अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
(१०८) अद्भुतरामायण [ विशंति-
सेना पालनेवाले रामचन्द्रके ऊपर धावमान हुए; और पकडो २ ऐसे कठोर वचन बोलने लगे ॥ ४२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां रावण- पुत्रनिर्याणं नाम एकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥
विशंति सर्ग
संकुलयुद्धवर्णन
धनूंषि च विधुन्वानस्ततो वैश्रवणानुजः ।। कोऽयं किमर्थमायातः इति चिन्तापरोऽभवत् ।। १ ।। ततो गगनसंभूता वाणी समुपद्यत ।। भो रावण महावीर्य रामोऽयं समुपागतः ।। २ ।।
तब वह सहस्त्रमुख रावण धनुष्यको कम्पायमान करता हुआ यह कौन कहाँसे आया है यह चिन्ता करने लगा ॥ १ ॥ तब उस समय आकाशसे वाणी हुई हे महावीर्यवान् रावण ! यह रामचन्द्र आये हैं ॥ २ ॥
राघवोऽयमयोध्याया राजा धर्मस्वरूपधृक् ।। लंकायां निहतो येन दाराकर्शो तवानुजः ।। ३ ।। त्वद्वधार्थमिहायातो विभीषण वसुप्रदः ।। भ्रातृभिर्वानरैर्ऋक्षै राक्षसैर्मानुषैर्युतः ।। ४ ।।
यह धर्मस्वरूपधारी राम अयोध्याके राजा हैं, यह धर्मका स्वरूप हैं जिन्होंने लंकामें रावणका वध किया है ॥ ३ ॥ यह विभीषणके राज्य देनेवाले हैं। भाई, वानर, ऋक्ष, राक्षस, मनुष्योंको साथ आये हैं ॥ ४ ॥
श्रुत्वा ह्यमानुषं वाक्यं रावणो लोकरावणः ।। क्रोधमाहारयामास द्विगुणं मुनिपुंगव ।। ५ ।। हन्यतां वध्यतामेष मानुषो रिपुसंज्ञितः ।। मम विश्वजितः साक्षाद्रणाय समुपस्थितः ।। ६ ।।
लोक रावण रावण यह अमानुषी वचन सुनकर दूना क्रोध करता हुआ बोला ॥ ५ ॥ इस मनुष्यसंज्ञक शत्रुको मारो, वध कर डालो, यह मुझ विश्वके जीतनेवालेसे युद्ध करनेको स्थित हुआ है ॥ ६ ॥
इत्युक्त्वा बाणजालानि चक्रपर्वततोमरान् ।। चिक्षेप सहसा रक्षः पुष्पकोपरि सुव्रतः ।। ७ ।। राक्षसी सा चमूर्घोरा वानरानृक्ष- 'मानुषान् ।। चखादकांश्चिदपरान्पोथयामासदर्पितान् ।। ८ ।।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०६)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०६)
ऐसा कहकर बाणसमूह चक्र पर्वत तोमर वह राक्षस पुष्पकके ऊपर छोडने लगा ॥ ७ ॥ और वह घोर राक्षसी सेना वानर ऋक्ष मनुष्योंको खाती दूसरोंको नष्ट करने लगी ॥ ८ ॥
सा च शाखामृगी सेना राघवस्य च मानुषी । रावणस्यानुगान्धी- राञ्जघान बाणपर्वतैः ॥ ९ ॥ तेऽन्योन्यवधमिच्छंतो युयुधुः सैनिको- त्तमाः ॥ पेतुर्मम्लुश्च मुमुहू राक्षसा वानरा नराः ॥ १० ॥
और वह रामचन्द्रकी मानुषी और वानरी सेना रावणके अनुचर वीरोंको बाण और पर्वतोंसे नष्ट करने लगी ॥ ९ ॥ वह सेनाके लोग परस्पर एक दूसरेके वधकी इच्छासे युद्ध करने लगे और वह राक्षस वानर गिरने और बारम्बार मलिन होने लगे ॥ १० ॥
ततो रामो महाबाहुर्भरतो लक्ष्मणस्तथा ॥ शत्रुघ्नो हनुमान्वीरः सुग्रीवो जांबवांस्तथा ॥ ११ ॥ अन्ये च नलनीलाद्या विभीषणपुरो- गमाः ॥ युयुधुस्ते महाघोरं महाघोरे रणाजिरे ॥ १२ ॥
तब महाबाहु राम भरत और लक्ष्मण शत्रुघ्न हनुमान वीर सुग्रीव जाम्ब- वन्त ॥ ११ ॥ और भी नल नील विभीषणादि महाघोर युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥
निर्जग्मुश्च विनेदुश्च चिक्रीडुश्चैव राक्षसाः ॥ जहृषुश्च महा- त्मानः संग्रामेष्वनिवर्तिनः ॥ १३ ॥ उत्कृष्टा स्फोटितैर्नादैश्चचालेव च मेदिनी ॥ रक्षसां सिंहनादैश्च परिपूर्णं नभः स्थलम् ॥ १४ ॥
वे निकलकर शब्द करने लगे और क्रीडा करने लगे और संग्रामसे न लौटने- वाले महात्मा प्रसन्न होते हुए ॥ १३ ॥ उनके उत्कृष्ट स्फोट और नादसे पृथ्वी चलायमान होने लगी, राक्षसोंके सिंहनादसे आकाशस्थल पूर्ण होगया । १४ ॥
ते प्रायुध्यंत मुदिता राक्षसेंद्रा महाबलाः ॥ प्रययुर्वानरानीकं समुद्यतशिलायुधम् ॥ १५ ॥ युयोध राक्षसं सैन्यं नरराक्षसवानरैः । रहस्त्यश्वरथसंबाधं किंकिणीशतनादितम् ॥ १६ ॥
वे महाबली राक्षस प्रसन्न हो युद्ध करने लगे और शिला हाथमें लिये वानरी सेनाके प्रति ॥ १५ ॥ नर राक्षस वानरोंसे राक्षसी सेना युद्ध करने लगी, हाथी घोडे रथकी संबाधा और सैकड़ों किंकिणियोंका शब्द होने लगा ॥ १६ ॥
(११०) अद्भुतरामायण [विशंति-
नीलजीमूतसंकाशैः समुद्यतशिलायुधैः ।। दीप्तानलरवि-
प्रख्यैर्नेत्रैस्तैः सर्वतो वृतम् ।। १७ ।। तद्वीक्ष्य राक्षसबलं संरब्धाश्च
प्लवंगमाः ।। क्रुद्धं तद्राक्षसं सैन्यं जघ्नुर्द्रुमशिलायुधैः ।। १८ ।।
नीलमेघके समान शिला आयुध उठाये दीप्त अग्नि और सूर्यके समान सब दिशा राक्षसोंसे भर गई ।। १७ ।। उस राक्षसी सेनाको देखकर संरम्भको प्राप्त होकर क्रोध कर उस राक्षसी सेनाको द्रुम शिला आयुधोंसे मारने लगे ।। १८ ।।
ते पादशिलाशैलेस्तां चक्रुर्वृष्टिमुत्तमाम् ।। वृक्षौघैर्वज्रसंका-
शैर्हरयो भीमविक्रमाः ।। १९ ।। शिखरैः शिखराभांस्ते यातुधानानमर्द
यन् ।। निर्जघ्नुःसमरे क्रुद्धा हरयो राक्षसर्वभान् ।। २० ।।
वे वृक्ष शिला शैलोंकी वर्षा करने लगे और भयंकर पराक्रमी वानर वृक्षोंसे युद्ध करने लगे ।। १९ ।। और शिखरोंसे शिखरोंके समान राक्षसोंको ताडन करने लगे, इसप्रकार क्रोध कर दैत्योंको तांडन करने लगे ।। २० ।।
केचिद्रथगतान्वीरान्गजवाजिस्थितौनपि ।। निर्जघ्नुः सहसाप्लुत्य
यातुधानानप्लवंगमाः ।। २१ ।। शैलशृंगनिभास्ते तु ✤ मुष्टिनिष्क्रांत
लोचनाः ।। ✤वेपु पेतुश्च नेदुश्च ततो राक्षसपुंगवाः ।। २२ ।।
