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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल

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द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल

धृतराष्ट्र उवाच

तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वन्वतः परम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! धृष्टद्युम्नके द्वारा अतिरथी वीर द्रोणाचार्यके मारे जानेपर मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने आगे कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥

संजय उवाच

तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै ।
कौरवेषु च भग्नेषु कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ २ ॥
दृष्ट्वा सुमहदाश्चर्यमात्मनो विजयावहम् ।
यदृच्छयाऽऽगतं व्यासं पप्रच्छ भरतर्षभ ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**भरतश्रेष्ठ! धृष्टद्युम्नद्वारा अतिरथी वीर द्रोणाचार्यके मारे जानेपर जब समस्त कौरव भाग खड़े हुए, उस समय अपनेको विजय दिलानेवाली एक अत्यन्त आश्चर्यमयी घटना देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुनने अकस्मात् वहाँ आये हुए वेदव्यासजीसे उसके सम्बन्धमें इस प्रकार पूछा ॥ २-३ ॥

अर्जुन उवाच

संग्रामे न्यहनं शत्रून् शरौघैर्विमलैरहम् ।
अग्रतो लक्षये यान्तं पुरुषं पावकप्रभम् ॥ ४ ॥
**अर्जुन बोले—**महर्षे! जब मैं अपने निर्मल बाणोंद्वारा शत्रु-सेनाका संहार कर रहा था, उस समय मुझे दिखायी दिया कि एक अग्निके समान तेजस्वी पुरुष मेरे आगे-आगे चल रहे हैं ॥ ४ ॥

ज्वलन्तं शूलमुद्यम्य यां दिशं प्रतिपद्यते ।
तस्यां दिशि विदीर्यन्ते शत्रवो मे महामुने ॥ ५ ॥
महामुने! वे जलता हुआ शूल हाथमें लेकर जिस ओर जाते उसी दिशामें मेरे शत्रु विदीर्ण हो जाते थे ॥ ५ ॥

तेन भग्नानरीन् सर्वान् मद्भग्नान् मन्यते जनः । तेन भग्नानि सैन्यानि पृष्ठतोऽनुव्रजाम्यहम् ।। ६ ।। उन्होंने ही मेरे समस्त शत्रुओंको मार भगाया है, किंतु लोग समझते हैं कि मैंने ही उन्हें मारा और भगाया है। शत्रुओंकी सारी सेनाएँ उन्हींके द्वारा नष्ट की गयीं, मैं तो केवल उनके पीछे-पीछे चलता था ।। ६ ।।

भगवंस्तन्ममाचक्ष्व को वै स पुरुषोत्तमः । शूलपाणिर्मया दृष्टस्तेजसा सूर्यसंनिभः ।। ७ ।। भगवन्! मुझे बताइये, वे महापुरुष कौन थे? मैंने उन्हें हाथमें त्रिशूल लिये देखा था। वे सूर्यके समान तेजस्वी थे ।। ७ ।।

न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति । शूलाच्छूलसहस्राणि निष्पेतुस्तस्य तेजसा ।। ८ ।। वे अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं करते थे। त्रिशूलको अपने हाथसे अलग कभी नहीं छोड़ते थे। उनके तेजसे उस एक ही त्रिशूलसे सहस्रों नये-नये शूल प्रकट होकर शत्रुओंपर गिरते थे ।। ८ ।।

व्यास उवाच

प्रजापतीनां प्रथमं तैजसं पुरुषं प्रभुम् ।
भुवनं भूर्भुवं देवं सर्वलोकेश्वरं प्रभुम् ॥ ९ ॥
ईशानं वरदं पार्थ दृष्टवानसि शङ्करम् ।
तं गच्छ शरणं देवं वरदं भुवनेश्वरम् ॥ १० ॥
**व्यासजीने कहा—**अर्जुन! जो प्रजापतियोंमें प्रथम, तेजःस्वरूप, अन्तर्यामी तथा सर्वसमर्थ हैं, भूर्लोक, भुवर्लोक आदि समस्त भुवन जिनके स्वरूप हैं, जो दिव्य विग्रहधारी तथा सम्पूर्ण लोकोंके शासक एवं स्वामी हैं, उन्हीं वरदायक ईश्वर भगवान् शंकरका तुमने दर्शन किया है। वे वरद देवता सम्पूर्ण जगत्‌के ईश्वर हैं, तुम उन्हींकी शरणमें जाओ ॥ ९-१० ॥
महादेवं महात्मानमीशानं जटिलं विभुम् ।
त्र्यक्षं महाभुजं रुद्रं शिखिनं चीरवाससम् ॥ ११ ॥
वे महान् देव हैं। उनका हृदय महान् है। वे सबपर शासन करनेवाले, सर्वव्यापी और जटाधारी हैं। उनके तीन नेत्र और विशाल भुजाएँ हैं, रुद्र उनकी संज्ञा है, उनके मस्तकपर शिखा तथा शरीरपर वल्कल वस्त्र शोभा देता है ॥ ११ ॥
महादेवं हरं स्थाणुं वरदं भुवनेश्वरम् ।
जगत्प्रधानमजितं जगत्प्रीतमधीश्वरम् ॥ १२ ॥
महादेव, हर और स्थाणु आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक भगवान् शिव सम्पूर्ण भुवनोंके स्वामी हैं। वे ही जगत्‌के कारणभूत अव्यक्त प्रकृति हैं। वे किसीसे भी पराजित नहीं होते हैं। जगत्‌को प्रेम और सुखकी प्राप्ति उन्हींसे होती है। वे ही सबके अध्यक्ष हैं ॥ १२ ॥
जगद्योनिं जगद्बीजं जयिनं जगतो गतिम् ।
विश्वात्मानं विश्वसृजं विश्वमूर्तिं यशस्विनम् ॥ १३ ॥
वे ही जगत्‌की उत्पत्तिके स्थान, जगत्‌के बीज, विजयशील, जगत्‌के आश्रय, सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, विश्वविधाता, विश्वरूप और यशस्वी हैं ॥ १३ ॥
विश्वेश्वरं विश्वनरं कर्मणामीश्वरं प्रभुम् ।
शम्भुं स्वयम्भुं भूतेशं भूतभव्यभवोद्भवम् ॥ १४ ॥
वे ही विश्वेश्वर, विश्वनियन्ता, कर्मोंके फलदाता ईश्वर और प्रभावशाली हैं। वे ही सबका कल्याण करनेवाले और स्वयम्भू हैं। सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा भूत, भविष्य और वर्तमानके कारण भी वे ही हैं ॥ १४ ॥
योगं योगेश्वरं सर्वं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ।
सर्वश्रेष्ठं जगच्छ्रेष्ठं वरिष्ठं परमेष्ठिनम् ॥ १५ ॥
वे ही योग और योगेश्वर हैं, वे ही सर्वस्वरूप और सम्पूर्ण लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं। सबसे श्रेष्ठ, सम्पूर्ण जगत्‌से श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम परमेष्ठी भी वे ही हैं ॥ १५ ॥
लोकत्रयविधातारमेकं लोकत्रयाश्रयम् ।

