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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

रामपूर्वंतापिन्युपनिषत् ] [ ३३३
आदाय मैथिलीमय ददताञ्चाशु गच्छत ।
ततस्ततार हनुमान्ब्धिं लङ्कां समाययौ ॥२५
सीतां दृष्ट्वाऽसुरान्हत्वा पुरं दग्ध्वा तथा स्वयम् ।
आगत्य रामेण सह न्यवेदयत् तत्त्वतः ॥२६
तदा रामः क्रोधिरूपी तानाहूयाथ वानरान् ।
तैः सार्धमादायस्त्राणि पुरीं लंकां समाययौ ॥२७
तां दृष्ट्वा तदधीशेन सार्धं युद्धमकारयत् ।
घटश्रोत्रसहस्राक्षजिद्भ्यां युक्तं तमाहवे ॥२८
हत्वा विभीषणं तत्र स्थाप्याथ जनकात्मजाम् ।
आदायाङ्कस्थितां कृत्वा स्वपुरं तैर्जगाम सः ॥२६
ततः सिंहासनस्थः सन् द्विभुजो रघुनन्दनः ।
धनुर्धरः प्रसन्नात्मा सर्वाभरणभूषितः ॥३०
मुद्रां ज्ञानमयीं याम्ये वामे तेजः प्रकाशिनीम् ।
धृत्वा व्याख्याननिरतश्चिन्मयः परमेश्वरः ॥३१
उदग्दक्षिणयोः स्वस्य शत्रुघ्नभरतौ ततः ।
हनूमन्तं च श्रोतारमग्रतः स्यान्त्रिकोणगम् ॥३२
भरताधस्तु सुग्रीवं शत्रुघ्नाधो विभीषणम् ।
पश्चिमे लक्ष्मणं तस्य धृतच्छत्त्रं सचामरम् ॥३३
तदधस्तौ तालवृन्तकरौ त्र्यस्रं पुनर्भवेत् ।
एवं षट्कोणमादौ स्वदीर्घाङ्गै रेष सयुतः ॥३४
द्वितीयं वासुदेवाद्यैराग्नेयादिषु संयुतः ।
तृतीय वायुसूनुं च सुग्रीवं भरतं तथा ॥३५
विभीषणं लक्ष्मणं च अङ्गद चारिमर्दनम् ।
जाम्बवन्तं च र्यु क्तस्ततो धृष्टिर्जयन्तकः ॥३६

३३४ ] [रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
विजयश्च सुराष्ट्रश्च राष्ट्रवर्धन एव च ।
अशोको धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चैभिरावृतः ॥३७
ततः सहस्रहग्वह्निर्धर्मज्ञो वरुणोऽनिलः ।
इन्द्रीशधालनन्ताश्च दशभिश्चैभिरावृतः ॥३८
बहिस्तदायुधैः पूज्यो नीलादिभिरलंकृतः ।
वसिष्ठवामदेवादिमुनिभिः समुपासितः ॥३९
इसके पश्चात् सुग्रीव ने अपने वानरों को बुलाकर कहा—
वीरो ! तुम से कोई दिशा छिपी हुई नहीं है । अतः तुम शीघ्र ही यहाँ
से जाकर श्री सीता जी की खोज करो । आज ही लौट कर इसकी
सूचना भगवान् श्रीराम को सुनाओ । फिर हनुमान जी समुद्र को
लांघकर लङ्का में जा पहुंचे । वहाँ उन्होंने सीताजी को देखा
और अनेक राक्षसों को मारकर लंका को जला डाला । फिर वे लौट-
कर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए और उनको सब समाचार
सुनाया । उस समय श्रीराम को अत्यन्त क्रोधावेश हुआ और
वानरों को साथ लेकर लङ्का की ओर चल पड़े । लंका पर
आक्रमण करने के लिए उसका निरीक्षण किया गया और फिर युद्ध
छिड़ गया । लङ्कापति रावण का भाई कुम्भकर्ण मारा गया । फिर
इन्द्रजीत और रावण भी युद्ध में मारे गये । तब विभीषण
को लङ्का का राज्य देकर श्रीराम ने सीता जी को अपने वामाङ्ग में
प्रतिष्ठित किया और सब वानरों को साथ लेकर अयोध्या की ओर चल
पड़े । भगवान् श्रीराम अयोध्या के राज-सिंहासन पर प्रतिष्ठित
हो गये । उन धनुर्धर राम का स्वभाव ही प्रसन्न रहने का है । वे सब
प्रकार के अलंकारों से अलंकृत हैं । उनके दक्षिण हाथ में
ज्ञानमयी मुद्रा और वाम हाथ में तेज को प्रकाशित करने वाली
धनुर्मयी मुद्रा स्थित है । इस प्रकार द्विभुज रूपधारी श्रीराम स्वयं

रामपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३३५
व्याख्यान मुद्रा में स्थित हो रहे हैं। अब श्रीराम के उत्तर भाग में
शत्रुघ्न और दक्षिण भाग में भरत हैं। हनुमान जी श्रीराम के सम्मुख
करबद्ध खड़े हैं। यह भी त्रिकोण में स्थित हैं। भरत के नीचे की ओर
सुग्रीव तथा शत्रुघ्न के नीचे की ओर विभीषण खड़े हुये हैं। श्रीराम के
पीछे लक्ष्मण अपने हाथों में छत्र-चँवर लिए हुये बैठे हैं। भरत-शत्रुघ्न
के हाथों में ताड़ के पंखे हैं। इस प्रकार लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एक
त्रिकोण का स्थिति में हैं। भगवान श्रीराम अपने बीजमन्त्र वाले दीर्घ
अक्षरों के आवरण में घिरे बैठे हैं । भगवान राम के आग्नेय आदि
दिशाओं की ओर वासुदेव, संकर्षण, शान्ति, श्री, सरस्वती, प्रद्युम्न,
अनिरुद्ध और रति हैं । श्रीराम इनसे युक्त रहते हुये द्वितीय आवरण में
घिरे हैं। भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, अङ्गद, जाम्बवान्
और विभीषण जब श्रीराम के साथ होते हैं तब तृतीय आवरण होता
है। राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, सुराष्ट्र, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुमन्त और
धर्मपाल के सहित भी तीसरा आवरण ही सिद्ध होता है । तब ब्रह्मा,
इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, चन्द्रमा, निऋं'ति, अनन्त और ईशान
इन दस दिक्पालों से श्रीराम के आवृत होने पर चतुर्थ आवरण बन
जाता है। इन दिक्पालों के बाहरी भाग में इनके आयुध रहते हैं। इसी
आवरण में नल आदि बानर भगवान् को सुशोभित करते हैं। उनके
साथ ही वसिष्ठ और वामदेव आदि महर्षि भी श्रीराम की उपासना में
लीन दिखाई देते हैं ॥२५-३६॥
एवमुद्दे शतः प्रोक्तं निर्देशस्तस्य चाधुना ।
त्रिरेखापुटमालिख्य मध्ये तारद्वयं लिखेत् ॥ ४०
तन्मध्ये बीजमालिख्य तदधः साध्यमालिखेत् ।
द्वितीयान्तं च तस्योर्ध्वं षष्ठ्यन्तं साधकं तथा ॥ ४१

३३६ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत्

कुरु द्वयं च तत्पार्श्वे लिखेद्बीजान्तरे रमाम् ।
तत्सर्वं प्रणवाभ्यां च वेष्टयेच्छुद्धबुद्धिमान् ॥ ४२
दीर्घभाजि षडस्रे तु लिखेद्बीजं हृदादिभिः ।
कोणपार्श्वे रमामाये वदग्रेऽनङ्गमालिखेत् ॥ ४३
क्रोधं कोणाग्रान्तरेषु लिख्य मन्त्र्यभितो गिरम् ।
वृत्तत्रयं साष्टपत्रं सरोजे विलिखेत्स्वरान् ॥ ४४
केसरे चाष्टपत्रे च वर्गाष्टकमथालिखेत् ।
तेषु मालामनोर्वर्णान्विलिखेदूर्भिसंख्यया ॥ ४५
अन्ते पञ्चाक्षराण्येष्वं पुनरष्टदलं लिखेत् ।
तेषु नारायणाष्टार्णाँल्लिख्य तत्केसरे रमाम् ॥ ४६
तद्बहिर्द्वादशदलं विलिखेद्द्वादशाक्षरम् ।
अथोंनमो भगवते बासुदेवाय इत्ययम् ॥ ४७

पूजा यन्त्र का संक्षिप्त वर्णन किया गया । अब उसका निर्देश
करते हैं । सम रेखाओं के दो त्रिकोण बनाकर उनके बीच में पृथक्-पृथक्
प्रणव लिखे, फिर उन दोनों के मध्य में आद्यबीज लिखे और उसके
नीचे जो कार्य सिद्ध करना है, उसका उल्लेख करे । साध्य का नाम
द्वितीयान्त हो और आद्यबीज के शीर्ष भाग में साधक का नाम षष्ट्यन्त
रहे । फिर बीज के इधर-उधर एक-एक कुरुपद का उल्लेख करे । बीज
के मध्य भाग में तथा साध्य के ऊपर श्री लिखे । यह सब इस प्रकार
लिखने चाहिये कि वे दोनों प्रणवों में सम्पुटित रहें । तत्पश्चात् छहों
कोणों में दीर्घ स्वर वाले मूल बीज को उल्लिखित करे । फिर एक-एक
के साथ हृदयाय नमः और शिर से स्वाहा लिखे । कोणों के बगल में
श्रीं, ह्रीं, क्लीं लिखे और कोण के अगले भाग में हुम् और हुम् के दोनों
ओर ऐं लिखना चाहिये । इसके पश्चात् तीन वृत्त बनाकर वृत्तों के साथ

रामपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३३७
ही आठ दल वाला कमल बनावे । कमल की केसर में दो-दो अक्षर के
क्रमपूर्वक सब स्वर वर्णों को लिखना चाहिए । कमल के आठ दलों में
छः छः वर्ण के क्रम से उल्लेख करे । माला-मन्त्र के सैंतालीस वर्ण पूरे
करने के लिए आठवें दल में पांच वर्ण ही रह जायेंगे । ऊपर बताये
ढङ्ग से पुनः एक कमल बनाकर उसकी आठों पंखुड़ियों पर 'ॐ नमो
नारायण' मन्त्र के एक-एक अक्षर को लिखे, उसके केसर में श्री लिखे ।
उसके ऊपर बारह पंखड़ियों का कमल बनाकर उसकी प्रत्येक पंखुड़ी
पर द्वादशाक्षर मन्त्र का एक-एक अक्षर लिखना चाहिए ॥४०-४७॥
आदिक्षान्तान्केसरेषु वृत्ताकारेण संलिखेत् ।
तद्वहिः षोडशदलं लिख्य तत्केसरे ह्रियप्र ।
वर्मस्त्रिनतिसंयुक्तं दलेषु द्वादशाक्षरम् ।
तत्सन्धिष्विरजादीनां मन्त्रान्मन्त्री समालिखेत् ॥ ४८
हं सं भ्रं वं लूं श्रं ञं च लिखेत्सम्यक्ततो वहिः ।
द्वात्रिंशारं महापद्मं नादबिन्दुसमायुतम् ॥ ५०
विलिखेन्मन्त्रराजाणांस्तेषु दात्रेषु यत्नतः ।
ध्यायेदष्टवसूनेकादशरुद्रांश्च तत्र वै ॥ ५१
द्वादशेनांश्च धातारं वषट्कारं च तद्बहिः ।
भूपृहं वज्रशूलाढ्यं रेखात्रयसमन्वितम् ॥ ५२
द्वारोपेतं च राश्यादिभूषितं फणिसंयुतम् ।
अनन्तो वासुकिश्चैव तक्षः कर्को पद्मऋः ॥ ५३
महापद्मश्च शङ्खश्च गुलिकोऽष्टौ प्रकीर्त्तिताः ।
एवं मण्डलमालिख्य तस्य दिक्षु विदिक्षुच ॥ ५४

