अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
अनुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| आमुख | v |
| अस्मदीयम् | vii |
| पाण्डुलिपियों के फोटोग्राफ्स | xiii |
| 1. प्रस्तावना | 1–94 |
| (क) उपोद्घात, पाण्डुलिपियों का विवरणादि | |
| (ख) अभिज्ञानशकुन्तल के बंगाली पाठ की मौलिकता के समर्थक कृतिनिष्ठ प्रमाण | |
| (ग) अभिज्ञानशकुन्तल के बंगाली एवं देवनागरी पाठ में प्रक्षेप एवं संक्षेप | |
| 2. अभिज्ञानशकुन्तल एवं सन्दर्भदीपिका टीका—समीक्षित पाठसम्पादन | 95–236 |
| प्रथमोऽङ्कः | 95 |
| द्वितीयोऽङ्कः | 120 |
| तृतीयोऽङ्कः | 134 |
| चतुर्थोऽङ्कः | 155 |
| पञ्चमोऽङ्कः | 175 |
| षष्ठोऽङ्कः | 192 |
| सप्तमोऽङ्कः | 220 |
| 3. परिशिष्ट-1: | |
| चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टांनां श्लोकानाम् अकारादिक्रमेण सूचिः | 237–244 |
| 4. परिशिष्ट-2: | |
| चन्द्रशेखरेण निर्दिष्टानां ग्रन्थकाराणाम् अकारादिक्रमेण सूचिः | 245–246 |
| 5. सन्दर्भग्रन्थ-सूचिः | 247–248 |
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पाण्डुलिपियों के फोटोग्राफ्स
[पत्र १]
ॐ नमोगणेशाय ॥ श्रीजगद्वल्लभचरणसरोजद्वयं प्रणम्य । श्रीचन्द्रशेखररुचितिताम्बुजेरुः नमयन्नि
कविसकलप्रदायतामवदता कविप्रदम् कालिदासः सुकनावतउरयाश्चारत्कारणशरम्यत्वात्कवतेः शपथं वलिपदानाम् अनुवृत्तित्वात् निवृत्तिक-
मा: परदेव ककवान् महादेवस्तस्यि नूतिस्तुतिविद्येत्याम्मानं वरमभवतातिः कालिः मायुक्तिः प्रशुक्ताशवरदर्शनात्तसिकडतासिद्विषाउवा-
तैरर्जुनरूपा ॥ मायेति वदनीमद्रणः घुटार्किकं बरहितैर्विः कीदृशं वदिदानाम्पास्तेष्वित्यर्थः पास्तिएकणयायायेमधीयजसानदक-
त्वेवमृकच्छलागतो कायस्थकुलवरडमार्क जपादसमसङ्कलादशदनानासाकीदृशंश्वेतः कर्म्मविविधायोगात्ताबरोग्राः शब्दार्थयम्नाश्च
सर्वेषां विद्वानश्रीरासिनीनाप्रधडाठक्क पटिकुलमणिस्तितिडनसामात्यः पुराविदः पाण्डिताश्च पण्डितार्थेषु । साधार्यार्थविशेषाणि दानाक्ष्येषु
प्रणामतैः साधारूपां धात्पाणपानरमणः । उल्लुतिः कीदृशीतिः प्रभवतातिः बोधयथासिक्किनायश्चापतोतिकमयः रूपाः कीदृशः
महिम्नवन्तः शङ्किनः मर्कितुरूपं ब्रह्मणानिदान्पादकं सम्प्रुक्ति मूर्त्तिनिहापमादायदूपस्यायतीः । संद्रूपदर्शपतिः पादरथमण्डलेवति-
उल्लेखः १
77A/41
[पत्र २]
...तारादिवानावरोगातपामितिशेषः समुदायवचनानह्येकत्वम साधम् मनुष्याणामितिव्यवहारो भवति महाभारतेपि; सप्तर्षीणाञ्च आश्रमेश्रेणीष्वेनलोम्नानिधानान् । आ-
म्नायीतिकि पाठः । यथाशीलिनामयमादेशिन अयुक्तं षाड्गुण्यादितिशब्दप्रयोगविरोधायोवृतङ्के ॥ * ॥ इति महामहोपाध्यायश्रीविश्वनाथतर्कपञ्चाननभट्टाचार्य्य-
विरचितकविताकल्पद्रुमतटीकायां काव्यसंस्कृतीविद्यायां महाकविविवरणंसमाप्तम् ॥० ॥ श्रीराधारमणाय नमः ॥ ० ॥ * ॥ शकाब्दाः १७२४ ॥ श्रीकृष्णायनमः ॥
इन्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लंदन के संग्रहालय में स्थित मेन्युस्क्रिप्ट, क्रमांक 4117 एवं 4118
(xiv)
[शीर्ष टिप्पणी]
1
अभिज्ञानरत्नाकर - टीका, धनुर्धरकृत, F.O 139e / 4118
रामः
[मूल हस्तलिखित पाठ]
नमोगणेशाय। श्रीलक्ष्मणचरणकमलयुगलमरविन्दलोचनं नमामि। भक्तकल्पवृक्षं। विज्ञानामृतसिन्धुं ज्ञानप्रदं विवस्वन्तं ॥१॥
हस्तिनिक्षयिनिर्णयप्रतिपादिकाग्रन्थः पण्डितपद्मसमरान वाग्देवता विज्ञाने ध्यावेनं ततः सङ्कलङ्का मोक्षमार्गकरणं मध्यमलोकः
व्यवहारेणानन्तरं विवदमाना नामार्थ ज्ञानं विना नकोऽप्यवगच्छति तात्कालिकेक्षण ब्रह्मश्रवज्ञान मथावधारणाय बुद्धिविशुद्धि
हेतुकारकपञ्चकः तदिः यद्यतः प्रथयः प्रथमतपञ्च महाविघ्ननाशाय नमस्कृतः यस्माज्ज्ञानात् सवि विक्षिप्तोऽज्ञानः मोक्षप्रसादन
ा या हरिरित्यनुवृतातिकृति हस्तः हस्तः संहत्यैः वीक्ष्यते (वेदविधाने गद्यपाठकः सामग्रीया यावती क्रमान्वया गत्या (वेदसूक्तम् नियमादि
कार्या समाधिवतः बृक्षकैः चक्रवर्तीरुपेण मायायाः सत्व रजस्तमः समावस्थतया क्रमतामवदिसंज्ञा कृतेः युक्तिसार्थक्या तस्या
प्राः वाक्यार्थ्याः संचिन्त्युक्तं दिक्कालानां चतुर्भिः समभवन्मध्यान्तः शेष्याः ज्ञानानाः पूर्त्तदीनां दृष्टान्तैरुपदिष्टामिति स्तुत्या
२: पुरारिनाम्नटोपेः साम्प्रतमीकरणा विना केन ज्ञप्तिः क्रिया चेदितिः प्रत्यक्षाख्यानो मन्त्रान्वयः प्रायश्चः सपाद कृत्या सा
मानं वृत्त्याः प्रकृतेः हेतु रिति १ परस्मैति २ वेद्यत्वम् आनन्दायति विवर्त्तते ३ काइण ४ प्रचीन ५ मूर्त्तत्वं ६ ज्ञानहेतुरिति नामा
न्तरक पार्थिव नानोदाह धीमन्तश्चकीर्त्तनः प्रकृतो निरूप्यो भूत्वा कृति मते मद्या चोवाम पृच्छाकृत २-१५६
श्रीर
प्रस्तावना
1. उपोद्घात
कवि कालिदास का अभिज्ञानशकुन्तल नाटक न केवल संस्कृत नाट्य-साहित्य में उत्तमोत्तम सर्जन है, किन्तु विश्वनाट्य साहित्य में भी वह प्रथम पङ्क्ति में विराजमान है। यह नाटक श्रेष्ठ एवं सर्वाधिक लोकप्रिय होने से रङ्गमञ्च पर भी उसकी प्रस्तुति बार बार होती रही है। किन्तु इसी कारण से उसके मूलपाठ में भी निरन्तर बहुविध परिवर्तन होते रहे हैं। परिणामतः आज भारत देश की विभिन्न लिपियों में लिखी गयी पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ इस नाट्यकृति का पाठ दो पाठपरम्पराओं में प्रवाहित हुआ मिलता है। (1) बृहद् पाठ एवं (2) लघु पाठ। पहली, बृहद् पाठपरम्परा की तीन या चार वाचनायें मिलती हैं। जैसे- 1. बंगाली 2. मैथिली, 3. काश्मीरी और 4. उत्कलीय। दूसरी, लघु पाठपरम्परा की दो वाचनायें दिखती हैं-5. देवनागरी, एवं 6. दाक्षिणात्य। (इन पाँचों वाचनाओं को रंगावृत्तियों के रूप में भी देख सकते हैं। मंचन के दृष्टिकोण से देखा जाय तो बृहत्पाठवाला नाटक अभिज्ञानशकुन्तल नाम से प्रचलित हुआ है तथा लघुपाठवाला अभिज्ञान-शाकुन्तल नाम से प्रचलित हुआ है। इस नाटक की द्विविध पाठपरम्पराओं पर टीकाकारों ने जब टीका-टिप्पण लिखे तब उन्होंने अलग अलग प्रान्त में प्रचलित पाठपरम्परा को अपने सामने रखा। अतः इन टीका-टिप्पणादि का सम्बन्ध भी किन किन वाचनाओं के साथ है वह भी ज्ञातव्य है। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कहा जाता है कि (1) बंगाली वाचना पर दो टीकायें लिखी गयी हैं:-(क) चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की “सन्दर्भदीपिका” टीका, जिसकी समीक्षितावृत्ति आपके हाथ में है। यह प्रथम बार प्रकाशित हो रही है। (ख) न्यायाचार्य की “रसिकमनोरमा” नामक टीका, जिसके सम्पादन का कार्य अभी चल रहा है। (2) मैथिली पाठ पर शङ्कर की “रसचन्द्रिका” एवं नरहरिकृत “अभिज्ञानशकुन्तलटिप्पणी”, जो मिथिला विद्यापीठ, (सन् 1957 में) दरभङ्गा से प्रकाशित हुई है। (3) काश्मीरी पाठ पर किसी ने टीका लिखी है या नहीं उसकी कोई सूचना नहीं है। (4) उत्कलीय पाठ (जिसको स्वतन्त्र पाठपरम्परा कहना मुश्किल है, उस) पर एक आधुनिक टीका मिलती है, जिसके रचयिता हैं श्रीनवकिशोरकर शास्त्री, वाराणसी। (5) देवनागरी पाठ पर राघवभट्ट ने एक टीका लिखी है, जिसका नाम “अर्थद्योतनिका” है और (6) जो दाक्षिणात्य पाठ है, उस पर अनेक