शुद्धात्मानं भवं भीमं शशाङ्ककृतशेखरम् ॥ १६ ॥
तीनों लोकोंके एकमात्र स्रष्टा, त्रिलोकीके आश्रय, शुद्धात्मा, भव, भीम और चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले भी वे ही हैं ॥ १६ ॥
शाश्वतं भूधरं देवं सर्ववागीश्वरेश्वरम् ।
सुदुर्जयं जगन्नाथं जन्ममृत्युजरातिगम् ॥ १७ ॥
वे सनातन देव इस पृथ्वीको धारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण वागीश्वरोंके भी ईश्वर हैं। उन्हें जीतना असम्भव है। वे जगदीश्वर जन्म, मृत्यु और जरा आदि विकारोंसे परे हैं ॥ १७ ॥
ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम् ।
दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान् वरान् ॥ १८ ॥
वे ज्ञानस्वरूप, ज्ञानगम्य तथा ज्ञानमें श्रेष्ठ हैं। उनके स्वरूपको समझ लेना अत्यन्त कठिन है। वे अपने भक्तोंको कृपापूर्वक मनोवांछित उत्तम फल देनेवाले हैं ॥ १८ ॥
तस्य पार्षदा दिव्या रूपैर्नानाविधैर्विभोः ।
वामना जटिला मुण्डा ह्रस्वग्रीवा महोदराः ॥ १९ ॥
महाकाया महोत्साहा महाकर्णास्तथापरे ।
आननैर्विकृतैः पादैः पार्थ वेषैश्च वैकृतैः ॥ २० ॥
भगवान् शंकरके दिव्य पार्षद नाना प्रकारके रूपोंमें दिखायी देते हैं। उनमेंसे कोई वामन (बौने), कोई जटाधारी, कोई मुण्डित मस्तकवाले और कोई छोटी गर्दनवाले हैं। किन्हींके पेट बड़े हैं तो किन्हींके सारे शरीर ही विशाल हैं। कुछ पार्षदोंके कान बहुत बड़े-बड़े हैं। वे सब बड़े उत्साही होते हैं। कितनोंके मुख विकृत हैं और कितनोंके पैर। अर्जुन! उन सबके वेष भी बड़े विकराल हैं ॥ १९-२० ॥
ईदृशैः स महादेवः पूज्यमानो महेश्वरः ।
स शिवस्तात तेजस्वी प्रसादाद् याति तेऽग्रतः ॥ २१ ॥
ऐसे स्वरूपवाले वे सभी पार्षद महान् देवता भगवान् शंकरकी सदा ही पूजा किया करते हैं। तात! उन तेजस्वी पुरुषके रूपमें वे भगवान् शंकर ही कृपा करके तुम्हारे आगे-आगे चलते हैं ॥ २१ ॥
तस्मिन् घोरे सदा पार्थ संग्रामे रोमहर्षणे ।
द्रौणिकर्णकृपैर्गुप्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः ॥ २२ ॥
कस्तां सेनां तदा पार्थ मनसापि प्रधर्षयेत् ।
ऋते देवान्महेष्वासाद् बहुरूपान्महेश्वरात् ॥ २३ ॥
कुन्तीनन्दन! उस रोमांचकारी घोर संग्राममें अश्वत्थामा, कर्ण और कृपाचार्य आदि प्रहारकुशल बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे सुरक्षित उस कौरव-सेनाको उस समय बहुरूपधारी महाधनुर्धर भगवान् महेश्वरके सिवा दूसरा कौन मनसे भी नष्ट कर सकता था ॥ २२-२३ ॥

स्थातुमुत्सहते कश्चिन्न तस्मिन्नग्रतः स्थिते ।
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ २४ ॥
जब वे ही सामने आकर खड़े हो जायँ तो वहाँ ठहरनेका साहस कोई नहीं कर सकता है? तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समानता करनेवाला नहीं है ॥ २४ ॥
गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः ।
विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च ॥ २५ ॥
संग्राममें भगवान् शंकरके कुपित होनेपर उनकी गन्धसे भी शत्रु बेहोश होकर काँपने लगते और अधमरे होकर गिर जाते हैं ॥ २५ ॥
तस्मै नमस्तु कुर्वन्तो देवास्तिष्ठन्ति वै दिवि ।
ये चान्ये मानवा लोके ते च स्वर्गजितो नराः ॥ २६ ॥
उनको नमस्कार करनेवाले देवता सदा स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। दूसरे भी जो मानव इस लोकमें उन्हें नमस्कार करते हैं, वे भी स्वर्गलोकपर विजय पाते हैं ॥
ये भक्ता वरदं देवं शिवं रुद्रमुमापतिम् ।
अनन्यभावेन सदा सर्वेशं समुपासते ॥ २७ ॥
इहलोके सुखं प्राप्य ते यान्ति परमां गतिम् ।
जो भक्त मनुष्य सदा अनन्यभावसे वरदायक देवता कल्याणस्वरूप, सर्वेश्वर उमानाथ भगवान् रुद्रकी उपासना करते हैं, वे भी इहलोकमें सुख पाकर अन्तमें परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ २७ १/२ ॥
नमस्कुरुष्व कौन्तेय तस्मै शान्ताय वै सदा ॥ २८ ॥
रुद्राय शितिकण्ठाय कनिष्ठाय सुवर्चसे ।
कपर्दिने करालाय हर्यक्षवरदाय च ॥ २९ ॥
कुन्तीनन्दन! अतः तुम भी उन शान्तस्वरूप भगवान् शिवको सदा नमस्कार किया करो। जो रुद्र, नीलकण्ठ, कनिष्ठ (सूक्ष्म या दीप्तिमान्), उत्तम तेजसे सम्पन्न, जटाजूटधारी, विकरालस्वरूप, पिंगल नेत्रवाले तथा कुबेरको वर देनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ २८-२९ ॥
याम्यायाव्यक्तकेशाय सद्वृत्ते शङ्कराय च ।
काम्याय हरिनेत्राय स्थाणवे पुरुषाय च ॥ ३० ॥
हरिकेशाय मुण्डाय कृशायोत्तारणाय च ।
भास्कराय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे ॥ ३१ ॥
जो यमके अनुकूल रहनेवाले काल हैं, अव्यक्त स्वरूप आकाश ही जिनका केश है, जो सदाचारसम्पन्न, सबका कल्याण करनेवाले, कमनीय, पिंगलनेत्र, सदा स्थित रहनेवाले और अन्तर्यामी पुरुष हैं, जिनके केश भूरे एवं पिंगलवर्णके हैं, जिनका मस्तक मुण्डित है, जो

