भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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भूमिका

स विश्ववन्द्यो महतां कवीनां गुरुर्मनीषी कविकालिदासः।
यत्काव्य-पीयूष रस-प्रवाह-स्वादान्मितानन्दमयो हि लोकः ॥

कविकलाधर कविवर कालिदास भारतीय साहित्य की सर्वश्रेष्ठ विभूति हैं तथा प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रतिनिधि कवि हैं। इनकी कृतियों में हमारी संस्कृति के प्राणतत्त्व सुरक्षित हैं। वस्तुतः भारतीय दार्शनिक मनीषियों ने सत्यं शिवं सुन्दरं के अनुसन्धान में जो बहुमूल्य मणिरत्न प्राप्त किये हैं वे सभी कालिदास की रचनाओं में सन्निविष्ट हैं। भारतीय संस्कृति ने जिन मूल्यों को अपनी साधना एवं अनुभव के आलोक में प्रतिष्ठित किया है उनकी मञ्जुल व्यञ्जना इनके काव्यों में रक्षित है।

संस्कृत साहित्य से परिचित कौन-सा ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने इसका नाम न सुना हो। जिस कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक ने उनकी कीर्तिकौमुदी को विश्वव्यापी एवं अमर बना दिया है और जिनकी कविताकामिनी की माधुरी पर मुग्ध होकर विदेशी विद्वान् भी आश्चर्यचकित हैं, उस कालिदास का नाम कौन नहीं जानता है।

कालिदास की महत्ता

न केवल भारतवर्ष में ही अपितु सारे संसार के सर्वश्रेष्ठ कवियों में कालिदास का सर्वोच्च एवं प्रमुख स्थान माना गया है। विश्व की किसी भी भाषा का कोई भी कवि अभी तक कालिदास की बराबरी नहीं कर पाया है।

इनके अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की नाट्यकला पर मुग्ध होकर एक जर्मन आलोचक ने ठीक ही कहा है कि “अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयर की तुलना कालिदास से करना अपनी अज्ञता का परिचय देना है, क्योंकि यदि शेक्सपीयर के सारे नाटक एक तरफ रख दिये जाँय और कालिदास का एक ही नाटक अभिज्ञानशाकुन्तल दूसरे तरफ रख दिया जाय तब भी शेक्सपीयर के सारे नाटक कालिदास के एक नाटक अभिज्ञानशाकुन्तल की बराबरी नहीं कर सकते हैं।” जर्मन भाषा में शकुन्तला का अनुवाद देखकर महाकवि गोटे ने आनन्दविभोर होकर इसकी प्रशंसा करते हुए कहा है कि यदि स्वर्ग एवं मर्त्यलोक को एक ही स्थान पर देखना हो तो शकुन्तला को देखो।

इनकी सर्वातिशायिनी अद्भुत विलक्षण प्रतिभा ने सारे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया है। आपके काव्यों में नाट्यकला की सुन्दरता, महाकाव्य की वर्णनशैली, गीतिकाव्य के सरस हृदयोद्गार को पढ़कर किस सहृदय का हृदय गद्गद नहीं हो उठता है। काव्य, नाटक, गीति जिस दिशा में देखा जाय उसी दिशा में इनकी अद्भुत प्रतिभा ने एक नयी कल्पना को प्रश्रय देकर संस्कृत साहित्य के स्तर को ऊँचा कर दिया है। इनके काव्यों में सरलता, प्रसादगुणसम्पन्नता, उपदेशप्रदता, धार्मिकता एवं भारतीयता का भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। इसीलिए संस्कृत साहित्य में इनकी बहुत बड़ी प्रतिष्ठा है।

यद्यपि संस्कृत साहित्य के काव्यसंसार में माघ, भारवि, श्रीहर्ष, सुबन्धु, दण्डी, बाणभट्ट, भास, भवभूति आदि बहुत से विद्वान हुए हैं, जिनकी कीर्तिकौमुदी दिग्-दिगन्तर में

( २ )

व्यास हैं एवं जिनकी विलक्षणा कविता प्रलयपर्यन्त सहृदयों के सरस हृदय को नवीन ज्योति प्रदान करती रहेगी तथापि इनमें जैसी अद्भुत कल्पना की छटा तथा काव्यकला दीख पड़ती है वैसी अन्य कवियों में नहीं। कालिदास के ग्रन्थों को देखकर निःसंकोच कहना पड़ता है कि ये सभी कवियों में शिरोमणि हैं। इनकी कविता की प्रशंसा करते हुए एक आलोचक ने ठीक ही कहा है—

महिषं दधि सशर्करं पयः कालिदासकविता नवं वयः । शारदेन्दुरबला च कोमला स्वर्गशेषमुपभुञ्जते जनाः ॥

सोढ्ढल कवि ने अवन्तिसुन्दरी कथा में कहा है कि धन्य है कालिदास जिनकी कीर्ति कविता के समान दोष रहित अमृत तुल्य और मधुर है। इनकी वाणी जैसे सूर्य वंश का वर्णन कर सकी है वैसे ही उनकी कीर्ति भी समुद्र के पार पहुँच चुकी है—

ख्यातः कृती सोऽपि च कालिदासः शुद्धा सुधा स्वादुमती च यस्य । वाणीमिषाखण्डमरीचिगोत्र सिन्धोः परं पारमवाप कीर्तिः ॥

महाकवि बाणभट्ट ने (जिनके विषय में कहा जाता है कि “बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्”) अपने हर्षचरित में कालिदास की कविता पर इस प्रकार सद्भावना व्यक्त की है—

निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु । प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥

संस्कृत साहित्य में कालिदास के काव्यों में रस, माधुर्य, कोमलभाव और साभिप्राय वर्णन अद्वितीय है। इनकी अद्वितीयता के सम्बन्ध में किसी मर्मज्ञ आलोचक ने बड़े ही सुन्दर कल्पना की है।

पुरा कवीनां गणनाप्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः । अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावादनामिका सार्थवती बभूव ॥

किसी समय जब श्रेष्ठ कवियों की गणना होने लगी तब सबसे पहले कालिदास को सर्वप्रथम स्थान देकर उनका नाम कनिष्ठ अंगुलि पर रखा गया। बाद यह विचार उपस्थित हुआ कि द्वितीय स्थान किस कवि को दिया जाय ? पर कालिदास जैसे विलक्षण प्रतिभा-सम्पन्न कवि के न रहने के कारण दूसरी अङ्गुली अनामिका पर किसी कवि का नाम पड़ा-ही नहीं। इसलिए अमानिका (जिस पर किसी का नाम न पड़े) का नाम सार्थक हो गया। अर्थात् यह बिना नाम की ही रह गयी। गणना की सर्वानुभूत पद्धति यह है कि कुछ गिनते समय सबसे पहले कनिष्ठ (छोटा) अङ्गुली पर ही अङ्गुष्ठ को रखते हैं। बाद अनामिका, मध्यमा तथा तर्जनी पर।

विश्वविख्यात गीतिकाव्य के रचयिता पीयूषवर्षी कवि जयदेव ने तो कालिदास को कविताकामिनी का विलास मानते हुए इन्हें कविकुलगुरू की उपाधि से विभूषित किया है।

कालिदास की कमनीयकलेवर कविता विश्व के किस सहृदय हृदय को आनन्दमग्न नहीं कर देती ? महाकवि कालिदास हमारे राष्ट्रीय कवि थे तथा भारतीय संस्कृति के प्रमुख परिपोषक थे। भारत की संस्कृति इनकी काव्यवाणी में बोलती है और इनके नाटकों में अपना मनोरम रूप दिखाकर मानवमात्र के हृदय का मनोरञ्जन करती है। कालिदास ने अपने काव्य चमत्कार से समस्त संसार में ख्याति प्राप्त की है। इनके काव्यों में पदलालित्य, रचनाचातुर्य, कल्पनाशक्ति, प्रकृतिवर्णन, एवं चरित्र-चित्रण पढ़कर विश्व का प्रत्येक

( ३ )

पाठक प्रफुल्ल हो उठता है, इनमें विचारगाम्भीर्य है, संसार का अनुभव है, बहुमूल्य सिद्धान्त हैं, इनके पदों से उपदेश भी मिलता है और इनकी उक्तियाँ आज भी हमारा पथप्रदर्शन करती हैं। इनकी कविता में प्रसाद गुण की अगाधता, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, कोमलकान्तपदावली का प्राचुर्य, उपमा को अपूर्वता, अलङ्कारों की रमणीयता, छन्दों की छटा और भावसौष्ठव पर्याप्तमात्रा में विद्यमान है। इनके काव्यों को जिस दृष्टि से देखा जाय उसी से काव्यकला की कमनीयता प्रगट होती है। इनकी कविता में सरस, सरल, सुबोध तथा सुन्दर शब्द एवं भावों का साम्राज्य, सहृदयों की तो बात हो क्या है, साधारण मनुष्यों के मन को भी मुग्ध कर देता है। व्यंग्यार्थप्रतिपादन की विलक्षण शैली, रसप्रकर्ष का प्रकाशन, विस्तृत विषय का थोड़े में वर्णन, वर्ण्य विषय को सुन्दर क्रम में रखकर रोचक बनाना, स्वाभाविक भाव के द्वारा लोकोत्तरानन्दप्रदान का ढंग आदि कालिदास की कविता के विशेष गुण हैं।

कालिदास संस्कृत साहित्य के अद्वितीय महाकवि हैं। इनकी कविता की मधुरिमा के सामने अन्य कवियों की कविता फीकी पड़ जाती है। आपने जैसा मानवहृदय के सूक्ष्म भावों का निरीक्षण किया है वैसा अन्य कवियों ने नहीं। कालिदास अन्तर तथा बाह्य दोनों जगत् के सूक्ष्म निरीक्षक महाकवि हैं।

