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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा

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सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा

वैशम्पायन उवाच

ततः स पाण्डवो विप्रं मार्कण्डेयमुवाच ह ।
कथयस्वेति चरितं मनोर्वैवस्वतस्य च ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इसके बाद पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे कहा—'अब आप हमसे वैवस्वत मनुके चरित्र कहिये' ॥ १ ॥

मार्कण्डेय उवाच

विवस्वतः सुतो राजन् महर्षिः सुप्रतापवान् ।
बभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— नरश्रेष्ठ नरेश! विवस्वान् (सूर्य)-के एक अत्यन्त प्रतापी पुत्र हुआ, जो प्रजापतिके समान कान्तिमान् और महान् ऋषि था ॥ २ ॥

ओजसा तेजसा लक्ष्म्या तपसा च विशेषतः ।
अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं च पितामहम् ॥ ३ ॥
वह बालक मनु ओज, तेज, कान्ति और विशेषतः तपस्याद्वारा अपने पिता भगवान् सूर्य तथा पितामह महर्षि कश्यपसे भी आगे बढ़ गया ॥ ३ ॥

ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां स नराधिप ।
एकपादस्थितस्तीव्रं चकार सुमहत् तपः ॥ ४ ॥
अवाक्शिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् ।
सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा ॥ ५ ॥
महाराज! उसने बदरिकाश्रममें जाकर दोनों बाँहें ऊपर उठाये एक पैरसे खड़ा हो दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उस समय उसका सिर नीचेकी ओर झुका हुआ था और वह एकटक नेत्रोंसे निरन्तर देखता रहता था। इस प्रकार बड़ी दृढ़ताके साथ उस बालकने घोर तप किया ॥ ४-५ ॥

तं कदाचित् तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् ।
चीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
(वही बालक वैवस्वत मनुके नामसे प्रसिद्ध हुआ।) एक दिनकी बात है, मनु भीगे चीर और जटा धारण किये चीरिणी नदीके तटपर तपस्या कर रहे थे। उस समय एक मत्स्य आकर इस प्रकार बोला— ॥ ६ ॥

भगवन् क्षुद्रमत्स्योऽस्मि बलवद्भ्यो भयं मम ।

मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ॥ ७ ॥
‘भगवन्! मैं एक छोटा-सा मत्स्य हूँ। मुझे (अपनी जातिके) बलवान् मत्स्योंसे बराबर भय बना रहता है। अतः उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सहर्षे! आप उनसे मेरी रक्षा करें ॥ ७ ॥
दुर्बलं बलवन्तो हि मत्स्या मत्स्यं विशेषतः ।
आस्वदन्ति सदा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ॥ ८ ॥
‘बलवान् मत्स्य विशेषतः दुर्बल मत्स्यको अपना आहार बना लेते हैं, यह सदासे हमारी मत्स्य-जातिकी नियत—वृत्ति है ॥ ८ ॥
तस्माद् भयौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः ।
त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृते प्रतिकृतं तव ॥ ९ ॥
‘इसलिये भयके महान् समुद्रमें मैं डूब रहा हूँ। आप विशेष प्रयत्न करके मुझे बचानेका कष्ट करें। आपके इस उपकारके बदले मैं भी प्रत्युपकार करूँगा' ॥ ९ ॥
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपयाभिपरिप्लुतः ।
मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात् तं मत्स्यं पाणिना स्वयम् ॥ १० ॥
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनुः ।
अलिञ्जरे प्राक्षिपत् तं चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ॥ ११ ॥
मत्स्यकी यह बात सुनकर वैवस्वत मनुको बड़ी दया आयी। उन्होंने स्वयं अपने हाथसे चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत रंगवाले उस मत्स्यको उठा लिया और पानीके बाहर लाकर मटकेमें डाल दिया ॥

