कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
The provided image is completely blank and does not contain any text to transcribe.
६१८ कथासरित्सागर
६१८ कथासरित्सागर एकां चाताडयद्राज्ञीं हेमकुम्भद्वयोपमे। कुचयुग्मे च विस्रस्तवसने करवारिणा ॥११९॥ तद्दृष्ट्वा सा चुकोपास्यै सेर्ष्या मदनसुन्दरी। कियत्क्षोभ्या नदीयेव सोद्वेगेव जगाद च ॥१२०॥ उत्तीर्य चाम्भसः प्रायादासन्नवस्त्रान्तरा रुषा। प्रियापराधं शंसन्ती तं सखीभ्यः स्वमन्दिरम् ॥१२१॥ ततो ज्ञाताक्षमस्तस्या जलक्रीडां विमुच्य सः। राजा कनकवर्षोऽपि तद्वासगृहमभ्ययौ ॥१२२॥ वार्यमाणो रुषा तत्र पञ्जरस्थैः शुकैरपि। प्रविश्य स ददर्शान्तर्देवीं तां मन्युपीडिताम् ॥१२३॥ वामहस्ततलन्यस्तविषण्णवदनाम्बुजाम् । स्वच्छमुक्ताफलनिभैः पतद्भिर्बाष्पबिन्दुभिः ॥१२४॥ 'जइ विरहो ण सहिज्जइ माणो (सुहा वि) परिवज्जणीओ से। विरहो हिअअ सहिज्जइ माणो (एव्व) परिवड्ढणीओ से ॥१२५॥ इअ आणिऊण णिउण चिट्ठसु ओलम्बिऊण इक्कवरम्। उहयतडदिण्णपाओ मज्झणिबिडिओ धुव विणिस्सिहिसि ॥१२६॥ इतीमं द्विपदीखण्डं पठन्तीं साश्रुगद्गदम्। निर्यद्दन्तांशुहारिण्या गिरापभ्रंशमुग्धया ॥१२७॥ विलोक्य च तथाभूतां तां कोपेऽपि मनोरमाम्। उपाययौ सलज्जश्च सभयश्च स भूपतिः ॥१२८॥ पराङ्मुखीमवाश्लिष्य वचोभिः प्रीतिपेशलैः। प्रवृत्तोऽभूत्सभिनयंस्तां प्रसादयितुं च सः ॥१२९॥ वक्रोक्तिसूचितार्थे परिहारे पपात च। तस्याश्चरणयोर्निन्दन्नात्मानमपराधिनम् ॥१३०॥ १ यदि विरहो न सह्यते मानः (सुखादपि) परिवर्जनीयस्ते। विरहो हृदय सह्यते मानः (एव) परिवर्धनीयस्ते॥ इति ज्ञात्वा निपुणं तिष्ठस्वावलम्ब्यैकतरम्। उभयतटदत्तपादो मध्यनिपतितो ध्रुवं विनंक्ष्यसि इति च्छाया।
नवम स्तम्बक ६१९ इसी समय वह राजा एक रानी के दो स्वर्ण-कलशों के समान वस्त्ररहित उत्तुंग कुचों को पानी के छींटा से मारने लगा ॥११९॥ यह देखकर मदनसुन्दरी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वह कहने लगी 'तुम नदी का कितना क्षोभ करोगे' इतना कहकर और जल से बाहर निकलकर, क्रोध के साथ वस्त्र बदलकर अपनी सखियों से राजा की शिकायत करती हुई वह अपने भवन को चली गई॥ १२०-१२१॥ तब उसके भाव को समझकर राजा भी जलक्रीड़ा छोड़कर उसके (मदनसुन्दरी) निवास भवन को गया ॥१२२॥ वहाँ पर पिंजराँ में टँगे हुए शुकौँ से भी रोके जाते हुए राजा ने भीतर जाकर क्रोधातुर रानी को देखा ॥१२३॥ बायें हथेली पर खिन्न और म्लान मुख-कमल को रखी हुई, आँखों से बड़े-बड़े स्वच्छ मोतियों के समान आँसुओं की बूँदों को गिराती हुई, बँधे हुए कण्ठ से अस्पष्ट उच्चारण करती हुई और दाँतों की किरणों से मनोहर लगती हुई वह रानी अपभ्रंश भाषा में सुन्दर द्विपदी के इस टुकड़े को गा रही थी- यदि विरह नहीं सहा जाता तो तुम्हें मान छोड़ना चाहिए। हे हृदय ! यदि विरह सहा जाय तो मान को बढ़ाओ। ऐसा जानकर दोनों में से एक का निश्चय कर लो। अन्यथा दोनों किनारों पर पैर रखने से बीच में गिरकर अवश्य नष्ट हो जाओगे ॥१२४-१२७॥ इस प्रकार क्रोध में भी मनोहर लगती हुई मदनसुन्दरी के पास राजा कन्दर्प डरता और लजाता हुआ गया ॥१२८॥ मुँह फेरकर बैठी हुई उसे वह राजा अपने आभिधान और मधुर वचनों द्वारा नम्रता के साथ मनाने लगा ॥१२९॥ नवोत्कण्ठा से उसके अनुराग को बताती हुई सखियों के सामने ही मदनसुन्दरी के चरणों पर वह राजा अपने अपराधी आत्मा की निन्दा करता हुआ गिर पड़ा ॥१३०॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर स्तनस्तमयुनेवाम्बुवारिणा गलितेन सा। सिञ्चन्ती कण्ठलग्नास्य प्रसाद्य महीपतिं ॥१३१॥ अथैष हृष्टो नीत्वा तद्दिनं कुपिततुष्टया' । राजा तया सहासेव्य रत निशामगाभिशि॥१३२॥ सुप्तो ददर्श चाकस्मात् स्वप्ने विकृतया स्त्रिया। हृतामेकावलीं कण्ठाच्चूडारत्नं च मूर्धतः ॥१३३॥ ततोऽप्यपश्यद्वेताल नानाप्राप्यङ्गविग्रहम्' । बाहुयुद्धे प्रवृत्तं च त स भूमावपातयत् ॥१३४॥ पृष्ठोपविष्टश्छोड्डीय पक्षिणेव विहायसा। नीत्वा तेन नृपोऽम्भोधी वेतालेन स विक्षिपे ॥१३५॥ तत्र कथञ्चिदुत्तीर्ण परमेकावलीं गले। चूडामणिं च तं मूर्ध्नि पूर्ववत्स्थितमैक्षत ॥१३६॥ एतद्दृष्ट्वा प्रबुद्धः स प्रातः परिचयागतम्। अस्य क्षपणकं राजा फलं स्वप्नस्य पृष्टवान् ॥१३७॥ । न वाच्यमप्रियं किं तु कथं पृष्टो न वच्मि य ॥१३८॥ या त्वयैकावली दृष्टा हृता चूडामणिस्तथा। सैष देव्या वियोगस्ते पुत्रेण च भविष्यति ॥१३९॥ प्राप्ते चैकावलीरत्नं यदुत्तीर्णाब्धिना त्वया। दुःखान्ते सोऽपि भावी ते देवीपुत्रसमागमः ॥१४०॥ इति क्षपणकेनोक्ते विमृश्य स नृपोऽब्रवीत्। पुत्रो मेऽद्यापि नास्त्येव स तावज्जायतामिति ॥१४१॥ अथोपयाताद्योपौरस रामायणपाठकात् । पुत्रार्थं विहितक्लेदं राजा ददर्श नृपम् ॥१४२॥ ततोऽमृतसुतप्राप्तिश्चिन्त क्षपणक गतः। राजा कनकवर्षस्तद्दिनाय विमना दिगम् ॥१४३॥ १ आदौ कुपिता पश्चात् तुष्टा तया । २ 'मोहम्-त्रो-बद्धो'स्थाने पुस्तरान्तरमवमितिः नानाप्राप्यङ्ग विग्रहा मूर्तकः समुत्पन्नतः तदि ३ मूलपुस्तके भ्रटितमिदं यथार्थम्।
प्रथम लम्बक १२१
प्रथम लम्बक १२१ तब उस क्रोधाग्नि से ही मानों पिघलकर गिरते हुए आँसुओं से राजा को भिगोती हुई रानी गले से लिपट गई ॥१३१॥ तदनन्तर, राजा क्रुद्ध होकर प्रसन्न हुई रानी के ही पास उस दिन को व्यतीत कर रात्रि में भी उसके साथ आनन्द विलास करके सो गया ॥१३२॥ सोये हुए उसने अकस्मात् एक स्वप्न देखा कि एक कुरूपा स्त्री ने उसके गले से मोतियों की एक बड़ी माला और मुकुट के रत्न निकाल लिये हैं। उसके पश्चात् विविध प्राणियों के अंग वाले उसने दो बेतालों को देखा। उनके साथ बाहुयुद्ध होने पर राजा ने उन्हें भूमि पर पटक दिया और उनकी पीठ पर वह चढ़ बैठा। बेतालों ने पीठ पर बैठे हुए राजा को पक्षी के समान उड़कर समुद्र में लेजाकर फेंक दिया तदनन्तर किसी प्रकार समुद्र से निकले हुए राजा ने गले में मोतियों की माला और मुकुट में चूडामणि आदि रत्नों को पहले के ही समान देखा ॥१३३-१३६॥ यह स्वप्न देखकर प्रातः काल जगे हुए राजा ने मिलने के लिए आए हुये बौद्ध भिक्षु को देखकर स्वप्न का फल पूछा ॥१३७॥ बौद्ध भिक्षु ने कहा-महाराज आपके सामने अप्रिय बात नहीं कहनी चाहिए किन्तु आपसे पूछे जाने पर कैसे न कहूँ ॥१३८॥ आपने जो मोतियों की माला और चूडामणि का अपहरण देखा वह आपके पुत्र और महारानी के साथ वियोग का सूचक है। समुद्र से निकलकर जो तुमने उन दोनों वस्तुओं को पा लिया यह दुःख के अन्त में फिर से उन दोनों के मिलने का सूचक हैं-॥१३९ १४०॥ क्षपणक के इस प्रकार कहने पर कुछ सोचकर राजा ने कहा-'मुझे अभी तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ अब पहले वह उत्पन्न तो हो' ॥१४१॥ इसके उपरान्त आये किसी हुए रामायण की कथा कहनेवाले से राजा ने सुना कि राजा दशरथ ने पुत्र के लिए बहुत कष्ट उठाया ॥१४२॥ क्षपणक के चले जाने पर, राजा के मन में पुत्रोत्पत्ति की चिन्ता बढ़ गई। और, उसने उस दिन को बड़े खिन्न मन से बिताया ॥१४३॥
६२२ कथासरित्सागर
६२२ कथासरित्सागर
रात्रावकस्माज्जैकाकी विनिद्रः शयनस्थितः । द्वारमुद्घाटितेऽप्यन्तः प्रविष्टां स्त्रियमैक्षत ॥१४४॥ विनीता सौम्यरूपा च सा तं साश्चर्यमुत्थितम् । कृतप्रणाम वक्ताशीः क्षितीश्वरमभाषत ॥१४५॥ पुत्र मां विद्धि तनयां नागराजस्य वासुकेः । त्वत्पितुर्भगिनीं ज्येष्ठां नाम्ना रत्नप्रभामिमाम् ॥१४६॥ रक्षार्थं तेऽन्तिके शश्वददृष्टा च वसाम्यहम् । अद्य दृष्ट्वा सचिन्तं त्वामात्मा ते बोधितो मया ॥१४७॥ न द्रष्टुमुत्सहे ग्लानिं तव तद्ब्रूहि कारणम् । इत्युक्तः स तया राजा पितृष्वस्रा जगाद ताम् ॥१४८॥ धन्योऽस्म्यम्ब यस्यैव त्वं प्रसादं करोषि मे । अनिवृत्तिं च मे विद्धि पुत्रासम्भवहेतुकाम् ॥१४९॥ अपि राजर्षयो यत्र पुरा दशरथादयः । स्वर्गार्थमेवेच्छंस्तत्राम्ब कथं नेच्छन्तु मादृशाः ॥१५०॥ एतत्कनकवर्षस्य नृपतेस्तस्य सा वचः । श्रुत्वा रत्नप्रभा नागी भ्रातुः पुत्रमुवाच तम् ॥१५१॥ तर्हि पुत्र वदाम्येकं यमुपायं कुरुष्व तम् । गत्वा स्वामिकुमारं त्वमतदर्थं प्रसादय ॥१५२॥ कुमारधारां विघ्नाय पतन्तीं मूर्ध्नि दुःसहाम् । शरीरान्तःप्रविष्टायाः प्रभावान्मम सहिष्यसे ॥१५३॥ विघ्नजातं विजित्या यदपि प्राप्स्यसि वाञ्छितम् । इत्युक्तान्तर्दधे नागी राजा हृष्टोऽक्षिपत्क्षपाम् ॥१५४॥ प्रातर्मन्त्रिषु विन्यस्य राज्यं पुत्राभिकाङ्क्षया । ययौ स्वामिकुमारस्य पादमूलं स भूपतिः ॥१५५॥ तत्र तीव्रं तपश्चक्रे तमाराधयितुं प्रभुम् । तयार्पितबलो नाग्या शरीरान्तःप्रविष्टया ॥१५६॥ ततोऽशनिनिभा राज्ञः पतितुं तस्य मूर्धनि । कुमारवारिधारा सा प्रवृत्ताभूदनारतम् ॥१५७॥ स च सहे शरीरान्तर्गतनागीबलेन ताम् । ततस्तस्याभिविप्सार्थं हेरम्बं प्रेरयद्गुहः ॥१५८॥