कालिदास का जीवनवृत्त

कालिदास ने अपने जीवन के सम्बन्ध में अपने ग्रन्थों में कहीं भी कुछ नहीं लिखा है। किन्तु प्राचीन विचार परम्परा के अनुयायी विद्वत्समाज में यह किम्बदन्ती प्रसिद्ध है कि कालिदास उज्जयिनी के राजा महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में एक महारत्न थे। ये ब्राह्मण बालक हैं। जब पांच-छ मास के थे तब मां बाप चल बसे और बालक अनाथ हो गया। संयोगवश उस पर एक ग्वाले की दृष्टि पड़ी वह उस मातृपितृविहीन बालक को अपने घर ले जाकर पाल पोसकर बढ़ाया। बचपन में इन्होंने कुछ भी नहीं पढ़ा-लिखा था। एक स्त्री के कारण इन्होंने अनमोल विद्यारत्न प्राप्त हुआ। इसकी कथा इस प्रकार प्रसिद्ध है—महाराज सदानन्द की पुत्री विद्योत्तमा बड़ी विदुषी और सुन्दरी थी। उसको अपनी विद्या का बहुत बड़ा गर्व था। उसने यह प्रतिज्ञा की थी कि शास्त्रार्थ में मुझे जो हरा देगा उसी से मैं अपना विवाह करूँगी। उस राजकुमारी के रूप, यौवन और विद्या की प्रशंसा सुनकर दूर दूर से विद्वान् आते थे पर शास्त्रार्थ में उससे पराजित होकर चले जाते थे। जब विद्वानों ने देखा कि यह राजकुमारी किसी प्रकार भी वश में नहीं आती है, सबको हरा देती है। तब उसकी विद्वत्ता से लज्जित होकर सभी ने राय की कि किसी ढंग से इसका विवाह ऐसे महामूर्ख से साथ करा दिया जाय जिससे यह जीवन भर अपने अहंकार पर पश्चात्ताप करती रहे। परिणामस्वरूप वे लोग एक मूर्ख की खोज से पड़ गये। एक दिन कहीं रास्ते में जाते हुए देखा कि भेड़ चरानेवाला एक आदमी पेड़ के ऊपर जिस डाल पर बैठा है उसी को जड़ से काट रहा है। विद्वानों ने उसे देखकर समझा कि बहुत बड़ा मूर्ख है, इसी से विद्योत्तमा का विवाह हो जाय तो अच्छा है। बाद बड़े प्रेम से उसे नीचे बुलाया और कहा कि चलो हम लोग तुम्हारा विवाह एक राजकुमारी के साथ करा देंगे। पर देखना राजसभा में मुँह से कुछ भी नहीं बोलना जो कुछ कहना वह इशारे से कहना। लो यह धोती चादर, जामा और पगड़ी पहन लो पण्डित बन कर हम लोगों के साथ चलो

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तो तुम्हारा विवाह जरूर कर दिया जायेगा। इस प्रकार पण्डितों की बात पर विश्वास कर वह मूर्ख पण्डित बनकर राजसभा में पहुँच गया। पहले से ही उपस्थित विद्वानों ने उसका खूब सत्कार किया और उसे सबसे ऊँचा आसन पर बैठा दिया। बाद में विद्योत्तमा से कहा कि ये बृहस्पति के समान काशी के दिग्गज विद्वान् हैं। आपके साथ शास्त्रार्थ करने के लिए आये हुए हैं। किन्तु इस समय ये तपस्या करने के कारण मौन व्रत लिये हुए हैं। शास्त्रार्थ में आपको जो कुछ कहना हो संकेत से कहिये। यह सुनकर राजकुमारी ने अपने मन से यह सोचकर कि ईश्वर एक है एक अंगुली उठाई। इधर मूर्ख ने समझा कि यह अंगुली दिखाकर मेरी एक आँख फोड़ने का संकेत कर रही है। इसलिए उसकी दोनों आँखों को फोड़ने के अभिप्राय से अपनी दो अंगुलियों को उठाया। इस पर विद्योत्तमा के विरोधी उपस्थित विद्वानों ने इसका यह अर्थ लगाया कि ये यह सङ्केत कर रहे हैं कि आत्मा एक नहीं है, किन्तु दो हैं, एक जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा। विद्वानों के इस कुचक्र के परिणाम स्वरूप उस राजकुमारी को उससे हार मानकर पूर्व में की हुई प्रतिज्ञा के अनुसार अपना विवाह उस महामूर्ख ब्राह्मणकुमार के साथ कर लेना पड़ा।

रात के समय एकान्त में जब दोनों का मिलन हुआ तब तक किसी तरफ से एक ऊँट चिल्ला उठा। राजकुमारी ने पूछा कि कौन शोर मचा रहा है? इस पर उस मूर्ख ने उत्तर दिया कि 'उष्ट्र चिल्लाता है'। राजकुमारी ने चौंककर फिर पूछा कि कैसा शोर है ? तब वह उष्ट्र के बदले 'उट्र बोलता है' ऐसा कहने लगा। क्योंकि वह जन्म से महामूर्ख था उष्ट्र का शुद्ध उच्चारण कैसे कर सकता था। बाद विद्योत्तमा को पण्डितों की धूर्तता का पता चल गया, इस पर वह पश्चात्ताप करती हुई फूट-फूट कर रोने लगीं। बाद अत्यन्त दुखो होकर उस मूर्ख को घर से बाहर निकाल दिया और कहा कि यदि तुम विद्वान् होकर आओगे तो मेरे साथ तुम्हारा सम्बन्ध हो सकता है, अन्यथा नहीं। इस प्रकार भर्त्सना देकर विद्योपार्जन के लिए अनुप्रेरित किया। इधर वह मूर्ख भी इस व्यवहार से बड़ा ही लज्जित हुआ, पहले तो सोचा कि अपना प्राण दे दूँ फिर सोच-समझकर विद्योपार्जन में परिश्रम करने लगा। भगवती काली की उसने बड़ी उपासना की, फलस्वरूप देवी की कृपा से थोड़े दिनों से वह एक ऐसा प्रभावशाली विलक्षण विद्वान् हो गया कि जिसका नाम संस्कृत साहित्य तथा विश्व के इतिहास में अजर-अमर हो गया। सच है सच्ची लगन से क्या नहीं हो सकता है। ये ही हैं हमारे चरितनायक कविवर कालिदास जो उपासना द्वारा भगवती काली की कृपा से भव प्रतिभासम्पन्न महाकवि कालिदास के नाम से नाम से प्रसिद्ध हो गये।

जब वे कवि होकर अपने घर राजकन्या के पास लौटे तब घर का दरवाजा बन्द था। उसे खोलवाने के अभिप्राय से इन्होंने संस्कृत में कहा कि “अनावृतकपाटं द्वारं देहि” तब विदुषी पत्नी ने प्रश्न किया कि “अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः ?” (आपकी वाणी में कुछ विशेषता आई ?) कालिदास की वाणी देवी के प्रसाद से निर्मल हो चुकी थी। इसलिए कवि ने अपनी पत्नी विद्योत्तमा के प्रश्नभूत वाक्य के अन्दर वर्तमान अस्ति—कश्चित् और वाग् इन तीन शब्दों से आरम्भ करके तीन काव्य बना डाले।

अस्ति शब्द से आरम्भ करके—अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा।
(कुमारसम्भव महाकाव्य)

कश्चित् शब्द से आरम्भ करके—कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा।
(मेघदूत खण्डकाव्य)

( ५ )

वाग् शब्द से आरम्भ करके—वागर्थाविव संपृक्तौ
( रघुवंश महाकाव्य )

बाद विद्योत्तमा को इस प्रकार पति को एक प्रतिभासम्पन्न महाकवि के रूप में पाकर जैसा आनन्द का अनुभव हुआ होगा वह लिखने के बाहर है। सुन्दरी नारी मनुष्य के जीवन प्रवाह में मोड़ देकर सुधार सकती है। इसमें कोई सन्देह नहीं। तुलसीदास नारी की भर्त्सना से ही भक्तशिरोमणि बन गये।

इसी प्रकार कालिदास और विक्रमादित्य तथा कालिदास और भोज के सम्बन्ध में भी कई किम्वदन्तियाँ विद्वत्समाज में प्रसिद्ध हैं जिन्हें यहाँ लिखकर भूमिका का कलेवर बढ़ाना उचित नहीं।

कालिदास कब हुए, कहाँ हुए किस वंश में हुए और उन्होंने कितने ग्रन्थ बनाये इत्यादि प्रश्नों का अभी तक ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो पाया है। क्योंकि उन्होंने अपने सम्बन्ध में अपने ग्रन्थों के अन्दर कहीं कुछ भी नहीं लिखा है। फिर भी विद्वानों ने उनके ग्रन्थों के आधार पर अब तक जो कल्पनाएँ की हैं उसी के आधार पर बराबर ही विचार होता आ रहा है।

कालिदास के ग्रन्थ

किस कालिदास ने कौन से ग्रन्थ बनाये हैं? इसका निर्णय करना एक प्रकार से असम्भव-सा है, फिर भी अधिक आलोचकों तथा विद्वानों के मत में उज्जयिनी नरेश महाराजा विक्रमादित्य की अभिरूपभूयिष्ठा सभा को अलंकृत करने वाले कालिदास के ८ ग्रन्थ माने जाते हैं। दो महाकाव्य-एक कुमारसम्भव, दूसरा रघुवंश, एक खण्डकाव्य-मेघदूत, दो स्फुट काव्य-ऋतुसंहार और श्रृंगारतिलक और तीन नाटक—१—अभिज्ञानशाकुन्तल, २—मालविकाग्निमित्र, ३—विक्रमोर्वशीय। कुछ लोग नलोदय और श्रुतबोध को भी इन्हीं की कृति मानते हैं।

