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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

योगचूड़ामणि उपनिषद् [ ८५ होता और संसार में कमल पत्रवत् रहता है ॥८८॥ वायु के चलित होने पर बिन्दु भी चलित होता है और वायु के निश्चल रहने पर वह भी स्थिर रहता है । बिन्दु की स्थिरता से योगी निश्चल होता है इस लिये वायु का निरोध करना ॥८६॥ जब तक देह में वायु स्थित है जब तक जीव उसे नहीं छोड़ सकता । वायु का निकल जाना ही मृत्यु है, इसलिये वायु का का निरोध करे ॥६०॥ यावद्बद्धो मरुत् देहे तावज्जीवो न मुञ्चति । यावद्दृष्टिभ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभय कुतः ॥६१॥ अल्पकालभयाद्ब्रह्मा प्राणायामपरो भवेत् । योगिनो मुनयश्चैव ततः प्राणान्निरोधयेत् ॥६२॥ षड्विंशदड्गुलीहंसः प्रायाणं कुरुते बहिः । वामदक्षिणमार्गेण धूणायामो विधीयते ॥६३॥ शुद्धिमेति यदा सर्वं नाड़ीचक्रं मलाकुलम् । तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणक्षमः ॥६४॥ बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् । धारयेद्वा यथाशक्त्या भूयः सूर्येण रेचयेत् ॥६५॥ जब तक देह में वायु स्थिर है तब तक जीव नहीं छूट सकता । जब तक दोनों भौंहों के बीच में दृष्टि स्थिर है तब तक काल का भय कहां ? ॥६१॥ काल से बचने के लिये ब्रह्मा भी प्राणायाम परायण होते हैं, इसलिये योगियों और मुनियों को चाहिये कि प्राण के निरोध का अभ्यास करें ॥६२॥ हंस (श्वास) छब्बीस अंगुल बाहर जाता है। बायें और दाहिने मार्ग से प्राणायाम किया जाता है ॥६३॥ जब नाड़ीचक्र सब प्रकार के मलों से शुद्ध हो जाता है, तब योगी प्राणों के निरोध में समर्थ होता है ॥ ६४ ॥ योगी को बद्ध पद्मासन लगाकर चन्द्र (बायीं नासिका) से वायु को खींचना

८६ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri और उसे यथाशक्ति भीतर रोककर सूर्य (दाहिनी नासिका) से बाहर निकालना ॥६५॥ अमृतोदधिसंकाशं गोक्षीरधवलोपमम् । ध्यात्वा चन्द्रमसं बिम्बं प्राणायामे सुखी भवेत् ॥६६॥ स्फुरत्प्रज्वलसज्जवालापूज्यमादित्यमण्डलम् । ध्यात्वा हृदि स्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत् ॥६७॥ प्राणं चेदिडया पिबेन्नियमितं भूयोऽन्यथा रेचयेत् । पीत्वा पिङ्गया समीरणमथो बद्ध्वा त्यजेद्वामया । सूर्यचन्दमसोरनेन विधिना बिन्दुद्वयं ध्यायतः शुद्धा न डिगणा भवन्ति यमिनो मासद्वयादूर्ध्वतः ॥६८॥ यथेष्ट धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् । नादाभिव्यक्तिररोग्यं जायते नाडिशोधनात् ॥६९॥ प्राणो देहस्थितो यावदपानं तु निरुन्धयेत् । एकाश्वसमयी मात्रा ऊर्ध्वाधो गगने स्थितिः ॥१००॥ अमृत के समुद्र के समान, गो के दूध के सदृश धवल चन्द्रमा के विम्ब का ध्यान करता हुआ प्राणायाम करे ॥ ६६ ॥ फिर प्रज्ज्वलित ज्वाला के समान हृदय में स्थित सूर्य भगवान का ध्यान करते हुये प्राणायाम करे ॥ ६७ ॥ पहले इड़ा (बांयीं) नाड़ी से श्वास लेकर पिङ्गला दाहिनी से रेचक करे, फिर पिङ्गला से श्वास लेकर इड़ा से बाहर निकाल दे। इस प्रकार सूर्य और चन्द्र दोनों बिन्दुओं का ध्यान (अभ्यास) करने से दो मास में नाड़ी शुद्ध हो जाती है ॥ ६८ ॥ वायु का यथेष्ठ धारण करना, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, नाद का सुनाई पड़ना, आरोग्य—ये सब नाड़ी शोधन से प्राप्त होते हैं ॥६९॥ जब तक देह में प्राणवायु स्थित है तब तक अपान को रोके। एक श्वास वाली मात्रा हृदयाकाश में ऊपर और नीचे गतिमान होती है ॥१००॥