कोई रथमें प्राप्त वीर हाथी घोडोंपर स्थित थे उन राक्षसोंको कूद कूद कर वानर मारने लगे ।। २१ ।। ये पर्वतके श्रृंगके समान अपने घूसोंसेही उनके नेत्र निकाल डालते थे, तब वे राक्षस कंपित होकर गिर पडते थे ।। २२ ।।
ततः शूलैश्च वज्रैश्च विमुष्टैर्हरिपुंगवैः ।। मुहूर्तेनावृता भूमि-
रभवच्छोणितप्लुता ।। २३ ।। विकीर्णैः पर्वताग्रैश्च रक्षोभिरुपम-
र्द्दितैः ।। आक्षिप्ताः क्षिप्यमाणाश्च भग्नशेषाश्च वानराः ।। २४ ।।
फिर शूल वज्र और मुष्टियोंसे वानरों द्वारा व भूमि रुधिरसे व्याप्त होगई ।। २३ ।। पर्वताग्रोंसे विकीर्ण हुई राक्षसोंसे मर्दित हुई आक्षिप्त और क्षिप्यमान होकर सब वानर भग्न हो गये ।। २४ ।।
रथेन रथिनं चापि राक्षसं राक्षसेन च ।। हयेन च हयं केचित्पि-
पेषुर्धरणी तले ।। २५ ।। वानरान्वानरैरेव जघ्नुर्घोरा हि राक्षसाः ।।
राक्षसान्राक्षसैरेव पिपिषुर्वानरा युधि ।। २६ ।।
* मुष्टिप्रहारेण निष्क्रांतलोचनाः । * आर्षम् ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१११)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१११)
रथसे रथीको राक्षसको राक्षस द्वारा घोडेको घोडेसे पृथ्वीतलमें पीसने लगे ॥ २५ ॥ वानरोंसे वानरोंको घोररूपसे राक्षस ताडन करने लगे और राक्षसोंको राक्षसद्वारा पीसने लगे ॥ २६ ॥
आक्षिप्य च शिला जघ्नु राक्षसा वानर स्तथा ॥ तेषामाच्छिद्य शस्त्राणि जघ्नुस्तानपि वानराः ॥ २७ ॥ निर्जघ्नुः शैलशिखैर्विभिन्नाश्च परस्परम् ॥ सिंहनादं विनेदुश्च रणे वानरराक्षसाः ॥ २८ ॥
शिलाओंसे राक्षस वानरोंको मर्द्दन करने लगे और उनके शस्त्रोंको छेदन कर वानर उनको मारने लगे ॥ २७ ॥ परस्पर शैलशिखरोंको प्रहारकरके रणमें परस्पर ताडन कर रीछ वानर शब्द करने लगे ॥ २८ ॥
छिन्नचर्मतनुत्राणा राक्षसा वानरैः कृताः ॥ सुस्राव रुधिरं तेभ्यः स्रवतः पर्वतादिव ॥ २९ ॥ तस्मिंस्तदा संयति संप्रवृत्ते कोलाहले राक्षसराजधान्याम् ॥ संहृष्यमाणेषु च वानरेषु निपात्यमानेषु च राक्षसेषु ॥ ३० ॥
छिन्न चर्मतरकस राक्षसोंको वानरोंने कर दिये और पर्वतोंसे झरनेके समान उनके रुधिर निकलने लगा ॥ २९ ॥ तब उस संग्रामसे प्रवृत्त होनेमें राजधानीमें वडा कोलाहल हो गया, वानरोंके प्रसन्न होनेमें और राक्षसोंके मारनेमें ॥ ३० ॥
प्रभज्य मानेषु महाबलेषु महर्षयो भूतगणाश्च नेदु ॥ तेनापि सर्वे हरयः प्रहृष्टा विनेदुरास्फोटितसिंहनादैः ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर काण्डे संकुलयुद्धं नामविंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥
महासेनाके भग्न होनेमें महर्षि और भूतगण शब्द करने लगे, इससे सब वानर प्रसन्न हुए और भुजा फटकारते सिंहनाद करने लगे ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीम. मा. आदि. अद्भु. भा. टी. संकुलयुद्धंनाम विंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥
(११२) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-
एकविंशति सर्ग
रावणका रामकी सेनाको विक्षेप करना
ततो रथं मारुततुल्यवेगमारुह्य शक्तिं निशितां प्रगृह्य ।। स
रावणो रामबलं प्रहृष्टो विवेश मीनो हि यथार्णवौघम् ।। १ ।।
सवानरान्हीनबलान्निरीक्ष्य प्राणेन दीप्तेन रराज राजा ।। एक-
क्षणेनैद्ररिपुर्महात्मा निहंतुमैच्छन्नरवानरांच ।। २ ।।
तब वडे क्षीण रथमें सवार होकर तीक्षण शक्तिको ग्रहण कर रावण रामकी सेनामें ऐसे प्रविष्ट हुआ जैसे मीन-सागरमें प्रवेश करती है ।। १ ।। तब वह वानरोंको हीनबल देखकर और राजा रावण प्राणोंके दीप्त होनेपर एकही क्षणमें उस वानरी सेनाके मारनेकी इच्छा करने लगा ।। २ ।।
मनसा चिंतयामास सहस्र कंधरः स्वराट् ।। एते क्षुद्राः समायाताः
प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।। ३ ।। द्वीपांतरं महत्प्राप्य मम युद्धाभिकां-
क्षिणः ।। किं स्यान्म महतैः क्षुद्रैर्नरराक्षसवानरैः ।। ४ ।।
वह सहस्रमुखका रावण मनमें विचार करने लगा, यह क्षुद्र अपने प्राण और धन छोडकर यहां आये हैं ।। ३ ।। और द्वीपान्तरमें प्राप्त होकर मुझसे युद्धकी इच्छा करते हैं, इन क्षुद्र नर राक्षस वानरोंके मारनेसे मुझे क्या मिलेगा ।। ४ ।।
यस्माद्देशात्समायातास्तं देशं प्रापयाम्यहम् ।। क्षुल्लकेषु शराघातं
न प्रशंसंति पंडिताः ।। ५ ।। इति संचिंत्य धनुषावायव्यास्त्रं युयोज
ह ।। तेनास्त्रेण नरा ऋक्षा वानरा राक्षसा हि ते ।। ६ ।।
यह जिस देशसे आये हैं उसी देशमें प्राप्त किये देता हूँ क्षुद्रोंमें शराघात करनेकी पंडित जन प्रशंसा नहीं करते हैं ।। ५ ।। यह विचार कर धनुषपर वायव्य अस्त्र चढाया, उस अस्त्रसे राक्षस वानर जितने सेनाके लोग थे ।। ६ ।।
यस्माद्यस्मात्समायातास्तं तं देशं प्रयापिताः ।। गलहस्तिकया
विप्र चोरान्राजभटा इव ।। ७ ।। ते सर्वे स्वगृहं प्राप्ता अस्त्रवेगेन
विस्मिताः ।। क्व स्थिताः क्व समा*यातामन्यंत स्वप्न एव तैः ।।८।।
* समायाताः अमन्यंतेतिच्छेदः संधिरार्षः ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११३)
जिस जिस देशसे आये थे उस उस देशको चले गये, जैसे जबरदस्ती चोरोंको राजसेवक गलहस्त देकर निकालते हैं ॥ ७ ॥ वे अस्त्रवेगसे अपने अपने घर आकर आश्चर्य करने लगे, हम कहां थे कहां आ गये इस प्रकार स्वप्न देखने लगे ॥ ८ ॥