राजसभा में रहते समय कालिदास ने अपनी प्रतिभा तथा समस्यापूर्ति से बड़े बड़े विद्वानों एवं अपने आश्रयदाता विक्रमादित्य को भी अनेकों बार चकित कर दिया था।

कालिदास के ग्रन्थों के अध्ययन से मालूम पड़ता है कि ये बड़े विनोदी थे। इनके सभी ग्रन्थों में शृङ्गार रस की प्रधानता है। इसलिए राजशेखर ने कहा है—शृंगार रस के वर्णन में और मधुर शैली में एक कालिदास की बराबरी करने वाला आज तक कोई नहीं हुआ, फिर तीन कालिदास को भिन्न भिन्न विषयों में परास्त करने वाला कहाँ मिलेगा।

एको न जीयते हन्त कालिदासो न केनचित् ।
शृंगारे ललितोद्गारे कालिदासत्रयी नु किम् ॥

विद्वानों की परम्परा में अनेक कालिदास होने की बात प्रसिद्ध है। दशम शताब्दी में वर्तमान राजशेखर कवि ने अपनी काव्यमीमांसा के उक्त छन्द में तीन कालिदासों का स्पष्ट उल्लेख किया है।

इसके अतिरिक्त एकादश शताब्दी में राजा भोज के दरबार में भी एक कालिदास थे, इसका पता वल्लाल कविप्रणीत भोजप्रबन्ध से लगता है।

अनेक कालिदासों को देखकर कुछ आलोचकों ने यह भी माना है कि जैसे आद्य स्वामी शंकराचार्य की परम्परा पर चलने वाले आगे के संन्यासियों को शंकराचार्य कह दिया जाता

( ६ )

है वैसे ही आदि कालिदास के समान कविता करने वाले कवि को भी कालिदास कहने लग गये थे । इसीलिए संस्कृत में अनेक कालिदासों की उपलब्धि विभिन्न समयों में होती है । जो कुछ हो विद्वान् लोग इस कल्पना को स्वयं समझ लें ।

कालिदास की प्रसिद्धि का कारण

अन्य ग्रन्थों के रहते हुए भी प्राच्य और पाश्चात्त्य देशों में कालिदास की इतनी महती प्रतिष्ठा का कारण उनका अभिज्ञानशाकुन्तल है । जब कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफजस्टिस सर विलियम जोन्स ने शकुन्तला का अंग्रेजी में अनुवाद किया । तब उसे पढ़कर पाश्चात्त्य विद्वानों की आँखें खुलीं और कालिदास की कवि-कल्पना पर मुग्ध होकर उन्होंने बड़े हर्ष के साथ कालिदास को “भारतीय शेक्सपीयर” की उपाधि से विभूषित किया । और संस्कृत की तरफ उनकी रुचि बढ़ी यहाँ तक कि वेदों तक भी छान-बीन शुरू हो गयी ।

देखिए—पाश्चात्त्य विद्वानों की कैसी श्लाघनीय गुणग्राहिता है ? इसी से वे इतनी शीघ्रता से अपनी इतनी उन्नति कर गये हैं । एक तरफ पाश्चात्त्य विद्वान् हैं जिन्होंने अपने देश के कवियों की तो बात ही क्या है कहीं के भी विद्वानों के गुण प्रकाश करने के लिए सदा उद्यत रहते हैं । दूसरे तरफ भारतीय विद्वान् हैं जिन्हें इस दिशा में थोड़ी भी अभिरुचि नहीं है । खेद का विषय है कि पाश्चात्त्य अनुकरण करने में प्रवीण भारतीय विद्वानों में भी विशेष अभिरुचि नहीं । कालिदास ही क्या महाराजाधिराज विक्रमादित्य भोज, भास, भारवि, माघ, श्रीहर्ष, बाणभट्ट और प्रातःस्मरणीय स्वामी शङ्कराचार्य आदि विद्वानों का वास्तविक स्वरूप ही भारतीय विद्वानों ने अभी तक नहीं समझा है । पाश्चात्त्य विद्वान् इनका जो कुछ मूल्यांकन कर देते हैं उन्हीं के बल पर ये भी कुछ कहने लग जाते हैं । जहाँ विदेशों में एक शेक्सपीयर की कृतियों की आलोचना की असंख्य पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं और बराबर लिखी भी जा रही हैं वहां भारतीय विद्वान मौनावलम्बन में मस्त हैं । यह बड़े खेद का विषय है ।

कालिदास की जन्मभूमि

इसी प्रकार कालिदास की जन्मभूमि तथा समय के सम्बन्ध में भी विद्वानों का बहुत बड़ा मतभेद है । वंगदेशीय विद्वान् इन्हें बंगाली मानते हैं और नवद्वीप को इनकी जन्मभूमि बतलाते हैं । बहुत विद्वान् कहते हैं कि इनकी जन्मभूमि कश्मीर है, क्योंकि इन्होंने हिमालय का जैसा सुन्दर वर्णन किया है वैसा दूसरे का नहीं । कुछ लोग इन्हें पंजाबी, कुछ लोग मालवीय मानते हैं । किन्तु विशिष्ट विद्वान् इन्हें उज्जयिनीनिवासी कहते हैं, क्योंकि इन्होंने अपने काव्यों में उज्जयिनी के लिये विशेष पक्षपात दिखलाया है जिससे इनकी जन्मभूमि उज्जयिनी मालूम पड़ती है ।

इनके मेघदूत में कान्ताविरही यक्ष रामगिरि से सीधे उत्तर अलकापुरी जाने वाले मेघ के लिए रास्ता टेढ़ा होने पर भी सकलसम्पत्सम्पन्न उज्जयिनी को देखने के लिए मेघ से आग्रह करते हुए कहा है कि यदि तुम उज्जयिनी के विशाल महलों और मृगाक्षी रमणियों के कुटिल कटाक्षों को देखने से वञ्चित रह गये, तो तुम्हारा जीवन ही निष्फल है ।

वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां
सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मास्मभूरुज्जयिन्याः ।
विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां
लोलापाङ्गैः यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोऽसि ॥ ( पूर्वमेघ २९ )

( ७ )

मेघदूत में कालिदास ने उज्जयिनी प्रदेश की भौगोलिक स्थिति का जैसा सूक्ष्म वर्णन करते हुए छोटी से छोटी नदियों का भी नाम निर्देश किया है और उनका जमकर वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं।

इस प्रकार उज्जयिनी के प्रति विशेष पक्षपात पूर्ण वर्णन तथा भौगोलिक परिचय के आधार पर यही कहा जा सकता है कि कालिदास उज्जयिनी के ही निवासी थे । पर्वतों में हिमालय, नगरियों में उज्जयिनी, देवताओं में शिव, अलंकारों में उपमा और छन्दों में मन्दाक्रान्ता कालिदास को परमप्रिय थे। इनका भौगोलिक ज्ञान बहुत ही समुन्नत है जिसका पता मेघदूत, रघुवंश में रघु का दिग्विजय और इन्दुमती के स्वयम्बर में देश देश के राजाओं के वर्णन से स्पष्ट मालूम पड़ता है। कुमारसम्भव, मेघदूत और शकुन्तला के वर्णन से स्पष्ट है कि इन्हें हिमालय तथा उत्तर भारत जितना प्रिय था उतना विन्ध्य तथा दक्षिण भारत नहीं।

कालिदास का समय

कालिदास के समय के सम्बन्ध में प्राच्य और पाश्चात्त्य विद्वानों में बहुत बड़ा मतभेद है। विभिन्न विद्वानों ने आन्तरिक प्रमाणों के आधार पर कालिदास की सत्ता ई० पू० प्रथम से लेकर छठी शताब्दी तक मानी है। इस सम्बन्ध में प्रधान रूप से दो मत हैं। एक प्राचीन और दूसरा अर्वाचीन। प्राचीन मत के पोषक संस्कृत के भारतीय विद्वान् हैं और अर्वाचीन मत के अनुयायी अंग्रेजी के पाश्चात्त्य विद्वान् तथा उनका अनुकरण करनेवाले कुछ भारतीय विद्वान् हैं।

धन्वन्तरि-क्षपणकामरसिंह-शङ्कु-
बेतालभट्ट-घट-खर्पर-कालिदासाः ।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां
रत्नानि वै वररुचिर्नवविक्रमस्य ॥

इस 'ज्योतिर्विदाभरण' जनश्रुति के आधार पर भारतीय संस्कृत के विद्वान् मानते हैं कि कविवर कालिदास विद्वत्प्रिय विक्रमसंवत् के प्रवर्तक उज्जयिनी के राजा महाराजाधिराज वीर विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से एक प्रमुख रत्न थे जिनके बिना महाराज को एक क्षण भी अच्छा नहीं लगता था। इनकी अद्भुत कवि कल्पना पर महाराज सदा मुग्ध रहते थे। कालिदास के ग्रन्थों से भी विक्रमादित्य के दरबार में रहने का संकेत मिलता है। शकुन्तला की प्रस्तावना में विक्रम की अभिरूपभूयिष्ठा परिषद् में विश्व-विख्यात शकुन्तला नाटक का अभिनय करने का संकेत है। विक्रमोर्वशीय नाटक में यद्यपि राजा पुरूरवा नायक है तथापि विक्रम का स्पष्ट नामोल्लेख है। "अनुत्सेकः खलु विक्रमालङ्कारः" इत्यादि वचनों से भी इसकी पुष्टि होती है कि कालिदास का विक्रम से सम्बन्ध अवश्य था। रामचन्द्र महाकाव्य में तो स्पष्ट उल्लेख है कि शकाराति वीर विक्रमादित्य ने कालिदास की बहुत बड़ी ख्याति की थी। देखिए—ख्यातिं कामपि कालिदासकवयो नीताः शकारातिना और सुभाषित में तो कहा गया है कि—

वाल्मीकिप्रभवेण रामनृपतिर्व्यासेन धर्मात्मजः ।
व्याख्यातः किल कालिदास श्रीविक्रमार्को नृपः ॥

