अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
(९६) अद्भुतरामायण [अष्टादश-
सानुगः ससुतामात्यः सभ्रातृकः सबान्धवः ॥ मत्कृते च पुरी दग्धा सेतुर्बद्धश्च वारिधौ ॥ ३ ॥ सुग्रीवेण सहायेन तथा हनुमदा- दिना ॥ इदं लोकोत्तरं कर्म कृतं लोकहितं महत् ॥ ४ ॥ पुत्र अनुचर भाई बन्धुओंके सहित उसे मेरे निमित्त मारकर लंकापुरी जलायी, सागरमें पुल बांधा ॥ ३ ॥ सुग्रीव और हनुमानाजीकी सहायता लेकर यह लोकके निमित्त बडा चमत्कारी कर्म किया है ॥ ४ ॥
तथापि हृदि मे नैतदाश्चर्यं प्रतिभाति हि ॥ यदि तस्य वधं कुर्याद्रावणस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥ तदा संभाव्यते कीर्त्तिर्जगत्स्वास्थ्यम- वाप्नुयात् । अतो मे हसितं विप्राः क्षमध्वं ज्वलनोपमाः ॥ ६ ॥ . परन्तु तथापि मेरे हृदयमें कुछ आश्चर्य नहीं विदित होता है, जो इस दुरात्मा रावणका वध किया तब आपकी महान् कीर्ति फैलकर जगत् स्वस्थ हो जाय, हे अग्नितुल्य ब्राह्मणो ! इस कारण आप मेरे हास्यको क्षमा करो । ५ । ६
आकर्ण्य मुनयः सर्वे साधु साध्विति वादिनः । जानकीं प्रशंसंसुस्ते सर्वलोकहितैषिणीम् ॥ ७ ॥ राघवो वचनं श्रुत्वा सीताया वीर्यवर्द्धनम् सिंहनादं विनद्योच्चैः सर्वाना ज्ञापयत्प्रभुः ॥ ८ ॥ यह वचन सुनकर सब मुनि धन्य धन्य कहने लगे, और सब जगत्की हित-कारिणी जानकीकी प्रशंसा करने लगे ॥ ७ ॥ रामचन्द्र सीताके वीर्यवर्द्धक वचन सुनकर सिंहनाद कर सबको आज्ञा देने लगे ॥ ८ ॥
मुनयोऽद्यैव गंतव्यं रावणस्य जयाय वै । लक्ष्मणं भरतं चैव शत्रुघ्नं चादिशत्प्रभुः ॥ ९ ॥ मित्र सुग्रीव हे राजन्सर्वे जांबवदादयः । गच्छामः सहितास्तत्र सैनिकैः सह मंत्रिभिः ॥ १० ॥ हे मुनियो ! आजही हम रावणको जीतने जाते हैं लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको प्रभुने आज्ञा दी ॥ ९ ॥ हे राजन् सुग्रीव ! मित्र और सम्पूर्ण सैनिकजनोंके सहित हम वहां जायेंगे ॥ १० ॥
इत्याज्ञाप्य महाबाहुः सस्मार पुष्पकं रथम् । स्मरणादागतस्तत्र पुष्कको रथसत्तमः ॥ ११ ॥ तत्रारुक्षन्महावीरारामाचन्द्रपुरो- गमाः । भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्चामितद्युतिः १२ । - वह महाबाहु इस प्रकार कहकर पुष्पकको स्मरण करते हुए वह पुष्पक .
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१७)
विमान स्मरण करते ही आकर प्राप्त हुआ ।। ११ ।। उसके ऊपर रामचन्द्र आदि सम्पूर्ण वीर चढ़े भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न जो स्थित हुए ।। १२ ।।
सुग्रीव प्रमुखाः सर्वे वानराजितकाशिनः । विभीषणो महाबाहुः सह रक्षोगणैः प्रभुः ।। १३ ।। मात्रा पित्राप्यकथनादजानन्बोधितोनया । सीतया रामकार्यार्थं निर्ययौ राघवाज्ञया ।। १४ ।।
सुग्रीवको आदि लेकर शत्रुको जीतनेवाले वानर तथा महाबाहुविभीषण राक्षसोंके सहित स्थित हुए ।। १३ ।। माता पिता आदिसे भी न कहकर इन जानकीके प्रेरे हुए रामचन्द्रकी आज्ञासे वे सब चले ।। १४ ।।
सुमंत्राद्या मंत्रिणश्च ऋषयस्ते च निर्ययुः । नानाशस्त्रप्रहरणा धृतायुधकलापिनः ।। १५ ।। मुमुचुस्ते सिंहनादं महाघोरं महाबलाः । धनुःशब्देन रामस्य सिंहनादेन चैव हि ।। १६ ।।
सुमन्त्रादि मन्त्री और वे सब ऋषि वहांसे चले; वे सब अनेक प्रकारके आयुध धारण कर बोलनेवाले ।। १५ ।। वे महाबली घोर सिंहनाद करने लगे, रामके धनुषशब्दसे और सिंहनादसे ।। १६ ।।
चचाल वसुधा शैलाश्चेलुः पेतुर्ग्रहाश्च खात् । नद्योऽशुष्यन्समुद्वेलाः सागराश्च चकंपिरे ।। १७ ।। सुग्रीवो हनुमान्नीलो जांबवान्नल एव च । ग्रसंत इव ते सर्वे निर्ययू रामशासनात् ।। १८ ।।
पृथ्वी और शैल चलायमान हो गये, तारे टूटने लगे, नदी सूखने लगी, सागरने मर्यादा छोडदी ।। १७ ।। सुग्रीव हनुमान् नील जाम्बवंत यह सब मानो आकाशको ग्रसते हुए चले ।। १८ ।।
स तया सीतया सार्धं रामचन्द्रो महाबलः । कामगं पुष्पकं दिव्यमारुरोह धनुर्धरः ।। १९ ।। पुष्पकं ते समारुह्य सर्व एव महाबलाः । सीतया भ्रातृभिः सार्द्धं रामचन्द्रं महाबलाः ।। २० ।।
फिर सीताके सहित महाबली रामचन्द्र धनुष धारण किये कामगामी पुष्पक विमानमें स्थित हुए ।। १९ ।। वे सब महाबली पुष्पकविमानमें स्थित होकर सीता और भाइयोंके सहित रामचन्द्र स्थित हुए ।। २० ।।
प्रोत्साहयंतो वचनैर्नियर्युजितकाशिनः । रामाज्ञया पुष्पकं तदा-
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(९८) अद्भुतरामायण [अष्टादश-
काशपथमाश्रितम् ॥ २१ ॥ मनोमारुतवेगेन क्षणेन गरुडो यथा ॥ जगाम पुष्करद्वीपं यत्रास्ते मानसोत्तरः ॥ २२ ॥ वे शत्रुके जीतनेवाले थे उनको अपने वीरताके वचनोंसे उत्साह करते हुए तब रामचन्द्रकी आज्ञासे पुष्कविमान आकाशमें प्राप्त हुआ ॥ २१ ॥ मन और पवन तथा गरुडके समान वेगकर मानसोत्तर पुष्करद्वीपमें क्षणमात्रमें प्राप्त हुआ ॥ २२ ॥
मानसोत्तरमासाद्य विस्मितास्ते महाबलाः ॥ किं चित्रं किं चित्रमिति प्रोचुराश्चर्यलक्षणाः ॥ २३ ॥ राघवो भ्रातृभिः सार्द्धं सह वानरपुंगवैः ॥ सिंहनादं ननादोच्चैर्धनुश्चापि व्यकर्षयत् ॥ २४ ॥ मानसके उत्तर भागमें प्राप्त होकर वे महावली विस्मित हुए कैसा विचित्र है ? इस प्रकार वे वारंवार कहने लगे ॥ २३ ॥ रामचन्द्रने वानर और भ्राताओंके साथ सिंहनाद करके धनुषको खैंचा ॥ २४ ॥