2 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
टीकाएँ उपलब्ध होती हैं। जैसे 1. काटयवेम की “कुमारगिरिराजीया” नामक टीका, 2. अभिराम की “दिङ्मात्रदर्शना” व्याख्या, 3. श्रीनिवासाचार्य की “शाकुन्तलव्याख्या”, 4. घनश्याम की “सञ्जीवन-टिप्पण”, 5. अज्ञातकर्तृक “चर्चा” टीका, 6. नीलकण्ठ दीक्षित की टीका, 7. नारायण पण्डित की “प्राकृत-विवृति” टीका इत्यादि।।
अभिज्ञानशकुन्तल की पाँचों वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही डॉ० रिचार्ड पिशेल के द्वारा सर्व प्रथम “समीक्षित-पाठ” के रूप में प्रकाशित हुआ था। तथा डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने दुबारा इसी तरह का कार्य प्रस्तुत किया है। जिसमें उन्होंने तीन काश्मीरी पाण्डुलिपियों का भी विनियोग किया है। डॉ० काञ्जीलाल ने यह सयुक्तिक सिद्ध किया है कि अभिज्ञानशकुन्तल की सभी वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही प्राचीनतम है। तथापि इस वाचना के पाठ पर लिखी गयी दो टीकाओं में से एक भी टीका को प्रकाशित होने का सौभाग्य नहीं मिला था। अतः बंगाली पाण्डुलिपियों में प्रवाहित हुए इस नाटक के पाठ पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती (ईसा की 16वीं शताब्दी) की इस “सन्दर्भदीपिका” टीका का प्रकाशन-कार्य चिरकाल से अभिलषित था। प्रस्तुत प्रकाशन से वह सम्पन्न हो रहा है।
2. टीका-ग्रन्थों के प्रकाशन की उपयोगिता
संस्कृत काव्य-साहित्य की विभिन्न कृतियों पर बहुत प्राचीन समय से टीका-टिप्पण-व्याख्यादि का प्रणयन होता रहा है। काव्य-सर्जन की प्रक्रिया के साथ साथ टीकाओं का प्रणयन होना भी स्वाभाविक ही है। क्योंकि सरस्वती का प्रथम उन्मेश कारयित्री प्रतिभा के रूप में प्रकट होता है, तथा दूसरा उन्मेश भावयित्री प्रतिभा के रूप में उदित होता है। जिसको आनन्दवर्धन ने “सरस्वत्यास्तत्त्वं कवि-सहृदयाख्यं विजयते।” इन शब्दों से कहा है। इस तरह साहित्य-जगत् में काव्यकृतियों के अनुज के रूप में टीका-ग्रन्थों का मूल्य भी महत्त्वपूर्ण है। इन टीका-ग्रन्थों के सहारे हम काव्यसौन्दर्य को पाने के लिए कदाचित् विशेष रूप से सक्षम हो सकते हैं। किन्तु आधुनिक युग में, काव्यकृतियों के रसास्वाद में सहायक ग्रन्थों के रूप में टीका-ग्रन्थों का मूल्य यथावत् रहते हुए भी क्योंकि हमारा एक दूसरे दृष्टिकोण से भी इनका महत्त्व बहुत अधिक प्रतीत होने लगा है। संस्कृत साहित्य ईसा पूर्व से चला आ रहा है और उसके पाठसंचरण का इतिहास अन्धेरे में होने से कवियों के द्वारा प्रणीत इन काव्यों के मूल पाठ का निर्धारण करना ही “इदं प्रथमतया” कर्तव्य बन गया है। पाण्डुलिपियों में सुरक्षित रहा पाठ तो दो सौ या तीन सौ साल से अधिक पुराना नहीं होता है क्योंकि पाण्डुलिपियाँ भूर्जपत्र या ताडपत्र, कागजादि जैसे अस्थाई फलक पर लिखी होने से उसके पुनर्लेखन/ प्रतिलिपिकरण की बार बार आवश्यकता रहती है। जिसके कारण आज उपलब्ध होनेवाली प्रायः सभी पाण्डुलिपियाँ दो सौ, तीन सौ साल से अधिक पुरानी नहीं होती हैं। अब पाठ-सम्पादक जब किसी भी एक-कर्तृक हो ऐसे काव्य के मूल पाठ
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 3
का सम्पादन करना चाहता है तब उसका अन्तिम लक्ष्य तो कवि-प्रणीत हो ऐसे मौलिक पाठ की गवेषणा करना, अथवा कवि-प्रणीत होने की जिस में सब से अधिक सम्भावना है ऐसे पाठ का निर्धारण करना होता है।¹ इस अन्तिम लक्ष्य को सिद्ध करने से पहले, पाठसम्पादक को प्राचीन काल से चली आ रही शताधिक पाण्डुलिपियों में से सब से पुराने समय में लिखी गयी हो ऐसी पाण्डुलिपि के सहारे “प्राचीनतर” काल के पाठ को ढूँढना है। और प्राचीनतर पाठ का निश्चय करने के बाद, उस काव्यकृति पर लिखी गयी टीकाओं में प्रतिबिम्बित हो रहे प्राचीनतम पाठ को भी ढूँढना आवश्यक होता है। क्योंकि काव्यकृति की पाण्डुलिपियाँ तो दो सौ, तीन सौ साल से अधिक पुरानी होती नहीं है, जब कि उनके टीकाकार तो इन पाण्डुलिपियों के रचना-काल से कहीं अधिक प्राचीनतर काल में बैठे होते हैं। अतः किसी भी एक-कर्तृक काव्य के प्राचीनतम पाठ को उजागर करने के लिए टीका-ग्रन्थों का मूल्य निर्विवाद रूप से बहुत अधिक है।। प्रस्तुत सन्दर्भ में बंगाली पाण्डुलिपियों के आधार पर प्रॉफे. रिचार्ड पिशेल (1876) तथा डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) ने अभिज्ञानशकुन्तल के बंगाली पाठ का समीक्षित पाठ-सम्पादन प्रकाशित किया है। लेकिन उसमें केवल नाटक के पाठ को संचरित करनेवाली बंगाली पाण्डुलिपियों का प्राधान्येन विनियोग हुआ है ऐसा दिखता है। यद्यपि उन दोनों महाशयों को चन्द्रशेखर की टीका का सुचारु परिचय है और उन्होंने उसका (प्राकृत उक्तियों के पाठ का निश्चय करने के लिए) बहुशः विनियोग भी किया है ऐसा कहा है। फिर भी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की टीका में प्रतिबिम्बित हो रहे पाठ के साथ बंगाली पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठ का तौलनिक अभ्यास करके बंगाली पाठपरम्परा का प्राचीनतर पाठ कौन सा हो सकता है उसका निष्कर्ष शायद नहीं निकाला है ऐसा लगता है। कहने का तात्पर्य यही है कि केवल नाट्यकृति के पाठ की पाण्डुलिपियों के आधार पर समीक्षित पाठसम्पादन तैयार करने से पहले उस नाट्यकृति की जितनी भी टीकायें उपलब्ध हो सकती हैं उनका प्रकाशन होना चाहिए। टीकाकार अतिप्राचीन काल के होने से उनके समक्ष निश्चित रूप से अधिक पुरानी पाठपरम्परा हो सकती है। अतः ऐसी प्राचीन काल की टीकायें पाठसम्पादन के कार्य में अधिक श्रद्धेय “सहायक सामग्री” मानी जाती हैं, जिसमें काव्यकृतियों की पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठ की अपेक्षा से अधिक प्राचीनतर पाठ सुरक्षित मिल सकता है। अतः प्रस्तुत टीका के सम्पादन से यह भी जानने को मिलेगा की बंगाली पाठ का प्राचीनतम स्वरूप कैसा रहा है।