इसलिए जब तक परम्परागत इन जनश्रुतियों के खण्डन करने के लिए इसके विरुद्ध

( ८ )

कोई प्रबल प्रमाण नहीं मिलता तब तक “नह्ममूला जनश्रुतिः” के आधार पर यह मानना सर्वथा न्यायसंगत है कि महाकवि कालिदास विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों ने एक महारत्न थे । पाश्चात्त्य विद्वानों में से केवल सर विलियम जोन्स महोदय ने भारतीय प्राचीन मत को ही प्रमाणित माना है । और अंग्रेजी में शकुन्तला का अनुवाद किया है ।

कालिदास के समय के सम्बन्ध में विभिन्न मत

हमारा संस्कृत साहित्य विश्वसाहित्य में सर्वसम्पन्न और अगाध है । वेद वेदाङ्ग, ब्राह्मण वाङ्मय, उपनिषद्, धर्मशास्त्र, काव्य, नाटक विविध विषयों के अनेकों ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं और अनेकों हस्तलिखित रूप वर्तमान हैं । इसके अतिरिक्त अनेकों ग्रन्थ अकाल में ही काल कवलित हो चुके हैं । आदि काल से ही अनेक विद्वान् लेखकों ने अपना बुद्धि वैभव व्यय करके इस विशाल ग्रन्थ भण्डार को भरा है, परन्तु ऐतिहासिक ग्रन्थों की कमी के कारण उन लेखकों का पूर्णपरिचय नहीं प्राप्त होता है । बाण, विल्हण, राजशेखर आदि कवियों ने अपने ग्रन्थों में अपने वंश, पाण्डित्य और आश्रयदाताओं के थोड़ा बहुत उल्लेख अवश्य किया है । पर उससे आधुनिक युग के पुरातत्त्व प्रेमी पाठकों को सन्तोष नहीं होता । फिर भी जिन्होंने अपने विषय में एक अक्षर तक नहीं लिखा है उनकी अपेक्षा इनका दिया हुआ अल्प परिचय भी ऐतिहासिक आधार के लिए सहायक ही है ।

देखिए विश्व के प्रायः समस्त प्राचीन और अर्वाचीन देशी एवं विदेशी विद्वानों ने सरस्वती के वरदपुत्र कविवर कालिदास की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है और इनको कविकुल-गुरु की उपाधि से सम्मानित कर संस्कृत के कवियों में सर्वोच्च स्थान दिया है, किन्तु इनके वंश, जन्म, चरित, स्वभाव, योग्यता आदि के बारे में जानने लायक विश्वसनीय सामग्री, कहाँ उपलब्ध होती है । उनके शरीर त्याग के अनन्तर ही उनके चरित्र की ऐतिहासिक सामग्री लुप्त हो गई उनकी ऐतिहासिकता का स्थान बेसिरपैर की दन्तकथाओं ने ले लिया । संस्कृत में बल्लाल कविका भोज प्रबन्ध ऐसे ही मनगढ़न्त कथाओं का गट्ठर है । काव्यकला की दृष्टि से इसकी शब्द योजना में भले ही माधुर्य हो, अर्थ वैशद्य में सौन्दर्य हो, परन्तु इतिहास की कसौटी पर वह खरा नहीं उतरता । भोजप्रबन्ध सोलहवीं शताब्दी की रचना है यह कालिदास के बहुत वर्षों बाद लिखा गया था । अतः इसका ऐतिहासिक महत्त्व बहुत कम है । इसमें सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि भिन्नकालीन कवियों को एक समय में तथा एक ही कतार में लाकर वल्लाल कवि ने खड़ा कर दिया है । भोज के दरबार में कालिदास, भवभूति, भारवि, दण्डी, बाण इन सबको समस्यापूर्ति करते पायेंगे । इन कवियों को आश्रयदाता धाराधीश भोज भी उक्त कवियों के कई सौ वर्ष बाद ग्यारहवीं शताब्दी में हुए हैं । जो उनके ताम्रपत्रों से सिद्ध हो चुका है । अतः पाठक स्वयं निर्णय कर लें कि कवियों के काल निर्णय करने में भोजप्रबन्ध कितना विश्वसनीय है । इस प्रकार परम्परागत विश्वसनीय सामग्री के अभाव में कालिदास के जन्मस्थान, स्थितिकाल तथा चरित्र के सम्बन्ध में अनेकानेक कल्पनाएँ की जाती हैं । विभिन्न विद्वानों ने कालिदास के काल की दो सीमाएँ मानी हैं । इन्होंने अपने मालविकाग्निमित्र नाटक का कथानक शुंग-वंशीय राजा अग्निमित्र के चरित्र से लिया है । यह अग्निमित्र मौर्यवंश का उच्छेद कर मगध साम्राज्य को स्वायत्त करने वाले सेनापति पुष्यमित्र का सुयोग्य पुत्र था । जिसका समय ईसा से लगभग १५० वर्ष पूर्व ऐतिहासिक विद्वानों ने निर्धारित किया है । अतः कालिदास का समय इसके पूर्व नहीं हो सकता है । छठी शताब्दी में वर्तमान कन्नौज के

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सम्राट् हर्षवर्द्धन (६०६-६४७ ई०) के दरबार के महाकवि बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित की प्रस्तावना में कालिदास की कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है और पुलकेशी द्वितीय (६३४ ई०) के ऐहोल नामक ग्राम में प्राप्त शिला पर खुदी हुई प्रशस्ति में भी कालिदास को स्पष्ट उल्लेख है। इससे इसके बाद भी कालिदास नहीं हो सकते। अतः कालिदास का समय ई० पू० प्रथम शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी के बीच कहीं न कहीं होना चाहिए। इन दो सीमाओं के आधार पर कालिदास की स्थिति के सम्बन्ध में विभिन्न ऐतिहासिक विद्वानों ने तीन मत प्रस्तुत किये हैं, क्योंकि कालिदास ने तो अपने सम्बन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा है और अपनी प्रतिभा के प्रकाश से विश्व को आलोकित करने वाले इस महाकवि ने अपना उल्लेख करना आवश्यक नहीं समझा। अपने स्थान और समय की बात को लिखना वे अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं समझते थे। अतिरिक्त इससे दूसरी बात यह है कि उन्हें यह आशा न थी कि मेरी कृतियों को लेकर कभी इतिहास के भव्य भवन का निर्माण होगा। यही कारण है कि अन्य मनीषियों के समान कालिदास ने भी अपने निवास स्थान, समय तथा अपने आश्रयदाता के विवरण को नहीं प्रस्तुत किया।

कालिदास के समय के सम्बन्ध में प्रधानरूप से तीन मत उपस्थित होते हैं :— १—कालिदास षष्ठ शताब्दी के महाकवि हैं। २—कालिदास गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में हुए थे। ३—कालिदास की सत्ता ई० पू० प्रथम शताब्दी मानना आवश्यक है।

(१) प्रथम मत—इतिहास में विक्रम उपाधिधारी चार राजाओं का उल्लेख पाया जाता है जिनके समसामयिक होने के कारण कालिदास का समय विभिन्न शताब्दियों में मानना पड़ता है।

डॉ० हार्नली मानते हैं कि यशोधर्मन ने वलादित्य नरसिंह गुप्त की सहायता से कारूर के युद्ध में हूणवंश के प्रतापी राजा मिहिरकुल को हराकर विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की और अपने इस बड़े विजय के उपलक्ष्य में विक्रम नाम का एक नया संवत् चलाया। इसे प्राचीन सिद्ध करने की इच्छा से उसने इसे ६०० छः सौ वर्ष पहले से ही प्रचारित किया। कालिदास इन्हीं के सभापण्डित थे। अतः कालिदास का समय छठी शताब्दी है। यह नई कल्पना डॉ० फर्गुसन साहब के मस्तिष्क की उपज है। कालिदास के समय निरूपण के लिए डॉ० हार्नली ने भी इसका उपयोग करते हुए यह दिखलाया है कि यशोधर्मन की राज्य सीमा रघु के दिग्विजय-प्रसंग में वर्णित राज्यसीमा से बिल्कुल मिलती-जुलती है। और एक आलोचक ने कुमारसम्भव की देवस्तुति के सांख्यसिद्धान्त को छठी शताब्दी में लिखी गई ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका के आधार पर अवलम्बित मानकर उसके आशय ग्रहण करनेवाले कालिदास का समय भी छठी शताब्दी माना है। म० म० हरिप्रसाद शास्त्री ने कौतुकपूर्ण अनेक युक्तियों से यह सिद्ध करने प्रयास किया है कि कालिदास भारवि के बाद छठी शताब्दी में हुए थे। मैक्समूलर का भी यही मत है कि कालिदास छठी शताब्दी में उत्पन्न हुए थे क्योंकि उसी समय भारतवर्ष में संस्कृत विद्या का पुनरुज्जीवन हुआ था। साहित्य, कला, विज्ञान आदि की दृष्टि से उत्तम युग था इसमें पुराणों का अन्तिम संस्करण और वैदिक धर्म का प्रचार हुआ था ऐसे समय पर इनका होना ज्यादा संभव है।

समीक्षा—हूणों को पराजित करनेवाले यशोधर्मन हूणारि कहे जा सकते हैं शकारि नहीं। छठी शताब्दी में शकों का कहीं नाम तक नहीं मिलता और न उनके शिलालेखों में

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कहीं विक्रम सम्वत् स्थापना की चर्चा है। ६ सौ वर्ष पहले से यशोधर्मन द्वारा विक्रम की स्थापना भी इतिहास प्रसिद्ध है कि मालव सम्वत् के नाम से यह सम्वत् चला आता था, विक्रमादित्य ने शकों की विजय के उपलक्ष्य में इसका नाम विक्रम सम्वत् रख दिया। दूसरी बात यह है कि मन्दसौर (मध्यभारत) के ई० ४७३ के शिलालेख में कुमारगुप्त की प्रशस्ति के लेखक वत्सभट्टि कवि ने कालिदास के मेघदूत और ऋतुसंहार के बहुत से पद्यों का अनुकरण किया है। इसलिए कालिदास को पञ्चम शताब्दी के बाद मानना अप्रमाणिक और इतिहास विरुद्ध है।

