अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
२९८ अध्यात्मरामायण [सर्ग १२
रामो विभीषणं दृष्ट्वा प्राप्तराज्यं मुदान्वितः ॥४८॥
कृतकृत्यमिवात्मानममन्यत सहानुजः ।
सुग्रीवं च समालिङ्ग्य रामो वाक्यमथाब्रवीत्॥४९॥
सहायेन त्वया वीर जितो मे रावणो महान् ।
विभीषणोऽपि लङ्कायामभिषिक्तो मयानघ ॥५०॥
ततः प्राह हनूमन्तं पार्श्वस्थं विनयान्वितम् ।
विभीषणस्यानुमते गच्छ त्वं रावणालयम् ॥५१॥
जानक्यै सर्वमाख्याहि रावणस्य वधादिकम् ।
जानक्याः प्रतिवाक्यं मे शीघ्रमेव निवेदय ॥५२॥
एवमाज्ञापितो धीमान् रामेण पवनात्मजः ।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां पूज्यमानो निशाचरैः ॥५३॥
प्रविश्य रावणगृहं शिंशपामूलमाश्रिताम् ।
ददर्श जानकीं तत्र कृशां दीनामनिन्दिताम्॥५४॥
राक्षसीभिः परिवृतां ध्यायन्तीं राममेव हि ।
विनयावनतो भूत्वा प्रणम्य पवनात्मजः ॥५५॥
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रह्वो भक्त्याऽग्रतः स्थितः ।
तं दृष्ट्वा जानकी तूष्णीं स्थित्वा पूर्वस्मृतिं ययौ॥५६॥
ज्ञात्वा तं रामदूतं सा हर्षात्सौम्यमुखी बभौ ।
स तां सौम्यमुखीं दृष्ट्वा तस्यै पवननन्दनः ।
रामस्य भाषितं सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥५७॥
देवि रामः ससुग्रीवो विभीषणसहायवान् ।
कुशली वानराणां च सैन्यैश्च सहलक्ष्मणः ॥५८॥
रावणं ससुतं हत्वा सबलं सह मन्त्रिभिः ।
त्वामाह कुशलं रामो राज्ये कृत्वा विभीषणम्॥५९॥
श्रुत्वा भर्तुः प्रियं वाक्यं हर्षगद्गदया गिरा ।
किं ते प्रियं करोम्यद्य न पश्यामि जगत्त्रये ॥६०॥
समं ते प्रियवाक्यस्य रत्नान्याभरणानि च ।
एवमुक्तस्तु वैदेह्या प्रत्युवाच प्लवङ्गमः ॥६१॥
श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और भाई लक्ष्मणके सहित अपनेको कृतकृत्य-सा मानने लगे । तदनन्तर भगवान् रामने सुग्रीवको हृदयसे लगाकर कहा—॥४७-४९॥
"हे वीर ! तुम्हारी सहायतासे ही मैंने महाबली रावणको जीता है और हे अनघ ! (उसीसे) विभीषणको भी लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त किया है" ॥ ५० ॥ फिर, पास ही खड़े विनीतभावसे खड़े हुए हनुमान्जीसे कहा— "तुम विभीषणकी सम्मतिसे रावणके महलमें जाओ ॥५१॥ और जानकीजीको रावणके वध आदिका समस्त वृत्तान्त सुनाओ, फिर वह जो कुछ उत्तर दें वह मुझे सुनाना" ॥५२॥
बुद्धिमान् पवननन्दनने, भगवान् रामकी ऐसी आज्ञा पा राक्षसोंसे पूजित हो, लङ्कापुरीमें प्रवेश किया ॥५३॥ फिर रावणके महलमें जाकर शिंशपावृक्षके तले बैठी हुई अति दुर्बल और दुःखिता अनिन्दिता जनक-नन्दिनीको देखा ॥५४॥ वे राक्षसियोंसे घिरी हुई थीं और एकमात्र भगवान् रामका ही ध्यान कर रही थीं। पवनकुमारने अति विनयावनत होकर उन्हें प्रणाम किया ॥५५॥ और अत्यन्त नम्रतापूर्वक भक्तिभावसे हाथ जोड़-कर सामने खड़े हो गये। उन्हें देखकर जानकीजी (पहले तो कुछ देर) चुप रहीं, फिर उन्हें पूर्व-स्मृति हो आयी ॥५६॥ और उन्हें रामका दूत जानकर उनका मुख हर्षसे खिल गया। हनुमान्जीने उन्हें प्रसन्नमुखी देख उनसे रामका सारा सन्देश कहना आरम्भ किया ॥५७॥ (वे बोले—) "देवि ! विभीषण जिनके सहायक हैं वे श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सुग्रीव और वानर-सेनाके सहित कुशलपूर्वक हैं ॥ ५८ ॥ उन भगवान् रामने पुत्र, सेना और मन्त्रियोंके सहित रावणको मारकर तथा लंकाका राज्य विभीषणको देकर तुम्हें अपनी कुशल भेजी है" ॥ ५९ ॥
पतिको यह प्रिय सन्देश सुन श्रीसीताजी हर्षसे गद्गद वाणीसे बोलीं—"भैया, मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूँ ? तुम्हारे प्रिय वाक्योंके समान मुझे त्रिलोकीमें कोई रत्न-आभूषणादि भी दिखायी नहीं देते (जिन्हें देकर तुमसे उऋण होऊँ) ।" जानकीजीके
सर्ग १२] युद्धकाण्ड २९९
| रत्नौघाद्विविधाद्धापि देवराज्याद्विशिष्यते ।<br>हतशत्रुं विजयिनं रामं पश्यामि सुस्थिरम् ॥६२॥<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मैथिली प्राह मारुतिम् ।<br>सर्वे सौम्या गुणाः सौम्य त्वय्येव परिनिष्ठिताः ॥६३॥<br>रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रं मामाज्ञापयतु राघवः ।<br>तथेति तां नमस्कृत्य ययौ द्रष्टुं रघूत्तमम् ॥६४॥<br><br>जानक्या भाषितं सर्वं रामस्याग्रे न्यवेदयत् ।<br>यन्निमित्तोऽयमारम्भः कर्मणां च फलोदयः ॥६५॥<br>तां देवीं शोकसन्तप्तां द्रष्टुमर्हसि मैथिलीम् ।<br>एवमुक्तो हनुमता रामो ज्ञानवतां वरः ॥६६॥<br>मायासीतां परित्यक्तुं जानकीमनले स्थिताम् ।<br>आदातुं मनसा ध्यात्वा रामः प्राह विभीषणम् ॥६७॥<br>गच्छ राजन् जनकजामानयाशु ममान्तिकम् ।<br>स्नातां विरजवस्त्राढ्यां सर्वाभरणभूषिताम् ॥६८॥<br><br>विभीषणोऽपि तच्छ्रुत्वा जगाम सहमारुतिः ।<br>राक्षसीभिः सुवृद्धाभिः स्नापयित्वा तु मैथिलीम् ॥६९॥<br>सर्वाभरणसम्पन्नामारोप्य शिबिकोत्तमे ।<br>याष्टीकैर्बहुभिर्गुप्तां कञ्चुकोष्णीषिभिः शुभाम् ॥७०॥<br>तां द्रष्टुमागताः सर्वे वानरा जनकात्मजाम् ।<br>तान्वारयन्तो बहवः सर्वतो वेत्रपाणयः ॥७१॥<br>कोलाहलं प्रकुर्वन्तो रामपार्श्वमुपाययुः ।<br>दृष्ट्वा तां शिबिकारूढां दूरादथ रघूत्तमः ॥७२॥<br>विभीषण किमर्थं ते वानरान्वारयन्ति हि ।<br>पश्यन्तु वानराः सर्वे मैथिलीं मातरं यथा ॥७३॥ | इस प्रकार कहनेपर वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी बोले— ॥ ६०-६१ ॥ "मातः ! मैं शत्रुके नष्ट होनेपर स्वस्थ चित्तसे विराजमान विजयशाली श्रीरामका दर्शन करता हूँ—यह मेरे लिये नाना प्रकारकी रत्नराशि और देवराज्यसे भी बढ़कर है" ॥ ६२ ॥ उनके ये वचन सुनकर मिथिलेशकुमारीने मारुतिसे कहा—"हे सौम्य ! जितने शुभ गुण हैं वे सब तुम्हींमें वर्तमान हैं ॥ ६३ ॥ अब, मैं रघुनाथजीके दर्शन करूँगी, वे शीघ्र ही मुझे भी आज्ञा दें।" तब हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह उन्हें प्रणाम कर श्रीरघनाथजीके दर्शनोंके लिये चल दिये ॥ ६४ ॥<br><br>(वहाँ पहुँचकर) हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीके आगे जानकीजीका सारा सम्भाषण कह सुनाया (और कहा—) "भगवन् ! जिनके लिये यह युद्धादि सम्पूर्ण कर्म आरम्भ हुए थे और जो उन समस्त कर्मोंकी फलरूपा हैं, अब उन शोकसन्तप्ता मिथिलेशनन्दिनी देवी जानकीको आप देखिये।" हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् रामने माया-सीताको त्यागनेके लिये और अग्निस्थिता जानकीको ग्रहण करनेके लिये मनसे विचार करते हुए विभीषणसे कहा—॥ ६५-६७ ॥ "राजन् ! तुम जाओ और तुरन्त ही जानकीको स्नान करा शुद्ध निर्मल वस्त्र पहना तथा सम्पूर्ण आभूषणोंसे सुसज्जित कर मेरे पास ले आओ ॥ ६८ ॥"<br><br>यह सुनकर विभीषण हनुमान्जीको साथ ले तुरन्त ही चले और शुभलक्षणा जानकीजीको बड़ी-बूढ़ी राक्षसीयोंद्वारा स्नान करा, सम्पूर्ण वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित होनेपर एक सुन्दर पालकीपर चढ़ाया और फिर उन्हें, जामा-पगड़ी आदिसे बने-ठने बहुत-से छड़ीदारोंसे सुरक्षित कर ले चले ॥ ६९-७० ॥ उस समय सीताजीको देखनेके लिये सब वानर दौड़ आये। उन्हें चारों ओरसे रोकते तथा (हटो-हटो कहकर) बड़ा कोलाहल करते बहुत-से छड़ीदार रामचन्द्रजीके पास ले आये। रघुनाथजीने दूरसे ही सीताजीको पालकीपर चढ़ी देखकर कहा—॥ ७१-७२ ॥ "विभीषण ! तुम्हारे ये छड़ीदार वानरोंको क्यों रोकते हैं? समस्त वानरगण जानकीका माताके समान दर्शन करें |