- प्राच्यविद्या से सम्बद्ध साहित्य की कृतियों का पाठ पञ्चविध है। 1. अकर्तृक वेदसाहित्य (मन्त्रसंहितायें), 2. श्रुतसाहित्य (बुद्ध एवं महावीर की वाणी), 3. अनेककर्तृक रचनायें (सूत्र, रामायण-महाभारतादि), 4. एककर्तृक रचनायें (काव्य, शास्त्रग्रन्थ, भाष्यादि) एवं 5. उत्कीर्ण शिलालेखादि। द्वितीय-तृतीय प्रकार के पाठ के संशोधन में केवल प्राचीनतम पाठ का निर्धारण ही इष्ट माना जाता है।
4 चंद्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
3. समीक्षणीय सामग्री के रूप में उपयुक्त पाण्डुलिपिओं का विवरण
टीकाकार चन्द्रशेखर चक्रवर्ती के द्वारा प्रणीत “अभिज्ञान-शकुन्तल-सन्दर्भदीपिका” (अपर नाम “अभिज्ञानशकुन्तल-विवरण”) नामक टीका की दो पाण्डुलिपियाँ दि इण्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लन्दन के डीस्क्रिप्टिव केटलॉग में, (1) san, ms, i.o. 77-a : Keith, 4117 एवं (2) san, ms, i-o-1398e : Keith, 4118 क्रमाङ्क से निर्दिष्ट हैं।।
(क) प्रथम मातृका (क्रमांक-77-अ.) 4117, जिसके फलक का आकार 12×08 इंच है और पीले कागज पर पुरानी बंगलिपि में लिखी गयी है। यह कुल मिला कर 38 फोलियो में परिसीमित है। प्रत्येक पृष्ठ पर 8 पङ्क्तियाँ लिखी हैं, तथा प्रत्येक पङ्क्त में प्रायः 76 अक्षर अंकित हैं। इस मातृका का लेखन-काल 1728 शकाब्द है, अर्थात् 1806 ई.स. में लिखी गयी है।।
(ख) द्वितीय मातृका (कोलंब्रुक कलेक्शन, क्रमांक-1398,) 4118 है, जिसमें 12×06 इंच का फलक है और पुराने पीले कागज पर लिखी गयी है। प्रत्येक पृष्ठ पर 10 पङ्क्तयाँ लिखी गयी हैं तथा प्रत्येक पङ्क्त में करीब 60 अक्षर अंकित हैं। यह पाण्डुलिपि 18वीं शताब्दी के प्रारम्भिक समय में बंगलिपि में लिखी गयी है। यह पाण्डुलिपि कुल मिला के 40 फोलियो में परिसीमित है। 22 से 36 क्रमाङ्क के फोलियो लिखनेवाला लिपिकार कोई अन्य व्यक्ति हो सकता है। पुष्पिका भी किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा लिखी गयी दिखती है। यह मातृका पहलीवाली से अधिक सुवाच्य है।
(ग) डॉ० श्रीदिलीपकुमार काञ्जीलाल ने (लन्दन में) ऊपर वर्णित दोनों पाण्डुलिपियों की एक प्रतिलिपि अपने हाथों से लिखी थी। उन्होंने वह कॉपी उनकी ओर से मुझे सहर्ष भेंट की है। मूल मातृकायें जहाँ भी अवाच्य या सन्देहास्पद थीं वहाँ पर उनकी लिखी हुई प्रतिलिपि का विनियोग किया गया है जिसके लिये मैं डॉ० काञ्जीलालजी के प्रति आभारी हूँ और प्रणामाञ्जलि के साथ उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।।
(घ) ऐसा संकेत मिलता है कि एक और पाण्डुलिपि भी बांग्ला देश की राजशाही लाईब्रेरी में सुरक्षित है, जिसका क्रमांक-4336 है। परन्तु वहाँ पर किये गये पत्राचार का कोई प्रत्युत्तर मिला नहीं है।
4. प्रस्तुत पाठसम्पादन का परिचय एवं स्वीकृत नियम
भूमिका:- पूर्व-निर्दिष्ट दोनों बंगीय लिपि में लिखी हुई पाण्डुलिपिओं में संचरित पाठ का सर्व प्रथम देवनागरी-लिप्यन्तरण किया जाना चाहिए। इस टीका का पाठ देवनागरी में उपलब्ध होने पर ही इसका विनियोग व्यापक फलक पर हो सकता है। तदनन्तर, द्वितीय सोपान पर पाण्डुलिपिओं में पढ़े गये पाठ का व्याकरणानुसारी शुद्धिकरण करना परम
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 5
आवश्यक है। इसके लिये लिपिकार के प्रमादजन्य-स्खलनों को दूर करना तथा जहाँ भी कोई अवाच्यांश हो तो उस अंश का दूसरी पाण्डुलिपि के आधार पर विशदीकरण करना जरूरी है। दूसरी पाण्डुलिपि के पाठ से साथ पहली पाण्डुलिपि के पाठ का मिलान करते समय जो जो पाठभेद मिलते हैं उसका पादटीप में निर्देश किया गया है। दोनों प्रतियों का तुलनात्मक अभ्यास करके व्याकरण-शुद्ध एवं पूर्वापर सन्दर्भ में सुसंगत हो ऐसे पाठ का चयन करके, उसे आधुनिक विरामचिह्नादि के साथ, एक सुगम एवं परिष्कृत संस्करण तैयार करने का लक्ष्य रखा है।
भाष्य, वृत्ति, टीकादि रूप कृतियाँ अनेक-कर्तृक नहीं होने से (अर्थात् एक-कर्तृक होने के कारण ऐसे) टीका-ग्रन्थों के पाठ-सम्पादन में वाचनाभेद की प्रायः² समस्या नहीं होती है। अतः टीका-ग्रन्थ की दो प्रतियाँ जब समान काल में लिखी गयी हों तब उन दोनों में से किसी एक प्रति का पाठ, जो अधिक शुद्ध प्रतीत होता हो, उसको मुख्य आधार के रूप में स्वीकारना चाहिए। यदि उस आधारभूत प्रति में भी कुत्रचित् अवाच्यांश, अशुद्ध पाठ्यांश दिखायी दे तो वहाँ पर दूसरी प्रति का सहारा लेकर मूल पाठ का परिष्कृत स्वरूप तैयार किया जा सकता है। अतः प्रस्तुत टीका का देवनागरी लिप्यन्तरण और उसका एक परिशुद्ध संस्करण तैयार करना सम्पादक का प्रमुख कर्तव्य रहा है।
यहाँ जिन दो पाण्डुलिपियों का उपयोग किया गया है वह किसी एक पूर्वज पाण्डुलिपि से प्रतिलिपि करके तैयार की गयी प्रतीत होती हैं क्योंकि दोनों पाण्डुलिपियों के पाठ में प्रायः सर्वत्र समानता है। पाण्डुलिपि क्रमांक-4118 में कुत्रचित् एक या दो वाक्य अधिक हैं। अन्यथा समान पाठ्यांश मिलता है। अतः इन दोनों को हम समान वंशज प्रतियाँ कहेंगे। इन पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ्यांश का पूर्व इतिहास प्रतिलिपि-कर्ताओं ने कहीं पर भी लिखा नहीं है, किन्तु उसका अनुमान किया जा सकता है:-
“क्ष” (चन्द्रशेखर का अप्राप्य स्वहस्तलेख)
↓
“ज्ञ” (अज्ञात पूर्वज प्रति)
↓
4117 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि ............ 4118 क्रमांक की वंशज पाण्डुलिपि
इस तरह से उपलब्ध की गयी दोनों पाण्डुलिपियों का सम्बन्ध अनुमित किया जा सकता है। (बांग्लादेश में इसी टीका की जो तीसरी पाण्डुलिपि होने की जानकारी मिलती है, वह अनुपलब्ध होने से उसका सम्बन्ध अभी नहीं सोचा जा सकता है।)
- कालिदास के पद्यकाव्यों के प्रथम टीकाकार कश्मीर के वल्लभदेव की टीका में ऐसी समस्या निश्चित रूप से है कि उसका शारदा लिपिवाली पाण्डुलिपियों का पाठ और देवनागरी पाण्डुलिपियों में मिलने वाला पाठ बहुशः भिन्न दिखायी देता है। अतः वहाँ वाचनाभेद की समस्या हो सकती है।
6 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