योगचूडामणि उपनिषत् [ ८७ रेचक, पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः । प्राणायामो भवेदेवं मात्राद्वादशसंयुक्तः ॥१०१॥ मात्राद्वादशसंयुक्तौ निशाकरदिवाकरौ । दोषाजालमबध्नन्तौ ज्ञातव्यौ योगिभि सदा ॥१०२॥ पूरकं द्वादशं कुर्यात्कुम्भकं षोडषं भवेत् । रेचकं दश चोंकारः प्राणायामः स उच्यते ॥१०३॥ प्रधमे द्वादशा मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता । उत्त मे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णयः ॥१०४॥ अधमे स्वेदजननं कम्पो भवति मध्यमे । उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥१०५॥ रेचक, पूरक और कुम्भक ये प्रणव स्वरूप हैं, इस प्रकार का प्राणायाम द्वादश मात्रा में करना ॥ १०१ ॥ यह द्वादश मात्रा संयुक्त सूर्य और चन्द्र का प्राणायाम समस्त दोषों का नाश करने वाला है ॥ १०२ ॥ बारह मात्रा का पूरक करके सोलह मात्रा का कुम्भक करना चाहिए तब फिर दस मात्रा रेचक करना—यह ओंकार प्राणायाम कहा जाता है ॥ १०३ ॥ द्वादश मात्रा का प्राणायाम हलका है, इससे दुगुनी मात्रा वाला मध्यम है और तिगुनी मात्रा वाला उत्तम कहा जाता है ॥ १०४ ॥ हलके प्राणायाम से पसीना आता है, मध्यम से कम्पन उत्पन्न होता है, उत्तम में आसन से उठता जान पड़ता है, इस प्रकार वायु का निरोध करना चाहिये ॥ १०५ ॥ बद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम्, नासाग्रदृष्टिरेकाकी प्राणायामं समभ्यसेत् ॥१०६॥ द्वाराणां नव संनिरुध्य मरुतं बद्ध्वा दृढां धारणां नीत्वा कालमपानवह्निहतं शक्त्या समं चालितम् ।

८८ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आत्मध्यानयुतस्त्वनेन विधिना विन्यस्य मूर्ध्नि स्थिरं । यावत्तिष्ठति तावदेव महतां संगो न संस्तूयते ॥१०७॥ प्राणायामो भवेदेवं पातकेन्धनपावकः । भवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभि सदा ॥१०८॥ आसनेन रुजं हन्ति प्राणायामेन पातकम् । विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुञ्चति ॥१०६॥ धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम् । समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम् ॥११०॥ बद्ध पद्मासन पर बैठकर शिवरूपी गुरु को नमस्कार करना चाहिये फिर नासाग्र पर दृष्टि रखकर एकाकी प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये ॥ १०६ ॥ नवों द्वारों को रोक वायु को बाँध कर दृढ़तापूर्वक शक्तिचालन करके अपान और अग्नि सहित कुण्डलिनी को ऊपर ले जाय ओर आत्म ध्यानपूर्वक उसे मस्तक में स्थिर करे, जब तक यह स्थिर रहे तब तक श्रेष्ठ है ॥ १०७ ॥ ऐसा प्राणायाम पाप रूपी ईंधन के लिये अग्नि स्वरूप है और संसार सागर से पार होने के लिए सेतु के समान है ॥ १०८ ॥ आसन से रोगों का नाश होता है और प्राणायाम से पापों का । योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हों जाते हैं ॥ १०६ ॥ धारणा से मन में धैर्य आता है, समाधि द्वारा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है और इस प्रकार शुभाशुभ कर्मों का नाश होकर मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ११० ॥ प्राणायामद्विषट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः । प्रत्याहारद्विषट्केन जायते धारणा शुभा ॥१११॥ धारणा द्वादश प्रोक्तं ध्यानं योगविशारदैः । ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते ॥११२॥ समाधौ परमं ज्योतिरनन्त विश्वतोमुखम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ८१ तस्मिन्दृष्टे क्रियाकर्म यातातो न विद्यते ॥११३ संबद्धाऽऽसनमेढ्रमङ् घ्रियुगलं कर्णाक्षिनासापुट- द्वारानङ् गुलिभिर्नियम्य पवनं वक्रे ण वा पूरितम् । बद्ध वा वक्षसि बह्नपानसहितं मूर्ध्नि स्थितं धारये- देवं याति विशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरस्तन्मनाः ॥११४ गगनं पवने प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान् । घण्टाऽऽदीनां प्रवाद्याना नादसिद्धिरुदीरिता ॥११५ प्राणायाम के द्वादश बार के अभ्यास से प्रत्याहार होता है और बारह प्रत्याहार का अभ्यास करने से शुभ धारणा उत्पन्न होती है। बारह धारणा को ध्यान कहा गया है और बारह ध्यान से समाधि कहलाती है ॥ ११२ ॥ समाधि होने पर जो परम ज्योति अनन्त और विश्वतोमुख का भाव होता है उससे क्रिया, कर्म और आवागमन से छूट जाता है ॥ ११३ ॥ आसन पर बैठकर दोनों चरणों को मेढ़ स्थान में लगाकर, कान, आंख और नाक के द्वारों को अंगुलियों से बन्द करके, वायु को मुख द्वारा खींचकर भीतर ले जाय । उसे अपान के साथ मिलाकर छाती में रोके फिर मस्तक में स्थिर करे, इस प्रकार उसमें मन को संलग्न करके योगीजन समभाव के विशेष तत्व को प्राप्त करते हैं ॥ ११४ ॥ आकाश मण्डल में पवन के जाने से महान ध्वनि ( नाद ) सुनाई देने लगती है, घण्टा आदि का शब्द सुनने में आता है और नाद-सिद्धि होती है ॥ ११५ ॥ प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत् । प्राणायामवियुक्तेभ्यः सर्वरोगसमुद्भवः ॥११६ हिक्का कासस्तथा श्वासः शिरः कर्णाक्षिवेदना । भवन्ति विविधा रोगाः पवनव्यत्ययक्रमात् ॥११७ यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः ।

६० ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम् ॥११८ युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं प्रपूरयेत् । युक्तं युक्तं प्रबध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥११९ चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् । तत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ॥१२० यथा तृतीयकाले तु रविः प्रत्याहरेत्प्रभाम् । तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं हरेत् ॥१२१ इत्युपनिषत् ॥ प्राणायाम का अभ्यास होने से सब रोग दूर हो जाते हैं और प्राणायाम से रहित होने से सब रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ११६ ॥ हिचकी, खांसी, श्वास, सिर, कान और आंख की पीड़ा आदि विविध प्रकार के रोगों का कारण वायु का विकार ही होता है ॥ ११७ ॥ जिस प्रकार सिंह, हाथी, व्याघ्र आदि को धीरे-धीरे वश में किया जाता है उसी प्रकार वायु को भी क्रमशः वश में करना चाहिये, अन्यथा वह साधक का नाश कर देता है ॥ ११८ ॥ वायु को युक्तिपूर्वक ही बाहर निकालना चाहिये और युक्तिपूर्वक ही भीतर लेना चाहिये और युक्ति से ही रोकना चाहिये, तभी सिद्धि मिलती है ॥ ११९ ॥ चक्षु आदि इन्द्रियां जो विषयों की तरफ चलती हैं उस को रोकना प्रत्याहार है ॥ १२० ॥ जिस प्रकार तीसरे प्रहर में सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है, उसी प्रकार योगी तीसरे अङ्ग में स्थिर होकर मन के विकारों का शमन करे, यह उपनिषद् है ॥ १२१ ॥ ॥ योगचूड़ामणि उपनिषद् समाप्त ॥ ―――― Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri महोपनिषद् ॐ आप्याय तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निरा- कुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे अस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों, वाणी, घ्राण, चक्षु श्रोत्र, बल और सब इन्द्रियाँ वृद्धि को प्राप्त हों सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं। मुझसे ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे। उसमें रत हुये मुझको उपनिषद् धर्म की प्राप्ति हो। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। प्रथमोऽध्यायः अथातो महोपनिषदं व्याख्यास्यामः। तदाहुः—एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नापो नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्यो न चन्द्रमाः। स एकाकी न रमेत। तस्य ध्यानान्तः स्थस्य यज्ञस्तोममुच्यते। तस्मिन् पुरुषाश्चतुर्दश जायन्ते एका कन्या दशेन्द्रियाणि मन एकादशं तेजो द्वादशमहं कारस्त्रयोदश प्राणश्चतुर्दश आत्मा पञ्चदश बुद्धि भूतानि पञ्च तन्मात्राणि पञ्च महाभूतानि स एकः पञ्चविंशयन्तिः पुरुषः तत्पुरुषं पुरुषो निवेश्य नास्य प्रधानसंवत्सरा जायन्ते संवत्सरादधिजायन्ते ॥१-६॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

६२ ] [ प्रथम अध्याय

६२ ] [ प्रथम अध्याय महोपनिषद् का आरम्भ किया जाता है कि आदि में केवल एक नारायण ही थे । ब्रह्मा, रुद्र, जल, अग्नि, सो, आकाश, पृथिवी, नक्षत्र, सूर्य एवं चन्द्रमा आदि कुछ भी नहीं था । नारायण को अकेले रहना अच्छा नहीं लगा । तब उन्होंने अन्तःस्थ सङ्कल्प रूपी ध्यान किया । वह ध्यान ही यज्ञस्तोम कहा गया है । उस ध्यान से ही चौदह पुरुष और एक कन्या की उत्पत्ति हुई । वे चौदह पुरुष हैं—दस इन्द्रियाँ, तेजस्वी मन, अहङ्कार, प्राण और आत्मा । इन चौदहों के अतिरिक्त बुद्धि रूपिणी कन्या हुई । इनसे भिन्न सूक्ष्म भूत वाली पञ्च तन्मात्राएँ और पञ्च महाभूत हुये । इन पच्चीसों के योग से एक पुरुष बना । उस पुरुष में विराट् पुरुष प्रविष्ट हुआ । परन्तु इस पच्चीस तत्व युक्त विराट् रूप से संवत्सरों की उत्पत्ति नहीं हुई । संवत्सर तो कालरूप संवत्सर से ही प्रकट हुये हैं ॥ १-६ ॥ अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायता लतस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् त्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषो जायते बिभ्रच्छ्रियं यशः सत्यं ब्रह्मचर्यं तपो वैराग्यं मन ऐश्वर्यं सप्रणवा व्याहृतय ऋग्यजुः सामाथर्वाङ्गिरसः सर्वाणि छन्दांसि तान्यंगे समाश्रितानि तस्मादीशानो महादेवो महादेवः ॥७॥ अथ पुनरेव नारायणः सोऽन्यत्कामो मनसा ध्यायत । तस्य ध्यानान्तःस्थस्य ललाटात् स्वेदोऽपतत् । ता इमाः प्रतता आपः । तत्तस्तेजो हिरण्मयमण्डम् । तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखो- ऽजायत ॥८॥ सोऽध्यायत् । पूर्वाभिमुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिर्गायत्रं छन्द ऋग्वेदोऽग्निर्देवता । पश्चिमाभिमुखो भूत्वा भुव इति व्याहृतिस्त्रिष्टुभं छन्दो यजुर्वेदो वायुर्देवता । उत्तराभिमुखो भूत्वा स्वरिति व्याहृतिर्जगतं छन्दः सामवेदः सूर्योदेवता । दक्षिणाभि-

[Header] महोपनिषद् [ ६३ ]

मुखो भूत्वा मह इति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः सोमो देवता ॥६॥ सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वशंभुवम् । विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥१० विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति । पतिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रें क विश्वरूपिणम् ॥११॥

