पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८९
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८९
अन्दर की आत्मवस्तु को देखने की विधि किंवा आत्मविचार की पद्धति तो यह है कि— [ आने जाने वाली जो] 'जागरण' 'स्वप्न' तथा 'सुषुप्ति' अवस्था हैं, इनमें से अगली के आने और पिछली के चले जाने की प्रतीति जिस नित्य चैतन्य रूप साक्षी से हुआ करती है वही स्वप्रकाशचिद्रूप पदार्थ 'आत्मा' है । शेषाः प्राणादिवित्तान्ता आसन्नास्तारतम्यतः । प्रीतिस्तथा तारतम्यात् तेषु सर्वेषु वीक्ष्यते ॥५९॥ शेष[अर्थात् उस साक्षी से भिन्न] प्राण से लेकर वित्तपर्यन्त जितने भी पदार्थ हैं [जिन को आगे बताया गया है] न्यूनाधिक भाव से आत्मा के समीपवर्ती होते हैं । जिस अनुपात से वे आत्मा के समीपवर्ती हैं उसी अनुपात से उन सब (प्राणादियों) में प्रीति पायी जाती है । वित्तात् पुत्रः प्रियः,पुत्रात् पिण्डः,पिण्डात्तथेन्द्रियम् । इन्द्रियाच्च प्रियः प्राणः, प्राणादात्मा प्रियः परः ॥६०॥ [प्रीति की न्यूनाधिकता इस प्रकार होती है कि] धन से तो पुत्र प्यारा होता है। पुत्र की अपेक्षा शरीर पर अधिक प्यार किया जाता है। शरीर से इन्द्रियें अधिक प्यारी होती हैं। इन्द्रियों से प्राण प्यारे हैं। आत्मा तो प्राणों से भी बहुत अधिक प्रिय माना गया है । सभी प्राणी पुत्र की विपत्ति को हटाने के लिये धन को व्यय कर डालते हैं । पुत्र पर विपत्ति आने पर धन की पर्वाह नहीं की जाती । कभी कभी तो अपने देह की रक्षा के लिये पुत्रों तक को छोड़ दिया जाता है। इन्द्रियों के नाश को बचाने के लिये लाठी डण्डों की मार से देह को पिटवाना पड़ता है और
४९० पञ्चदशी इन्द्रियों को बचा लेते हैं। मरने का प्रसङ्ग आपड़े तो इन्द्रियों का छेदन भी सहन किया जाता है और प्राणों को बचा लिया जाता है। आत्मा का कल्याण दीख पड़ता हो तो प्राणों का परित्याग करते हुए 'गर्व' और 'हर्ष' दोनों ही पाये जाते हैं। यों जो जो पदार्थ आत्मा के जितना जितना अधिक निकट है, वह उतना ही उतना अधिक प्रिय होता है। इस बातका अनुमोदन सभी का अनुभव कर रहा है। परन्तु आत्मा की सर्वाधिक प्रियता की ओर को पामर पुरुषों का ध्यान जाता ही नहीं। वहां तक तो विद्वानों का अनुभव ही पहुँच सकता है। एवं स्थिते विवादोऽत्र प्रतिबुद्धविमूढयोः । श्रुत्योदाहारि तत्रात्मा प्रेयानित्येव निर्णयः ॥६१॥ यों आत्मा की प्रियतमता प्रमाण से सिद्ध भी है तो भी ज्ञानी और अज्ञानी की विप्रतिपत्ति को हटाने के लिये श्रुति ने उन दोनों के विवाद का वर्णन कर दिया है और यही निर्णय किया है कि आत्मा ही प्रियतम है। साक्ष्येव दृश्यादन्यस्मात् प्रेयानित्याह तत्ववित् । प्रेयान् पुत्रादिरेवेमं भोक्तुं साक्षीति मूढधीः ॥६२॥ 'अन्य सब दृश्य पदार्थों से अधिक प्रिय तो यह साक्षी ही है' ऐसा तत्वज्ञानी समझता है। मूढबुद्धि का तो यह विचार होता है कि—प्रियतम तो पुत्रादि ही हैं यह साक्षी आत्मा तो इन [प्रियतम पुत्रादि] को भोगने के लिये इस संसार में उतरा है। आत्मनोऽन्यं प्रियं ब्रूते शिष्यश्च प्रतिवाद्यपि । तस्योत्तरं वचो बोधशापौ कुर्यात् तयोः क्रमात् ॥६३॥ आत्मा से भिन्न को प्रिय कहने वाले दो होते हैं—एक