प्रलयानिलवेगेन अस्त्रेण वंचिता भृशम् ॥ भरतो लक्ष्मणश्चापि शत्रुघ्नो हनुमांस्तथा ॥ ९ ॥ सुग्रीवनलनीलाद्या हरयोऽनिलरंहस ॥ विभीषणपुरोगाश्च राक्षसाः क्रूरविक्रमाः ॥ १० ॥
प्रलयकी पवनके वेगसे अत्यन्त आहत हुए भरत, शत्रुघ्न, हनुमान् ॥ ९ ॥ सुग्रीव, नल, नीलादि वानर पवनवेगसे विभीषणादि सम्पूर्ण राक्षस जो बडे पराक्रमी थे ॥ १० ॥
वानराश्च नरा ऋक्षा राक्षसा अक्षता गृहम् ॥ प्राप्यातिवि- स्मिताः सर्वे शोचंतो राममेवपि ॥ ११ ॥ पुष्करे पुष्पकेतिष्ठन्ससीतो राघवः परम् ॥ आस्ते स्म नास्त्रवेगोऽयं रामं चालयितुं क्षमः । १२ ।
वानर, नर, रीछ, राक्षस सब अक्षत अपने घर प्राप्त हो महाविस्मययुक्त रामचन्द्रके निमित्त शोच करने लगे ॥ ११ ॥ केवल सीतासहित रामचन्द्र पुष्पक विमानमें स्थित रहे, वह अस्त्र रामको चलायमान करनेको समर्थ न हुआ ॥ १२ ॥
महर्षयोऽपि तत्रासन्किमेतदिति विस्मिताः ॥ सापि सीता महा- भागा तत्रास्ते स्म शुचिस्मिता ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगराकारं दृष्ट्वा रागबलं महत् ॥ स्वस्तीतिवादिनः सौम्यशांतिं जेपुर्महर्षयः ॥ १४ ॥
जो महर्षि थे वेभी यह क्या हुआ, इस प्रकार आश्चर्यमें भरकर सोचने लगे; वह महाभागा मनोहर हास्ययुक्त जानकीभी वहीं स्थित रही ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगरके समान वह रामकी वडी भारी सेनाको देख स्वस्ति कहकर ऋषिजनशांतिका जप करने लगे ॥ १४ ॥
अन्तरिक्षचराः सर्वे हाहाकारं प्रचक्रिरे ॥ देवा अग्निमुखा विप्र किं कृतं रावणेन हि ॥ १५ ॥ गरुडस्थो यदा विष्णू रावणं हंतुमा- गत ॥ लीलया लवणांभोधौ क्षिप्तो विष्णुः सनातनः ॥ १६ ॥
८
(११४) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-
अन्तरिक्षचारी जीव हाहाकार करने लगे, अग्निमुखादि देवता कहने लगे यह रावणने क्या किया ॥ १५ ॥ जिस समय गरुड़पर स्थित विष्णु रावणके मारनेको आये थे तो इसने लीलासेही सागरकी ओर क्षिप्त कर दिया था ॥ १६॥
साट्टहासं विनद्योच्चै रक्षसा वामपाणिना ॥ ततः प्रभृति देवाश्च गंधर्वाः किन्नरा नराः ॥ १७ ॥ गन्धमस्य न गृह्णन्ति शार्दूलस्येव जंबुकाः ॥ सोऽयं विष्णुर्दशरथाज्जातो देवः सनातनः ॥ १८ ॥
और हँसकर बाँये हाथसेही यह कार्य इसने किया था; उस दिनसे देवता गन्धर्व किन्नर अप्सरा ॥ १७ ॥ इसकी गन्धतक ग्रहण नहीं करते हैं, जैसे शार्दूलकी गन्धको जंबुक नहीं ग्रहण करते हैं, वही यह सतातन विष्णु दशरथसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १८ ॥
अस्माकं भागधेयेन रामो जयतु रावणम् ॥ परस्परं सुराः सर्वे वदन्तोऽन्तर्हिता स्थिताः ॥ १९ ॥ ननर्द च सहस्रास्याः क्षुद्रं मत्वा स राघवम् ॥ विसिष्मिये च रामोऽपि तद्दृष्ट्वा कर्म दुष्करम् ॥ २० ॥ क्रोधमाहारयामास रावणस्य वधं प्रति ॥ ततः किलकिलाशब्दं चक्रू राक्षसपुंगवाः ॥ २१ ॥ स राघवः पद्मपलाशलोचनो जज्वल कोपेन द्विषज्जयैषणः ॥ रामं प्रहर्तुं न शशाक मेदिनी चकंपिरे वारिधयो ग्रहा अपि ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामसैन्यविक्षेपणं नामैकविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥
हमारे भाग्यसे राम रावणको जीतें, इस प्रकार अन्तरमें स्थित हुए सब देवता परस्पर कहने लगे ॥ १९ ॥ और रामचन्द्रको क्षुद्र मानकर रावण गर्जने लगा, उसका यह दुष्कर कर्म देखकर रामचन्द्रको आश्चर्य हुआ ॥ २० ॥ और रावणके वध करनेको वडा क्रोध किया, तब राक्षस किलकिला शब्द करने लगे ॥ २१ ॥ तब कमललोचन रामचन्द्र शत्रुको जीतनेके निमित्त क्रोधसे जल उठे, तब इधर रामके प्रहार करनेको समर्थ न हुआ तब पृथ्वी, सागर और सब ग्रह कंपित होगये ॥ २२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा० अद्भु० भा०टी० रामसैन्यविक्षेपणं नामकैविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ११५ )
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ११५ )
द्वाविंशति सर्ग
रामचन्द्रका मूर्च्छित होना
विनर्दन्तं रिपुं दृष्ट्वा रामः शत्रुनिबर्हणः। जज्वलंच स कोपेन रक्षसां सहजो रिपुः ॥ १ ॥ विचकर्ष धनुः श्रेष्ठ प्रलयानलसंनिभम् ॥ वेगेन बाणांश्चिक्षेप रक्षसां मर्मसु प्रभुः ॥ २ ॥
शत्रुनाशी श्रीरामचन्द्रजी शत्रुको गर्जन करता हुआ देखकर वह राक्षसोंके स्वाभाविक शत्रु कोपसे जल उठे ॥ १ ॥ प्रलयके समान उस धनुषश्रेष्ठको खेंचकर वेगसे राक्षसोंके मर्मस्थानमें प्रभु बाण प्रहार करने लगे ॥ २ ॥
तिलशः खण्डयन्ति स्म बाणा राक्षसपुङ्गवान् ॥ कदा धनुषि संधत्ते कदा विसृजति प्रभुः ॥ ३ ॥ नान्तरं ददृशे कैश्चिच्छिन्नाः स्युररयः परम् ॥ जघान राक्षसान्रामो रुद्रः पशुगणानिव ॥ ४ ॥
और बाणोंसे राक्षसश्रेष्ठोंको खंड खंड करने लगे कब धनुषके ऊपर बाण चढाते और कब छोडते हैं ॥ ३ ॥ इसमें कुछभी अन्तर नहीं दीखता था और शत्रु क्षीण होते चले जाते थे, रामने राक्षसोंको ऐसा मारा जैसे रुद्र पशुओंका संहार करता है ॥ ४ ॥
तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म कृतं रामेण रावणः॥ अनीकाग्रं समासाद्य युयुधे राघवेण हि ॥ ५ ॥ रे रे राक्षससेनान्यः प्रेक्षका इव तिष्ठत ॥ अहमेको हनिष्यामि नरमाकस्मिकं रिपुम् ॥ ६ ॥
रामचंद्रका यह दुष्कर कर्म देखकर रावण रामचन्द्रके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५ ॥ अरे राक्षसी सेनाके लोगो ! क्या तुम देखते हुए स्थित हो, मैं इस अकस्मात् आये शत्रुको इकला वध करूंगा ॥ ६ ॥