फिर उन नारायण ने अन्य सङ्कल्पयुक्त अन्तःस्थ ध्यान किया । उनके उस ध्यान से एक ऐसे पुरुष की उत्पत्ति हुई जो तीन नेत्रों वाला था तथा वह अपने हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये था । यश, सत्य, तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, नियन्त्रित मन, ऐश्वर्य, प्रणव युक्त व्याहृतियां, चारों वेद और सम्पूर्ण छन्द उस सिद्ध पुरुष में समाश्रित थे । इसीलिए उसका नाम ईशान एवम् महादेव हुआ । उन प्रसिद्ध नारायण ने पुनः अन्तःस्थ ध्यान किया, उस समय उनके ललाट से पसीना टपकते लगा । वह पसीना ही जल रूप में फैल गया । उस जल में ही एक अणुकार हिरण्यमय तेज की उत्पत्ति हुई । उस तेज से ही ब्रह्माजी उत्पन्न हुये । ब्रह्मा जी पूर्व की ओर मुख करके भूः व्याहृति, गायत्री छन्द, ऋग्वेद और अग्नि का ध्यान करने लगे । पश्चिम की ओर मुख करके भुवः व्याहृति, त्रिष्टुप छन्द, यजुर्वेद और वायु का ध्यान करने लगे । उत्तराभिमुख होकर स्वः व्याहृति, जगती छन्द, सामवेद और सूर्य का ध्यान करने लगे । फिर उन्होंने दक्षिणाभिमुख होकर महः व्याहृति, अनुष्टुप्त छन्द, अथर्ववेद और सोम का ध्यान किया । फिर उन ब्रह्मा ने सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र वाले, सर्व मङ्गलों के कारण, सर्वत्र व्याप्त, परात्पर और नित्य स्वरूप नारायण का ध्यान किया और उन्होंने उन जगदीश्वर के क्षीर सागर में शयन करते हुए, दर्शन किये तथा यह जाना कि यही परममुख विश्वरूप हैं और सम्पूर्ण संसार का जीवन इन्हीं पर अवलम्बित है ॥७-११॥

९४ ] [ द्वितीय अध्याय

९४ ] [ द्वितीय अध्याय पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसंनिभम् । हृदयं चाप्यधोमुखं संतस्तै सीत्काराभिश्च ॥१२ तस्ये मध्यं महानर्चिर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखम् । तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥१३ तस्याः शिखाया मध्ये पुरुषः परमात्मा व्यवस्थितः । स ब्रह्मा स ईशानः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥ इति महोपनिषत् ॥१४॥ जो भले प्रकार से पद्मकोश के समान लम्बायमान एवं अधोमुख हृदय है, उससे सीत्कार शब्द निकलता रहता है । उस हृदय के मध्य में ही एक ज्वाला प्रदीप्त है । वही ज्वाला दीपशिखा के समान दसों दिशाओं में प्रकाश को बाँटकर विश्व को प्रकाशित करती है । उसी ज्वाला के मध्य में कुछ ऊपर उठी हुई एक क्षीण वह्निशिखा है । उसी शिखा में परमात्मा निवास करते हैं । वही परमात्मा ब्रह्मा, ईशान, इन्द्र हैं तथा वे अविनाशी एवम् परम स्वराट् हैं ॥ १२-१४ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ द्वितीयोऽध्यायः शुको नाम महातेजाः स्वरूपानन्दतत्परः । जातमात्रेण मुनिराड् यत् सत्यं तदवाप्तवान् ॥१ तेनासौ स्वविवेकेन स्वयमेव महामनाः । प्रविचार्य चिरं साधु स्वात्मनिश्चयमाप्नुयात् ॥२ अनाख्यत्वादगम्यत्वान्मनः षष्ठेन्द्रियस्थितेः । चिन्मात्र मेवायमणुराकाशादपि सूक्ष्मकः ॥३ चिदणोः परमस्यान्तः कोटिब्रह्माण्डरेणवः । उत्पत्तिस्थितिमभ्येत्य लीयन्ते शक्तिपर्ययात् ॥४

महोपनिषद् ] [ ६५ आकाशं बाह्यशून्यत्वादनाकाशं तु चित्त्वतः । न किंचिद्यदिनर्देश्यं वस्तु सत्तेति किंचन ॥५ आत्मा के परम आनन्द का निरन्तर आस्वादन करने वाले एक अत्यन्त तेजस्वी मुनीश्वर थे । उनका नाम शुकदेव था । जन्म लेते ही उन्हें सत्य एवं तत्वज्ञान की प्राप्ति हो गई थी । इसीलिये उन्होंने किसी की सहायता लिये बिना ही, बहुत काल तक विचार करने के पश्चात् अपने ही विवेक से आत्मस्वरूप क्या है, इस पर एक निश्चित धारणा बनाई । आत्मा अनिर्वचनीय है इसलिये अगम्य है और मन रूपी षष्ठ इन्द्रिय में अवस्थित होने से यह अणु के आकार का है, चिन्मात्र एवं आकाश तत्व से भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म है । इस परम चिद् रूप अणु में कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड रेणुकायें शक्ति क्रम के अनुसार उत्पन्न स्थित और विलय होती रहती हैं । यह आत्मा चिद्रूप होने के कारण आकाश रूप से भिन्न है, परन्तु बाह्य-शून्यता के कारण आकाश रूप भी है । इसके रूप का वर्णन नहीं हो सकने से यह वस्तु रूप नहीं है, परन्तु सत्ता होने से वस्तु रूप है ॥ १-५ ॥ चेतनोऽसौ प्रकाशत्वाद्वैद्याभावाच्छिलोपमः । स्वात्मनि व्योमनि स्वच्छे जगदुन्मेषचित्रकृत् ॥६ तद्भामात्रमिदं विश्वमिति न स्यात्ततः पृथक् । जवद्भे दोऽपि तद्भानमिति भेदोऽपि तन्मयः ॥७ सर्वगः सर्वसंबन्धो गत्यभावान्न गच्छति । नास्त्यसावाश्रयाभावात् सद्भूतत्वादथास्ति च ॥८ विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दातुः परायणम् । सर्वसंकल्पसंन्यासश्चेतसा यत्परिग्रहः ॥६ जाग्रतः प्रत्ययाभावं यस्याहुः प्रत्ययं बुधाः । यत्सङ्कोचविकासाभ्यां जगत्प्रलयसृष्टयः ॥१०