'शिष्य' दूसरा 'प्रतिवादी' । शिष्य के लिये उत्तर यही है कि उसे आत्मबोध कराया जाय [और उसके अनुभव से ही आत्मा की प्रियता को कहलाया जाय] प्रतिवादी के लिये उत्तर यही है कि उसे शाप दिया जाय—उसे भय अर्थात् इस मन्तव्य से होने वाली हानि दिखायी जाय [जैसा कि ६९ श्लोक में दिखाया गया है ।] प्रियं त्वां रोत्स्यतीत्येवमुत्तरं वक्ति तत्ववित् । स्वोक्तप्रियस्य दुष्टत्वं शिष्यो वेत्ति विवेकतः ॥६४॥ [ तत्वज्ञानी पुरुष शिष्य और प्रतिवादी दोनों को एक ही उत्तर देता है कि ]—हे शिष्य ! या हे प्रतिवादिन् तेरा माना हुआ [ पुत्रादिरूपी ] प्रिय जब नष्ट होने लगेगा तब वह तुम्हें [दोनों को] रुलायेगा । [रोक लेगा,बांध कर बैठा लेगा] शिष्य जब इस उत्तर को सुनता है तब अपने प्रेमपात्र पुत्रादि के दोषों का निम्नरीति से विचार करके उनकी दोषदुष्टता को पहचान जाता है । अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम् । लब्धोऽपि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते ॥६५॥ जातस्य ग्रहरोजादिः कुमारस्य च मूर्खता । उपनीतेऽप्यविद्यत्व मनुद्वाहश्च पण्डिते ॥६६॥ यूनश्च परदारादि दारिद्र्यं च कुटुम्बिनः । पित्रोर्दुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्म्रियते तदा ॥६७॥ दोषों का विचार करने की रीति यह है कि—जब पुत्र की आशा नहीं होती तब माता पिता को उस अजात पुत्र से चिर- काल तक बड़ा क्लेश रहता है । पुत्र की आशा भी हो और गर्भपात हो जाय तब और भी क्लेश होता है । प्रसव काल में
४९२ पञ्चदशी माता को अकथनीय दुःख देता है । उत्पन्न होने पर ग्रहपीडा या रोगों का आक्रमण हो जाय तो माता पिता को बड़े कष्टों का सामना करना पड़ता है । कुमारावस्था में यदि वह विद्या न पढ़ने लगे तो भी माँ-बाप दुःखी ही रहते हैं । उपनयन हो जाने पर यदि विद्या प्राप्त न कर सके तो भी दुःख का कारण बन जाता है । पण्डित होकर यदि उसका विवाह न हो सके तो मां बाप के कष्ट का अन्त ही मत पूछो । युवा होकर यदि परस्त्री- गमनादि दुराचार करने लगे तो मां बाप मुँह दिखाने योग्य भी नहीं रहते । सन्तान वाला होकर भी यदि वह दरिद्र रहे तो भी वे उससे चिन्तित ही रहते हैं । धनी होकर भी यदि वह भरी जवानी में मर जाय तब तो माता पिता की आंखों के सामने अंधेरा हो जाता है । यों माता पिता की कष्टकथा का अन्त ही नहीं होता । एवं विविच्य पुत्रादौ प्रीतिं त्यक्त्वा, निजात्मनि । निश्चित्य परमां प्रीतिं, वीक्षते तमहर्निशम् ॥६८॥ इस प्रकार पुत्र, स्त्री आदि जितने भी प्रिय प्रतीत होने वाले पदार्थ हैं, उनके दोषों को जानकर, उनसे प्रेम छोड़कर, अपने आत्मा में ही परम प्रेम का निश्चय करके, दिन रात उस आत्मा का ही अनुसन्धान करने लग जाता है । आग्रहाद् ब्रह्मविद्वेषादपि पक्षममुञ्चतः । वादिनो नरकः प्रोक्तो दोषश्च बहुयोनिषु ॥६६॥ आग्रह से [कि पुत्रादि की प्रियता को तो मैं कभी छोड़ ही नहीं सकता हूँ] तथा ब्रह्मविद्वेष से [कि इसके कहे हुए ब्रह्म की तो मैं धज्जी उड़ा डालूँगा] अपने पक्ष को न छोड़ने वाले.
