रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
५. विविध पद संग्रह, फुटकर सवैये व उपसंहार
व्याख्या भाग २६६ सवैया सोई हुती पिय की छतियाँ लगि बाल प्रबीन महा मुद मानै । केस खुले छहरैं वहरैं फहरैं छवि देखत मैन अमानै ॥ वा रस मै रसखानि पगी रति रैन जगी अँखियाँ अनुमानै । चन्द पै विम्ब औ विम्ब कैरव कैरव पै मुकता प्रयानै ॥२२६॥ शब्दार्थ—सोई हुई = सोई हुई थी । मुद = प्रसन्नता । छहरैं = फैले हुए थे । वहरैं फहरैं = बाहर निकलकर हिल रहे थे । मैन = कामदेव अमानै = अमान्य, तिरस्करणीय । चन्द = चन्द्रमा जैसा मुख । बिम्ब = कुँदरु, आँखों की ललाई । कैरव = कुमुद, आँखो के सफेद कोए । मुक्तान = मोतियो के; रात मे जागने के कारण आँस्रओ के । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य सखी के सुरतान्त का वर्णन करती हुई कहती है कि वह चतुर बाला अत्यन्त प्रसन्नता के साथ अपने प्रिय- तम की छाती से लगाकर सोई हुई थी । उसके खुले हुए केश बाहर निकलकर हिल रहे थे । उसकी शोभा को देखकर कामदेव भी तिरस्करणीय था । प्रिय के साथ आनन्द मे डूबी रहकर रातभर जागने की बात का पता उसकी आँखो से चल रहा था । उसका अलसाया हुआ मुख, लाल आँखे, आँखो के सफेद कोए और रातभर जगाने के कारण जम्भाई के कारण निकले हुए आँसू ऐसे प्रतीत होते थे मानो चन्द्रमा पर बिम्ब, बिम्ब पर कुमुद और कुमुद पर मोती हो । विशेष—प्रतीप और रूपक अलकार । सवैया अगनि अग मिलाइ दोऊ रसखानि रहे लिपटे तरु छाही । संगनि सग अनग को रंग सुर ग सनी पिय दै गलवाही ।। वैन ज्यौ मैन सु ऐन सनेह को लूटि रहे रति अन्तर जाही । नीबी गहै कुछ कंचन कुम्भ कहै वनिता पिय नाही जु नाही ।।२२७।। शब्दार्थ—अनग = कामदेव । रग = प्रेम । सुरग = उन्मादक । ऐन = घर । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से किसी अन्य गोपी के सुरत-शृंगार का वर्णन करती हुई कहती है कि वे दोनो वृक्ष की छाया मे अपने अग से अंग मिला रहे थे । वह नायिका उसके साथ कामदेव के उन्मादक प्रेम मे डूबकर
३०० रसखान-ग्रन्थावली
उसे बाहुपाश मे जकड़े हुए थी। उसके वचन कामदेव के घर जान पडते थे; अर्थात् उसके वचनो से काम-भावना की अभिव्यक्ति हो रही थी। वे दोनो 'रति के अन्तर्गत प्रेम की लूट कर रहे थे। जब उसका प्रिय उसकी नीवी को और कचन कुच-कुम्भो को ग्रहण करता था तो वह वनिता नही नही कर रही थी। विशेष —अनुप्रास, उपमा, रूपक अलकार। तुलना—'हाथन सो गहि नीवी कह्यो पिय, नाही जु नाही जु नाही जु नाही।' —हरिश्चन्द्र सवैया आज अचानक राधिका रूप-निधान सो भेट भई वन माही। देखत दीठि परे रसखानि मिले भरि अंक दियें गलवाही ॥ प्रेम-पगी बतियाँ दुहुँ घाँ की दुहूँ को लगी अति ही चितचाही। मोहिनी मंत्र वसीकर जन्त्र हटा पिय की तिय की नंहि नाही ॥२२८॥ शब्दार्थ —रूप-निधान —सौन्दर्य-भण्डार । रसखानि —आनन्द-सागर कृष्ण। अंक —बाहुपाश। प्रेम-पगी = प्रेमपूर्ण। अर्थ —कोई गोपी अपनी सखी से राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज अचानक वन मे राधा और सौन्दर्य-भण्डार कृष्ण की भेट हो गई। आनन्द-सागर कृष्ण ने उसे देखते ही गलवाँही देकर बाहुपाश मे बाँध लिया। दोनो प्रेम-पूर्ण बाते करने लगे, दोनो के मन मे ही मिलन की अत्यन्त प्रबल इच्छा थी। प्रियतम कृष्ण का 'हा हा करना' यदि मोहिनी मन्त्र था तो राधा का 'नही नही करना' वशीकरण मन्त्र था। सवैया वह सोई हुती परजक लली लला लीनों सु आह भुजा भरिकै। अकुलाइ कै चौकि उठी सु डरी निकरी चहै अंकनि ते फरिकै ॥ झटका झटकी मैं फटी पटुका दर की अंगिया मुकता झरिकै। मुख बोल कढे रिस से रसखानि हटी जू लला निविया धरिकै ॥२२६॥ शब्दार्थ —हुती = थी । परजक = पर्यंक । अंकनि ते = भुजाओ मे से । 'पटुका = दुपट्टा । दरकी = फट गई । मुकता = मोती ।