स शब्दस्तुमुलो भूत्वा पृथिवीं चांतरिक्षकम् ॥ पातालविवरांश्चैव पूरयामास सर्वतः ॥ २५ ॥ रावणः सहसोत्तस्थौ किमेतदिति संव- दन् ॥ तत्राथ राक्षसाः क्रुद्धाः सर्व एव विनिर्ययुः ॥ २६ ॥ वह तुमुलशब्द पृथ्वी अन्तरिक्षाऔर सब ओरसे पातालके विवरोंको पूर्ण करता हुआ ॥ २५ ॥ तब रावण यह क्या है ऐसा कहकर एक साथ उठ बैठा और वहांके सब राक्षस क्रोध कर एक साथ वहां निकले ॥ २६ ॥
अहो कुतः स्विच्छब्दोऽयं साधु सर्वैर्निरूप्यताम् ॥ इत्याभाष्य राक्षसेंद्रो राक्षसैर्द्रर्महाबलैः ॥ २७ ॥ नगरान्निर्ययौ शीघ्रं संदष्टोष्ठ- पुटो बली ॥ द्वादशादित्यसंकाशः सहस्रवदनो महान् ॥ २८ ॥ और बोले जान्ना चाहिये कि, यह शब्द कहांसे होता है, इस प्रकार वह राक्षसेन्द्र महावली राक्षसोंके साथ शीघ्र ॥ २७ ॥ होठ चबाता हुआ निकला वह बारह सूर्यके समान सहस्र मुखका महाबली था ॥ २८ ॥
द्विसहस्रभुजोद्रिक्तो द्विसहस्रविलोचनः ॥ महामेघसमध्वानो वडवाग्निसमः क्रुधा ॥ २९ ॥ शतयोजनविस्तीर्णे रथे सूर्यसमत्विषि । नानायुधानि संगृह्य परिघप्रासतोमरान् ॥ ३० ॥ दो सहस्र भुजा और सहस्र नेत्रवाला महामेघके समान वडवा अग्निके समान क्रोध किये ॥ २९ ॥ सूर्यके समान कांतिमान् अनेक प्रकारके आयुध परिघ प्रास तोमर लेकर ॥ ३० ॥
सर्ग ] .हिन्दीटीकासहित (९९)
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भुशुण्डिः परशून्घंटां लोहं मुद्गरचक्रकम् ।। पाशांश्च विविधा- न्गृह्य बाणान्कर्मारर्जितान् ।। ३१ ।। विपाठान्क्षुरधारांश्च अर्धचन्द्रा- कृतीनपि ।। नानायुधसहस्राणि नानाविधधनूंषिच ।। ३२ ।।
भुशुण्डी परशु घंटे लोहे मुद्गर चक्र पाश तथा बाणोंको ग्रहण कर ॥३१॥ विपाठ क्षुरधार अर्धचन्द्रके आकार सहस्रों आयुध और अनेक प्रकारके धनुष ।। ३२ ।।
प्रगृह्य सहसा प्रायाद्यत्र रामो धनुर्धरः ।। लोचनैः क्रोधसंदीप्तैरु- ल्काभिरिव दीपितः ।। ३३ ।। कोयमित्यब्रवीत्क्रोधादलं प्रोद्वमन्निव ।। सिंहनादं मम पुरे रिपुत्वाद्विससर्ज ह ।। ३४ ।।
लेकर जहां धनुर्धर रामचन्द्र थे वहां आये, क्रोध भरे नेत्र मानो उल्कासे दीपित हुए ।। ३३ ।। अग्निको क्रोधसे वमन करता कहने लगा, यह कौन है ? कि शत्रु होकर मेरे पुरमें सिंहनाद करता है ।। ३४ ।।
ममापि रिपुरस्तीति दुर्यशः समुपस्थितम् ।। इंद्राद्याः ककुभां नाथा भृत्याः प्राणपरीप्सया ।। ३५ ।। पातालविवरे स्वर्गं स्वर्गे पातालमेककम् ।। करोमि सहसैवाहं मानवानां तथैकताम् ।। ३६ ।।
मेरेभी शत्रु हैं, यह मेरा वडा दुर्यश प्राप्त हुआ है, इन्द्रादि लोकपाल तो मेरे दासवत हैं ।। ३५ ।। पातालके छिद्रोंमें स्वर्गको स्वर्गमें पातालको तथा मनुष्योंकोभी एकत्र कर सकता हूं ।। ३६ ।।
मेरुप्रभृतिशैलांश्च चूर्णयाम्यणुसंख्यया ।। देवलोकं नृणां कुर्यान्नृ- लोकं त्रिदिवौकसाम् ।। ३७ ।। उद्धृत्य पृथिवीं छिद्यामनंतं नखरा- ग्रकैः ।। ब्रह्मा मां वारयामास सांत्वयन्प्रियभाषितैः ।। ३८ ।।
मेरुप्रभृति पर्वतोंको मैं चूर्ण कर सकता हूँ देवलोकको मनुष्यलोक और मनुष्य लोकको देवलोक कर सकता हूं ।। ३७ ।। पृथ्वी और शेषजीको नखोंसे उद्धृत कर सकता हूं और करताही था कि, ब्रह्माजीने आकर इस कार्यसे मुझको निवारण किया ।। ३८ ।।
अन्यथा राक्षसमृते नारदं जगतीतले ।। सूर्य्याचन्द्रमसौ भूत्वा तिथिप्रणयनं त्वहम् ।। ३९ ।। बलाहकत्वमिंद्रत्वं पृथ्वीसेकादिकाः क्रियाः ।। कुर्यां यमत्वं वह्नित्वं वरुणत्वं धनेशताम् ।। ४० ।।
( १०० ) अद्भुतरामायण [ अष्टादश-
नहीं तो राक्षसोंके सिवाय पृथ्वीमें और किसीको न रखता, सूर्य चन्द्रमा होकर मैं ही तिथिका प्रणयन करता ॥ ३९ ॥ मेघपन, इन्द्रपन, पृथ्वीको सेकादि क्रिया, यमत्व अग्नित्व वरुणंत्व कुबेरत्व मैं ही कर सकता हूं ॥ ४० ॥
इत्येवं बहुधा गर्जन्नाजगामांतिकं हरेः ॥ सेनाध्यक्षा राक्षसेंद्रा राज्ञा सार्द्धं सामागताः ॥ ४१ ॥ नानाप्रहरणोपेता नानारथपदातिनः ॥ एकैकस्यापि पर्याप्ता जगती नेति मन्महे ॥ ४२ ॥
इस प्रकार अनेक प्रकारसे गर्जना करता हुआ रामके समीप आया, सेनाध्यक्ष राक्षसेन्द्र राजाके साथ आये ॥ ४१ ॥ यह सब नाना प्रकारके प्रहार लिये अनेक रथ पैदलोंसे युक्त एक ऐसे वीर थे कि, पृथ्वीमें वलसे नहीं समा सकते थे ।४२।
केषांचिदपि नामानि भारद्वाज निबोध मे ॥ कोटिशो मनसः पूर्णः शलः पालो हलीमुखः ॥ ४३ ॥ पिच्छलः कौणपश्चक्रः कालवेगः प्रकाशकः ॥ हिरण्यबाहुः शरणः कक्षकः कालदन्तकः ॥ ४४ ॥
हे भरद्वाज ! उनमें कुछेकके नाम मुझसे सुनो । कोटिश, मनस, पूर्ण, शल, पाल, हलीमुख ॥ ४३ ॥ पिच्छल, कौणप, चक्र, कालवेग, प्रकाशक, हिरण्यबाहु, शरण, कक्षक, कालदन्तक ॥ ४४ ॥
पुच्छाण्डको मंडलकः पिंडसेक्ता रभेणकः ॥ उच्छिखः करभो भद्रो विश्वजेता विरोहणः ॥ ४५ ॥ शिली शलकरो मूकः सुकुमारः प्ररेषणः ॥ मुद्गरः शशरोमा च सुरोमा च महाहनुः ॥ ४६ ॥
पुच्छाण्डक, मण्डलक, पिण्डसेक्ता, रभेणक, उच्छिख, करभ, भद्र, विश्वजेता, विरोहण ॥ ४५ ॥ शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्ररेषण, मुद्गर, शशरोमा, सुरोमा, महामनु ॥ ४६ ॥
पारावतः पारियात्रः पांडुरो हरिणः कृशः ॥ विहंगः शरभो दक्षः प्रमोदः सहपातनः ॥ ४७ ॥ कृकरः कुण्डरो वैणीवेणीस्कंधः कुनारकः ॥ बाहुकः शंखवेगश्च धूर्त्तकः पातपातको ॥ ४८ ॥