३०० अध्यात्मरामायण [सर्ग १२
पादचारेण साऽऽयातु जानकी मम सन्निधिम् । श्रुत्वा तद्रामवचनं शिबिकादवरुह्य सा ॥ ७४॥ पादचारेण शनकैरागता रामसन्निधिम् । रामोऽपि दृष्ट्वा तां मायासीतां कार्यार्थनिर्मिताम् ७५ अवाच्यवादान्बहुशः प्राह तां रघुनन्दनः । अमृष्यमाणा सा सीता वचनं राघवोदितम् ॥ ७६॥ लक्ष्मणं प्राह मे शीघ्रं प्रज्वालय हुताशनम् । चिक्षिासार्थं हि रामस्य लोकानां प्रत्ययाय च ॥ ७७॥ राघवस्य मतं ज्ञात्वा लक्षमणोऽपि तदैव हि । महाकाष्ठचयं कृत्वा ज्वालयित्वा हुताशनम् ॥ ७८॥ रामपार्श्वमुपागम्य तस्थौ तूष्णीमरिन्दमः । ततः सीता परिक्रम्य राघवं भक्तिसंयुता ॥ ७९॥ पश्यतां सर्वलोकानां देवराक्षसयोषिताम् । प्रणम्य देवताभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यश्च मैथिली ॥ ८०॥ बद्धाञ्जलिपुटा चेदमुवाचाग्निसमीपगा । यथा मे हृदयं नित्यं नापसर्पति राघवात् ॥ ८१॥ तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः । एवमुक्त्वा तदा सीता परिक्रम्य हुताशनम् ॥ ८२॥ विवेश ज्वलनं दीप्तं निर्भयेन हृदा सती ॥ ८३॥
दृष्ट्वा ततो भूतगणाः ससिद्धाः सीतां महावह्निगतां भृशार्ताः । परस्परं प्राहुरहो स सीतां रामः श्रियं स्वां कथमत्यजज्ज्ञः ॥ ८४॥
॥७३॥ और जानकीजी मेरे पास पैदल चलकर आयें।" रामजीके ये वचन सुन श्रीसीताजी पालकीसे उतर पड़ीं और धीरे-धीरे पैदल ही श्रीरामचन्द्रजीके पास पहुँचीं । भगवान् रामने कार्यवश रची हुई माया-सीताको देखकर उनसे बहुत-सी न कहनेयोग्य (उनके चरित्रके विषयमें सन्देहयुक्त) बातें कहीं । श्रीरघुनाथजीद्वारा कहे हुए उन वाक्योंको सहन न कर सकनेके कारण सीताजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"भगवान् रामके विश्वासके लिये और लोगोंको निश्चय करानेके लिये तुम शीघ्र ही मेरे लिये अग्नि प्रज्वलित करो" ॥ ७४-७७ ॥ श्रीरघुनाथजीकी भी सम्मति समझकर शत्रुदमन लक्ष्मणजीने उसी समय बड़ा भारी काष्ठसमूह इकट्ठा किया और उसमें अग्नि प्रज्वलित कर चुपचाप रामजीके पास आकर खड़े हो गये। तब सीताजीने भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की ॥ ७८-७९ ॥ और फिर श्रीमिथिलेशकुमारीने समस्त लोकों तथा देव और राक्षसोंकी स्त्रियोंके देखते-देखते देवता और ब्राह्मणोंको नमस्कार कर अग्निके पास जा हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—"यदि मेरा हृदय श्रीरघुनाथजीको छोड़कर कभी अन्यत्र नहीं जाता तो समस्त लोकोंके साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें" ऐसा कह सतीशिरोमणि श्रीसीताजी अग्निकी परिक्रमा कर निर्भय-चित्तसे उस प्रज्वलित अग्निमें घुस गयीं ॥ ८०-८३ ॥
उस समय सीताजीको महा प्रचण्ड अग्निमें प्रविष्ट हुई देख समस्त सिद्ध और भूतगण अत्यन्त व्याकुल हो गये और आपसमें कहने लगे—"अहो ! सब कुछ जानते हुए भी श्रीरामचन्द्रजीने अपनी लक्ष्मी सीताजीको कैसे छोड़ दिया ?" ॥ ८४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
युद्धकाण्ड - सर्ग १३: देवताओंका स्तवन, अग्निदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान
सर्ग १३ ] युद्धकाण्ड ३०१
त्रयोदश सर्ग
देवताओंका भगवान् रामकी स्तुति करना, सीताजी सहित अग्निदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान।
श्रीमहादेव उवाच
ततः शक्रः सहस्राक्षो यमश्च वरुणस्तथा।
कुवेरश्च महातेजाः पिनाकी वृषवाहनः ॥ १ ॥
ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो मुनिभिः सिद्धचारणैः ।
पितरो ऋषयः साध्या गन्धर्वाप्सरसोरगाः ॥ २ ॥
एते चान्ये विमानाग्र्यैराजग्मुर्यत्र राघवः ।
अब्रुवन्परमात्मानं रामं प्राञ्जलयश्च ते ॥ ३ ॥
कर्ता त्वं सर्वलोकानां साक्षी विज्ञानविग्रहः ।
वसूनामष्टमोऽसि त्वं रुद्राणां शङ्करो भवान् ॥ ४ ॥
आदिकर्ताऽसि लोकानां ब्रह्मा त्वं चतुराननः।
अश्विनौ घ्राणभूतौ ते चक्षुषी चन्द्रभास्करौ ॥ ५ ॥
लोकानामादिरन्तोऽसि नित्य एकः सदोदितः।
सदा शुद्धः सदा बुद्धः सदा मुक्तोऽगुणोऽद्वयः॥ ६ ॥
त्वन्मायासंवृतानां त्वं भासि मानुषविग्रहः।
त्वन्नाम स्मरतां राम सदा भासि चिदात्मकः॥ ७ ॥
रावणेन हृतं स्थानमस्माकं तेजसा सह।
त्वयाऽद्य निहतो दुष्टः पुनः प्राप्तं पदं स्वकम् ॥ ८ ॥
एवं स्तुवत्सु देवेषु ब्रह्मा साक्षात्पितामहः ।
अब्रवीत्प्रणतो भूत्वा रामं सत्यपथे स्थितम् ॥ ९ ॥
ब्रह्मोवाच
वन्दे देवं विष्णुमशेषस्थितिहेतुं
त्वामध्यात्मज्ञानिभिरन्तर्हृदि भाव्यम् ।
हेयाहेयद्वन्द्वविहीनं परमेकं
सत्तामात्रं सर्वहृदिस्थं दृशिरूपम् ॥ १०॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! इसी समय सहस्राक्ष इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, महातेजस्वी वृषभवाहन महादेवजी, मुनि, सिद्ध और चारणोंके सहित ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी, पितृगण, ऋषि, साध्य, गन्धर्व, अप्सराएँ और नागगण ये सब तथा और भी अन्यान्य देवगण श्रेष्ठ विमानोंपर चढ़कर जहाँ श्रीरघुनाथजी थे आये। और वे सब हाथ जोड़कर परमात्मा श्रीरामसे बोले— ॥ १-३ ॥
"आप समस्त लोकोंके कर्ता, सबके साक्षी और विशुद्ध विज्ञानस्वरूप हैं; तथा वसुओंमें अष्टम वसु और रुद्रोंमें श्रीमहादेवजी हैं ॥ ४ ॥
आप ही समस्त लोकोंके आदिकर्ता चतुर्मुख ब्रह्माजी हैं, अश्विनीकुमार आपकी घ्राणेन्द्रिय हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं ॥ ५ ॥