( २ ) दूसरा मत—बहुत से विद्वानों ने सर्वतः समृद्ध शान्तिमय गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानी है। इनमें भी पूना के प्रोफेसर के० पी० पाठक का मत है कालिदास स्कन्दगुप्त के समकालीन थे। क्योंकि रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में वर्णित महाराज रघु के दिग्विजय से स्कन्दगुप्त की विजय में अधिक समानता है। किन्तु डॉ० स्मिथ, कील, मैकडोनल डॉ० रामकृष्ण भण्डारकर, पं० रामावतार शर्मा और बहुसंख्यक पाश्चात्त्य विद्वान् मानते हैं कि कालिदास के आश्रयदाता गुप्तनरेशों में सबसे अधिक प्रभाव-शाली चन्द्रगुप्त द्वितीय थे। क्योंकि शकों को भारत से बाहर निकाल देने वाले विक्रमादित्य पदवीधारी चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्यकाल में सब तरह से शान्ति थी और भारतीय कला कौशल की उन्नति परम सीमा तक पहुँच गई थी। कालिदास के ग्रन्थों के समान गम्भीर विचार के ग्रन्थ ऐसे ही शान्तिमय समय में स्थिर चित्त से लिखे जा सकते हैं एवं रघुवंश के छठे सर्ग में वर्णित शान्ति का समुचित समय चन्द्रगुप्त द्वितीय का ही समय था—

यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्थं पथे गतानाम्।

इसके अतिरिक्त इन्दुमती के स्वयम्बर में सम्मिलित मगधराज के लिए चन्द्रमा की जो उपमा दी गई उसमें चन्द्रगुप्त नाम का ही संकेत है।

कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम्। नक्षत्र-तारा-ग्रहसंकुलापि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः॥ ६।२३

समीक्षा—मेघदूत का भूगोल गुप्तकाल के भूगोल से समता रखता है। गुप्तकाल के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानना भी ठीक नहीं क्योंकि केवल चन्द्रगुप्त द्वितीय ही विक्रमादित्य नहीं थे, किन्तु इनसे पूर्व मालवा में राज्य करने वाले विक्रमादित्य का पता इतिहास को मालूम है। दूसरी बात यह है कि यदि कालिदास गुप्तकाल में होते तो प्रयाग के स्कन्दगुप्त के स्तम्भ पर कालिदास की रचना न होकर साधारण पण्डित हरिसेन से क्यों लिखवाया जाता। इसलिए कालिदास को गुप्तकाल में मानना सर्वथा असंगत है।

( ३ ) तीसरा मत—उपर्युक्त कल्पनाओं से असन्तुष्ट होकर कुछ विद्वानों ने ६८ इसवी की गाथासप्तशती के पद्य में दानशील राजा विक्रमादित्य के स्पष्ट उल्लेख मिलने के आधार पर ईसा के पूर्व विक्रमादित्य की सत्ता प्रामाणिक रूप से स्थिर मानी है। इसके शकारि होने में भी किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है क्योंकि ईसा से १५० वर्ष पूर्व भारत में आने वाले शकों का पता इतिहास में मिलता है। अतः इन्हीं की सभा में कालिदास की सत्ता मानना युक्तियुक्त एवं प्रामाणिक प्रतीत होता है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग के ५९ वें श्लोक—'अथोरगाख्यस्य पुरस्य नाथं' में पाण्ड्यनरेश का वर्णन करते हुए कालिदास ने उरगपुर की उनकी राजधानी बतलाया है। उरियापुर का ही संस्कृत रूप उरगपुर जान

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पड़ता है। इतिहास के अनुसार प्रथम शताब्दी में उरियापुर पाण्ड्य नरेशों की राजधानी थी। इसलिए कालिदास को प्रथम शताब्दी में मानना ठीक ही है।

दूसरी बात यह है कि अभिज्ञान शाकुन्तल के मङ्गलाचरण—'या सृष्टिः स्रष्टुराद्या' में सूचित धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं से भी मालूम पड़ता है कि कालिदास ऐसे समय में हुए थे कि जब लोग बौद्धधर्म के प्रभाव से हिन्दू देवी-देवताओं के विषय में श्रद्धा-विहीन होते जा रहे थे।

ऊर्ध्वाङ्कित पद्य में 'प्रत्यक्षाभिः' इस पद का प्रयोग करके कालिदास ने देवता विषयक अविश्वास को दूर करने का प्रयास किया है। जिस भूतभावन भगवान् शिव की जल, अग्नि, यजमान, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, पृथ्वी और वायु इन आठ मूर्तियों का हमें सर्वदा प्रत्यक्ष दर्शन होता है उसके विषय में अश्रद्धा कैसे हो सकती है। इसी प्रकार शकुन्तला के षष्ठ अङ्क में दुष्यन्त की अँगूठी को बेचने के समय राजपुरुषों द्वारा पकड़े जाने पर मछली मारना अपनी जाति का कर्तव्य बतलाता हुआ धीवर कहता है कि—भगवान् ने जिस जाति को जो भला-बुरा काम दे दिया है वह छोड़ा नहीं जा सकता। देखिए—पशुओं को मारना तो बुरा काम है, पर बड़े-बड़े दयावान् और वेद जानने वाले ब्राह्मण भी यज्ञ में पशुओं को मारते ही हैं। इस वर्णन से मालूम पड़ता है कि कालिदास ने बौद्धधर्म के प्राबल्य के कारण यज्ञों के विषय में होनेवाली हिंसीजन्य निन्दा और अश्रद्धा को दूर करने का प्रयास करते हुए आवश्यक कर्तव्य होने के कारण हिंसा होने पर भी ब्राह्मणों को यज्ञ करना जातीय धर्म बतलाया है। अतः कुलपरम्परा जाति धर्म का त्याग करना उचित नहीं, यज्ञों का अनुष्ठान करना ब्राह्मणों के लिए सर्वथा श्रेयस्कर है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि कालिदास उस समय में थे जब वर्ण व्यवस्था और यज्ञादि-खण्डन करने के कारण बौद्धधर्म के प्रति अश्रद्धा बढ़ती जा रही थी और ब्राह्मण धर्म का अभ्युदय हो रहा था। यह समय ई० पू० द्वितीय शताब्दी के बाद सुङ्गवंशीय नरेशों के बाद का है। इसलिये कालिदास का जन्म प्रथम शताब्दी में मानना न्यायसंगत है।

पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को हटाकर वैदिक धर्म की स्थापना की थी। वैदिक संस्कृति की जो महिमा कालिदास की रचनाओं में दीखती है वह उस समय ही हो सकती थी। उस समय संस्कृत एवं काव्य का इतना प्रचार था कि अश्वघोष को भी संस्कृत में रचना करने के लिए विवश होना पड़ा। जब कि स्वयं बुद्ध ने पालि में उपदेश दिये और बौद्ध-ग्रन्थ पालि में ही लिपिबद्ध किये जाते थे।

प्रथम शताब्दी में वर्तमान कनिष्क की सभा के महापण्डित बौद्ध कवि अश्वघोष ने अपने बुद्धचरित में कालिदास के बहुत से पद्यों का अनुकरण किया है। दोनों के काव्यों में अत्यधिक साम्य है। कथानक की सृष्टि और विकास, वर्णन-शैली, अलंकारों का प्रयोग, छन्दों का चयन एवं शब्दों का विन्यास दोनों कलाकारों में से एक-दूसरे से प्रभावित हैं।

जैसे—रघुवंश में—अलं महीपाल तव श्रमेण।
बुद्धचरित में—मोघं श्रम नार्हसि मार कर्तुम्।

इसी प्रकार कालिदास ने रघुवंश के सप्तम सर्ग में इन्दुमती के स्वयम्बर से लौटते हुए अज को देखने के लिए उत्सुक स्त्रियों का जैसा सुन्दर वर्णन किया है। ठीक वैसा ही वर्णन अश्वघोष ने अपने बुद्धचरित के तृतीय सर्ग में शुद्धोदन की समृद्ध नगरी में प्रथम बार

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प्रवेश करते हुए राजकुमार सिद्धार्थ को देखने के लिए अत्युत्कण्ठा पूर्वक दौड़ती हुई नारियों का किया है ।

इन दोनों महाकवियों के वर्णन में बहुत बड़ी समानता है । अश्वघोष द्वारा कालिदास का अनुकरण करने के बल पर यह सिद्ध किया जाता है कि कालिदास अश्वघोष के पहले ई० पूर्व प्रथम शताब्दी ये उत्पन्न महाकवि हैं ।

कालिदास की कविताकला

कविकुलकलाधर कविवर कालिदास की कोमल कमनीय कलेवर कविता विश्व के किस सहृदय के हृदय को आनन्द मग्न नहीं कर देती है ।

इनकी कविता में प्रसाद गुण की, अगाधता, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, कोमलकान्त पदावली, उपमा की अपूर्वता, अलंकारों की रमणीयता, छन्दों की छटा और भावसौष्ठव आदि पर्याप्त मात्रा में रहने के कारण उनकी कविता विश्वविख्यात बन गई है । इनके काव्यों को जिस दृष्टि से देखा जाय उसी से काव्य कला की कमनीयता प्रकट होती है । इनकी कविता में सरस, सरल सुबोध तथा सुन्दर-सुन्दर शब्दों एवं भावों का साम्राज्य मन को मुग्ध कर देता है ।