दुबले-पतले और भवसागरसे पार उतारनेवाले हैं, जो सूर्यस्वरूप, उत्तम तीर्थ और अत्यन्त वेगशाली हैं, उन देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है ।। ३०-३१ ।। बहुरूपाय सर्व्वाय प्रियाय प्रियवाससे। उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे ।। ३२ ।। जो अनेक रूप धारण करनेवाले, सर्वस्वरूप तथा सबके प्रिय हैं, वल्कल आदि वस्त्र जिन्हें प्रिय है, जो मस्तकपर पगड़ी धारण करते हैं, जिनका मुख सुन्दर है, जिनके सहस्रों नेत्र हैं तथा जो वर्षा करनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है ।। ३२ ।। गिरिशाय प्रशान्ताय यतये चीरवाससे। हिरण्यबाहवे राज्ञे उग्राय पतये दिशाम् ।। ३३ ।। जो पर्वतपर शयन करनेवाले, परम शान्त, यतिस्वरूप, चीरवस्त्रधारी, हिरण्यबाहु (सोनेके आभूषणोंसे विभूषित बाँहवाले), राजा (दीप्तिमान्), उग्र (भयंकर) तथा दिशाओंके अधिपति हैं, (उन भगवान् शंकरको नमस्कार है) ।। ३३ ।। पर्जन्यपतये चैव भूतानां पतये नमः। वृक्षाणां पतये चैव गवां च पतये नमः ।। ३४ ।। जो मेघोंके अधिपति तथा सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं, उन्हें नमस्कार है। वृक्षोंके पालक और गौओंके अधिपतिरूप आपको नमस्कार है ।। ३४ ।। वृक्षैरावृतकायाय सेनान्ये मध्यमाय च। सुवहस्ताय देवाय धन्विने भार्गवाय च ।। ३५ ।। जिनका शरीर वृक्षोंसे आच्छादित है, जो सेनाके अधिपति और शरीरके मध्यवर्ती (अन्तर्यामी) हैं, यजमानरूपसे जो अपने हाथमें स्रुवा धारण करते हैं, जो दिव्यस्वरूप, धनुर्धर और भृगुवंशी परशुरामस्वरूप हैं, उनको नमस्कार है ।। ३५ ।। बहुरूपाय विश्वस्य पतये मुञ्जवाससे। सहस्रशिरसे चैव सहस्रनयनाय च ।। ३६ ।। सहस्रबाहवे चैव सहस्रचरणाय च। जिनके बहुत-से रूप हैं, जो इस विश्वके पालक होकर भी मूँजका कौपीन धारण करते हैं, जिनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र, सहस्रों भुजाएँ और सहस्रों पैर हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है ।। ३६१/२ ।। शरणं गच्छ कौन्तेय वरदं भुवनेश्वरम् ।। ३७ ।। उमापतिं विरूपाक्षं दक्षयज्ञनिबर्हणम्। प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम् ।। ३८ ।। कुन्तीनन्दन! तुम उन्हीं वरदायक भुवनेश्वर, उमा वल्लभ, त्रिनेत्रधारी, दक्षयज्ञविनाशक, प्रजापति, व्यग्रतारहित और अविनाशी भगवान् भूतनाथकी शरणमें जाओ ।। कपर्दिनं वृषावर्त्तं वृषनाभं वृषध्वजम्।

वृषदर्पं वृषपतिं वृषशृङ्गं वृषर्षभम् ॥ ३९ ॥
वृषाङ्कं वृषभोदारं वृषभं वृषभेक्षणम् ।
वृषायुधं वृषशरं वृषभूतं वृषेश्वरम् ॥ ४० ॥
जो जटाजूटधारी हैं, जिनका घूमना परम श्रेष्ठ है, जो श्रेष्ठ नाभिसे सुशोभित, ध्वजापर वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, वृषदप (प्रबल अहंकारवाले), वृषपति (धर्मस्वरूप वृषभके अधिपति), धर्मको ही उच्चतम माननेवाले तथा धर्मसे भी सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनके ध्वजमें साँड़का चिह्न अंकित है, जो धर्मात्माओंमें उदार, धर्मस्वरूप, वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले, श्रेष्ठ आयुध और श्रेष्ठ बाणसे युक्त, धर्मविग्रह तथा धर्मके ईश्वर, उन भगवान्‌की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ३९-४० ॥

महोदरं महाकायं द्वीपिचर्मनिवासिनम् ।
लोकेशं वरदं मुण्डं ब्रह्मण्यं ब्राह्मणप्रियम् ॥ ४१ ॥
त्रिशूलपाणिं वरदं खड्गचर्मधरं प्रभुम् ।
पिनाकिनं खड्गधरं लोकानां पतिमीश्वरम् ॥ ४२ ॥
प्रपद्ये शरणं देवं शरण्यं चीरवाससम् ।
कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेके कारण जिनका उदर और शरीर विशाल है, जो व्याघ्रचर्म ओढ़ा करते हैं, जो लोकेश्वर, वरदायक, मुण्डितमस्तक, ब्राह्मणहितैषी तथा ब्राह्मणोंके प्रिय हैं। जिनके हाथमें त्रिशूल, ढाल, तलवार और पिनाक आदि अस्त्र शोभा पाते हैं, जो वरदायक, प्रभु, सुन्दर शरीरधारी, तीनों लोकोंके स्वामी तथा साक्षात् ईश्वर हैं, उन चीरवस्त्रधारी, शरणागतवत्सल भगवान् शिवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४१-४२ ½ ॥

नमस्तस्मै सुरेशाय यस्य वैश्रवणः सखा ॥ ४३ ॥
सुवाससे नमस्तुभ्यं सुव्रताय सुधन्विने ।
धनुर्धराय देवाय प्रियधन्वाय धन्विने ॥ ४४ ॥
धन्वन्तराय धनुषे धन्याचार्याय ते नमः ।
उग्रायुधाय देवाय नमः सुरवराय च ॥ ४५ ॥
कुबेर जिनके सखा हैं, उन देवेश्वर शिवको नमस्कार है। प्रभो! आप उत्तम वस्त्र, उत्तम व्रत और उत्तम धनुष धारण करते हैं। आप धनुर्धर देवताको धनुष प्रिय है, आप धन्वी, धन्वन्तर, धनुष और धन्वाचार्य हैं, आपको नमस्कार है। भयंकर आयुध धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महादेवजीको नमस्कार है ॥ ४३—४५ ॥

नमोऽस्तु बहुरूपाय नमोऽस्तु बहुधन्विने ।
नमोऽस्तु स्थाणवे नित्यं नमस्तस्मै तपस्विने ॥ ४६ ॥
अनेक रूपधारी शिवको नमस्कार है, बहुत-से धनुष धारण करनेवाले रुद्रदेवको नमस्कार है, आप स्थाणुरूप हैं, आपको नमस्कार है, उन तपस्वी शिवको नित्य नमस्कार है ॥ ४६ ॥

नमोऽस्तु त्रिपुरघ्नाय भगघ्नाय च वै नमः ।
वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः ।। ४७ ।।
त्रिपुरनाशक और भगनेत्रविनाशक भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है। वनस्पतियोंके पति तथा नरपतिरूप महादेवजीको नमस्कार है ।। ४७ ।।
मातृणां पतये चैव गणानां पतये नमः ।
गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः ।। ४८ ।।
मातृकाओंके अधिपति और गणोंके पालक शिवको नमस्कार है। गोपति और यज्ञपति शंकरको नित्य नमस्कार है ।। ४८ ।।
अपां च पतये नित्यं देवानां पतये नमः ।
पूष्णो दन्तविनाशाय त्र्यक्षाय वरदाय च ।। ४९ ।।
नीलकण्ठाय पिङ्गाय स्वर्णकेशाय वै नमः ।
जलपति तथा देवपतिको नित्य नमस्कार है। पूषाके दाँत तोड़नेवाले, त्रिनेत्रधारी वरदायक शिवको नमस्कार है। नीलकण्ठ, पिंगलवर्ण और सुनहरे केशवाले भगवान् शंकरको नमस्कार है ।। ४९ १/२ ।।
कर्माणि यानि दिव्यानि महादेवस्य धीमतः ।। ५० ।।
तानि ते कीर्तयिष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
अर्जुन! अब मैं परम बुद्धिमान् महादेवजीके जो दिव्य कर्म हैं, उनका अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा मैंने सुन रखा है, वैसा ही तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ ।।
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न राक्षसाः ।। ५१ ।।
सुखमेधन्ति कुपिते तस्मिन्नपि गुहागताः ।
यदि वे कुपित हो जायँ तो देवता, असुर, गन्धर्व और राक्षस इस लोकमें अथवा पातालमें छिप जानेपर भी चैनसे नहीं रहने पाते हैं ।। ५१ १/२ ।।
दक्षस्य यजमानस्य विधिवत् सम्भृतं पुरा ।। ५२ ।।
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्दयस्त्वभवत् तदा ।
धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ।। ५३ ।।
पहलेकी बात है, वे यज्ञपरायण दक्षपर कुपित हो गये थे। उस समय उन्होंने उनके विधिपूर्वक किये जानेवाले यज्ञको नष्ट कर दिया था। उन दिनों वे निर्दय हो गये थे और धनुषद्वारा बाण छोड़कर बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे थे ।। ५२-५३ ।।
ते न शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे स्म सुरास्तदा ।
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ।। ५४ ।।
देवताओंको उस समय कहीं भी सुख और शान्ति नहीं मिली, महेश्वरके कुपित होनेसे सहसा यज्ञमें उपद्रव खड़ा हो गया था ।। ५४ ।।
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः ।