सब लोकोंके आदि (उत्पत्तिस्थान) और अन्त (लयस्थान) आप ही हैं तथा आप नित्यस्वरूप, एक, सदोदित (आविर्भाव-तिरोभावसे रहित नित्यप्रकाशस्वरूप), नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, नित्यमुक्त, निर्गुण और अद्वितीय हैं ॥ ६ ॥
हे राम ! जो लोग आपकी मायासे आच्छादित हैं उन्हें आप मनुष्यरूप प्रतीत होते हैं, किन्तु जो आपका नामस्मरण करते हैं उन्हें तो आप सर्वदा चैतन्यस्वरूप ही भासते हैं॥ ७॥
रावणने हमारे तेजके सहित हमारा स्थान भी छीन लिया था, सो आज वह दुष्ट आपके हाथसे मारा गया और हमें फिर अपना पद प्राप्त हो गया ॥ ८ ॥
देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर साक्षात् पितामह ब्रह्माजी अति विनम्र होकर सत्यपथपर स्थित भगवान् रामसे बोले— ॥ ९ ॥
ब्रह्माजी बोले— ‘हे राम ! सम्पूर्ण प्राणियोंकी स्थितिके कारण, आत्मज्ञानियोंद्वारा हृदयमें ध्यान किये जानेवाले, त्याज्य और ग्राह्यरूप द्वन्द्वसे रहित, सबसे परे, अद्वितीय, सत्तामात्र, सबके हृदयमें विराजमान, साक्षीस्वरूप आप विष्णुभगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥ मोहहीन संन्यासीगण निश्चित बुद्धिके द्वारा
| ३०२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १३ |
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प्राणापानौ निश्चयबुद्ध्या हृदि रुद्ध्वा<br>$\quad$छित्त्वा सर्वं संशयबन्धं विषयौघान् ।<br>पश्यन्तीशं यं गतमोहा यतयस्तं<br>$\quad$वन्दे रामं रत्नकिरीटं रविभासम् ॥११॥ | प्राण और अपानको हृदयमें रोककर तथा अपने सम्पूर्ण संशय-बन्धन और विषय-वासनाओंका छेदन कर जिस ईश्वरका दर्शन करते हैं उन रत्नकिरीटधारी, सूर्यके समान तेजस्वी भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ११ ॥ मायातीतं माधवमाद्यं जगदादिं<br>$\quad$मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्द्यम् ।<br>योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्णं<br>$\quad$वन्दे रामं रञ्जितलोकं रमणीयम् ॥१२॥ | जो मायासे परे, लक्ष्मीके पति, सबके आदिकारण, जगत्के उत्पत्ति-स्थान, प्रत्यक्षादि प्रमाणों-से परे, मोहका नाश करनेवाले, मुनिजनोंसे वन्दनीय, योगियोंसे ध्यान किये जानेयोग्य, योगमार्गके प्रवर्त्तक, सर्वत्र परिपूर्ण और सम्पूर्ण संसारको आनन्दित करनेवाले हैं उन परम सुन्दर भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ भावाभावप्रत्ययहीनं भवमुख्यै-<br>$\quad$र्योग्यासक्तैरर्चितपादाम्बुजयुग्मम् ।<br>नित्यं शुद्धं बुद्धमनन्तं प्रणवाख्यं<br>$\quad$वन्दे रामं वीरमशेषासुरदावम् ॥१३॥ | जो भाव और अभावरूप दोनों प्रकारकी प्रतीतियोंसे रहित हैं, तथा जिनके युगलचरणकमलों-का योगपरायण शंकर आदि पूजन करते हैं और जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और अनन्त हैं, सम्पूर्ण दानवोंके लिये दावानलके समान उन ओंकारनामक वीरवर रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १३ ॥ त्वं मे नाथो नाथितकार्याखिलकारी<br>$\quad$मानातीतो माधवरूपोऽखिलधारी ।<br>भक्त्या गम्यो भावितरूपो भवहारी<br>$\quad$योगाभ्यासैर्भावितचेतःसहचारी ॥१४॥ | हे राम ! आप मेरे प्रभु हैं और मेरे सम्पूर्ण प्रार्थित कार्योंको पूर्ण करने-वाले हैं, आप देश-कालादि मान (परिमाण) से रहित, नारायणस्वरूप, अखिल विश्वको धारण करनेवाले, भक्तिसे प्राप्य, अपने स्वरूपका ध्यान किये जाने-पर संसार-भयको दूर करनेवाले और योगाभ्यास-से शुद्ध हुए चित्तमें विहार करनेवाले हैं ॥ १४ ॥ त्वामाद्यन्तं लोकततीनां परमीशं<br>$\quad$लोकानां नो लौकिकमानैरधिगम्यम् ।<br>क्तैश्श्रद्धाभावसमेतैर्भजनीयं<br>$\quad$वन्दे रामं सुन्दरमिन्दीवरनीलम् ॥१५॥ | आप इस लोक-परम्पराके आदि और अन्त (अर्थात् उत्पत्ति और प्रलयके स्थान) हैं, सम्पूर्ण लोकोंके महेश्वर हैं, आप किसी भी लौकिक प्रमाणसे जाने नहीं जा सकते, आप तो भक्ति और श्रद्धासम्पन्न पुरुषोंद्वारा ही भजन किये जानेयोग्य हैं, ऐसे नील-कमलके समान श्यामसुन्दर आप श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १५ ॥ को वा ज्ञातुं त्वामतिमानं गतमानं<br>$\quad$मायासक्तो माधव शक्तो मुनिमान्यम् ।<br>वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्दं<br>$\quad$वन्दे रामं भवसुखवन्द्यं सुखकन्दम् ॥१६॥ | हे लक्ष्मीपते ! आप प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे तथा सर्वथा निर्मान हैं। मायामें आसक्त कौन प्राणी आपको जाननेमें समर्थ हो सकता है ? आप महर्षियोंके माननीय हैं, तथा (कृष्णावतार-के समय) वृन्दावनमें अखिल देवसमूहकी वन्दना करते हुए भी रामरूपसे शिव आदि देवताओंके स्वयं वन्दनीय हैं; ऐसे आप आनन्दघन भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १६ ॥ नानाशास्त्रैर्वेदकदम्बैः प्रतिपाद्यं | जो नाना शास्त्र और वेदसमूहसे प्रतिपादित नित्य आनन्दस्वरूप, निर्विकल्प ज्ञान-
सर्ग १३.] युद्धकाण्ड ३०३
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नित्यानन्दं निर्विषयज्ञानमनादिम्।<br>मत्सेवार्थं मानुषभावं प्रतिपन्नं<br>वन्दे रामं मरकतवर्णं मधुरेशम् ॥१७॥ | स्वरूप और अनादि हैं तथा जिन्होंने मेरा कार्य करनेके लिये मनुष्यरूप धारण किया है उन मरकतमणिके समान नीलवर्ण मथुरानाथ* भगवान् रामको प्रणाम करता हूँ ॥ १७॥ |
| श्रद्धायुक्तो यः पठतीमं स्तवमाद्यं<br>ब्राह्मं ब्रह्मज्ञानविधानं भुवि मर्त्यः।<br>रामं श्यामं कामितकामप्रदमीशं<br>ध्यात्वा ध्याता पातकजालैर्विगतः स्यात् | जो मनुष्य इच्छित कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्याममूर्ति भगवान् रामका ध्यान करते हुए ब्रह्माजीके कहे हुए इस ब्रह्मज्ञान-विधायक आद्य स्तोत्रका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा वह ध्यानशील पुरुष सकल पापोंसे मुक्त हो जायगा" ॥ १८ ॥ |
| श्रुत्वा स्तुतिं लोकगुरोर्विभावसुः<br>स्वाङ्के समादाय विदेहपुत्रिकाम्।<br>विभ्राजमानां विमलारुणद्युतिं<br>रक्ताम्बरां दिव्यविभूषणान्विताम्॥१९॥ | लोकगुरु भगवान् ब्रह्माजीकी यह स्तुति सुन लोकसाक्षी अग्निदेवने अपनी गोदमें निर्मल अरुण कान्तिसे सुशोभित और लाल वस्त्र तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित विदेहपुत्री जानकीजीको लिये (प्रकट होकर) शरणागत-दुःखहारी श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे रघुवीर ! पहले तपोवनमें मुझे सौंपी हुई देवी जानकीको अब ग्रहण कीजिये ॥ १९-२० ॥ |