व्याख्या भाग ३०६ अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य सखी की सुरत का वर्णन करती हुई कहती है कि वह अपने पलंग पर सोई हुई थी कि कृष्ण ने आकर उसे अपनी भुजाओ मे भर लिया । वह आकुल होकर चौंक उठी, डर गई और फड़क कर उसकी गोद से निकलने का प्रयत्न करने लगी । इस भटका भटकी. मे उसका दुपट्टा फट गया, चोली भी फट गई और उसमे से मोती टूटकर नीचे गिर पड़े । रसखान कहते है, तब उसने क्रोधपूर्वक कृष्ण से कहा कि हे कृष्ण ! दूर हट जाओ, मेरी नीवी धडक रही है । विशेष —अनुभावो का सजीव एव स्वाभाविक वर्णन है । सवैया अँखियाँ अँखियाँ सौ सकाइ मिलाइ हिलाइ रिझाइ हियो हरिवो । बतिया चित चोरन चेटक सी रस चारु चरित्रन ऊचरिवो ॥ रसखानि के प्रान सुधा भरिवो अधरान पै त्यौ अधरा धरिवो । इतने सब मैन के मोहिनी जन्त्र पै मन्त्र बसीकर सी करिवो ॥ २३०॥ शब्दार्थ—सकाइ = सकोचपूर्वक । चेटक = जादू । चारु = सुन्दर । ऊचरिवो = उच्चरित करना, कटना । बसीकरण = वशीकरण । सी = सी सी की ध्वनि । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य सखी के सुख श्रृंगार का वर्णन कहती हुई कहती है कि उसने सकोचपूर्वक अपने प्रियतम की आँखो से अपनी आँखे मिलाई; गर्दन हिलाकर और उसके द्वारा अपने प्रिय को रिझाकर उसने उसका हृदय अपने वश मे कर लिया । चित्त को चुराने वाले चीरो की सी जादू-भरी बाते करके उसने रमणीय आनन्द दिया । अपने प्रिय के अधरो पर अपने अधर रखकर उसने उसके प्राणो मे अमृत उड़ेल दिया । इतने सारे मोहने वाले कामदेव के मन्त्रो को अपनाकर भी उसने सी-सी ध्वनि करके अपने करने प्रियकर वशीकरण मन्त्र डाल दिया । विशेष—यमक, उपमा अलकार । सवैया वागन काहे को जाओ पिया, बैठी ही बाग लगाम दिखाऊं । एडी अनार सी मौरि रही, बरियाँ दोउ चम्पे की डार नवाऊँ ॥
३०२ रसखान-ग्रन्थावली छातिन मैं रस के निबुआ अरु घूंघट खोलि कै दाख चखाऊं । टाँगन के रस के चसके रति फूलनि की रसखानि लूटाऊँ ॥२३१॥ शब्दार्थ—मौरि रही = फूल रही है। दाख = द्राक्षा, अधर । टाँगन = छुहारा । अर्थ—कोई नायिका नायक से कह रही है कि हे प्रियतम ! तुम बाग मे क्यो जाते हो ? मैं घर बैठे ही तुम्हे बाग लगाकर दिखा सकती हूँ। मेरी एडियाँ अनार की भांति फूल रही है, मानो ये ही अनार है। दोनो बाँहे ही मानो चम्पे की डाले है। छाती मे उभरे हुए स्तन ही मानो रस भरे नीबू है । मैं घूंघट खोलकर तुम्हे द्राक्षा चखा सकती हूँ, अर्थात् मेरे अधरो के चुम्बन मे द्राक्षा का आनन्द भरा हुआ है। रसखान कहते हैकि जंग रूपी छुहारो का रस तुम्हे चखा सकती हूँ और प्रेम की कलियाँ तुम पर लुटा सकती हूँ। विशेष—वर्णन मे काव्यात्मकता कम है और सागरूपक की सयोजना का प्रयत्न अधिक है । वियोग-वर्णन सवैया फूलत फूल सबै वन बागन बोलत मौर वसत के आवत । कोमल की किलकार सुनै सब कत विदेसन ते सब धावत ॥ ऐसे कठोर महा रसखान जु नेकहु मोरी ये पीर न पावत । हक सी सालत है हिय मैं जब वैरीन कोमल कूक सुनावत ॥२३२॥ शब्दार्थ—कंत = प्रियतम । हक = वरछी । अर्थ—कोई विरहणी गोपी अपनी सखी से कहती है कि सारे बागो मे फूल खिल गये है। वसन्त के आगमन के कारण भौरे उन पर गूँज रहे है । कोयल की कू-कू सुनकर सबके प्रियतम कृष्ण इतने कठोर है कि मेरी विरह-वेदना की तनिक भी चिन्ता नही करते । जब कोयल बोलती है तो उसकी कूक हृदय मे चरछी के समान लगती है । विशेष—१. उपमा अलकार । २ परम्परागत वर्णन । ३. यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्था-वली' मे नही है ।
व्याख्या भाग ३०३ सवैया रसखान सुनाह वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की । पकज सौ मुख गौ मुरझाय लगी लपटैं बरै स्वाँस हिया की ॥ ऐसे मे आवत कान्ह सुने हुलसै सुतनी तरकी अँगिया की । यो जन जोति उठी तन की उसकाय दई मनो बाती दिया की ॥२३३॥ शब्दार्थ-सुनाह = प्रियतम । ताप = दुख । पकज = कमल । बरै = जलने लगी । हुलसै = प्रसन्न हुई । सुतनी = दृढ़ डोर । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखि से किसी अन्य विरहिणी गोपी के विषय मे कह रही है । वह गोपी अपने प्रियतम के वियोग-दुख से इतनी दुखी थी कि उसके शरीर की शोभा भी मद पड गई थी । उसका कमल-जैसा मुख भी मुरझा गया था । उसके हृदय की साँसे लपट बनकर जलने लगी थी । इसी बीच उसने अपने प्रियतम के आगमन की खबर सुनी । वह इतनी प्रसन्न हुई कि उसकी कचुकी की दृढ़ डोर भी कसमसाने लगी । उसका शरीर इस प्रकार शोभायुक्त हो उठा, मानो दीपक की बत्ती को उकसा दिया गया हो । विशेष-१. उपमा, उत्प्रेक्षा, समाधि अलकार । २ सवैया २०० मे भी यही उत्प्रेक्षा है । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया विरहा की जु आँच लगी तन मे तब जाय परी जमुना जल मे । विरहानल तै जल सूखि गयौ मछली बही छाँडि गई तल मे ॥ जब रेत फटी रु पताल गई तब सेस जर यौं धरती-तल मे । रसखान तबै इहि आँच मिटै जब आय कै स्याम लगै गल मे ॥२३४॥ शब्दार्थ - विरहानल = वियोग की आग । धरती-तल-पाताल लोक । आँच मिटै = दुख दूर होगा, ज्वाला शान्त होगी । अर्थ-कोई गोपी अपनी सखी से अन्य विरहिणी गोपी का वियोग-दुख वर्णन करती हुई कहती है जब उसके शरीर मे वियोग-दुख की आग बढ गई तो वह उसे शान्त करने के लिए यमुना जल मे कूद गई । तब विरह की आग के कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के अभाव के कारण