बभूवुर्वशगाः पार्थ निपेतुश्च सुरासुराः ॥ ५५ ॥ पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके गम्भीर घोषसे अत्यन्त व्याकुल हो सम्पूर्ण लोक उनके अधीन हो गये। देवता और असुर सभी धरतीपर गिर पड़े ॥ ५५ ॥ आपश्चक्षुभिरे सर्वाश्चकम्पे च वसुंधरा । पर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्च मोहिताः ॥ ५६ ॥ समुद्रके जलमें ज्वार आ गया, धरती काँपने लगी, पर्वत टूट-फूटकर बिखरने लगे और दिग्गज मूर्च्छित हो गये ॥ अन्धेन तमसा लोका न प्राकाशन्त संवृताः । जघ्निवान् सह सूर्येण सर्वेषां ज्योतिषां प्रभाः ॥ ५७ ॥ घोर अन्धकारसे आच्छादित हो जानेके कारण सम्पूर्ण लोकोंमें कहीं भी प्रकाश नहीं रह गया। भगवान् शिवने सूर्यसहित सम्पूर्ण ज्योतियोंकी प्रभा नष्ट कर दी ॥ ५७ ॥ चुक्षुभुर्भयभीताश्च शान्तिं चक्रुस्तथैव च । ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च सुखैषिणः ॥ ५८ ॥ महर्षि भी भयभीत एवं क्षुब्ध हो उठे। वे सम्पूर्ण भूतोंके तथा अपने लिये भी सुख चाहते हुए पुण्याहवाचन आदि शान्ति कर्म करने लगे ॥ ५८ ॥ पूषणमभ्यद्रवत शङ्करः प्रहसन्निव । पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत् ॥ ५९ ॥ उस समय हँसते हुए-से भगवान् शंकरने पूषापर आक्रमण किया। वे पुरोडाश खा रहे थे। उन्होंने उनके सारे दाँत तोड़ डाले ॥ ५९ ॥ ततो निष्क्रमुर्देवा वेपमाना नताः स्म ते । पुनश्च संदधे दीप्तान् देवानां निशिताञ्शरान् ॥ ६० ॥ तदनन्तर सारे देवता नतमस्तक हो भयसे थरथर काँपते हुए यज्ञशालासे बाहर निकल गये। तब भगवान् शिवने देवताओंको लक्ष्य करके तीखे और तेजस्वी बाणोंका संधान किया ॥ ६० ॥ सधूमान् सस्फुलिङ्गांश्च विद्युत्तोयदसंनिभान् । तं दृष्ट्वा तु सुराः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ ६१ ॥ रुद्रस्य यज्ञभागं च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् । धूम और चिनगारियोंसहित वे बाण बिजलीसहित मेघोंके समान जान पड़ते थे। तब सम्पूर्ण देवताओंने भगवान् महेश्वरको कुपित देख उनके चरणोंमें प्रणाम किया और रुद्रके लिये उन्होंने विशिष्ट यज्ञभागकी कल्पना की ॥ भयेन त्रिदशा राजञ्छरणं च प्रपेदिरे ॥ ६२ ॥ तेन चैवातिकोपेन स यज्ञः संधितस्तदा । भग्नाश्चापि सुरा आसन् भीताश्चाद्यापि तं प्रति ॥ ६३ ॥

राजन्! सब देवता भयभीत हो भगवान् शंकरकी शरणमें आये। तब क्रोध शान्त होनेपर उन्होंने उस यज्ञको पूर्ण किया। उन दिनों देवता लोग भाग खड़े हुए थे, तभीसे आजतक वे देवता उनसे डरते रहते हैं ॥ ६२-६३ ॥ असुराणां पुराण्यासंत्रीणि वीर्यवतां दिवि । आयसं राजतं चैव सौवर्णं परमं महत् ॥ ६४ ॥ पूर्वकालमें परम पराक्रमी तीन असुरोंके आकाशमें तीन नगर थे। एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा अत्यन्त विशाल नगर सोनेका बना हुआ था ॥ ६४ ॥ सौवर्णं कमलाक्षस्य तारकाक्षस्य राजतम् । तृतीयं तु पुरं तेषां विद्युन्मालिन आयसम् ॥ ६५ ॥ उनमेंसे सोनेका नगर कमलाक्षके, चाँदीका तारकाक्षके तथा तीसरा लोहेका बना हुआ नगर विद्युन्मालीके अधिकारमें था ॥ ६५ ॥ न शक्तस्तानि मघवान् भेत्तुं सर्वायुधैरपि । अथ सर्वे सुरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥ ६६ ॥ इन्द्र सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन नगरोंका भेदन न कर सके। तब उनसे पीड़ित हुए सम्पूर्ण देवता भगवान् शंकरकी शरणमें गये ॥ ६६ ॥ ते तमूचुर्महात्मानं सर्वे देवाः सवासवाः । ब्रह्मदत्तवरा ह्येते घोरास्त्रिपुरवासिनः ॥ ६७ ॥ पीडयन्त्यधिकं लोकं यस्मात् ते वरदर्पिताः । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंने महात्मा भगवान् शंकरसे कहा—‘प्रभो! ब्रह्माजीसे वरदान पाकर ये त्रिपुरनिवासी घोर दैत्य सम्पूर्ण जगत्‌को अधिकाधिक पीड़ा दे रहे हैं; क्योंकि वरदान प्राप्त होनेसे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है ॥ ६७ १/२ ॥ त्वदृते देवदेवेश नान्यः शक्तः कथंचन ॥ ६८ ॥ हन्तुं दैत्यान् महादेव जहि तांस्त्वं सुरद्विषः । ‘देवदेवेश्वर महादेव! आपके सिवा दूसरा कोई उन दैत्योंका वध करनेमें समर्थ नहीं है; अतः आप उन देवद्रोहियोंको मार डालिये ॥ ६८ १/२ ॥ रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥ ६९ ॥ निपातयिष्यसे चैतानसुरान् भुवनेश्वर । ‘भुवनेश्वर! रुद्र! आप जब इन असुरोंका विनाश कर डालेंगे, तबसे सम्पूर्ण यज्ञकर्मोंमें जो पशु (यज्ञके साधनभूत उपकरण) होंगे, वे रुद्रके भाग समझे जायँगे’ ॥ स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा देवानां हितकाम्यया ॥ ७० ॥ गन्धमादनविन्ध्यौ च कृत्वा वंशध्वजौ हरः । पृथ्वीं ससागरवनां रथं कृत्वा तु शङ्करः ॥ ७१ ॥ अक्षं कृत्वा तु नागेन्द्रं शेषं नाम त्रिलोचनः ।