इस सम्पादन में उपर्युक्त दोनों पाण्डुलिपियाँ एक समान पूर्वज से बनी हैं ऐसा दिखता है, इसलिए किसी एक पाण्डुलिपि का पाठ मुख्य रूप से स्वीकारा हो और दूसरी प्रति का पाठ गौण माना हो, ऐसा नहीं है। दोनों प्रतियों में मिल रहे समान पाठ्यांश में से जिसका पाठ कुत्रचित् अशुद्ध मालूम हुआ है, उसको पादटीप में रखा गया है। जहाँ दोनों में एक समान अशुद्धि दिख रही हो वहाँ पर पाठ की संशुद्धि प्रदर्शित करने के लिए निम्नोक्त कोष्ठकों का विनियोग किया गया है।।
(क) जहाँ किसी खण्डित या लुप्तांशवाले शब्द में किसी एक या दो वर्ण की पूर्ति करनी आवश्यक लगती है वहाँ [ ] इस तरह के कोष्ठक से क्षतिपूर्ति की गयी है।। उदाहरण के रूप में-[न] कदाचित् स[त्]पुरुषाः शोकपरवशा भवन्ति। (पृ. 203)
(ख) जहाँ पर लिपिकार के प्रमाद या अनवधान से किसी अनर्थक वर्ण का लेखन (=पुनर्लेखन) दिख रहा हो और उसे हटाना आवश्यक लगता है, उस निष्कास्य अंश को { } इस कोष्ठक में रखा गया है। उदाहरण रूप में-सखि, चपलः खल्वेष नूनम्। निवारयितुमेकाकिनी न पारयि{ष}ष्यसि। (पृ. 146)
(ग) किसी अशुद्ध पाठ्यांश के स्थान में सूचित शुद्ध पाठ को प्रदर्शित करने के लिए इस सामान्य ( ) कोष्ठक का विनियोग किया है।। (यहाँ पाण्डुलिपि में जो अशुद्ध मिलता है उसको पहले यथावत् रखते हुए सूचितांश को ही कोष्ठक में दिया गया है।) उदाहरण के रूप में-अत्र तावद् दुःस्व(ष)प्तम् स्मर। यतो राजरक्षितानि तपोवनानि। (पृ. 111)
(घ) किसी शुद्ध पाठ्यांश के स्थान में शुद्ध पाठ की कल्पना करना मुश्किल था उसको इस (?) तरह के निशान से अंकित किया है। उदाहरण रूप में-सोमवन्मनपत्यषे (?)। (पृ. 164)
(ङ) और जब पाण्डुलिपियों में कुछ अंश लुप्त या खण्डित मिलता है (और उसका पुनर्गठन सम्भव नहीं है) तो उसे ........ बिन्दुओं की लकीर से व्यक्त किया गया है।
सारांश यही है कि दोनों पाण्डुलिपियों का विवेक पुरस्सर विनियोग करते हुए प्रस्तुत टीका का पाठ परिष्कृत रूप में सम्पादित करने का उपक्रम रखा गया है। तथा उपर्युक्त विविध प्रकोष्ठों का विनियोग करने के साथ साथ अल्पविराम, पूर्णविरामादि का भी विनिवेश करके मूल पाठ्यांश को सुगम बनाने का भी लक्ष्य रखा है।
दूसरी महत्त्वपूर्ण स्पष्टता यह करनी है कि अकेले चन्द्रशेखर की टीका का पाठ प्रस्तुत करने से नाटक के किस पाठ पर टीका लिखी जा रही है वह तुरन्त नहीं मालूम होता है। अतः पहले नाट्यकृति का मूल पाठ देकर चन्द्रशेखर की तत्सम्बद्ध टीका उसके नीचे ही दी गयी है। यहाँ नाट्यकृति का जो पाठ दिया है वह प्रायः डॉ० रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति का अनुसरण करते हुए रखा है। एवं जहाँ पर भी डॉ० रिचार्ड पिशेल ने किसी श्लोक को
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 7
“मूल पाठ” माना नहीं है, और उसे हटा दिया है, किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने ऐसे श्लोक पर टीका लिखी है तो उस श्लोक को यहाँ [ ] इस तरह के प्रकोष्ठ में रखा गया है। ऐसा करने से यहाँ तुलनात्मक दृष्टि से दो बातें ध्यान में आ सकेंगी कि चन्द्रशेखर ने कितने श्लोकोंवाले नाटक का पाठ स्वीकारा है, और चन्द्रशेखर ने जिन प्राकृत उक्तियों का संस्कृत-छायानुवाद दिया है उनमें से डॉ० रिचार्ड पिशेल ने कितनी सहायता प्राप्त की है। यद्यपि डॉ० पिशेल ने ऐसा कहा है कि उन्होंने प्राकृत उक्तियों के पाठ का निर्धारण करने के लिए चन्द्रशेखर की टीका से काफी सहायता ली है, फिर भी यहाँ प्रस्तुत हो रहे नाट्यकृति के पाठ और टीका को पाठ का तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने से मालूम होगा कि कुछ ऐसे भी स्थान हैं जहाँ पर डॉ० पिशेल ने चन्द्रशेखर का अनुसरण नहीं किया है। यहाँ प्राकृत उक्ति के ध्वन्यात्मक स्वरूप-निर्धारण का प्रश्न तो द्वितीय सोपान पर आता है। किन्तु प्रथम सोपान पर तो उस उक्ति का, उसी स्वरूप में मूल नाटक में होना या नहीं होना-यह निश्चित करना ही महत्त्वपूर्ण बात बन जाती है। डॉ० पिशेल के प्राकृत भाषा के तलस्पर्शी ज्ञान को लेकर कोई विवाद नहीं हो सकता है किन्तु चन्द्रशेखर ने जिस प्राकृत उक्ति को मूल पाठ का अंश माना हो, और डॉ० पिशेल ने उसका त्याग किया हो या कुछ परिवर्तित पाठ को माना हो तो उन दोनों में से प्राचीनतर पाठ क्या हो सकता है? वह विचारणीय बनता है। इस दृष्टि से यहाँ केवल टीका का पाठ न देकर, नाटक के पाठ को (वह भी डॉ० पिशेल-अनुसारी) देकर, ठीक उसके नीचे ही टीका का पाठ देना उपयुक्त समझा है।
5. चन्द्रशेखर का परिचय एवं काल
अभिज्ञानशकुन्तल पर लिखी गयी जिस “सन्दर्भदीपिका” टीका का पाठ यहाँ प्रस्तुत हो रहा है उसके रचयिता बंगाल के चन्द्रशेखर चक्रवर्ती हैं। उन्होंने पुष्पिका में अपने बारे में निम्नोक्त जानकारी दी है:-उनके पिता का नाम श्री विष्णु पण्डित है, जिनको महामहोपाध्याय की उपाधि भी दी गयी थी। इसके अलावा और कोई जानकारी उन्होंने नहीं दी है। संस्कृत साहित्य के अनगिनत रचनाकारों में चन्द्रशेखर नामधारी व्यक्ति भी एकाधिक हैं।³ अतः अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका लिखनेवाले चन्द्रशेखर कौन थे यह निश्चित करना बड़ा मुश्किल कार्य है। डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने इस विषय में लिखा है कि
- एशियाटिक सोसायटी के कैटलॉग में लिखा है कि एक (1) चन्द्रशेखरपण्डित ने सन्दर्भचिन्तामणि टीका की रचना की है। दूसरे (2) चन्द्रशेखरवाचस्पति ने धर्मदीपिका लिखी थी। तथा तीसरे (3) चन्द्रशेखरशर्मा ने स्मृतिदुर्गमभञ्जनम् एवं तत्त्वचन्द्रिका की रचना की है। यह चन्द्रशेखर शर्मा नवद्वीप में स्थायी बने वारेन्द्र ब्राह्मण थे। महानाटक पर टीका लिखनेवाले एक (4) चौथे चन्द्रशेखर सर्वथा कोई भिन्न व्यक्ति ही हैं। श्रीराजेन्द्र लाल मित्र के मत से “महामहोपाध्याय चन्द्रशेखर” एवं “चन्द्रशेखर वाचस्पति” ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं। लेकिन इस अभिप्राय के समर्थन में उन्होंने कोई सबल तर्क नहीं दिया है।
8 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
केटलॉगस केटलॉगोरम में चन्द्रशेखर नामधारी कुल 11 व्यक्ति निर्दिष्ट किये गये हैं। किन्तु अभिज्ञान-शकुन्तल पर “सन्दर्भदीपिका” टीका लिखनेवाला चन्द्रशेखर रङ्गभट्ट का पौत्र और विष्णु पण्डित का पुत्र है। इस विष्णु पण्डित की पहचान निश्चित नहीं है। प्रॉफेसर मोनियर विलियम्स एवं डॉ० ऑटो बोथलिंक के मतानुसार यह चन्द्रशेखर साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ के पिता थे। किन्तु प्रॉफेसर डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) के मतानुसार ऐसा मानना उचित नहीं है। क्योंकि स्वयं चन्द्रशेखर ने अनेक स्थानों पर साहित्यदर्पण का उल्लेख किया है। अतः वह विश्वनाथ के पुरोगामी या पिता नहीं हो सकते हैं।⁴