३०४ रसखान ग्रन्थावली यमुना के तल मे बैठ गई। उस आग के कारण जब यमुना का जल अत्यन्त गर्म हो गया तो उसकी गरमी से पाताल-लोक मे स्थित शेषनाग भी जलने लगा। रसखान कहते है कि यह ज्वाला तभी शात हो सकती है जब कृष्ण, उसके गले से आकर लगेगे। विशेष-१. अहात्मकता के कारण भाव-शून्यता । २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है। तुलना - 'प्यारी कौ परसि पौन गयो मानसर पँह, लागत ही औरे गति भई मानसर की। जलचर जरे औ सिवार जरि छार भयौ, जल जरि गयो पक सूख्यो भूमि दरकी।' —गग कवि, सवैया बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हियैं जिन ढारौ । कज की माल करौ जु बिछावत होत कहा पुनि चंदन गारौ ॥ एते इलाज विकाज करौ रसखानि को काहे को जारे पै जारौ । चाहत हौ जु जिवायौ भटू तौ दिखावौ बडी बड़ी आँखिनिवारी ॥२३५॥ शब्दार्थ-गुलाब के नीर = गुलाब जल । उसीर = खस । गारौ = लेप । विकाज = व्यर्थ । भटू = सखी । अर्थ - कोई विरह-व्याकुल गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी ! मेरे हृदय मे गुलाबजल और खस छिडकना बेकार है। कंजमाला का बिछावन करने से तथा चंदन का लेप करने से भी कोई लाभ नही है। ये सारे उपचार व्यर्थ है, वरन् ये तो मेरी जलन को और अधिक बढ़ाते है। हे सखि ! यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मुझे विशाल नेत्र वाले कृष्ण का दर्शन करा दो। विशेष-वर्णन परम्परागत है । सवैया काह कहूँ रतियाँ की कथा बतियाँ कहि आवत है न कछू री । आइ गोपाल लियौ भरि अंक कियौ मनभायौ पियो रस कू री ॥
व्याख्या भाग ३०५.
ताहि दिना सो गडी अँखियाँ रसखानि मेरे अंग अंग मैं पूरी । पै न दिखाई परै अब बावरी दै कै वियोग विथा की मजूरी ॥२३६॥ शब्दार्थ—रतियाँ की = रात की । अंक = गोद । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी-विरह व्यथा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! मैं रात की बाते तुमसे क्या कहूँ ? वे बाते तो कहने मे ही नही आती । कृष्ण ने मुझे अपनी गोद मे भर लिया, उसने अपनी मनोकामना पूरी की, और रस का पान किया । उसी दिनसे उस आनन्द-सागर की आँखे पूर्णतया मेरे अंग-अंग मे गडी हुई है, अर्थात् मैं उनकी शोभा को तनिक देर के लिए भी नही भूल पाती । किन्तु हे सखि ! वियोग-व्यथा को मजदूरी रूप मे देकर वह कृष्ण अब दिखाई नही पड़ता । विशेष—१. परम्परागत वर्णन है । २. 'बावरी' शब्द आत्मीयता का सूचक है । कवित्त काह कहूँ सजनी सँग की रजनी नित बीतै मुकुन्द कोटे री । आवन रोज कहै मनभावन आवन की न कबौ करी फेरी । सौतिन-भाग बढ़्यौ ब्रज मै जिन लूटत हैं निसि रंग घनेरी । मो रसखानि लिखी बिधना मन मारिकै आयु बनी हौ अहेरी ॥२३७॥ शब्दार्थ—मुकुन्द = कृष्ण । रंग = आनन्द । विधिना = ब्रह्मा । अहेरी = शिकारी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से सपत्नी-भाव को प्रकट करती हुई कहती है कि हे सजनी ! मै तुमसे अपनी व्यथा किस प्रकार प्रकट करूँ ? सारी रात कृष्ण की बाट देखते-देखते ही बीत जाती है । मनभावन कृष्ण रोजाना मेरे पास आने को कहते है, लेकिन उनकी मेरे यहाँ आने की कभी बारी ही नही आती । आजकल तो ब्रज मे वह सौत ही बहुत भाग्यशाली है जो कृष्ण के साथ रात को अत्यधिक आनन्द का भोग करती है । रसखान कहते है कि मेरे भाग्य मे तो ब्रह्मा ने यही लिखा है कि मै अपने-आपको मारने के लिए स्वयं ही अपनी शिकारी बनी हुई हूँ । सवैया आये कहा करि कै कहिए वृपमान लली सो लला दृग जोरत । ता दिन तें अँसुवान की धार रुकी नही जद्यपि लोग निहोरत ।