पारावत, पारियात्र, पाण्डुर, हरिण, कृश, विहंग, शरभ, दक्षप्रमोद, सहातापन ॥ ४७ ॥ कृकर, कुंडर वैणी, वेणीस्कंद, कुमारक, बाहुक, शंखवेग धूर्त्तक, पात, पातक ॥ ४८ ॥
शंकुकर्णः पिटरकः कुटीरमुखसंचकौ ॥ पूर्णांगदः पूर्णमुखः प्रभाषः शकुलिर्हरिः ॥ ४९ ॥ अमाहिठः कामठकः सुषेणो मानसो व्ययः ॥ भैरवो मुण्डदेवांगः पिशंगश्चोडपालकः ॥ ५० ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०१)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०१)
. शंकुकर्ण, पिटरक, कुटीरमुख, सेचक, पूर्णमुख, भाष, शकुलि,हरि ॥ ४९ ॥ अमाहिठ, कामठक, सुषेण, मानस, व्यय; भैरव, मुण्ड, देवांग, चोडपालक ॥ ५० ॥
ऋषभो वेगवान्नाम पिंडारकमहाहनू ॥ रक्तांगः सर्वसारंगः समृद्धः पाटवाकसौ ॥ ५१ ॥ वराहको रावणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः ॥ पराशरस्तरुणिको मणिस्कन्धस्तथारुणिः ॥ ५२ ॥
ऋषभ, वेगवान्, पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारङ्ग, समृद्ध, पाट, वासक ॥ ५१ ॥ वराहक, रावणक, सुत्रिच, चित्रवेगिक, पराशर, तरुणिक, मणिस्कंध, अरुणि ॥ ५२ ॥
सेनाध्यक्षा महाब्रह्मन्कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः ॥ प्राधान्येन बहुत्वात्तु न सर्वे परिकीर्तिताः ॥ ५३ ॥ न शक्याः परिसंख्यातुं ये युद्धाय समागताः॥नीलरक्ता सिता घोरा महाकाया महाबलाः ॥ ५४ ॥
हे ब्रह्मन् ! यह महाकीर्तिवर्द्धन सेनाध्यक्ष कहे हैं प्रधानभी बहुत हैं, विस्तारके कारण सबका वर्णन नहीं किया ॥ ५३ ॥ युद्ध करनेको आये थे उनकी संख्या नहीं हो सकती, नील रक्त सित घोर महाकाय महाबली ॥ ५४ ॥
सप्तशीर्षाद्विशीर्षाश्च पञ्चशीर्षास्तथापरे । कालानलमहाघोरा हुताशसमविग्रहाः ॥ ५५ ॥ महाकाया महावेगाः शैलशृंगसमुच्छ्रयाः । योजनायामविस्तीर्णाद्वियोजनसमुच्छ्रयाः ॥ ५६ ॥
सात शिरके दो शिरके पांचशिरके कालानलके समान महाघोर अग्निके समान शरीरवाले ॥ ५५ ॥ महाकाय महावेगवान् शैलशृंगके समान ऊंचे एक योजनके चौड़े दो योजनके ऊंचे ॥ ५६ ॥
कामरूपाः कामबला दीप्तानलसमत्विषः । अन्ये च बहवः शूराः शूलपट्टिशधारिणः ॥५७॥ दिव्यप्रहरणोपेता नानावेषविभूषिताः ॥ शृणु नामानि चान्येषां येऽन्ये रावणसैनिकाः ॥ ५८ ॥
कामरूपी कामबली दीप्त अनलके समान कान्तिमान् और भी बहुतसे शूर शूल पट्टिश लिये ॥ ५७ ॥ दिव्य प्रहारसे नाना युक्त वेषसे विभूषित थे, रावणके सेनापतियोंके नाम सुनो ॥ ५८ ॥
शंकुकर्णोनिकुम्भश्च पद्मः कुमुद एव च ॥ अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ ॥ ५९ ॥ घ्राणश्रवाः कपिस्कंधः कांचनाक्षो जलन्धमः ॥ अक्षसंतर्दनो ब्रह्मन्कुनदीकस्तमोऽभ्रकृत् ॥ ६० ॥
(१०२) अद्भुतरामायण [ अष्टादश
- शंकुकर्ण, निकुम्भ, पद्म, मुकुद, अनन्त, द्वादशभुजा, कृष्ण उपकृष्ण ।। ५९ ।। घ्राणश्रवा, कपिस्कंध, कांचनाक्ष, जलन्धम, अक्षसंतर्दन ,कुनदीक, तमोभ्रकृत् ।। ६० ।।
एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजराभिधः ।। सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राख्य क्षितिकंपनः ।। ६१ ।। पुण्यनामानुनामा च सुवक्त्रः प्रियदर्शनः ।। परिश्रितः कोकनदः प्रियमाल्यानुलेपनः ।। ६२ ।।
एकाक्ष, द्वादशाक्ष, एकजरा, सहस्रबाहु, विकट; व्याघ्र क्षितिकंपन ।। ६१ ।। पुण्यनाम, अनुनाम, सुवक्त्र, परिश्रित, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन ।। ६२ ।।
अजोदरो गजशिराः स्कंधाक्षः शतलोचनः ।। ज्वालाजिह्वः करालश्च सितकेशो जटी हरिः ।। ६३ ।। चतुर्दंष्ट्रोष्ठजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः ।। विकृताक्षो धनुर्वक्त्रो जाठरो मारुताशनः ।। ६४ ।।
अजोदर, गजशिर, स्कन्धाक्ष, शतलोचन, ज्वालाजिह्व, कराल, सितकेश, जटी, हरि ।। ६३ ।। चतुर्दंष्ट्र, ओष्ठजिह्व, मेघनाद, पृथुश्रव, विकृताक्ष, धनुर्वक्त्रः जाठर मारुताशन ।। ६४ ।।
उदाराक्षो रथाक्षश्च वज्रनाभो वसुप्रभः ।। समुद्रवेगो विपेन्द्रः शैलकम्पी तथैव च ।। ६५ ।। वृषमेषप्रवाहश्च तथा नंदोपनंदकौ ।। धूम्रश्वेतः कलिंगश्च सिद्धार्थो वरदस्तथा ।। ६६ ।।
उदाराक्ष; रथाक्ष, वज्रनाभ, वसुप्रभ, समुद्रवेग, शैलकंपी ।। ६५ ।। वृषमेषप्रवाह, नन्द, उपनन्द, धूम्रश्वेत, कलिंग, सिद्धार्थ, वरद ।। ६६ ।।
प्रियकश्चैकनन्दश्च बहुवीर्यः प्रतापवान् ।। आनंदश्च प्रमोदश्च स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा ।। ६७ ।। क्षेमबाहुः सुबाहुश्च सिद्धपात्रश्च सुव्रतः ।। गोव्रजः कनकापीडो महापारिषदेश्वरः ।। ६८ ।।
प्रियक, एकनन्द, बहुवीर्य, प्रतापवान् आनन्द, प्रमोद; स्वस्तिक ध्रुव ।। ६७ ।। क्षेमबाहु, सिद्धपात्र, सुव्रत, गोव्रज, कनकापीड, महापारिषदेश्वर ६८
गायनो दमनश्चैवः बाणः खङ्गश्च वीर्यवान् ।। वैताली गतिताली च तथा कथकवातिकौ ।। ६९ ।। हंसजः पंकदिग्धांगः समुद्रोन्मादनश्च ह ।। रणोत्कटः प्रहासश्च वेतसिद्धश्च नन्दकः ।। ७० ।।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०३)
गायन, दमन, वाण, वीर्यवान्, खड्ग वैताली, गतिताली, कथक वोतिक ॥ ६९ ॥ हंसज, पंकदिग्धांग, समुद्र, उन्मादन, रणोत्कट, प्रहास, वेतसिद्ध नन्दक ॥ ७० ॥
एते पुरा रावणसैन्यपाला नानायुधप्राहरणा रणेषु ॥ हंसेषु मेषेषु वृषेषु वीरा रामं प्रतस्थुः कृतसिंहनादाः ॥ ७१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. अद्भुतोत्तरकाण्डे रावण सैन्यनिर्याणं नामाष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