नवम लम्बक ६२३
नवम लम्बक ६२३ एक बार रात्रि में शयनागार में अकेले सोये हुए राजा ने पर्यंग पर पड़े-पड़े ही द्वार बन्द रहने पर भी सहसा अन्दर आई हुई एक स्त्री को देखा ॥१४४॥ वह स्त्री नम्र और शान्त-स्वरूप थी। उसने शय्या से उठे और प्रणाम करते हुए राजा को आशीर्वाद देकर कहा—॥१४५॥ 'बेटा मैं तुम्हारे पिता की बड़ी बहन और नागराज वासुकि की कन्या हूँ। मेरा नाम रत्नप्रभा है ॥१४६॥ मैं अदृश्य रूप से तेरी रक्षा के लिए सदा तेरे पास रहती हूँ। आज तुम्हें अधिक चिन्तित देखकर तेरे सामने प्रकट हुई हूँ। मैं तुझे खिन्न नहीं देख सकती। दुःखी होने का कारण क्या है बताओ। पिता की बहन (बुआ) के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे कहा—॥१४७-१४८॥ 'माता मैं धन्य हूँ कि तुम मेरी रक्षा का ध्यान रखती हो। किन्तु, पुत्र न होने का मुझे दुःख है। जब कि प्राचीन काल के राजर्षि दशरथ ऐसे महान् व्यक्तियों ने स्वर्ग के लिए पुत्र की इच्छा की तो मेरे ऐसे व्यक्ति क्यों न करें' ॥१४९ १५ ॥ राजा कनकवर्ष के यह वचन सुनकर वह रत्नप्रभा नागिन भाई के पुत्र (राजा) से बोली—॥१५१॥ यदि ऐसा है तो हे पुत्र मैं तुमसे कहती हूँ कि तू जाकर पुत्र के लिए स्वामी कार्तिक से प्रार्थना कर ॥१५२॥ उनकी आराधना में विघ्न करने के लिए सिर पर कुमार-धारा गिरती है तू मेरे शरीर में प्रविष्ट हो जाने के कारण उस धारा को सहन कर सका ॥१५३॥ और भी असाध्य विघ्नों को जीतकर तू अपना ईप्सित फल प्राप्त कर लेगा। इतना कहकर वह नागिन अन्तर्धान हो गई। और राजा ने वह रात्रि प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत की ॥१५४॥ प्रातःकाल राजा ने राज्य का भार मन्त्रियों पर छोड़कर पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से स्वामी कार्तिक के चरणों में प्रस्थान किया ॥१५५॥ वहाँ जाकर उसने कार्तिक की आराधना के लिए कठोर तप प्रारम्भ किया क्योंकि शरीर में प्रविष्ट नागिन (बुआ) का बल उसे प्राप्त था ॥१५६॥ तब राजा के सिर पर वज्र के समान तीव्र कुमार-धारा निरन्तर गिरने लगी ॥१५७॥ शरीर के अन्दर प्रविष्ट नागिन के बल से राजा ने धारा के वेग को सहन कर लिया। तब उनकी तपस्या में विघ्न करने के लिए कार्त्तिकेय ने यमेश्वरों को प्रेरित किया ॥१५८॥
हेरम्बश्वाससूतत्र धागमध्यं महाविषम्। तस्याजगरमत्युग्रं न स तेनाप्यकम्पत ॥१५९॥ ततो विनायकः साक्षाद्धन्ताघातानुरस्य सः। एत्य वातुं प्रवृते तस्याजय्यः सुरैरपि ॥१६०॥ मत्वा तं दुर्जयं देवं सोऽथ स्तुतिमिरचितुम्। राजा कनकवर्षस्तद्विषयोपचक्रमे ॥१६१॥ नमः सर्वार्थसंसिद्धिनिधिकुम्भोपमात्मने। लम्बोदराय विघ्नेश व्याघ्रात्तङ्करुणाय ते॥१६२॥ लीलोत्क्षिप्तकराघातविभुतासनरेणुजम् । ब्रह्माणमपि सोत्कम्पं कुर्वन्नजय गजानन ॥१६३॥ सुरासुरमुनीन्द्राणामपि सन्ति न सिद्धयः। अतुष्टे त्वयि लोकैकधुरन्ध्य शङ्करप्रिय ॥१६४॥ घटोदरः शूर्पकर्णो गणाध्यक्षो मदोत्कटः। पाशहस्तोऽम्बरीषश्च जम्भकस्त्रिशिखायुधः ॥१६५॥ एवमाद्यैः स्तुवन्ति स्म पापघ्नैराष्टषष्टिभिः। तत्सख्यस्थाननियतैर्नामभिस्त्वां सुरोत्तम ॥१६६॥ स्मरतः स्तुवतश्च त्वां विनश्यन्ति भयं प्रभो। रणराजकुलद्यूतघोराग्निश्वपदादिजम् ॥१६७॥ इति स्तुतिपदैरेतैरन्यैर्वहुविधैश्च सः। नृपः कनकवर्षस्तं विघ्नेश्वरमपूजयत् ॥१६८॥ तुष्टोऽस्मि न करिष्यामि विघ्नं ते पुत्रमाप्नुहि। इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे तत्र राज्ञस्तस्य स विघ्नजित् ॥१६९॥ ततः स्वामिकुमारस्तं तदाराधारिणं नृपम्। उवाच धीरं तुष्टोऽस्मि तव याचस्व तद्वरम् ॥१७०॥ तच्छ्रुत्वा स प्रहृष्टस्तं देवं राजा व्यजिज्ञपत्। त्वत्प्रसादेन मे नाथ सूनुरुत्पद्यतामिति ॥१७१॥ एवमस्तु सुतो भावी भवतो मद्गुणांशभाक्। नाम्ना हिरण्यवर्षश्च भविष्यति स भूपते ॥१७२॥ इत्युक्त्वा गर्भगेहान्तः प्रवेशाय तमाह्वयत्। सविशेषप्रसादाप्तुमुपेतं बर्हिवाहनः ॥१७३॥