स तत्र ववृधे राजन् मत्स्यः परमसत्कृतः ।
पुत्रवत् स्वीकरोत् तस्मै मनुर्भावं विशेषतः ॥ १२ ॥
अथ कालेन महता स मत्स्यः सुमहानभूत् ।
अलिञ्जरे यथा चैव नासौ समभवत् किल ॥ १३ ॥
राजन्! वहाँ उन्होंने बड़े आदरके साथ उसका पालन-पोषण किया और वह दिन-दिन बढ़ने लगा। मनुने उसके प्रति पुत्रके समान विशेष वात्सल्य भाव प्रकट किया। तदनन्तर दीर्घकाल बीतनेपर वह मत्स्य इतना बड़ा हो गया कि मटकेमें उसका रहना असम्भव हो गया ॥ १२-१३ ॥
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ।
भगवन् साधु मेऽद्यान्यत् स्थानं सम्प्रतिपादय ॥ १४ ॥
तब एक दिन मत्स्यने मनुको देखकर फिर कहा—‘भगवन्! अब आप मेरे लिये इससे अच्छा कोई दूसरा स्थान दीजिये’ ॥ १४ ॥
उद्धृत्यालिञ्जरात् तस्मात् ततः स भगवान् मनुः ।
तं मत्स्यमनयद् वापीं महतीं स मनुस्तदा ॥ १५ ॥
तब वे भगवान् मनु उस मत्स्यको उस मटकेसे निकालकर एक बहुत बड़ी बावलीके पास ले गये ॥ १५ ॥

तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय । अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान् बहून् ॥ १६ ॥ शत्रुविजयी युधिष्ठिर! मनुने उसे वहीं डाल दिया। अब वह मत्स्य अनेक वर्षोंतक उसीमें क्रमशः बढ़ता रहा ॥ १६ ॥ द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम् । तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन ॥ १७ ॥ कमलनयन! उस बावलीकी लम्बाई दो योजन और चौड़ाई एक योजनकी थी; परंतु उसमें भी उस मत्स्यका रहना कठिन हो गया ॥ १७ ॥ विचेष्टितुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते । मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १८ ॥ नराधिप कुन्तीनन्दन! वह उस बावलीमें हिल-डुल भी नहीं पाता था। अतः मनुको देखकर वह पुनः बोला— ॥ १८ ॥ नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम् । गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ॥ १९ ॥ निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता । वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ ॥ २० ॥ ‘भगवन्! साधुबाबा! अब आप मुझे समुद्रकी प्यारी पटरानी गङ्गाजीमें ले चलिये। मैं वहीं निवास करूँगा। अथवा तात! आप जहाँ उचित समझें, ले चलें। अनघ! मुझे दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा आपके आज्ञापालनमें स्थिर रहना है; क्योंकि आपके कारण ही मैं भलीभाँति पुष्ट होकर इतना बड़ा हुआ हूँ’ ॥ १९-२० ॥ एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद् भगवान् वशी । नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वयं प्राक्षिपदच्युतः ॥ २१ ॥ मत्स्यके ऐसा कहनेपर जितेन्द्रिय, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् मनुने उसे स्वयं ले जाकर गङ्गामें डाल दिया ॥ २१ ॥ स तत्र ववृधे मत्स्यः किंचित्कालमरिंदम । ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो । समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति ॥ २३ ॥ उद्धृत्य गङ्गासलिलात् ततो मत्स्यं मनुः स्वयम् । समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ॥ २४ ॥ शत्रुदमन! फिर वह मत्स्य वहाँ कुछ कालतक बढ़ता रहा। फिर एक दिन मनुको देखकर उसने कहा—‘प्रभो! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गङ्गाजीमें हिल-डुल नहीं सकता। अतः मुझे शीघ्र ही समुद्रमें ले चलिये। भगवन्! आप प्रसन्न होकर मुझपर

इतनी कृपा अवश्य कीजिये।' कुन्तीनन्दन! तब मनुने स्वयं उस मत्स्यको गंगाजीके जलसे निकालकर समुद्रतक पहुँचाया और उसमें छोड़ दिया ॥ २२—२४ ॥

सुमहानपि मत्स्यस्तु स मनोर्नयतस्तदा । आसीद् यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखस्य वै ॥ २५ ॥ राजन्! यद्यपि वह मत्स्य बहुत विशाल था, तो भी जब मनु उसे ले जाने लगे, तब वह ऐसा बन गया, जिससे आसानीसे ले जाया जा सके। उसका स्पर्श और गन्ध दोनों मनुके लिये बड़े सुखकर थे ॥ २५ ॥

यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा । तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ २६ ॥ जब मनुने उस मत्स्यको समुद्रमें डाल दिया, तब इसने उनसे मुसकराते हुए-से कहा— ॥ २६ ॥