चक्रे कृत्वा तु चन्द्रार्कौ देवदेवः पिनाकधृक् ॥ ७२ ॥
अणी कृत्वैलपत्रं च पुष्पदन्तं च त्र्यम्बकः ।
यूपं कृत्वा तु मलयमवनाहं च तक्षकम् ॥ ७३ ॥
देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् शिवने ‘तथास्तु’ कहकर उनके हितकी इच्छासे गन्धमादन और विन्ध्याचल इन दो पर्वतोंको अपने रथके दो पार्श्ववर्ती ध्वज बनाये। फिर समुद्र और पर्वतोंसहित समूची पृथ्‍वीको रथ बनाकर नागराज शेषको उस रथका धुरा बनाया। तत्पश्चात् त्रिनेत्रधारी पिनाकपाणि देवाधिदेव महादेवने चन्द्रमा और सूर्य दोनोंको रथके दो पहिये बनाये। एलपत्रके पुत्र और पुष्पदन्तको जूएकी कीलें बनाया। फिर त्र्यम्बकने मलयाचलको यूप और तक्षक नागको जूआ बाँधनेकी रस्सी बना लिया ॥ ७०—७३ ॥

योक्त्राङ्गानि च सत्त्वानि कृत्वा शर्वः प्रतापवान् ।
वेदान् कृत्वाऽथ चतुरश्चतुरश्वान् महेश्वरः ॥ ७४ ॥
इसी प्रकार प्रतापी भगवान् महेश्वरने अन्य प्राणियोंको जोते और बागडोर आदिके रूपमें रखकर चारों वेद ही रथके चार घोड़े बना लिये ॥ ७४ ॥

उपवेदान् खलीनांश्च कृत्वा लोकत्रयेश्वरः ।
गायत्रीं प्रग्रहं कृत्वा सावित्रीं च महेश्वरः ॥ ७५ ॥
तत्पश्चात् तीनों लोकोंके स्वामी महेश्वरने उपवेदोंको लगाम बनाकर गायत्री और सावित्रीको प्रग्रह बना लिया ॥ ७५ ॥

कृत्वोङ्कारं प्रतोदं च ब्रह्माणं चैव सारथिम् ।
गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा तु वासुकिम् ॥ ७६ ॥
विष्णुं शरोत्तमं कृत्वा शल्यमग्निं तथैव च ।
वायुं कृत्वाथ वाजाभ्यां पुङ्खे वैवस्वतं यमम् ॥ ७७ ॥
फिर ओंकारको चाबुक, ब्रह्माजीको सारथि, मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकिनागको उसकी प्रत्यंचा, भगवान् विष्णुको उत्तम बाण, अग्निदेवको उस बाणका फल, वायुको उसके पंख और वैवस्वत यमको उसकी पूँछ बनाया ॥ ७६-७७ ॥

विद्युत् कृत्वाथ निश्राणं मेरुं कृत्वाथ वै ध्वजम् ।
आरुह्य स रथं दिव्यं सर्वदेवमयं शिवः ॥ ७८ ॥
त्रिपुरस्य वधार्थाय स्थाणुः प्रहरतां वरः ।
असुराणामन्तकरः श्रीमानतुलविक्रमः ॥ ७९ ॥
बिजलीको उस बाणकी तीखी धार बनाकर मेरु पर्वतको प्रधान ध्वजके स्थानमें रखा। इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार करके असुरोंका अन्त करनेवाले, अतुल पराक्रमी, योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा सदा स्थिर रहनेवाले श्रीमान् भगवान् शिव त्रिपुरवधके लिये उसपर आरूढ़ हुए ॥ ७८-७९ ॥

स्तूयमानः सुरैः पार्थ ऋषिभिश्च तपोधनैः । स्थानं माहेश्वरं कृत्वा दिव्यमप्रतिमं प्रभुः ॥ ८० ॥ अतिष्ठत् स्थाणुभूतः स सहस्रं परिवत्सरान् । पार्थ! उस समय सम्पूर्ण देवता और तपोधन महर्षि भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे। उन भगवान्‌ने उस अनुपम एवं दिव्य माहेश्वर स्थान (रथ)-का निर्माण करके उसपर एक हजार वर्षोंतक स्थिरभावसे खड़े रहे ॥ ८० १/२ ॥

यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे पुराणि च ॥ ८१ ॥ त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि बिभेद सः । जब वे तीनों पुर आकाशमें एकत्र हुए, तब उन्होंने तीन गाँठ और तीन फलवाले बाणसे उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला ॥ ८१ १/२ ॥

पुराणि न च तं शेकुर्दानवाः प्रतिवीक्षितुम् ॥ ८२ ॥ शरं कालाग्निसंयुक्तं विष्णुसोमसमायुतम् । उस समय दानव उन नगरोंकी ओर और कालाग्निसे संयुक्त एवं विष्णु तथा सोमकी शक्तिसे सम्पन्न उस बाणकी ओर भी आँख उठाकर देख न सके ॥ ८२ १/२ ॥

पुराणि दग्धवन्तं तं देवी याता प्रवेक्षितुम् ॥ ८३ ॥ बालमङ्कगतं कृत्वा स्वयं पञ्चशिखं पुनः । जिस समय वे तीनों पुरोंको दग्ध कर रहे थे, उस समय पार्वतीदेवी भी उन्हें देखनेके लिये एक पाँच शिखावाले बालकको गोदमें लेकर वहाँ गयीं ॥ ८३ १/२ ॥

उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत् सुरान् ॥ ८४ ॥ असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः । बाहुं सवज्रं तं तस्य क्रुद्धस्यास्तम्भयत् प्रभुः ॥ ८५ ॥ प्रहस्य भगवांस्तूर्णं सर्वलोकेश्वरो विभुः । पार्वतीदेवीने देवताओंसे पूछा—‘पहचानते हो, यह कौन है?’ उनके इस प्रश्नसे इन्द्रके हृदयमें असूया और क्रोधकी आग जल उठी, वे उस बालकपर वज्रका प्रहार करना ही चाहते थे कि सर्वलोकेश्वर सर्वव्यापी भगवान् शंकरने हँसकर उनकी वज्रसहित बाँहको स्तम्भित कर दिया ॥ ८४-८५ १/२ ॥

ततः स स्तम्भितभुजः शक्रो देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥ जगाम ससुरस्तूर्णं ब्रह्माणं प्रभुमव्ययम् । तदनन्तर स्तम्भित हुई भुजाके साथ ही देवताओंसहित इन्द्र तुरंत ही वहाँसे अविनाशी भगवान् ब्रह्माजीके पास गये ॥

ते तं प्रणम्य शिरसा प्रोचुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ८७ ॥ किमप्यङ्कगतं ब्रह्मन् पार्वत्या भूतमद्भुतम् ।