यह रावणके सेनापति युद्धमें अनेक प्रकारके प्रहार करनेवाले हंस मेष वृषके ऊपर चढे सिंहनाद करते रामसे युद्ध करनेको चले ॥ ७१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आ. अ. भाषाटीकायां रावणसैन्यनिर्माणं नामाष्टादश सर्गः ॥ १८ ॥
एकोनविंश सर्ग
सहस्रमुखी रावणके पुत्रोंका युद्धको चलना
रावणस्यौरसाः पुत्रास्सह राक्षसपुंगवैः ॥ नानाप्रहरणोपेता दुद्रुवू राघवं रणे ॥ १ ॥ नामान्येषां प्रवक्ष्यामि भरद्वाज शृणुष्व मे ॥
कालकण्ठः प्रभाषश्च तथा कुम्भाण्डको परः ॥ २ ॥
रावणके औरस पुत्र महाराक्षसोंके साथमें अनेक प्रकारके प्रहार लेकर धावमान हुए ॥ १ ॥ हे भरद्वाज ! उनके नाम मैं कहता हूं सो तू मुझसे सुन; कालकण्ठ, प्रभाष, कुम्भांडक ॥ २ ॥
कालकक्ष शितश्चैव भूतलोन्मथनस्तथा ॥ यज्ञबाहुः प्रबाहुश्च देवयाजी च सोमदः ॥ ३ ॥ मज्जालश्च महातेजाः क्रथः क्राथोवसुव्रतः ॥ तुहरश्च तुहारश्च चित्रदेवश्च वीर्यवान् ॥ ४ ॥
कालकक्ष, शित, भूतल, उन्मथन, यज्ञबाहु, प्रवाहू देवयाजी, सोमप ॥ ३ ॥ महातेजस्वी, मज्जाल, क्रथ, क्राथ, वसुव्रत, तुहर, तुहार, वीर्यवान्, चित्रदेव ॥ ४ ॥
१ आरूढा इति शेषः ।
(१०४) अद्भुतरामायण [ एकोनविंश-
मधुरः सुप्रसादश्च किरीटश्च महाबलः॥ वसनो मधुवर्णश्च कलशोदर एव च ॥ ५ ॥ धर्मदो मन्मथकरः सूचीवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ श्वेतवक्त्रः सुवक्त्रश्च चारुवक्त्रश्च पाण्डुरः ॥ ६ ॥
मधुर, सुप्रसाद, महाबली, किरीट, वसन, मधुवर्ण, कलशोदर ॥ ५ ॥ धर्मद, मन्मथकर, वीर्यवान्, सूचिवक्त्र श्वेतवक्त्र, सुवक्त्र, चारुवक्त्र, पाण्डुर ॥ ६ ॥
दण्डबाहुः सुबाहुश्च रजः कोकिलकस्तथा ॥ अचलः काल- काक्षश्च बालेशो बालभक्षकः ॥ ७ ॥ संचानकः कोकनदो गृध्रपत्रश्च जम्बुकः ॥ लोहाजवक्त्रो जवनः कुम्भवक्त्रश्च कुम्भकः ॥ ८ ॥
दण्डबाहु, सुबाहु, कोकिलक, अचल, कालाकाक्ष, बालेश, बालभक्षक ॥ ७ ॥ सञ्चानक, कोकनद, गृध्रपत्र, जम्बूक, लोहाजवक्त्र, जवन, कुम्भ- वक्त्र ॥ ८ ॥
मुंडग्रीवश्च कृष्णौजा हंसवक्त्रश्च कुंर्जरः ॥ एते रावणपुत्राश्च महावीरपराक्रमाः ॥ ९ ॥ बाहुशब्दैः सिंहनादैः पूरयंतो दिशो दश ॥ एषां सैन्यसहस्राणां सहस्राण्यर्बुदानि च ॥ १० ॥
मुंडग्रीव, कृष्णौजा, हंसवक्त्र, कुञ्जर, यह रावणके पुत्र महाबली और पराक्रमी थे ॥ ९ ॥ बाहुशब्द और सिंहनादसे दशों दिशाओंको पूर्ण करते हुए, इनकी सेनाके सहस्रों और अर्बों ॥ १० ॥
नानाकृतिवयोरूपा विविधायुधपाणयः ॥ कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च सर्पजम्भकवक्त्रकाः ॥ ११ ॥ गोमायुमुखवक्त्राश्च शशोलूकमुखा- स्तथा ॥ खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा ॥ १२ ॥
अनेक प्रकारकी आकृति वय रूपवाले अनेक आयुध हाथमें लिये, कूर्म कुक्कुटमुखवाले सर्प जम्भकसे मुखवाले ॥ ११ ॥ शृगालमुखवाले शशक और खरगोशके मुखवाले, खर उष्ट्र तथा वराहके मुखवाले ॥ १२ ॥
मनुष्यमेषवक्त्राश्च शृगालवदनास्तथा ॥ मार्जारशशवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च केचन ॥ १३ ॥ नकुलोलूकवक्त्रश्च काकवक्त्रास्तथा- परे ॥ आखुबभ्रुकवक्त्राश्च मयूरवदनातस्था ॥ १४ ॥
मनुष्य मेष शृगाल मार्जार शशाके मुखवाले, कोई दीर्घमुख ॥ १३ ॥ नकुल, उलूकमुख, काक, आखु, बभ्रुमुख, मोरमुख ॥ १४ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०५)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०५)
मत्स्यमेषाननाश्चैव अजाविमहिषाननाः ।। ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्च द्वीपिंसिहाननास्तथा ।। १५ ।। भीमा गजाननाश्चैव तथा नक्रमुखा- स्तथा ।। गोखरोष्ट्रमुखाश्चान्ये वृषदंशमुखास्तथा ।। १६ ।। मत्स्य मेष अजा मुखवाले ऋक्ष, शार्दूल द्वीप, और सिंहमुखवाले ।। १५ ।। भयंकर हाथीकेसे मुखवाले, नाकेके समान मुखवाले, गो, खर उष्ट्र वृष दंष्ट्रमानस के मुखवाले ।। १६ ।।
महाजठरपापांगाः स्तवकाक्षाश्च दुर्मुखाः ।। पारावतमुखाश्चान्ये तथा वृषमुखाः परे ।। १७ ।। कोकिलाभाननाश्चान्ये श्येनतित्तिरिका- ननाः ।। कृकलासमुखाश्चैव विरजोऽम्बरधारिणः ।। १८ ।। महाजठरेपाद अंगवाले, स्तवकाक्ष, दुर्मुख, पारावतमुख, वृषमुख ।। १७ ।। कोकिलाम्रख, तित्तिरि मुख, कृकलासमुख, श्वेतवस्त्र धारण किये ।। १८ ।।
व्यासवक्त्राः शुकमुखाश्चंडवक्त्राः शुभाननाः ।। आशीविषाश्चीर- धरा गोनासावरणास्तथा ।। १९ ।। स्थूलोदराः कृशांगाश्च स्थूलां- गाश्च कृशोदराः ।। ह्रस्वग्रीवा महाकर्णा नानाव्यालविभूषणाः ।।२०। व्यालमुख शुकमुख, चण्डमुख, शुभानन, आशीविष, चीरबारी, गोनासाव- रण ।। १९ ।। स्थूलोदर, कृशांग, कृशोदर, ह्रस्वग्रीव, महाकर्ण अनेक व्यालके भूषणवाले ।। २० ।।
गजेंद्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनांबराः ।। स्कंधेमुखा द्विजश्रेष्ठ तथा ह्युदरतोमुखाः ।। २१ ।। पृष्ठेमुखा हनुमुखास्तथा जंघामुखा- स्तथा ।। पार्श्वाननाश्च बहवो नानादेशमुखास्तथा ।। २२ ।। गजेन्द्रके चर्मका वस्त्र पहरे, काले वस्त्रधारे, स्कंधमें मुखवाले, उदरमें मुखवाले ।। २१ ।। पीठमें मुखवाले हनुमुख, जंघामुख, पार्श्वानन नानादेशमें मुखवाले ।। २२ ।।