३३८ ] रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
नारसिंहं च वाराहं लिखेन्मन्त्रद्वयं तथा ।
कूटो रेफानुग्रहेन्दुनादशक्त्यादिभिर्युतः ॥ ५५
यो नृसिंहः समाख्यातो ग्रहमारणकर्मणि ।
अन्त्याङ्गीशवियद्विन्दुनादैर्बीजं च सौकरम् ॥ ५६
हुंकारं चात्र रोमस्य मालामन्त्रोऽधुनेरितः ।
तारो नतिश्च निद्रायाः स्मृतिर्भेदश्च कामिका ॥ ५७
रुद्रेण संयुता वह्निर्मेधामरविभूषिता ।
दीर्घक्रूरयुता ह्लादिन्यथो दीर्घसमायुता ॥ ५८
क्षुधा क्रोधिन्यमोघा च विश्वभप्यथ मेधया ।
युक्ता दीर्घज्वालिनी च सुसूक्ष्मा मृत्युरूपिणी ॥ ५६
सप्रतिष्ठा ह्लादिनी त्वक्श्वेलप्रीतिश्च सामरा ।
ज्योतिस्तीक्ष्णाग्निसंयुक्ता श्च तानुस्वारसंयुताः ॥ ६०
कामिकापञ्चमूलान्तस्तान्तान्तो थान्त इत्यथ ।
स सानन्तो दीर्घयुतो वायुः सूक्ष्मयुतो विषः ॥ ६१
कामिका कामका रुद्रयुक्ताथोऽथ स्थिरातपा ।
तापनी दीर्घयुक्ता भूरनलोऽनन्तगोऽनिलः ॥ ६१
नारायणात्मकः कालः प्राणाभो विद्यया युतः ।
पीतारातिस्तथा लान्तो योन्या युक्तस्ततो नतिः ॥ ६३
सप्तचत्वारिंशद्वर्णगुणान्तः सृङ्मनुः स्वयम् ।
राज्याभिषिक्तस्य तस्य रामस्योक्तक्रमाल्लिखेत् ॥ ६४
इदं सर्वात्मकं यन्त्रं प्रागुक्तमृषिसेवितम् ।
सेवकानां मोक्षकरमायुरारोग्यवर्धनम् ॥ ६५

रामपूर्वंतापिन्युपनिषत् ] [ ३३६
अपुत्राणां पुत्रदं च बहुना किमनेन वै ।
प्राप्नुवन्ति क्षणात्सम्यग्व धर्मादिकानपि ॥ ६६
इदं रहस्यं परममीश्वरेणापि दुर्गमम् ।
इदं यन्त्रं समाख्यातं न देयं प्राकृते जने ॥ ६७ ॥ इति ॥
बारह पंखुड़ी वाले कमल की केसरों में 'अ' से 'क्ष' तक के
वर्ण वृत्ताकार में लिखे । उसके बाहरी भाग में फिर सोलह पंखुड़ियों
का कमल बनाकर, केसरों में ह्रीं अङ्कित करे । उसकी सोलह पंखुड़ियों
में एक-एक पर एक-एक अक्षर के कम से 'हूं' 'फट्' 'नमः' और द्वादशा-
क्षर मन्त्र लिखना चाहिये । पंखुड़ियों की संधियों में हनुमान जैसे वीर
पुरुषों के बीज मन्त्र लिखे । उसके बाहरी भाग में नाद बिन्दु से युक्त
बत्तीस पंखुड़ियों का एक विशाल कमल बनावे । पंखुड़ियों पर नरसिंह
मन्त्रराज के बत्तीस अक्षरों को क्रमपूर्वक लिखे । उन पंखुड़ियों में ही
आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य और सबके धारक वषट्कार
का न्यास एवं ध्यान करना चाहिये । इस बत्तीस पंखुड़ियों वाले कमल
के बाहरी भाग में भूपुर यन्त्र बनावे और उसके चारों ओर वज्र तथा
कोणों में शूल अंकित करे । भूपुर को तीन रेखाओं से मिलावे, यह
रेखायें सत्य, रज, तमगुणों की सूचक हैं । मण्डप में बने द्वार के समान
इसमें भी द्वार बनाना चाहिये । भूपुर में राशि आदि बनाकर भूपुर यन्त्र
को शेष भाग से युक्त करना चाहिये ।
भूपुर यन्त्र-लेखन के पश्चात् उसकी चारों दिशाओं में नरसिंह
बीजमन्त्र और कोणों में बारह बीज मन्त्र लिखना चाहिये । अनुग्रह,
इन्दु, नाद, शक्ति आदि से युक्ता क्षरों मन्त्र ही नरसिंह बीज मन्त्र हैं ।
यह मन्त्र शत्रुओं का नाश करने, ग्रह बाधाओं को शान्त करने और
इच्छित सिद्धि प्राप्त कराने वाला है । अन्त्य वर्ण, अर्धीश, बिन्दु, नाद