अद्य निर्मानवां पृथ्वीं निर्देवं त्रिदिवं तथा ॥ करिष्याम्यहमेवैकः शोषयिष्यामि वारिधीन् ॥ ७ ॥ पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि पातयिष्यामि वै ग्रहान् ॥ इत्युक्त्वा राक्षसश्रेष्ठो रामं योद्धुमथाह्वयत् ॥ ८ ॥
आज पृथ्वीको निर्मनुष्य कर डालूंगा, तथा त्रिदिवको देवतारहित करदूंगा और सागरको सोख डालूंगा ॥ ७ ॥ पर्वतोंको चूर्ण कर ग्रहोंको गिरा दूंगा, हे राम ! यह लंकापुरी नहीं है यह कहकर राक्षसश्रेष्ठ रामचन्द्रको युद्ध के निमित बुलाने लगा ॥ ८ ॥
(११६) अद्भुतरामायण [द्वाविंशो-
त्वामद्य खड्गेनाच्छिद्य तर्पयिष्यामि चानुगान् ।। नेयं लंकापुरी राम नाहञ्च दशकन्धरः ।। ९ ।। शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया रघुनन्दन ।। कपित्थमिव काकुत्स्थ करी मदकलः किल ।। १० ।। कि, आज तुमको खड्गसे छेदन कर अपने अनुचरोंको तृप्त कर दूंगा, हे राम ! न तो यह लंकापूरी है और न मैं दशमुख रावण हूं ।। ९ ।। मैं गदास तुम्हारा शिर चूर्ण कर दूंगा यह कैथकी तरहसे वा मदवाले हाथीके समान गिरेगा ।। १० ।।
इत्युक्त्वा रावणो युद्धं रामेण सह चारभत् ।। तदभूद्वैरथं युद्धं बलिवासवयोरिव ।। ११ ।। रावणं प्राप्य रामोऽपि परं हर्षमुपागमत् ।। तदभूदद्भुतं युद्धं द्वयोर्वै रोमहर्षणम् ।। १२ ।। यह कह रावण रामचन्द्रके साथ युद्ध करने लगा वह वलि वासवके समान वीरथ युद्ध होने लगा ।। ११ ।। रावणको प्राप्त हो राम भी परम प्रसन्न हुए, वह उन दोनोंका रोमहर्षण युद्ध हुआ ।। १२ ।।
रामस्य च महाबाहोर्बलिनौ रावणस्य च ।। गांधर्वेण च गांधर्वं दैवं दैवेन राघवः ।। १३ ।। अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ।। अस्त्रयुद्धे च परमो रावणो राक्षसाधिपः ।। १४ ।। महाबाहु राम और वली रावणका गन्धर्व तथा दैव आदि अस्त्रोंसे युद्ध होने लगा ।। १३ ।। परमास्त्रज्ञाता रामने राक्षसराजके अस्त्रोंको ताडन कर दिया, परम अस्त्रयोधी रोक्षसपति रावण ।। १४ ।।
ससर्ज परदक्रुद्धः पन्नगास्त्र स राघवे ।। ते रावणधनुर्मुक्ताः शराः कांचनभूषिताः ।। १५ ।। अभ्यवर्त्तन्त काकुत्स्थं सर्पा भूत्वा महाविषाः ।। ते सर्पवदना घोरा वमन्तो ज्वलनं मुखैः ।। १६ ।। रामचन्द्रके ऊपर पन्नगास्त्रका प्रहार करता हुआ उससे रावणके धनुषसे मुक्त हुए सुवर्णभूषित बाण ।। १५ ।। रामके ऊपर सर्प होकर गिरने लगे और वे घोर सर्प मुखसे अग्निको वमन करते थे ।। १६ ।।
राममेवाभ्यवर्त्तंत व्यादितास्या भयावहाः ।। तैर्वासुकिसमस्पर्शै-र्दीप्तभोगैर्महाविषैः ।। १७ ।। दिशश्च विदिशश्चैव समंतादावृता भृशम् ।। रामः संपततो दृष्ट्वा पन्नगांस्तान्सहस्रशः ।। १८ ।।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११७)
मुख फैलाये हुए वे महाबली सर्प रामके ही निकट धावमान हुए वह वासुकीके समान दीप्त भागवाले महाविषैले ॥ १७ ॥ दिशा विदिशाओंको सब ओरसे व्याप्त करते हुए, तब रामचन्द्र सब ओर सर्पोंको धावमान देखकर ॥ १८ ॥
सौपर्णमस्त्रं तद्घोरं पुनः प्रावर्तयद्रणे ॥ रामेण च शरा मुक्ता रुक्मपुंखाः शिलाशिताः ॥ १९ ॥ सुपर्णाः कांचना भूत्वा विचेरुः सर्पशत्रवः ॥ ते ताञ्छत्रुशराञ्जघ्नुः सर्परूपान्महाविषान् ॥ २० ॥
युद्धमें घोर गरुडास्त्रका स्मरण करते हुए, वे रामचन्द्रके सुवर्ण पुंखवाले बाण शिलापर पैनाये हुए ॥ १९ ॥ सुवर्णके गरुड होकर सब ओरसे सर्पशत्रु विचरने लगे उन्होंने रावणके महाविषैले सर्पोंका नाश कर दिया ॥ २० ॥
सुपर्णरूपा रामस्य विशिखाः कामरूपिणः ॥ अस्त्रे प्रतिहते क्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः ॥२१॥ अभ्यवर्षत्तदा रामं घोराभिश्चाश्मवृष्टिभिः ॥ ततः शरसहस्रेण पुनरक्लिष्टकारिणम् ॥ २२ ॥
शिखाहीन कामरूपी रामके बाणोंसे अस्त्र नष्ट होनेसे राक्षसराज रावण बडा क्रोधित हुआ ॥ २१ ॥ और रघुनाथजीके ऊपर घोर पत्थरकी वर्षा करने लगा, फिर सौ सहस्र बाणसे अक्लिष्ट कर्मकारी ॥ २२ ॥
रामबाणानभ्यहनद्घोराभिः शरवृष्टिभिः ॥ विषेदुर्देवगंधर्वाश्चारणाः पितरस्तथा ॥ २३ ॥ रामप्रार्तं तदा दृष्ट्वा सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ रामचन्द्रमसं दृष्ट्वा ग्रस्तं रावण राहुणा ॥ २४ ॥
रामके बाणोंको घोर बाणवर्षासे नष्ट करने लगा । देव, गन्धर्व, चारण, पितर यह देखकर दुःखी हुए ॥ २३ ॥ रामचन्द्रको व्याकुल देखकर सिद्ध और परमर्षि ऐसे जानने लगे मानो चन्द्रको राहु ग्रास करता हो ॥ २४ ॥
प्राजापत्यं च नक्षत्रं रोहिणीं शशिनः प्रियाम् ॥ समाक्रम्य बुधस्तस्थौ प्रजाना महिते रतः ॥ २५ ॥ सधूमः परिवृत्तोर्मिः प्रज्वलन्निव सागरः ॥ उत्पपात ततः क्रुद्धः स्पृशन्निव दिवाकरम् ॥ २६ ॥
उस समय प्रजापतिका नक्षत्र चन्द्रमाकी प्रिया रोहिणीको आक्रमण कर बुध स्थित हुआ, इससे भी प्रजाका अहित होता है ॥ २५॥ समुद्र जलने सा लगा और धूम निकलने लगा तब वह रावण सूर्यको स्पर्श करते हुए के समान ऊपरको कूदा ॥ २६ ॥
( ११८ ) अद्भुतरामायण [ द्वाविंशो-
नष्टरूपश्च परुषो मंदरश्मिर्दिवाकरः॥अदृश्यत कबन्धांकः समेतो धूमकेतुना ॥ २७ ॥ ऋक्षाश्वरवनिर्घोषा गगने पुरुषाधमाः ॥ औत्पातिकानि नर्दतः समंतात्परिचक्रमुः ॥ २८ ॥