तथा कीटपतंगानां सदृशास्या महाबलाः ।। नानाव्यालमुखा- श्चान्ये बहुबाहुशिरोधराः ।। २३ ।। नानावक्षोभुजाः केचिद्भुजंग- वदनाः परे ।। खड्गमुखा वृकमुखा अपरे गरुडाननाः ।। २४ ।। कीट पतंगोंके समान मुखवाले, महाबली, सर्वमुखवाले, बहुत बाहु और शिरवाले ।। २३ ।। अनेक छाती भुजावाले, कोई भुजंगमुख, खड्ग, वृक गरुडके समान मुखवाले ।। २४ ।।
(१०६) अद्भुतरामायण [ एकोनविंश -
चोलसंवृतगात्राश्च नानाफलकवाससः ॥ नानावेषधराश्चान्ये नानामाल्यानुलेपनाः ॥ २५ ॥ नानावस्त्रधराश्चान्ये चर्मवासस एव च ॥ उष्णीषिणो मुकुटिनः कंबुग्रीवाः सुवर्चसः ॥ २६ ॥
कुरतोंसे शरीर ढके फलक वस्त्रवाले, नानावेषधारी नानामालाओंका अनुलेपन लगाये, नाना वेषधारी अनेक माला और अनुलेपन लगाये ॥ २५ ॥ नानावस्त्र और चर्म धारण किये पगडी मुकुटवाले शंखकेसी गर्दन सुन्दर कान्तिवाले ॥ २६ ॥
किरीटिनः पंचशिखास्तथा कठिनमूर्द्धजाः ॥ त्रिशिखा द्विशिखाश्चैव तथा सप्तशिखा अपि ॥ २७ ॥ शिखण्डिनोऽमुकुटिनो मुंडाश्च जटिलास्तथा ॥ चित्रमालाधराः केचित्केचिद्रोमाननास्तथा ॥ २८ ॥
किरीटधारी, पंचशिख, कठिन केशवाले, तीन शिखा और दो शिखावाले सात शिखावाले ॥ २७ ॥ शिखण्डी, मुकुटरहित, मुण्ड जटिल, चित्रमालाधारी कोई रोमानन ॥ २८ ॥
विग्र*हैकवशा नित्यमजेयाः सुरसप्तमैः॥ कृष्णा निर्मंसवक्त्राश्च दीर्घपृष्ठा *निरूदराः ॥ २९ ॥ दीर्घपृष्ठा स्थूलपृष्ठाः प्रलम्बोदरमेहनाः ॥ महाभुजा ह्रस्वभुजा ह्रस्वगात्राश्च वामनाः ॥ ३० ॥
युद्धमें देवताओंको अजय, काले निर्मंस मुख, दीर्घपृष्ठ, और उदरवाले ॥ २९ ॥ दीर्घपृष्ठ, स्थूलपृष्ठ, प्रलम्ब उदर और मेहनवाले, महाभुज, ह्रस्वभुज, ह्रस्वगात्र, वामन (बौने) ॥ ३० ॥
कुब्जाश्च ह्रस्वजंघाश्च हस्तिकर्णशिरोधराः ॥ हस्तिनासाः कूर्मनासा वृकनासास्तथापरे ॥ ३१ ॥ वारणेन्द्रनिभाश्चान्ये दीप्तिमंतः स्वलंकृताः ॥ पिंगाक्षाः शंकुकर्णाश्च वक्रनासास्तथापरे । ३२ । पृथुदंष्ट्रा महादंष्ट्राः स्थूलोष्ठा हरिमूर्द्धजाः ॥ नानापादौष्ठदंष्ट्राश्च नानाहस्तशिरोधराः ॥ ३३ ॥ नानाचर्मभिराच्छन्ना नानावासाश्च सुव्रत ॥ हृष्टाः परिपतन्ति स्म महापरिघ बाहवः ॥ ३४ ॥
कुबडे, ह्रस्वजंघ, हाथीकेसे कान और शिरवाले, हस्तिनास, कूर्मनास वृकनास, ॥ ३१ ॥ कोई वारणेन्द्रके समान, दीप्तिमान्, अलंकृत, पिंगाक्ष, शंकुकर्ण, वक्रनास ॥ ३२ ॥ पृथुदंष्ट्र, महादंष्ट्र, स्थूलोष्ठ, हरिकेश, नानाचरण
* विग्रहो युद्धम् * दीर्घत्वमार्षम् ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०७)
ओष्ठ दाढोंवाले, अनेक हाथ और शिरवाले ॥ ३३ ॥ अनेक चर्मोंसे आच्छा- दित; अनेक प्रकारके वस्त्रधारे, महापस्घिके समान भुजवाले, प्रसन्न हो युद्ध करनेको चले ॥ ३४ ॥
दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरोभुजाः ॥ पिंगाक्षा नीलकण्ठाश्च स्वर्णकर्णाश्च सुव्रत ॥ ३५ ॥ वृकोदरनिभाः केचित्केचिदंजनसं निभाः ॥ श्वेताक्षा लोहितग्रीवाः पिंगाक्षाश्चतथापरे ॥ ३६ ॥
दीर्घगर्दन, दीर्धनख, दीर्घचरण, दीर्घ शिर और भुजवाले, पिंगाक्ष, नीलकंठ, स्वर्णकर्णवाले ॥ ३५ ॥ कोई वृकोदरके समान, कोई अञ्जनपर्वतके समान, श्वेताक्ष, लोहितग्रीव, पिंगाक्ष ॥ ३६ ॥
कल्माषबाहवो विप्र चित्रवर्णाश्च केचन ॥ चामरापीडकनिभाः श्वेत लोहितकान्तयः ॥ ३७ ॥ नानावर्णाः सुवर्णाश्च मयूरसदृश- प्रभाः ॥ पाशोद्यतकराः केचिद्व्यादितास्याः खराननाः ॥ ३८ ॥
हे विप्र ! कोई कल्माष (काली) भुजावाले, कोई चित्रवर्ण, चमरकी पीडाके समान, श्वेत और लाल कांतिवाले ॥ ३७ ॥ अनेक वर्ण और सुवर्ण मोरके समान कांतिवाले, कोई पाश हाथमें उठाये, कोई मुखफैलाये खरके समान मुखवाले ॥ ३८ ॥
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा मुसलपांणयः ॥ असिमुद्गरहस्ताश्च दंडहस्ताश्च केचन ॥ ३९ ॥ गदाभुशुण्डिहस्ताश्च तथा तोमरपा- णयः ॥ आयुधैर्विविधैर्घोरैर्महात्मानो महौजसः ॥ ४० ॥
शतघ्नी, चक्र हाथमें लिये, मुसलहाथमें लिये; कोई असि मुद्गर हाथमें लिये, कोई दंड हाथमें लिये ॥ ३९ ॥ गदा भुशुण्डी हाथमें लिये, तोमरे हाथमें लिये तथा महात्मा लोग अनेक घोर आयुध हाथमें लिये ॥ ४० ॥
महाबला महावेगा असंख्याता विनिर्ययुः ॥ घंटाजालपिनद्धांगा ननृतुस्ते रणाजिरे ॥ ४१ ॥ कोटिशो विक्रतरूक्षभाषिणो यातुधान- गणसैन्यपालकाः॥दुद्रुवू रघुकुलावतं सकं गृह्णधावनपोथ वादिन ४२॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे रावणपुत्रनिर्याण नामैकोनविंश सर्गः ॥ १९ ॥
महाबली महावेगवान् असंख्यों चले और घंटाजालसे नद्ध हुए रणस्थलमें नृत्य करने लगे ॥ ४१ ॥ असंख्य विकृत और रूखे बोलनेवाले, राक्षसोंकी
(१०८) अद्भुतरामायण [ विशंति-
सेना पालनेवाले रामचन्द्रके ऊपर धावमान हुए; और पकडो २ ऐसे कठोर वचन बोलने लगे ॥ ४२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां रावण- पुत्रनिर्याणं नाम एकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥
विशंति सर्ग
संकुलयुद्धवर्णन
धनूंषि च विधुन्वानस्ततो वैश्रवणानुजः ।। कोऽयं किमर्थमायातः इति चिन्तापरोऽभवत् ।। १ ।। ततो गगनसंभूता वाणी समुपद्यत ।। भो रावण महावीर्य रामोऽयं समुपागतः ।। २ ।।
तब वह सहस्त्रमुख रावण धनुष्यको कम्पायमान करता हुआ यह कौन कहाँसे आया है यह चिन्ता करने लगा ॥ १ ॥ तब उस समय आकाशसे वाणी हुई हे महावीर्यवान् रावण ! यह रामचन्द्र आये हैं ॥ २ ॥