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९३ प्रतिवादी को नरक मिलता है तथा अनेक योनियों में दोष देखने पड़ते हैं [उसे अनेक तिर्यगादि जन्मों में कभी इष्ट का वियोग होगा और कभी अनिष्ट की प्राप्ति होगी। यही शाप ज्ञानी लोग दिया करते हैं। उनके 'प्रियं त्वां रोत्स्यति' कहने का यही अभिप्राय होता है।] ब्रह्मविद् ब्रह्मरूपत्वादीश्वर स्तेन वर्णितम् । यद्यत् तत्तत् तथैव स्यात् तच्छिष्यप्रतिवादिनोः ॥७०॥ [ईश्वरोह तथैव स्यात् बृ-१-४-८ इस वाक्य में कहा गया है कि] ब्रह्मज्ञानी को अपने ब्रह्मत्व का अनुभव हो गया है। इस से वह ईश्वर पद को पाचुका है। अब वह अपने शिष्यादि के प्रति जो [भली या बुरी] बात कहता है, उस ज्ञानी का जो शिष्य है, या जो प्रतिवादी है, उन दोनों को उसका कहा हुआ इष्ट या अनिष्ट अवश्य ही प्राप्त हो जाता है। [यों ज्ञानी का कहा हुआ एक ही वाक्य शिष्य के लिये उपदेश और वादी के लिये शाप रूप हो जाता है] यस्तु साक्षिणमात्मानं सेवते प्रियमुत्तमम् । तस्य प्रेयानसावात्मा न नश्यति कदाचन ॥७१॥ ['आत्मानमेव प्रियमुपासीत, स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति' (बृ-१-४-८) इस वाक्य में कहा गया है कि] जो शिष्य आत्मा को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ कर सदा आत्मा की सेवा करता है [किंचा सदा आत्मस्मरण रखने लगता है] उसका प्रिय माना हुआ यह आत्मा, वैसे कभी भी नष्ट नहीं हो जाता, जैसे प्रतिवादी का माना हुआ प्रिय नष्ट
४९४ पञ्चदशी हो जाता है [ किन्तु वह तो सदानन्द रूप हो कर भासने लगता है ] परप्रेमास्पदत्वेन परमानन्दरूपता । सुखवृद्धिः प्रीतिवृद्धौ सार्वभौमादिषु श्रुता ॥७२॥ [यों यहां तक यह सिद्ध हो चुका कि] निरतिशय प्रेम का विषय होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है । [ तैत्तिरीय और बृहदारण्यक श्रुतियों में बताया गया है कि] चक्रवर्ती राजा से लेकर हिरण्यगर्भपर्यन्त पदों में जहां जहां प्रीति की वृद्धि होती है, वहां वहां सुख की भी वृद्धि होती है । यों जब प्रीति की निरतिशयता भी समझ में आसकती है तब आनन्द की निरतिशयता भी समझी जा सकती है । [ राजा को अपने उपकरणों (साधनों) में प्रीति अधिक होती है तो उसे सुख भी अधिक ही होता है ] चैतन्यवत् सुखं चास्य स्वभावश्चेच्चिदात्मनः । धीवृत्तिष्वनुवर्तेत सर्वास्वपि चितिर्यथा ॥७३॥ शंका यह होती है कि—यदि चैतन्य के समान सुख या आनन्द भी चिदात्मा का स्वभाव हो, तो जैसे सब बुद्धिवृत्तियों में चैतन्य की अनुवृत्ति होती है वैसे सब बुद्धिवृत्तियों में आनन्द की भी अनुवृत्ति होनी चाहिये । मैव मुष्णप्रकाशात्मा दीपस्तस्य प्रभा गृहे । व्याप्नोति नोष्णता तद्वच्चित्तेरेवानुवर्तनम् ॥७४॥ यह शंका न करनी चाहिये । दृष्टान्त में देख लो कि— दीप के दो स्वरूप हैं एक 'उष्ण' दूसरा 'प्रकाश' । घर में जब दीपक जलता है तब उसकी प्रभा तो घर को व्याप्त कर लेती
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९५
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९५ है परन्तु उसकी उष्णता व्याप्त नहीं करती। ठीक इसी प्रकार बुद्धिवृत्तियों में चैतन्य की तो अनुवृत्ति हो जाती है परन्तु आनन्द की अनुवृत्ति नहीं होती। गन्धरूपरसस्पर्शेष्वपि सत्सु यथा पृथक् । एकाक्षेणैक एवार्थो गृह्यते नेतरस्तथा ॥७५॥ एक द्रव्य में गन्ध, रूप, रस और स्पर्श सभी रहते हैं, परन्तु एक इन्द्रिय, इनमें से एक ही गुण को ग्रहण करती है, दूसरे को नहीं। ठीक इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द इन दोनों में से, केवल चैतन्य का भान लोगों को होता है, आनन्द का नहीं होता। चिदानन्दौ नैव भिन्नौ गन्धाद्यास्तु विलक्षणाः । इति चेत् तदभेदोऽपि साक्ष्यन्यत्र वा वद ॥७६॥ यदि कहा जाय कि—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में तो बड़ी विषमता है। क्योंकि चित् और आनन्द तो भिन्न नहीं हैं, गन्धादि तो परस्पर भिन्न भिन्न हैं। तो उत्तर देने से पहले यह बताओ कि—चित् और आनन्द का जो अभेद है वह साक्षी आत्मस्वरूप में है ? या कहीं अन्यत्र है [ या यह भेद उसकी उपाधि कहाने वाली वृत्तियों में है। पूछने का तात्पर्य यह है कि चिदानन्द का अभेद स्वाभाविक है या औपाधिक है ?] आद्ये गन्धाद्योऽप्येवमभिन्नाः पुष्पवर्तिनः । अक्षभेदेन तद्भेदे वृत्तिभेदात् तयोर्भिदा ॥७७॥ चित् और आनन्द का साक्षी में कोई भेद नहीं है, इस पक्ष में, पुष्प में रहने वाले गन्धादि भी इसी तरह [साक्षी में] परस्पर भेद रहित हैं। क्योंकि एक को छोड़कर एक को उस
५९६ पञ्चदशी में से लाया ही नहीं जा सकता। अब यदि भेद को औपाधिक मानें, अर्थात् गन्धादि को ग्रहण करने वाली घ्राणादि इन्द्रियों के भेद से ही, उन गन्धादि में भी भेद मान लें तब तो ठीक उसी तरह वृत्ति भेद के कारण [ क्रमानुसार चित् और आनन्द को अभिव्यक्त करने वाली राजस और सात्विक वृत्तियों के भिन्न भिन्न होने से ] उन चिदानन्दों का भी औपाधिक भेद हो ही जायगा। सत्ववृत्तौ चित्सुखैक्यं तद्वृत्तेर्निर्मलत्वतः । रजोवृत्तेस्तु मालिन्यात् सुखांशोऽत्र तिरस्कृतः॥७८॥ [चित् और आनन्द की एकता देखनी हो तो सात्विक वृत्तियों में देखो] पुण्य कर्मों के प्रताप से जब बुद्धिवृत्ति का सात्विक परिणाम होता है तब चित् और आनन्द की एकता भासने लग पड़ती है। क्योंकि सात्विक वृत्तियें निर्मल होती हैं। [इन दोनों के भेद के भासने का कारण भी सुन लो कि] रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण इनमें सुखभाग दीखना बन्द हो जाता है। [तब भूल से यह समझा जाता है कि हम चित् ही चित् हैं सुख हम में है ही नहीं, सुख तो कहीं से लाना होगा] तिंतिणीफल मत्यम्लं लवणेन युतं यदा। तदाम्लस्य तिरस्कारा दीषदम्लं यथा तथा ॥७९॥ [होता हुआ भी सुखभाग कैसे ढक जाता है ? क्यों नहीं दीखता ? इसके लिये दृष्टान्त देख लो] जैसे कि इमली का फल बहुत खट्टा होता है, जब उसमें नमक मिला दिया जाता है तब उसकी खटाई छिप जाती है और बहुत कम हो जाती है। इसी प्रकार रजोवृत्तियों में भी आनन्द का तिरोभाव हो जाता है।
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९७
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९७ ननु प्रियतमत्वेन परमानन्दतात्मनि । विवेक्तुं शक्यतामेवं विना योगेन किं भवेत् ॥८०॥ [रहस्य बात पूछता है कि] ऊपर जिस रीति से समझाया गया है, उस रीति से परम प्रेम का स्थान होने के कारण आत्मा की परमानन्दता का विवेक हो भी सकता हो, तो भी ऐसे थोथे विवेक से क्या होना है ? मुक्ति के साधन योग के विना क्या होगा ? [क्योंकि मुक्ति का साधन अपरोक्ष ज्ञान तो योग से होता है] यद्योगेन तदेवेति वदामो, ज्ञानसिद्धये । योगः प्रोक्तो, विवेकेन ज्ञानं किं नोपजायते ॥८१॥ [इस का उत्तर हम यह देते हैं कि] जो योग से होना है, वही इस विवेक से हाथ आ जायगा [भाव यह है कि जैसे योग अपरोक्ष ज्ञान का कारण है वैसे विवेक से भी अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है ] पहले अध्याय में अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि के लिये जैसे योग बताया है इसी प्रकार [इस अध्याय में दिखाये हुए गौण आदि आत्माओं के विवेक के द्वारा पांच कोषों के] विवेक से भी ज्ञान उत्पन्न हो ही जाता है । यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । इति स्मृतं फलैकत्वं योगिनां च विवेकिनाम् ॥८२॥ [गीता स्मृति में कहा भी है कि] सांख्य [अर्थात् आत्मा- नात्मविवेकी] लोग जिस मोक्षरूप स्थान को पा लेते हैं योगी लोग भी उसी को पा लेते हैं। यों गीता में 'योगी' और 'विवेकी' दोनों के फलों की एकता बतायी गयी है [ज्ञान के द्वारा मोक्ष- रूपी एक ही फल दोनों के हाथ लग जाता है ] ३२