वास्तव में कालिदास की कविता में सहृदयों की तो बात ही क्या है, साधारण व्यक्ति को भी जैसा प्रसाद गुण का रसास्वाद शब्द और अर्थ की निर्दोषता, गुण और अलंकारों का चमत्कार मिलता है । वैसा दूसरे किसी कवि में नहीं मिलता है। व्यङ्ग्यार्थ प्रतिपादन की विलक्षण शैली, रसप्रकर्ष का प्रकाशन, विस्तृत विषय का थोड़े में वर्णन, वर्ण्य विषय को सुन्दर क्रम से रखकर रोचक बनाना, स्वाभाविक भाव के द्वारा लोकोत्तर प्रदान का ढंग आदि कालिदास की कविता का स्वाभाविक गुण है । ध्वनिकाव्य का उत्तम गुण व्यञ्जना-व्यापार कालिदास के सभी ग्रन्थों में अनुस्यूत है ।

कालिदास संस्कृत साहित्य के अद्वितीय महाकवि माने जाते हैं । इनकी कविता की मधुरिमा के सामने अन्य कवियों की कविता फीकी पड़ जाती है । मानव हृदय के सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों का आपने जैसा निरीक्षण किया है वैसा अन्य कवियों ने नहीं ? कालिदास अन्तर्जगत् तथा बाह्यजगत् दोनों के सूक्ष्म निरीक्षक एवं पारखी कवि हैं। समष्टि दृष्टि से इनकी कविता में प्रसाद गुण तो सर्वत्र प्राप्त ही है पर अन्य कवियों की अपेक्षा इनका उपमा अलंकार स्वभाव सुन्दर होता है और वे उपमा के तो बेजोड़ कवि माने जाते हैं ।

वाल्मीकि और व्यास के बाद विद्वत्समाज में सर्वप्रथम महाकवि के नाम से कालिदास ही प्रसिद्ध हैं । कवि में जितने गुण होने चाहिए वे सभी कालिदास में पूर्ण रूप से विद्यमान हैं । इनकी नैसर्गिक रचना में भाषानुकूल भाव रखने की अद्भुत कला है । प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण और मानव हृदय के अन्तर्निहित भावों को व्यक्त करने में कालिदास को स्वतः सिद्धि प्राप्त है, इसीलिए विदेश के समीक्षक विद्वान् भी मुक्त कण्ठ से कालिदास की कविता कला की प्रशंसा करते हुए इनके काव्यों का आदर करते हैं । मल्लिनाथ ने तो स्पष्ट कहा है कि कालिदास की वाणी का वास्तविक रहस्य हमारे जैसे लोग तो नहीं समझ पाते केवल तीन व्यक्ति ही समझते हैं, एक तो विधाता=ब्रह्मा, दूसरी वाग्देवी सरस्वती तथा तीसरे स्वयं कालिदास ।

कालिदासगिरां सारं कालिदासस्सरस्वती ।
चतुर्मुखोऽथवा ब्रह्मा विदुर्नान्ये तु मादृशाः ॥

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कवि ने शकुन्तला के चतुर्थ अंक में निसर्गसुन्दरी शकुन्तला की विदाई के समय केवल आश्रमवासी मनुष्यों को ही नहीं, किन्तु मृग, मयूर, चक्रवाक और निर्जीव वृक्ष लताओं को भी रुला दिया है। यह अद्भुत कला कवि की अपनी विशिष्टता है। शकुन्तला के प्रति महर्षि कण्व का उपदेश और दुष्यन्त के प्रति सन्देश तो प्रत्येक गृहस्थ के लिए आदरणीय, अनुकरणीय और आचरणीय हैं। तपोवन के पावन वातावरण में पली हुई शकुन्तला मानो साक्षात् प्रकृति की कन्या है। यहाँ के निवासी सजीवों एवं निर्जीवों के प्रति उसका हृदय बान्धव स्नेह से आप्लुत है।

रसपरिपाक

यों तो कालिदास ने अपनी रचना में स्थान-स्थानपर सभी रसों का सन्निवेश किया है, पर ये प्रधान रूप से शृङ्गार-रस के रसिक कवि हैं। इनकी रचनाओं में शृङ्गार रस ओत-प्रोत है। इनके काव्यों में सम्भोग शृंगार का प्रकाशमान रूप तथा विप्रलम्भ शृङ्गार का करुणामय रूप पाठक एवं श्रोताओं के हृदय को चमत्कृत कर देते हैं। मेघदूत में विप्रलम्भ और कुमारसम्भव में सम्भोग शृङ्गार का प्राचुर्य है। सम्भोग शृंगार की अपेक्षा इनका विप्रलम्भ शृंगार उच्चकोटि का होता है। उत्तर मेघदूत का उदाहरण देखिए—

त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया-
मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम्।
अस्रैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरलुप्यते मे
क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः॥ ४७ ॥

पर्वत के चट्टानों पर गैरिकादि धातुओं से प्रणयकुपिता अपनी प्रियतमा की मूर्ति बनाकर क्षमा के लिए उसके चरणों पर गिरने का प्रयत्न करते समय अश्रुप्रवाह के उमड़ आने से कल्पित सम्भोग में भी बाधा पड़ने के कारण क्षुब्धहृदय यक्ष का क्रूर कृतान्त-विषयक उपालम्भ पढ़कर किस सहृदय का हृदय व्यथित नहीं हो उठता है? निर्जीव मेघ को दूत बनाकर अपनी प्रियतमा के पास प्रेममय सन्देश भेजनेवाले यक्ष के प्रेमोन्माद को पढ़कर कालिदास की काव्यकला की प्रशंसा किये बिना कौन रह सकता है?

कालिदास के करुण रस का वर्णन भी स्वाभाविक होता है। कुमारसम्भव के चतुर्थ सर्ग में शङ्कर की क्रोधाग्नि से कामदेव के भस्मसात् हो जाने पर रति का विलाप तथा रघुवंश के अष्टम सर्ग में आकाश से गिरी हुई पुष्पमाला के आघात से इन्दुमती के मर जाने पर अज का विलाप करुण रस के मर्मस्पर्शी उदाहरण हैं। इन्दुमती के मर जाने पर अज विलाप करते हुए कहते हैं—

स्रगियं यदि जीवितापहा हृदये किं निहिता न हन्ति माम्।
विषमप्यमृतं क्वचिद्भवेदमृतं वा विषमीश्वरेच्छया॥ ८।४६

कुमारसम्भव में भगवान् शङ्कर के ललाटस्थ तृतीय नेत्र से निर्गत अग्नि से भस्मसात् हुए अपने पति के शरीर को देखकर रति विलाप करती हुई कहती है—

शशिना सह याति कौमुदी सह मेघेन तडित् प्रलीयते।
प्रमदाः पतिवर्त्मगा इति प्रतिपन्नं हि विचेतनैरपि॥ ४।३३

अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला को अपने पति के घर जाते समय का कवि ने ऐसा मर्मस्पर्शी करुण रस का चित्रण अङ्कित किया है कि विषयसुख से

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२ शा० भू०

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विमुख कण्व जैसे धीर महर्षि भी रोये बिना नहीं रहे। कण्व मुनि कहते हैं—आज शकुन्तला अपने पति के घर जायेगी। इस विचार में मेरा हृदय दुःख से भर गया है, कण्ठ गद्गद हो रहा है। चिन्ता से दृष्टि जड़ हो रही है। मैं अरण्यवासी होकर भी कन्या के प्रेम से इतना व्याकुल हो रहा हूँ, तो गृहस्थ लोगों की कन्या के विरह में क्या दशा होती होगी ?

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्। वैक्लव्यं मम तावदीदृशमहो स्नेहादरण्यौकसः पीड्यन्ते गृहिणः कथं न तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ॥ ४।५

कालिदास की कविता में हास्य रस भी ऊँचे दर्जे का है। इनकी कविता पढ़कर पाठक मुस्करा देता है, ठहाके की हँसी नहीं हँसता। कुमारसम्भव महाकाव्य के पञ्चमसर्ग में पार्वती के आश्रम पर आकर भगवान् शङ्कर की निन्दा करता हुआ कपटवटु पार्वती का उपहास करता हुआ कहता है—

द्वयं च तेऽन्य पुरतो विडम्बना यदूढया वारणराजहार्यया। विलोक्य वृद्धोक्षमधिष्ठितं त्वया महाजनः स्मेरमुखो भविष्यति ॥ ५।७

साहित्य जगत् के समालोचक शेक्सपियर को अन्तर्जगत् का तथा कालिदास को बाह्य-जगत् का कलाकार कवि कहते हैं। प्रकृति के मनोरम चित्रण में कालिदास अद्वितीय हैं। इनके प्रकृति-चित्रण में रमणीयता, भव्यता, सजीवता तथा स्वाभाविकता ओत-प्रोत है।

प्रकृति के साथ कालिदास की अपूर्व सहानुभूति है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों का उद्घा-टन जैसा इन्होंने किया है वैसा संस्कृत-जगत् का कोई अन्य कवि नहीं कर पाया है। इन्होंने प्रकृति के अनुपम दृश्यों का सच्चा चित्र खींचा है। ये कोमल रूप के उपासक हैं, भवभूति के समान उग्र रूप से इनका प्रेम नहीं है। ये प्रायः शान्त तपोवन, नदी-तट, उपवन, प्रासाद, भ्रमर, मृग तथा कोकिल आदि का वर्णन करने में अपना सौभाग्य समझते हैं। इन्हें विन्ध्याचल पर्वत की अपेक्षा हिमालय से अधिक प्रेम है। इन्होंने अपने कुमार-सम्भव में हिमालय का सजीव वर्णन किया है। इन्हें ६ ऋतुओं में ग्रीष्म और वसन्त ऋतु बहुत ही प्रिय हैं।