३४० ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
और शक्ति आदि से सम्पन्न 'हुम्' बारह बीज-मन्त्र हैं । अब श्रीराम
विषयक माला-मन्त्र को कहेंगे । इसमें प्रथम प्रणव, फिर नमः, निद्रा,
स्मृति, मेद और कामिका है जो रुद्र से युक्त है, फिर अमर से अलंकृत
अग्नि और मेधा कामिका है जो रुद्र से युक्त है, फिर अमर से अलंकृत
अग्नि और मेधा है । फिर अक्रूर से युक्त दीर्घ कला है । फिर ह्लादिनी
है और इसके बाद मानदा कला से विभूषित दीर्घ कला है, फिर क्षुधा
है । यहाँ तक कि 'ॐ नमो भगवते रघुनन्दनाय' बन गया । इसके
पश्चात् क्रोधिनी, अमोघा और मेधा से युक्त विश्व है । फिर दीर्घा है,
ज्वालिनी सूक्ष्म से संयुक्त है ; फिर प्रतिष्ठा से युक्त प्रणवकला है ।
फिर ह्लादिनी और त्वक् है । यहां तक 'रक्षोघ्नविशदाय' की पूर्ति हुई ।
फिर क्ष्वेल, प्रीति, अमर, ज्योति, अग्नि से युक्त तीक्ष्णा, अनुस्वार से
युक्त श्वेता, फिर कामिका, व, द और अनन्त से युक्त न, दीर्घ स्वर
युक्त वायु, सूक्ष्म इकार युक्त विष, कामिका, कामिका में रुद्र, स्थिरा
और ए की मात्रा युक्त स है । इससे 'मधुरप्रसन्नवदनायामिततेजसे' बन
गया । फिर तापिनी, दीर्घ भू, अनिल से 'बलाय' बना । फिर अनन्तग
अनल, नारायणात्मक मकार और प्राण से 'रामाय' सिद्ध हुआ,
विद्यामय अम्भस्, पीता, रति, ए की मात्रा युक्त व है, इससे विष्णवे
बना । अन्त में नमः और प्रणव है । यह संतालीस अक्षरों वाला राज्या-
भिषिक्त श्रीराम से सम्बन्धित माला-मन्त्र है । सगुण होते हुए भी
यह साधकों के तीनों गुणों को नष्ट करने वाला है । यह मन्त्र पूर्वोक्त
क्रम-पूर्वक ही लिखा जाना चाहिये । उपरोक्त मन्त्र सर्वात्मक है । इसे
प्राचीन कालीन विद्वानों ने बताया और अनेक ऋषि मुनियों ने इसके
द्वारा साधना की है । इसके सेवन करने वाले साधकों को आरोग्य की
प्राप्ति तथा आयु वृद्धि होती है और अन्त में वे इस संसार के बन्धनों
से मुक्त हो जाते हैं । यह साधन पुत्रहीनों को पुत्र प्राप्त कराने वाला

रामपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३४१
है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य आदि सभी अभीष्टों की इससे पूर्ति
होती है। इसका साधन करने वाले जन शीघ्र ही अपना इच्छित प्राप्त
करते हैं। यह रहस्य अत्यन्त गोपनीय है, परन्तु बिना दीक्षा के अत्यन्त
समर्थ विद्वान के लिये भी कठिन है । अनाधिकारी पुरुषों को इसका
कभी उपदेश न करे ॥४८-६७॥
ॐ भूतादिकं शोधयेद्द्वारपूजां
कृत्वा पद्माद्यासनस्थः प्रसन्नः ।
अर्चाविद्यावस्य पीठाधरोर्ध्वपार्श्वार्चनं
मध्यपद्मार्चनं च ॥ १
कृत्वा मृदुश्लक्ष्णसुतूलिकायां
रत्नासने देशिकमर्चयित्वा ।
शक्तिं चाधारव्यकां कूर्मनागौ
पृथिव्यब्जे स्वासनाधः प्रकल्प्य ॥ २
विघ्नेशं दुर्गां क्षेत्रपालं च वाणीं
बीजादि कांश्चाग्निदेशादिकांश्च ।
पीठस्याङ्घ्रिष्वेव धर्मादिकांश्च
नत्वा पूर्वाद्यासु दिक्ष्वर्चयेच्च ॥ ३
मध्ये क्रमादर्कविध्वग्नितेजांस्यु-
पर्यु पर्यादिमैरर्चितानि ।
रजः सत्त्व तम एतानि वृत्तत्रयं
बीजाढ्यं क्रमाद्भावयेच्च ॥ ४
आशाव्याशास्वप्यथात्मानमन्तरात्मानं
वा परमात्मानमन्तः ।
ज्ञानात्मानं चार्चयेत्तस्य दिक्षु
मायाविद्ये ये कलापारतत्वे ॥ ५

३४२ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
संपूजयेद्विमलादींश्च शक्तीरभ्यर्चयेद्देवमावाहयेच्च ।
अङ्गव्यूहानिलजाद्यैश्च पूज्य धृष्ट्यादिकैर्लोकपालैस्तदस्त्रैः
॥ ६ ॥
वसिष्ठाद्यैर्मुनिभिर्नीलमुख्यैराराधयेद्राघवं चन्दनाद्यैः ॥
मुख्योपहारैर्विविधैश्च पूज्यैस्तस्मै जपादींश्च सम्यक्प्रकल्प्य
॥ ७ ॥
एवंभूतं जगदाधारभूतं रामं वन्दे सच्चिदानन्दरूपम् ।
गदारिशङ्खाब्जधरं भवारिं स योध्यायेन्मोक्षमाप्नोति सर्वंः
॥ ८ ॥
विश्वव्यापी राघवो यस्तदानीमन्तर्दधे
शंखचक्रे गदाब्जे ।
धृत्वा रमासहितः सानुजश्च
सपत्तनः सामुगः सर्वलोकी ॥ ९
तद्भक्ता ये लब्धकामांश्च भुक्त्वा
तथा पदं परमं यान्ति ते च ।
इमा ऋचः सर्वकामार्थदाश्च
ये ते पठन्त्यमला यान्ति मोक्षम् ॥ १०
इति पंचमोपनिषत् । चिन्मयेऽस्मिंस्त्रयोदश । स्वभूर्ज्योति-
स्तिस्त्रः । सीतारामावेका । जीववाची षट्षष्टिः । भूतादिकमेका-
दश । पंचखण्डेषु त्रिनवतिः ॥ इति ॥
द्वारपूजा करके पद्मासन या अन्य आसन लगावे और पंचभूत
की शुद्धि करे। श्रीराम की पूजा-विधि में सिंहासन की पीठ की निचला

रामपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३४३
भाग, ऊपर का भाग, अगल-बगल भी पूजन किया जाता है। पीठ के
ऊपर बीच में स्थित आठ दल वाले कमल को भी पूजे । रत्न जटिट
सिंहासन पर कोमल और चिकनी गद्दी की भावना कर उस पर ईश्वर
रूप आचार्य की पूजा करे । पीठ के निचले भाग में, उपास्यदेव के
आसन के नीचे आश्रयशक्ति, कूर्म, नाग और पृथ्वीयुक्त दो कमलों की
भावना कर, उन सब का पूजन करे ।
विघ्न, दुर्गा, क्षेत्रपाल और वाणी के साथ आदि में बीज
लगाकर नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति लगाकर पूजा करे । फिर पीठ
के पायों में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का अग्नि कोण आदि में पूजन कर
अधर्म, अनर्थ, अकाम और अमोक्ष को भी पूर्वादि दिशाओं में पूजे ।
फिर पीठ के ऊपर के मध्य भाग में सूर्य, चन्द्र, अग्नि का पूजन करे ।
यन्त्र स्थित सत्व, रज तम के प्रतीक बीज सहित तीन वृत्तों का भी
चिन्तन एवं पूजन करे ।
फिर दिशाओं और कोणों में बने हुये कमल के आठ दलों का
पूजन करे । इनमें जो दल मध्य स्थित दिशा में है, उनमें आग्नेयकोण
से क्रमशः आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा की पूजा
करे । पूर्वादि दिशाओं में माया, विद्या, कला और पर इन तत्वों को
पूजे । फिर विमला आदि शक्तियों को पूजे । फिर मुख्य देवता
का आह्वान और अर्चन करे । फिर अङ्गव्यूहों का पूजन करे और धृष्टि
आदि लोकपाल और उनके अस्त्र, वशिष्ठ आदि मुनि फिर नील आदि
के साथ चन्दन आदि विभिन्न लेपनों और अलंकारों आदि के द्वारा
श्रीराम का पूजन कर जप आदि समर्पित करे । "संसार के आश्रयभूत,
गदा, चक्र, शंख, पद्मधारी भव-बन्ध के काटने वाले सच्चिदानन्द
स्वरूप और अत्यन्त महिमावान हैं उन परमेश्वर श्रीराम को मैं नमस्कार
करता हूँ।" इस प्रकार उनकी स्तुति करे । जो उपासक ऐसा करते हैं,
वे मोक्ष को अवश्य प्राप्त करते हैं ।

३४४ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
लीला-संवरण-काल में ही श्रीराम देह सहित अन्तर्ध्यान हो गए ।
उनके आयुध भी साथ ही अन्तर्ध्यान हो गये। वे अपने स्वाभाविक
रूप को धारण कर सीता सहित परमधाम में पहुँच गये । उनके साथ
ही उनका सब परिवार, प्रजाजन, विभीषण आदि भी परमधाम में
गए। उनके भक्त इच्छित भोगों को प्राप्त करते हैं और उनका
उपभोग कर अन्त में परमपद प्राप्त करते हैं। यह ऋचायें सम्पूर्ण
अभीष्टों और अर्थों की देने वाली हैं। इनका पाठ करने वाले
भक्तजन पवित्र अन्तःकरण वाले होकर मोक्ष को प्राप्त होते
हैं ॥ १-१० ॥
॥ रामपूर्वतापिन्युपनिषद् समाप्त ॥
—:०:—

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गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न
इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो
अरिष्टनेमिः । स्वस्तिः नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः
शान्तिः ।
शान्ति पाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों
से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते
रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे
भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने
वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे
गरुड़ देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
हरिः ॐ सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे ।
नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥
मुनयो ह वै ब्राह्मणमूचुः । कः परमो देवः । कुतो मृत्यु-
र्बिभेति । कस्य विज्ञानेनाखिलं विज्ञातं भवति । केनेदं विश्वं
संसरतीति । तदुहोवाच ब्राह्मणः । कृष्णो वै परमं दैवतम् ।
गोविन्दान्मृत्युर्बिभेति । गोपीजनवल्लभज्ञानेनैतद्विज्ञातं भवति ।
स्वाहेदं विश्वं संसरतीति । तदुहोचुः । कः कृष्णः । गोविन्दश्च
कोऽसाविति । गोपीजनवल्लभश्च कः । का स्वाहेति । तानुवाच
ब्राह्मणः । पापकषर्णो गोभूमिवेदवेदितो गोपीजनविद्याकलाप-
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