६०६ रसखान-ग्रन्थावली वेगि चलो रसखान वलाइ लौं क्यो अभिमानन भौंह मरोरत । प्यारे । पुरन्दर होय न प्यारी अबै पल आधिक मे ब्रज बोरत ॥२३८॥ शब्दार्थ—निहोरत = समझाते हैं । वलाइ ली = बलैया लेती हूँ । पुरन्दर = इन्द्र । पल आधिक मे = एकआध पल मे । बोरत = डुबोना । अर्थ—राधा की कोई सखी कृष्ण को समझाती हुई कहती है कि हे कृष्ण ! तुम यह तो बताओ कि राधा से अपनी आँखे मिलाकर तुम उस पर क्या जादू कर आये हो, क्योकि उसी दिन से उसकी आँसुओ की धारा रुकी नही है, यद्यपि लोग उसे बहुत समझाते हैं । हे आनन्द-सागर कृष्ण ! जल्दी चलो, मै तुम्हारी बलैया लेती हूँ, क्यो अभिमान करके तुम रुक रहे हो । हे प्यारे ! यदि तुम नही चले तो वह विरहिणी राधा अपने आँसुओ मे एक-आध पल मे ही इन्द्र बनकर सारे ब्रज को डुबो देगी । विशेष—१. एक वार इन्द्र ने ब्रज-वासियो से रुष्ट होकर समूचे ब्रज को डुबा देने का सकल्प किया और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजकी रक्षा की । इस सवैया की अतिम पक्ति मे इसी कथा की ओर सकेत है । २. 'पुरन्दर होय न प्यारी' का एक अर्थ यह भी हो सकता है— राधा को इन्द्र मत समझो, क्योकि इन्द्र से तो तुमने गोवर्धन उठाकर ब्रज की रक्षा कर ली थी, पर राधा से किसी प्रकार भी उसे नही बचा पाओगे । ३. श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे यह सवैया नही है । तुलना—१ 'सखी इन नैननि तै घन हारे । बिनही रितु बरषत निति वासर, सदा मलिन दोउ तारे ऊरध स्वास समीर तेज अति, सुख अनेक द्रुम डारे वदन सदन कहि बसे वचन-खग, दुख पावस के मारे । दुरि दुरि बूँद परत कंचुकि पर, मिलि अंजन सौ कारे । मानौ परनकुटी सिव कीन्ही, बिवि मूरति धरि न्यारे । घुमरि घुमरि वरषत जल छाँडत, डर लागत अँधियारे । बूडत ब्रजहिं सूर को राखै, बिनु गिरवरधर प्यारे ॥'
व्याख्या भाग ३०७ २. 'कहु रहीम उत जाय कै, गिरधारी सो टेरि। अब दृग जल भरि राधिका, जहि डुबावत फेरि ॥' —रहीम ३. 'लाडिली के अँसुवान को सागर, बाढ़त जात मनो नभ छूवे है। बात कहा कहिए ब्रज की अब, बूडोई ह्वै है कि बूढ़त ह्वै है ॥' —रघुनाथ ४. 'जानि ब्रज बूडत जू होते गिरिधारी तौ पे, ब्रज मे बढ़ौते दुख-सोते कहो काहे के।' —द्विजदेव सवैया गोकुल के विछुरे को सखी दुख प्रान ते नेकु गयौ नही काढ्यौ । सो फिर कोस हजार ते आय कै रूप दिखाय दधे पर दाघ्यौ । सो फिर द्वारिका ओर चले रसखान है सोच यहै जिय गाढ्यौ । कौन उपाय किये करि है ब्रज मे बिरहा कुरुखेत को बाढ्यौ ॥२३६॥ शब्दार्थ—गोकुल के बिछुरे को=गोकुल गाँव त्यागने का। दधे पर दाघ्यौ=जले हुए को और जलाया। कुरुखेत को बाढ्यौ=कुरुक्षेत्र मे दिये गये दान के समान बढ़ता ही जाता है। (पुराणो मे बताया गया है कि कुरुक्षेत्र मे किया गया दान आदि १३ दिन तक प्रतिदिन १३ गुनी वृद्धि को प्राप्त करता है। अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! अभी तक गोकुल गाँव से बिछुड़ने का दुख ही अपने मन से नही निकाला गया था कि बहुत दूर से कृष्ण ने आकर अपना सौन्दर्य दिखाकर हमे जले हुओ को और जलाया अपने प्रेम-पाश मे बाँधकर वे फिर द्वारिका को चले गये। हमारे मन मे अब यही दुख है कि ब्रज मे कुरुक्षेत्र मे दिये गये दान के समान नित्यप्रति बढ़ते हुए इस विरह-दुख को किस प्रकार मिटाया जा सकता है। विशेष—१. रूपक अलकार। २. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित रसखान ग्रंथावली मे नही है।
३०८ रसखान-ग्रन्थावली तुलना—विरह भरेयो कर आँगन कोने । दिन दिन बाढत जात सखी री, ज्यों कुरुखेत के डारे सोने ॥' —सूरदास सवैया गोकुल नाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमति जू पर । वाहि गयी अँसुवान प्रवाह भयौ जल मे ब्रजलोक तिहू पर ॥ तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर । पूरन ब्रह्म ह्वै ध्यान रह्यौ पिय औधि अखैबट पात के ऊपर ॥२४०॥ शब्दार्थ—प्रलै=प्रलय तीरथराज=प्रयाग, प्रयाग के समान पवित्र । औधि=अवधि । अखैवट=अक्षयवट, इस वृक्ष का प्रलयकाल मे भी नाश नही होता। अर्थ—कोई गोपी अपनो सखी से कहती है कि कृष्ण के वियोग का दुख गोपियो, नद और यशोदा पर प्रलय का रूप धारण कर चुका है। इनके वियोगजन्य आँसुओ के प्रवाह मे ब्रजलोक जल मे बह गया है। प्रयाग के समान पवित्र राधा के प्राण ही समूचे ब्रज में इस धरती पर बच पाये है और वह भी इसलिए कि वह अपने पूर्ण ब्रह्म प्रियतम के ध्यान मे उनके आगमन की अवधि भी गिनती हुई अक्षयवृक्ष के पत्तो पर चढ गई है । विशेष—१. उपमा, अतिशयोक्ति अलकार । २. ऊहात्मकता के कारण भावो को क्षति । ३. यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया ए सजनी जब ते मैं सुनी मथुरा नगरी बरषा रितु आई । लै रसखान सनेह की ताननि कोकिल मोर मलार मचाई ॥ साँझ ते भोर लौ भोर ते साँझ लौ गोपिन चातक ज्यौ रट लाई । एरी सखी कहिये तो कहाँ लगि वैर अहीर ने पीर न पाई ॥२४१॥ शब्दार्थ—सनेह की ताननि=प्रेमपूर्ण स्वरो मे । साँझ ते भोर लौ भोर ते साँझ लो—सन्ध्याकाल से प्रात काल तक और प्रात काल से सन्ध्याकाल तक । कहाँ लगि=कहाँ तक । बैरी=शत्रु; आत्मीयता=सूचक सम्बोधन । पीर न पाई=पीड़ा का अनुभव नही हुआ ।