जहाँ पाश्चात्य कवियों के प्रकृतिवर्णन नग्न होते हैं, वहाँ भारतीय कवियों का प्रकृति-वर्णन अलंकृत होता है। पाश्चात्य कवि बिना किसी आवरण के प्रकृति को उसके असली रूप में उपस्थित कर देते हैं, परन्तु भारतीय कवि प्रकृति को मनोरम मुग्धकारी विविध आभूषणों से सुसज्जित कर पाठकों के समक्ष उपस्थित करते हैं। महाकवि कालिदास में इस अलंकृत वर्णनशैली की ही निपुणता है। इतना ही नहीं, इनके प्रकृति-वर्णन में वैज्ञानिक ज्ञान का पर्याप्त परिचय मिलता है।

रघुवंश के नवम सर्ग में वायु से हिलाई गई लता को लक्ष्य कर वसन्त ऋतु का कैसा मनोरंजक वर्णन है—

श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः कुसुमकोमलदन्तरुचो बभुः। उपवनान्तलताः पवनाहृतैः किसलयैः सलयैरिव पाणिभिः ॥ ६।३५

स्त्री और पुरुषों के विविध मनोभावों का इन्हें पूर्ण ज्ञान है, उसे व्यक्त करने के लिए

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इन्होंने अभिधा शक्ति का प्रयोग न कर व्यंजना शक्ति से ही काम लिया है। इससे इनकी कविता में और भी चमत्कार आ जाता है।

जब अङ्गिरा ऋषि हिमालय के पास आकर कहने लगे कि अपनी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान् सदाशिव के साथ कर दीजिए। उस समय पार्वती का वर्णन करते हुए अन्तर्जगत् के पारखी कालिदास कहते हैं कि—अङ्गिरा ऋषिके इस प्रकार कहने समय अपने पिता हिमालय के पास खड़ी हुई पार्वती लज्जावश मुँह नीचे करके हाथ में लिए लीलाकमल के पत्तों को गिनने लगी—

एवं वादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी।
लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती॥ ६।८४

इस श्लोक में कवि ने लज्जा शब्द का प्रयोग नहीं किया है; किन्तु लज्जा के उदय होने पर पार्वती ने जो कार्य किया है, उसी का वर्णन किया है, वही कार्य हृदयगत लज्जाभाव को व्यक्त कर देता है।

कालिदास की प्रियवस्तुयें

पर्वतों में हिमालय, नगरियों में उज्जयिनी, देवताओं में शिव, छन्दों में मन्दक्रान्ता, अलङ्कारों में उपमा, रसों में शृङ्गार और ऋतुओं में वसन्त कालिदास को परम प्रिय थे।

संस्कृत साहित्य के लक्षणकार आचार्यों ने गौडी पाञ्चाली, वैदर्भी और लाटी नाम की चार रीतियाँ तथा माधुर्य, ओज और प्रसाद ये ३ गुण माने हैं गौडी रीति में बड़े-बड़े समास तथा पाञ्चाली में छोटे-छोटे समास होते हैं। वैदर्भी रीति में समास प्रायः नहीं के बराबर होते हैं। गौडी में ओज गुण, पाञ्चाली में माधुर्य गुण और वैदर्भी में प्रसाद गुण की प्रधानता होती है।

कालिदास की कविता में वैदर्भी रीति और प्रसाद गुण ओत-प्रोत है। प्रसाद गुण का प्राधान्य होने के कारण कालिदास की कविता शीघ्र ही समझ में आ जाती है।

कालिदास का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इनकी भाषा व्याकरण से परिष्कृत सरल, सरस एवं सुबोध होती है। ये—‘च, तु, हि, वै, किल, खलु’ आदि का प्रयोग केवल पाद की पूर्ति के लिए नहीं करते हैं; किन्तु उनका जहाँ प्रयोग करते हैं वहाँ वे सार्थक होते हैं। इनके शब्द नपे-तुले होते हैं, और इनके वाक्यों में क्रियापद प्रायः स्पष्ट होते हैं। ये किसी बात को घुमा-फिरा कर कहने की अपेक्षा सीधे कह देना अधिक पसन्द करते हैं। थोड़े शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की प्रवृत्ति इनमें विशेषरूप से दीख पड़ती है।

जैसे भिन्न-भिन्न वर्णों के उच्चारण के लिए भिन्न-भिन्न कण्ठ-ताल्वादि के आघातों के भेद हैं और भिन्न-भिन्न वर्ण, भिन्न-भिन्न रस, भाव एवं अलङ्कारों के व्यञ्जक हैं वैसे ही विभिन्न रसों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न छन्द भी हैं। शृङ्गार रस के व्यञ्जक वर्णों के द्वारा ही शृङ्गार रस की पुष्टि तथा वीर रस के व्यञ्जक वर्णों से वीर रस की पुष्टि हो सकती है, अन्य वर्णों से नहीं। तथापि केवल शब्द योजना ही काव्य में रस सिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है उसके लिये छन्द की योजना भी अपेक्षित है। क्षेमेन्द्र ने अपने सुवृत्ततिलक में कहा है कि काव्य में रस तथा वर्णनीय वस्तु के अनुसार छन्दों का विनियोग करना चाहिये—

काव्ये रसानुसारेण वर्णनानुगुणेन च।
कुर्वीत सर्ववृत्तानां विनियोगं विभाववित्॥

( १६ )

कालिदास का छन्द-विषयक ज्ञान भी गम्भीर और पूर्ण है। इन्होंने अपने काव्यों में प्रायः सभी प्रमुख छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्दों का चुनाव रस और वर्ण्य वस्तु के अनुकूल ही करते हैं। कालिदास मन्दाक्रान्ता छन्द के सिद्धहस्त कवि माने जाते हैं।

इन्होंने अपने खण्ड काव्य मेघदूत को केवल मन्दाक्रान्ता छन्द में ही लिखा है—

सुवशा कालिदासस्य मन्दाक्रान्ता प्रवल्गति ।
सदश्वस्य दमस्येव कम्बोजतुरगाङ्गना ॥

कालिदास की विशेषता

प्रत्येक कवि में किसी न किसी विषय की खास एक विशेषता रहती है। कविवर कालिदास उपमा अलंकार के आचार्य माने जाते हैं। तत्तत् कवियों की विशेषता व्यक्त करते हुए एक आलोचक ने बहुत ठीक कहा है—

उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् ।
दण्डिनः पदलालित्यं त्रयोऽप्येकैकतोऽधिकाः ॥

उपमा की छटा

कालिदास की उपमायें एक से एक बढ़कर हैं। इन्होंने नई-नई उपमाओं की उद्भावना की है। इनकी उपमाओं के विशेष चमत्कार का कारण यह है कि प्रायः इनकी उपमायें अन्तर्जगत् और बाह्य जगत् दोनों से ली गई हैं। इन्होंने उपमाओं में उपमान तथा उपमेय के वचन और लिंग तक का भी विचार किया है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर में उपस्थित राजाओं की दशा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—स्वयम्बर में उपस्थित जिन-जिन राजाओं को छोड़कर जब इन्दुमती आगे बढ़ जाती थी तब वे राजे दीपशिखा के द्वारा छोड़े गये महलों के समान प्रतीत होते थे। यहाँ निराश राजाओं की विषण्णता तथा खिन्नता की अभिव्यक्ति इस उपमा के द्वारा बड़ी सुन्दरता से दी गई है।

सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रियं यं व्यतीयाय पतिम्बरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥ ६।६७

इस श्लोकमें इन्दुमती की उपमा स्त्रीवाची दीपशिखा शब्द से दी गई है और राजा की उपमा पुंलिङ्ग अट्ट शब्द से दी गई है। लिंग की समता के साथ-साथ वचन की समता भी दर्शनीय है। इसी उपमासौष्ठव पर मुग्ध होकर साहित्यिक विद्वत्समुदाय ने इस महाकवि को दीपशिखा कालिदास कहना आरम्भ कर दिया।

रघुवंश के द्वितीय सर्ग में सायंकाल के समय जब दिलीपं वसिष्ठजी की गाय नन्दिनीको चराकर आश्रम की ओर लौटते हैं और लाल रंग की गाय आगे आगे है, शुभ्रवस्त्रधारी दिलीप पीछे पीछे हैं हरितवस्त्र धारिणी सुदक्षिणा उनकी प्रतीक्षां करती हुई स्वागत करने के लिए खड़ी है, दोनों के बीच में स्थित नन्दिनी की शोभा जैसी प्रतीत हो रही है जैसे दिन और रात के मध्य रक्तवर्णा सन्ध्या।

पुरस्कृत्य वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्य ॥ २।२०

यहाँ राजा की उपमा दिनसे, सुदक्षिणा की उपमा रात्रि से और गाय नन्दिनी की उपमा लाल सन्ध्या से दी गई है। और भी देखिए—

( १७ )

शरीरसादादसमग्रभूषणा मुखेन सालक्ष्यत लोध्रपाण्डुना ।
तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी ॥ ३।२

शरीर की दुर्बलता के कारण कुछ ही आभूषण पहनी हुई उस सुदक्षिणा की लोध्रपुष्प सदृश पीले मुख से ऐसी शोभा हुई जैसे प्रातःकाल टिमटिमाते हुए ताराओं से युक्त रात की शोभा पीले वर्ण के चन्द्रमा से होती है। यह भाव व्यक्त करने के लिए कवि ने लोध्रपाण्डु मुख से चन्द्रमा की एवं एकाध तारायुक्त प्रभातकल्पशर्वरी से सुदक्षिणा की उपमा देते हुए कितने सुन्दर ढङ्ग से पूर्णोपमा व्यक्त की है। इस प्रकार कालिदास की कविता में स्थल-स्थल पर अनूठी उपमा का चमत्कार मिलता है। इनकी उपमाओं में स्वाभाविकता का उत्कर्ष है जिससे पाठक का हृदय सहसा चमत्कृत हो उठता है।