नवम लम्बक ६२५
नवम लम्बक ६२५
गणप ने उस धारा में महाविष मिला दिया और एक भीषण अजगर को उत्पन्न किया। किन्तु, उससे राजा जरा भी विचलित न हुआ ॥१५९॥ तब विनायक ने स्वयं आकर राजा के पेट में दाँतों से प्रहार किया। जिस प्रहार का देवता भी सहन नहीं कर सकते थे राजा ने उसका भी सहन किया ॥१६०॥ तब राजा कनकवर्ष ने गणेशजी को दुर्जय जानकर उस दन्त-प्रहार का सहन करने के उपरान्त उनकी स्तुति प्रारम्भ की— ॥१६१॥ 'हे सभी इच्छित अर्थों की सिद्धि के कोष-स्वरूप कुम्भ के भगवान् गजपति तुम्हारे लिए नमस्कार है। हे लम्बोदर, हे विघ्नविनाशक, हे सर्प का यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, तुम्हें प्रणाम करता हूँ ॥१६२॥ झींझा (क्रीडा) करते समय अपनी सूँड़ से ब्रह्मा के भी आसन-कमल को कँपानेवाले गजानन तुम्हारी जय हो ॥१६३॥ तुम्हारे अप्रसन्न होने पर देवता, दैत्य और मुनिजनों को भी सिद्धियाँ प्राप्त नहीं हो सकतीं। अतः हे समस्त लोकों के एकमात्र शरण देनेवाले शंकर के दुलारे, तुम्हें प्रणाम है ॥१६४॥ हे महोदर, हे शूर्पकर्ण, हे गणाध्यक्ष, हे महोत्कट, हे पाशहस्त, हे अम्बरीष, हे अम्बक और हे त्रिशिखायुध, इस प्रकार उन-उन स्थानों में प्रसिद्ध अड़सठ नामों से देवता और दैत्य तुम्हारा स्मरण और स्तुति करते हैं। इन नामों से तुम्हारी स्तुति करनेवाले को संग्राम, राजकुल, जूआ, चोर, अग्नि और हिंस्र जन्तुओं का भय नहीं रहता' ॥१६५—१६७॥ उस राजा कनकवर्ष ने इस प्रकार की बहुसंख्य स्तुतियों से विघ्नेश्वर गणेश की प्रार्थना की ॥१६८॥ 'मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ। अब विघ्न न करूँगा। तू पुत्र प्राप्त कर।' राजा से इस प्रकार कहकर गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥१६९॥ तब कुमार-धारा का सहन किये हुए उस राजा को दर्शन देकर स्वामी कार्तिकेय ने कहा—'हे वीर मैं तुझसे प्रसन्न हूँ, वर माँग' ॥१७०॥ यह सुनकर हर्षित राजा ने उनसे निवेदन किया—'हे प्रभो आपकी कृपा से मुझे पुत्र-प्राप्ति हो' ॥१७१॥ ऐसा ही हो। तुझे मेरे गण के मध्य से पुत्र-प्राप्ति होगी। वह संसार में हिरण्यवर्ष नाम से विख्यात होगा ॥१७२॥ ऐसा कहकर मयूरवाहन कार्तिकेय ने उस पर विशेष कृपा करने की इच्छा से राजा को मन्दिर के गर्भगृह में बुलाया ॥१७३॥ ७९
१२६ कथासरित्सागर
१२६ कथासरित्सागर सेनादृष्ट्यास्य निर्गान् नागी वहान्नृपस्य सा। विशन्ति शापभीता हि न कुमारगृहं स्त्रियः ॥१७४॥ ततः कनकवर्षोऽसौ स्वेन मानुषतेजसा। विवेश गर्भभवनं तस्य देवस्य पावकेः ॥१७५॥ स तं नाग्यनधिष्ठानात् पूर्वतेजोविनाकृतम्। दृष्ट्वा नृपं म्रियेतत् स्यादिति देवोऽप्यचिन्तयत् ॥१७६॥ ज्ञात्वा नागीबलव्याजनिर्व्यूढविषमद्रवम्। प्रणिधानाच्च तं क्रुद्धः शशाप स नृपं गुहः ॥१७७॥ व्याजस्त्वया कृतो यस्मादतो जातेन सूनुना। महादेव्यौ च दुर्दान्तो वियोगस्ते भविष्यति ॥१७८॥ निर्घासदारुणं श्रुत्वा शापमेतं स भूपतिः। सूक्तैस्तुष्टाव तं देवं मोहं मुक्त्वा महाकविः ॥१७९॥ स सुभाषिततुष्टोऽथ षण्मुखस्तमभाषत। राजंस्तुष्टोऽस्मि सूक्तैस्ते शापान्तं तव वच्मि तत् ॥१८०॥ भविष्यत्यब्दमेकं ते पत्नीपुत्रवियुक्तता। मुक्तोऽप्यमृत्युरित्यास्तौ च प्राप्स्यस्यत परम् ॥१८१॥ इत्युक्त्वा विरतालापं षण्मुखं स प्रणम्य तम्। तत्प्रसादसुधातृप्तो राजा स्वपुरमाययौ ॥१८२॥ तत्र तस्यामृतस्यन्दौ ज्योत्स्नायामिव शीतगोः। दम्यां मदनसुन्दर्यां क्रमात्सूनुरजायत ॥१८३॥ दृष्ट्वा सुतमुखं सोऽथ राजा राज्ञी च सा मुहुः। अत्यानन्दमयायुक्ते नामर्ततां सदारमनि ॥१८४॥ तत्कालं चोत्तरङ्गं चक्रं वसु वर्षम् स भूपतिः। निजां कनकवर्षाख्यां मयग्भुवि यथार्थनाम् ॥१८५॥ पञ्चरात्रे गते षष्ठ्यां रजनौ जातजन्मनि। कृत रक्षाविधौ तत्र मधोऽगङ्गितमागतः ॥१८६॥ ततः श्रुतिमवाप्तानां सत्राश्च नभः क्रमात्। शत्रुगोपेशितनेव राज्यं राज्ञः प्रमान्ति ॥१८७॥ मदन्यश्च क्षिपन्नाशं वर्षम्योग्भूसित्रदृम् । नतो पार्वितुमारभ वातमत्तमनेङ्कजः ॥१८८॥
