कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
७० | कथासरित्सागर
७० | कथासरित्सागर
तथेत्युक्ते तयान्येद्युस्तदुत्सङ्गस्थितश्च सः। व्योम्ना निश्चयदत्तोऽगात्सख्युरस्तस्याथ वनम्॥१९४॥ सत्र तं सुहृदं दृष्ट्वा कपिरूपमुपेत्य सः। प्रणमत्प्रियया साकमपृच्छत्कुशलं तदा॥१९५॥ अद्य मे कुशलं यत्त्वमनुरागपरायुतः। दृष्टो मयेति सोऽप्युक्त्वा सोमस्वामिकपिः किल॥१९६॥ तमभ्यनन्दत्प्रवदौ तत्प्रियायै सभाधिपम्। तत सर्वेऽप्युपाविशंस्तत्र रम्ये शिलातले॥१९७॥ धत्तूश्च सत्कथालाप ततस्तस्य कपेः कृते। [L10: आदौ निश्चयदत्तेन चिन्तितं कान्तया सह॥१९८॥ ततस्तं कपिमापृच्छ्य प्रेयसीसदनं च तत्। ययौ निश्चयदत्तो द्वामुत्पत्याङ्के धृतस्तया॥१९९॥ अन्येद्युस्तामवादीच्च सोऽनुरागपरो पुनः। एहि तस्यान्तिकं सख्युः क्षणं यावत् कपेरिति॥२००॥ सत सापि तमाह स्म त्वमेवाद्य व्रज स्वयम्। गृहाणोत्पतनीं विद्यां मत्तोऽवतरणीं तथा॥२०१॥ इत्युक्त्व स तदादाय तद्विद्याद्वितयं ततः। व्योम्ना निश्चयवत्तोऽगात्सख्युरस्तस्यान्तिकं कपेः॥२०२॥ तत्र यावत्स कुरुत तेन साकं चिरं कथाः। सानुरागपरा तावदुद्यानं निर्ययौ गृहात्॥२०३॥ तत्र तस्यां निष्पन्नायां विद्याधरकुमारकः। कोऽप्यांजगाम नभसा परिभ्राम्य यदृच्छया॥२०४॥ स दृष्ट्वैव स्मरावेशविवशस्तामुपाययौ। विद्याधरी स तां बुद्ध्वा विद्यया मर्त्यभर्तृकाम्॥२०५॥ साप्युपतं समालोक्य सुभगं विनतानना। कस्त्वं किमागतोऽसीति शनैः पप्रच्छ कौतुकात्॥२०६॥ ततः स प्रत्यबोचत्तां स्वविद्याभानशासिनम्। विद्धि विद्याधरं मुग्धे माम्ना मां राजभञ्जनम्॥२०७॥ सोऽहं सन्दर्शनादेव सहसा हरिणेक्षणे। मनोभुवा वशीकृत्य तुभ्यमेव समर्पितः॥२०८॥
सप्तम लम्बक ७१
सप्तम लम्बक ७१ उसके स्वीकार करने पर दूसरे दिन निश्चयदत्त विद्याधरी की गोद में बैठकर उस बन्दर वाले वन में गया ॥१९४॥ वन में बन्दर-रूप उस मित्र को प्रिया के साथ प्रणाम करके निश्चयदत्त ने उसका कुशल- क्षेमंक पूछा ॥१९५॥ बन्दर ने कहा—'आज मेरा कुशल ही है कि तू अनुरागपरा के साथ मुझसे मिला' ऐसा कहकर बन्दर रूप सोमस्वामी ने निश्चयदत्त को बधाई दी और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया। तदनन्तर वे सब एक पत्थर की सुन्दर चट्टान पर बैठ गये ॥१९६-१९७॥ वहीं बैठकर वे उस बन्दर के लिए चर्चा करने लगे जैसा कि निश्चयदत्त ने पहले ही अपनी पत्नी से कहा था ॥१९८॥ तदनन्तर अपनी प्रेयसी की गोद में बैठा हुआ निश्चयदत्त बन्दर से आज्ञा लेकर अपनी पत्नी के नवनिर्मित भवन में लौट गया ॥१९९॥ दूसरे दिन निश्चयदत्त ने फिर कहा— आओ उस बन्दर-मित्र के पास आज फिर चलें। तब अनुरागपरा बोली—'आज तुम स्वयं जाओ। मुझ से उड़ने और उतरने की विद्या ले लो ॥२००-२०१॥ उसके ऐसा कहने पर वह निश्चयदत्त विद्याधरी से दोनों विद्याएँ प्राप्त करके आकाश में उड़कर उस मित्र बन्दर के पास आया ॥२०२॥ इधर जब वह अपने मित्र के साथ बैठकर गप-शप कर रहा था उधर अनुरागपरा घर से निकल बाग में आई। जब वह बाग में बैठी थी तब उसपर आकाश से उड़ता हुआ एक विद्याधर कुमार घूमता हुआ उधर आ निकला। वहाँ पर अनुरागपरा को देखकर काम के आवेश में आ गया और उसे मनुष्य-पतिवाली विद्याधरी जानकर उसके समीप आया ॥२०३-२०५॥ उस विद्याधरी ने भी उस सुन्दर विद्याधर-युवक को पास आये देखकर नीचे मुँह किये हुए कौतुक से पूछा—'तू कौन है और क्यों आया है' ॥२०६॥ तब वह बोला— हे सुन्दरी ! मुझे अपनी विद्याओं के ज्ञानवाला राजभंजन नामक विद्याधर समझो ॥२०७॥ मृगनयनी ! यह मैं तुझे देखकर कामदेव द्वारा वश में करके तुझको समर्पित कर दिया गया हूँ ॥२०८॥
७२ कथासरित्सागर