६६ ] [द्वितीय अध्याय

६६ ] [द्वितीय अध्याय प्रकाशात्मक होने के कारण यह चेतन स्वरूप है, परन्तु वेदनात्मक होने से शिला रूप है। अपने अन्तरतम में यह विभिन्न प्रकार के विश्व का उन्मेष करने वाला है। यह विश्व उसी का अपना प्रकाश मात्र होने से उससे भिन्न नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में परिलक्षित होता है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। सबसे सम्बद्ध होने के कारण उसकी गति सर्वत्र है, परन्तु उसमें गति न होने से चलता-फिरता नहीं है। निराश्रित होने से वह नास्ति रूप है, परन्तु तत्स्वरूप होने के कारण उसे अस्ति रूप मात्र हो गया है। वही धन देने वाले की महान गति है। आनन्द एवं विज्ञान रूप जो ब्रह्म है तथा जिसका ग्रहण सभी मानसिक सङ्कल्पों का त्याग मात्र ही है, मेधावी जन जिसकी प्रतीति जाग्रत अवस्था की प्रतीति न होने को ही कहते हैं तथा जिसके संकोच से प्रलय और विकास से सृष्टि की रचना होती है ॥ ६-१० ॥ निष्ठा वेदान्तवाक्यानामथ वाचामगोचरः । अहं सच्चित्परानन्दब्रह्म वास्मि न चेतरः ॥११ स्वयैव सूक्ष्मया बुद्ध्या सर्वं विज्ञातवान् शुकः । स्वयं प्राप्ते परे वस्तुन्यविश्रान्तमनाः स्थितः ॥१२ इदं वस्त्विति विश्वासं नासावात्मन्युपाययौ । केवलं विररामास्य चेतो विषयचापलम् । भोगेभ्यो भूरिभङ्गेभ्यो धाराभ्य इव चातकः ॥१३ एकदा सोऽमलप्रज्ञो मेरावेकान्तसंस्थितम् । पप्रच्छ पितरं भक्त्या कृष्णद्वैपायनं मुनिम् ॥१४ संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने । कथं च प्रशमं याति कियत् कस्य कदा वद ॥१५ जो वेदान्त वाक्यों को निष्ठा रूप तथा वाणी के लिए अकथनीय हैं, मैं उस सत् चित् एवं परमानन्द स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं हूँ।

महोपनिषत् ] [ ६७ अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा श्री शुकदेव जी ने यह सब कुछ जान लिया और इस स्वयं उपलब्ध परम तत्व में वे निरन्तर लगे रहने वाले मन से युक्त हुये। उनके हृदय में इस प्रकार विश्वास जम गया कि यही वस्तु है, इनसे भिन्न कुछ नहीं है। जैसे धारा प्रवाह वर्षा से सन्तुष्ट हुये चातक की चञ्चलता दूर हो जाती है, वैसे ही शुकदेव जी का चित्त विभिन्न प्रकार के भोगों से उत्पन्न चञ्चलता से मुक्त होकर कैवल्य अवस्था को प्राप्त हुआ। उन शुकदेव जी ने एक बार मेरु पर्वत के निर्जन में स्थित अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन की कुटी में जाकर उनसे भक्तिपूर्वक निवेदन किया—'महामुने ! इस संसार रूप प्रपञ्च की उत्पत्ति किस प्रकार हुई और इसका विलय किस प्रकार होता है, यह क्या है, किसका है, इसकी उत्पत्ति कब हुई, यह सब मुझे कृपापूर्वक कहिये ॥ ११--१५ ॥ एवं पृष्टेन मुनिना व्यासेनाखिलमात्मजे । यथावदखिलं प्रोक्तं वक्तव्यं विदितात्मना ॥१६॥ अज्ञासिषं पूर्वमेवमहमित्यथ तत्पितुः । स शुकः स्वकया बुद्ध्वा न वाक्यं बहु मन्यत ॥१७॥ व्यासोऽपि भगवान् बुद्ध् वा पुत्राभिप्रायमीदृशम् । प्रत्युवाच पुनः पुत्रं नाहं जानामि तत्त्वतः ॥१८॥ जनको नाम भूपालो विद्यते मिथिलापुरे । यथावद्वेत्त्यसौ वेद्यं तस्मात् सर्वमवाप्स्यसि ॥१९॥ पित्रैत्युक्तः शुकः प्रायात् सुमेरोर्वसुधात लम् । विदेहनगरीं प्राप जनकेनाभिपालिताम् ॥२०॥ शुकदेव जी इस प्रकार जिज्ञासा देखकर आत्मज्ञानी मुनि ने सभी बातें यथावत् कहीं। परन्तु शुकदेव जी ने समझा कि यह सब बातें तो मैं पहले से ही जानता हूं और अपने पिता की बातों पर विशेष ध्यान न दिया। उनके इस भाव को व्यास जी ने समझ लिया