चन्द्रशेखर ने अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका टीका लिखने के उपरान्त 1. शिशुपालवध पर सन्दर्भचिन्तामणि टीका, तथा 2. हनुमन्नाटक पर भी टीका लिखी है। चन्द्रशेखर ने इस सन्दर्भ-चिन्तामणि टीका में एक भावदत्त नामक विद्वान् का नामोल्लेख किया है। इस भावदत्त ने जो तत्त्वकौमुदी नामक ग्रन्थ लिखा है, जिसकी पाण्डुलिपि में लक्ष्मण संवत 572 का निर्देश है। अब लक्ष्मण संवत 572 में “शक संवत 1552” चल रहा था, जिसमें “ईसवीय 1630” चल रही थी। इस के आधार पर चन्द्रशेखर का समय ई. स. 1600 से 1650 के बीच में अनुमित किया जा सकता है।
प्रॉफेसर रिचार्ड पिशेल के मतानुसार (Die Recension der Śakuntala, p. 7) चन्द्रशेखर अभिज्ञान-शकुन्तल का सर्वोत्तम टीकाकार है। या यों कहें कि सब से बड़ा एवं बुद्धिमान् टीकाकार है। उसमें निष्पक्ष न्यायिक बुद्धि, सतर्क पाठसन्तुलन, उपलब्ध सामग्री का सही मूल्यांकन, परम्परा का समुचित ज्ञान एवं श्रद्धेय पाठ-निर्धारण की क्षमता होने से वह एक अच्छा पाठालोचक बन सका है। यद्यपि उसमें कुत्रचित् ज्यादा आत्मविश्वास दिखता है, एवं वह अपने नजदीक के पुरोगामी शंकर की ओर तीव्र-प्रतिक्रिया भी दिखाता है। बड़ा विद्वान् होने से उसने “महामहोपाध्याय” की उपाधि भी अर्जित की है।।
6. लिपिकार द्वारा दी गयी सूचनायें
चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की अभिज्ञानशकुन्तल नाटक पर लिखी गयी सन्दर्भदीपिका टीका की उपलब्ध की गयी दो पाण्डुलिपियों के लिखने वाले लेखक कौन थे? यह स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है। किन्तु उन्होंने इन पाण्डुलिपियों के अन्त में जो पुष्पिका के रूप में दो-चार पंक्तियाँ लिखी हैं उसमें से निम्नोक्त सूचनाएँ मिलती हैं। जैसे कि,
- But Chandrashekhar himself had quoted long passages from the Sahityadarpana and has referred to some of the emendations occuring in the Sahityadarpana, which clearly proves his posteriority to Vishvanatha.-D.K. Kanjilal, preface, p. 24
सप्तमाङ्क-विवरणं समाप्तम्।।
अभिज्ञानशकुन्तलम् | प्रस्तावना | 9
इति महामहोपाध्याय-श्रीविष्णुपण्डित-तनूज- श्रीचन्द्रशेखर-चक्रवर्तिकृतावभिज्ञानशकुन्तलटीकायां (ज्ञान)सन्दर्भदीपिकायां⁵ सप्तमाङ्क-विवरणं समाप्तम्।। श्रीहरये नमः।। श्रीरामय नमः।। शकाब्दाः 1728।। ॐ गङ्गायै नमः।।
इससे यह सूचित होता है कि मातृका 4117 के अनुसार समग्र टीका का नाम “ज्ञानसन्दर्भदीपिका” है और मातृका 4118 के अनुसार “सन्दर्भदीपिका” नाम है। यद्यपि इसके अलावा टीका के आरम्भ में तो इस टीका का नाम केवल “सन्दर्भदीपिका” इतना ही दिया है। चन्द्रशेखर ने शिशुपालवध पर जो टीका लिखी है उसे “सन्दर्भचिन्तामणि” नाम दिया है जिससे सिद्ध होता है कि इस टीका का सही नाम “सन्दर्भदीपिका” ही होगा। प्रथमांक की पूर्ति होने पर दोनों ही पाण्डुलिपियों में ऐसी पुष्पिका दी गयी है-इति महामहोपाध्याय-श्रीविष्णु-पण्डित-तनुजन्म-श्रीचन्द्रशेखर-चक्रवर्ति-कृतावभिज्ञान-शकुन्तल-टीकायां प्रथमाङ्क-विवरणम्।। अन्यत्र अङ्कों की समाप्ति पर, संक्षेप में उसे एक अन्य नाम, “अभिज्ञानशकुन्तल-विवरण” से भी घोषित किया गया है तथा कुत्रचित् इतना भी नहीं लिखा है। केवल अमुक अंक समाप्त हुआ इतना ही बताया गया है।।
लिपिकारों के लेखन में कुछ विशेषतायें इस प्रकार दिख रही हैं:-
(क) दोनों पाण्डुलिपियाँ वंगीय लिपि में लिखी हुई हैं। लेकिन दोनों पाण्डुलिपियाँ लिखनेवाले व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं। तथा मातृका 4117 का लेखन-काल शकाब्दाः 1728 है, जो ईसा का 1806 वर्ष होगा। मातृका 4118 की पुष्पिका में लेखनकाल नहीं है।।
(ख) यहाँ कुछ संयुक्ताक्षरों की वर्तनी में प्राचीनता झलक रही है। तद्यथा-अवग्रह, ज्ञ, ङ्क, इत्यादि। इसी तरह से वकार एवं रेफ की वर्तनी में बिन्दी के चिह्न से स्पष्टता लायी जा सकती थी, जो नहीं है।
(ग) पाण्डुलिपि क्रमांक-4117 में प्रायः सर्वत्र “प्रियंवदा” के स्थान में “प्रियम्वुदा” ऐसा शब्द रखा गया है, जो लिपिकार के अज्ञान या अशक्ति का दुष्परिणाम हो सकता है।
7. चन्द्रशेखर द्वारा स्वीकृत बंगाली पाठ का स्वरूप
चन्द्रशेखर की सन्दर्भदीपिका-टीका का सब से पहले जो परिचय देना आवश्यक है वह यह कि उन्होंने अभिज्ञानशकुन्तल पर टीका लिखते समय अपने समक्ष नैरन्तर्येण शङ्कर की रसचन्द्रिका टीका को रखा है। लेकिन शङ्कर के द्वारा स्वीकृत जो पाठ है उससे अपना साम्प्रदायिक बंगाली पाठ जहाँ जहाँ पृथक् है उसकी ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया ही है। उदाहरण के रूप में देखें तो-
- मातृका 4118 इत्यत्र तु केवलं “सन्दर्भदीपिकायाम्” इति लिखितं वर्तते।
10 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
(क) प्रथमाङ्के में सरसिजमनुविद्धम्० (1-19) श्लोक के बाद “अपि च” से अवतारित, कठिनमपि मृगाक्ष्या वल्कलं कान्तरूपम्० (1-20) ऐसा एक विशेष श्लोक चन्द्रशेखर ने माना है और उस पर व्याख्या की है। किन्तु यह श्लोक मैथिल पाठपरम्परा में नहीं होने से शङ्कर ने उस पर व्याख्या नहीं लिखी है। इस बात की जानकारी दिखाते हुए चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-पद्यमिदं दाक्षिणात्य-तीरभुक्तीयग्रन्थेषु न दृश्यते। अर्थात् यह श्लोक केवल बंगाल की पाठपरम्परा में ही प्रचलित है। वह दाक्षिणात्य (याने उत्कलीय-?) एवं तीरभुक्तीय (याने तिरहुत-बिहार) की परम्परा में कहीं पर भी नहीं मिलता है।।
(ख) प्रथमाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-अम्मो, नवमालिकामुज्झित्वा वदनं मे मधुकरः अभिलषति। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि, शङ्करस्तु सलिलसेकसम्भ्रान्तो मधुकरो वदनं मे अभिलषति पीडयतीति पाठान्तरमाह। अर्थात् चन्द्रशेखर मैथिल पाठ में कुछ प्रक्षिप्त अंश है उसकी जानकारी रखते हैं।
(ग) तृतीयाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-तद्यदि वाम् अनुमतं ततः तथा प्रयतेथाम् यथा तस्य राजर्षेरनुकम्पनीया भवामि। अन्यथा स्मरतं माम्। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-अन्यथा प्रसीदतं, सिञ्चतम् इदानीं मे उदकम्, मामुदकैः सिञ्चतमित्यर्थः इति शङ्करसम्मतः पाठोऽर्थश्च।। यहाँ “स्मरतम्” के स्थान पर “सिञ्चतम् उदकम्” जैसा पाठभेद मैथिल परम्परा में है।