७२ कथासरित्सागर तदलं देवि सेवित्वा मर्त्यं धरणिगोचरम्। पिता वेत्ति न यावत्ते तावदुत्पत्य भजस्व माम्॥२०९॥ इति तस्मिन्ब्रुवाणे सा कटाक्षार्धविलोकिती। अचिन्तयदयं युक्तो ममेति चपलाशया॥२१०॥ ततो लब्धाशयं चक्रे भार्या तेनैव तम सा। अपेक्षत द्वयोरेकचित्त्ये किं रहसि स्मरः॥२११॥ अथ विद्याधरे तस्मिन् सम्प्रत्यपसुते ततः। आगात्निश्चयवत्तोऽत्र सोमस्वामिसमीपतः॥२१२॥ आगतस्य च सा चक्रे विरक्तालिङ्गनादिकम्। अनुरागपरा तस्य व्यपदिश्य शिरोरुजम्॥२१३॥ स तु तद्व्याजमविदन्नृजुः स्नेहविमोहितः। अस्वास्थ्यमेव मन्वास्या युक्तस्तदनमद्दिनम्॥२१४॥ प्रातश्च दुर्मना भूयस्तं कपिं सुहृदं प्रति। स सोमस्वामिन प्रायान्नभसा विद्ययोर्बलात्॥२१५॥ यात तस्मिन्नुपागात्तां सानुरागपरा पुनः। कामी विद्याधरो रात्रिक्लान्तोऽनिद्रस्तया विना॥२१६॥ निशाविरहसोत्कण्ठः कण्ठे तामवलम्ब्य च। सुरतान्तपरिश्रान्तो निद्राक्रान्तो बभूव सः॥२१७॥ साप्यङ्कसुप्तं प्रच्छाद्य प्रियं विद्याबलेन तम्। रात्रिजागरणाद्निद्रामनुरागपरा ययौ॥२१८॥ तावन्निश्चयवत्तोऽपि प्राप तस्यान्तिकं नृप। सोऽपि पप्रच्छ च कृत्वा स्वागतं वानरः सुहृत्॥२१९॥ दुर्मनस्कमिवाद्य त्वां किं पश्याम्युच्यतामिति। ततो निश्चयवत्तोऽपि स तं वानरमब्रवीत्॥२२०॥ अनुरागपराद्यैषामस्वस्था मित्र वर्तते। तेनास्मि दुःखितः सा हि प्राणेभ्योऽपि प्रिया मम॥२२१॥
सप्तम लम्बक ७३
सप्तम लम्बक ७३ इसलिए, हे देवि ! जब तुम पृथिवी पर रहनेवाले मानव का तबतक परित्याग कर दो जबतक तुम्हारे पिता को मालूम नहीं होता और अपने समानजातीय मेरा वरण कर लो' ॥२१०॥ उसके ऐसा कहने पर कटाक्ष से देखती हुई वह चंचलहृदया विद्याधरी सोचने लगी कि 'यह मेरे लिए उपयुक्त पति है। ॥२११॥ तब राजमञ्जन ने उसके हृदय के अभिप्राय को जानकर उसे भार्या बना लिया । एकान्त में दोनों (प्रेमी और प्रेमिका) के एकत्रित होने पर कामदेव किसकी परवाह करता है ? ॥२१२॥ तदनन्तर, विद्याधर के चले जाने पर निश्चयदत्त सोमस्वामी से मिलकर आ गया ॥२१३॥ उसके लौट आनेपर उस विरक्ता अनुरागपरा ने सिरदर्द का बहाना करके उससे आलिंगन आदि द्वारा प्रेम-प्रदर्शन नहीं किया ॥२१४॥ उस सरलहृदय प्रेमी निश्चयदत्त ने उसका बहाना न समझकर वैसे ही वह दिन व्यतीत किया और प्रातःकाल दुःखितचित्त होकर विद्या के बल से पुनः उस बन्दर के समीप गया ॥२१४-२१५॥ उसके चले जानेपर, अनुरागपरा के बिना रात-भर का जगा हुआ वह कामी विद्याधर फिर उसके पास आया। रात के जागरण से उत्कण्ठित उसे गल से लगाकर वह विद्याधर काम क्रीडा से थककर वहीं सो गया ॥२१६-२१७॥ वह अनुरागपरा भी रात-भर जगने के कारण गाढ म सोये उस प्यारे का विद्याबल से छिड़ाकर आ गई॥ २१८॥ इधर निश्चयदत्त भी बन्दर के पास पहुँचा । बन्दर ने भी उसका स्वागत करके समाचार पूछा—॥२१९॥ 'आज तुम खिन्नमन मालूम हो रहे हो ? क्या कारण है बताओ। तब निश्चयदत्त उस बन्दर से बोला—'मित्र ! अनुरागपरा अस्वस्थ हो गई है। उसी से दुःखी हूँ। वह मेरे प्राणों से भी प्यारी है ॥२२०-२२१॥ १०
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर इत्युक्तस्तेन स ज्ञानी मर्कटस्समभाषत । गच्छ सुप्तामिदानीं तां स्थितां कृत्वाऽङ्गरुहसिनीम् ॥२२२॥ तद्धस्तविद्यया व्योम्ना तामानय मदन्तिकम् । यावन्महद्विहाटथ्यं दर्शयाम्यधुनैव च ॥२२३॥ तच्छ्रुत्वा खेन गत्वैव सोऽनुरागपरो ततः। दृष्ट्वा निश्चयदत्तस्तां सुप्तामङ्केऽग्रहील्लघु ॥२२४॥ न तु विद्याधरं तस्या नाङ्गे लग्नं ददर्श सः । सुप्तं विद्याधसेनाथाववृश्यं विहितं तया ॥२२५॥ उत्पत्य चान्तरिक्षं तामनुरागपरां क्षणात् । आनिनाय कपेस्तस्य स सोऽगत्स्वामिनोऽन्तिकम् ॥२२६॥ स कपिर्विद्ययुक्तेस्मै तथा योगमुपादिदत्। येन विद्याधरं तस्याः कण्ठे लग्नं ददर्श सः ॥२२७॥ दृष्ट्वा च हा भिगोतस्स्मीति तं वादिनं कपिः। स एव तत्त्वदर्शी तच्चेष्टावृत्तमबोधयत् ॥२२८॥ क्रुद्धे निश्चयदत्तेऽथ तस्मिन् विद्याधरोऽत्र सः । प्रबुद्धस्तत्प्रियाकामी समुत्पत्य तिरोबभे ॥२२९॥ सापि प्रबुद्धा तत्कालमनुरागपरात्मनः । रहस्यमेदं तं दृष्ट्वा ह्रिया तस्याप्यधोमुखी ॥२३०॥ ततो निश्चयदत्तस्तामुवाचोदश्रुलोचनः । विश्वस्तोऽहं कथं पापे त्वयैव बत वञ्चितः ॥२३१॥ अत्यन्तसञ्छन्नस्येह पारवश्य निबन्धने । कामं विज्ञायते युक्तिर्न स्त्रीचित्तस्य काचन ॥२३२॥ इति ब्रुवति तस्मिन्सामुत्तरा रुदती शनैः । अनुरागपरोत्पत्य विप्रं धाम निजं ययौ ॥२३३॥ ततो निश्चयदत्तस्तं सुहृन्मर्कटमब्रवीत् । एतां यन्म्यभावस्त्वं वारितोऽपि ममा प्रियाम् ॥२३४॥ त्यक्त्व तीव्ररागान्धैः पश्चाद्यदनुतप्यते । कः हि सम्पत्सु चपलास्वाश्वासो वनितासु च ॥२३५॥
सप्तम लम्बक ७५