भगवन् हि कृता रक्षा त्वया सर्वा विशेषतः । प्राप्तकालं तु यत् कार्यं त्वया तच्छ्रूयतां मम ॥ २७ ॥ 'भगवन्! आपने विशेष मनोयोगके साथ सब प्रकारसे मेरी रक्षा की है, अब आपके लिये जिस कार्यका अवसर प्राप्त हुआ है, वह बताता हूँ, सुनिये— ॥ २७ ॥

अचिराद् भगवन् भौममिदं स्थावरजङ्गमम् । सर्वमेव महाभाग प्रलयं वै गमिष्यति ॥ २८ ॥ 'भगवन्! यह सारा-का-सारा चराचर पार्थिव जगत् शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है। महाभाग! सम्पूर्ण जगत्‌का प्रलय हो जायगा ॥ २८ ॥

सम्प्रक्षालनकालोऽयं लोकानां समुपस्थितः । तस्मात् त्वां बोधयाम्यद्य यत् ते हितमनुत्तमम् ॥ २९ ॥ 'यह सब लोकोंके सम्प्रक्षालन (एकार्णवके जलसे धुलकर नष्ट होने)-का समय आ गया है। इसलिये मैं आपको सचेत करता हूँ और आपके लिये जो परम उत्तम हितकी बात है, उसे बताता हूँ ॥ २९ ॥

त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति । तस्य सर्वस्य सम्प्राप्तः कालः परमदारुणः ॥ ३० ॥ 'सम्पूर्ण जंगमों तथा स्थावर पदार्थोंमें जो हिल-डुल सकते हैं और जो हिलने-डुलनेवाले नहीं हैं, उन सबके लिये अत्यन्त भयंकर समय आ पहुँचा है ॥ ३० ॥

नौश्च कारयितव्या ते दृढा युक्तवटारका । तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ॥ ३१ ॥ 'आपको एक मजबूत नाव बनवानी चाहिये, जिसमें (मजबूत) रस्सी जुटी हो। महामुने! फिर आप सप्तर्षियोंके साथ उस नावपर बैठ जाइये ॥ ३१ ॥

बीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि द्विजैः पुरा ।

तस्यामारोहयेर्नावि सुसंगुप्तानि भागशः ॥ ३२ ॥ ‘पूर्वकालमें ब्राह्मणोंने जो सब प्रकारके बीज बताये हैं, उनका पृथक्-पृथक् संग्रह करके उन्हें सुरक्षितरूपसे उस नावपर रख लें’ ॥ ३२ ॥ नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्ततो मुनिजनप्रिय । आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेयस्तेन तापस ॥ ३३ ॥ एवमेतत् त्वया कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम् । ता न शक्या महत्यो वै आपस्तर्तुं मया विना ॥ ३४ ॥ ‘मुनिजनोंके प्रेमी तपस्वी नरेश! उस नावमें बैठे रहकर आप मेरी प्रतीक्षा कीजियेगा। मैं आपके पास अपने मस्तकमें सींग धारण किये आऊँगा। उसीसे आप मुझे पहचान लेंगे। इस प्रकार यह सब कार्य आपको करना है। अब मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ और यहाँसे जाता हूँ। उस महान् जलराशिको आपलोग मेरी सहायताके बिना पार नहीं कर सकेंगे’ ॥ ३३-३४ ॥ नाभिशङ्क्यमिदं चापि वचनं मे त्वया विभो । एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत ॥ ३५ ॥ ‘प्रभो! आप मेरी इस बातमें तनिक भी संदेह न करें।’ तब राजाने उस मत्स्यसे कहा—‘बहुत अच्छा! मैं ऐसा ही करूँगा’ ॥ ३५ ॥ जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् । ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह ॥ ३६ ॥ बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा । नौकया शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम ॥ ३७ ॥ शत्रुदमन! वे दोनों एक-दूसरेसे विदा लेकर इच्छानुसार वहाँसे चले गये। महाराज! तदनन्तर मनु मत्स्यभगवान्‌के कथनानुसार सम्पूर्ण बीज लेकर एक सुन्दर नौकाद्वारा उत्ताल तरंगोंसे भरे हुए महासागरमें तैरने लगे ॥ ३६-३७ ॥ चिन्तयामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते । स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरंजय ॥ ३८ ॥ शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम । तं दृष्ट्वा मनुजव्याघ्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे ॥ ३९ ॥ शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम् । वटारकमयं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि ॥ ४० ॥ शत्रुनगरविजयी नरेश्वर! तदनन्तर मनुने भगवान् मत्स्यका चिन्तन किया। यह जानकर शृंगधारी भगवान् मत्स्य वहाँ शीघ्र आ पहुँचे। नरश्रेष्ठ भरतकुलशिरोमणे! समुद्रमें अपने पूर्वकथित रूपसे ऊँचे पर्वतकी भाँति शृंगधारी मत्स्य भगवान्‌को आया देख उनके मस्तकवर्ती सींगमें उन्होंने बँटी हुई रस्सी बाँध दी ॥ ३८—४० ॥

मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिन् शृङ्गे न्यवेशयत् ।
संयतस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरंजय ।। ४१ ।।
वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि ।
स च तांस्तारयन् नावा समुद्रं मनुजेश्वर ।। ४२ ।।
नृत्यमानमिवोर्मीभिर्गर्जमानमिवाम्भसा ।
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन् महोदधौ ।। ४३ ।।
घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरंजय ।
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे ।। ४४ ।।

शत्रुकी राजधानीपर विजय पानेवाले पुरुषसिंह! मनुने वह नाव उस सींगमें अटका दी। रस्सीसे बँधे हुए मत्स्यभगवान् उन सबको नौकाद्वारा पार उतारनेके लिये उस खारे पानीके समुद्रमें बड़े वेगसे नाव खींचने लगे। मनुजेश्वर! उस समय समुद्र अपनी लहरोंसे नृत्य करता-सा जान पड़ता था। पानीके हिलोरोंसे भयंकर गर्जना-सी कर रहा था। शत्रुविजयी नरेश्वर! उस महासागरमें प्रचण्ड वायुके झोंकोंसे विक्षुब्ध होकर हिलती-डुलती हुई वह नौका चंचल-चित्तवाली मतवाली स्त्रीके समान झूम रही थी। उस समय न तो भूमिका पता लगता था और न दिशाओं तथा विदिशाओंका ही भान होता था ।।

सर्वमाम्भसमेवासीत् खं द्यौश्च नरपुङ्गव ।
एवंभूते तदा लोके संकुले भरतर्षभ ।। ४५ ।।

अदृश्यन्तर्षयः सप्त मनुर्मत्स्यस्तथैव च । एवं बहून् वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः ॥ ४६ ॥ चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन् सलिलसंचये । ततो हिमवतः शृङ्गं यत् परं भरतर्षभ ॥ ४७ ॥ तत्राकर्षत् ततो नावं स मत्स्यः कुरुनन्दन । अथाब्रवीत् तदा मत्स्यस्तानृषीन् प्रहसन् शनैः ॥ ४८ ॥ अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत मा चिरम् । सा बद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ ॥ ४९ ॥ नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा । तच्च नौबन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् ॥ ५० ॥ भरतकुलभूषण नरेश्वर! आकाश और द्युलोक सब कुछ जलमय ही प्रतीत होता था। इस प्रकार जब सारा विश्व एकार्णवके जलमें डूबा हुआ था, उस समय केवल सप्तर्षि, मनु और मत्स्य भगवान्—ये ही नौ व्यक्ति दृष्टिगोचर होते थे। राजन्! इस तरह बहुत वर्षोंतक भगवान् मत्स्य आलस्यरहित होकर उस अगाध जलराशिमें उस नौकाको खींचते रहे। भरतकुलतिलक! तदनन्तर हिमालयका जो सर्वोच्च शिखर था, वहाँ मत्स्यभगवान् उस नावको खींचकर ले गये। कुरुनन्दन! तब वे धीरे-धीरे हँसते हुए उन समस्त ऋषियोंसे बोले—'आपलोग हिमालयके इस शिखरमें इस नावको शीघ्र बाँध दें।' भरतश्रेष्ठ! मत्स्यका वह वचन सुनकर उन महर्षियोंने तुरंत वहाँ हिमालयके शिखरमें वह नौका बाँध दी। तभीसे हिमालयका वह उत्तम शिखर 'नौका-बन्धन' के नामसे विख्यात हुआ ॥ ४६—५० ॥ ख्यातमद्यापि कौन्तेय तद् विद्धि भरतर्षभ । अथाब्रवीदनिमिषस्तानृषीन् सहितस्तदा ॥ ५१ ॥ भरतश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि वह शिखर आज भी उसी नामसे प्रसिद्ध है। तदनन्तर एकटक दृष्टिवाले भगवान् मत्स्य एक साथ उन सब ऋषियोंसे बोले— ॥ ५१ ॥ अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते । मत्स्यरूपेण यूयं च मयास्मान्मोक्षिता भयात् ॥ ५२ ॥ मनुना च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानुषाः । स्रष्टव्याः सर्वलोकाश्च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥ ५३ ॥ 'मैं प्रजापति ब्रह्मा हूँ। मुझसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं उपलब्ध होती। मैंने ही मत्स्यरूप धारण करके इस महान् भयसे तुमलोगोंकी रक्षा की है। अब मनुको चाहिये कि ये देवता, असुर और मनुष्य आदि समस्त प्रजाकी, सब लोकोंकी और सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि करें ॥ तपसा चापि तीव्रेण प्रतिभास्य भविष्यति ।