| प्रोवाच साक्षी जगतां रघूत्तमं<br>प्रपन्नसर्त्तिहरं हुताशनः।<br>गृहाण देवीं रघुनाथ जानकीं<br>पुरा त्वया मय्यवरोपितां वने ॥२०॥ | |
| विधाय मायाजनकात्मजां हरे<br>दशाननप्राणविनाशनाय च।<br>हतो दशास्यः सह पुत्रबान्धवै-<br>र्निराकृतोऽनेन भरो भुवः प्रभो ॥२१॥ | हे हरे ! रावणका प्राणहरण करनेके लिये आपने मायामयी सीता रचकर रावणको उसके पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके सहित मार डाला। हे प्रभो ! ऐसा करके आपने पृथिवीका भार उतार दिया ॥ २१ ॥ |
| तिरोहिता सा प्रतिबिम्बरूपिणी<br>कृता यदर्थं कृतकृत्यतां गता।<br>ततोऽतिहृष्टां परिगृह्य जानकीं<br>रामः प्रहृष्टः प्रतिपूज्य पावकम् ॥२२॥ | वह प्रतिबिम्बरूपिणी मायासीता, जिस कार्यके लिये रची गयी थी उसे पूरा करके अब अदृश्य हो गयी है।" अग्निदेवके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रसन्न हो उनका पूजन कर प्रसन्नवदना जानकीजीको ग्रहण किया ॥ २२ ॥ |
| स्वाङ्के समावेश्य सदाऽनपायिनीं<br>श्रियं त्रिलोकीजननीं श्रियः पतिः।<br>दृष्ट्वाऽथ रामं जनकात्मजायुतं<br>श्रिया स्फुरन्तं सुरनायको मुदा।<br>भक्त्या गिरा गद्गदया समेत्य<br>कृताञ्जलिः स्तोतुमथोपचक्रमे ॥२३॥ | फिर लक्ष्मीपति भगवान् रामने अपनेसे कभी विलग न होनेवाली जगज्जननी जानकीको गोदमें बैठा लिया । उस समय जनकनन्दिनी सीताजीके सहित भगवान् रामको कान्तिसे सुशोभित देख देवराज इन्द्र अति प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर भक्ति-गद्गद वाणीसे स्तुति करने लगे ॥ २३ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>भजेऽहं सदा राममिन्दीवराभं<br>भवारण्यदावानलाभाभिधानम् । | इन्द्र बोले—जो नीलकमलकी-सी आभावाले हैं, संसाररूप वनके लिये जिनका नाम दावानलके समान है, श्रीपार्वतीजी जिनके आनन्दरूपकहा हृदयमें ध्यान |
* यहाँ भगवान् रामको 'मधुरानाथ' कहकर श्रीराम और कृष्णकी अभिन्नता प्रकट की है।
| ३०४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १३ |
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भवानीहृदा भावितानन्दरूपं<br>भवाभावहेतुं भवादिप्रपन्नम् ॥२४॥<br>सुरानीकदुःखौघनाशैकहेतुं<br>नराकारदेहं निराकारमीड्यम् ।<br>परेशं परानन्दरूपं वरेण्यं<br>हरिं राममीशं भजे भारनाशम् ॥२५॥<br>प्रपन्नाखिलानन्ददोहं प्रपन्नं<br>प्रपन्नार्त्तिनिःशेषनाशाभिधानम् ।<br>तपोयोगयोगीशभावाभिभाव्यं<br>कपीशादिमित्रं भजे राममित्रम् ॥२६॥<br>सदा भोगभाजां सुदूरे विभान्तं<br>सदा योगभाजामदूरे विभान्तम् ।<br>चिदानन्दकन्दं सदा राघवेशं<br>विदेहात्मजानन्दरूपं प्रपद्ये ॥२७॥<br>महायोगमायाविशेषाऽनुयुक्तो<br>विभासीश लीलानराकारवृत्तिः ।<br>त्वदानन्दलीलाकथापूर्णकर्णाः<br>सदानन्दरूपा भवन्तीह लोके ॥२८॥<br>अहं मानपानाभिमत्तमत्तो<br>न वेदाखिलेशाभिमानाभिमानः ।<br>इदानीं भवत्पादपद्मप्रसादात्-<br>त्रिलोकाधिपत्याभिमानो विनष्टः ॥२९॥<br>स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिरामं<br>धराभारभूतासुरानीकदावम् ।<br>शरच्चन्द्रवक्त्रं लसत्पद्मनेत्रं<br>दुरावारपारं भजे राघवेशम् ॥३०॥<br>सुराधीशनीलाभ्रनीलाङ्गकान्तिं<br>विराधादिरक्षोवधाल्लोकशान्तिम् ।<br>किरीटादिशोभं पुरारातिलाभं<br>भजे रामचन्द्रं रघूणामधीशम् ॥३१॥ | करती हैं, जो (जन्म-मरणरूप) संसारसे छुड़ानेवाले<br>हैं और शंकरादि देवोंके आश्रय हैं उन भगवान् रामको<br>मैं भजता हूँ ॥२४॥ जो देवमण्डलके दुःखसमूहका<br>नाश करनेके एकमात्र कारण हैं तथा जो मनुष्यरूपधारी,<br>आकारहीन और स्तुति किये जानेयोग्य हैं, पृथिवीका<br>भार उतारनेवाले उन परमेश्वर परानन्दरूप पूजनीय<br>भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥२५॥ जो शरणागतों-<br>को सब प्रकारका आनन्द देनेवाले और उनके आश्रय<br>हैं, जिनका नाम शरणागत भक्तोंके सम्पूर्ण दुःखों-<br>को दूर करनेवाला है, जिनका तप और योग<br>एवं बड़े-बड़े योगीश्वरोंकी भावनाओंद्वारा चिन्तन<br>किया जाता है तथा जो सुग्रीवादिके मित्र हैं, उन<br>मित्ररूप भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥२६॥ जो<br>भोगपरायण लोगोंसे सदा दूर रहते हैं और योगनिष्ठ<br>पुरुषोंके सदा समीप ही विराजते हैं, श्रीजानकीजीके<br>लिये आनन्दस्वरूप उन चिदानन्दघन श्रीरघुनाथजीको<br>मैं सर्वदा भजता हूँ ॥२७॥ हे भगवन् ! आप<br>अपनी महान् योगमायाके गुणोंसे युक्त होकर लीलासे<br>ही मनुष्यरूप प्रतीत हो रहे हैं । जिनके कर्ण आपकी<br>इन आनन्दमयी लीलाओंके कथामृतसे पूर्ण होते हैं वे<br>संसारमें नित्यानन्दरूप हो जाते हैं ॥२८॥ प्रभो !<br>मैं तो सम्मान और सोमपानके उन्मादसे मतवाला<br>हो रहा था, सर्वेश्वरताके अभिमानवश मैं अपने आगे<br>किसीको कुछ भी नहीं समझता था । अब आपके<br>चरणकमलोंकी कृपासे मेरा त्रिलोकाधिपतित्वका<br>अभिमान चूर हो गया ॥२९॥ जो चमचमाते हुए<br>रत्नजटित भुजबन्ध और हारोंसे सुशोभित हैं, पृथिवीके<br>भाररूप राक्षसोंके लिये दावानलके समान हैं,<br>जिनका शरच्चन्द्रके समान मुख और अति मनोहर<br>नेत्रकमल हैं तथा जिनका आदि-अन्त जानना अत्यन्त<br>कठिन है उन रघुनाथजीको मैं भजता हूँ ॥३०॥<br>जिनके शरीरकी इन्द्रनील मणि और मेघके समान<br>श्याम कान्ति है, जिन्होंने विराध आदि राक्षसों-<br>को मारकर सम्पूर्ण लोकोंमें शान्ति स्थापित की है<br>उन किरीटादिसे सुशोभित और श्रीमहादेवजीके परम-<br>धन रघुकुलेश्वर रामचन्द्रजीको मैं भजता हूँ ॥३१॥
सर्ग १३ ] युद्धकाण्ड ३०५
| लसचन्द्रकोटिप्रकाशादिपीठे <br> समासीनमङ्के समाधाय सीताम् । <br> स्फुरद्धेमवर्णां तडित्पुञ्जभासां <br> भजे रामचन्द्रं निवृत्तार्तितन्द्रम् ॥३२॥ | जो तेजोमय सुवर्णके-से वर्णवाली और बिजलीके समान कान्तिमयी जानकीजीको गोदमें लिये करोड़ों चन्द्रमाओं-के समान देदीप्यमान सिंहासनपर विराजमान हैं उन निर्दुःख और आलस्यहीन भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥३२॥ |
| ततः प्रोवाच भगवान्भव्याया सहितो भवः। <br> रामं कमलपत्राक्षं विमानस्थो नभःस्थले ॥३३॥ | तदनन्तर आकाशमें विमानपर बैठे हुए भवानी-सहित भगवान् शंकरने कमलदललोचन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥३३॥ |
| आगमिष्याम्ययोध्यायां द्रष्टुं त्वां राज्यसत्कृतम्। <br> इदानीं पश्य पितरमस्य देहस्य राघव ॥३४॥ | "हे रघुनन्दन ! मैं आपको राज्या-भिषिक्त होते देखनेके लिये अयोध्यापुरीमें आऊँगा; इस समय आप अपने इस शरीरके पिता (दशरथ) का दर्शन कीजिये" ॥३४॥ |