बालरूपधरं दृष्ट्वा नास्माभिरभिलक्षितः ॥ ८८ ॥
देवताओंने मस्तक झुकाकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मन्! पार्वतीजीकी गोदमें बालरूपधारी एक अद्भुत प्राणी था, जिसे देखकर भी हमलोग पहचान नहीं सके हैं ।। ८७-८८ ।।
तस्मात् त्वां प्रष्टुमिच्छामो निर्जिता येन वै वयम् ।
अयुध्यता हि बालेन लीलया सपुरंदराः ॥ ८९ ॥
‘अतः हमलोग आपसे उसके विषयमें पूछना चाहते हैं, उस बालकने बिना युद्धके ही खेल-खेलमें इन्द्रसहित हम देवताओंको परास्त कर दिया' ।। ८९ ।।
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ।
ध्यात्वा स शम्भुं भगवान् बालं चामिततेजसम् ॥ ९० ॥
उनकी यह बात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने ध्यान करके अमिततेजस्वी बालरूपधारी शंकरको पहचान लिया ।। ९० ।।
उवाच भगवान् ब्रह्मा शक्रादींश्च सुरोत्तमान् ।
चराचरस्य जगतः प्रभुः स भगवान् हरः ॥ ९१ ॥
तस्मात् परतरं नान्यत् किंचिदस्ति महेश्वरात् ।
यो दृष्टो ह्युमया सार्धं युष्माभिरमितद्युतिः ॥ ९२ ॥
स पार्वत्याः कृते शर्वः कृतवान् बालरूपताम् ।
ते मया सहिता यूयं प्रापयध्वं तमेव हि ॥ ९३ ॥
तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने उन देवश्रेष्ठ इन्द्र आदिसे कहा—'देवताओ! वे चराचर जगत्‌के स्वामी साक्षात् भगवान् शंकर थे। उन महेश्वरसे बढ़कर दूसरी कोई सत्ता नहीं है। तुमलोगोंगे पार्वतीजीके साथ जिस अमिततेजस्वी बालकका दर्शन किया है, उसके रूपमें भगवान् शंकर ही थे। उन्होंने पार्वतीजीकी प्रसन्नताके लिये बालरूप धारण कर लिया था; अतः तुमलोग मेरे साथ उन्हींकी शरणमें चलो' ।। ९१—९३ ।।
स एष भगवान् देवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
न सम्बुबुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम् ॥ ९४ ॥
सप्रजापतयः सर्वे बालार्कसदृशप्रभम् ।
उस बालकके रूपमें ये सर्वलोकेश्वर प्रभु भगवान् महादेव ही थे, किंतु प्रजापतियोंसहित सम्पूर्ण देवता बालसूर्यके सदृश कान्तिमान् उन जगदीश्वरको पहचान न सके ।। ९४ १/२ ।।
अथाभ्येत्य ततो ब्रह्मा दृष्ट्वा स च महेश्वरम् ॥ ९५ ॥
अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तं पितामहः ।
तदनन्तर ब्रह्माजीने निकट जाकर भगवान् महेश्वरको देखा और ये ही सबसे श्रेष्ठ हैं, ऐसा जानकर उनकी वन्दना की ।। ९५ १/२ ।।

ब्रह्मोवाच

त्वं यज्ञो भुवनस्यास्य त्वं गतिस्त्वं परायणम् ॥ ९६ ॥
त्वं भवस्त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम् ।
त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ९७ ॥
ब्रह्माजी बोले— भगवन्! आप ही यज्ञ, आप ही इस विश्वके सहारे और आप ही सबको शरण देनेवाले हैं, आप ही सबको उत्पन्न करनेवाले भव हैं, आप ही महादेव हैं और आप ही परमधाम एवं परमपद हैं। आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ ९६-९७ ॥

भगवन् भूतभव्येश लोकनाथ जगत्पते ।
प्रसादं कुरु शक्रस्य त्वया क्रोधार्दितस्य वै ॥ ९८ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवन्! लोकनाथ! जगत्पते! ये इन्द्र आपके क्रोधसे पीड़ित हो रहे हैं। आप इनपर कृपा कीजिये ॥ ९८ ॥

व्यास उवाच

पद्मयोनिवचः श्रुत्वा ततः प्रीतो महेश्वरः ।
प्रसादाभिमुखो भूत्वा अट्टहासमथाकरोत् ॥ ९९ ॥
व्यासजी कहते हैं— पार्थ! ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवान् महेश्वर प्रसन्न हो गये और कृपाके लिये उद्यत हो ठठाकर हँस पड़े ॥ ९९ ॥

ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुराः ।
अभवच्च पुनर्बाहुर्यथाप्रकृति वज्रिणः ॥ १०० ॥
तब देवताओंने पार्वतीदेवी तथा भगवान् शंकरको प्रसन्न किया। फिर वज्रधारी इन्द्रकी बाँह जैसी पहले थी, वैसी हो गयी ॥ १०० ॥

तेषां प्रसन्नो भगवान् सपत्नीको वृषध्वजः ।
देवानां त्रिदशश्रेष्ठो दक्षयज्ञविनाशनः ॥ १०१ ॥
दक्षयज्ञका विनाश करनेवाले देवश्रेष्ठ भगवान् वृषध्वज अपनी पत्नी उमाके साथ देवताओंपर प्रसन्न हो गये ॥ १०१ ॥

स वै रुद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वश्च सर्ववित् ।
स चेन्द्रश्चैव वायुश्च सोऽश्विनौ च स विद्युतः ॥ १०२ ॥
वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्वस्वरूप एवं सर्वज्ञ हैं। वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही दोनों अश्विनीकुमार तथा विद्युत् हैं ॥ १०२ ॥

स भवः स च पर्जन्यो महादेवः सनातनः ।
स चन्द्रमाः स चेशानः स सूर्यो वरुणश्च सः ॥ १०३ ॥

वे ही भव, वे ही मेघ और वे ही सनातन महादेव हैं। चन्द्रमा, ईशान, सूर्य और वरुण भी वे ही हैं ॥ १०३ ॥

स कालः सोऽन्तको मृत्युः स यमो रात्र्यहानि तु ।
मासार्धमासा ऋतवः संध्ये संवत्सरश्च सः ॥ १०४ ॥
वे ही काल, अन्तक, मृत्यु, यम, रात्रि, दिन, मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर हैं ॥ १०४ ॥

धाता च स विधाता च विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ।
सर्वासां देवतानां च धारयत्यवपुर्वपुः ॥ १०५ ॥
वे ही धाता, विधाता, विश्वात्मा और विश्वरूपी कार्यके कर्ता हैं। वे शरीररहित होकर भी सम्पूर्ण देवताओंके शरीर धारण करते हैं ॥ १०५ ॥

सर्वदेवैः स्तुतो देवः सैकधा बहुधा च सः ।
शतधा सहस्रधा चैव भूयः शतसहस्रधा ॥ १०६ ॥
सम्पूर्ण देवता सदा उनकी स्तुति करते हैं। वे महादेवजी एक होकर भी अनेक हैं। सौ, हजार और लाखों रूपोंमें वे ही विराज रहे हैं ॥ १०६ ॥

द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरा चान्या शिवा चान्या ते तनू बहुधा पुनः ॥ १०७ ॥
वेदज्ञ ब्राह्मण उनके दो शरीर मानते हैं, एक घोर और दूसरा शिव। ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं और उन्हींसे पुनः बहुसंख्यक शरीर प्रकट हो जाते हैं ॥ १०७ ॥

घोरा तु या तनुस्तस्य सोऽग्निर्विष्णुः स भास्करः ।
सौम्या तु पुनरेवास्य आपो ज्योतींषि चन्द्रमाः ॥ १०८ ॥
उनका जो घोर शरीर है, वही अग्नि, विष्णु और सूर्य है और उनका सौम्य (शिव) शरीर ही जल, ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा है ॥ १०८ ॥

वेदाः साङ्गोपनिषदः पुराणाध्यात्मनिश्चयाः ।
यदत्र परमं गुह्यं स वै देवो महेश्वरः ॥ १०९ ॥
वेद, वेदांग, उपनिषद्, पुराण और अध्यात्मशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं तथा उनमें भी जो परम रहस्य है, वह भगवान् महेश्वर ही हैं ॥ १०९ ॥

ईदृशश्च महादेबो भूयांश्र्च भगवानजः ।
न हि सर्वे मया शक्या वक्तुं भगवतो गुणाः ॥ ११० ॥
अपि वर्षसहस्रेण सततं पाण्डुनन्दन ।
अर्जुन! यह है अजन्मा भगवान् महादेवका महामहिमस्वरूप। मैं सहस्रों वर्षोंतक लगातार वर्णन करता रहूँ तो भी भगवान्‌के समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ॥ ११० १/२ ॥