मत्प्रसादात् प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति ॥ ५४ ॥
‘इन्हें तीव्र तपस्याके द्वारा जगत्‌की सृष्टि करनेकी प्रतिभा प्राप्त हो जायगी। मेरी कृपासे प्रजाकी सृष्टि करते समय इन्हें मोह नहीं होगा ॥ ५४ ॥
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः ।
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् ॥ ५५ ॥
प्रमूढोऽभूत् प्रजासर्गे तपस्तेपे महत् ततः ।
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ ५६ ॥
ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य क्षणभरमें अदृश्य हो गये। तदनन्तर स्वयं वैवस्वत मनुको प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, किंतु प्रजाकी सृष्टि करनेमें उनकी बुद्धि मोहाच्छन्न हो गयी थी। तब उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और महान् तपोबलसे सम्पन्न होकर उन्होंने सृष्टिका कार्य प्रारम्भ किया ॥ ५५-५६ ॥
सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद् यथावद् भरतर्षभ ।
इत्येतन्मात्स्यकं नाम पुराणं परिकीर्तितम् ॥ ५७ ॥
भरतकुलभूषण! फिर वे पूर्वकल्पके अनुसार सारी प्रजाकी यथावत् सृष्टि करने लगे। इस प्रकार यह संक्षेपसे मत्स्य पुराणका वृत्तान्त बताया गया है ॥ ५७ ॥
आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मया ।
य इदं शृणुयान्नित्यं मनोश्चरितमादितः ।
स सुखी सर्वपूर्णार्थः सर्वलोकमियान्नरः ॥ ५८ ॥
मेरे द्वारा वर्णित यह उपाख्यान सब पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रारम्भसे ही मनुके इस चरित्रको सुनता है, वह सुखी हो सम्पूर्ण मनोरथोंको पा लेता और सब लोकोंमें जा सकता है ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि मत्स्योपाख्याने
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें मत्स्योपाख्यानविषयक
एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥

चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्‌के उदरमें प्रवेश

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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्‌के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना

वैशम्पायन उवाच

ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम्।
पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ १ ॥
नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने।
न चापीह समः कश्चिदायुष्मान् दृश्यते तव ॥ २ ॥
‘महामुने! आपने हजार-हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं। इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता ॥ २ ॥
वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
न तेऽस्ति सदृशः कश्चिदायुषा ब्रह्मवित्तम ॥ ३ ॥
ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है ॥ ३ ॥
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् देवदानववर्जिते।
त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे ॥ ४ ॥
ब्रह्मन्! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं ॥ ४ ॥
प्रलये चापि निर्वृत्ते प्रबुद्धे च पितामहे।
त्वमेकः सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि ॥ ५ ॥
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेष्ठिना।
वायुभूता दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ॥ ६ ॥
ब्रह्मर्षे! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे

स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं ॥ ५-६ ॥ त्वया लोकगुरुः साक्षात् सर्वलोकपितामहः । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ॥ ७ ॥ स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकGeneric/शः? -> शः । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया ॥ ८ ॥ द्विजश्रेष्ठ! आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्‌की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है ॥ ७-८ ॥ नारायणाङ्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेऽतिपठ्यसे । भगवाननेकशः कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत् ॥ ९ ॥ कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्मणः कामरूपिणः । रत्नालंकारयोगाभ्यां दृग्भ्यां दृष्टस्त्वया पुरा ॥ १० ॥ आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्‌का अनेक बार साक्षात्कार किया है ॥ ९-१० ॥ तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । न त्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेष्ठिनः ॥ ११ ॥ इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्षे! इसमें भगवान् परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है ॥ ११ ॥ यदा नैवं रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमाः । नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन ॥ १२ ॥ तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ॥ १३ ॥ शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् । त्वमेकः सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि ॥ १४ ॥ (महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथिवी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस

समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं ॥ १२—१४ ॥

एतत् प्रत्यक्षतः सर्वं पूर्वं वृत्तं द्विजोत्तम ।
तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम् ॥ १५ ॥
द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ ॥ १५ ॥

अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा ॥ १६ ॥
विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो' ॥ १६ ॥

मार्कण्डेय उवाच

हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।
पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च ॥ १७ ॥
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने ।
स एष पुरुषव्याघ्र पीतवासा जनार्दनः ॥ १८ ॥
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभुः ।
अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमिति चोच्यते ॥ १९ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान् समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान् आश्चर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ॥ १७—१९ ॥

अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम् ।
एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे ॥ २० ॥
इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं ॥ २० ॥

यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न तं विदुः ।
सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निवृतं राजसत्तम ॥ २१ ॥
आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षये ।

ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्चर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है ॥ २१½ ॥

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् ॥ २२ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ।
चार हजार दिव्य वर्षोंका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ॥ २२½ ॥

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ॥ २३ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च ततः परम् ।
तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है) ॥ २३½ ॥

तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः ॥ २४ ॥
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ।
द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अतः सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं) ॥ २४½ ॥

सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम् ॥ २५ ॥
तस्य वर्षशतं संधिः संध्यांशश्च ततः परम् ।
संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय ॥ २६ ॥
तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो ॥ २५-२६ ॥

क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम् ।
एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या परिकीर्त्तिता ॥ २७ ॥
कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है ॥ २७ ॥

एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम् ।
विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्त्तते ॥ २८ ॥
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधाः ।

नरश्रेष्ठ! एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत् ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान् पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं ।। २८ १/२ ।। अल्पावशिष्टे तु तदा युगान्ते भरतर्षभ ।। २९ ।। सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः । यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा ।। ३० ।। व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ! सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं ।। २९-३० १/२ ।। ब्राह्मणाः शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जकाः ।। ३१ ।। क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शूद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं ।। ३१ १/२ ।। निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिताः ।। ३२ ।। ब्राह्मणाः सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे । अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणाः ।। ३३ ।। (सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने-पीनेवाले हो जायेंगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे ।। ३२-३३ ।। विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत् । बहवो म्लेच्छराजानः पृथिव्यां मनुजाधिप ।। ३४ ।। नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं ।। ३४ ।। मृषानुशासिनः पापा मृषावादपरायणाः । आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः ।। ३५ ।। काम्बोजा बाह्निकाः शूरास्तथाऽऽभीरा नरोत्तम । न तदा ब्राह्मणः कश्चित् स्वधर्ममुपजीवति ।। ३६ ।। छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठ! उस समय कोई

ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा ।। ३५-३६ ।। क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप । अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः ।। ३७ ।। नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोंके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे ।। ३७ ।। अल्पसारल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः । बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः ।। ३८ ।। युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः । भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः ।। ३९ ।। मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोंसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूद्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे ।। ३८-३९ ।। युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धा विशाम्पते ।। ४० ।। पुरुषसिंह राजन्! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे ।। ४० ।। रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः । बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः । मुखे भगाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४१ ।। अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः । केशशूलाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४२ ।। नरव्याघ्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन्! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी* ।। ४१-४२ ।। अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ।। ४३ ।। ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ।। ४४ ।।

जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान-दक्षिणा लेंगे ।। ४३-४४ ।।

लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः ।
भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ।। ४५ ।।
राजन्! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे ।। ४५ ।।

करभारभयाद् भीता गृहस्थाः परिमोषकाः ।
मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविनः ।। ४६ ।।
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः ।
गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूंछ धारण करेंगे ।। ४६ १/२ ।।