सप्तम लम्बक ७५ उससे इसप्रकार कहा गया वह ज्ञानी बन्दर बोला—'जाओ उसकी दी हुई विद्या के प्रभाव से सोई हुई उसे गोद में उठाकर ले आओ। तब मैं तुम एक महान् आश्चर्य दिखाऊँगा ॥२२२ २२३॥ यह सुनकर निश्चयदत्त आकाश-मार्गस वहाँ गया और सोती हुई अनुरागपरा को धीरे से गोद में उठाकर सोमस्वामी बन्दर के समीप ले आया। पहले शाप और फिर विद्याधरी के द्वारा विद्या के बल से अदृश्य कर दिये गये उस विद्याधर का विद्याधरी के शरीर से लग रहने पर भी निश्चयदत्त ने नही देखा ॥२२४-२२६॥ उसके बाद उस दिव्य दृष्टिवाले बन्दर ने निश्चयदत्त को ऐसा योग बताया जिससे निश्चयदत्त ने विद्याधरी के गाल से चिपक हुए विद्याधर को देख लिया। देखते ही ओह ! यह क्या ? —ऐसा कहते हुए उस तत्त्वदर्शी बानर ने सब यथार्थ बात बता दी ॥२२७ २२८॥ यह दृश्य देखकर निश्चयदत्त के क्रुद्ध होने पर वह विद्याधर आकाश में उड़ गया। और, वह अनुरागपरा भी निद्रा से जागकर अपने रहस्य का भण्डाफोड़ देखकर लज्जा से नीचा मुंह किये बैठ गई ॥२२९ २३०॥ तब रोते हुए निश्चयदत्त ने कहा—हे पापिन ! मेरे ऊपर विश्वास करनेवाले मुझे तुमने क्यों ठग लिया? ॥२३१॥ अत्यन्त चंचल पार का बाँधने की युक्ति है। परन्तु चंचल स्त्री-चित्त को जानने या बाँधने की कोई शक्ति नही ॥२३२॥ उसके ऐसा कहने पर वह अनुरागपरा उत्तर दिये बिना ही धीरे-धीरे रोती हुई आकाश में उड़कर अपने घर चली गई ॥२३३॥ तब वह बानर सोमस्वामी निश्चयदत्त से बोला—मेरे कहने पर भी जो तुम इस स्त्री के पीछे दौड़ रहे थे, उसी तीव्र प्रमात्ति का यह फल है कि आज दुःख पा रहे हो। चंचल धन और स्त्री का क्या विश्वास ? ॥२३४ २३५॥
७६ कथासरित्सागर
७६ कथासरित्सागर तदलं परितापेन तवदानीं शमं कुरु । भवितव्यं हि धात्रापि न शक्यमतिवर्तितुम् ॥२३६॥ इति तस्मात्कपेः श्रुत्वा शाकमोहं विहाय तम् । ययौ निश्चयवसोऽत्र विरक्तः शरणं शिवम् ॥२३७॥ अथ तत्र वने सुहृवा कपिना सह तिष्ठतस्ततो निकटम् । तस्याजगाम दैवात्तपस्विनी मोक्षदा नाम ॥२३८॥ सा तं क्रमेण दृष्ट्वा प्रणतं पप्रच्छ मानुषस्य सतः । चित्रं कथमिह जातो मित्रं ते मर्कटोऽयमिति ॥२३९॥ यतः स्वं वृत्तान्तं तदनु च स मित्रस्य चरितं समाचख्यो तस्यै कृपणमथ तामेवमवदत् । प्रयागं मग्नं वा यदि भगवती वेत्ति तदिमं परिभ्रंशात् सन्मित्रं सुहृदमधुना मोचयतु मे ॥२४०॥ श्रुत्वा सा तस्य वाचं कपेस्तत् सूत्रं कण्ठामन्त्रयुक्त्या मुमोच । सोऽथ त्यक्त्वा मर्कटीमाकृतिं तां सामस्वामी पूर्ववन्मानुषोऽभूत् ॥२४१॥ तस्यां ततश्च तद्विद्यां तिरोहितायां दिव्यप्रभावभूमिं भूरि तपो विधाय । प्राप्य तत्र शिवं निश्चयसमोम- स्यामसिद्धा प्रययतुः परमां गतिं तौ ॥२४२॥ एवं निजगुणगण्या रमना विचर- पद्यते विषयदोषपरिग्रहवशा । साध्वी तु रागिणी तासु कुरु विरक्तिं यासां फलं न तनुतापमवाप्नुवन्ति ॥२४३॥ इत्येतां नरवाहनदत्तो रुचिरास्य गोमुखस्य मुखात् । चिन्तामपश्य कथां श्रुत्वैव गताधमार्गेण ॥ २४४ ॥ इति कथासरित्सागरे मदनमञ्चुकालम्बके षष्ठस्तरङ्गः समाप्तः । शुभं भूयात् ।
सप्तम लम्बक ४७
सप्तम लम्बक ४७ अब व्यर्थ चिन्ता और शोक मत करो। जो होना है, उसे ब्रह्मा भी नहीं बदल सकते' ॥२३६॥ वानर ने यह सुनकर और शोक एवं मोह को छोड़कर निश्चयदत्त विरक्त भाव से शिव की शरण में चला गया ॥२३७॥ तदनन्तर वन में उस बन्दर के साथ रहते हुए निश्चयदत्त के पास एक बार दैव योग से मायंदा नाम की तपस्विनी आई। उसने प्रणाम करते हुए निश्चयदत्त से पूछा कि तुम्हारे मनुष्य होते हुए भी यह तुम्हारा मित्र बानर कैसे हुआ यह आश्चर्य है! ॥२३८-२३९॥ तब निश्चयदत्त ने पहले अपना और बाद बानर का समाचार सुनाकर उस तपस्विनी से दीनतापूर्वक कहा— यदि आप कोई प्रयोग या मन्त्र जानती हैं तो मेरे मित्र को पशुता से बचाइए ॥२४०॥ निश्चयदत्त की प्रार्थना सुनकर मायंदा योगिनी ने उसे स्वीकार कर, मन्त्र की युक्ति से बन्दर के गले का डोरा खोल दिया। उसके खोलते ही सोमस्वामी बन्दर-रूप छोड़कर उसी क्षण अपने यथार्थ मनुष्य-रूप में आ गया ॥२४१॥ तदनन्तर, वह दिव्य प्रभाववाली मायंदा के बिजली के समान अन्तर्धान हो जाने पर निश्चयदत्त और सोमस्वामी दोनों उग्र तपस्या करते हुए योग-धाम को प्राप्त हुए ॥ २४२॥ इस प्रकार, संसार में चञ्चला स्त्रियाँ विपत् और वैराग्य देनेवाले अपने दुष्पापों को त्याग नहीं करतीं। पतिव्रता स्त्री भाग्यवान् विरले ही होती है जो अपने कुल को उसी प्रकार आनन्दित करती है जैसे नई चन्द्रकला आकाश को शोभित करती है॥२४३॥ इस प्रकार गोमुख के मुख से इस विचित्र कथा को सुनकर नरवाहनदत्त के साथ मन्दारवती बहुत सन्तुष्ट हुआ ॥२४४॥ महाकवि श्रीमत्सोमदेव भट्ट-विरचित कथासरित्सागर के मन्दारवती-लम्बक का तृतीय तरङ्ग समाप्त