४९८ पञ्चदशी असाध्यः कस्यचिद् योगः कस्यचिज्ज्ञाननिश्चयः । इत्थं विचार्य मार्गौ द्वौ जगाद परमेश्वरः ॥८३॥ कोई अधिकारी ऐसे होते हैं कि उनके लिये 'योग' असाध्य होता है । किन्हीं को तो ज्ञान का निश्चय होना कठिन हो जाता है । यों अधिकारियों की विचित्रता के कारण, परमेश्वर ने 'ज्ञान' और 'योग' दोनों मार्गों को कहा है । योगे कोतिशयस्तेऽत्र ज्ञानमुक्तं समं द्वयोः । रागद्वेषाद्यभावश्च तुल्यो योगिविवेकिनोः ॥८४॥ आपके योग में तो इस ज्ञान से कोई भी उल्लेखयोग्य विशे- षता नहीं पायी जाती । देख लो कि—'विवेक' और 'योग' दोनों का ज्ञानरूपी एक ही फल होता है । जैसे योगी लोग रागद्वेष से रहित होते हैं वैसे ही विवेकी लोग भी रागद्वेष से हीन पाये जाते हैं । न प्रीति र्विषयेष्वस्ति प्रेयानात्मेति जानतः । कुतो रागः कुतो द्वेषः प्रातिकूल्यमपश्यतः ॥८५॥ जिस विवेकी को यह मालूम हो जाता है कि—आत्मा ही एक प्रियतम पदार्थ है, उसे फिर विषयों में प्रीति ही नहीं रहती यही कारण है कि फिर उसे किन्हीं विषयों में राग भी नहीं होता । क्योंकि वह किसी विषय को अनुकूल ही नहीं मानता । फिर उसे किसी से द्वेष भी नहीं होता । क्योंकि वह किसी विषय को अपने प्रतिकूल ही नहीं समझता । देहादेः प्रतिकूलेषु द्वेषस्तुल्यो द्वयोरपि । द्वेषं कुर्वन्न योगी चेद्विवेक्यपि तादृशः ॥८६॥
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९९
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९९ देहादि के प्रतिकूल जितने पदार्थ होते हैं, उनसे जैसे विवेकी लोग द्वेष करते हैं, वैसे योगी भी करते हैं। यदि कहो कि [प्रतिकूल विच्छू सांप आदि से] द्वेष करने वाले को तो हम योगी ही नहीं मानते, तो हम कहेंगे कि वैसे द्वेषी को हम विवेकी भी कब कहते हैं ? [वैसा द्वेष करने वाला तो विवेकवान् भी नहीं माना जा सकता] द्वैतस्य प्रतिभानं तु व्यवहारे द्वयोः समम् । समाधौ नेति चेत् तद्वन्नाद्वैतत्वविवेकिनः ॥८७॥ व्यवहार काल में जैसे योगी को द्वैत का प्रतिभान होता रहता है, वैसे ही विवेकी को भी हुआ करता है। यदि कहो कि—योगी को समाधि करते समय द्वैत का भान नहीं होता, [यही योगी में विवेकी से विशेषता है] तो हम कहेंगे कि उसी तरह विवेकी को भी जब वह अद्वैत आत्मतत्वका विवेक करने बैठता है, तब द्वैत का प्रतिभान नहीं रहता । विवक्ष्यते तदस्माभि रद्वैतानन्दनामके । अध्याये हि तृतीयेऽतः सर्वमप्यतिमङ्गलम् ॥८८॥ विवेकी को जैसे द्वैत का भान नहीं रहता है सो तो हम अद्वैतानन्द नाम के अगले तीसरे अध्याय में कहेंगे। यों सभी कुछ मङ्गल ही मङ्गल है। सदा पश्यन्निजानन्द मपश्यन्निखिलं जगत् । अर्थाद् योगीति चेत् तर्हि संतुष्टो वर्धतां भवान् ॥८९॥ जो सदा आत्मानन्द को देखता रहता है, जिसे यह सम्पूर्ण जगत् नहीं दीखता [जिसको द्वैत का दर्शन बन्द हो जाता है] वह तो एक प्रकार से योगी ही हो गया है, ऐसा यदि तुम कहो
५०० पञ्चदशी
तो अच्छा तुम ऐसे ही सन्तुष्ट हो जाओ और वृद्धि पाओ। हम कब कहते हैं कि उपासना करनी ही चाहिये। ब्रह्मज्ञान से बढ़कर और है ही क्या । ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे मन्दानुग्रहसिद्धये । द्वितीयाध्याय एतस्मिन्नात्मानन्दो विवेचितः ॥९०॥ ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ के इस द्वितीयाध्याय में मन्दाधि- कारी पर अनुग्रह करने के लिए 'आत्मानन्द' का विवेचन किया गया। इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दः
13. Advaitananda