सर्वैर्ग्रहैर्गृहीतान् वै सर्वपापसमन्वितान् ॥ १११ ॥

स मोचयति सुप्रीतः शरण्यः शरणागतान् ।
जो सब प्रकारकी ग्रहबाधाओंसे पीड़ित हैं और सम्पूर्ण पापोंमें डूबे हुए हैं, वे भी यदि शरणमें आ जायँ तो शरणागतवत्सल भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें पाप-तापसे मुक्त कर देते हैं ।। १११ १/२ ।।
आयुरायोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ।। ११२ ।।
स ददाति मनुष्येभ्यः स चैवाक्षिपते पुनः ।
वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और प्रचुरमात्रामें मनोवांछित पदार्थ देते हैं तथा वे ही कुपित होनेपर फिर उन सबका संहार कर डालते हैं ।। ११२ १/२ ।।
सेन्द्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते ।। ११३ ।।
स चैव व्यापृतो लोके मनुष्याणां शुभाशुभे ।
ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरश्च स उच्यते ।। ११४ ।।
इन्द्र आदि देवताओंमें उन्हींका ऐश्वर्य बताया जाता है, वे ही ईश्वर होनेके कारण लोकमें मनुष्योंके शुभाशुभ कर्मोंके फल देनेमें संलग्न रहते हैं। सम्पूर्ण कामनाओंके ईश्वर भी वे ही बताये जाते हैं ।। ११३-११४ ।।
महेश्वरश्च महतां भूतानामीश्वरश्च सः ।
बहुभिर्बहुधा रूपैर्विश्वं व्याप्नोति वै जगत् ।। ११५ ।।
महाभूतोंके ईश्वर होनेसे वे ही महेश्वर कहलाते हैं। वे नाना प्रकारके बहुसंख्यक रूपोंद्वारा सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हैं ।। ११५ ।।
तस्य देवस्य यद् वक्त्रं समुद्रे तदधिष्ठितम् ।
वडवामुखेति विख्यातं पिबत् तोयमयं हविः ।। ११६ ।।
उन महादेवजीका जो मुख है, वह समुद्रमें स्थित है। वह 'वडवामुख' नामसे विख्यात होकर जलमय हविष्यका पान करता है ।। ११६ ।।
एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यशः ।
यजन्त्येनं जनास्तत्र वीरस्थान इतीश्वरम् ।। ११७ ।।
ये ही महादेवजी श्मशानभूमि (काशीपुरी)-में नित्य निवास करते हैं। वहाँ मनुष्य 'वीरस्थानेश्वर' के नामसे इनकी आराधना करते हैं ।। ११७ ।।
अस्य दीप्तानि रूपाणि घोराणि च बहूनि च ।
लोके यान्यस्य पूज्यन्ते मनुष्याः प्रवदन्ति च ।। ११८ ।।
इनके बहुत-से तेजस्वी घोर रूप हैं, जो लोकमें पूजित होते हैं और मनुष्य उनका कीर्तन करते रहते हैं ।। ११८ ।।
नामधेयानि लोकेषु बहून्यस्य यथार्थवत् ।
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मणस्तथा ।। ११९ ।।

उनकी महत्ता, सर्वव्यापकता तथा कर्मके अनुसार लोकमें इनके बहुत-से यथार्थ नाम बताये जाते हैं ।। ११९ ।।

वेदे चास्य समाम्नातं शतरुद्रियमुत्तमम् ।
नाम्ना चानन्तरुद्रेति ह्युपस्थानं महात्मनः ।। १२० ।।
यजुर्वेदमें भी परमात्मा शिवकी 'शतरुद्रिय' नामक उत्तम स्तुति बतायी गयी है। अनन्तरुद्रनामसे इनका उपस्थान बताया गया है ।। १२० ।।

स कामानां प्रभुर्देवो ये दिव्या ये च मानुषाः ।
स विभुः स प्रभुर्देवो विश्वं व्याप्नोति वै महत् ।। १२१ ।।
जो दिव्य तथा मानव भोग हैं, उन सबके स्वामी ये महादेवजी ही हैं। ये देव इस विशाल विश्वमें व्याप्त हैं; इसलिये विभु और प्रभु कहलाते हैं ।। १२१ ।।

ज्येष्ठं भूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा मुनयस्तथा ।
प्रथमो ह्येष देवानां मुखादस्यानलोऽभवत् ।। १२२ ।।
ब्राह्मण और मुनिजन इन्हें सबसे ज्येष्ठ बताते हैं, ये देवताओंमें सबसे प्रथम हैं; इन्हींके मुखसे अग्निदेवका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १२२ ।।

सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते पुनः ।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ।। १२३ ।।
ये सर्वथा पशुओं (प्राणियों)-का पालन करते और उन्हींके साथ खेला करते हैं तथा उन पशुओंके अधिपति हैं; इसलिये 'पशुपति' कहे गये हैं ।। १२३ ।।

दिव्यं च ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यथा स्थितम् ।
महयत्येष लोकांश्च महेश्वर इति स्मृतः ।। १२४ ।।
इनका दिव्य लिंग ब्रह्मचर्यसे स्थित है। ये सम्पूर्ण लोकोंको महिमान्वित करते हैं; इसलिये महेश्वर कहे गये हैं ।। १२४ ।।

ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
लिङ्गमस्यार्चयन्ति स्म तच्चाप्यूर्ध्वं समास्थितम् ।। १२५ ।।
ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ इनके ऊर्ध्वलोकस्थित लिंगविग्रह (प्रतीक)-की पूजा करती हैं ।। १२५ ।।

पूज्यमाने ततस्तस्मिन् मोदते स महेश्वरः ।
सुखी प्रीतश्च भवति प्रहृष्टश्चैव शङ्करः ।। १२६ ।।
उस लिंग अर्थात् प्रतीककी पूजा होनेपर कल्याणकारी भगवान् महेश्वर आनन्दित होते हैं। सुखी, प्रसन्न तथा हर्षोल्लाससे परिपूर्ण होते हैं ।। १२६ ।।

यदस्य बहुधा रूपं भूतभव्यभवस्थितम् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ।। १२७ ।।

भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें इनके स्थावर-जंगम बहुत-से रूप स्थित होते हैं; इसलिये इन्हें 'बहुरूप' नाम दिया गया है ।। १२७ ।।
एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
क्रोधाद् यश्चाविशल्लोकांस्तस्मात् सर्व इति स्मृतः ।। १२८ ।।
यद्यपि उनके सब ओर नेत्र हैं, तथापि उनका एक विलक्षण अग्निमय नेत्र अलग भी है, जो सदा क्रोधसे प्रज्वलित रहता है; वे सब लोकोंमें समाविष्ट होनेके कारण 'सर्व' कहे गये हैं ।। १२८ ।।
धूम्ररूपं च यत् तस्य धूर्जटिस्तेन चोच्यते ।
विश्वेदेवाश्च यत् तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ।। १२९ ।।
उनका रूप धूम्रवर्णका है; इसलिये वे 'धूर्जटि' कहलाते हैं। विश्वेदेव उन्हींमें प्रतिष्ठित हैं, इसलिये उनका एक नाम 'विश्वरूप' है ।। १२९ ।।
तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वरः ।
द्यामपः पृथिवीं चैव त्र्यम्बकश्च ततः स्मृतः ।। १३० ।।
वे भगवान् भुवनेश्वर आकाश, जल और पृथ्वी इन अम्बास्वरूपा तीन देवियोंको अपनाते, उनकी रक्षा करते हैं, इसलिये त्र्यम्बक कहे गये हैं ।। १३० ।।
समेधयति यन्नित्यं सर्वार्थान् सर्वकर्मसु ।
शिवमिच्छन् मनुष्याणां तस्मादेष शिवः स्मृतः ।। १३१ ।।
ये मनुष्योंका कल्याण चाहते हुए उनके समस्त कर्मोंमें सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंकी समृद्धि (सिद्धि) करते हैं, इसलिये 'शिव' कहे गये हैं ।। १३१ ।।
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ।। १३२ ।।
उनके सहस्र अथवा दस हजार नेत्र हैं अथवा वे सब ओरसे नेत्रमय ही हैं। भगवान् शिव महान् विश्वका पालन करते हैं; इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं ।। १३२ ।।
महत् पूर्वं स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्च यत् ।
स्थितलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः ।। १३३ ।।
वे पूर्वकालसे ही महान् रूपमें स्थित हैं, प्राणोंकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा उनका लिंगमय शरीर सदा स्थिर रहता है; इसलिये उन्हें 'स्थाणु' कहते हैं ।। १३३ ।।
सूर्याचन्द्रमसोर्लोके प्रकाशन्ते रुचश्च याः ।
ताः केशसंज्ञितास्त्र्यक्षे व्योमकेशस्ततः स्मृतः ।। १३४ ।।
लोकमें जो सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें प्रकाशित होती हैं, वे भगवान् त्रिलोचनके केश कही गयी हैं। वे व्योम (आकाश)-में प्रकाशित होती हैं; इसलिये उनका नाम 'व्योमकेश' है ।। १३४ ।।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं जगदशेषतः ।

