॥ स्खलितेऽस्मिन्प्रहरतश्चक्रेण भुजमच्छिनत् । राज्ञो विक्रमशक्तेः स गुणशर्मा सखड्गकम् ॥९०॥ पुनश्च हृदि हत्वा तं परिघेण न्यपातयत् । तच्चोत्थाय महासेनो राजा दृष्ट्वा तुतोष सः ॥९१॥ किं वच्मि पञ्चमं वारमिदं प्राणा इमे मम । विप्रवीर त्वया दत्ता इति तं चावदन्मुहुः ॥९२॥ ततो विक्रमशक्तेस्तत्तस्य सैन्यं सराष्ट्रकम् । आजक्राम महासेनो हतस्य गुणशर्मणा ॥९३॥ आक्रम्य चान्यान्नृपतीन्सहाये गुणशर्मणि । आगत्योज्जयिनीं तस्यां स राजा सुखितस्तदा ॥९४॥ सा त्वशोकवती राज्ञी सोत्सुका गुणशर्मणः । विरराम न निर्बन्धप्रार्थनातो दिवानिशम् ॥९५॥ स तु नाङ्गीचकारैव तदकार्यं कथञ्चन । देहपातमपीच्छन्ति सन्तो नाविनयं पुनः ॥९६॥ ततोऽशोकवती बुद्ध्वा निश्चयं तस्य वैरतः । एकदा व्याजखेदं सा कृत्वा तस्थौ रुषन्मुखी ॥९७॥ प्रविष्टोऽथ महासेनस्तामालोक्य तथास्थिताम् । पप्रच्छ राजा किमिदं प्रिये केनासि कोपिता ॥९८॥ ब्रूहि तस्य करोम्यद्य धर्मं प्राणैश्च निग्रहम् । इति ब्रुवाणं तं भूपं राज्ञी कृच्छ्रादिवाह सा ॥९९॥ येन मेऽपकृतं तस्य नैव त्वं निग्रहे क्षमः । न स तादृक्तदेतेन मिथ्योद्घाटितेन किम् ॥१००॥ इत्युक्त्वा सानबन्धे सा राज्ञि मिथ्येवमब्रवीत् । आर्यपुत्रातिनिर्बन्धो यदि ते वच्मि तच्छृणु ॥१०१॥ अयं गौडेश्वरात्प्राप्तुं तेन संस्थाप्य संविदम् । गुणशर्मा तव द्रोहं कर्तुमेतच्चिकीर्षति ॥१०२॥ त्वं च रूपनिबन्धाद्धि गौडं कारयितुं नृपम् । विससर्ज स दूतं स्वं गुप्तमाप्तं द्विजाधमः ॥१०३॥
अष्टम लम्बक १६९
अष्टम लम्बक १६९ क्रोध से खड्ग लेकर दौड़ते हुए उन दोनों में महासेन व्याकुल होकर भूमि में फिसलने के कारण गिर गया ॥८९॥ गिरे हुए राजा पर राजा विक्रमशक्ति के खड्ग-सहित हाथ को गुणशर्मा ने चक्र से काट डाला और तदनन्तर लोहे के डंडे से उसे मार डाला। महासेन उठकर और यह देखकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ और बोला—हे विप्रवीर, क्या कहूँ यह पाँचवीं बार तुमने मेरी प्राण-रक्षा की ॥९०-९२॥ गुणशर्मा से विक्रमशक्ति के मारे जाने पर, महासेन ने विक्रमशक्ति की सेनाओं और उसके राष्ट्र पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की ॥९३॥ गुणशर्मा की सहायता से उसने अन्यान्य राजाओं पर भी आक्रमण करके और उन्हें अधीन करके महासेन उज्जयिनी लौट आया ॥९४॥ उधर उत्कण्ठिता रानी अशोकवती गुणशर्मा से बार-बार आग्रहपूर्वक प्रार्थना करने से रुकती न थी ॥९५॥ किन्तु, गुणशर्मा ने उसकी प्रार्थना किसी प्रकार स्वीकार न की। सच है, सज्जन व्यक्ति मरना स्वीकार करते हैं किन्तु दुराचार नहीं ॥९६॥ अशोकवती ने भी गुणशर्मा के दृढ़ निश्चय को देखकर उससे शत्रुता ठान ली। वह एकबार बनावटी खेद का-सा मुंह बनाकर और रोने का-सा मुंह लेकर पड़ी थी ॥९७॥ महासेन ने आकर यह देखा और पूछा—'प्रिये क्या बात है, तुम्हें किसने क्रुद्ध किया है, मुझे बताओ मैं अभी उसके धन और प्राणों का विनाश करता हूँ ॥९८-९९॥ इस प्रकार कहते हुए राजा से रानी ने बड़े ही कष्ट से कहा—'यह कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसके प्रकट करने से कोई लाभ हो ॥१००॥ जिसने मेरा अपकार किया है, तुम उसे दंड देने में समर्थ नहीं हो। तथापि आर्यपुत्र यदि तुम्हारा आग्रह ही है तो सुनो, कहती हूँ ॥१०१॥ गुणशर्मा गौडेश्वर से धन लेने की इच्छा से उसके साथ षड्यन्त्र करके छल से भीतर ही भीतर तुमसे द्रोह करता था। इस नीच ब्राह्मण ने गौडेश्वर को राजा बनाने के लिए गुप्त दूत भेजा था ॥१०२-१०३॥