व्याख्या भाग ३०६ अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सजनी ! जब से मैंने यह सुना है कि मथुरा नगरी मे वर्षाऋतु आ गई है और कोयल तथा मोर प्रेम के स्वरो मे बोलने लगे है, तब से हर समय गोपियाँ चातक की भाँति पी-पी पुकार रही है । लेकिन हे सखि ! यह तो बताओ कि उस बैरी अहीर को (कृष्ण को) इन गोपियो की विरह-वेदना का कहाँ तक अनुभव हुआ है; वह तो अत्यन्त निष्ठुर और पाषाण-हृदय है । विशेष—१. प्रकृति का उद्दीपन रूप मे परम्परागत वर्णन । २. उपमा अलंकार । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे नही है । सवैया मग हेरत धूं धरे नैन भए रसना रट वा गुन गावन की । अगुरी गनि हार थकी सजनी सगुनौती चलै नहि पावन की । पथिकी कोउ ऐसो जु नाहिं कहै सुधि है रसखान के आवन की । मनभावन आवन सावन मे कही औधि करी डग वावेन की ॥२४२॥ शब्दार्थ—मग हेरत=रास्ता देखते हुए । धूँ धरे = धुंधले । रसना = जीभ । सगुनौती = शुभ शकुन । औधि = आने की अवधि । डग वावेन की = वामनावतार के डगो की भाँति निरन्तर बढती हुई । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से अपनी विरहा 'वस्था का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! प्रियतम कृष्ण का रास्ता देखते हुए मेरे नेत्र धुंधले पड़ गये हैं; उसके गुणो का गान करती-करती जीभ थक गई है । उसके आने के दिनो को गिनती-गिनती अगुलियाँ थक गई है, लेकिन उनके आने का कोई भी शुभ शकुन प्राप्त नही होता । कोई भी ऐसा पथिक नही आता जो कृष्ण के आगमन का समाचार दे । कृष्ण सावन के महीने मे आने की कह गये थे, पर अभी तक नही आये । उनके आने की अवधि तो वामनावतार की तरह निरन्तर, बढती ही जा रही है । विशेष—१. उपका अलंकार । २. विरह का परम्परागत वर्णन । ३ यह सवैया श्री विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-
३१० रसखान-ग्रन्थावली ग्रन्थावली' मे नही है । तुलना—1 'बीती औधि आवक की लाल मनभावन की, डग भई बावन की सावन की रतियाँ ।'—सेनापति 2. 'बावन को डग यौ बिरहा जु ग्रहो मन भावन सावन आयी ।' —अज्ञात ' सपत्नी-भाव सवया वा रसखानि गुनौ सुनि कै हियरा सत टूक ह्वै फाटि गयौ है । जानति है न कछू हम ह्याँ उनवाँ पढ़ि मन्त्र कहा धौ दयौ है । साँची कहै जिय मै निज जानि कै जानति है जस जैसो लयौ है । लोग लुगाई सबै ब्रज माँहि कहैं हरि चेरी को चेरो भयौ है ॥२४३॥ शब्दार्थ—गुनौ=गुणो को । सत=सौ । कहा धौ=न जाने क्या । जस=यश । चेरी को=दासी कुब्जा का । चेरो=सेवक । अर्थ—गोपियाँ कुब्जा के प्रति ईर्ष्या भाव दिखाती हुई उद्धव से कहती है कि हे उद्धव ! उस आनन्द-सागर कृष्ण के गुणो को सुनकर हमारा हृदय सौ- सौ टुकड़े होकर फट गया है । हम नही जानती कि कौन-सा मन्त्र पढकर कुब्जा ने कृष्ण पर चला दिया है । हम अपने मन मे विचार कर यह बात सत्य कहती हैं और जानती हैं कि कृष्ण ने इस प्रकार से कितना यश प्राप्त किया है ? अर्थात् वे बहुत बदनाम हो गये है, क्योकि ब्रज के सब नर-नारी यह कहते हैं कि कृष्ण कुब्जा दासी के दास बन गये है । विशेष—काकुवक्रोक्ति अलंकार । सवैया जानै कहा हम मूढ सबै समझीन तबै जबही बनि आई । सोचत है मन ही मन मै अब कीजै कसा बनियां जु गँवाई ॥ नीचो भयौ ब्रज को सब सीस मलीन भई रसखानि दुहाई । चेरी को चेटक देखहु ही हाई चेरो कियौ धौ कहा पढि मोई ॥२४४॥
व्याख्या भाग ३११ शब्दार्थ—जबही बनि आई—अवसर था। चेरी को—कुब्जा को । चेटक—जादू । अर्थ—गोपियाँ उद्धव के निर्गुण ब्रह्म के उपदेश को सुनकर बहुत दुखी होती है और परस्पर कहती है कि हम मूर्ख कुछ भी नही जानती, इसीलिए जब अवसर था, तभी हम अपने कर्तव्य को नही समझ सकी, अर्थात् जब कृष्ण ब्रज छोड़कर जा रहे थे, तभी उन्हे रोक लेना था। अब मन ही मन यह सोचती है कि जो बाते हो चुकी, उनके विषय मे कुछ कहना-सुनना व्यर्थ है। इस घटना से सारे ब्रज-वासियों का सिर झुक गया और सारी प्रार्थनाएँ व्यर्थ सिद्ध हो गईं। हे सखि ! उस कुब्जा का जादू तो देखो जिससे उसने कृष्ण को अपना दास बना लिया है। न जाने वह जादू उसने कहाँ पढ़ा है। सवैया काइ सौ 'माई कहा करियै सहियै सोई जो रसखान सहावै । नेम कहा जब प्रेम कियौ तब नाचियै सोई जो नाच नचावै ॥ चाहत है हम और कहा सखि क्यो हूँ कहूँ पिय देखन पावै । चेरियै सौ जु गुपाल रुच्यौ तौ भलौ ही सबै मिलि चेरी कहावै ॥२४५॥ शब्दार्थ—नेम—नियम । रूपौ—अनुरूप हो गया । अर्थ—गोपियाँ परस्पर कहती है कि हे सखी ! किससे अपने मन की व्यथा कहे। आन्द-सागर कृष्ण ने जो दुख दिया है, अब तो उसे सहन करने के अतिरिक्त और कोई सहारा नही है। जब कृष्ण से प्रेम किया है तो फिर नियम आदि का स्थान भी क्या रह गया है। जिस प्रकार वह नचाये उसी प्रकार नाचना होगा। हे सखि ! हम और नहीकुछ चाहती । हम तो केवल यही चाहती हैकि किस प्रकार कृष्ण के दर्शन कर सके । यदि कृष्ण दासी के वश मे ही होते है व(यो कि वे कुब्जा के वश मे हो गये है,) तो चलो और सब मिलकर उनकी दासी बन जाओ । तुलना—१. 'चेरी ही सो जो पै रुचि रावही बढी है तो तो, आओ ब्रजनाथ ब्रज हम सब चेरी है।' —नाथ २ 'दासी सो जो साँवरो उद्धव तो हमहूँ चलदासी बनेगी।' —रसनायक
३१२ रसखान-ग्रन्थावली सवैया भेती जु पै कुवरी हयाँ सखी भरी लातन मूका वकोटती लेती । लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कौटी पिराइ कै देती ॥ देती नचाई कै नाच वा रांड कौ लाल रिझावन को फल सेती । सेती सदा रसखानि लिये कुवरी के करेजनि सूलसी भेती ॥२४६॥ शब्दार्थ — भेती = होती । बकोटती लेती = चोट लेती । अर्थ — कुब्जा के प्रति आक्रोश दिखाती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! यदि यहाँ पर वह कुब्जा होती लात-घूँसे मारकर उसे मोह लेती । अपने हृदय का सारा गुस्सा लेती और उसकी नाक को छेद कर उसमे कौडी पहिना देती । उस रांड को मै नाच नचा देती और कृष्ण कोई रिझाने का फल देती । इस प्रकार मैं सदैव आनंद-सागर कृष्ण की सेवा करती जिससे कुब्जा के हृदय मे मैं सदैव कांटे की भाँति कसकती रहती । विशेष — १. मुक्त पदग्रहय यमक । २ नारी-पन के आक्रोश का स्थान का स्वाभाविक चित्रण । तुलना — 'नीच जाति लांडी जाको बेसर सो काम कहा, दोऊ ओर छेद नाक कौडी एक डारती । दांतनि सो काटि काटि लातन सो मारि मारि, कुब्जा को कूबरी करेजो हों निकारती । —अज्ञात कुवलियापीड-वध सवैया कंस के क्रोध की फैलि रही सिगरे ब्रजमंडल माँझ फुकार सी । आइ गए कछनी कछिकै तबही नट-नागर नंदकुमार-सी ॥ द्वैरद को रद खैंचि लियो रसखानि हिये माहि लाइ विमार सी । लीनी कुठोर लगी लखि तोरि कलक तमाल ते कीरति-डार सी ॥२४७॥ शब्दार्थ — फुकार = फुफकार । द्वैरद = हाथी, कुवलिया पीड । रद = दाँत अर्थ — इस सवैया मे कवि कुवलयापीड के वध का वर्णन करता हुआ कहता है कि कंस के क्रोध की आग सारे ब्रज मे फुफकार की तरह फैल रही थी और उसने कृष्ण को मरवाने के लिए कुवलयापीड से उनका युद्ध निश्चित
व्याख्या भाग ३१३ कर दिया था । उससे युद्ध करने के लिए कृष्ण कछनी बाँध कर आ गये । रसखान कहते है कि उन्होने अपने मन मे विचार कर के उस हाथी का दाँत 'लिया और उन्होने उसे तमाल की डाली की भाँति तोड दिया । कृष्ण का यह कार्य ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्होने कलकरूपी तमाल वृक्ष जैसे तुच्छ स्थान पर लगी कीर्तिरूपी शाखा को तोड दिया हो । विशेष—उत्प्रेक्षा अलंकार । पाठान्तर—'इस सवैया की तृतीय पंक्ति का यह रूप भी मिलता है 'रद्द दुरद्द को ऐंच लियौ रसखान यहै, मन आइ विचार सी ।' उद्धव-उपदेश सवैया जोग सिखावत आवत है वह कौन कहावत को है कहाँ को । जानति है वर नागर है पर नेकहु भेद लख्यौ नहिं ह्वाँ को ॥ जानति ना हम और कछू मुख देखि जियैं नित नन्दलला को । जात नही रसखानि हमै तजि राखनहारी है मोरपखा को ॥२४८॥ शब्दार्थ—वर = श्रेष्ठ । नन्दलला = कृष्ण । अर्थ—निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देने के लिए आए हुए उद्धव को देख कर गोपियाँ परस्पर कहती है कि योग की शिक्षा देता हुआ जो व्यक्ति आ रहा है, -यह कौन है ? उसका क्या नाम है ? कहाँ वह रहता है ? यद्यपि हम जानती है कि वह कोई श्रेष्ठ आदमी है, तथापि इसका हमको तनिक भी भेद (परिचय) ज्ञात नही है । यह चाहे कितना ही योगोपदेश करे, पर हम तो इसके अतिरिक्त और कुछ नही जानती कि हम नित्य कृष्ण के दर्शन करके ही जीवित रहती हैं, रसखान कहते हे कि कृष्ण हमसे नही त्यागे जाते, क्योकि वे मोर मुकुटधारी कृष्ण ही हमारे रक्षक है । सवैया अंजन मंजन त्यागौ अली अँग धारि भभूत करौ अनुरागै । आपुन भाग करयौ सजनी इन बावरे ऊधो जू को कहाँ लागै ॥ चाहै सो और सबै करियै जु कहै रसखान सयानप आगै । जो मन मोहन ऐसी बसी तो सबै री कहौ मुख गोरस जागै ॥२४६॥ शब्दार्थ—अंजन मंजन = श्रृंगार । करौ अनुरागै = प्रेम करो । सयानप =