भव एव ततो यस्माद् भूतभव्यभवोद्भवः ॥ १३५ ॥ भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण जगत् भगवान् शंकरसे ही विस्तारको प्राप्त हुआ है; इसलिये वे ‘भूतभव्यभवोद्भव’ कहे गये हैं ॥ १३५ ॥

कपिः श्रेष्ठ इति प्रोक्तो धर्मश्च वृष उच्यते । स देवदेवो भगवान् कीर्त्यतेऽतो वृषाकपिः ॥ १३६ ॥ कपि कहते हैं श्रेष्ठको और वृष नाम है धर्मका। वृष और कपि दोनों होनेके कारण देवाधिदेव भगवान् शंकर ‘वृषाकपि’ कहलाते हैं ॥ १३६ ॥

ब्रह्माणमिन्द्रं वरुणं यमं धनदमेव च । निगृह्य हरते यस्मात् तस्माद्धर इति स्मृतः ॥ १३७ ॥ वे ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, यम तथा कुबेरको भी काबूमें करके उनसे उनका ऐश्वर्य हर लेते हैं; इसलिये ‘हर’ कहे गये हैं ॥ १३७ ॥

निमीलिताभ्यां नेत्राभ्यां बलाद् देवो महेश्वरः । ललाटे नेत्रमसृजत् तेन त्र्यक्षः स उच्यते ॥ १३८ ॥ उन भगवान् महेश्वरने दोनों नेत्रोंको बंद करके अपने ललाटमें बलपूर्वक तीसरे नेत्रकी सृष्टि की, इसलिये उन्हें त्रिनेत्र कहते हैं ॥ १३८ ॥

विषमस्थः शरीरेषु समश्च प्राणिनामिह । स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोऽपानः शरीरिषु ॥ १३९ ॥ वे प्राणियोंके शरीरोंमें विषम संख्यावाले पाँच प्राणोंके साथ निवास करते हुए सदा समभावसे स्थित रहते हैं। विषम परिस्थितियोंमें पड़े हुए समस्त देहधारियोंके भीतर वे ही प्राणवायु और अपानवायुके रूपमें विराजमान हैं ॥ १३९ ॥

पूजयेद् विग्रहं यस्तु लिङ्गं चापि महात्मनः । लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १४० ॥ जो कोई भी मनुष्य हो, उसे महात्मा शिवके अर्चाविग्रह अथवा लिंग (प्रतीक)-की पूजा करनी चाहिये। लिंग अथवा प्रतिमाकी पूजा करनेवाला पुरुष बड़ी भारी सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ १४० ॥

ऊरुभ्यामर्धमाग्नेयं सोमर्धं च शिवा तनुः । आत्मनोऽर्धं तथा चाग्निः सोमोऽर्धं पुनरुच्यते ॥ १४१ ॥ दोनों जाँघोंसे नीचे भगवान् शिवका आधा शरीर आग्नेय अथवा घोर है तथा उससे ऊपरका आधा शरीर सोम एवं शिव है। किसी-किसीके मतमें उनके सम्पूर्ण शरीरका आधा भाग ‘अग्नि’ और आधा भाग ‘सोम’ कहलाता है ॥ १४१ ॥

तैजसी महती दीप्ता देवेभ्योऽस्य शिवा तनुः । भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराग्निरुच्यते ॥ १४२ ॥

उनका जो शिव शरीर है, वह तेजोमय और परम कान्तिमान् है। वह देवताओंके उपयोगमें आता है तथा मनुष्यलोकमें उनका प्रकाशमान घोर शरीर 'अग्नि' कहलाता है॥ १४२॥

ब्रह्मचर्यं चरत्येष शिवा यास्य तनुस्तया।
यास्य घोरतरा मूर्तिः सर्वानत्ति तयेश्वरः॥ १४३॥
उनकी जो शिव मूर्ति है, वह जगत्की रक्षाके लिये ब्रह्मचर्यका पालन करती है और उनकी जो घोरतर मूर्ति है, उसके द्वारा भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं॥ १४३॥

यन्निर्दहति यत् तीक्ष्णो यदुग्रो यत् प्रतापवान्।
मांसशोणितमज्जादो यत् ततो रुद्र उच्यते॥ १४४॥
ये प्रतापी देवता प्रलयकालमें अत्यन्त तीक्ष्ण एवं उग्र रूप धारण करके सबको दग्ध कर डालते हैं और प्राणियोंके रक्त, मांस एवं मज्जाको भी भक्षण करते हैं; अतः रौद्रभावके कारण 'रुद्र' कहलाते हैं॥ १४४॥

एष देवो महादेवो योऽसौ पार्थ तवाग्रतः।
संग्रामे शात्रवान् निघ्नंस्त्वया दृष्टः पिनाकधृक्॥ १४५॥
अर्जुन! संग्रामभूमिमें जो तुम्हारे आगे शत्रुओंका संहार करते हुए दिखायी दिये हैं, वे ये ही पिनाकधारी भगवान् महादेव हैं॥ १४५॥

सिन्धुराजवधार्थाय प्रतिज्ञाते त्वयानघ।
कृष्णेन दर्शितः स्वप्ने यस्तु शैलेन्द्रमूर्धनि॥ १४६॥
एष वै भगवान् देवः संग्रामे याति तेऽग्रतः।
येन दत्तानि तेऽस्त्राणि यैस्त्वया दानवा हताः॥ १४७॥
निष्पाप अर्जुन! जब तुमने सिंधुराजके वधकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हें गिरिराजके शिखरपर जिनका दर्शन कराया था, ये वे ही भगवान् शंकर संग्राममें तुम्हारे आगे-आगे चल रहे हैं। उन्होंने ही तुम्हें वे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनके द्वारा तुमने दानवोंका संहार किया है॥ १४६-१४७॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम्।
देवदेवस्य ते पार्थ व्याख्यातं शतरुद्रियम्॥ १४८॥
पार्थ! यह देवाधिदेव भगवान् शिवके 'शतरुद्रिय' स्तोत्रकी व्याख्या की गयी है। यह स्तोत्र वेदोंके समान परम पवित्र तथा धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है॥ १४८॥

सर्वार्थसाधनं पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम्।
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहम्॥ १४९॥
इसके पाठसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। यह पवित्र स्तोत्र सम्पूर्ण किल्बिषोंका नाशक, सब पापोंका निवारक तथा सब प्रकारके दुःख और भयको दूर करनेवाला