उस समय नष्टरूप पुरुष और मन्द किरणोंवाला सूर्य हो गया और धूमकेतुके सहित कबन्ध दीखने लगा ॥ २७ ॥ आकाशमें नक्षत्रोंका तीक्ष्ण शब्द होने लगा, सब ओरसे उत्पात दीखने लगे ॥ २८ ॥
रामोऽपि बद्ध्वा भ्रुकुटिं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ क्रोधं चकार सुभृशं निर्द्दहन्निव राक्षसम् ॥ २९ ॥ तस्य क्रुद्धस्य वदनं दृष्ट्वा रामस्य धीमतः ॥ सर्वभूतानि वित्रसुः प्राकंपत मही तदा ॥ ३० ॥
रामचन्द्रभी भौंह चढ़ाये क्रोधसे लालनेत्र किये राक्षसको जलाते हुएके समान क्रोध करते हुए ॥ २९ ॥ उन क्रोध किये रामचन्द्रका मुख देखकर सब भूत घबड़ा गये और पृथिवी कंपित होगई ॥ ३० ॥
सिंहशार्दूलमाच्छैलः प्रजज्वालाकुलद्रुमः ॥ बभूव चातिक्षुभितः समुद्र इव १पर्वसु ॥ ३१ ॥ लंकायां रावणवधे यं प्रायुंक्त शरं प्रभुः ॥ जग्राह तं शरं दीप्तं निःसंतमिवोरगम् ॥ ३२ ॥
सिंह शार्दूलके सहित पर्वत और कुलवृक्ष जल उठे और पर्वतमें सागरके समान समुद्र क्षुभित होगये ॥ ३१ ॥ लंकामें रावण वधके निमित्त जो बाण प्रभुने चलाया था, उसी बाणको श्वास लेते सर्पके समान ॥ ३२ ॥
यमस्मै प्रथमं प्रादादगस्त्यो भगवानृषिः ॥२ब्रह्मदत्तं महाबाणं यमाह युधि तद्वधे ॥ ३३ ॥ ब्रह्मणा निर्मितं पूर्णमिंद्राद्यैरमिततेजसा ॥ दत्तं सुरपतेः पूर्वं त्रैलोक्यजयकांक्षिणः ॥ ३४ ॥
प्रभुने ग्रहण किया, वह ब्रह्मदत्त महाबाण अगस्त्यजीने दिया था, युद्धमें उसके वधको ग्रहण किया ॥ ३३ ॥ वह महातेज द्वारा ब्रह्माका निर्माण किया था, इन्द्रादिके तेज उसमें विद्यमान थे, त्रिलोकी जयकी इच्छा करनेवाले इन्द्रके निमित्त वह बाण दिया गया था ॥ ३४ ॥
१ पर्वस्विवेतिसम्बन्धः । २ यं महाबाणं ब्रह्मदत्तं प्राहैत्यन्वयः । युधितद्वधनिमित्तं ब्रह्मणा निर्मितमिति
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११६)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११६)
यस्य वाजेषु पवनःफले पावकभास्करौ ।। शरीरमाकाशमयं गौरवे मेरुमन्दरौ ।। ३५ ।। पर्वस्वपि च विन्यस्ता लोकपाला महौजसः ।। धनदो वरुणश्चैव पाशहस्तस्तथांतकः ।। ३६ ।। जिसके पंखमें पवन, फलमें अग्नि और सूर्य, आकाशमय शरीर, गुरुतामें मेरुमंदरके समान ।। ३५ ।। जिसकी ग्रंथियोंमें लोकपाल स्थित थे, कुबेर, वरुण, पाश हाथमें लिये यमराज ।। ३६ ।।
जाज्वल्यमानं वपुषा सपुंखं हेमभूषितम् ।। तेजसा सर्वभूतानां कृतं भास्करवर्चसा ।। ३७ ।। सधूममिव कालाग्निं दीप्यमानं रविं यथा ।। रथनागाश्ववृन्दानां भेदनं क्षिप्रकारिणम् ।। ३८ ।। शरीरसे प्रकाशमान सुवर्णके पंख बने सूर्यके समान तेजसे सब लोकका प्रकाश करनेवाला ।। ३७ ।। धूमयुक्त कालाग्निके समान, प्रकाशमें सूर्यके समान, रथ हाथियोंका शीघ्र भेदन करनेवाला ।। ३८ ।।
परिघाणां सहस्राणां गिरीणां चैव भेदनम् ।। नानारुधिरसिक्तांगं मेदोदिग्धं सुदारुणम् ।। ३९ ।। कालाभं सुमहानादं नानाशक्तिविना- शनम् ।। शत्रूणां त्रासजननं सपक्षामिव पन्नगम् ।। ४० ।। सहस्रों परिघ और पर्वतोंका भेदनेवाला अनेक रुधिरोंसे सिक्त, अंग मेदसे अच्छादित ।। ३९ ।। कालके समान, बडे शब्दसे अनेक शक्तियोंका नाश करनेवाला शत्रुओंका त्रास देनेवाला, पंखयुक्त सर्पके समान ।। ४० ।।
काकगृध्रबकानां च गोमायुवृकरक्षसाम् ।। नित्यं भक्ष्यप्रदं युद्धे राक्षसानां भयावहम् ।। ४१ ।। द्विषतां कीर्तिहरणं प्रकर्षकरमात्मनः ।। अभिमन्त्र्य ततो रामस्तं महेषुं महाभुजः ।। ४२ ।। काक, गृध्र, बक, गोमायु (शृगाल) भेडियों तथा राक्षसोंको नित्य भक्षका देनेवाला, राक्षसोंको भयदायक ।। ४१ ।। शत्रुओंकी कीर्तिका हरने- वाला अपनी उन्नति करनेवाले उस बाणको अभिमंत्रित कर रामचन्द्रने । ४२ ।।
वेदप्रोक्तेन विधिना कुण्डलीकृत्य कार्मुकम् ।। स रावणाय तं वेगाच्चिक्षेप शर मुत्तमम् ।।४३।। स सायको धनुर्मुक्त्तो हन्तुं रामेण रावणम् ।। धूमपूर्वँ प्रजज्वाल प्राप्य वायुपथं महान् ।। ४४ ।। वेदके कहे विधानसे धनुषपर चढाय रावणके ऊपर बडे वेगसे छोडा ।। ४३ ।। छोडा हुआ बाण प्रथम धूमयुक्त जल उठा और फिर वायुके मार्गको प्राप्त होकर चला ।। ४४ ।।
( १३० ) अद्भुतरामायण [द्वाविंशति-
तं वज्रमिव दुर्धर्षं वज्रपाणिविसर्जितम् ॥ कृतांतकमिवावार्यं रावणो वीक्ष्य तत्पुरः ॥ ४५ ॥ हुंकृत्य किल जग्राह बाणं वामेन पाणिना ॥ ततस्तं जानुना कृष्य बभंज राक्षसाधिपः ॥ ४६ ॥
इन्द्रके हाथसे छोडे हुए वज्रके समान महादुर्धर्ष कालके समान निवारण करनेके अयोग्य उस बाणको देखकर रावण ॥ ४५ ॥ “हूँ” ऐसा शब्द कर वाम हाथसे वाण ग्रहण कर लेता हुआ, और जंघासे खेंचकर उसको तोड डाला ४६ ।
भग्ने तस्मिञ्छरे रामो विमना इव तस्थिवान् ॥ सहस्रकन्धरः क्रुद्धः क्षुरंप्रगृह्य साय कम् ॥ ४७ ॥ विव्याध रा*घवं वक्षः सर्वप्राणेन राक्षसः ॥ वक्षो निर्भिद्य स शरो रामस्य सुमहात्मनः ॥ ४८ ॥
उस वाणके भग्न होनेसे रामचन्द्र विमन होकर स्थित हुए; तब वह सहस्र-कंधर क्रोध कर तीक्ष्ण वाणको ग्रहण कर ॥ ४७ ॥ सम्पूर्ण बलसे रामचन्द्रकी छातीमें ताडन करता हुआ ॥ ४८ ॥
भित्त्वा महीं च सहसा पाताल तलमाविशत् ॥ ततो रामो महाबाहुः पपात पुष्पकोपरि ॥ ४९ ॥ निःसंज्ञो निश्चलश्चासीद्धाहा भूतानि चक्रिरे ॥ प्राकम्पत मही सर्वा सपर्वतवनाब्धिका ॥ ऋषयः कांदिशीकास्ते हा राम इति वादिनः ॥ ५० ॥