राघवोऽयमयोध्याया राजा धर्मस्वरूपधृक् ।। लंकायां निहतो येन दाराकर्शो तवानुजः ।। ३ ।। त्वद्वधार्थमिहायातो विभीषण वसुप्रदः ।। भ्रातृभिर्वानरैर्ऋक्षै राक्षसैर्मानुषैर्युतः ।। ४ ।।
यह धर्मस्वरूपधारी राम अयोध्याके राजा हैं, यह धर्मका स्वरूप हैं जिन्होंने लंकामें रावणका वध किया है ॥ ३ ॥ यह विभीषणके राज्य देनेवाले हैं। भाई, वानर, ऋक्ष, राक्षस, मनुष्योंको साथ आये हैं ॥ ४ ॥
श्रुत्वा ह्यमानुषं वाक्यं रावणो लोकरावणः ।। क्रोधमाहारयामास द्विगुणं मुनिपुंगव ।। ५ ।। हन्यतां वध्यतामेष मानुषो रिपुसंज्ञितः ।। मम विश्वजितः साक्षाद्रणाय समुपस्थितः ।। ६ ।।
लोक रावण रावण यह अमानुषी वचन सुनकर दूना क्रोध करता हुआ बोला ॥ ५ ॥ इस मनुष्यसंज्ञक शत्रुको मारो, वध कर डालो, यह मुझ विश्वके जीतनेवालेसे युद्ध करनेको स्थित हुआ है ॥ ६ ॥
इत्युक्त्वा बाणजालानि चक्रपर्वततोमरान् ।। चिक्षेप सहसा रक्षः पुष्पकोपरि सुव्रतः ।। ७ ।। राक्षसी सा चमूर्घोरा वानरानृक्ष- 'मानुषान् ।। चखादकांश्चिदपरान्पोथयामासदर्पितान् ।। ८ ।।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०६)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०६)
ऐसा कहकर बाणसमूह चक्र पर्वत तोमर वह राक्षस पुष्पकके ऊपर छोडने लगा ॥ ७ ॥ और वह घोर राक्षसी सेना वानर ऋक्ष मनुष्योंको खाती दूसरोंको नष्ट करने लगी ॥ ८ ॥
सा च शाखामृगी सेना राघवस्य च मानुषी । रावणस्यानुगान्धी- राञ्जघान बाणपर्वतैः ॥ ९ ॥ तेऽन्योन्यवधमिच्छंतो युयुधुः सैनिको- त्तमाः ॥ पेतुर्मम्लुश्च मुमुहू राक्षसा वानरा नराः ॥ १० ॥
और वह रामचन्द्रकी मानुषी और वानरी सेना रावणके अनुचर वीरोंको बाण और पर्वतोंसे नष्ट करने लगी ॥ ९ ॥ वह सेनाके लोग परस्पर एक दूसरेके वधकी इच्छासे युद्ध करने लगे और वह राक्षस वानर गिरने और बारम्बार मलिन होने लगे ॥ १० ॥
ततो रामो महाबाहुर्भरतो लक्ष्मणस्तथा ॥ शत्रुघ्नो हनुमान्वीरः सुग्रीवो जांबवांस्तथा ॥ ११ ॥ अन्ये च नलनीलाद्या विभीषणपुरो- गमाः ॥ युयुधुस्ते महाघोरं महाघोरे रणाजिरे ॥ १२ ॥
तब महाबाहु राम भरत और लक्ष्मण शत्रुघ्न हनुमान वीर सुग्रीव जाम्ब- वन्त ॥ ११ ॥ और भी नल नील विभीषणादि महाघोर युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥
निर्जग्मुश्च विनेदुश्च चिक्रीडुश्चैव राक्षसाः ॥ जहृषुश्च महा- त्मानः संग्रामेष्वनिवर्तिनः ॥ १३ ॥ उत्कृष्टा स्फोटितैर्नादैश्चचालेव च मेदिनी ॥ रक्षसां सिंहनादैश्च परिपूर्णं नभः स्थलम् ॥ १४ ॥
वे निकलकर शब्द करने लगे और क्रीडा करने लगे और संग्रामसे न लौटने- वाले महात्मा प्रसन्न होते हुए ॥ १३ ॥ उनके उत्कृष्ट स्फोट और नादसे पृथ्वी चलायमान होने लगी, राक्षसोंके सिंहनादसे आकाशस्थल पूर्ण होगया । १४ ॥
ते प्रायुध्यंत मुदिता राक्षसेंद्रा महाबलाः ॥ प्रययुर्वानरानीकं समुद्यतशिलायुधम् ॥ १५ ॥ युयोध राक्षसं सैन्यं नरराक्षसवानरैः । रहस्त्यश्वरथसंबाधं किंकिणीशतनादितम् ॥ १६ ॥
वे महाबली राक्षस प्रसन्न हो युद्ध करने लगे और शिला हाथमें लिये वानरी सेनाके प्रति ॥ १५ ॥ नर राक्षस वानरोंसे राक्षसी सेना युद्ध करने लगी, हाथी घोडे रथकी संबाधा और सैकड़ों किंकिणियोंका शब्द होने लगा ॥ १६ ॥
(११०) अद्भुतरामायण [विशंति-
नीलजीमूतसंकाशैः समुद्यतशिलायुधैः ।। दीप्तानलरवि-
प्रख्यैर्नेत्रैस्तैः सर्वतो वृतम् ।। १७ ।। तद्वीक्ष्य राक्षसबलं संरब्धाश्च
प्लवंगमाः ।। क्रुद्धं तद्राक्षसं सैन्यं जघ्नुर्द्रुमशिलायुधैः ।। १८ ।।
नीलमेघके समान शिला आयुध उठाये दीप्त अग्नि और सूर्यके समान सब दिशा राक्षसोंसे भर गई ।। १७ ।। उस राक्षसी सेनाको देखकर संरम्भको प्राप्त होकर क्रोध कर उस राक्षसी सेनाको द्रुम शिला आयुधोंसे मारने लगे ।। १८ ।।
ते पादशिलाशैलेस्तां चक्रुर्वृष्टिमुत्तमाम् ।। वृक्षौघैर्वज्रसंका-
शैर्हरयो भीमविक्रमाः ।। १९ ।। शिखरैः शिखराभांस्ते यातुधानानमर्द
यन् ।। निर्जघ्नुःसमरे क्रुद्धा हरयो राक्षसर्वभान् ।। २० ।।
वे वृक्ष शिला शैलोंकी वर्षा करने लगे और भयंकर पराक्रमी वानर वृक्षोंसे युद्ध करने लगे ।। १९ ।। और शिखरोंसे शिखरोंके समान राक्षसोंको ताडन करने लगे, इसप्रकार क्रोध कर दैत्योंको तांडन करने लगे ।। २० ।।
केचिद्रथगतान्वीरान्गजवाजिस्थितौनपि ।। निर्जघ्नुः सहसाप्लुत्य
यातुधानानप्लवंगमाः ।। २१ ।। शैलशृंगनिभास्ते तु ✤ मुष्टिनिष्क्रांत
लोचनाः ।। ✤वेपु पेतुश्च नेदुश्च ततो राक्षसपुंगवाः ।। २२ ।।
कोई रथमें प्राप्त वीर हाथी घोडोंपर स्थित थे उन राक्षसोंको कूद कूद कर वानर मारने लगे ।। २१ ।। ये पर्वतके श्रृंगके समान अपने घूसोंसेही उनके नेत्र निकाल डालते थे, तब वे राक्षस कंपित होकर गिर पडते थे ।। २२ ।।
ततः शूलैश्च वज्रैश्च विमुष्टैर्हरिपुंगवैः ।। मुहूर्तेनावृता भूमि-
रभवच्छोणितप्लुता ।। २३ ।। विकीर्णैः पर्वताग्रैश्च रक्षोभिरुपम-
र्द्दितैः ।। आक्षिप्ताः क्षिप्यमाणाश्च भग्नशेषाश्च वानराः ।। २४ ।।
फिर शूल वज्र और मुष्टियोंसे वानरों द्वारा व भूमि रुधिरसे व्याप्त होगई ।। २३ ।। पर्वताग्रोंसे विकीर्ण हुई राक्षसोंसे मर्दित हुई आक्षिप्त और क्षिप्यमान होकर सब वानर भग्न हो गये ।। २४ ।।