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर षट्षष्टस्तरङ्गः राज्ञो विक्रमादित्यस्य मदनमालावेश्यायाश्च कथा गोमुखीयकथातुष्टं दृष्ट्वा तत्स्पर्धया किल। नरवाहनदत्तं तं मरुभूतिरथाब्रवीत् ॥१॥ प्रायेण चपला कामं स्त्रियो नैकान्ततः पुनः। वेश्या अपि च दृश्यन्ते सत्त्वाढ्या किमुतापराः ॥२॥ तथा च देव विख्यातामिमामत्र कथां शृणु। विक्रमादित्य इत्यासीद्राजा पाटलिपुत्रकः ॥३॥ तस्याभूतामभिप्रेते मित्रे हयपतिर्नृपः। राजा गजपतिश्चोभौ बह्वश्वगजसाधनौ ॥४॥ शत्रुर्नृपतिर्भूयिषादातस्तस्य चाभवत्। मानिनो नरसिंहस्य प्रतिष्ठानेश्वरो बली ॥५॥ तं रिपुं प्रति सामर्थ्यं स मित्रबलर्गवितः। चकार विक्रमादित्यः प्रतिज्ञां रभसादिमाम् ॥६॥ तया मया विजेतव्यो राजा नरपतिर्यथा। स बन्दिमागधैर्द्वारि सेवको मे निवेद्यते ॥७॥ एवं कृतप्रतिज्ञस्ते मित्रे हयगजाधिपौ। समानीय समं ताभ्यां हस्त्यश्वक्षोभितक्षितिः ॥८॥ अभियास्तुं नरपतिं नरसिंहं प्रसह्य तम्। स ययौ विक्रमादित्यो राजास्तिरुबलान्वितः ॥९॥ प्राप्ते तस्मिन्प्रतिष्ठाननिकटं सोऽप्यवेत्य तत्। नरसिंहो नरपतिः संनद्धाग्रेस्र्यो निर्ययौ ॥१०॥ ततस्तयोरभूद्युद्धं राज्ञोर्जनितविस्मयम्। गजाश्वनं समं यत्र युध्यन्त स्म पदातयः ॥११॥ क्रमाच्च नरसिंहस्य कोटिसंख्यपदातितिभिः। भग्नं तद्विक्रमादित्यबलं नरपतेर्बलैः ॥१२॥ मग्नश्च विक्रमादित्यः पुरं पाटलिपुत्रकम्। ययौ पलाय्य तन्मित्रे स्वं स्वं देशं च जग्मतुः ॥१३॥ नरसिंहो नरपतिर्जितशत्रुनिजं पुरम्। प्रविवेश प्रतिष्ठानं बन्दिभिः स्तुतविक्रमः ॥१४॥
सप्तम लम्बक ७९
सप्तम लम्बक ७९ चतुर्थ तरङ्ग राजा विक्रमादित्य और मदनमाला वेश्या की कथा गोमुख से कही गई कथा को सुनकर प्रसन्न हुए नरवाहनदत्त को देखकर उससे मरुभूति बोला— 'स्त्रियाँ अविशङ्कत अवश्य ही चंचल (दुराचारिणी) होती हैं—यह कोई निश्चित बात नहीं है। ऐसी वेश्याएँ भी देखी जाती हैं जो सत्त्वगुणशाली (सदाचारिणी) होती हैं। दूसरी स्त्रियों की तो बात ही क्या ? ॥१-२॥ महाराज ! मैं इस विषय में एक प्रसिद्ध कथा सुनाता हूँ सुनिए—। पाटलिपुत्र नगर में विक्रमादित्य नामक राजा था। उसके दो परम प्रिय मित्र राजा थे। एक का नाम हयपति और दूसरे का गजपति था। इन दोनों राजाओं की सेना में हाथी और घोड़े प्रचुर मात्रा में थे ॥३-४॥ उस राजा विक्रम का एकमात्र शत्रु प्रतिष्ठानपुर का बलवान्-राजा नरसिंह था जो उसके वश में नहीं आया था ॥५॥ राजा विक्रम उस शत्रु के प्रति क्रोध करके और मित्र राजाओं के घोड़ों और हाथियों की शक्ति पर विश्वास करके आवेश में यह प्रतिज्ञा कर बैठा कि मुझे प्रतिष्ठान-नरेश पर ऐसी विजय प्राप्त करनी है कि वह मेरे द्वार पर आने और भृत्यों द्वारा सेवकों के समान सूचना दिये जाने पर प्रवेश पा सके ॥६-७॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके हयपति और गजपति नामक दोनों मित्रों से सम्मति करके उनके साथ ही हाथी-घोड़ों से पृथ्वी को रौंदता हुआ अपनी समस्त सेना के साथ प्रतिष्ठान-नरेश पर अवज्ञा के साथ चढ़ गया ॥ ८-९॥ विक्रम की चढ़ाई का समाचार सुनकर राजा नरसिंह भी अपने पैदल सैनिकों के साथ युद्ध के लिए समरभूमि में निकल आया ॥१० ॥ वहाँ उन दोनों का आश्चर्यजनक घमासान युद्ध हुआ जिसमें पैदल सैनिक घोड़ों और हाथियों के साथ लड़े ॥११॥ क्रमशः नरसिंह के एक करोड़ पैदल सैनिकों से विक्रम की सेना हार गई और भाग गई विक्रमादित्य भी भागकर पाटलिपुत्र में चला आया और उसके मित्र अश्वपति (हयपति) तथा गजपति भी सब अपनी-अपनी राजधानियों को चले गये ॥१२-१३॥ शत्रु पर विजय प्राप्त किया हुआ राजा नरसिंह भी विजयलक्ष्मी के साथ बन्दी-चारणों से स्तुति किया जाता हुआ अपने प्रतिष्ठान नगर में गया ॥१४॥
८ कथासरित्सागर