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् योगानन्दः पुरोक्तो यः स आत्मानन्द इष्यताम् । कथं ब्रह्मत्वमेतस्य सद्धयस्येति चेच्छृणु ॥१॥ जिसको पहले 'योगानन्द' कहा है उसी को 'आत्मानन्द' समझलो—[उसमें और उसमें कोई भेद नहीं है] यह सद्वितीय आत्मानन्द ब्रह्मानन्द कैसे हो सकता है सो भी सुन लो । प्रथमाध्याय में 'ब्रह्मानन्द' 'विद्यानन्द' तथा 'विषयानन्द' इन तीन तरह का आनन्द बताया था । द्वितीयाध्याय में उन तीनों आनन्दों से अधिक एक और आत्मानन्द का वर्णन कर चुके हैं । उसका अभिप्राय यह है कि—जिसको प्रथमाध्याय में योगानन्द कहा था उसी को आत्मानन्द समझो । उसमें और उसमें कोई भी भेद नहीं है । भाव यह है कि—योग के द्वारा साक्षात्कार होने के कारण उसी ब्रह्मानन्द को योगानन्द कह देते हैं । जब तो इस योगरूपी उपाधि की विवक्षा नहीं रहती तब उसे सीधे शब्दों में ब्रह्मानन्द या निजानन्द ही कहने लगते हैं । इसी प्रकार गौण आत्मा कौन है ? मिथ्या आत्मा कौन से हैं ? मुख्य आत्मा किसे कहते हैं ? इस आत्मविवेचन के बाद जिस आनन्द की प्राप्ति होती है उसे 'आत्मानन्द' कह दिया है । असल में योगानन्द और आत्मानन्द एक ही बात है । जिस द्वारा वह आनन्द प्रकट होता है, उसी के नाम से
५०२ पञ्चदशी उसका नाम रख लिया जाता है। फिर प्रश्न यह होता है कि जिस आत्मानन्द का वर्णन हो चुका है, वह तो सद्वितीय है। उसके साथ तो, उसके सजातीय पुत्र स्त्री आदि गौण आत्मा देहादि मिथ्या आत्मा, तथा उसके विजातीय आकाशादि पदार्थ विद्यमान रहते हैं, फिर ऐसे आत्मानन्द को ब्रह्मानन्द कैसे मान लें ? इसका उत्तर अगले श्लोक में दिया है। आकाशादिस्वदेहान्तं तैत्तिरीयश्रुतीरितम् । जगन्नास्त्यन्यदानन्दादद्वैतब्रह्मता ततः ॥२॥ तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः (तै० २-१) इस तैत्तिरीय श्रुति में जिस आकाशादि स्वदेहपर्यन्त जगत् का वर्णन आया है, [जिसके होने से द्वैत की शंका पैदा हो सकती है] वह सब [जगत् का कारण जो आनन्द है उस आनन्द से पृथक् कुछ भी नहीं है। यही कारण है कि [उस सब के रहने पर भी वह आत्मानन्द अद्वितीय ब्रह्मरूप ही है। [आकाश आदि देहपर्यन्त जगत् में द्वैत की शंका मत करो। यह सब मूल में अद्वैत ब्रह्मतत्व ही है ।] आनन्दादेव तज्जातं तिष्ठत्यानन्द एव तत् । आनन्द एव लीनं चेत्युक्तानन्दात् कथं पृथक् ॥३॥ [आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते (तै०३-६) इस श्रुति में कहा गया है कि] आनन्द से ही वह उत्पन्न हुआ है [समागम होने पर माता पिता को जब आनन्द आता है तब यह जगत् उत्पन्न होता है] वह आनन्द में ही निवास करता है [आनन्द के बिना इसका ठहरा रहना कठिन हो जाता है। इस आनन्द से निराश हो जाने पर कुए में डूब कर या विष आदि
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०३
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०३ खाकर मर जाता है] अन्त में भी आनन्द में ही लीन हो जाता है । जब श्रुति स्वयं यह बात कह रही है तो यह जगत् अपने कारण उक्त आनन्द से पृथक् कैसे है ? तुम्हीं बताओ । कुलालाद् घट उत्पन्नो भिन्नश्चेति न शङ्क्यताम् । मृद्वदेव उपादानं, निमित्तं न कुलालवत् ॥४॥ कुम्हार से घट उत्पन्न हुआ है और वह उससे भिन्न भी है, ऐसी शंका न करो। क्योंकि यह आत्मानन्द तो, मिट्टी जैसे घड़े का उपादान कारण होती है इसी प्रकार, इस जगत् का उपादान कारण है । यह कुम्हार की तरह का केवल निमित्त कारण नहीं है । [ यह तो जाले का मकड़ी की तरह निमित्त भी है और उपादान भी है । ] स्थितिर्लयश्च कुम्भस्य कुलाले स्तो न हि क्वचित् । दृष्टौ तौ मृदि, तद्वत् स्यादुपादानं तयोः श्रुतेः ॥५॥ कुम्भ की स्थिति और कुम्भ का लय, कुम्हार में कभी नहीं होते [इस कारण कुम्हार उसका उपादान नहीं होता] घड़े की स्थिति और घड़े का लय उसके उपादान मिट्टी में ही होते हुए प्रत्यक्ष देखे गये हैं। ठीक उसी तरह जगत् का उपादान आनन्द ही है । श्रुति ने स्वयं अपने मुख से जगत् की स्थिति और जगत् के लय को आनन्द में होता हुआ माना है । उपादानं त्रिधा भिन्नं विवर्ति, परिणामि च । आरम्भकं च, तत्रान्त्यौ न निरंशेऽवकाशिनी ॥६॥ उपादान तीन प्रकार का होता है—एक 'विवर्ती' दूसरा 'परिणामी' तीसरा 'आरम्भक' । इनमें से 'आरम्भ' और 'परिणाम' ये दोनों ही पक्ष निरवयव वस्तु में लागू नहीं हो सकते ।