३१४ रसखान-ग्रन्थावली चतुराई। गोरख जागै = गोरखपंथी 'गोरख जागै' का नाद किया करते हैं। अर्थ — गोपियाँ उद्धव के उपदेश का परिहास करती हुई कहती हैं कि हे सखि ! अब श्रृंगार करना छोड़ दो और भस्म से प्रेम करके उसे ही अपने अंगों पर धारण करो। हे सजनि ! जब हमारे भाग्य में कृष्ण की प्रीति लिखी हुई है तो इस पागल उद्धव को क्यों ईर्ष्या होती है। इस चतुराई के आगे, और चाहे हम कुछ भी कर लें, पर जब हमारे हृदय में कृष्ण बसा हुआ है तो उसकी प्रीति हमसे नहीं छूट सकती। इस पर भी यह उद्धव कहता है कि हम सब कृष्ण की प्रीति छोड़ कर 'गोरख जागे' का नाद करती रहें। विशेष — यह सवैया श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान- ग्रन्थावली में नहीं है। सवैया लाज के लेप चढ़ाइ कै अंग पची सब सीख को मन्त्र सुनाइ कै। गारुडू ह्वै ब्रज लोग भक्यौ करि औषद बेसक सौंह दिखाइ कै।। ऊधो सौं रसखानि कहै जिन चित्त धरौ तुम एते उघाइ कै। कारे बिसारे को चाहें उतरयौ अरे विख बावरे राख लगाइ कै ॥२५०॥ शब्दार्थ — पची = कोशिश की। गरुड = साँप का विष उतारने वाला। बेसक — उत्तमोत्तम। कारे = कृष्ण को। विख = विष। अर्थ — उद्धव से निर्गुण ब्रह्म का उपदेश सुनकर गोपियाँ उससे कहती हैं कि हे उद्धव ! हम सबने लाज का लेप अपने अंगों पर लगाने की कोशिश की, सभी प्रकार के मन्त्र सुनाए, ब्रज के लोग गरुड बन कर भी थक गये, सौगन्ध दिला कर उत्तमोत्तम औषधियाँ खाई, पर इतने उपाय करने पर भी हमारा कृष्ण प्रेम रूपी विष नहीं उतर सका, अर्थात् हम कृष्ण को नहीं छोड़ सकीं। हे कारे ! तुम उसी विषैले नाग रूपी कृष्ण का विष योग की भस्म से उता- रना चाहते हो ? कहने का भाव यह है कि जब इतने अधिक उपाय करने पर भी हम कृष्ण प्रेम से वियुक्त नहीं हुई तो तुम्हारा योगोपदेश भी यहाँ पर कोई कार्य नहीं करेगा। तुलना — १. सांवरे सांप डसीहै सबें तिन्है ज्ञान सो मूढि उतारै कहा बिस' ब्रजनिधि २ 'स्याम वियोग तैं उद्धव जू छतियाँ फटी ता में मयूप भरो जु।' —सोमनाथ.
व्याख्या भाग ३१५. सवैया सार की सारी सो पारी लगै धरिबे कहँ सीस बघम्बर पैया । हाँसी सो दासी सिखाइ लई है वेई जु वेई रसखानि कन्हैया ॥ जोग गयौ कुबजा की कलानि मै री कब ऐहै जसोमति मैया । हाहा न ऊधौ कुढाओ हमे अब ही कहि दै ब्रज बाजै बधैया ॥२५१॥ शब्दार्थ —सार=लोहा । बाघम्बर=वाघ की खाल । पैया=पाया हुआ । अर्थ—उद्धव का निर्गुण गुरु का उपदेश सुनकर गोपियाँ उससे कहती हैं कि हे उद्धव ! तुम हमे सीस पर बाघम्बर धारण करने को कहते हो, पर वह बाघम्बर हमे लोटे की साडी से भी भारी लगता है । जिसमे हसी-हँसी मे कुब्जा को अपने वश मे कर लिया है, वे ही—केवल वे ही हमारे आनन्द सागर कृष्ण है । तुम्हारा योग तो कुब्जा की चतुरता मे दब गया । हे उद्धव ! हमे बहुत दुख है । तुम हमे अधिक दुखी न करो । हम अभी कह देती हैं कि ब्रज मे बधाई के वाजे बाजे । ब्रज-प्रेम सवैया या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहुँ पुर को तजि डारौ । आठहु सिद्ध नवौ निधि को सुख नन्द की गाइ चराइ बिसारौ ॥ ए रसखानि जबै इन नैनन ते ब्रज के वन बाग तडाग निहारौ । कोटिक ये कलधौत के धाम करील की कुन्जन ऊपर वारौ ॥ २५२ ॥ शब्दार्थ—वा=उस । लकुठी=लाठी । तिहुँ पुर को=तीनो लोको को । सिद्ध=अलौकिक शक्ति, सिद्धियाँ आठ मानी गई है—अणिमा, महिमा, गरिमा लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और कशित्व । अणिमा सिद्धि से योगी अणुरूप धारण करके अदृश्य हो जाता है । महिमा सिद्धि से योगी अपने देह का चाहे जितना विस्तार कर सकता है । गरिमा सिद्धि से योगी अपने शरीर का चाहे जितना भार बढ़ा सकता है । लघिमा सिद्धि से योगी चाहे जितना छोटा और हलका हो सकता है । प्राप्ति सिद्धि से प्रत्येक पदार्थ प्राप्त किया जा सकता है । प्राकाम्य सिद्धि से योगी जो चाहता है, वही हो जाता है । ईशित्व सिद्धि- के बल पर दूसरो पर प्रभुत्व किया जा सकता है । वाशित्व के सिद्धि के बल पर चाहे जिसको वश मे किया जा सकता है । निधि=अपूर्व वैभव,.