८ कथासरित्सागर ततः स विक्रमादित्योऽसिद्धकार्यो व्यचिन्तयत् । शस्त्रेरजय शत्रुं स जयामि प्रज्ञया वरम् ॥१५॥ कामं कश्चिद्विगर्हन्तां मा प्रतिज्ञाम्यथा तु भूत्। इति सञ्चिन्त्य निक्षिप्य राज्यं याम्येषु मन्त्रिषु ॥१६॥ निर्गत्य नगराद् गुप्त मुख्येनेकेन मन्त्रिणा । सह वज्रवराख्येन राजपुत्रवरैस्तथा ॥१७॥ पञ्चभिः कुलजैः शूरैः स कार्पटिकवेषभृत् । भूत्वा पुरं निजरिपोः प्रतिष्ठानं जगाम तत् ॥१८॥ तत्र वारविलासिन्या नरेन्द्रसदनोपमम् । ययौ मदनमालेति ख्याताया वरमन्दिरम् ॥१९॥ कृताह्वानमिव प्रांशुप्रकारशिखरोच्छ्रितैः । ध्वजांशुकैर्मृदुमयैर्विक्षिप्ताक्षिप्तपल्लवैः ॥२०॥ प्रधाने पूर्वदिग्द्वारे विविधाग्रुधशालिनाम् । गुप्तं सहस्रद्वितया पदातीनां दिवानिशम् ॥२१॥ अन्यासु दिक्षु तिसृषु द्वारि द्वारि मदोद्धतैः । दशभिर्दशभिः शूरसहस्रैरभिरक्षितम् ॥२२॥ आव्रजितं प्रतीहारस्तथामूत प्रविश्य च । क्वचित्प्रथितवेतानेकवराश्वश्रेणिशोभितम् ॥२३॥ क्वचिद्धावन्मातङ्गभटासङ्घटसञ्चरम् । क्वचिद्यायुधसन्दर्मगम्भीराकारगुम्भितम् ॥२४॥ क्वचिद् रत्नप्रभाभास्वद्बहुकोशगृहाज्वलम् । क्वचित्सेवकसङ्घातसन्ततायतमण्डलम् ॥२५॥ क्वचित्युच्चैः पठद्वन्दिबुन्दकोलाहलाकुलम् । क्वचिन्निबद्धसङ्गीतमुवङ्गध्वनिनादितम् ॥२६॥ सप्तकक्ष्याविभक्तं तत्स पश्यन् सपरिच्छदः । प्रापन्मदनमालाया वासप्रासादमुन्नतम् ॥२७॥ सा तं कक्ष्यासु साकूतनिर्वर्णिंतहृयादिकम् । श्रुत्वा परिजनान् मत्वा प्रच्छन्नं कञ्चिदद्भुतम् ॥२८॥ प्रत्युद्गम्य प्रणम्यासौ साभिलाषं सकौतुकम् । राजोचिते प्रवेश्यान्तस्तमुपावेशयदासने ॥२९॥
सप्तम लम्बक' ८१
सप्तम लम्बक' ८१ तब पराजित राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि शत्रु शस्त्रों से अजेय है। अतः अच्छा हो कि इसपर बुद्धि से विजय प्राप्त करें ॥१५॥
भले ही कुछ लोग निन्दा करें किन्तु मेरी प्रतिज्ञा झूठी न होनी चाहिए—ऐसा सोचकर और राज्यकार्य का भार, मन्त्रियों पर डालकर एक सौ राजपूतों तथा पाँच विशेष अंगरक्षकों के साथ गुप्त रूप से साधु का वेश बनाकर राजा विक्रमादित्य प्रतिष्ठानपुर पहुँचा ॥१६-१८॥
वहाँ जाकर वह राजा राजभवन के समान महान् और सुन्दर मदनमाला नाम की वेश्या के भवन में जा पहुँचा ॥१९॥
वह विशाल भवन (वायु से कम्पित करहा की झंडियों के) हिलते हुए वस्त्रों से मानो अतिथियों को हाथ से आमन्त्रित करता था। उस भवन के पूर्वी द्वार पर बीस हजार सैनिक सिपाही दिन-रात रक्षा करते थे और अन्य तीनों दिशाओं के द्वारों पर दस दस हजार शूर-वीर सैनिक पहरा देते थे ॥२०-२२॥
वह भवन कहीं घोड़ों की फैंकी हुई पंक्तियों से शोभित हो रहा था। कहीं हाथियों की चल-बन्द से भरा हुआ था। कहीं विविध अस्त्र-शस्त्रों की सुन्दर सजावट थी। कहीं चमचमाते रत्नों और खजानों से उज्ज्वल था। कहीं संगीत और मृदंग की मधुर स्वर-लहरी लहरा रही थी। सात प्राकारों (परों) से बँधे हुए उस भवन को देखता हुआ राजा मदनमाला के ऊँचे भवन पर पहुँचा ॥२३-२७॥
मदनमाला ने उन प्राकारों में अभिप्राय के साथ हाथी घांट आदि को देखते हुए उस राजा के गुप्तचरों द्वारा समाचार जानकर उस गुप्त बने हुए उच्च कोटि का व्यक्ति समझ लिया और उसके आने पर उसकी अगवानी करती हुई उसे समझदार समझ बड़ी अभिलाषा और आदर के साथ लाकर राजाओं के योग्य आसन पर बिठाया ॥२८-२ ९॥
८२ कथासरित्सागर
८२ कथासरित्सागर सोऽपि तद्रूपलावण्यविनीताहृतचेतनः। तामभ्यनन्ददारामान्नप्रकाश्यैव भूपतिः॥३०॥ ततो मदनमाला सा स्नानपुष्पानुलेपनैः। वस्त्रैराभरणैर्धूपैर्महार्हैरसममानयत् ॥३१॥ दत्त्वा दिवसवृत्तिं च तेषां तदनुयायिनाम्। आहारैस्तं ससचिवं नानारूपैरपाययत्॥३२॥ निनाय च समं तेन दिनं पानादिलीलया। आत्मानं भावयतस्तं सा दर्शनावशीकृता॥३३॥ रात्रौ चाराध्यमानोऽप्यच्छन्नोऽप्यहरहस्तया। स तस्यै विक्रमादित्यश्छत्रवत्युचितं क्रमम् ॥३४॥ याचकेभ्यो ददौ नित्यं वित्तं यावच्च यच्च सः। दृष्ट्वा मदनमाला सा तत्तस्मै स्वमुपानयत्॥३५॥ क्षनोपभुज्यमानं च सा शरीरं धनं सथा। मेन कृतार्थमम्यस्मिन्नुत्पर्ये च पराङ्मुखी॥३६॥ ततश्चण्डा ऽपि तत्रत्यमनुरक्तं नराधिपम्। आयान्तं नरसिंहं तं वारयामास युक्तिभिः॥३७॥ एवं तया सेव्यमानः कदाचिन्मन्त्रिणं रहः। राजा सहचरं सोऽत्र तं बुद्धिवरमभ्यधात्॥