कुमारसंभव में तपस्या के लिए आभूषणों का परित्याग कर केवल वल्कल वस्त्र धारण करने वाली पार्वती चन्द्रमा तथा ताराओं में मण्डित अरुणोदय युक्त रजनी के समान बतलाई गई है। स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई आतप सदृश लालवस्त्र धारण की हुई पार्वती फूलों के गुच्छों से झुकी हुई नवीन लाल पल्लवों से सुशोभित संचारिणी लता के समान प्रतीत होती थी—

पर्याप्तपुष्पस्तनभारनम्रा सञ्चारिणी पल्लविनी लतेव ।

रघुवंश के प्रथम सर्ग में कवि की उपमा देखने योग्य है। वशिष्ठ की नन्दिनी गौ का शरीर नये पत्तों के समान कोमल एवं लाल है, उसके मस्तक पर भूरे बालों की वक्र रेखा बनी हुई है जिससे वह ऐसी शोभा पा रही है जैसे लाल सन्ध्या के भाल पर द्वितीया का चन्द्रमा चढ़ आया हो—

ललाटोदयमाभुग्नं पल्लवस्निग्धपाटला ।
बिभ्रती श्वेतरोमाङ्कं सन्ध्येव शशिनं नवम् ॥ १।८३
श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् २।२, जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम् । २।३

नादसौन्दर्य की प्रसूतिके लिए अनुप्रास अलङ्कार की योजना उनकी रचनाओं में नितान्त मनोरम बन गई है। जैसे रघुवंश में—

जीवन् पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ ! पितेव पासि ॥ २।४८

अर्थान्तरन्यास का उदाहरण शकुन्तला में देखिए—

इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी ।
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ॥ १।१६

रघुवंश में इन्दुमती स्वयंम्बर में—

नासौ न काम्यो न च वेद सम्यग्द्रष्टुं न सा भिन्नरुचिहि लोकः । ६।३०

पूर्वमेघ में—

इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे ।
कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥ ५ ॥

उत्तरमेघ में—

कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा ।
नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ ५२ ॥

( १८ )

शकुन्तला के प्रथम अंक में हरिण भाग रहा है। राजा दुष्यन्त उसका पीछा कर रहा है। उसके धनुष पर बाण चढ़ा हुआ है। तपस्वी राजा को रोकते हुए कहता है—राजन् ! पुष्पराशि की तरह सुकोमल शरीर वाला यह हरिण आपके अग्नितुल्य बाणों को क्या बर्दाश्त कर सकेगा। अहह, कहाँ बेचारों हरिणों का अति चंचल प्राण और कहाँ तीक्ष्ण प्रहार करने वाले वज्र के समान कठोर आपके बाण। अतः आप इस पर बाण प्रहार न करें—

न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन् मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः। क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं क्व च निशितनिपाता वज्रसाराः शरास्ते ॥ १०

इसी प्रकार शकुन्तला को पुष्पित लता के समान बतलाकर कालिदास ने उसके सौन्दर्य में कितनी मादकता भर दी है। राजा दुष्यन्त की दृष्टि में शकुन्तला लता से जरा भी कम नहीं है। उसके अनुपम सौन्दर्य की छटा अत्यन्त लोभनीय है। शकुन्तला का अधरोष्ठ नव पल्लव के समान लाल है, दोनों भुजायें कोमल शाखाओं के सदृश हैं। इसके अङ्गों में फूल की तरह लुभावना यौवन व्याप्त है।

अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू। कुसुममिव लोभनीयं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम् ॥ १२१

इस प्रकार प्रायः कालिदास सभी प्रचलित अलङ्कारों के प्रयोग में दक्ष हैं किन्तु उपमा अलंकार पर इनका चमत्कारिक अधिकार है। केवल संस्कृत के ही नहीं, अपितु विश्व का भी कोई ऐसा कवि नहीं है। जो इनकी उपमा कला की समता कर सके। इनकी रचनाओं में उपमा की प्रचुरता के साथ ही उसका सौष्ठव भी देखते ही बनता है। इनकी उपमाओं की रसपेशलता अत्यन्त हृदयावर्जक है। सन्दर्भ को सुन्दर बनाने की कला में वे पारङ्गत हैं।

कालिदास के अध्ययन-स्थल की कल्पना

प्राचीन काल में विविध विद्याओं के गम्भीर अध्ययन के लिए भारत में अनेक विद्या-पीठ थे पंजाब में तक्षशिला, मगध में नालन्दा, सौराष्ट्र में वलभी और मालवा में उज्जैन। इनके अतिरिक्त जगह-जगह विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा स्थापित अनेक गुरुकुल थे, जिनमें वेद, वेदाङ्ग, व्याकरण, ज्योतिष, धर्मशास्त्र दर्शन आदि का अध्ययन ही नहीं होता था बल्कि सुधामधुर काव्यों के निर्माण के लिए भी प्रोत्साहन मिलता था। कालिदास के ग्रन्थों के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि उनकी शिक्षा भी ऐसे ही किसी गुरुकुल में हुई होगी। क्योंकि वे आश्रमों का वर्णन साङ्गोपाङ्ग करते हैं। कालिदास ने एक स्थल पर कहा है कि ऐसे गुरुकुलों में चौदह विद्याओं का अभ्यास कराया जाता है। याज्ञवल्क्यस्मृति में चार वेद, शिक्षा, व्याकरण आदि छः अङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र ये मिलकर धर्म के मूलभूत चौदह विद्याएँ हैं—

पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥

कालिदास के विचार

कालिदास को वैदिक धर्म पर पूर्ण विश्वास है और ये वर्णाश्रम व्यवस्था को पूर्णरूप

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से मानते हैं। इन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर अपार श्रद्धा है। ये सभी को त्याग और तपस्या की शिक्षा देते हैं। इनको नगर निवास की अपेक्षा तपोवन का जीवन बहुत अच्छा लगता है।

ये आशुतोष भगवान् सदाशिव के परम उपासक महाकवि हैं। इन्होंने अपने तीनों नाटकों में भगवान् शङ्कर का ही स्मरण किया है और रघुवंश के मङ्गलाचरण में शिव पार्वती की वन्दना की है इनके सभी ग्रन्थों में शिव की महिमा विशेष रूप से वर्णित पाई जाती है। इनके नाटकों के भरतवाक्य से मालूम होता है कि ये भगवान् सदाशिव से विश्व कल्याण की कामना रखते थे। ये व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्त्व देते हैं और सभी को लोककल्याणार्थ कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ये आशावादी कवि हैं, निराशावादी नहीं। ये सत्कार्यों के सम्पादन द्वारा परलोक मार्ग को सुगम बनाना मानव जीवन का वास्तविक सदुपयोग और अन्तिम लक्ष्य समझते हैं। अभिज्ञानशाकुन्तल के भरत वाक्य में भगवान् सदाशिव से पुनर्जन्म को दूर करने के लिए प्रार्थना करते हुए कहते हैं—

“ममापि च क्षपयतु नीललोहितः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः।”

कवि ने कुमारसंभव के द्वितीय सर्ग में देवताओं की प्रार्थना का उत्तर देते समय स्वयं ब्रह्मा जी से कहवाया है मुझे और विष्णु को भी शिवजी के प्रभाव का ज्ञान नहीं होता—

स हि देवः परं ज्योतिस्तमः पारे व्यवस्थितम्। परिच्छिन्नप्रभावर्द्धि न मया न च विष्णुना ॥ २।१५

अतः कालिदास के शिवोपासक होने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है।

कालिदास भारतीय संस्कृति के सच्चे उपासक महाकवि थे। इसका आभास उनके काव्यों में स्थान-स्थान पर मिलता है। जैसे रघुवंश महाकाव्य में कालिदास ने रघुवंशी राजाओं को निमित्त बनाकर उदारचरित पुरुषों का स्वभाव पाठकों के समक्ष रखा है और उनकी योग्यता का वर्णन करने के बहाने कितने ही प्रकार के रमणीय उपदेश प्राणिमात्र के लिए दिये हैं। चक्रवर्ती राजा दिलीप द्वारा २१ दिन महर्षि वशिष्ठ की नन्दिनी गौ की सेवा कराकर वरदान के रूप में पुत्रप्राप्तिरूप मनोरथ सिद्धि एवं इन्द्र द्वारा दिलीप के आश्वमेधिक अश्वहरण के बाद गोमूत्र को नेत्र में लगाते ही रघुको दिव्य दृष्टि प्राप्त करना आदि से गो-सेवा का अलौकिक फल दिखाकर संसार को गो-सेवा से अपने-अपने मनोरथ को पूर्ण करने का निर्देश किया है, और गो-सेवा की अपूर्व महिमा बतलाई है। इसी प्रकार महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स को अपार धनराशि देकर अज को पुत्र रूप में प्राप्त करना ब्राह्मणभक्ति एवं दानशक्ति का अनुपम उदाहरण है। श्रीराम के चरित्र के समान भारतीय संस्कृति के आदर्श का दिग्दर्शन तो कहीं अन्यत्र उपलब्ध ही नहीं हो सकता है। महाराजा रघु द्वारा कौत्सको सत्कार तथा अपार धनराशि देकर भारतीयों का अनुपम आदर्श अतिथि-सत्कार और विद्या-दान के प्रति अटल श्रद्धा व्यक्त की है। कुमारसम्भव में दिव्य नायक का दिव्य चरित्र वर्णित है, किन्तु लौकिक काम और शृङ्गार रस की सूक्ष्म भावनाओं का वर्णन करने के लिए उन्होंने खण्डकाव्य मेघदूत लिखा है।

अपने अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में तो इन्होंने आदर्श राजा दुष्यन्त तथा आदर्श नारी शकुन्तला का मार्मिक चित्र खींचकर यह दिखा दिया है कि भारतीय नारी किसी कारण-वश पति द्वारा अपमानित होने पर भी उसका अपमान नहीं करती अपितु संयमद्वारा पुनः