६८ ] [ द्वितीय अध्याय

६८ ] [ द्वितीय अध्याय और वे कहने लगे—'पुत्र मैं इन बातों को तत्वपूर्वक नहीं जानता। यदि तुम इस विषय में जिज्ञासा रखते हो तो मिथिला नरेश जनक के पास जाओ। वे इस विषय के पूर्ण ज्ञाता हैं। तुम्हें उनसे इच्छित ज्ञान की उपलब्धि होगी।' पिता के इस कथन पर शुकदेव जी मेरुपर्वत से उतरकर, समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक की मिथिला पुरी में प्रविष्ट हुये ॥ १६-–२० ॥ आवेदितोऽसौ याष्टीकैर्जनकाय महात्मने । द्वारि व्याससुतो राजन् शुकोऽत्र स्थितवानिति ॥२१॥ जिज्ञासार्थं शुकस्यासावास्तामेवेत्यवज्ञया । उक्त्वा बभूव जनकस्तूष्णीं सप्त दिनान्यथ ॥२२॥ ततः प्रवेशयामास जनकः शुकमंगणे । तत्राहानि स सप्तैव तथैवावसदुन्मनाः ॥२३॥ ततः प्रवेशयामास जनकोऽन्तःपुराजिरे । राजा न दृश्यते तावदिति सप्त दिनानि तम् ॥२४॥ तत्रोन्मदाभिः कान्ताभिर्भोजनैर्भोगसंचयैः । जनको लालयायास शुकं शशिनिभाननम् ॥२५॥ ते भोगास्तानि भोज्यानि व्यासपुत्रस्य तन्मनः । नाजुहुर्मन्दपवनो बद्धपीठमिवाचलम् ॥२६॥ केवलं सुसमः स्वच्छो मौनी मुदितमानसः । सम्पूर्ण इव शीतांशुस्तिष्ठदमलः शुकः ॥२७॥ शुकदेव जी को आया देखकर द्वारपालों ने महाराज जनक के पास जाकर निवेदन किया—'श्रीमन् महर्षि व्यासदेव जी के सुपुत्र श्री शुकदेव जी राज-द्वार पर खड़े हैं।' यह सुनकर राजा जनक ने अवज्ञापूर्ण कहा कि 'वे वहीं ठहरे रहें और सात दिन तक उनकी कोई खबर नहीं ली। आठवें दिन उन्हें राज-प्राङ्गण में बुलवा कर फिर सात दिन तक उनसे बात नहीं की। इसके बाद उन्हें अन्तःपुर

महोपनिषद् [ ६६ के आंगन में बुलवाया, परन्तु फिर भी सात दिन तक राजा उनके समाने नहीं आये । इसके पश्चात् बाईसवें दिन उनका युवती नारियां, विभिन्न प्रकार के भोजनों और योग्य वस्तुओं द्वारा महाराज ने सत्कार किया । परन्तु सौम्यवदन शुकदेव जी के मन में उन भोगों के प्रति कोई आकर्षण उत्पन्न नहीं हुआ । जैसे मन्द पवन दृढ़ पर्वत को नहीं डिगा सकता, वैसे ही राजा द्वारा प्रस्तुत कोई भोग साधन शुकदेव जी के मन को नहीं डिगा सकता । वे विकार रहित भाव से युक्त प्रसन्नचित्त, समभाव वाले तथा संग-दोष से रहित निर्मल पूर्णचन्द्र के समान शुभ्र तेज वाले बने रहे ॥२१-२७॥ परिज्ञातस्वभावं तं शुकं स जनको नृपः आनीय मुदितात्मानमवलोक्य ननाम ह ॥२८॥ निःशेषितजगत्कार्यः प्राप्ताखिलमनोरथः । किमीप्सितं तवेत्याह कृतस्वागतमाह तम् ॥२९॥ संसाराडम्बरमिदंकथमभ्युत्थितं गुरो । कथं प्रशममायाति यथावत् कथयाशुमे ॥३०॥ यथावदखिलं प्रोक्तं जनकेन महात्मना । तदेव यत् पुरा प्रोक्तं तस्य पित्रा महाधिया ॥३१॥ स्वयमेव मया पूर्वमभिज्ञातं विशेषतः । एतदेव हि पृष्टेन पित्रा मे समुदाहृतम् ॥३२॥ भवताऽप्येषः एवार्थः कथितो वाग्विदां वर । एष एव हि वाक्यार्थः शास्त्रेषु परिदृश्यते ॥३३॥ मनोविकल्पसंजातं तद्विकल्पपरिक्षयात् । क्षीयते दग्धसंसारो निःसार इति निश्चितः ॥३४॥ तत् किमेतन्महाबाहो सत्यं ब्रूहि ममाचलम् । त्वत्तो विश्रममाप्नोति चेतसा भ्रमता जगत् ॥३५॥