नवम लम्बक १२७
नवम लम्बक १२७ यह जानकर वह अदृश्य भामिन उसके शरीर से बाहर निकल गई, क्योंकि शाप के भय से स्त्रियाँ कुमार के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करतीं ॥१७४॥ तब वह राजा कनकप्रभ भामिन के तेज से रहित होकर केवल अपने मानव-तेज के साथ ही वह कार्तिकेय देवता के गर्भगृह में प्रविष्ट हुआ ॥१७५॥ कुमार ने भामिन के निकल जाने के कारण तेजोहीन राजा को देखकर सोचा कि यह क्या बात है ॥१७६॥ और ध्यान लगाकर भामिन के बल से कठोर तपस्या में उत्तीर्ण हुए उसे जानकर क्रोध में शाप दिया—॥१७७॥ 'राजा तूने मेरे साथ कपट व्यवहार किया है। इसलिए तुझे उत्पन्न हुए बालक और महारानी से भीषण वियोग होगा ॥१७८॥ वज्रपात के समान भयंकर शाप को सुनकर महाकवि राजा ने मोह त्याग कर सुन्दर- सुन्दर सूक्तियों से स्वामी कार्तिकेय की स्तुति प्रारम्भ की ॥१७९॥ उसकी सूक्तियों से सन्तुष्ट होकर षण्मुख ने उससे कहा—'राजन्, तेरी सूक्तियों से मैं प्रसन्न हुआ। अब तेरे उस शाप का अन्त करता हूँ ॥१८०॥ तुझ रानी और पुत्र का वियोग एक बार के लिए होगा। तू तीन बार अपमृत्यु से बचकर उन्हें प्राप्त करेगा ॥१८१॥ कार्तिकेय स्वामी के ऐसा कहकर चुप हो जाने पर राजा उन्हें प्रणाम करके उनकी कृपा से सन्तुष्ट होकर अपने नगर को गया ॥१८२॥ नगर में पहुँचने पर कुछ दिनों के उपरान्त चन्द्रमा की चाँदनी से अमृत-वर्षा के समान मदनसुन्दरी से रत्न उत्पन्न हुआ ॥१८३॥ राजा और रानी पुत्र के मुख को देखकर अपने आनन्द में अपने में ही फूल न समाये। उस राजा ने धन बरसाते हुए उसी समय महान् उत्सव किया और स्वर्ण की वर्षा करके उसका कनकप्रभ नाम सार्थक किया ॥१८४-१८५॥ पाँच रात्रियों के बीतने पर छठी रात्रि में प्रसूति-भवन में सर्वतो रक्षा का प्रबन्ध करने पर जो आयुष्मान् किया जाता है ही सब विध किया ॥१८६॥ धीरे-धीरे बढ़ते हुए बालक के कारण बाल्य योग्य विद्या जैसे प्रभावसे राजा के राज्य का यशो रूप पात्र भर गया है ॥१८७॥ बाल-लीला दिखलाता हाथी, मस्ताना पन और चाल के समान मूसलाधार वृष्टि से वंशी का उगाड़ना हुआ व न गया ।
१२८ कथासरित्सागर
१२८ कथासरित्सागर तत्क्षणं सार्गलमपि द्वारमुद्घाट्य भीषणा। स्त्री कापि क्षुरिकाहस्ता जातवेश्म विवेश तत् ॥१८९॥ सा त मदनसुन्दर्या स्तनासक्तमथ सुतम्। हृत्वा देव्या प्रदुद्राव समोह्वैव परिच्छदम् ॥१९०॥ हा हा हृतो मे राक्षस्या सुत इत्यथ विह्वला। क्रन्दन्ती भान्वधावत्तां राज्ञी सा स्त्री समभ्यधि ॥१९१॥ सा च गत्वा पपात स्त्री सरस्यन्त सराक्षसा। राज्ञी चान्वपतत्सापि तत्रैवाप्यमृतप्रिया ॥१९२॥ क्षणान्मेघो निवृते जगामास्त च यामिनी। जातवेश्मनि चाक्रन्दः परिवारस्य शुश्रुवे ॥१९३॥ राजा कनकवर्षोऽथ तच्छ्रुत्वा जातवासकम्। एत्य पुत्रप्रियाशून्यं दृष्ट्वा मोह जगाम स ॥१९४॥ समाश्वस्य च हा देवि हा पुत्रक शिखो इति। विलपन्नथ सस्मार शापं तं वत्सरावधिम् ॥१९५॥ भगवच्छापसम्पृक्ता मन्दपुण्यस्य मे यतः। कध स्कन्द त्वया बत सविषामृतसन्निभ ॥१९६॥ हा हा युगमसहस्राभं कथ नेष्यामि वत्सरम्। देव्या मदनसुन्दर्या जीविताधिकया विना ॥१९७॥ इत्याक्रन्दन् स ज्ञातवृत्तान्तैर्मन्त्रिभिर्नृपः। बोध्यमानोऽपि न प्राप देव्या सह गतां धृतिम् ॥१९८॥ क्रमाच्च मदनावशविवशो निर्गत पुरात्। विवेश विन्ध्यकान्तारमुन्मीमय स भ्रमन् ॥१९९॥ तत्र चारुमृगीनेत्रे प्रियाया लोचनश्रियम्। कबरीभारसोन्दर्य चमरीबालगुच्छ्रये ॥२ ०॥ दृष्टे करिकरेणता गतर्मन्यगतां गत । स्मरतस्तस्य जज्वाल सुतरां मदनानलः ॥२ १॥ भ्राम्यंस्तृष्णात्तपक्लान्तो विन्ध्यपादमवाप्य सः। पीतनिर्झरपानीयस्तदधस्त उपामिशन् ॥२ २॥ तावद् गुहामुखाद्भिंक्त्वाट्टहास इवाददन्। सिंह गजास्रो निर्गत्य हन्तुमभ्यत्पपात तम् ॥२०३॥
१३० कथासरित्सागर