३४६ ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत्
प्रेरकः । तन्माया चेति सकलं परं ब्रह्मैव तत् । यो ध्यायति
रसति भजति सोऽमृतो भवतीति । ते होचुः । किं तद्रूपं किं रसनं
किमाहो तद्भजनं तत्सर्वं विविदिषतामाख्याहीति । तदुहोवाच
हैरण्यो गोपवेषमभ्रामं कल्पद्रुमाश्रितम् । तदिह श्लोका भवन्ति ॥
सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं
वनमालिनमीश्वरम् ॥ १ ॥ गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रि-
तम् । दिव्यालंकरणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ २ ॥ कालिन्दी-
जलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयञ्चेतसा कृष्णं मुक्तो
भवति संसृतेः ॥ ३ ॥
सच्चिदानन्द स्वरूप परमेश्वर श्रीकृष्ण के नाम में 'कृष' शब्द
सत्ता-वाचक और 'न' शब्द आनन्दबोधक है । यह सच्चिदानन्द स्वरूप
श्रीकृष्ण अनायास ही सब कुछ कर सकने में समर्थ हैं, सब की बुद्धि के
साक्षी और सब के जानने योग्य है । वे सम्पूर्ण विश्व के गुरु हैं । उनके
लिये नमस्कार हो ।
एक समय मुनियों ने ब्रह्माजी से प्रश्न किया कि "भगवन् ! कौन
देवता सर्वश्रेष्ठ है ? मृत्यु किससे भय मानती है ? किसके तत्त्व को भले
प्रकार जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है ? यह जगत किसकी
प्रेरणा से आवागमन के चक्र में घूमता है ?"
ब्रह्माजी ने मुनियों को उत्तर दिया—"'सर्वश्रेष्ठ देवता श्रीकृष्ण
हैं, वही गोविन्द हैं, उनसे मृत्यु भी भयभीत रहती है । उन गोपीजन-
वल्लभ के तत्व को जो कोई जान लेता है, उसे अनजाना कुछ नहीं
रहता । स्वाहा रूप माया की प्रेरणा से यह सम्पूर्ण जगत आवागमन के
चक्र में पड़ा घूम रहा है ।"

गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३४७
तब उन मुनियों ने पुनः प्रश्न किया—"यह श्रीकृष्ण कौन हैं ?
गोविन्द कौन हैं ? गोपीजन वल्लभ कौन हैं ? स्वाहा कौन है ? यह सब
कृपाकर हमें बतावें।"
ब्रह्माजी बोले—"श्रीकृष्ण पापों का अपकर्षण करने वाले हैं।
वही गोविन्द नाम से गो, भूमि तथा वेदवाणी के जानने हारे के रूप में
प्रसिद्ध हैं। गोपीजन-वल्लभ अविद्या के निवारक और अन्तरङ्ग शक्ति-
रूप ब्रज-वनिताओं में सब ज्ञानमयी विद्याओं और चौंसठ कलाओं का
ज्ञान भरने वाले हैं। इनकी माया शक्ति स्वाहा है। यह सब परमेश्वर
के ही रूप हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण नाम से परब्रह्म ही प्रसिद्ध हुये हैं।
जो मनुष्य उनके इस रूप का ध्यान करता है तथा उनके अमृतत्व को
प्राप्त कराने वाले नामों को जपता है, या उनका भजन करता अथवा
गुणानुवाद गाता है यह अवश्य ही अमृतत्व को प्राप्त करता है।
तब उन मुनियों ने पुनः पूछा—"ध्यान करने के योग्य श्रीकृष्ण
का कैसा रूप है ? उनके नाम रूप अमृत का रस किस प्रकार चाखा जा
सकता है ? उनका भजन किस प्रकार होता है ? हमें यह सब बात स्पष्ट
बताइये।"
ब्रह्माजी ने बताया कि "भगवान के जिस रूप का ध्यान करना
चाहिये उसका वेष ग्वाल-बाल जैसा है। उनका वर्ण नवीन जलधर के
तुल्य श्याम है, किशोर अवस्था है और दिव्य कल्पतरु के नीचे वे विराज-
मान हैं। उनका सौन्दर्य अपूर्व है और गोप तथा गोपियों से चारों ओर
से घिरे हैं। जमुना जल की लहरों के स्पर्श से शीतल वायु भगवान की
सेवा कर रही है। ऐसे रूप का चिन्तन करने वाला भव-बन्धन से छुट-
कारा पा जाता है" ॥ १-३ ॥
तस्य पुना रसनमिति जलभूमिं तु संपाताः । कामादि
कृष्णायेत्येकं पदम् ॥ गोविन्दायेति द्वितीयम् । गोपीजनेति तृती-

३४८ ] [ गोपालपूर्वत्तापिन्युपनिषत्
यम् । वल्लभेति तुरीयम् । स्वाहेति पञ्चममिति पञ्चपदं
जपन्पञ्चाङ्गं द्यावाभूमी सूर्याचन्द्रमसौ तद्रूपतया ब्रह्म संपद्यत
इति । तदेष श्लोकः क्लीमित्येतदादावादाय कृष्णाय गोविन्दाय
गोपीजनवल्लभायेति बृहन्मानव्यासकृदुच्चरेद्योऽसौ गतिस्तस्यास्ति
मङ्क्षु नान्या गति स्यादिति । भक्तिरस्य भजनम् । एतदिहा
मुत्रोपाधिनैराश्येनामुष्मिन्मनःकल्पनम् । एतदेव च नैष्कर्म्यम् ।
कृष्णं तं विप्रा बहुधा यजन्ति । गोविन्दं सन्तं बहुधा आराध-
यन्ति । गोपीजनवल्लभो भुवनानि दध्रे स्वाहाश्रितो जगदेतत्सु-
रेताः ॥ १ ॥ वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो जन्येजन्ये पञ्चरूपो
बभूव । कृष्णस्तदेकोऽपि जगद्धितार्थं शब्देनासौ पञ्चपदो
विभाति ॥ २ ॥ इति ॥
ते होचुरुपासनमेतस्य परमात्मनो गोविन्दस्याखिला-
धारिणो ब्रूहीति । तानुवाच यत्तस्य पीठं हैरण्याष्टपलाश-
मम्बुजं तदन्तराधिकानलास्त्रयुगं तदन्तरालद्यर्णखिलबीजं
कृष्णाय नम इति बीजाढ्यं सब्रह्म। ब्राह्मणमादायानङ्गगायत्रीं
यथावदालिख्य भूमण्डलं शूलवेष्टितं कृत्वाऽङ्गवासुदेवादिरुक्मिण्या-
दिस्वशक्ति नन्दादिसुदेवादिपार्थादिनिष्ठ्यादिवीतं यजेत्संध्यासु
प्रतिपत्तिभिरुपचारः । तेनास्याखिलं भवत्यखिलं भवतीति ॥ २ ॥
तदिह श्लोका भवन्ति । एको वशी सर्वगः कृष्णः ईड्य एकोऽपि
सन्बहुधा यो विभाति । तं पीठं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां सिद्धिः
शाश्वती नेतरेषाम् ॥ ३ ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको
बहूनां यो विदधाति कामान् । तं पीठगं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां
सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ ४ ॥ एतद्विष्णोः परमं पदं ये
नित्योद्युक्तास्तं यजन्ति न कामात् । तेषामसौ गोपरूपः प्रयत्ना
त्प्रकाशयेदात्मपदं तदेव ॥ ५ ॥
क्लीं काम बीज है । जो उपासक इसे आदि में रखकर कृष्णाय

गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् ] [ ३४६
गोविन्दाय, गोपीजन वल्लभाय इन तीनों पदों का स्वाहा सहित
उच्चारण करेगा, वह शीघ्र ही श्रीकृष्ण से मिलकर मुक्ति को प्राप्त
होगा। इसके लिए इससे भिन्न कोई गति नहीं समझनी चाहिये। इनकी
भक्ति करना ही भजन माना गया है। भजन करना उसे कहते हैं, जिसमें
साधक अपने भोगों की इच्छा को पूर्ण रूप से त्याग कर अपने मन और
इन्द्रियों को उन्हीं में समर्पित कर देता है। इसी को वास्तविक संन्यास
कहा गया है। वेद के ज्ञाता ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण का अनेक प्रकार
से यजन करते तथा भक्तजन गोविन्द नाम से उनकी उपासना करते हैं।
सम्पूर्ण संसार का पालन करने वाले वे ही गोपीजन-वल्लभ हैं, जिन्होंने
अपनी स्वाहा नाम वाली माया शक्ति के द्वारा इस विश्व की रचना
की। जैसे सम्पूर्ण संसार में एक ही वायु-तत्त्व है, परन्तु वह प्रत्येक
शरीर में प्राण आदि पाँच रूपों में रमा हुआ है, वैसे ही भगवान
श्रीकृष्ण भी एक ही हैं, परन्तु इस मन्त्र में ये पाँच नामों वाले जान
पड़ते हैं। इस मन्त्र में कहे हुए पाँचों नाम एक ही श्रीकृष्ण का प्रति-
पादन करने वाले हैं।
फिर उन मुनियों ने पूछा—"विश्व के आधारभूत भगवान्
श्रीकृष्ण की उपासना किस प्रकार होती है, कृपा पूर्वक इसका वर्णन
कीजिये।"
तब श्री ब्रह्माजी ने भगवान् श्रीकृष्ण की पीठ का वर्णन किया
और बोले—"पीठ पर सुवर्णयुक्त एक कमल बनावे, उसमें आठ पंखु-
डियाँ हों, उसके बीच में दो त्रिकोण अंकित करे, वे परस्पर सम्पुटित
हों। ऐस छः कोण बनावे। कोणों में स्थित कर्णिका में सभी अभीष्टों को
पूर्ण करने वाले काम-बीज का अंकन करे। फिर हरेक कोण में
क्लीं बीज युक्त 'कृष्णायनमः' को क्रमशः एक-एक अक्षर करके
लिखे। फिर ब्रह्म-मन्त्र और काम-गायत्री विधिपूर्वक लिख कर

३५० ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत्
आठ वज्रों से आवेष्ठित पृथिवी मण्डल बनावे । फिर अङ्ग, वासुदेव,
रुक्मिणी, इन्द्र, वसुदेव, पार्थ और निधि आदि अष्टावरणों से घेर कर
उसका पूजन करना चाहिये ।
तीनों संध्याओं के समय षोडश उपचारों द्वारा उक्त आवरणों
वाले श्रीकृष्ण की पूजा करे । ऐसा करने से साधक चारों पदार्थों को
प्राप्त करता है ।
भगवान् श्रीकृष्ण सर्वव्यापी, सब पर शासन करने वाले हैं, वे
सदा स्तुति के योग्य हैं । एक होकर भी वे अनेक रूपों में दिखाई देते
हैं । जो ज्ञानी भक्त ऊपर कही हुई पीठ पर प्रतिष्ठित भगवान्
श्रीकृष्ण की नित्य प्रति पूजा करते हैं, उन्हें स्थाई सुख की प्राप्ति
होती है ।
जो श्रीकृष्ण सब साधकों का अभीष्ट पूर्ण करते हैं, जो नित्य
में भी नित्य और चैतन्यों में भी चैतन्य हैं, उन्हें पहले कही हुई पीठ में
प्रतिष्ठित करे । जो इस प्रकार उनका अर्चन करते हैं वे परम सिद्धि के
अधिकारी होते हैं ।
जो भगवान् विष्णु के परमपद रूप इस मन्त्र को नित्य प्रति
उत्साह सहित विधिपूर्वक पूजते हैं और भगवत्-प्राप्ति के सिवाय अन्य
किसी वस्तु को नहीं चाहते, उनके लिये गोपस्वरूप श्रीकृष्ण अपने
परमपद को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं ॥ १-५ ॥
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो विद्यां तस्मै गोपयति स्म
कृष्णः । तं ह वेवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुः शरणं व्रजेत् ॥ ६ ॥
ओङ्कारेणान्तरितं ये जपन्ति गोविन्दस्य पञ्चपदं मनुम् । तेषा-
मसौ दर्शयेदात्मरूपं तस्मान्मुमुक्षुरभ्यसेन्नित्यशान्त्यै ॥ ७ ॥
एतस्मा एव पञ्चपदादभूवन्गोविन्दस्य मनवो मानवानाम् ।
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

गोपालपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३५१
दशार्णाद्यास्तेऽपि संक्रन्दाद्यै रभ्यस्यन्ते भूतिकामैर्यथावात् ॥८
जो सृष्टि के पूर्व काल में ब्रह्माजी उत्पन्न कर उन्हें वेद
ज्ञान देते और उनसे साम-गान कराते हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों को बुद्धि
रूप प्रकाश प्रदान करते हैं, मुमुक्षु व्यक्ति उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण की
शरण प्राप्त करे ।
भगवान गोविन्द के पञ्चपदी मन्त्र की ओंकार सम्पुट कर जप
करने वाले साधक शीघ्र ही उनके दर्शन करते हैं । इसलिये भव-बन्धन
से मुक्त होने की कामना करने वाले साधक को नित्य शांति की प्राप्ति
के लिये उक्त मन्त्र का ही जप करना चाहिये ।
इस पञ्चपदी मन्त्र से ही दशाक्षर आदि अन्य मन्त्र भी प्रकट
हुए हैं । वे सभी मन्त्र मानव का कल्याण करने वाले हैं । उन मन्त्रों का
भी ऐश्वर्य-कामना वाले इन्द्रादि देव विधिपूर्वक सदा जप करते रहते हैं
॥६—८॥
ते पप्रच्छु स्तुदुहोवाच ब्रह्मसदनं चरतो मे ध्यातः स्तुतः
परमेश्वरः परार्द्धान्ते सोऽबुध्यत । कोपदेष्टा मे पुहुषः पुरस्तादा-
विर्बभूव । ततः प्रणतो मायानुकूलेन हृदा मह्यमष्टादशार्णस्वरूपं
सृष्टये दत्त्वान्तर्हितः । पुनस्ते सिसृक्षतो मे प्रादुरभूवन् । तेष्व-
क्षरेषु विभज्य भविष्यज्जगद्रूपं प्रकाशयम् । तदिह कादाका-
लात्पृथिवीतोऽग्निर्बिन्दोरिन्दुस्तत्संपातात्तदर्क इति । क्लींकाराद-
जस्रं कृष्णादाकाशं खाद्वायुरुत्तरात्सुरभिर्विद्याः प्रादुरकार्षमका-
र्षमिति । तदुत्तरात्स्वापुंसादिभेदं सकलमिदं सकलमिदमिति
॥ ३ ॥ एतस्यव यजनेन चन्द्रध्वजो गतमोहमात्मानं वेदयति ।
ओंकारालिकं मनुमावर्तयेत् । सङ्गरहितोऽध्यानयेत् । तद्विष्णोः

:गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३५२
परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तस्मा-
देतन्नित्यमावर्तयेन्नित्यमावर्तयेदिति ॥४॥ तदाहुरेके यस्य प्रथ-
मपदाद्भूमिर्द्वितीयपदाज्जलं तृतीयपदाद्यं जश्चतुर्थपदाद्वायुश्चर-
मपादाद्व्योमेति । वैष्णवं पञ्चव्याहृतिमयं मन्त्रं कृष्णावभासकं
कैवल्यस्य सृप्त्यै सततमावर्तयेत्सततमावर्तयेदिति ॥ ५ ॥ तदत्र
गाथाः ॥ यस्य चाद्यपदाद्भूमिर्द्वितीयात्सलिलोद्भवः । तृतीयाः
तेज उद्भूतं चतुर्थाद्गन्धवाहनः ॥ १ ॥ पञ्चमादम्बरोत्पत्तिस्त-
मेवैकं समभ्यसेत् । चन्द्रध्वजोगमद्विष्णोः परमं पदमव्ययम्
॥ २॥ ततो विशुद्धं विमलं विशोकमशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् ।
यत्तत्पदं पञ्चपदं तदेव स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ३ ॥
तमेकं गोविन्दं सच्चिदानन्दविग्रहं पञ्चपदं वृन्दावनसुरभूरूह-
तलासीनं । सततं मरुद्गणोऽहं परमया स्तुत्या स्तोष्यामि ॥
ब्रह्माजी ने कहा—जब मेरी परार्ध आयु भगवान की स्तुति
करते बीत गई तो मुझे गोप वेषधारी भगवान का दर्शन प्राप्त हुआ ।
उन्होंने मुझे अष्टादशाक्षर मन्त्र का उपदेश देकर सृष्टि रचना की प्रेरणा
की। मैंने इस मन्त्र के 'क' अक्षर से जल की, 'ल' से पृथ्वी की, 'ई' से
अग्नि की, अनुस्वार से चन्द्रमा की और समग्र 'क्लीं' से सूर्य की रचना
की । मन्त्र के द्वितीय पद 'कृष्णाय' से आकाश और वायु की, 'गोविन्दाय'
से कामधेनु और वेदों की तथा 'गोपीजन वल्लभाय' से पुरुष-स्त्री की
रचना की । अन्त के स्वाहा' पद से चराचर जगत को उत्पन्न किया ।
इस अष्टाक्षर मन्त्र से ही प्राचीन समय में चन्द्रध्वज राजा मोहरहित
होकर पूर्ण आत्मज्ञान के अधिकारी बने थे । भगवान कृष्ण के गोलो-
कधाम की प्राप्ति इसी मन्त्र से होती है ।
वह जो परम विशुद्ध, विमल, शोक रहित, आसक्ति और