१०० ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [द्वितीय अध्याय महाराज जनक ने इस प्रकार श्री शुकदेव जी की परीक्षा की और जब उन्हें अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण पाया तब उन्हें अपने समीप बुलाकर प्रणाम किया और उनका सौम्य सत्कार करते हुये बोले- आपने अपने सांसारिक विषयों को समाप्त कर दिया है और आप स्वयं ही पूर्ण मनोरथ हैं, कृपया बतलाइये अब आपकी क्या कामना शेष है ? इस पर श्री शुकदेव जी ने जिज्ञासु भाव से निवेदन किया- 'हे गुरु श्रेष्ठ इस सांसारिक प्रपञ्च की उत्पत्ति किस प्रकार होती है और यह कैसे लय को प्राप्त होती है ? इस सम्बन्ध में मुझे यथार्थ बात शीघ्र ही बताने की कृपा करें।' इस पर जो बातें महान आत्मा महाराज जनक ने उन्हें बतलाईं, वे सब बातें उनके पिता परमज्ञानी व्यास जी पहले ही बता चुके थे । अतः शुकदेव जी ने कहा इन सब बातों को मैंने स्वयं जाना था, यही बातें मेरे पिता जी ने भी बतलाईं थीं, और आपने भी यही बातें मुझसे कही हैं और ऐसा ही शास्त्र कहते हैं । मानसिक संकल्प से प्रपंच की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के नष्ट होने पर प्रपंच का भी नाश हो जाता है । यह संसार निन्दनीय एवं सार-रहित है, तब यह क्या वस्तु है ? यही बात मुझे यथार्थ रूप में कहिए । मेरा यह चित्त संसार के विषय में भ्रमित हो रहा है, उसे आपके सदुपदेश द्वारा ही शान्ति प्राप्त हो सकती है ॥२८-३५॥

शृणु तावदिदानीं त्वं कथ्यमानमिदं मया । श्रीशुक ज्ञानविस्तारं बुद्धिसारान्तरान्तरम् ॥ ३६ ॥ यद्विज्ञानात् पुमान् सद्यो जीवन्मुक्तत्वमाप्नुयात् ॥३७॥ दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् । संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृ तिः ॥३८॥ अशेषेण परित्यागो वासनाया य उत्तमः । मोक्ष इत्युच्यते सद्भिः स एक विमलक्रमः ॥३९॥

महोपनिषत् [ १०१ ये शुद्धवासना भूयो न जन्मानर्थभागिनः । ज्ञातज्ञेयास्त उच्यन्ते जीवन्मुक्ता महाधियः ॥४०॥ पदार्थभावनादार्थं बन्ध इत्यभिधीयते । वासनातानवं ब्रह्मन् मोक्ष इत्यभिधीयते ॥४१॥ इस पर राजा जनक बोले—'हे शुकदेव जी ! अब मैं तुम्हारे प्रति ज्ञान को विस्तृत रूप से कहता हूं। यह ज्ञान सभी ज्ञानों का सार और सभी रहस्यों का रहस्य है जो पुरुष इसे जान लेता है, वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त होता है । महाराज ने कहा—'यह ज्ञान प्राप्त होने पर कि यह दृश्य जगत भ्रम है, दृश्य-विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। जब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है, तब निर्वाणमयी शान्ति प्राप्त होती है । त्याग वही परम श्रेष्ठ है जिसमें वासनाओं की पूर्ण समाप्ति की गई हो । यही श्रेष्ठ अवस्था विद्वानों द्वारा मोक्ष कही गई है। जो शुद्ध कामना से युक्त और अनर्थ-शून्य जीवन वाले हैं तथा जो जानने योग्य तत्त्व के ज्ञाता हैं, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहे जाते हैं, हे शुकदेव जी ! पदार्थ-भावना में दृढ़ता ही बन्धन है और वासनाओं के क्षय को ही मोक्ष कहा गया है ।३६-४१। तपःप्रभृतिना यस्मै हेतुनैव विना पुनः । भोगा इव न रोचन्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४२॥ आपतत्सु यथाकालं सुखदुःखेष्वनारतः । न हृष्यति ग्लायति यः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४३॥ हर्षामर्षभयक्रोधकामकार्पण्यदृष्टिभिः । न परामृश्यते योऽन्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४४॥ अहंकारमयीं त्यक्त्वा वासनां लीलयैव यः । तिष्ठति ध्येयसं त्यागी स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४५॥ ईप्सितानीप्सिते न स्तो यस्यान्तर्वर्तिदृष्टिषु । सुषुप्तिवच्चरत्यन्तस्स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४६॥

१०२ ] [ द्वितीब भाग अध्यात्मरतिरासीनः पूर्णः पावनमानसः । प्राप्तानुत्तमविश्रान्तिर्न किंचिदिह वाञ्छति । यो जीवति गतस्नेहः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४७॥ संवेद्येन हृदाकाशे मनागपि न लिप्यते । यस्यासावजडा संवित् स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४८॥ रागद्वेषौ सुखं दुःखं धर्माधमौ फलाफले । यः करोत्यनपेक्ष्यैव स जीवन्मुक्त उच्यते ॥४९॥ मौनवान् निरहंभावो निर्मानो मुक्तमत्सरः । यः करोति गतोद्वेगः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५०॥ सर्वत्र विगत स्नेहो यः साक्षिबदवस्थितः । निरीच्छो वर्तते कार्ये जीवन्मुक्त उच्यते ॥५१॥ येन धर्ममधमं च मनोमननमूहितम् । सर्वमन्तः परित्यक्तं स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५२॥ यावती दृश्यकलना सकलेयं विलोक्यते । स येन सुष्ठु संत्यक्ता स जीवन्मुता उच्यते ॥५३॥ कट्वम्ललवणं तिक्तममृष्टं मृष्टमेव च । सममेव च यो भुङ्क्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५४॥ जरा मरणमापच्च राज्यं दारिद्य्रमेव वा । रम्यमित्येव यो भुङ्क्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५५॥ धर्माधमौ सुखं दुःख तथा मरणजन्मनी । धिया येन सुसंत्यक्तं स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५६॥ उद्वेगानन्दरहितः समया स्वच्छया धिया । न शोचते न चोदेति स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५७॥ सर्वेच्छाः सकलाः शंकाः सर्वेहाः सर्वनिश्चयाः । धिया येन परित्यक्ताः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५८॥ जन्मस्थितिविनाशेषु सोदयास्तमयेषु च ।