तं दृष्ट्वा तत्र सूदस्तमाप्तो राजानमभ्यधात्। महं से साधयाम्यत्सत्कार्यं मार्गक्षय कृथाः॥१०४॥ इत्युक्त्वा बन्धयित्वा च स दूतं गुणशर्मणः। सूदो मन्त्रस्रुतिं , रक्षन्निहागाद्विषदायकः॥१०५॥ तन्मध्ये च पलाय्यैव सतो निर्गत्य बन्धनात्। गुणशर्म्मान्तिक दूतस्तदीयः सोऽप्युपागमत्॥१०६॥ तेनाधिगतवृत्तान्तेनोक्त्या सर्वं स दर्शितः। सूपो महानसेजस्माकं प्रविष्टो गुणशर्मणे॥१०७॥ ततो ज्ञात्वा स धूर्त्तेन सूपकृद् ग्राह्यत्युना। विषदानोद्यतस्तेन शुम्यमावेद्य भातिष्ठत्॥१०८॥ अथ तस्येह सूदस्य मातुभार्ये तथानुजाम्। वार्त्तामन्वेष्टुमायातान्गुणशर्मा स बुद्धिमान्॥१०९॥ बुद्ध्या तेन हृता तस्य भार्या माता च सोऽस्य तु। भ्राता पलायितो दैवात्प्रविष्टन्मम मन्दिरम्॥११०॥ तेन तद्वर्ण्यते यावत्सर्वं मे शरणार्थिना। गुणशर्मा स मदासगृहं तावत्प्रविष्टवान्॥१११॥ तं दृष्ट्वा मां च श्रुत्वा भ्राता सूदस्य तस्य सः। भयान्निर्गम्य मत्पाश्र्वाभि जागे क्व पलायितः॥११२॥ गुणशर्मापि तं दृष्ट्वा स्वभृत्यैः पूर्व्वदर्शितम्। संभूत्सद्यः सवेमक्ष्यो विमृशन्निव किञ्चन॥११३॥ गुणशर्मन्किमर्थैवंमन्यादृक्ष इवेक्ष्यसे। इत्यपृच्छमहं तं च जिज्ञासुविजने ततः॥११४॥ सोऽप्य स्वीकर्त्तुकामो मामाह स्मोद्भेदशङ्कितः। देवि त्वदनुरागाग्निदग्धोऽहं तद्भजस्व माम्॥११५॥ धन्यथाहं न जीवेयं देहि मे प्राणदक्षिणाम्। इत्युक्त्वा वासक शून्ये पादयोरपतन्म मे॥११६॥ ततोऽहं पादमाक्षिप्य सम्भ्रमादायदुत्थिता। साम्टूत्याय तनाहमबलामिलिङ्गिता बलात्॥११७॥ सत्तार्ण च प्रविष्टा मे शती पल्लविकान्तिकम्। तां दृष्ट्वैव स निष्क्रम्य गुणशर्मा भयाद् गतः॥११८॥
अष्टम लम्बक ४०१
अष्टम लम्बक ४०१ यह सुनकर राजा के विश्वस्त रसोईदार ने कहा—'यह काम मैं कर दूंगा। द्रव्य का अपव्यय न करो' ॥१ ४॥ ऐसा कहकर गुणशर्मा के दूत को बाँधकर कैद में डाल दिया और रसोईदार गुप्त रूप से तुम्हें विष देने के लिए यहाँ आया ॥१ ५॥ इसी बीच गुणशर्मा का दूत किसी प्रकार जेल से भागकर यहाँ आ गया और उसने रसोईदार का समस्त समाचार गुणशर्मा से सुनाया। पाचक हमारे भोजनालय में था इसलिए उस दुष्ट ब्राह्मण ने विष देते हुए तुम्हें बताकर उसे मरवा डाला ॥१ ६—१ ८॥ जब उस रसोईदार का समाचार जानने के लिए आये हुए उसकी माता स्त्री तथा भाइयों को जानकर उस बुद्धिमान् गुणशर्मा ने उन सबको मार डाला किन्तु उसका भाई भागकर दैवयोग से मेरे घर आ गया ॥१ ९—११ ॥ उस शरणार्थी ने मुझे सब समाचार सुनाया और इतने में गुणशर्मा भी मेरे वासगृह में आया ॥१११॥ उसे देखकर और मुझसे उसका नाम जानकर वह रसोइये का भाई भय से न जाने कहाँ भाग गया ॥११२॥ गुणशर्मा भी अपने सेवकों से बचाये हुए उसे मेरे पास देखकर कुछ सोचते-सोचते तुरन्त मलिन हो गया ॥११३॥ 'गुणशर्मन् आज तुम कुछ दूसरे-से क्यों मालूम हो रहे हो? —मैंने उसका भाव जानने के लिए एकान्त में उससे पूछा ॥११४॥ गुणशर्मा रहस्य खुलने के भय से मुझे स्वीकार करने की इच्छा से बोला—'रानी मैं तुम्हारी प्रेमाग्नि से जल रहा हूँ। अतः, तुम मुझे स्वीकार करो। अन्यथा मैं नहीं जिऊँगा। मुझे प्राणों की भिक्षा दो। इस प्रकार कहकर वह सूने घर में मेरे पैरों पर गिर पड़ा ॥११५ ११६॥ तब मैं पैर छुड़ाकर जब उठी तब उसने मुझ अबला को बलपूर्वक अपने से लिपटा लिया ॥११७॥ उसी समय मेरी सेविका पल्लविका अन्दर आई। उसे देखकर वह गुणशर्मा भय से बाहर चला गया ॥११८॥ ५१