| ततोऽपश्यद्विमानस्थं रामो दशरथं पुरः। <br> ननाम शिरसा पादौ मुदा भक्त्या सहानुजः॥३५॥ | तब श्रीरामचन्द्रजीने अपने सामने विमानपर बैठे हुए महाराज दशरथको देखा। (उन्हें देखते ही) उन्होंने प्रसन्न होकर भाई लक्ष्मणके सहित भक्तिपूर्वक चरणोंमें शिर रखकर प्रणाम किया ॥३५॥ |
| आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय रामं दशरथोऽब्रवीत्। <br> तारितोऽस्मि त्वया वत्स संसाराद्दुःखसागरात् ३६ | दशरथजीने श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगा लिया और उनका शिर सूँघकर कहा—"बेटा ! तुमने मुझे संसाररूप दुःखसमुद्रसे पार कर दिया" ॥३६॥ |
| इत्युक्त्वा पुनरालिङ्ग्य ययौ रामेण पूजितः। <br> रामोऽपि देवराजं तं दृष्ट्वा प्राह कृताञ्जलिम्॥३७॥ | ऐसा कह श्रीरामको फिर हृदयसे लगा और उनसे पूजित हो दशरथजी चले गये। <br> तब श्रीरामचन्द्रजीने देवराज इन्द्रको हाथ जोड़े खड़ा देखकर कहा—॥३७॥ |
| मत्कृते निहतान्सङ्ख्ये वानरान्पतितान् भुवि । <br> जीवयाशु सुधावृष्ट्या सहस्राक्ष ममाज्ञया ॥३८॥ | "हे सहस्राक्ष ! मेरी आज्ञासे तुम अमृत बरसाकर मेरे लिये युद्धमें मरकर पृथिवीपर गिरे हुए वानरोंको तुरन्त जीवित कर दो" ॥३८॥ |
| तथेत्यमृतवृष्ट्या तान् जीवयामास वानरान् । <br> ये ये मृता मृधे पूर्वं ते ते सुप्तोत्थिता इव । <br> पूर्ववद्बलिनो हृष्टा रामपार्श्वमुपाययुः ॥३९॥ | (ऐसा सुन देवराजने) 'बहुत अच्छा' कह अमृत बरसाकर उन सब वानरोंको जीवित कर दिया। जो-जो वानर पहले युद्धमें मारे गये थे वे सभी सोकर उठे हुएके समान पहलेकी भाँति ही बलवान् और प्रसन्न होकर भगवान् रामके पास चले आये॥३९॥ |
| नोत्थिता राक्षसास्तत्र पीयूषस्पर्शनादपि । | किन्तु वहाँ (युद्धमें मरकर गिरे हुए) राक्षसगण अमृतका स्पर्श होनेपर भी नहीं उठे।* |
| विभीषणस्तु साष्टाङ्गं प्रणिपत्याब्रवीद्वचः ॥४०॥ | इसी समय विभीषणने साष्टांग प्रणाम करके कहा—॥४०॥ |
| देव मामनुगृह्णीष्व मयि भक्तिर्यदा तव । | "भगवन् ! आपकी मुझपर अत्यन्त प्रीति है; अतः इतनी कृपा कीजिये कि आज श्रीसीताजीके |
* अमृतका स्वाभाविक गुण जीवनदान करना है, अतः अमृतका स्पर्श होनेपर भी राक्षसोंके जीवित न होनेसे स्वभाव-विपर्ययका दोष आता है। परन्तु भगवदिच्छाका प्रभाव इतना प्रबल है कि उसके आगे कुछ भी असम्भव नहीं है; भगवान्की इच्छा न होनेसे अमृतका प्रभाव भी बाधित हो गया। इसके अतिरिक्त इसका दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि साक्षात् भगवान् रामके द्वारा मारे जानेके कारण राक्षस मुक्त हो गये थे, इसलिये अमृतका संसर्ग भी उन्हें फिर जीवित न कर सका।
| ३०६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १३ |
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मङ्गलस्नानमद्य त्वं कुरु सीतासमन्वितः ॥४१॥
अलङ्कृत्य सह भ्रात्रा श्वो गमिष्यामहे वयम् ।
विभीषणवचः श्रुत्वा प्रत्युवाच रघूत्तमः ॥४२॥
सुकुमारोऽतिभक्तो मे भरतो मामवेक्षते ।
जटावल्कलधारी स शब्दब्रह्मसमाहितः ॥४३॥
कथं तेन विना स्नानमलङ्कारादिकं मम ।
अतः सुग्रीवमुख्यांस्त्वं पूजयाशु विशेषतः ॥४४॥
पूजितेषु कपीन्द्रेषु पूजितोऽहं न संशयः ।
इत्युक्तो राघवेणाशु स्वर्णरत्नाम्बराणि च ॥४५॥
ववर्ष राक्षसश्रेष्ठो यथाकामं यथारुचि ।
ततस्तान्पूजितान्दृष्ट्वा रामो रत्नैश्च यूथपान् ॥४६॥
अभिनन्द्य यथान्यायं विससर्ज हरीश्वरान् ।
विभीषणसमानीतं पुष्पकं सूर्यवर्चसम् ॥४७॥
आरुरोह ततो रामस्तद्विमानमनुत्तमम् ।
अङ्के निधाय वैदेहीं लज्जमानां यशस्विनीम् ॥४८॥
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विक्रान्तेन धनुष्मता ।
अब्रवीच्च विमानस्थः श्रीरामः सर्ववानरान् ॥४९॥
सुग्रीवं हरिराजं च अङ्गदं च विभीषणम् ।
मित्रकार्यं कृतं सर्वं भवद्भिः सह वानरैः ॥५०॥
अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं गन्तुमर्हथ ।
सुग्रीव प्रतियाह्याशु किष्किन्धां सर्वसैनिकैः ॥५१॥
स्वराज्ये वस लङ्कायां मम भक्तो विभीषण ।
न त्वां धर्षयितुं शक्ताः सेन्द्रा अपि दिवौकसः ॥५२॥
अयोध्यां गन्तुमिच्छामि राजधानीं पितुर्मम ।
एवमुक्तास्तु रामेण वानरास्ते महाबलाः ॥५३॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राक्षसश्च विभीषणः ।
अयोध्यां गन्तुमिच्छामस्त्वया सह रघूत्तम ॥५४॥
सहित मंगल-स्नान कीजिये ॥ ४१ ॥ फिर कल भाई लक्ष्मणके सहित वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हो हम सब चलेंगे ।” विभीषणके ये वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी बोले—॥ ४२ ॥ “मेरा भाई भरत अति सुकुमार और मेरा भक्त है; वह जटा-वल्कल धारण किये ओंकारका चिन्तन करता हुआ मेरी बाट देखता होगा ॥ ४३ ॥ उससे मिले बिना मैं कैसे स्नान अथवा वस्त्राभूषण धारण कर सकता हूँ ? अतः अब तुम शीघ्र ही सुग्रीवादि वानरोंका ही विशेष सत्कार कर दो ॥ ४४ ॥ इन वानर-वीरोंका सत्कार होनेसे मेरा ही सत्कार होगा—इसमें सन्देह नहीं ।”
श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर राक्षसश्रेष्ठ विभीषणने वानरोंको उनकी इच्छा और रुचिके अनुसार बहुत-से रत्न और वस्त्रादि मुक्तहस्तसे दिये । इस प्रकार उन सब वानर-यूथपतियोंको रत्नादिसे सत्कृत देख श्रीरामचन्द्रजीने सबकी यथायोग्य बड़ाई की और उन्हें विदा किया । फिर वे, सकुचाती हुई यशस्विनी जानकीजीको गोदमें ले महापराक्रमी धनुर्धर भाई लक्ष्मणके सहित, विभीषणके लाये हुए सूर्यके समान तेजस्वी अति उत्तम पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए । विमानपर बैठकर भगवान् रामने वानरराज सुग्रीव, अंगद, विभीषण और समस्त वानरोंसे कहा—“आप लोगोंने अन्य समस्त वानर-वीरोंके सहित, मित्रका जो कुछ कार्य होता है वह खूब निभाया है ॥ ४५-५० ॥ अब मेरी आज्ञानुसार आप अपने-अपने इच्छित स्थानोंको जाइये । सुग्रीव ! तुम अपने समस्त सैनिकोंके सहित शीघ्र ही किष्किन्धाको जाओ ॥ ५१ ॥ विभीषण ! तुम मेरी भक्तिमें तत्पर रहकर अपने राज्यपर लंकामें रहो । अब इन्द्रके सहित देवगण भी तुम्हारा बाल बाँका नहीं कर सकते ॥ ५२ ॥ अब मैं अपने पिताजीकी राजधानी अयोध्यापुरीको जाना चाहता हूँ ।”
श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर वे समस्त महाबली वानरगण तथा राक्षसराज विभीषण हाथ जोड़कर बोले—“हे रघुश्रेष्ठ ! हम सब आपके साथ अयोध्या चलना चाहते हैं ॥ ५३-५४ ॥ हे प्रभो !