महोपनिषत् ] [ १०३ सममेव मनो यस्य स जीवन्मुक्त उच्यते ॥५९॥ न किंचन द्वेष्टि तथा न किंचिदपि काङ्क्षति । भुङ्क्तेयः प्रकृतान् भोगान् स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६०॥ शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः । यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६१॥ यः समस्तार्थ जालेषु व्यवहार्यपि निस्पृहः । परार्थेष्विव पूर्णात्मा स जीवन्मुक्त उच्यते ॥६२॥ जीवन्मुक्त वही है जो तप आदि साधनों के बिना, स्वभाव से ही सांसारिक भोगों से विरक्त है । समय-समय पर मिलने वाले सुख अथवा दुःख में जो आसक्त नहीं होता तथा जो सुख से हर्षित अथवा दुःख से दुःखित नहीं होता, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है । ऐसा पुरुष काम, क्रोध, हर्ष, उद्वेग, शोक आदि विकारों से मुक्त रहता है और अहंकारयुक्त वासना को स्वभाव से ही त्याग देता है । चित्त के अवलम्बन में जो सदा त्याग-भाव रखता है, वही जीवन्मुक्त है । जो सदा अन्तर्मुखी दृष्टि वाला, पदार्थ-आकांक्षा से रहित, किसी वस्तु की कामना या उपेक्षा से शून्य सुषुप्ति के समान अवस्था में स्थित रहने वाला है, वह जीवन्मुक्त है । जो पूर्ण पवित्र मन वाला, सदा आत्मा में लीन रहने वाला, अत्यन्त शांत अवस्था में रहने वाला, कामना और आसक्ति से रहित सदा उदासीन रहता, वह जीवन्मुक्त है । जिसका हृदय किसी पदार्थ में लिप्त नहीं रहता और चेतन संवित् स्वरूप वाला है, वह जीवन्मुक्त है । जो किसी कार्य में फलाफल की अपेक्षा नहीं करता तथा जो राग-द्वेष से रहित, सुख-दुःख से निरपेक्ष, और धर्माधर्म में निर्लिप्त है वह जीवन्मुक्त है । जिसने अहंकार के भाव का परित्याग कर दिया है, जो मान-मत्सर के विकार से मुक्त हो गया है, जो उद्वेग-रहित होकर कर्म में रत हैं, उसे ही ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं। जो मोह रहित रहकर साक्षी के समान जीवन व्यतीत करता है और बिना किसी Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१०४ ] [ द्वितीय अध्याय

१०४ ] [ द्वितीय अध्याय फल की कामना किये कर्म में लगा रहता है. वह पुरुष जीवन्मुक्त ही है। जिसने धर्माधर्म और सभी कामनाओं तथा सांसारिक विषयों के चिन्तन का त्याग कर दिया है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं । जिसने इस दिखाई पड़ने वाले विश्वरूप प्रपंच का भले प्रकार त्याग कर दिया है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो पुरुष, खट्टे, चरपरे, कडुवे, मीठे, नमकीन आदि पदार्थों को स्वाद की चिन्ता किये बिना अर्थात् स्वादिष्ट और स्वाद रहित तथा खराब स्वाद वाले पदार्थों को एक समान मानकर भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त है । जो वृद्धावस्था, मृत्यु विपत्ति, ऐश्वर्य-भोग एवं दारिद्रय में समभाव रखता हुआ सब स्थितियों में संतुष्ट रहता है, वह जीवन्मुक्त है। धर्माधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म मरण में हर्ष विषाद न करने वाला पुरुष जीवन्मुक्त है। जो उद्वेग और आनन्द से रहित, शोक अथवा हर्षोत्साह से ममत्व एवं स्वच्छ बुद्धि वाला है, वह जीवन्मुक्त है। सभी इच्छाओं, शंकाओं, कामनाओं और निश्चयों को जिसने पूर्णतः त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त है । उत्पत्ति, स्थिति और विलीनावस्था में तथा उन्नति-अवनति में जो समान मन वाला है. वह जीवन्मुक्त है। जो केवल प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला आकां- क्षाओं में रहित तथा किसी के प्रति द्वेष-ईर्ष्या नहीं करता. वह जीवन्मुक्त है। जो कलायुक्त होते हुये भी कला-रहित रहता है, चित्त के रहते हुये भी जो चित्त रहित बना हुआ है तथा जिसने सांसारिक विषयों का चिन्तन छोड़ दिया है, वह जीवन्मुक्त है । विश्व के सभी अर्थ-जालों के मध्य स्थिर होकर भी उसने पराये धन से निस्पृह रहने वाले धर्मात्मा के समान जो पुरुष निस्पृह रहता है, वह आत्मा में ही पूर्णता का अनु- भव करने वाला महात्मा जीवन्मुक्त हैं ॥४२-६२॥ जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते । विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥६३॥ विदेहमुक्तो नोदेति नास्तमेति न शाम्यति ।