वह बाण रामचंद्रकी छातीको भेदन कर पृथिवी फाडकर पातालमें प्रवेश कर गया; तब महाबाहु राम मूर्च्छित हो पुष्पकमें गिरे ॥ ४९ ॥ निश्चल और अचेतन हो गये, सब प्राणी हाहाकार करने लगे, सब पर्वत और वनोंके सहित पृथिवी कंपित हो गई और हा राम ! इस प्रकारके शब्द ऋषिजन करने लगे ५०
दशशतवदनो जितारिरुग्रोरणशिरसि प्रननर्त सानुयात्रः ॥ गगन-तलगता निपतुरुल्काः प्रलयमिवापि च मेनिरे जनौघाः ॥ ५१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर कांडे रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥
शत्रुका जीतनेवाला सहस्रमुखी रावण रणमें नृत्य करने लगा आकाशसे उल्कापात होने लगीं, सब प्राणियोंने जाना अब प्रलय हो जायगी ॥ ५१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसादमिश्रकृत रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥
* रावणं राघवसम्बन्धि ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२१)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२१)
त्रयोविंशति सर्ग
जानकीद्वारा सहस्रमुखी रावणका वध
रामं तथाविधं दृष्ट्वा मुनयो भयविह्वलाः ।। हाहाकारं प्रकुर्वन्तः शांतिं जेपुश्च केचन ।। १ ।। तदा तु मुनिभिर्दृष्टा सीता प्रहसितानना ।। वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे सीतां प्रोचुर्महर्षयः ।। २ ।।
रामचन्द्रको इस प्रकारका देख मुनि भयसे व्याकुल हो गये और कोई हाहाकार कर शान्तिपाठ करने लगे ।। १ ।। उस समय जानकीको हास्यमुख देखकर वसिष्ठ आदि ऋषि जानकीसे कहने लगे ।। २ ।।
सीते कथं श्रावितोऽयं रावणं राघव स्त्वया ।। समुत्पन्नो विपाकोऽयं घोरो जनकनंदिनि ।। ३ ।। क्व गता भ्रातरः सर्वे क्व गता वानरर्षभाः ।। मंत्रिणः क्व गता भद्रे रामस्य किमुपस्थितम् ।। ४ ।।
हे जानकी ! क्यों इस रावणकी वार्ता रामचन्द्रको सुनाई, इसीका घोर-फल रघुनन्दनको उपस्थित हुआ है ।। ३ ।। सब भाई और वानर जाने कहां गये, हे भद्रे ! सब मंत्री कहां गये, रघुनाथजीको यह क्या व्यसन उपस्थित हुआ है ।। ४ ।।
श्रुत्वैतद्वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।। रामं तथाविधं दृष्ट्वा शयानं पुष्पकोपरि ।। ५ ।। पुंडरीकनिभे नेत्रे निमील्य रणमूर्द्धनि ।। आलिंग्य चोरसा सुप्तं प्रियामिव धनुः शरम् ।। ६ ।। नर्दन्तं राक्षसं चापि महाबलपराक्रमम् ।। साट्टहासं विनद्योच्चैः सीता जनकनंदिनी ।। ७ ।। स्वरूपं प्रजहौ देवी महाविकटरूपिणी ।। क्षुत्क्षामाच कोटराक्षी चक्रभ्रमितलोचना ।। ८ ।।
उन मुनियोंके इस प्रकारके वचन श्रवण कर और रामचन्द्रको पुष्पकपर मूच्छित देखकर ।। ५ ।। धनुष शर लिये मूच्छित रामको आलिंगन कर कमलकेसे नेत्रोंको रणस्थलमें मीचकर ।। ६ ।। महाबली पराक्रमी राक्षसको शब्द करता देखकर जनकनंदिनी सीता ऊँचे स्वरसे अट्टहास करके ।। ७ ।। वह महाविकट रूपवाली होकर अपना पूर्वरूप त्यागन करती हुई भूखसे व्याकुल कोटराक्षी चक्रके समान भ्रमित लोचन ।। ८ ।।
(१२२) अद्भुतरामायण [त्रयोविंशति-
दीर्घजंघा महारावा मुंडमालाविभूषणा ॥ अस्थिकंकिणिका भीमा भीमवेगपराक्रमा ॥ ९ ॥ खरस्वरा महाघोरा विकृता विकृतानना, ॥ चतुर्भुजा दीर्घतुंडा शिरोऽलंकरणोज्ज्वला ॥ १० ॥
दीर्घजंघा महाशब्दवाली मुण्डमालाके भूषणोंवाली हड्डियोंकी क्षुद्रघण्टिका पहरे भीम वेग पराक्रमवाली ॥ ९ ॥ तीक्ष्ण शब्दवाली महाघोर विकृतमुखवाली चार भुजा दीर्घतुण्ड उज्ज्वल शिरके भूषण पहरे ॥ १० ॥
ललज्जिह्वा जटाजूटैर्मण्डिता चण्डरोमिका ॥ प्रलयांभोदकालाभा घंटापाशविधारिणी ॥ ११ ॥ अवस्कंद्य ॐ रथात्तूर्णं खड्गखर्परधारिणी ॥ श्येनीव रावणरथे पपात निमिषान्तरे ॥ १२ ॥
चलायमानजिह्वा जटाजूटसे मण्डित चण्डरोमवाली प्रलयसागर और कालके समान घंटापाशको धारण करनेवाली ॥ ११ ॥ पुष्पकसे शीघ्रतासे उतरकर खड्ग खर्पर धारण किये वाजिनीके समान रावणके रथपर टूट पडी ॥ १२ ॥
शिरांसि रावणस्याशु निमेषान्तरमात्रतः ॥ खड्गेन तस्य चिच्छेद सहस्राणीह लीलया ॥ १३ ॥ अन्येषां योद्धृवीराणां शिरांसि नखरेण हि ॥ भिन्ना निपातयामास भूमौ तेषां दुरात्मनाम् ॥ १४ ॥
एक निमेषमात्रमेंही लीलासे रावणके सहस्र शिर खड्गसे काट डाले ॥ १३। और भी वीर योध्दाओंके शिर नखोंसे तोड तोडकरं पृथिवीमें डाल दिये ॥ १४ ॥
केषांचित्पाटयामास नख कोष्ठानि जानकी ॥ खड्गेन चाच्छिनत्कांश्चित्क्रूरान्यादांश्च चिच्छिदे ॥ १५ ॥ खण्डं खण्डं चकारान्यांस्तिलशः कांश्चिदेव हि ॥ अन्त्राण्यन्यस्याचकर्ष पादाघातेन कांश्चन ॥ १६ ॥
किन्हींके कोष्ठ नखोंसे चीर डाले, किन्हींके चरण आदि अंग खड्गसे काट डाले ॥ १५ ॥ किन्हींके अंग खड्गसे तिलके वरावर काटकर चूर्णकर दिये, किसीको चरणाघात कर आंतें निकालकर खेंचन लगी ॥ १६ ॥
पार्श्वेन निजघानान्यान्याष्णिनान्यानपोथयत् ॥ कांश्चिच्छरीरवातेन दृष्ट्वाप्यन्यानपातयत् ॥ १७ ॥ प्रलयं कुर्वती सीता राक्षसानां भयंकरी ॥ निजघानाट्टहासेन कांश्चित्पृष्ठे द्विधाकरोत् ॥ १८ ।
* पुष्पादित्यर्थः । सम्पार पुष्पकं रथमित्यत्र पुष्पंके रथशब्द प्रयोगात् ।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२३)
पार्श्वभागसे इधर उधरके राक्षसोंको प्रहार करने लगी, किन्हींको शरीरकी पवनोंसे नष्ट करती हुई ॥ १७ ॥ वह राक्षसोंको भयदायक प्रलय करने लगी, किसीको अट्टहास कर पृष्ठभागसे दो टुकडे करती हुई ॥ १८ ॥
कांश्चित्केशांन्समाकृष्य निष्पिपेष महीतले ॥ सारथान्सगजान्सा-