रथेन रथिनं चापि राक्षसं राक्षसेन च ।। हयेन च हयं केचित्पि-
पेषुर्धरणी तले ।। २५ ।। वानरान्वानरैरेव जघ्नुर्घोरा हि राक्षसाः ।।
राक्षसान्राक्षसैरेव पिपिषुर्वानरा युधि ।। २६ ।।
* मुष्टिप्रहारेण निष्क्रांतलोचनाः । * आर्षम् ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१११)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१११)
रथसे रथीको राक्षसको राक्षस द्वारा घोडेको घोडेसे पृथ्वीतलमें पीसने लगे ॥ २५ ॥ वानरोंसे वानरोंको घोररूपसे राक्षस ताडन करने लगे और राक्षसोंको राक्षसद्वारा पीसने लगे ॥ २६ ॥
आक्षिप्य च शिला जघ्नु राक्षसा वानर स्तथा ॥ तेषामाच्छिद्य शस्त्राणि जघ्नुस्तानपि वानराः ॥ २७ ॥ निर्जघ्नुः शैलशिखैर्विभिन्नाश्च परस्परम् ॥ सिंहनादं विनेदुश्च रणे वानरराक्षसाः ॥ २८ ॥
शिलाओंसे राक्षस वानरोंको मर्द्दन करने लगे और उनके शस्त्रोंको छेदन कर वानर उनको मारने लगे ॥ २७ ॥ परस्पर शैलशिखरोंको प्रहारकरके रणमें परस्पर ताडन कर रीछ वानर शब्द करने लगे ॥ २८ ॥
छिन्नचर्मतनुत्राणा राक्षसा वानरैः कृताः ॥ सुस्राव रुधिरं तेभ्यः स्रवतः पर्वतादिव ॥ २९ ॥ तस्मिंस्तदा संयति संप्रवृत्ते कोलाहले राक्षसराजधान्याम् ॥ संहृष्यमाणेषु च वानरेषु निपात्यमानेषु च राक्षसेषु ॥ ३० ॥
छिन्न चर्मतरकस राक्षसोंको वानरोंने कर दिये और पर्वतोंसे झरनेके समान उनके रुधिर निकलने लगा ॥ २९ ॥ तब उस संग्रामसे प्रवृत्त होनेमें राजधानीमें वडा कोलाहल हो गया, वानरोंके प्रसन्न होनेमें और राक्षसोंके मारनेमें ॥ ३० ॥
प्रभज्य मानेषु महाबलेषु महर्षयो भूतगणाश्च नेदु ॥ तेनापि सर्वे हरयः प्रहृष्टा विनेदुरास्फोटितसिंहनादैः ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर काण्डे संकुलयुद्धं नामविंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥
महासेनाके भग्न होनेमें महर्षि और भूतगण शब्द करने लगे, इससे सब वानर प्रसन्न हुए और भुजा फटकारते सिंहनाद करने लगे ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीम. मा. आदि. अद्भु. भा. टी. संकुलयुद्धंनाम विंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥
(११२) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-
एकविंशति सर्ग
रावणका रामकी सेनाको विक्षेप करना
ततो रथं मारुततुल्यवेगमारुह्य शक्तिं निशितां प्रगृह्य ।। स
रावणो रामबलं प्रहृष्टो विवेश मीनो हि यथार्णवौघम् ।। १ ।।
सवानरान्हीनबलान्निरीक्ष्य प्राणेन दीप्तेन रराज राजा ।। एक-
क्षणेनैद्ररिपुर्महात्मा निहंतुमैच्छन्नरवानरांच ।। २ ।।
तब वडे क्षीण रथमें सवार होकर तीक्षण शक्तिको ग्रहण कर रावण रामकी सेनामें ऐसे प्रविष्ट हुआ जैसे मीन-सागरमें प्रवेश करती है ।। १ ।। तब वह वानरोंको हीनबल देखकर और राजा रावण प्राणोंके दीप्त होनेपर एकही क्षणमें उस वानरी सेनाके मारनेकी इच्छा करने लगा ।। २ ।।
मनसा चिंतयामास सहस्र कंधरः स्वराट् ।। एते क्षुद्राः समायाताः
प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।। ३ ।। द्वीपांतरं महत्प्राप्य मम युद्धाभिकां-
क्षिणः ।। किं स्यान्म महतैः क्षुद्रैर्नरराक्षसवानरैः ।। ४ ।।
वह सहस्रमुखका रावण मनमें विचार करने लगा, यह क्षुद्र अपने प्राण और धन छोडकर यहां आये हैं ।। ३ ।। और द्वीपान्तरमें प्राप्त होकर मुझसे युद्धकी इच्छा करते हैं, इन क्षुद्र नर राक्षस वानरोंके मारनेसे मुझे क्या मिलेगा ।। ४ ।।
यस्माद्देशात्समायातास्तं देशं प्रापयाम्यहम् ।। क्षुल्लकेषु शराघातं
न प्रशंसंति पंडिताः ।। ५ ।। इति संचिंत्य धनुषावायव्यास्त्रं युयोज
ह ।। तेनास्त्रेण नरा ऋक्षा वानरा राक्षसा हि ते ।। ६ ।।
यह जिस देशसे आये हैं उसी देशमें प्राप्त किये देता हूँ क्षुद्रोंमें शराघात करनेकी पंडित जन प्रशंसा नहीं करते हैं ।। ५ ।। यह विचार कर धनुषपर वायव्य अस्त्र चढाया, उस अस्त्रसे राक्षस वानर जितने सेनाके लोग थे ।। ६ ।।
यस्माद्यस्मात्समायातास्तं तं देशं प्रयापिताः ।। गलहस्तिकया
विप्र चोरान्राजभटा इव ।। ७ ।। ते सर्वे स्वगृहं प्राप्ता अस्त्रवेगेन
विस्मिताः ।। क्व स्थिताः क्व समा*यातामन्यंत स्वप्न एव तैः ।।८।।
* समायाताः अमन्यंतेतिच्छेदः संधिरार्षः ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११३)
जिस जिस देशसे आये थे उस उस देशको चले गये, जैसे जबरदस्ती चोरोंको राजसेवक गलहस्त देकर निकालते हैं ॥ ७ ॥ वे अस्त्रवेगसे अपने अपने घर आकर आश्चर्य करने लगे, हम कहां थे कहां आ गये इस प्रकार स्वप्न देखने लगे ॥ ८ ॥
प्रलयानिलवेगेन अस्त्रेण वंचिता भृशम् ॥ भरतो लक्ष्मणश्चापि शत्रुघ्नो हनुमांस्तथा ॥ ९ ॥ सुग्रीवनलनीलाद्या हरयोऽनिलरंहस ॥ विभीषणपुरोगाश्च राक्षसाः क्रूरविक्रमाः ॥ १० ॥
प्रलयकी पवनके वेगसे अत्यन्त आहत हुए भरत, शत्रुघ्न, हनुमान् ॥ ९ ॥ सुग्रीव, नल, नीलादि वानर पवनवेगसे विभीषणादि सम्पूर्ण राक्षस जो बडे पराक्रमी थे ॥ १० ॥
वानराश्च नरा ऋक्षा राक्षसा अक्षता गृहम् ॥ प्राप्यातिवि- स्मिताः सर्वे शोचंतो राममेवपि ॥ ११ ॥ पुष्करे पुष्पकेतिष्ठन्ससीतो राघवः परम् ॥ आस्ते स्म नास्त्रवेगोऽयं रामं चालयितुं क्षमः । १२ ।