३८॥ अर्थार्थिनी न कामऽपि वेश्या रज्यति तं विना। तामां लोभो हि विधिना वत्सो निर्माय याचकान् ॥३९॥ इयं मदनमाला तु भुज्यमाने धने मया। न विरज्यत्यतिस्नेहान्मयि प्रत्युत तुष्यति॥४०॥ तदस्याः संप्रति कश्च करोमि प्रत्युपक्रियाम्। येन कामं प्रतिज्ञापि क्ष्मणं मम सत्स्यति॥४१॥ तच्छ्रुत्वा स ब्रवीति स्म मन्त्री बुद्धिवरो नृपम्। यद्येवं तद्भवार्णे यानि रत्नान्युपाहरत्॥४२॥ प्रपञ्चबुद्धिमिदंस्त स्तेभ्योऽर्घ्यं देहि वाञ्छितम्। इत्युक्तो मन्त्रिणा तेन राजा तं प्रत्यभाषत॥४३॥ दत्तं ममपरेरपि सैनांन्या किञ्चित्कृतं भवेत्। एतद्दान्तान्मदिमण्डं हि स्वमन्यत्र निष्कृतिः॥४४॥
सप्तम लम्बक ८१
सप्तम लम्बक ८१ राजा ने भी उसके सौन्दर्य सुचाई एवं विनय से आकृष्ट होकर अपने को छिपाये हुए ही उसका समुचित अभिनन्दन किया ॥३०॥ तब मदनमाला ने स्नान बहुमूल्य फूल इत्र वस्त्र भूषण आदि से राजा का सत्कार किया ॥३१॥ राजा के अनुयायियों का भी समुचित भोजन आदि विविध प्रकार से आतिथ्य-सत्कार किया ॥३२॥ उसके वर्तन से वशीभूत मदनमाला ने पान (मद्यपान) संगीत आदि से दिन-भर उसका मनोरंजन किया और अपने को राजा के लिए अर्पित कर दिया ॥३३॥ उस वेश्या द्वारा प्राप्त चक्रवर्ती राजा के योग्य सेवा-सत्कार का इसी प्रकार सेवन करता हुआ राजा कुछ दिनों के लिए वही गुप्त रूप से रहने लगा ॥३४॥ याचकों को प्रतिदिन वह जितना जो कुछ भी देता था मदनमाला वह सब लाकर स्वयं रख देती थी ॥३५॥ मदनमाला राजा पर इस प्रकार आसक्त थी कि अन्य लोगों के संपर्क से दूर रहकर, राजा विक्रम से उपभोग किये जाते धन और शरीर को सफल और धन्य समझती थी। यहाँ तक कि प्रतिष्ठान नगर के राजा नरसिंह को भी विक्रमादित्य के प्रेम के कारण किसी युक्ति से उसने आने से रोक दिया ॥३६-३७॥ इस प्रकार, मदनमाला से सेवित राजा विक्रम ने अपने साथ रहनेवाले मन्त्री बुद्धिवर से एकान्त में कहा—'वेश्या अर्थ-लोलुप होती है। अर्थ के बिना वह कामदेव पर भी प्रसन्न नहीं होती। ब्रह्मा ने भिक्षुका का निर्माण करने और उनसे लोभ को लेकर वेश्याओं को दे दिया ॥३८-३९॥ किन्तु, यह मदनमाला धन का अत्यन्त स्वतन्त्र उपभोग करते हुए भी मुझ पर अत्यन्त स्नेह के कारण विरक्त नहीं है, बल्कि प्रसन्न है ॥४०॥ तो मैं अब इसका प्रत्युपकार कैसे करूँ? जिससे क्रमशः मेरी प्रतिज्ञा भी सिद्ध हो सके' ॥४१॥ यह सुनकर मन्त्री बुद्धिवर राजा विक्रम से बोला—यदि ऐसा ही है, तो प्रपंचवज्र नाम के भिक्षु (तपस्वी) ने जो तुम्हें रत्न दिये थे उन बहुमूल्य रत्नों को इसे भेंट कर दो ॥४२॥ तब राजा ने कहा—उन सब रत्नों के देने पर भी इसका कुछ भी बदला नहीं चुकाया जा सकता। उसने कृतघ्न न समझ उसका प्रत्युपकार करने का और ही उपाय है ॥४३-४४॥
८४ कथासरित्सागर
८४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीन्मन्त्री देव किं तेन भिक्षुणा। स्वत्सेवा सा कृतस्यैष तद्वृत्तान्तस्त्वमोच्यताम् ॥४५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा तेन राजा बुद्धिवरण सः। जगाद शृणु तत्रेतां तत्कथां वर्णयामि ते ॥४६॥ प्रपञ्चबुद्धिभिक्षुकथा पूर्व पाटलिपुत्रे मे प्रविष्टस्यास्पदान्वहम्। भिक्षु प्रपञ्चबुद्ध्याख्यः समुद्गकमुपानयत् ॥४७॥ अहं तथैव सतत वर्षमात्रं समर्पयन्। भाण्डागारिकहस्तं तन्मृद्घाटितमव सत् ॥४८॥ एकदा भिक्षुणा तत्र ढौकितं तत्समुद्गकम्। देवात् पाणेर्मम पतद्द्विधामूतमभूद् भुवि ॥४९॥ निरगाच्च महारत्नं तस्मादनलभासुरम्। प्राक्तन्येवाप्यपञ्चिात हृदयं तेन दर्शितम् ॥५०॥ तद्वृष्ट्वादाय चान्यानि तान्यानाय्य विभज्य च। समुद्गकानि सर्वेभ्यो रत्नान्यहमवाप्तवान् ॥५१॥ ततः प्रपञ्चबुद्धिं तमप्राक्षं विस्मयादहम्। किमहो सेवसे रत्नैरैष मामीदृशैरिति ॥५२॥ अथान्त्र विजनं कृत्वा स भिक्षुर्मामवोचत। अस्यां कृष्णचतुर्दश्यामागामिन्यां निशागमे ॥५३॥ श्मशाने साधनीया मे विद्या काचित्सतो बहिः। तत्र साहायके वीर त्वदागमनमर्थये ॥५४॥ वीरसाहाय्यनिर्विघ्ना सुसुलभ्या हि सिद्धयः। इत्युक्तो भिक्षुणा तेन तदहं प्रतिपन्नवान् ॥५५॥ अथ दृष्टे गते तस्मिन् दिने कृष्णचतुर्दशी। चागात्सा श्रमणस्यास्य तस्यास्मार्थमहं वचः ॥५६॥ ततः कृताह्निक्रो भूत्वा प्रबोध्य प्रतिपास्यन्। कृतसन्ध्याविधिर्देवात् क्षिप्रं निद्रामगामहम् ॥५७॥ तत्क्षणं गरुडारूढो भगवान् भक्तवत्सलः। हरिः पद्मार्कितोरस्कः स्वप्ने मामेवमादिशत् ॥५८॥