श्वान्सगदासहतोमरान् ॥ १९ ॥ कांश्चिद्योधान्समाकृष्य मज्जया-
मास वारिधौ ॥ गले चोद्वेष्ट्य केषांचित्प्राणाञ्जग्राह जानकी ॥२०॥
किन्हींके केश पकडकर पीस डालती हुई रथ हाथी घोडे तोमरोंसहित ॥ १९ ॥ खैंचकर किसीको सागरमें डुबाती हुई, किसीका गला घोटकर जानकीने प्राण हरण कर लिये ॥ २० ॥
केषांचित्स्कंध आरुह्य शिरांस्युत्पाटितानि हि ॥ हुंकारेणाट्टहासेन
कांश्चित्प्राणानहापयत् ॥ २१.॥ कांश्चित्प्रचूर्ण्य वदनं पशुमारम-
मारयत् ॥ तान्सर्वान्निमिषेणैव निहत्य जनकात्मजा ॥ २२ ॥
किन्हींके कंधेपर कूदकर शिर तोड़ती हुई, किन्हींके प्राण अट्टहास और हुंकारसे हरण कर लिये ॥ २१ ॥ किन्हींके वदनको चूर्ण कर पशुओंके समान मार डाला. इस प्रकार एक निमेषमात्रमें जानकी उन सबको मारकर ॥ २२ ॥
तेषामंत्रेण शिरसां मालाभिः कृतभूषणा ॥ रावणस्य शिरांस्यु-
ग्राण्यादाय रणमूर्द्धनि ॥ २३ ॥ कंदुकक्रीडनं कर्तुं मनश्चक्रे मन-
स्विनी ॥ एतस्मिन्नंतरे तस्यां रोमकूपेभ्य उद्गताः ॥ २४ ॥
उनके शिरोंकी माला बनाकर धारण करती हुई और रणस्थलमें वे रावणके शिर लेकर ॥ २३ ॥ उनसे वह मनस्विनी गेंदका खेल करनेकी इच्छा करने लगी इसी अवसरमें उसके रोमकूपसे निकलकर ॥ २४ ॥
मातरो विकृताकाराः साट्टहासाः समाययुः ॥ सह कंदुकलीलार्थं
सीतया ताः सहस्रशः २५ ॥ तासां कासांचिदाख्यास्ये नामानि
शृणुसुव्रत ॥ याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः कल्याणीभिश्चराचराः । २६
विकृत आकारवाली माताएँ हँसती हुई प्राप्त हुईं, वह सहस्रों कंदुक क्रीडामें जानकीको सहायता देने लगीं ॥ २५ ॥ हे सुव्रत उनमें किन्हींके नाम मैं कहता हूं, जिन कल्याणियोंसे त्रिलोकी व्याप्त रही है ॥ २६ ॥
(१२४) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-
प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी तथा ॥ श्रीमती बहुला चैव तथैव बहुपुत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता च गोपाली बृहदंबालिका तथा ॥ जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी ॥ २८ ॥
प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोनसी श्रीमती बहुला बहुपत्रिका ॥ २७ ॥ अप्सुजाता गोपाली बृहदम्बालिका जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी २८
वसुदामा सुदामा च विशोका नंदिनी तथा ॥ एकचूडा महाचूडा चक्रनेमिश्चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी जया सेना कमलाक्ष्यथ शोभना ॥ शत्रुंजया तथा चैव क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥
सुदामा वसुदामा विशोका नंदिनी एकचूडा चक्रनेमि चटीतमा ॥ २९ ॥ उत्तेजनी तया सेना कमलाक्षी शोभना शत्रुञ्जया क्रोधना शलभी खरी ॥ ३० ॥
माधवी शुभ्रवस्त्रा च तीर्थसेनी जटोज्ज्वला ॥ गीतप्रिया च कल्याणी कद्रुरोमामिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रूश्च कनकावती ॥ अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा च भारती ॥ ३२ ॥
माधवी शुभ्रवस्त्रा तीर्थसेना जटा उज्ज्वला गीतप्रिया कल्याणी कद्रुरोमा अमिताशना ॥ ३१ ॥ मेघस्वना भोगवती सुभ्रू कनकावती अलाताक्षी वेगवती विद्युज्जिह्वा भारती ॥ ३२ ॥
पद्मावती सुनेत्रा च गंधरा बहुयोजना ॥ सन्नालिका महाकाली कमला च महाबला ॥ ३३ ॥ सुदामा बहुदामा च सुप्रभा च यशस्विनी ॥ नृत्यप्रिया परानन्दा शतोदूखलमेखला ॥ ३४ ॥
पद्मावती सुनेत्रा गंधरा बहुयोजना सन्नालिका महाकाला कमला महाबला ३३ सुदामा बहुदामा सुप्रभा यशस्विनी नृत्यप्रिया परामंदा शतोदूख-मलमेखरा ॥ ३४ ॥
शतघंटा शतानंदा आनन्दा भवतारिणी ॥ वपुष्मती चंद्रसीता भद्रकाली सटामला ॥ ३५ ॥ झंकारिकानिष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी ॥ सुमला सुस्तनवति वृद्धिकामा जयप्रिया ॥ ३६ ॥
शतघंटा शतानन्दा आनन्दा भवतारिणी वपुष्मती चन्द्रसीता भद्रकाली सठामला ॥ ३५ ॥ झंकारिका निष्कुटिका रामा चत्वरवासिनी सुमला सुस्तनम्रती वृद्धिकामा जयाप्रिया ॥ ३६ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२५)
धना सुप्रसादा च भवदा च जनेश्वरी ॥ एडी भेडी समेडी च वेतालजननी तथा ॥ ३७ ॥ कंदुतिः कंदुका चैव वेदमित्रा सुदेविका ॥ लम्बास्या केतकी चैव चित्र सेना चलाचला ॥ ३८ ॥
धनदा सुप्रसादा भवदा जनेश्वरी एडी समेडी भेडी वेतालजननी ॥ ३७ ॥ कंदुति कन्दुका वेदमित्रा सुदेविका लम्बास्या केतकी चित्रसेना चला अचला ३८
कुक्कुटिका शृंखलिका तथा शंकुलिका हडा ॥ कन्दालिका काकलिका कुंभिकाथ शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला च महावेगा च कंकिनी ॥ मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना तथा । ४० ।
कुक्कुटिका शृंखलिका संकुलिखा हडा कंदालिका काकलिका कुंभिका शतोदरी ॥ ३९ ॥ उत्क्राथिनी जवेला महावेगा कंकिनी मनोजवा कटकिनी प्रघसा पूतना ॥ ४० ॥
खेशया चातिद्रढिमा क्रोशनाथत दित्प्रभा ॥ मंदोदरी च तुंडीच कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लंबिनी लंबा बहुचूडा विकत्थिनी ॥ ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥
खेशया अतिद्रढिमा क्रोशना तडित्प्रभा मन्दोदरी तुंडी कोटरा मेघवाहिनी ॥ ४१ ॥ सुभगा लम्बिनी लम्बा वहुचूडा विकत्थिनी ऊर्ध्ववेणीधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४२ ॥
पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा तथैव च ॥ यक्षाणिका मत्सरिका जरायुर्जर्जरानना ॥ ४३ ॥ ख्यातां डहडहा चैव तथा धमधमा द्विजा ॥ खंडखंडा पृथुश्रोणी पूषणामणि कुट्टिका ॥ ४४ ॥
पृथुवक्त्रा मधुलिहा मधुकुंभा यक्षणिका मत्सरिका जरायु जर्जरानना ॥ ४३ । ख्याता दहपहा धमधमा खण्डखण्डा पृथुश्रेणी पूषणा मणिकुट्टिका ॥ ४४ ॥
अम्लोचा चैव निम्लोचा तथा लंबपयोधरा ॥ वेणुदीणाधरा चैव पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी दृष्ट्वा खरजंघा महाजरा ॥ शिशुमारमुखी श्वेता लोहिताक्षी विभीषणा ॥ ४६ ॥
अम्लोचा निम्लोचा पलोधरा वेणुवीणाधरा पिंगाक्षी लोहमेखला ॥ ४५ ॥ शशोलूकमुखी हृष्टा खरजंघा महाजरा शिशुरामुखी श्वेता लोहिताक्षी बिभीषणा ॥ ४६ ॥
( १२६ ) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति-
जटालीका कामचरी दीर्घजिह्वाबलोत्कटा ।। कालाहिकाया मालीका मुकुटामुकुटेश्वरी ।। ४७ ।। लोहिताक्षी महाकाया हवि- ष्पिण्डा च पिण्डिका ।। एकत्वचा सुकूर्म्मा च कुल्लाकर्णि च कर्णिका ।४८
जटालीका कामचारी दीर्घजिह्वा बलोत्कटा कालाहिका मालीका मुकुटा मुकुटेश्वरी ॥ ४७ ॥ लोहिताक्षी महाकाया हविष्पिण्डा पिण्डिका एकत्वचा सुकूर्मा कुल्लाकर्णी कर्णिका ॥ ४८ ॥
सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा तथा ।। चतुष्पथनिकेता च गोकर्णी महिषानना ।। ४९ ।। खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वनमहा- स्वना ।। शंखकुंभश्रवा चैव भगदा च महाबला ।। ५० ।।
सुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा चतुष्पथ निकेता गोकर्णी महिषानना ॥ ४९ ॥ खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वना महास्वना शंखकुम्भश्रवा भगदा महाबला ॥ ५० ॥
गणा च सुगणा चैव कामदाप्यथ कन्यका ।। चतुष्पथरता चैव भूतितीर्थान्यगोचरा ।। ५१ ।। पशुदा विबुदा चैव सुखदा च महा- यशाः ।। पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ।। ५२ ।।
गणा सुगणा कामदा कन्यका चतुष्पथ रता भूतितीर्था अन्यगोचरा ॥ ५१ ॥ पशुदा विबुदा सुखदा महयशा पयोदा गोमहिषदा सुविशाला चतुर्भुजा ॥ ५२ ॥
प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा च रोचमाना सुलोचना ।। नौकर्णी मुखकर्णी च विशिरा मंथिनी तथा ।। ५३ ।। एकवक्त्रा मेघरवा मेघवामा द्विरो- चना ।। एताश्चान्याश्च बहवो मातरः कोटिकोटिशः ।। ५४ ।।
प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा रोचमाना सुलोचना नौकर्णी मुखकर्णी विशिरा मंथिनी ॥ ५३ ॥ एकमुखी मेघरवा मेघवामा द्विरोचना इसके सिवाय और भी अनेकों मातायें थीं ॥ ५४ ॥
असंख्याताः समाजग्मुःक्रीडितुं सीतया सह ।। दीर्घवक्ष्यो दीर्घदंत्यो दीर्घतुंड्यो द्विजोत्तम ।। ५५ ।। सरसा मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलं- कृताः ।। माहात्म्येन च संयुक्ताः कामरूपधरास्तथा ।। ५६ ।।
वे असंख्य जानकीके साथ क्रीडा करनेको आई, दीर्घ वक्षस्थलवाली, दीर्घ दांतोंवाली, दीर्घनासिकावाली ॥ ५५ ॥ सरस मधुर यौवनमती स्वलंकृत- महिमासे संयुक्त कामरूपधारिणी ॥ ५६ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)
निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा कांचनसंनिभाः ॥ कृष्णमेघ- निभाश्चान्या धूम्राश्च द्विजपुङ्गव ॥ ५७ ॥ अरुणाभा महाभागा दीर्घकेश्यः सिताम्बराः ॥ ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिंगाक्ष्यो लंब- मेखलाः ॥ ५८ ॥ निर्मांस गात्रेवाली, श्वेता, कांचनके समान, कृष्णमेघके समान कोई धूम्रवर्ण वाली ॥ ५७ ॥ अरुणाभा, महाभागा, दीर्घवालोंवाली, श्वेतवस्त्र पहरे, ऊर्ध्ववेणी धारे, पिंगाक्षी, लम्बायमान मेखला ॥ ५८ ॥
लंबोदर्यो लम्बकर्ण्यस्तथा लम्बपयोधराः ॥ ताम्राक्ष्यस्ताम्र- वर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथापराः ॥ ५९ ॥ शत्रूणां विग्रहे नित्यं भय- दास्ता भवन्त्यपि ॥ कामरूपधराश्चैव जवे वायुसमास्तथा ॥ ६० ॥ लम्बे पेट, लम्बे कानवाली लम्बे पयोधरवाली, ताम्रवर्णके नेत्रवाली हर्यक्षी ॥ ५९ ॥ शत्रुओंके विग्रहमें नित्य भय देनेवाली होती हैं वे कामरूप धारिणी वेगमें वायुके समान हैं ॥ ६० ॥
शिरांसि रक्षसां गृह्य गंडशैलोपमान्यपि ॥ चिक्रीडुः सीतया सार्द्धं तस्मिन् रणधरातले ॥ ६१ ॥ मुंडमालाधराश्चैव काश्चिन्मुण्ड विभू- षणाः । रणांगणे महाघोरे गृध्रकंकशिवान्विते ॥ ६२ ॥ पर्वतशिखरके समान राक्षसोंके शिरको ग्रहण कर धरातलमें जानकीके साथ क्रीडा करने लगीं ॥ ६१ ॥ कोई मुण्डमाला धारण किये कोई मुण्डोंके भूषण पहरे महाघोर रणस्थल जो कि गृध्र कंक और गीदडोंसे युक्त था। ६२।
मांसासृक्पंकिले घोरे तत्र तत्र पुरोपमे ॥ ननर्त जानकी देवी घोर काली महाबला ॥ ६३ ॥ तदा चकंपे पृथिवी नौरिवानिलचालिता ॥ चेलुश्च भूधराः सर्वे समुद्राश्च चकंपिरे ॥ ६४ ॥ तथा मांस रुधिरके कीचसे युक्त उस पुरके समान उस रणस्थलमें महाकाली महाबला महाघोर जानकी देवी नृत्य करने लगी ॥ ६३ ॥ तब नौकाके समान चलायमान हो पृथिवी कंपित होने लगी, सब पर्वत चलायमान और सागर कंपित होगये ॥ ६४ ॥
स्वर्गिणां च विमानानि खात्पेतुर्भयतो द्विज ॥ सूर्यस्य दुद्रुवुर्भीता वाजिनो मुक्तरश्मयः ॥ ६५ ॥ यदा न सेहे जानक्याः भारं सोढुं वसुंधरा ॥ गंतुमैच्छत पातालं सीतापादाग्रपीडिता ॥ ६६ ॥