वानर, नर, रीछ, राक्षस सब अक्षत अपने घर प्राप्त हो महाविस्मययुक्त रामचन्द्रके निमित्त शोच करने लगे ॥ ११ ॥ केवल सीतासहित रामचन्द्र पुष्पक विमानमें स्थित रहे, वह अस्त्र रामको चलायमान करनेको समर्थ न हुआ ॥ १२ ॥
महर्षयोऽपि तत्रासन्किमेतदिति विस्मिताः ॥ सापि सीता महा- भागा तत्रास्ते स्म शुचिस्मिता ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगराकारं दृष्ट्वा रागबलं महत् ॥ स्वस्तीतिवादिनः सौम्यशांतिं जेपुर्महर्षयः ॥ १४ ॥
जो महर्षि थे वेभी यह क्या हुआ, इस प्रकार आश्चर्यमें भरकर सोचने लगे; वह महाभागा मनोहर हास्ययुक्त जानकीभी वहीं स्थित रही ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगरके समान वह रामकी वडी भारी सेनाको देख स्वस्ति कहकर ऋषिजनशांतिका जप करने लगे ॥ १४ ॥
अन्तरिक्षचराः सर्वे हाहाकारं प्रचक्रिरे ॥ देवा अग्निमुखा विप्र किं कृतं रावणेन हि ॥ १५ ॥ गरुडस्थो यदा विष्णू रावणं हंतुमा- गत ॥ लीलया लवणांभोधौ क्षिप्तो विष्णुः सनातनः ॥ १६ ॥
८
(११४) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-
अन्तरिक्षचारी जीव हाहाकार करने लगे, अग्निमुखादि देवता कहने लगे यह रावणने क्या किया ॥ १५ ॥ जिस समय गरुड़पर स्थित विष्णु रावणके मारनेको आये थे तो इसने लीलासेही सागरकी ओर क्षिप्त कर दिया था ॥ १६॥
साट्टहासं विनद्योच्चै रक्षसा वामपाणिना ॥ ततः प्रभृति देवाश्च गंधर्वाः किन्नरा नराः ॥ १७ ॥ गन्धमस्य न गृह्णन्ति शार्दूलस्येव जंबुकाः ॥ सोऽयं विष्णुर्दशरथाज्जातो देवः सनातनः ॥ १८ ॥
और हँसकर बाँये हाथसेही यह कार्य इसने किया था; उस दिनसे देवता गन्धर्व किन्नर अप्सरा ॥ १७ ॥ इसकी गन्धतक ग्रहण नहीं करते हैं, जैसे शार्दूलकी गन्धको जंबुक नहीं ग्रहण करते हैं, वही यह सतातन विष्णु दशरथसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १८ ॥
अस्माकं भागधेयेन रामो जयतु रावणम् ॥ परस्परं सुराः सर्वे वदन्तोऽन्तर्हिता स्थिताः ॥ १९ ॥ ननर्द च सहस्रास्याः क्षुद्रं मत्वा स राघवम् ॥ विसिष्मिये च रामोऽपि तद्दृष्ट्वा कर्म दुष्करम् ॥ २० ॥ क्रोधमाहारयामास रावणस्य वधं प्रति ॥ ततः किलकिलाशब्दं चक्रू राक्षसपुंगवाः ॥ २१ ॥ स राघवः पद्मपलाशलोचनो जज्वल कोपेन द्विषज्जयैषणः ॥ रामं प्रहर्तुं न शशाक मेदिनी चकंपिरे वारिधयो ग्रहा अपि ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामसैन्यविक्षेपणं नामैकविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥
हमारे भाग्यसे राम रावणको जीतें, इस प्रकार अन्तरमें स्थित हुए सब देवता परस्पर कहने लगे ॥ १९ ॥ और रामचन्द्रको क्षुद्र मानकर रावण गर्जने लगा, उसका यह दुष्कर कर्म देखकर रामचन्द्रको आश्चर्य हुआ ॥ २० ॥ और रावणके वध करनेको वडा क्रोध किया, तब राक्षस किलकिला शब्द करने लगे ॥ २१ ॥ तब कमललोचन रामचन्द्र शत्रुको जीतनेके निमित्त क्रोधसे जल उठे, तब इधर रामके प्रहार करनेको समर्थ न हुआ तब पृथ्वी, सागर और सब ग्रह कंपित होगये ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा० अद्भु० भा०टी० रामसैन्यविक्षेपणं नामकैविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ११५ )
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ११५ )
द्वाविंशति सर्ग
रामचन्द्रका मूर्च्छित होना
विनर्दन्तं रिपुं दृष्ट्वा रामः शत्रुनिबर्हणः। जज्वलंच स कोपेन रक्षसां सहजो रिपुः ॥ १ ॥ विचकर्ष धनुः श्रेष्ठ प्रलयानलसंनिभम् ॥ वेगेन बाणांश्चिक्षेप रक्षसां मर्मसु प्रभुः ॥ २ ॥
शत्रुनाशी श्रीरामचन्द्रजी शत्रुको गर्जन करता हुआ देखकर वह राक्षसोंके स्वाभाविक शत्रु कोपसे जल उठे ॥ १ ॥ प्रलयके समान उस धनुषश्रेष्ठको खेंचकर वेगसे राक्षसोंके मर्मस्थानमें प्रभु बाण प्रहार करने लगे ॥ २ ॥
तिलशः खण्डयन्ति स्म बाणा राक्षसपुङ्गवान् ॥ कदा धनुषि संधत्ते कदा विसृजति प्रभुः ॥ ३ ॥ नान्तरं ददृशे कैश्चिच्छिन्नाः स्युररयः परम् ॥ जघान राक्षसान्रामो रुद्रः पशुगणानिव ॥ ४ ॥
और बाणोंसे राक्षसश्रेष्ठोंको खंड खंड करने लगे कब धनुषके ऊपर बाण चढाते और कब छोडते हैं ॥ ३ ॥ इसमें कुछभी अन्तर नहीं दीखता था और शत्रु क्षीण होते चले जाते थे, रामने राक्षसोंको ऐसा मारा जैसे रुद्र पशुओंका संहार करता है ॥ ४ ॥
तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म कृतं रामेण रावणः॥ अनीकाग्रं समासाद्य युयुधे राघवेण हि ॥ ५ ॥ रे रे राक्षससेनान्यः प्रेक्षका इव तिष्ठत ॥ अहमेको हनिष्यामि नरमाकस्मिकं रिपुम् ॥ ६ ॥
रामचंद्रका यह दुष्कर कर्म देखकर रावण रामचन्द्रके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५ ॥ अरे राक्षसी सेनाके लोगो ! क्या तुम देखते हुए स्थित हो, मैं इस अकस्मात् आये शत्रुको इकला वध करूंगा ॥ ६ ॥
अद्य निर्मानवां पृथ्वीं निर्देवं त्रिदिवं तथा ॥ करिष्याम्यहमेवैकः शोषयिष्यामि वारिधीन् ॥ ७ ॥ पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि पातयिष्यामि वै ग्रहान् ॥ इत्युक्त्वा राक्षसश्रेष्ठो रामं योद्धुमथाह्वयत् ॥ ८ ॥
आज पृथ्वीको निर्मनुष्य कर डालूंगा, तथा त्रिदिवको देवतारहित करदूंगा और सागरको सोख डालूंगा ॥ ७ ॥ पर्वतोंको चूर्ण कर ग्रहोंको गिरा दूंगा, हे राम ! यह लंकापुरी नहीं है यह कहकर राक्षसश्रेष्ठ रामचन्द्रको युद्ध के निमित बुलाने लगा ॥ ८ ॥