५०४ पञ्चदशी आरम्भवादिनोऽन्यस्मादन्यस्योत्पत्तिमूचिरे । तन्तोः पटस्य निष्पत्तेर्भिन्नौ तन्तुपटौ खलु ॥७॥ आरम्भवादी [वैशेषिक नैयायिक आदि] कहते हैं कि अन्य [कार्य से सर्वथा भिन्न रहने वाले कारण] से अन्य अर्थात् कार्य नाम की वस्तु उत्पन्न हुआ करती है [जो कि उससे सर्वथा भिन्न ही होती है] वे कहते हैं कि तन्तु से वस्त्र की उत्पत्ति देखी जाती है। इस कारण वे तन्तु और वस्त्र परस्पर भिन्न ही है। [क्योंकि पट से निकलने वाले काम तन्तुओं से नहीं निकाल सकते ।] अवस्थान्तरतापत्ति रेकस्य परिणामिता । स्यात् क्षीरं दधि,मृत् कुम्भः,सुवर्णं कुण्डलं यथा ॥८॥ एक ही वस्तु जब पहली अवस्था को छोड़ कर दूसरी अवस्था में आ जाती है तब उसी को 'परिणाम' कहते हैं। जैसे कि परिणाम होने पर दूध दही हो जाता हैं, मिट्टी घड़ा बन जाती है, सोने की बाली हो जाती है । अवस्थान्तरभानं तु विवर्तो रज्जुसर्पवत् । निरंशेऽप्यस्त्यसौ, व्योम्नि तलमालिन्यकल्पनात् ॥९॥ अपनी पूर्वावस्था भी न छूटे और दूसरी अवस्था का भान भी होने लग पड़े तो इसे 'विवर्त' कहते हैं। रज्जुसर्प इसका उदाहरण है [रज्जुरूप से विद्यमान जो पदार्थ है वही सर्वरूप से भी भासने लगता है। यद्यपि हमने सावयव पदार्थ का ही दृष्टान्त दिया है परन्तु] यह विवर्त निरवयव पदार्थों में भी देखा जाता है। देखते हैं कि आकाश यद्यपि निरवयव है तो भी वह तल सा दीखा करता और उसमें भी नीलवर्णता की
[header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०५ [/header]
[header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०५ [/header] कल्पना अर्थात् आरोप [उस आकाश के रूप को न जानने वाले लोग ] कर ही लेते हैं। ततो निरंश आनन्दे विवर्तो जगदिष्यताम् । मायाशक्तिः कल्पिका स्यादैन्द्रजालिकशक्तिवत् ॥१०॥ ऊपर के दृष्टान्त से जब कि निरंश में भी विवर्त होना सम्भव है तब यह भी मान ही लेना चाहिए कि—निरवयव आनन्द में यह जगत् कल्पित कर लिया गया है। कल्पना करने वाले की तलाश हो तो मायाशक्ति को ही कल्पना करने वाली मान लो। इसका दृष्टान्त देखना चाहो तो ऐन्द्रजालिक की शक्ति को देख लो [ऐन्द्रजालिक में रहने वाली जो मणि- मन्त्रादिरूपी माया शक्ति होती है, वह गन्धर्वनगर आदि की कल्पना कर डाला करती है। क्या यह बात हम लोक में नहीं देखते हैं?] शक्तिः शक्तात् पृथङ् नास्ति तद्वद् दृष्टे, र्न चाभिदा । प्रतिबन्धस्य दृष्टत्वाच्छक्त्यभावे तु कस्य सः ॥११॥ शक्ति शक्ति वाले से भिन्न नहीं है क्योंकि ऐसा ही [अभिन्न होना ही] देखा जाता है। शक्ति शक्ति वाले से अभिन्न भी नहीं है क्योंकि [अकेली] शक्ति का प्रतिबन्ध देखने में आता है। यदि शक्ति [उससे पृथक्] कोई चीज नहीं है तो बताओ कि यह प्रतिबन्ध किस वस्तु का होता है ? प्रश्न यह है कि—आनन्दात्मा से भिन्न माया को मानें तो द्वैत मानना पड़ता है। इसका उत्तर हमें यह देना है कि वह माया तो अनिर्वचनीय होने से अनृत है। इसीसे द्वैत नहीं बनता। देखलो कि लौकिक अग्नि आदि की शक्तियों को भी भिन्न या
५०६ पञ्चदशी अभिन्न कुछ भी बताया नहीं जा सकता। क्योंकि अग्नि आदि की शक्ति अग्नि आदि के स्वरूप से भिन्न नहीं होती है। क्योंकि अग्नि आदि के स्वरूप से पृथक् वह दीख ही नहीं पड़ती है। शक्ति और शक्तिमान् का अभेद भी नहीं माना जा सकता। क्योंकि मणिमन्त्रादि से शक्ति का प्रतिबन्ध होता पाया जाता है। इस कारण अग्नि आदि के स्वरूप से भिन्न शक्ति माननी चाहिए। यदि अग्न्यादि से भिन्न शक्ति न मानोगे तो बताना होगा कि वह प्रतिबन्ध किस का होता है ? शक्तेः कार्यानुमेयत्वादकार्ये प्रतिबन्धनम् । ज्वलतोग्नेरदाहे स्यान्मन्त्रादिप्रतिबन्धता ॥