युद्धकाण्ड - सर्ग १४: अयोध्या-यात्रा, भरद्वाज मुनिका आतिथ्य तथा भरत-मिलाप
| सर्ग १४ ] | युद्धकाण्ड | ३०७ |
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दृष्ट्वा त्वामभिषिक्तं तु कौसल्यामभिवाद्य च।
पश्चाद्गृणीमहे राज्यमनुज्ञां देहि नः प्रभो ॥५५॥
रामस्तथेति सुग्रीवं वानरैः सविभीषणः ।
पुष्पकं सहनूमांश्च शीघ्रमारोह साम्प्रतम् ॥५६॥
ततस्तु पुष्पकं दिव्यं सुग्रीवः सह सेनया ।
विभीषणश्च सामात्यः सर्वे चारुरुहुर्द्रुतम् ॥५७॥
तेष्वारूढेषु सर्वेषु कौबेरं परमासनम् ।
राघवेणान्वनुज्ञातमुत्पपात विहायसा ॥५८॥
बभौ तेन विमानेन हंसयुक्तेन भास्वता ।
प्रहृष्टश्च तदा रामश्चतुर्मुख इवापरः ॥५९॥
ततो बभौ भास्करविम्बतुल्यं
$\quad$कुबेरयानं तपसानुलब्धम् ।
रामेण शोभां नितरां प्रपेदे
$\quad$सीतासमेतेन सहानुजेन ॥६०॥
हम आपको राज्याभिषिक्त हुआ देखकर और माता कौसल्याकी वन्दना कर फिर अपना राज्य ग्रहण करेंगे; आप हमें (साथ चलनेकी) आज्ञा दीजिये' ॥ ५५॥ तब रामचन्द्रजीने कहा—"बहुत अच्छा सुग्रीव ! अब वानरोंके सहित तुम शीघ्र ही विभीषण और हनुमान्को साथ लेकर इस विमानपर चढ़ो' ॥ ५६॥ तब, सेनाके सहित सुग्रीव और मन्त्रियों सहित विभीषण—ये सभी बड़ी शीघ्रतासे दिव्य चिमा पुष्पकपर चढ़ गये ॥ ५७॥
उन सबके आरूढ़ हो जानेपर वह कुबेरका परम यान भगवान् रामकी आज्ञा पा आकाश-मार्गसे उड़ चला ॥ ५८॥ उस तेजस्वी विमानपर जाते हुए भगवान् राम बड़े प्रसन्न हुए और ऐसे सुशोभित हुए मानो दूसरे ब्रह्माजी हंसपर चढ़े जा रहे हों ॥५९॥ उस समय, वह तपस्यासे प्राप्त हुआ कुबेरका यान सूर्य-बिम्बके समान सुशोभित होने लगा तथा श्रीसीताजी और भाई लक्ष्मणके सहित भगवान् रामके कारण तो उसकी शोभा और भी अधिक बढ़ गयी ॥ ६०॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
चतुर्दश सर्ग
अयोध्या-यात्रा, भरद्वाज मुनिका आतिथ्य तथा भरत-मिलाप ।
श्रीमहादेव उवाच
पातयित्वा ततश्चक्षुः सर्वतो रघुनन्दनः ।
अब्रवीन्मैथिलीं सीतां रामः शशिनिभाननाम् ॥१॥
त्रिकूटशिखराग्रस्थां पश्य लङ्कां महाप्रभाम् ।
एतां रणभुवं पश्य मांसकर्दमपङ्किलाम् ॥ २ ॥
असुराणां प्लवङ्गानामत्र वैशसनं महत् ।
अत्र मे निहतः शेते रावणो राक्षसेश्वरः ॥ ३ ॥
कुम्भकर्णेन्द्रजिन्मुख्याः सर्वे चात्र निपातिताः ।
एष सेतुर्मया बद्धः सागरे सलिलाशये ॥ ४ ॥
श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! तदनन्तर, सब ओर दृष्टि डालकर श्रीरघुनाथजीने मिथिलेशकुमारी चन्द्रमुखी सीताजीसे कहा—॥ १॥ "प्रिये ! त्रिकूट पर्वतकी चोटीपर बसी हुई यह परम प्रकाशमयी लंकापुरी देखो और यह मांसमयी कीचड़से भरी हुई रणभूमि देखो ॥ २ ॥ यहाँ राक्षसों और वानरोंका बड़ा भारी संहार हुआ है। यहीं मेरे हाथसे मरकर राक्षस-राज रावण गिरा था ॥ ३॥ और यहीं कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् आदि समस्त राक्षस-वीर मारे गये हैं। यह मैंने जलपूर्ण समुद्रपर पुल बाँधा था ॥ ४ ॥ देखो,
| ३०८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग १४ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतच्च दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ।<br>सेतुबन्धमिति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् ॥ ५ ॥<br>एतत्पवित्रं परमं दर्शनात्पातकापहम् ।<br>अत्र रामेश्वरो देवो मया शम्भुः प्रतिष्ठितः ॥ ६ ॥<br>अत्र मां शरणं प्राप्तो मन्त्रिभिश्च विभीषणः ।<br>एषा सुग्रीवनगरी किष्किन्धा चित्रकानना ॥ ७ ॥ | इस विशाल समुद्रपर यह सेतुबन्ध नामसे विख्यात तीर्थ दिखायी देता है, जो तीनों लोकोंसे पूजनीय है ॥ ५ ॥ यह अत्यन्त पवित्र है और दर्शनमात्रसे ही सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है । यहाँ मैंने श्रीरामेश्वर महादेवकी स्थापना की है ॥ ६ ॥ यहाँ मन्त्रियोंके सहित विभीषण मेरी शरणमें आया था । (और देखो) यह विचित्र उपवनोंवाली सुग्रीवकी राजधानी किष्किन्धापुरी है" ॥ ७ ॥ |
| तत्र रामाज्ञया ताराप्रमुखा हरियोषितः ।<br>आनयामास सुग्रीवः सीतायाः प्रियकाम्यया ॥८॥<br>ताभिः सहोत्थितं शीघ्रं विमानं प्रेक्ष्य राघवः ।<br>प्राह चाद्रिमृष्यमूकं पश्य वाल्यत्र मे हतः ॥ ९ ॥<br>एषा पञ्चवटी नाम राक्षसा यत्र मे हताः ।<br>अगस्त्यस्य सुतीक्ष्णस्य पश्याश्रमपदे शुभे ॥१०॥<br>एते ते तापसाः सर्वे दृश्यन्ते वरवर्णिनि ।<br>असौ शैलवरो देवि चित्रकूटः प्रकाशते ॥११॥<br>अत्र मां कैकयीपुत्रः प्रसादयितुमागतः ।<br>भरद्वाजाश्रमं पश्य दृश्यते यमुनात्तटे ॥१२॥<br>एषा भागीरथी गङ्गा दृश्यते लोकपावनी ।<br>एषा सा दृश्यते सीते सरयूर्यूपमालिनी ॥१३॥<br>एषा सा दृश्यतेऽयोध्या प्रणामं कुरु भामिनि ।<br>एवं क्रमेण सम्प्राप्तो भरद्वाजाश्रमं हरिः ॥१४॥ | किष्किन्धामें पहुँचनेपर भगवान् रामकी आज्ञासे सीताजीको प्रसन्न करनेके लिये सुग्रीव अपनी तारा आदि स्त्रियोंको ले आये ॥८॥ जब रघुनाथजीने विमानको तुरन्त ही उन सबको लेकर भी चलते देखा तो वे (फिर सीताजीसे) कहने लगे—"यह ऋष्यमूक-पर्वत देखो, यहाँ मैंने वालीको मारा था ॥९॥ इधर, पञ्चवटी है जहाँ मैंने (खर-दूषणादि) राक्षसोंका संहार किया था । देखो, ये मुनिवर अगस्त्य और सुतीक्ष्णके अति पवित्र आश्रम हैं ॥१०॥ हे सुन्दर वर्णवाली ! देखो, ये वे सब तपस्वीगण दिखायी दे रहे हैं और हे देवि ! यह पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूट दीख रहा है ॥ ११ ॥ यहीं मुझे मनानेके लिये कैकेयीके पुत्र भरत आये थे; और देखो, वह यमुनाजीके तटपर भरद्वाज मुनिका आश्रम दिखलायी दे रहा है ॥१२॥ ये त्रिलोकपावनी भागीरथी गङ्गाजी दीख रही हैं और हे सीते ! (सूर्यवंशी राजाओंके किये हुए यज्ञोंके) यूपों (यज्ञस्तम्भों) से युक्त यह सरयू नदी दिखायी दे रही है ॥ १३ ॥ हे सुन्दरि ! देखो, वह अयोध्यापुरी दीख रही है, उसे प्रणाम करो।" इस प्रकार भगवान् राम क्रमसे भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचे ॥ १४ ॥ |
| पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां रघुनन्दनः ।<br>भरद्वाजं मुनिं दृष्ट्वा ववन्दे सानुजः प्रभुः ॥१५॥<br>पप्रच्छ मुनिमासीनं विनयेन रघूत्तमः ।<br>शृणोषि कच्चिद्भरतः कुशल्यास्ते सहानुजः ॥१६॥<br>सुभिक्षा वर्ततेऽयोध्या जीवन्ति च हि मातरः । | श्रीरघुनाथजीने चौदहवें वर्षके समाप्त होनेपर पञ्चमी तिथिको मुनिवर भरद्वाजके दर्शन कर उन्हें भाई लक्ष्मणसहित प्रणाम किया ॥ १५ ॥ फिर आश्रममें विराजमान मुनिवरसे रघूश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने अति नम्रतापूर्वक पूछा—"आपने कुछ सुना है, भाई शत्रुघ्नसहित भरत कुशलसे हैं न ? ॥ १६ ॥ अयोध्यामें सुकाल तो है ? और हमारी माताएँ अभी जीवित हैं न ?" |
सर्ग १४ ]
युद्धकाण्ड
३०९
मूल श्लोक
श्रुत्वा रामस्य वचनं भरद्वाजः प्रहृष्टधीः ॥ १७॥
प्राह सर्वे कुशलिनो भरतस्तु महामनाः।
फलमूलकृताहारो जटावल्कलधारकः ॥ १८॥
पादुके सकलं न्यस्य राज्यं त्वां सुप्रतीक्षते ।
यद्यत्कृतं त्वया कर्म दण्डके रघुनन्दन ॥ १९॥
राक्षसानां विनाशं च सीताहरणपूर्वकम्।
सर्वं ज्ञातं मया राम तपसा ते प्रसादतः ॥ २०॥
त्वं ब्रह्म परमं साक्षादादिमध्यान्तवर्जितः ।
त्वमग्रे सलिलं सृष्ट्वा तत्र सुप्तोऽसि भूतकृत् ॥ २१॥
नारायणोऽसि विश्वात्मन्नराणामन्तरात्मकः।
त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २२॥
अतस्त्वं जगतामीशः सर्वलोकनमस्र्कृतः ।
त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शेषोऽयं लक्ष्मणाभिधः ॥ २३॥
आत्मना सृजसीदं त्वमात्मन्येवात्ममायया ।
न सज्जसे नभोवत्त्वं चिच्छक्त्या सर्वसाक्षिकः ॥ २४॥
बहिरन्तश्च भूतानां त्वमेव रघुनन्दन ।
पूर्णोऽपि मूढदृष्टीनां विच्छिन्न इव लक्ष्यसे ॥ २५॥
जगत्त्वं जगदाधारस्त्वमेव परिपालकः ।
त्वमेव सर्वभूतानां भोक्ता भोज्यं जगत्पते ॥ २६॥
दृश्यते श्रूयते यद्यत्स्मर्यते वा रघूत्तम ।
त्वमेव सर्वमखिलं त्वद्भिन्नान्यन्न किञ्चन ॥ २७॥
माया सृजति लोकांश्च स्वगुणैरहमादिभिः ।
त्वच्छक्तिप्रेरिता राम तस्मात्त्वय्युपचर्यते ॥ २८॥
यथा चुम्बकसान्निध्याच्चलन्त्येवायआयदयः ।
जडास्तथा त्वया दृष्टा माया सृजति वै जगत् ॥ २९॥
देहद्वयमदेहस्य तव विश्वं रिरक्षिषोः ।
हिन्दी अनुवाद
भगवान् रामके ये वचन सुनकर भरद्वाज मुनिने प्रसन्न होकर कहा—"आपके यहाँ सब सकुशल हैं। महामना भरतजी तो जटा-वल्कल धारण किये फल-मूलादिसे निर्वाह करते हुए राज्यका सारा भार आपकी पादुकाओंको सौंपकर आपकीही प्रतीक्षा कर रहे हैं। हे रघुनन्दन ! आपने दण्डकारण्यमें जो-जो कार्य किये हैं तथा सीता-हरण होनेपर जैसे-जैसे राक्षसोंका वध किया है वह सब आपकी कृपासे मैंने तपोबलसे जान लिया है ॥ १७–२० ॥
आप आदि, अन्त आर मध्यसे रहित साक्षात् परब्रह्म हैं। आप समस्त भूतोंको रचनेवाले हैं। आपने सबसे पहले जल रचकर उसपर शयन किया था। हे विश्वात्मन् ! आप समस्त मनुष्योंके अन्तरात्मा हैं, अतः आप नारायण हैं। आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए ब्रह्माजी सम्पूर्ण लोकोंके पितामह हैं ॥ २१–२२ ॥
अतः आप समस्त लोकोंसे वन्दित और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। आप साक्षात् विष्णुभगवान् हैं, जानकीजी लक्ष्मी हैं और ये लक्ष्मणजी शेषनाग हैं ॥ २३॥
आप अधिष्ठान-रूपसे अपने भीतर ही अपनी मायाके द्वारा स्वयं अपने-आपसे ही इस सम्पूर्ण जगत्को रचते हैं, किन्तु आकाशके समान किसीसे भी लिप्त नहीं होते। आप अपनी चित्-शक्तिसे सबके साक्षी हैं ॥ २४॥
हे रघुनन्दन ! समस्त प्राणियोंके भीतर और बाहर आप ही व्याप्त हैं, इस प्रकार पूर्ण होनेपर भी आप मूढ़-बुद्धियोंको परिच्छिन्न (एकदेशी) से दिखायी देते हैं ॥ २५॥
हे जगत्पते ! आप ही जगत्, जगत्के आधार और उसका पालन करनेवाले हैं; तथा आप ही समस्त प्राणियोंके (कालरूपसे) भोक्ता और (अन्नरूपसे) भोज्य हैं ॥ २६॥
हे रघुश्रेष्ठ ! जो कुछ भी दिखायी देता है तथा जो कुछ सुना और स्मरण किया जाता है वह सब आप ही हैं; आपके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ २७ ॥
हे राम ! आपकी शक्तिसे प्रेरित होकर ही माया अपने अहङ्कारादि गुणोंसे सम्पूर्ण लोकोंको रचती है, इसलिये इन सबकी रचनाका आपहीमें आरोप किया जाता है ॥ २८ ॥
जिसप्रकार चुम्बककी सन्निधिसे लोहा आदि जड पदार्थ भी चलायमान हो जाते हैं उसी प्रकार आपकी दृष्टि पड़नेसे ही माया सम्पूर्ण जगत्की रचना करती है ॥ २९ ॥
विश्वकी रक्षा करनेके इच्छुक आप
| ३१० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग १४ |
|---|
विराट् स्थूलं शरीरं ते सूत्रं सूक्ष्ममुदाहृतम् ॥३०॥
विराजः सम्भवन्त्येते अवताराः सहस्रशः ।
कार्यान्ते प्रविशन्त्येव विराजं रघुनन्दन ॥३१॥
अवतारकथां लोके ये गायन्ति गृणन्ति च ।
अनन्यमनसो मुक्तिस्तेषामेव रघूत्तम ॥३२॥
त्वं ब्रह्मणा पुरा भूमेर्भारहाराय राघव ।
प्रार्थितस्तपसा तुष्टस्त्वं जातोऽसि रघोः कुले ॥३३॥
देवकार्यमशेषेण कृतं ते राम दुष्करम् ।
बहुवर्षसहस्राणि मानुषं देहमाश्रितः ॥३४॥
कुर्वन्दुष्करकर्माणि लोकद्वयहिताय च ।
पापहारिणि भुवनं यशसा पूरयिष्यसि ॥३५॥
प्रार्थयामि जगन्नाथ पवित्रं कुरु मे गृहम् ।
स्थित्वाऽद्य भुक्त्वा सगलः श्वो गमिष्यसि पत्तनम् ॥३६॥
तथेति राघवोऽतिष्ठत्तस्मिन्नाश्रम उत्तमे ।
ससैन्यः पूजितस्तेन सीतया लक्ष्मणेन च ॥३७॥
ततो रामश्चिन्तयित्वा मुहूर्तं प्राह मारुतिम् ।
इतो गच्छ हनूमंस्त्वमयोध्यां प्रति सत्वरः ॥३८॥
जानीहि कुशली कश्चिज्जनो नृपतिमन्दिरे ।
शृङ्गवेरपुरं गत्वा ब्रूहि मित्रं गुहं मम ॥३९॥
जानकीलक्ष्मणोपेतमागतं मां निवेदय ।
नन्दिग्रामं ततो गत्वा भ्रातरं भरतं मम ॥४०॥
दृष्ट्वा ब्रूहि सभार्यस्य सभ्रातुः कुशलं मम ।
सीतापहरणादीनि रावणस्य वधादिकम् ॥४१॥
ब्रूहि क्रमेण मे भ्रातुः सर्वं तत्र विचेष्टितम् ।