३१६ रसखान-ग्रन्थावली निधियाँ नौ मानी गई हैं—पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व । कोटिक=करोडो । कलधौत के धाम=सोने चाँदी के महल । ये=सांसारिक प्रभुता के प्रतीक । अर्थ —द्वारिका मे रह कर कृष्ण को ब्रज की याद आ गई है । वे व्यथित होकर रुक्मणी से कह रहे है कि उस लाठी और कामरी के लिए मै तीनो लोक का राज्य एक दम छोड देने को तैयार हूँ, नन्द की गय चराने के लिए अणिमा आदि आठो सिद्धियो के तथा पद्म आदि नवो निधियो के सुख का त्याग करने को उद्यत हू । जब से मैंने अपनी इन आँखो से ब्रज के वन और तालाबो को देखा है अर्थात् मुझे उनकी याद आई है, तब से मैं उसके लिए इतना आतुर हो गया हूँ कि मै वैभव के प्रतीक इन करोडो सोने चादी के महलो को ब्रज के करील कुंजो के ऊपर न्यौछावर करता हूँ । विशेष --'ब्रज के वन-बाग' और 'करील की कुंजन' मे छेकाप्रप्रास है । पाठान्तर—ए रसखानि कबौ इन आँखिन सों ब्रज के बान बाग तडाग निहारो ।' कोटि कई कलधौत के धाम करील की कुंजन ऊपर वारौ ।" कवित्त ग्वॉलन संग जैबौ वन ऐबौ सु गायन संग, हेरि तान गैबो हा हा नैन कहकत हैं । ह्वाँ के गज मोती माल वारो गुंज मालन पै, कुंज सुधि आये हाय प्रान धरकत हैं ॥ गोबर को गारौ सु तो मोहि लागै प्यारौ कहा, भयौ मौन सोने के जटिल मरकत हैं । मंदर ते ऊँचे यह मंदिर है द्वारिका के, ब्रज के खिरक मेरे हिय खरकत है ॥२५३॥ शब्दार्थ—जैबौ = जाना। ऐबौ = आना । हेरि = देखकर । गैबो = गाना । जटिल मरकत = रत्नो से जडे हुए । मंदर = मदराचल । खिरक = गोशाला । अर्थ—ब्रज का स्मरण आने पर कृष्ण रुक्मणी से अपने ब्रज प्रेम को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वन मे ग्वालो के सग जाना, वहाँ से गायो के -साथ लौटना, ब्रज के सुन्दर दृश्यो को देख कर बाँसुरी बजाना आज भी मेरी
व्याख्या भाग ३१७ आंखो मे करकते है, अर्थात् उन घटनाओ की स्मृति से मुझे बहुत दुख होता है। यहाँ पर मुझे गज मोतियो की जो मालाये मिली हुई है, इन्हे मैं उन गुन्जमालाओ के ऊपर न्यौछावर कर सकता हूँ । जब भी मुझे ब्रज के कुंजों की याद आती है तो मेरे अंग धड़कने लगते है । वहाँ के गोबर का गारा भी मुझे इतना प्रिय है कि उसके सामने रत्नो से जडे हुए ये सोने के भव्य भवन भी नगण्य है। वह सच है कि द्वारिका के ये राजमहल मदिराचल (पर्वत) से ऊँचे है। फिर भी ब्रज की गोशालाओ की याद मेरे हृदय को कुदेरती रहती है । विशेष—यह कवित्त श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान ग्रन्थावली मे नही है । गंगा-महिमा सवैया इक ओर किरीट लसै दूसरी दिसि नागन के गन गाजत री । मुरली मधुरी धुनि आधिक ओठ पै आधिक नन्द से बाजत री ॥ रसखानि पितम्बर एक कँधा पर एक बाघम्बर राजत री । कोउ देखउ सगम लै बुड़की निकसे यहि मेख सो छाजत री ॥२५४॥ शब्दार्थ—किरीट = मुकुट । लसै = सुशोभित है । नागन के गन = सर्पों के समूह । अधिक = आधा । नाद = श्रृंगी । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से गंगा महिमा का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! उसके सिर पर एक ओर तो मुकुट सुशोभित है और दूसरी ओर सर्पों के समूह फुंकार रहे हैं । एक ओर आधे ओठ पर मधुरी मुरली बज रही है और दूसरी ओर आधे ओठ पर श्रृंगी बज रही है । रसखान कहते है कि उनके एक कन्धे पर पीला वस्त्र है और दूसरे पर बाघ की खाल सुशोभित है । ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण गंगा और यमुना मे डुबकी लगाकर इस सुन्दर रूप को धारण करके निकले हो । विशेष—यह माना जाता है कि गंगा मे स्नान करने से शिवरुप की और यमुना मे स्नान करने से कृष्णरुप की, तथा सगम (गंगा-यमुना) मे स्नान करने से हरिहर (शिव-कृष्ण) रूप की प्राप्ति होती है ।
३१८ रसखान-ग्रन्थावली सवैया वैद की औपध खाइ कछू न करै बहु सजम री सुनि मोसें । तो जल-पान कियौ रसखानि सजीवन जानि लियौ रस तोसें । ए री सुधामई भागीरथी नित पथ्य अपथ्य वनै तोहि पोसैं । आक धतूरो चबात फिरै विख खात फिरै सिव तेरे भरोसें ॥२५५॥ विशेष-औपध = औषधि । सजम = संयम । भागीरथी = गंगा । पथ्य = 'परहेज । अपथ्य = बद परहेज । पोसैं = प्रसन्न करने पर । अर्थ-कवि रसखान गंगा की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे गंगे ! जिस व्यक्ति पर तुम्हारी कृपा हो जाती है, उसे न तो वैद्य की औषधि खाने की आवश्यकता है और न किसी प्रकार का संयम करने की ही जरूरत है । रसखान कहते हैं कि तेरे जल को पीने से सजीवन शक्ति और अपार आनन्द प्राप्त होता है । हे अमृत जल से युक्त गंगे ! तेरे प्रसन्न करने पर बदपरहेज भी परहेज के समान लाभदायक बन जाता है । इसीलिए तेरे भरोसे पर शिव आक और धतूरे को चबाते हैं तथा विष को खाते हैं । तुलना-'बाँधे जटाजूट बैठि परवत कूट माँहि, महाकाल कूटे कहौ कैसे के ठहरतौ । पीवै नित भगै रहै प्रेतन के सगै ऐसे, पूछतौ को नगें जो न गंगे सीस धारतौ ।' -पद्माकर शिव-महिमा सवैया यह देखि धतूरे के पात चवात औ गात सो धूलि लगावत हैं । चहुँ ओर जटा अटकैं लटकै फनि सो कफनी फहरावत हैं । रसखानि जे ई चितवैं चित दै तिनके दुखदुन्द भजावत हैं । गज खाल कमालकी माल विसाल सो गाल बजावत आवत हे ॥२५६॥ शब्दार्थ-पात = पत्ते । फनि = सर्प । कफनी = एक प्रकार का वस्त्र जिसे साधु पहनते हैं । भजावत है = नष्ट करते हैं : अर्थ-कवि रसखान शिव की स्तुति करते हुए कहते हैं कि यह देखो : शिव धतूरे के पत्ते चवाते हैं तथा शरीर मे धूलि लगाते हैं । उनकी जटाएँ