१३० कथासरित्सागर सहसाणं गगनायान् पार्थय विद्याधरो जवान् । निक्षेपाग्निशिखारूपं सिंहं तमवगङ्गुविषा ॥२०४॥ समीपमेत्य चापृच्छद्राजानं तं स गत्वरः। राजन्रकनकवर्षेत्य प्राप्ताज्येतां वय भुषम् ॥२०५॥ समाश्वास्य समभ्येति हरषाम गजा प्रत्यवाच तम्। विन्ध्यान्तर्वासिजं वृत्तस्य वदिस मामिति ॥२०६॥ ततो विद्याधरोऽवादीन् प्राङ्कवन्धोऽभवम्। मानुषो बन्धुमियाम्यस्यखपुरे न्यवसं पुरा ॥२०७॥ मयया प्रार्थितनाथ स्वया गाहायके मृतः। विद्याधरत्वं प्राप्तोऽस्मि वीरवेतालसाधनात् ॥२०८॥ तेन त्वां प्रत्यभिज्ञाय यत स प्रत्युपक्रियाम्। त्वत्स्निपांसुरयं दृष्ट्वा सिंहो व्यापादितो मया ॥२०९॥ नाम्ना बन्धुप्रभञ्चाद्य सर्वतोऽस्मीति वादिनम् । राजा कनकवर्षस्त जातप्रीतिरभाषत ॥२१०॥ हन्त स्मरामि सा वह मैत्री निर्वाहिका त्वया। तत् ब्रूहि मे कदा भावी भार्यापुत्रसमागमः ॥२११॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा बुद्ध्वा विद्याप्रभावतः। विद्याधरोऽब्रवीद् बन्धुप्रभस्त स महीभृतम् ॥२१२॥ दृष्ट्वा विन्ध्यवासियां पत्नीपुत्रौ त्वमाप्स्यसि। तत्तत्र गच्छ सिद्धय त्वं स्वलोकं च व्रजाम्यहम् ॥२१३॥ इत्युक्त्वा स्व गते तस्मिन् राजा लब्धधृतिः शनैः। प्रायात् कनकवर्षोऽसौ द्रष्टुं तां विन्ध्यवासिनीम् ॥२१४॥ गच्छन्तमभ्यधावत नृपं धन्यो महान् पथि। आधूत मस्तको मत्त प्रसारिनकर करी ॥२१५॥ स दृष्ट्वा श्वभ्रमार्गेण स राजापाससारथाः। मथानुधावन् स गजो विषवे श्वभ्रपातः ॥२१६॥ तत सोऽभ्वभ्रमायासब्रान्तो राजा व्रजन् क्रमात्। उत्खण्डपुण्डरीकाढ्य प्रापदेकं महत्सरः ॥२१७॥ तत्र स्नात्वा च पीत्वा च जलं जग्धमृणालकम्। विश्रान्त पादपतले क्षण जह्ले स निद्रया ॥२१८॥
नवम लम्बक ६३१
नवम लम्बक ६३१
उसी क्षण आकाश से आते हुए किसी विद्याधर ने वेग से नीचे उतरकर तलवार के एक ही प्रहार से उस सिंह के दो टुकड़े कर दिये ॥२ ४॥
और पास में आकर उस आकाशचारी ने राजा से पूछा—'हे राजा कनकवर्ष तुम इस स्थिति में क्यों पहुँच गये हो ? ॥२ ५॥
यह सुनकर और अपनी स्थिति का स्मरण करके राजा ने उससे कहा—'विषाद की अग्नि से पायस बने हुए मुझे क्या तुम नहीं जानते? ॥२०६॥
तब विद्याधर ने कहा—'मैं पहले बन्धुमित्र नामक मनुष्य परिव्राजक होकर तुम्हारे नगर में रहता था। सेवा से प्रार्थना करने पर तुम्हारी सहायता से वीर बेताल की सिद्धि द्वारा विद्याधर पद को प्राप्त हुआ हूँ ॥२ ७-२ ८॥
इसी कारण तुम्हें पहचानकर तुम्हारा प्रत्युपकार करने के लिए, तुम्हें मारने के लिए उद्यत इस सिंह को मैंने मार डाला ॥२ ९॥
अब मैं आज नाम से बन्धुप्रभ हो गया। इस प्रकार कहकर उस पर प्रेम प्रकट करते हुए राजा कनकवर्ष ने कहा—'हाँ हाँ मुझे स्मरण है। आज तुमने मित्रता निभा दी। अब यह बताओ कि पत्नी और पुत्र से मेरा मिलन कब होगा ? ॥२१०-२११॥
राजा की यह बात सुनकर और अपनी विद्या के प्रभाव से सब बात जानकर बन्धुप्रभ नामक विद्याधर ने राजा से कहा—'विन्ध्यवासिनी का दर्शन प्राप्त करने पर पत्नी और पुत्र का मिलन तुम्हें हो जायगा। अतः तू अपनी कार्य-सिद्धि के लिए जा। मैं अपने विद्याधर-लोक को जाता हूँ ॥२१२-२१४॥
इस प्रकार कहकर उस विद्याधर के आकाश में उड़ जाने पर धीरे-धीरे धैर्य धारण किया हुआ वह राजा कनकवर्ष विन्ध्यवासिनी के दर्शन को गया ॥२१४॥
वन-मार्ग में जाते हुए राजा पर मस्तक और सूँड को हिलाता हुआ एक बड़े जंगली हाथी ने आक्रमण कर दिया ॥२१५॥
उसे देखकर राजा ने एक खड्ड के मार्ग से दौड़ना आरम्भ किया इस प्रकार राजा के पीछे दौड़ता हुआ वह हाथी उस खड्ड में गिरकर मर गया ॥२१६॥
तब मार्ग की थकावट से व्याकुल और प्यासे राजा को मार्ग में ऊँचे-ऊँचे और निविड़ कमलों- वाला एक तालाब मिला। उसमें स्नान करके जल पीकर और कमल-नालों को खाकर तृप्त राजा सरोवर के पास एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते-करते सो गया ॥२१७-२१८॥
६३२ कथासरित्सागर