अर्थलोभान्नरव्याघ्र तथा च ब्रह्मचारिणः ।। ४७ ।।
आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः ।
इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ।। ४८ ।।
नरश्रेष्ठ! धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मोंमें ही लगे रहेंगे ।।

बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः ।
आश्रमा मनुजव्याघ्र भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४९ ।।
नरश्रेष्ठ! युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे ।। ४९ ।।

यथर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासनः ।
न चापि सर्वबीजानि सम्यग् रोहन्ति भारत ।। ५० ।।
भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे ।। ५० ।।

हिंसाभिरमश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचिः ।
अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ।। ५१ ।।
कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा ।। ५१ ।।

तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः ।

अल्पायुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन ।। ५२ ।।
भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा ।। ५२ ।।
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः ।
वणिजश्च नरव्याघ्र बहुमाया भवन्त्युत ।। ५३ ।।
लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठ! उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे ।। ५३ ।।
धर्मिष्ठाः परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जनः ।
धर्मस्य बलहानिः स्यादधर्मश्च बली तथा ।। ५४ ।।
धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान् होगा ।। ५४ ।।
अल्पायुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तथा ।
दीर्घायुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षये ।। ५५ ।।
युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे ।। ५५ ।।
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये ।
अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत ।। ५६ ।।
युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे ।। ५६ ।।
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याढ्यमदान्विताः ।
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नराः ।। ५७ ।।
हर्तुं व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विताः ।
नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपाः ।। ५८ ।।
राजन्! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है ।। ५७-५८ ।।
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा ।
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ।। ५९ ।।
मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे ।। ५९ ।।
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रियो गर्भधरा नृप ।
दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्रः प्रजायते ।। ६० ।।

राजन्! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे ।। ६० ।। भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा । आयुःक्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ।। ६१ ।। सोलहवें वर्षमें मनुष्योंके बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी ।। ६१ ।। क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः । तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते ।। ६२ ।। महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका-सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा ।। ६२ ।। विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चयित्वार्हतः पतीन् । व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ।। ६३ ।। उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी ।। ६३ ।। वीरपत्न्यस्तथा नार्यः संश्रयन्ति नरान् नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत ।। ६४ ।। राजन्! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी ।। ६४ ।। तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुषः क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ।। ६५ ।। महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोंतक वृष्टि बंद हो जाती है ।। ६५ ।। ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ।। ६६ ।। पृथिवीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं ।। ६६ ।। ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ।। ६७ ।। नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं ।। ६७ ।। यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत । सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ ।। ६८ ।।

भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं ॥ ६८ ॥ ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत । लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥ ६९ ॥ भारत! इसके बाद ‘संवर्तक’ नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है ॥ ६९ ॥ ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥ ७० ॥ तत्पश्चात् पृथिवीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है ॥ ७० ॥ निर्दहन् नागलोकं च यच्च किञ्चित् क्षिताविह । अधस्तात् पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥ ७१ ॥ राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथिवीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है ॥ ७१ ॥ ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥ ७२ ॥ इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है ॥ ७२ ॥ सदेवासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद् विभुः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है ॥ ७३ ॥ ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥ ७४ ॥ इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है ॥ ७४ ॥ केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः । केचित् किञ्जल्कसंकाशाः केचित् पीताः पयोधराः ॥ ७५ ॥ केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा । केचित् कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः ॥ ७६ ॥ कुछ बादल नील कमलके समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले

और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं ।। ७५-७६ ।।
केचित् पुरवराकाराः केचिद् गजकुलोपमाः ।
केचिदञ्जनसंकाशाः केचिन्मकरसंनिभाः ।। ७७ ।।
कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं ।। ७७ ।।
विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः ।
घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः ।
ततो जलधराः सर्वे व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् ।। ७८ ।।
वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पड़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं ।। ७८ ।।
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा ।
आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता ।। ७९ ।।
महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें डूबकर सब ओरसे भर जाती है ।। ७९ ।।
ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ ।
सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ।। ८० ।।
पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं ।। ८० ।।
वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम् ।
सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम् ।। ८१ ।।
महान् जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं ।। ८१ ।।
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे ।
धाराभिः पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना ।। ८२ ।।
तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोंतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं ।। ८२ ।।
ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत ।
पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति ।। ८३ ।।
भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है ।। ८३ ।।
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् ।