(घ) तृतीयाङ्के में राजा की उक्ति है-सुन्दरि, किमन्यत्। इदमप्युपकृतिपक्षे सुरभि मुखं ते मया यदाघ्रातम्। ननु कमलस्य मधुकरः सन्तुष्यति गन्धमात्रेण।। (3-37) यहाँ पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-ननु निश्चये। न त्विति शङ्करः। तेनालिङ्गनमपि देहीति भावः इति व्याचष्टे दृष्टान्तः। यहाँ उपर्युक्त श्लोक में “ननु” के स्थान में मैथिल परम्परा में “न तु” इतना ही परिवर्तित किया हुआ जो पाठभेद है (और जिसके कारण पूरा वाक्यार्थ बदल जाता है), वह चन्द्रशेखर अच्छी तरह से जानते हैं ऐसा उन्होंने लिखा है।
(ङ) उसी तरह से चतुर्थाङ्के में प्रियंवदा की उक्ति है-अहो, आभरणार्हं ते रूपमाश्रमसुलभैः प्रसाधनैः विप्रकार्यते। इस पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि, आभरणान्ते अस्य वा रूपमाश्रमसुलभैः प्रसाधनैर्विप्रक्रियते पीड्यते। विप्रलभ्यत इति शङ्करः पठति।।
(च) पञ्चमाङ्के में शकुन्तला की उक्ति है-इदम् अवस्थान्तरं गते तादृशे अनुरागे किं वा स्मारितेन। अथवा, आत्मेदानीं मे शोधनीयः। भवतु। व्यवसिष्यामि। इस पर चन्द्रशेखर लिखते हैं कि, शङ्करस्तु शोचनीय इति पठित्वा, सदसि तादृशं रहस्यप्रकाशनात् त्रपया शोचनीया भविष्यसीति भावः इत्याह। भवतु, व्यवस्यामि रहस्यं वक्तुमिति शेषः। वदिष्यामीति शाङ्करः पाठः।
अभिज्ञानशकुन्तलम् \quad\quad\quad\quad\quad\quad प्रस्तावना \quad\quad\quad\quad\quad\quad 11
इन उदाहरणों से यह निश्चित होता है कि चन्द्रशेखर ने बंगाली-लिपि में संचरित हुए (साम्प्रदायिक) पाठ का ही अनुसरण किया है। तथा वे, मैथिली पाठ से बंगाली पाठ कहाँ पर भिन्न पाठ परम्परावाला है, यह बहुत बारिकी के साथ दिखाते रहे हैं।
टीकाकार चन्द्रशेखर को बंगाल का परम्परागत (साम्प्रदायिक) पाठ अभिमत है। यह पाठ शङ्कर के द्वारा स्वीकृत मैथिली पाठ से कई स्थानों पर पृथक् ही है। उन्होंने इस मैथिल पाठपरम्परा को “शङ्करधृतः पाठ” के नाम से या “तीरभुक्तीय” (तिरहुत) के नाम से निर्दिष्ट किया है। अब यह भी ज्ञातव्य है कि चन्द्रशेखर ने अपने समय की कुछ और भी पाठपरम्पराओं का निर्देश किया है। जैसे कि-1. विदेशीय, 2. प्राचीनपुस्तक और 3. दाक्षिणात्य पाठपरम्परा। यहाँ विदेशीय पाठ शब्द से सम्भवतः काश्मीर या नेपाल की परम्परा का निर्देश हो सकता है। प्राचीनपुस्तक शब्द से तो केवल किसी प्राचीन काल की हस्तलिखित प्रति का ही उल्लेख करते हैं ऐसा मालूम होता है। लेकिन उन्होंने जो दाक्षिणात्य पाठपरम्परा का एक स्थान पर उल्लेख किया है वह भ्रम में डालनेवाला है। सामान्य रूप से दाक्षिणात्य शब्द से कोई भी व्यक्ति उसे दक्षिण भारत की पाठपरम्परा मानने को तैयार हो जायेगा। लेकिन चन्द्रशेखर ने जिन श्लोकों को दाक्षिणात्य पाठपरम्परा का श्लोक कहा है वह श्लोक दक्षिण भारत के एक भी अभिज्ञानशकुन्तल में नहीं मिलता है। जैसे कि-
अस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं, निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धप्रभावाच्चिरं
प्रेम्णा मन्मुखमीषद्रीक्षत इव स्मेरा च वक्तीव माम्॥
\hfill (6–16)
इस श्लोक पर चन्द्रशेखर ने लिखा है कि-पद्यमिदम् अनतिमधुरं दाक्षिणात्यपुस्तकेष्वेव दृश्यते। अब प्रश्न होता है कि यह दाक्षिणात्य परम्परा कहाँ की है? क्योंकि यह श्लोक दक्षिण भारत के एक भी टीकाकार, जैसे कि, काटयवेम, अभिराम, घनश्याम, श्रीनिवासाचार्य, नीलकण्ठ, चर्चा आदि के द्वारा किसी भी तरह से निर्दिष्ट नहीं है। अतः ऐसा सूचित होता है कि चन्द्रशेखर यहाँ “दाक्षिणात्य” शब्द से सम्भवतः उत्कलीय पाठ परम्परा का निर्देश कर रहे होंगे। उत्कल प्रदेश बंगाल से दक्षिण में कहा जा सकता है। और उत्कलदेशीय श्रीनवकिशोरकर शास्त्रीजी ने जो अभिज्ञानशाकुन्तल प्रकाशित किया है उसमें यह श्लोक है। इस दृष्टि से सोचने पर चन्द्रशेखर अपनी बंगाल की पाठ परम्परा को जानने के साथ साथ काश्मीर या नेपाल की, तीरभुक्तीय यानि बिहार की मैथिल एवं (बंगाल से दक्षिण में स्थित) उत्कल की पाठपरम्परा को भी जानते थे। चन्द्रशेखर ने चतुर्दिकू फैली पाठ परम्पराओं को जानने के बावजूद उनमें से अपनी बंगाल की पाठपरम्परा की अस्मिता बनाये रखने का जो उपक्रम रखा है उसीमें उसकी मूल्यवत्ता निहित है।
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|---|
यद्यपि यहाँ उल्लेखनीय है कि चन्द्रशेखर के द्वारा प्रस्तुत किये गये करीब 15 पाठान्तरों में से 4 पाठान्तर काश्मीरी पाठ के साथ संगत बैठते हैं। उदा. 1. कृतार्थेदानीम् गमिष्यसि। 2. नेदं विस्मरिष्यामि। 3. कृतावमर्षाम् अनुमन्यमानः। 4. कण्वाश्रम की गौतमी की पहचान देते हुए उसे कण्व की “धर्मभगिनी कनीयसी” कहा है, जो काश्मीरी पाठ के अनुरूप है। इसके अलावा अन्य सभी पाठान्तर प्रायः बंगाली वाचना के साथ संगत होते हैं।
प्रस्तुत चर्चा के उपसंहार में इतना कहेंगे कि चन्द्रशेखर ने कुल मिला कर 225 श्लोकोंवाले अभिज्ञानशकुन्तल के पाठ पर टीका लिखी है। उन्होंने जिस पाठ को स्वीकार करके टीका लिखी है, वह बंगाल का परम्परागत पाठ है। यद्यपि यह उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द, डमरुवल्लभ एवं कृष्णनाथ जैसे सम्पादकों ने अतीत में बंगाली पाठ का जो (230 श्लोकोंवाला) एक प्रलम्ब पाठ प्रकाशित किया था उससे भिन्न पाठ चन्द्रशेखर ने स्वीकारा है। इस तरह चन्द्रशेखर ने बंगाल का जो पाठ स्वीकारा है वह अधिक पुराना एवं प्रामाणिक है।