६३२ कथासरित्सागर तावच्च तेन मृगयान्निवृत्ताः शबराः पथा। आगता ददृशुः सुप्तं तं राजानं सुलक्षणम् ॥२१९॥ तं च देव्युपहाराय बद्ध्वा निन्युस्तदैव तम्। स्वस्य मुक्ताफलाख्यस्य पार्श्वं शबरभूभृतः ॥२२० ॥ सोऽप्येनं शबराधीशः प्रशस्तं वीक्ष्य नीतवान्। स तं विन्ध्यवासिन्याः पशूकर्तुं नराधिपम् ॥२२१॥ दृष्ट्वैव च स देवीं तां प्रणमंस्तदनुग्रहात्। राजा स्तवप्रभावाच्च बभूव क्षतबंधनः ॥२२२॥ तदालोक्याद्भुतं मत्वा तस्य तं देव्यनुग्रहम्। मुमोच तं स राजानं शबराधिपतिर्वधात् ॥२२३॥ एवं कनकवर्षस्य तृतीयादपमृत्युतः। अतिक्रान्तस्य तस्याभूत्पूर्णं तच्छापवत्सरम् ॥२२४॥ तावच्च तस्य सा नागी राज्ञो मदनसुन्दरीम्। देवीं सपुत्रामादाय तत्रैवागात् पितृष्वसा ॥२२५॥ जगाद तं च भो राजन् ज्ञातकोपारुणा भयात्। एतौ ते रक्षितौ युक्त्या नीत्वा स्वभवनं मया ॥२२६॥ तस्मात्कनकवर्ष स्वौ गृहाणैतौ प्रियासुतौ। भुङ्क्ष्वेदं पृथिवीराज्यं क्षीणशापोऽधुना ह्यसि ॥२२७॥ इत्युक्त्वा प्रणतं सा तं नृपं नागी तिरोदधे। नृपोऽपि स्वप्नमिव तन्मेने भार्यासुतागमम् ॥२२८॥ ततोऽस्य राज्ञो गात्राच्च चिरादिष्टसमागमः। अगमद्विरहक्लेशो हृष्टबाष्पाम्बुभिः सह ॥२२९॥ ततः कनकवर्षं तं बुद्ध्वा पृथ्वीपतिं प्रभुम्। मुक्ताफलोऽप्यथ प्रणम्य शबरेन्द्रः स पादयोः ॥२३०॥ क्षमयित्वा च पल्लीं स्वां प्रपद्य च निजोचितैः। तस्तैः समुचितैस्तारैः तमुपचारैरपूजयत् ॥२३१॥ सोऽथ तत्र स्थितो राजा दूतैरानाययन्नृपम्। श्वशुरं देवशक्तिं तं स्वसुतं च निजात्सुतात् ॥२३२॥ अथान्वितनरेशः स मदनसुन्दरीं तां प्रियां सुतं च राज्येऽभिषिच्य हिरण्यगर्भाभिधम्। विधाय पुत्रस्तं श्वशुरं च समायादितः शशास स तदन्वितः कनकवर्षपृथ्वीपतिः ॥२३३॥
नवम लम्बक १३३
नवम लम्बक १३३
इतने में ही शिकार से लौटे हुए भील उस मार्ग से आ निकले और उन्होंने अच्छे लक्षणों से सम्पन्न राजा को वहाँ सोये हुए देखा ॥२१९॥ तब वे उसे बलिदान के योग्य समझकर देवी को भेंट करने के लिए बाँधकर अपने राजा मुक्ताफल के पास ले गये। वह भील सरदार भी उस अच्छे रूपवाला जानकर पशु बनाने के लिए विन्ध्यवासिनी के मन्दिर में ले गया ॥२२०-२२१॥ देवी का दर्शन करते ही राजा ने उसे प्रणाम किया और देवी की कृपा तथा स्वामी कार्त्तिकेय के वरदान के कारण उसी समय वह बन्धन से छूट गया। यह देखकर और उसे देवी की अद्भुत और आश्चर्यजनक कृपा समझकर भील-सरदार ने राजा का वध न करके उसे मुक्त कर दिया ॥२२२ २२३॥ इस प्रकार अपमृत्यु के तीसरे दौर से छूटे हुए राजा के शाप का एक वर्ष व्यतीत हो गया ॥२२४॥ तबतक राजा को ढूँढ़ती वह नागिन पुत्र-सहित रानी मदनसुन्दरी को लाकर उपस्थित हुई ॥२२५॥ और उससे बोली—'हे राजन्, कुमार के शाप को जानकर मैंने तुम्हारी पत्नी और पुत्र को युक्ति से अपने घर ले जाकर सुरक्षित रखा था। अब तुम इन दोनों को लो और शाप से मुक्त होकर अपनी भूमि के राज्य का उपभोग करो। इस प्रकार कहकर, और प्रणाम करते हुए राजा को आशीर्वाद देकर वह नागिन अन्तर्हित हो गई। राजा ने भी पत्नी और पुत्र के उस मिलने को एक सपना-सा समझा ॥२२६-२२८॥ तदनन्तर, चिरकाल के वियोग के उपरान्त मिलकर आलिंगन करते हुए राजा और रानी का वियोग-कष्ट प्रसन्नता के आँसुओं के साथ बह निकला ॥२२९॥ तब भीलों का सरदार मुक्ताफल ने उसे राजा कनकवर्ष समझकर पैर पर गिर पड़ा और उससे क्षमा माँगी। तदनन्तर पत्नी तथा पुत्र-सहित उसे अपने ग्राम में ले जाकर समुचित साधनों से उसकी सेवा करने लगा ॥२३०-२३१॥ वहाँ रहते हुए राजा ने दूत द्वारा अपने स्वपुर देशभक्ति को तथा अपनी सेना को वहीं बुलवा लिया ॥२३२॥ उन सब के आने पर राजा कनकवर्ष स्वामी कार्त्तिकेय के कहे हुए हिरण्यवर्म नाम के पुत्र के साथ रानी मदनसुन्दरी को हस्तिनी पर बैठाकर और आप रथपर मयूराक्ष जाने के लिए वहाँ से चला ॥२३३॥ ८