सप्तम लम्बक ८५
सप्तम लम्बक ८५ यह सुनकर मन्त्री ने कहा- 'महाराज ! उस भिक्षु ने आपका कौन-सा उपकार किया उसे बताइए। राजा ने कहा- 'सुनो उसकी कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ-॥४५-४६॥ प्रपञ्चबुद्धि नामक भिक्षुक की कथा प्राचीन समय में पाटलिपुत्र (पटना) में प्रपंचबुद्धि नाम का भिक्षु (तपस्वी) प्रतिदिन दरबार में आकर मुझे एक बन्द डिब्बा देता था। एक वर्ष तक प्रतिदिन वह डिब्बा देता रहा और मैं उसे उसी प्रकार (बिना खोले ही) भाण्डागार के अधिकारी को दे देता था॥४७-४८॥ एक बार उस भिक्षु से दिया गया रत्न का डिब्बा दैवयोग से मेरे हाथ से गिरकर दो टुकड़े हो गया। उसके अन्दर से आग के समान जलता हुआ चमकीला रत्न निकला मानो उस डिब्बे ने पहले मेरे द्वारा न जाने हुए अपने हृदय का प्रदर्शन किया ॥४९-५०॥ उसे देखकर मैंने सभी पुराने डिब्बे मँगाये और उनके खोलने पर सबमें ऐसे चमकीले बहुमूल्य रत्न निकले ॥५१॥ तब मैंने प्रपंचबुद्धि से पूछा 'आश्चर्य है कि तुम ऐसे अमूल्यरत्नों से मेरी सेवा क्यों कर रहे हो? ॥५२॥ तब वहाँ से सब लोगों को हटाकर वह भिक्षु बोला-'इसी आनेवाली कृष्ण चतुर्दशी को मैं रात के समय एक विद्या की सिद्धि करूँगा। उसमें बाहरी सहायता के लिए तुम्हारे ऐसे वीर की आवश्यकता है। वीर की सहायता से विघ्न दूर होने पर सहज में ही सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं' भिक्षु के ऐसा कहने पर मैंने उसकी सहायता करना स्वीकार कर लिया ॥५३-५५॥ उसके प्रसन्न होकर चले जाने पर और कुछ दिनों के व्यतीत होने पर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि आई। मैंने उस भिक्षु की बात का स्मरण किया ॥५६॥ तब प्रातःकाल उठकर अपना नित्यकर्म करके सायंकाल की प्रतीक्षा करने लगा। सायंकाल की सन्ध्या-विधि करके मैं रात्रि में जल्दी ही सो गया ॥५७॥ निद्रा आते ही स्वप्न में गरुड़ पर बैठे हुए लक्ष्मी को गोद में लिये भगवान् पद्म- नाभू ने आदेश दिया-॥५८॥
प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/सफेद) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) दिखाई नहीं दे रहा है।
कृपया सही पृष्ठ या छवि पुनः अपलोड करें ताकि उसका पूर्ण लिप्यंतरण किया जा सके।
सप्तम लम्बक ८७
सप्तम लम्बक ८७ वह प्रपंचबुद्धि नाम के अनुसार प्रपंचबुद्धि ही है। हे पुत्र ! वह मण्डल की पूजा में तुम्हें श्मशान में ले जाकर तुम्हारा बलिदान करेगा ॥५९॥ इसलिए, तुम्हें मारने के लिए जो कुछ कहे वह न करना। उससे कहना कि पहले तुम क्रिया करके हमको सिखाओ तो मैं करूँगा ॥६० ॥ जब वह तुम्हें सिखाने के लिए उस प्रकार करे, तब तुम उसकी युक्ति से रखी शस्त्र उसे मार देना। इस प्रकार वह जिस सिद्धि को चाहता है वह तुम्हें मिलेगी' ॥६१॥ विष्णु भगवान् के ऐसा कहकर अन्तर्धान होने पर मैंने उठकर सोचा—मैंने मायावी को भगवान् की कृपा से जाना और मुझ से वह मारा जायगा ॥६२॥ ऐसा सोचकर एक पहर रात बीतने पर नंगी तलवार लिये हुए मैं अकेला श्मशान पहुँचा ॥६३॥ वहाँ मण्डल की पूजा किये हुए उस भिक्षु को देखकर मैं उसके समीप गया। वह भी धूर्त मुझे देखकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए बोला—॥६४॥ आँखें बन्द करके अंगों को फैलाकर नीचे मुँह किये हुए पृथ्वी पर प्रणाम करो। राजन् ! इस प्रकार हम दोनों को एक समान सिद्धि प्राप्त होगी' ॥६५॥ तब मैंने उससे कहा—'पहले तुम इस प्रकार प्रणाम करो। पहले मुझे करके दिखाओ तब मैं भी इसी प्रकार करूँगा' ॥६६॥ ऐसा सुनकर वह मूर्ख श्रमण उसी प्रकार करने लगा। मैंने तलवार से उसका सिर काट डाला ॥६७॥ इसके बाद ही आकाश से वाणी हुई 'राजन् ! बहुत अच्छा किया जो इस पापी भिक्षु का बलिदान कर डाला ॥६८॥ इसलिए मैं धनाधिप कुबेर, तुम्हारे धैर्य से प्रसन्न हूँ। इसलिए, मुझसे और जो कुछ चाहता है वह और वर माँग। ऐसा कहकर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर सामने आये कुबेर को प्रणाम करके मैंने कहा—'भगवन् ! आवश्यकता पड़ने पर मैं जब भी तुमसे प्रार्थना करूँ तब तुम स्मरण-मात्र से उपस्थित होकर मुझे वर प्रदान करना ॥६९—७१॥ ऐसा ही होगा' मुझ ऐसा कहकर कुबेर अन्तर्धान हो गया और मैं सिद्धि प्राप्त करके शीघ्र अपने भवन में आया ॥७२॥ यह मैंने तुम्हें अपना वृत्तान्त सुना दिया। अब उसी कुबेर देवता के वर से मदनमाला का प्रत्युपकार करता हूँ ॥७३॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर
प्रविष्टा तत्र नाद्राक्षीत्प्रियं तं नृपतिं क्वचित्। अद्राक्षीत्तु महोच्छायान्¹ सौवर्णान्पञ्च पूरुषान् ॥८८॥ तान्दृष्ट्वा समनासाद्य दुःखिता सा व्यचिन्तयत्। नूनं विद्याधरः कोऽपि गन्धर्वो वा स मे प्रियः ॥८९॥ यः सविभज्य मामेभिः पुंभिरुत्पत्य स गतः। तदेतैर्भर्तृतुल्यैः किं सवियुक्ता करोम्यहम् ॥९०॥ इति सञ्चिन्त्य पृच्छन्ती निजं परिजनं मुहुः। तत्प्रवृत्तिं विनिर्गत्य तत्र बभ्राम सर्वतः ॥९१॥ न च लेभे रतिं क्वापि हर्म्योद्यानगृहादिषु। विलपन्ती वियोगार्त्ता शरीरत्यागसम्मुखी ॥९२॥ मा विषादं कृथा देवि कोऽपि कामचरो हि सः। देवो यदृच्छया भूयो भव्ये त्वामभ्युपैष्यति ॥९३॥ इत्यादिभिः प्रदत्तास्थैर्यवाक्यैः परिजनेन सा। आश्वासिता कथमपि प्रतिज्ञामकरोदिमाम् ॥९४॥ षण्मासमध्ये यदि मे न स दास्यति दर्शनम्। दत्तसर्वस्वया वह्नौ प्रवेष्टव्यं ततो मया ॥९५॥ इति प्रतिज्ञयात्मानं संस्तभ्यामृतपक्षं सा। मन्वहं ददती दानं ध्यायन्ती तं स्ववल्लभम् ॥९६॥ एकदा स्वर्णपुंसां च तेषामेकस्य सा भुजौ। छेदयित्वा द्विजातिभ्यो ददौ दानैकतत्परा ॥९७॥ द्वितीयेऽह्नि च साद्राक्षीत्तादृक्षावेव तस्य तौ। रात्रिमध्ये समुत्पन्नौ भुजौ सञ्जातविस्मया ॥९८॥ ततः क्रमेण सान्येषां भुजौ दानार्थमच्छिनत्। उत्पेदिरे च सर्वेषां पुनस्तेषां तथैव ते ॥९९॥ अथ तानक्षयान् दृष्ट्वा विप्रेभ्यो भेदसत्त्वया। अभ्यर्थिभ्यो ददौ छित्त्वा तद्भुजान् सा शुभान्वहम् ॥१००॥ दिनेष्वल्पैर्गतां दिक्षु श्रुत्वा तां ख्यातिमाययौ। तत्र संग्रामदत्ताख्यो विप्रः पाटलिपुत्रकात् ॥१०१॥
१ मह्युन्नतान्।
सप्तम लम्बक ९१
सप्तम लम्बक ९१ उसमें जाकर उसने कही भी राजा को नहीं देखा प्रत्युत वहाँ बड़े ऊँचे पाँच सोने के पुरुषों को देखा ॥८८॥ उन्हें देखकर और राजा को न देखकर वह (मदनमाला) सोचने लगी कि यह मेरा प्यारा अवश्य कोई विद्याधर है या गन्धर्व है ॥८९॥ जो मेरे हिस्से में ये पाँच सोने के पुरुष देकर आकाश में उड़ गया तो उससे वियुक्त होकर इन व्यर्थ भार-स्वरूप पुरुषों को क्या करूँगी ॥९०॥ ऐसा सोचकर पूजागृह से बाहर निकलकर अपने सेवकों से उसका समाचार बार-बार पूछती हुई मदनमाला पागलों की भाँति इधर-उधर घूमने लगी ॥९१॥ भवन उद्यान आदि कहीं भी उसे शान्ति न मिली। वह राजा के वियोग से पीड़ित होकर अपना शरीर-त्याग करने का प्रयत्न करने लगी ॥९२॥ 'हे देवि ! दुःख न करो। यह अकस्मात् आया हुआ देवता पुनः तुम्हारे पास आयेगा' ॥९३॥ इस प्रकार, आशा और आश्वासन देनेवाले परिजनों के वाक्यों से आश्वासित मदनमाला ने प्रतिज्ञा यह कर ली कि यदि वह मेरा प्यारा छह् महीनों के अन्दर दर्शन न देगा तो मैं अपना सर्वस्व-दान करके आग में जलकर मर जाऊँगी ॥९४-९५॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके और अपने को किसी प्रकार रोककर प्रतिदिन दान देती और अपने प्रिय का ध्यान करती हुई वह किसी तरह जीवित रहने लगी ॥९६॥ एक बार परम दानी उसने सोने के पुरुषों में से एक के हाथों को कटवाकर ब्राह्मणों को दान दे दिया ॥९७॥ दूसरे दिन उसने देखा कि उसके हाथ उसी तरह रात भर में फिर से पैदा हो गये हैं। इससे उसे आश्चर्य हुआ ॥९८॥ इसी प्रकार, उसने क्रमशः सभी पुरुषों के हाथ कटवाकर दान कर दिये; किन्तु रात-भर में वे हाथ उसी प्रकार उग गये ॥९९॥ तदनन्तर, उसने उन पुरुषों को अक्षय देखकर ब्राह्मणों को बड़े की संख्या से दान करना प्रारम्भ किया। अर्थात् जो ब्राह्मण जितने लेने जानता था उतने हाथ उसे दान में देने लगी ॥१००॥ कुछ दिनों में उस के दान की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई। उसकी इस प्रसिद्धि को सुनकर गदाधरनामक ब्राह्मण पाटलिपुत्र से आया ॥१०१॥