दूसरा ध्यातव्य बिन्दु यह भी है कि टीकाकार चन्द्रशेखर जिस बंगाली पाठ को पुरस्कृत कर रहे है वह डॉ० रिचार्ड पिशेल (1876 ई.सन्) द्वारा सम्पादित जो “समीक्षित पाठ” है, उससे कुत्रचित् भिन्न और शायद पुराना पाठ है। इस सन्दर्भ में, विद्वानों के समक्ष कुछ ठोस प्रमाण रखना आवश्यक है:-(क) डॉ० रिचार्ड पिशेल ने और डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलालजी ने बंगालीलिपि में लिखित पाण्डुलिपियों में प्रत्येक अङ्क की समाप्ति पर उन अङ्कों के जो विभिन्न नाम दिये हैं, जैसे-1. इत्याखेटको नाम प्रथमोऽङ्कः। 2. इत्याख्यानगुप्तिर्नाम द्वितीयोऽङ्कः। 3. इति शृङ्गारभोगो नाम तृतीयोऽङ्कः। 4. इति शकुन्तलाप्रस्थानं नाम चतुर्थोऽङ्कः। 5. इति शकुन्तला-प्रत्याख्यानं नाम पञ्चमोऽङ्कः। इत्यादि उसे स्वीकृत रखा है एवं उल्लिखित किया है। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने तो किसी भी अङ्क के नाम का निर्देश ही नहीं किया है। सम्भव है कि इस नाटक के अङ्कों का नामाभिधान करने का प्रघात चन्द्रशेखर के काल के पश्चात् शुरू हुआ हो। (ख) डॉ० रिचार्ड पिशेल ने और डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलालजी ने अपने समीक्षित पाठ में (तृतीयाङ्क के एक सन्दर्भ में) शकुन्तला की उक्ति इस तरह दी है: अज्जउत्त, एसा खु मम वुत्तन्तोवलम्भणणिमित्तं अज्जा गोदमी आअदा। ता विडवन्तरिदो होहि। (आर्यपुत्र, एषा खलु मम वृत्तान्तोपलम्भननिमित्तम् आर्या गौतमी आगता। ततो विटपान्तरितो भव।) यहाँ पर “समीक्षित पाठ” में, कण्व मुनि के आश्रम में रहनेवाली गौतमी कौन थी? उसकी कोई पहचान नहीं दी गयी है। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने अपनी टीका में उपर्युक्त प्राकृत उक्ति के संस्कृतच्छायानुवाद में लिखा है कि-आर्यपुत्र, एषा खलु तातकण्वस्य धर्म्मभगिनी कनीयसीवार्या गौतमी मम वृत्तान्तोपलम्भननिमित्तमागता। तद् विटपान्तरितो भव।। अर्थात् चन्द्रशेखर के सामने अभिज्ञानशकुन्तल की जो पाठ परम्परा है उसमें गौतमी को कण्व मुनि
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 13
की छोटी धर्मभगिनी बताया गया है। (ग) रिचार्ड पिशेल की समीक्षितावृत्ति में कुल मिला कर 222 श्लोकोंवाला पाठ ग्राह्य रखा गया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने 225 श्लोकों पर टीका लिखी है। इसका निष्कर्ष यही है कि चन्द्रशेखर द्वारा पुरस्कृत बंगाली पाठ और “बंगाली वाचना का समीक्षित पाठ” के नाम से रिचार्ड पिशेल के द्वारा सम्पादित जो पाठ है उन दोनों में जो अन्तर है वह भी अतीव ध्यानास्पद है।
यद्यपि डॉ० रिचार्ड पिशेल ने ऐसा प्रकट शब्दों में कहा है कि उनका समीक्षित पाठ चन्द्रशेखर की टीका पर ही सम्पूर्णतया आधारित है।
Candraśekhara's text is the basis of the present edition- In the Appendix I have added his version of the Prakrit passages, and his various readings as far as they could be ascertained from his commentary.
(Pischel's Preface to the First Edititon p- 10);
Kalidasa's Śakuntala, Ed- Richard Pischel,
Harward University Press, Second ed. 1922
लेकिन अब जब चन्द्रशेखर की टीका का प्रथम बार प्रकाशन हो रहा है तब मालूम होता है कि रिचार्ड पिशेल का पाठ चन्द्रशेखर की टीका में स्वीकृत पाठ के साथ सम्पूर्णतया मिलता जुलता नहीं है। वह तो बहुशः बंगाली पाण्डुलिपिओं पर आश्रित है। अर्थात् उपलब्ध बंगाली पाण्डुलिपियों के समय से अधिक पुराने समय की यह टीका होते हुए भी, (और उसमें बंगाल का साम्प्रदायिक पाठ प्रतिबिम्बित हो रहा है फिर भी) प्राकृत उक्तियों का संस्कृतच्छायानुवाद देने के लिए भी उन्होंने सर्वत्र चन्द्रशेखर की टीका का अनुगमन नहीं किया है। एवमेव, संस्कृत उक्तियों का पाठ भी चन्द्रशेखर के द्वारा जो स्वीकृत है वह भी सूक्ष्मेक्षिका से ध्यान में नहीं लिया गया है। इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण देखने से यह बात और भी स्पष्ट होगी।
(क) तृतीयाङ्क में दोनों सहेलियों की उक्ति है:- अइ अत्तगुणावमाणिणि, को णाम संतावणिव्वाव-इत्तिअं सारदीअं जोण्हं आदवत्तेण वारइस्यदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह से किया गया है: अयि आत्मगुणावमानिनि, को नाम संतापनिर्वापयित्रीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। (3-17 के नीचे), लेकिन चन्द्रशेखर ने उसका अनुवाद इन शब्दों से किया है: आत्मगुणावमानिनि, को नाम सन्तापनिर्वाणकारिणीं शारदीयां ज्योत्स्नाम् आतपत्रेण वारयिष्यति।। यहाँ निर्वापयित्रीम् के स्थान में निर्वाणकारिणीम् ऐसा अनुवाद है।
(ख) चतुर्थाङ्क में शकुन्तला के सुशोभन के लिए वनस्पति ने जो आभरण, लाक्षारसादि दिये हैं उसको देख कर प्रियंवदा बोलती है कि-कोडरसंभवा वि महुअरी पोक्खरमहुं जेव अहिलसदि। इसका संस्कृतच्छायानुवाद डॉ० रिचार्ड पिशेल ने “कोटरसम्भवापि
14 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
मधुकरी पुष्करमधु एव अभिलषति।" ऐसा दिया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद दिया है उसमें "पुष्करमधु" के स्थान पर "पुष्परसं मधु" ऐसा पाठ है। अर्थात् चन्द्रशेखर के सामने जो प्राकृत उक्ति होगी वह डॉ० रिचार्ड द्वारा स्वीकृत पाठ से भिन्न होनी चाहिए।
(ग) षष्ठाङ्क के आरम्भ में, धीवरक की उक्ति है:-सहये किल ये वि णिन्दिदे ण हु शे कम्म विवव्यणीअके। पशुमालिं कलेदिं दालुणं अणुकम्पामिदुले वि शोणिके।।(6-1), इसका डॉ० रिचार्ड पिशेल ने संस्कृतच्छायानुवाद इस तरह दिया हैः सहजं किल यद्यपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति दारुणमनुकम्पामृदुलोपि सौनिकः।। किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने जो संस्कृतच्छायानुवाद किया है वह चतुर्थ चरण में बहुशः भिन्न है। जैसे कि-सहजं किल यदपि निन्दितं न खलु तत् कर्म विवर्जनीयम्। पशुमारणं करोति कारणात् षट्कर्मा विदुरो श्रोत्रियः।। यहाँ रिचार्ड पिशेल ने बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ की ओर ही ध्यान दिया है, और टीकाकार ने किस पाठ का आदर किया है वह नहीं देखा है। वस्तुतः पाठनिर्धारण के लिए पाण्डुलिपिओं की संख्या को निर्णायक न मान कर, टीकाग्रन्थों में संचरित हुए पुराने जमाने के पाठ का ही समादर करना चाहिए। क्योंकि प्रथम सोपान पर पाठसम्पादक का लक्ष्य तो प्राचीन से प्राचीनतर पाठ को उजागर करना ही हो सकता है।। लगता है कि रिचार्ड पिशेल ने यह नहीं सोचा है कि सौनिक (पशुघातक) को अनुकम्पामृदुल कैसे कहा जा सकता है? अर्थात् किसी अज्ञात ब्राह्मणपक्षपाती व्यक्ति ने ही श्रोत्रिय शब्द को परिवर्तित करके यह सौनिक वाला पाठ प्रस्तुत किया होगा। मतलब की कवि कालिदास के हाथ से तो श्रोत्रिय को ही अनुकम्पामृदु (अथवा षट्कर्मा विदुरः) कहा गया होगा।। यहाँ विशेष रूप से एक ही बात ध्यानार्ह है कि रिचार्ड पिशेल ने, (और इस सन्दर्भ में डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने भी) टीकाकार चन्द्रशेखर के द्वारा दिये गये श्रोत्रिय जैसे प्राचीनतर पाठ की ओर पूर्णतया ध्यान नहीं दिया है।