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर अवाप च स वासरैः कतिपयैर्गृहं श्वशुरं बिदर्भविषयाश्रितं तदथ कुण्डिनाख्यं पुरम् । समुचितमिति तत्र च श्वशुरसत्कृतः कानिचित् दिनान्यभजत स्थितिं तनयदारसेनायुतः ॥२३४॥ प्रस्थाय सतश्च शनैः कनकपुरं प्राप्तवान्निजं नगरम् । पौरवधूजन नयन विचरोत्सुकैः पीयमान इव ॥२३५॥ अविशच्च राजधानीं सुतसहितो मदनसुन्दरीयुक्तः । उत्सव इव विग्रहवान् प्रमोषशोभान्वितो नृपतिः ॥२३६॥ अभिषिच्य बद्धपट्टां तत्र च तां मदनसुन्दरीमकरोत् । सर्वान्तःपुरमुख्यामभ्युदये मानितप्रकृतिः ॥२३७॥ वध्वा तया सह सुतेन च तेन बद्ध नित्योत्सवः पुनरदृष्टवियोगदुःखः । निष्कण्टकं कनकवर्धनरेश्वरोऽथ भूमण्डलं सञ्चतुरन्तमिव शशास ॥२३८॥ इति गोमुखतः स्वमन्त्रिमुख्यादुचिरां तत्र कथामिमां निशम्य । नरवाहनदत्तराजपुत्रः सवरूङ्कारवतीयुतस्तुतोष ॥२३९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीसम्बके - पञ्चमस्तरङ्गः । षष्ठस्तरङ्ग नरवाहनदत्त कथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः स गोमुखाख्यात कथातुष्टः प्रियासखः । दृष्ट्वा सकोपविकृतिं मरुभूतिं सधीर्र्यया ॥१॥ नरवाहनदत्तस्तं निजगादानुरञ्जयन् । मरुभूते त्वमप्येकां किं नाख्यासि कथामिति ॥२॥ ततः स बाढमाख्यामीत्युक्त्वा तुष्टेन चेतसा । समाख्यातुं कथामेतां मरुभूतिः प्रचक्रमे ॥३॥
नवम लम्बक १३५
नवम लम्बक १३५ कुछ समय बाद वह राजा विदर्भदेश-स्थित कुण्डिनपुर नामक समृद्ध नगर में श्वशुर गृह को पहुँचा। वहाँ श्वशुर द्वारा सत्कार प्राप्त कर स्त्री और पुत्र के साथ कुछ दिनों तक वह वहीं ठहर गया ॥२३४॥ तदनन्तर, वहाँ से धीरे-धीरे चलकर स्त्री मदनसुन्दरी और पुत्र हिरण्यवर्म के साथ प्रजाओं के लिए मूर्तिमान् उत्सव के समान और प्रसन्नचित्त वह राजा अपनी राजधानी कनकपुर में पहुँचा ॥२३५-२३६॥ वहाँ पहुँचकर प्रसन्न प्रजाओं का अभिनन्दन स्वीकार कर राजा कनकवर्म ने रानी मदन- सुन्दरी का पट्टबन्धन करके उसे सभी रानियों में प्रमुख अर्थात् महारानी बना दिया ॥२३७॥ तदनन्तर राजा कनकवर्म महारानी और पुत्र के साथ प्रतिदिन उत्सव मनाता हुआ सदा के लिए विद्यारस भुक्त होकर, अपने निष्कण्टक सर्वभोग्य राज्य का पालन करने लगा ॥२३८॥ अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त अपने मुख्य मंत्री गोमुख से इस प्रकार की मनोरंजक कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥२३९॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का पञ्चम तरंग समाप्त षष्ठ तरंग तदनन्तर गोमुख द्वारा कही गई कथा के सुनने से सन्तुष्ट राजा नरवाहनदत्त ने मरुभूतिक आदि मन्त्रियों को कुछ कुण्ठित-सा देखकर उसे प्रसन्न करते हुए कहा-हे मरुभूति तुम भी एक कथा जरा सही कहो ॥१-२॥ तब मरुभूति ने 'बहुत अच्छा कहता हूँ'—इस प्रकार उत्तर देकर कथा आरम्भ की ॥३॥
११६ कथासरित्सागर
११६ कथासरित्सागर चन्द्रस्वामिनस्तत्सूनोर्महीपालस्य च कथा चन्द्रस्वामीत्यभूत् पूर्वं राज्ञः कमलवर्मणः। नगरे ऽथ कमलपुराख्यं ब्राह्मणोत्तमः ॥४॥ तस्य लक्ष्मीसरस्वत्यास्तृतीया विनयोग्ज्वला। भार्या देवमतिर्नाम समाना सुमतिरभूत् ॥५॥ तस्यां तस्य च विप्रस्य पत्न्यां जज्ञे सुलक्षणः। पुत्रः स यस्य जातस्य वागेवमुदगाद्दिवः ॥६॥ चन्द्रस्वामिन् महीपालो नाम्ना कार्यः सुतस्त्वया। राजा भूत्वा चिरं यस्मात् पालयिष्यत्ययं महीम् ॥७॥ एतद्दिव्यं वचः श्रुत्वा स महीपालमेव तम्। चन्द्रस्वामिसुतं नाम्ना चकार रचितोत्सवः ॥८॥ क्रमाच्च स महीपाले विवृद्धौ ग्राहितोऽभवत्। शस्त्रास्त्रवेदविद्यासु समं सर्वासु शिक्षितः ॥९॥ तावच्च सुषुवे तस्य सा चन्द्रस्वामिनः पुनः। भार्या देवमतिः कन्यां सर्वावयवसुन्दरीम् ॥१०॥ सा च चन्द्रवती नाम महीपालः स च क्रमात्। भ्रातरौ ववृधाते तौ स्वपितुस्तस्य वेश्मनि ॥११॥ अथार्वृष्टिकृतस्तत्र देशे दुर्भिक्षविप्लवः। उदपद्यत दग्धेषु सस्येषु रविरश्मिभिः ॥१२॥ क्षुधोपन्नं च राजान्नं प्रारेभे तस्करायितुम्। अधर्मेण प्रजाभ्योऽर्थमाकृष्य मुक्तसत्पथः ॥१३॥ ततोऽवसीदत्यत्यर्थं देशे तस्मिन्नुवाच सा। भार्या देवमतिर्विप्रं चन्द्रस्वामिनमत्र तम् ॥१४॥ आगच्छ मत्पितृगृहं व्रजामो नगरादितः। एते ह्यपत्ये नश्येतामावयोरिह जातुचित् ॥१५॥ तच्छ्रुत्वा तां गदति स्म चन्द्रस्वामी स्वगेहिनीम्। भय पापं महद्गङ्गासद्दुर्भिक्षे हि पलायनम् ॥१६॥ तदहं बालचावतीं नीत्वा स्वपितुर्वेश्मनि। स्थापयामि त्वमास्वेह शीघ्रं यास्याम्यहं पुनः ॥१७॥