१२॥ शक्ति वैसे तो किसी को भी आंखों से नहीं दीखती। उसे तो केवल कार्य से ही अनुमान कर सकते हैं। फिर जब कारण होने पर भी कार्य न होता हो तब प्रतिबन्ध को मानना पड़ता है। दृष्टान्त देख लो कि—जब आग जल रही हो और दाह न होता हो तब यह मानना होता है कि मन्त्रादि ने शक्ति का प्रति- बन्ध, कर दिया है। देवात्मशक्तिं स्वगुणै र्निगूढां मुनयोऽविदुन् । परास्य शक्ति र्विविधा क्रियाज्ञानबलात्मिका ॥१३॥ [ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् (श्वे० १-३) इस श्रुति में कहा गया है कि] मुनि लोग जगत् के कारण को जानने की इच्छा से, जब ध्यान योग में बैठे, तब उन्होंने देव अर्थात् स्वयं प्रकाशस्वरूप आत्मा की मायारूपी शक्ति को देख पाया, जो शक्ति अपने गुणों [अर्थात् अपने कार्य स्थूल- सूक्ष्म शरीरों ] से छिपी बैठी थी ये
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०७
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०७ दर्शन नहीं होने देते थे । परास्य शक्ति र्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च (श्वे० ६-८) इस में कहा गया है कि ] जगत् को बनाने वाली, उस ब्रह्म की पराशक्ति, नाना प्रकार की सुनी गयी है । वह माया शक्ति क्रिया ज्ञान और बल अर्थात् इच्छा रूप होती है * । इति वेदवचः प्राह, वसिष्ठश्च तथाब्रवीत् । सर्वशक्ति परं ब्रह्म नित्यमापूर्णमद्वयम् ॥१४॥ माया के विषय में उपर्युक्त बात श्रुतियों ने कही है। वसि- ष्ठमुनि ने भी इस मायाशक्ति की विचित्रता का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि वह परब्रह्म सर्वशक्तियुक्त है, वह ब्रह्म नित्य पूर्ण और अद्वितीय है [ यों उन्होंने क्रमानुसार ब्रह्म के सोपा- धिक रूप का भी और निरुपाधिक रूप का भी कथन कर दिया है।] ययोल्लसति शक्त्यासौ प्रकाशमधिगच्छति । चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेषूपलभ्यते ॥१५॥ वह परब्रह्म, जब जब, जिस जिस, मायाशक्ति के कारण उल्लास किंवा विकास को प्राप्त हो जाता है, तब तब वह वह शक्ति हम पर प्रकट हो जाया करती है [अर्थात् जब वह शक्ति प्रकट नहीं भी होती तब भी अप्रकट दशा में ब्रह्म में यह जगत् रहता है । हे राम ! तुम देखलो कि देवनिर्यङ् मनुष्यादि शरीर में
- कभी वह शक्ति ज्ञान रूप हो जाती है, फिर इच्छा रूप में दीखती है, फिर क्रिया रूप में हो जाती है, कभी कभी दो या तीनों रूप एक साथ धारण कर लेती है।
५०८ पञ्चदशी वही चिच्छक्ति देखी जा रही है। [उस शक्ति के क्षुद्र कण ही नाना शरीरों की चेतना के रूप में जब तब प्रकट होते रहते हैं ] स्पन्दशक्तिश्च वातेषु दार्ढ्यशक्ति स्तथोपले । द्रवशक्तिस्तथाम्भःसु दाहशक्तिस्तथानले ॥१६॥ शून्यशक्तिस्तथाकाशे नाशशक्तिर्विनाशिनि । वायु में उसकी स्पन्दशक्ति प्रकट होती है। पत्थर में उसकी दार्ढ्य शक्ति अभिव्यक्त हो जाती है। जलों में उसकी द्रवशक्ति प्रकट दशा में देखी जा सकती है। अग्नि में उसकी दाहशक्ति देखने में आती है। आकाश में उसकी शून्यशक्ति पायी जाती है। विनाशी पदार्थों में उसकी नाशशक्ति को देख सकते हैं। यथाण्डेऽन्तर्महासर्पो जगदस्ति तथात्मनि ॥१७॥ [कहाँ तक कहें] जैसे सांप के अण्डे के भीतर महासर्प अनभिव्यक्त दशा में छिपा पड़ा रहता है, इसी प्रकार आत्मा में यह जगत् अनभिव्यक्त दशा में रहता है। फलपत्रलतापुष्पशाखाविटपमूलवान् । तनु बीजे यथा वृक्षस्तथेदं ब्रह्मणि स्थितम् ॥१८॥ फल फूल पत्ते लता शाखा टहनी और मूल वाला पेड़ जैसे एक बीज में [सूक्ष्म रूप में छिपा] रहता है इसी प्रकार यह विचित्र जगत् ब्रह्म में रहता है। क्वचित् काश्चित् कदाचिच्च तस्मादुद्यन्ति शक्तयः । देशकालविचित्रत्वात् क्ष्मातलादिव शालयः ॥१९॥ देश और काल के विचित्र होने के कारण कहीं किसी देश में और किसी काल में कोई कोई शक्तियें अभिव्यक्त हो जाती