(घ) षष्ठाङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला का चित्र मँगवाता है और उसको देखते हुए एक श्लोक का उच्चारण करता है:-
अस्यास्तुङ्गमिव स्तनद्वयमिदं, निम्नेव नाभिः स्थिता
दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तौ समायामपि।
अङ्गे च प्रतिभाति मार्दवमिदं स्निग्धप्रभावाच्चिरं
प्रेम्णा मन्मुखमीषद्रीक्षत इव स्मेरा च वक्तीव माम्।।
\hfill 6-16
यद्यपि टीकाकार चन्द्रशेखर ने उस श्लोक की टीका में लिखा है कि "पद्यमिदम् अनतिमधुरं दाक्षिणात्यपुस्तकेष्वेव दृश्यते"। (हमारे अनुमान से यह दाक्षिणात्य पाठ
अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 15
बंगाल के दक्षिण में आया हुआ उत्कल प्रदेश होगा, क्योंकि काटयवेमादि दाक्षिणात्यादि टीकाकारों ने इस श्लोक को उल्लिखित ही नहीं किया है।) इस लिए डॉ० रिचार्ड पिशेल ने उसको अपने समीक्षित पाठ में स्थान नहीं दिया है। किन्तु रिचार्ड पिशेल ने यहाँ विदूषक की जो उक्ति को मान्यता दी है वह ध्यातव्य है:-भो भावमधुरा रेखा। स्खलति इव मे दृष्टिः निम्नोन्नतप्रदेशेषु। किं बहुना, सत्त्वानुपवेशशङ्कया आलपनकौतूहलं मे जनयति।। यहाँ विदूषक की दृष्टि चित्रित शकुन्तला की देहयष्टि के निम्न एवं उन्नतप्रदेश पर स्खलन कर रही है-इस प्रकार की अभिव्यक्ति का सम्बन्ध तो स्पष्ट रूप से उपर्युक्त श्लोक के (वर्ण्य विषय के) साथ ही है। अतः रिचार्ड पिशेल को यदि विदूषक की यह उक्ति मान्य है तो फिर उपर्युक्त श्लोक को भी रखना चाहिए था। दूसरी तरह से यह बात कही जाय तो, यह दाक्षिणात्य अर्थात् उत्कलीय परम्परा का श्लोक समीक्षित पाठ के रूप में ग्राह्य नहीं है। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर के अभिप्राय से वह अनतिमधुर श्लोक है। तो फिर इस श्लोक के साथ सम्बद्ध विदूषक की जो उक्ति (भी अनतिमधुर) थी उसको भी निकाल देना चाहिए था। समीक्षित पाठ में से विदूषक की उक्ति को हटाने की आवश्यकता का कारण न केवल उस उक्ति का अनौचित्य ही है, किन्तु टीकाकार चन्द्रशेखर ने भी विदूषक की इस उक्ति का संस्कृत च्छायानुवाद नहीं दिया है। मतलब कि चन्द्रशेखर के सामने विद्यमान जो भी बंगाली पाठपरम्परा होगी उसमें विदूषक की उक्ति होगी ही नहीं, जिसके कारण चन्द्रशेखर ने उसका संस्कृतच्छायानुवाद नहीं दिया है। यह एक ऐसा ठोस कारण है जिसकी वजह से विदूषक की पूर्वोक्त उक्ति प्रक्षिप्त होने का इशारा मिल जाता है।
(ङ) तृतीयाङ्क का एक अन्य सन्दर्भ भी द्रष्टव्य है: दुष्यन्त कहता है कि सुन्दरि, जो मधुकर होता है वह कमल की गन्ध मात्र से सन्तुष्ट रहता है (3-37)। तब शकुन्तला प्रश्न करती है कि-असंतोषे पुनः किं करोति। जिसको सुनते ही राजा “इदम् इदम्”, बोलता हुआ शकुन्तला के प्रति प्रेमचेष्टा शुरू करता है। यहाँ पर एक रंगसूचना है:- “इति व्यवसितो वक्त्र ढौकते”। डॉ० रिचार्ड पिशेल ने इसी स्वरूप में उक्त रंगसूचना को छपवाया है। लेकिन इस रंगसूचना पर चन्द्रशेखर ने जो टीका लिखी है उसको यदि हम देखें तो लगता है कि रिचार्ड पिशेलजी चन्द्रशेखर की बात को समझ ही नहीं पाये हैं। चन्द्रशेखर ने लिखा है कि शकुन्तला वक्त्रं ढौकते गृह्णाति। ......। शकुन्तला कत्री वक्त्रं ढौकते, पिधत्त इत्यर्थः। न तु चुम्बतीत्यर्थः।। अर्थात् इस रंगसूचना में दुष्यन्त को क्या करना है और शकुन्तला को क्या करना है उसकी भिन्न भिन्न दो सूचनायें रखी गयी हैं। और इस लिए रिचार्ड पिशेल को इस रंगसूचना में इति व्यवसितः के बाद एक अल्पविराम का चिह्न रखना अनिवार्य था, (जो उन्होंने नहीं
16 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
रखा है)। क्योंकि टीकाकार चन्द्रशेखर ने साफ लिखा है कि शकुन्तला के मुख पर दुष्यन्त चुम्बन करता है ऐसा अर्थ नहीं है। अन्यथा आगे चल कर दुष्यन्त जो बोलता है कि "(अस्या मुखं) कथमप्युन्नमितं, न चुम्बितं तत्" इस पङ्क्ति से विरोध आयेगा। अतः यहाँ तो ढौकते का अर्थ पिधत्ते, याने शकुन्तला (स्वयं) अपना मुख हाथों से ढकती है ऐसा ही करना चाहिए। और रंगसूचना में पाठसम्पादक को बीच में अल्पविराम का चिह्न जोड़ना चाहिए। इस दृष्टि से देखने पर बंगाली पाठ का समीक्षित पाठसम्पादन करने में टीकाकार चन्द्रशेखर की टीका का पूरा अनुगमन नहीं किया गया है यह बात सिद्ध होती है।।
सारभूत बात यही है कि किसी भी कृति के समीक्षित पाठसम्पादन में मूल कृति की पाण्डुलिपियों के साथ साथ, उन पर लिखी गयी टीकाओं का विनियोग भी प्राचीनतर पाठ को उजागर करने के लिये असाधारण महत्त्व रखता है। चन्द्रशेखर की टीका जो अद्यावधि अप्रकाशित रही थी, उसका बंगाली पाठपरम्परा का प्राचीनतर स्वरूप पुनः संप्राप्त करने के लिए एक सहायक प्रमाण के रूप में महत्त्व अनुपेक्ष्य था।
8. चन्द्रशेखर की टीका का विश्लेषण
चन्द्रशेखर ने अपनी सन्दर्भदीपिका टीका में जिन ग्रन्थों का नाम-निर्देश किया है वह इस प्रकार है:- 1. नाट्यलोचन के रचयिता त्रिलोचन मिश्र, 2. वामदेव, 3. चतुर्भुज मिश्र, 4. भर्तृहरि मिश्र, 5. अमर, 6. शंकर, 7. मेदिनी, 8. भरत, 9. भविष्यपुराण, 10. शाश्वत, 11. अद्भुतसागर, 12. विश्व, 13. यज्ञ नारायण दीक्षित (15 शती के अन्त में) प्रणीत साहित्यरत्नाकर, 14. अनन्तार्णव, 15. दर्पणकार, (विश्वनाथ द्वारा रचित साहित्यदर्पण), 16. त्रिकाण्डशेष, 17. हारावली, 18. अमरटीका, और 19. प्राकृतप्रकाश इत्यादि। इन सब के निर्देशों की गिनती की जाय तो 209 से अधिक है। जब कोई टीकाकार अपनी अभीष्ट कृति पर टीका लिखता है तब वह शब्दार्थ से लेकर वाक्यार्थ एवं काव्य-सौन्दर्य तक की सीमाओं को विशद करने की कोशिश करता है। ऐसे कार्य में यदि विविध ग्रन्थों के सन्दर्भ की दीपिका भी प्रस्तुत की जाय तो वैसी "सन्दर्भदीपिका" टीका अधिक श्रद्धेय सिद्ध होती है। चन्द्रशेखर ने अनेक स्थानों पर विविध कोषग्रन्थ के उद्धरण, भरतमुनि के विधिविधान, प्राकृतसूत्रों का प्रमाण, अलङ्कारों की पहचान प्रस्तुत करके एक अच्छे टीकाकार की भूमिका निभायी है।
चन्द्रशेखर ने उपर्युक्त जिन जिन ग्रन्थकारों का निर्देश किया है उनमें से एक, अपने पुरोगामी टीकाकार शङ्कर का अनेक स्थानों पर जो उल्लेख किया है वह ध्यानार्ह है। शंकर, जिसने अभिज्ञानशकुन्तल की मैथिली वाचना पर "रसचन्द्रिका" नामक टीका लिखी है, उसका चन्द्रशेखर ने करीब 85 बार नामशः उल्लेख किया है। लेकिन चन्द्रशेखर ने शङ्कर की टीका से कुत्रचित् प्रेरणा प्राप्त करते हुए भी, अपनी अस्मिता को बनाये रखा है। जैसा