हत्वा शत्रुगणान्सर्वान्सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥४२॥
उपयाति समृद्धार्थः सह ऋक्षहरीश्वरैः ।
इत्युक्त्वा तत्र वृत्तान्तं भरतस्य विचेष्टितम् ॥४३॥
सर्वं ज्ञात्वा पुनः शीघ्रमगच्छ मम सन्निधिम् ।
देहहीन होकर भी दो देहवाले हैं। आपका स्थूल शरीर 'विराट्' और सूक्ष्म शरीर 'सूत्र' कहलाता है ॥३०॥ हे रघुनन्दन ! आपके विराद् शरीरसे ही ये सहस्रों अवतार उत्पन्न होते हैं और अपना कार्य समाप्त कर फिर उसीमें लीन हो जाते हैं ॥३१॥ हे रघुश्रेष्ठ ! संसारमें जो लोग अनन्य चित्तसे आपके अवतारोंकी कथा गाते और सुनते हैं उनकी तो मुक्ति अवश्य ही हो जाती है ॥३२॥ हे राघव ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने आपसे पृथिवीका भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी। उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर ही आपने रघुकुलमें अवतार लिया है ॥३३॥ हे राम ! जो अत्यन्त दुष्कर था देवताओंका वह सब काम आपने कर दिया। अब कई सहस्र वर्षतक मनुष्य-देहमें स्थित रहकर दोनों लोकोंके कल्याणके लिये बहुत-से कठिन और पाप-नाशक कार्य करते हुए आप सम्पूर्ण लोकोंको अपने सुयशसे परिपूर्ण करेंगे ॥३४-३५॥ हे जगन्नाथ ! मेरी यह प्रार्थना है कि आज सेनासहित यहाँ ठहर कर और भोजन कर मेरा घर पवित्र कीजिये। फिर कल अपनी राजधानीमें पधारें ॥३६॥ तब रघुनाथजी 'बहुत अच्छा' कह मुनिवर भरद्वाजसे सन्तुष्ट हो सेना, सीताजी और लक्ष्मणजीके सहित उस अत्युत्तम आश्रममें ठहर गये ॥३७॥
इस समय एक मुहूर्त विचार कर भगवान् रामने श्रीमारुतिसे कहा—“हनुमन् ! तुम शीघ्र ही यहाँसे अयोध्याको जाओ ॥३८॥ और यह मालूम करो कि राजमन्दिरमें सब कुशलसे तो हैं। शृंगवेरपुरमें जाकर मेरे मित्र गुहसे बातचीत करना ॥३९॥ और उसे जानकी और लक्ष्मणके सहित मेरे आनेकी सूचना देना। तत्पश्चात् नन्दिग्राममें जाकर मेरे भाई भरतसे मिलकर उसे स्त्री और भाईके सहित मेरी कुशल सुनाना। वहाँ भैया भरतको सीताहरणसे लेकर रावणके वध आदि पर्यन्त मेरी समस्त लीलाएँ क्रमसे सुनाना और कहना कि रामचन्द्रजी समस्त शत्रुओंको मारकर सफल-मनोरथ हो स्त्री और लक्ष्मणके सहित रीछ और वानरोंके साथ आ रहे हैं। यह सब वृत्तान्त उसे सुनाकर और भरतकी सभी चेष्टाओंका पता लगाकर शीघ्र ही मेरे पास लौट आना।”
सर्ग १४ ] युद्धकाण्ड ३११
तथेति हनुमांस्तत्र मानुषं वपुरास्थितः ॥४४॥
नन्दिग्रामं ययौ तूर्णं वायुवेगेन मारुतिः ।
गरुत्मानिव वेगेन जिघृक्षन् भुजगोत्तमम् ॥४५॥
शृङ्गवेरपुरं प्राप्य गुहमासाद्य मारुतिः ।
उवाच मधुरं वाक्यं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥४६॥
रामो दाशरथिः श्रीमान्सखा ते सह सीतया ।
सलक्ष्मणस्त्वां धर्मात्मा क्षेमी कुशलमब्रवीत् ॥४७॥
अनुज्ञातोऽद्य मुनिना भरद्वाजेन राघवः ।
आगमिष्यति तं देवं द्रक्ष्यसि त्वं रघूत्तमम् ॥४८॥
तब हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह मनुष्य-शरीर धारण कर तुरन्त ही वायुवेगसे नन्दिग्रामको चले, मानो किसी श्रेष्ठ सर्पको पकड़नेके लिये गरुडजी जाते हों ॥ ४०-४५ ॥ शृंगवेरपुर पहुँचनेपर श्रीमारुतिने गुहके पास जाकर अति प्रसन्नचित्तसे मीठी बोलीमें कहा—॥४६॥ "तुम्हारे मित्र परम धार्मिक एवं क्षेम-युक्त दशरथकुमार श्रीमान् रामचन्द्रजीने सीता और लक्ष्मणके सहित अपनी कुशल कही है ॥ ४७॥ आज मुनिवर भरद्वाजकी आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथजी आयेंगे तब तुम्हें भी उन रघुश्रेष्ठ भगवान् रामका दर्शन होगा" ॥ ४८ ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः सम्प्रहृष्टतनूरुहम् ।
उत्पपात महावेगो वायुवेगेन मारुतिः ॥४९॥
सोऽपश्यद्रामतीर्थं च सरयूं च महानदीम् ।
तामतिक्रम्य हनुमान्नन्दिग्रामं ययौ मुदा ॥५०॥
क्रोशमात्रे त्वयोध्यायाश्चीरकृष्णाजिनाम्बरम् ।
ददर्श भरतं दीनं कृशमाश्रमवासिनम् ॥५१॥
मलपङ्कविधिग्धाङ्गं जटिलं वल्कलाम्बरम् ।
फलमूलकृताहारं रामचिन्तापरायणम् ॥५२॥
पादुके ते पुरस्कृत्य शासयन्तं वसुन्धराम् ।
मन्त्रिभिः पौरमुख्यैश्च काषायाम्बरधारिभिः ॥५३॥
धृतदेहं मूर्तिमन्तं साक्षाद्धर्ममिव स्थितम् ।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान्मारुतात्मजः ॥५४॥
जिसे हर्षसे रोमाञ्च हो रहा था ऐसे गुहसे इसप्रकार कह महातेजस्वी और अत्यन्त वेगशाली हनुमान्जी फिर वायुवेगसे उड़े ॥४९॥ (कुछ दूर जानेपर) उन्होंने राम-तीर्थ (अयोध्या) और महानदी सरयूके दर्शन किये । उसे भी पारकर हनुमान्जी अति प्रसन्न-चित्तसे नन्दि-ग्रामको चले ॥ ५० ॥ अयोध्यासे एक कोशकी दूरीपर भरतजीको अति दीन और दुर्बल अवस्थामें चीरवस्त्र और कृष्णमृगचर्म धारण किये, आश्रममें निवास करते, शरीरमें भस्म रमाये, जटाजूट और वल्कलवस्त्र धारण किये, फल-मूलादि भोजनकर भगवान् रामके ध्यानमें तत्पर हुए, रामचन्द्रजीकी उन दोनों पादुकाओं-को निवेदनकर पृथिवीका शासन करते तथा काषाय-वस्त्रधारी मन्त्रियों और मुख्य-मुख्य पुरवासियोंसे घिरे हुए साक्षात् मूर्त्तिमान् धर्मके समान देखकर पवनकुमार हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले—॥ ५१-५४ ॥
यं त्वं चिन्तयसे रामं तापसं दण्डके स्थितम् ।
अनुशोचसि काकुत्स्थः स त्वां कुशलमब्रवीत् ॥५५॥
प्रियमाख्यामि ते देव शोकं त्यज सुदारुणम् ।
अस्मिन्मुहूर्त्ते भ्रात्रा त्वं रामेण सह सङ्गतः ॥५६॥
समरे रावणं हत्वा रामः सीतामवाप्य च ।
"हे भरतजी ! जिन दण्डकारण्यवासी तपो-निष्ठ भगवान् रामका आप चिन्तन करते हैं तथा जिनके लिये आप इतना अनुताप करते हैं उन ककुत्स्थनन्दन रामने तुम्हें अपनी कुशल कहला भेजी है ॥ ५५ ॥ हे देव ! आप यह दारुण शोक त्यागिये । मैं आपको अति प्रिय समाचार सुनाता हूँ । आप इसी मुहूर्त्तमें अपने भाई रामसे मिलेंगे ॥ ५६ ॥ भगवान् राम युद्धमें रावणको मारकर और सीताजीको प्राप्तकर सफल-मनोरथ
३१२ अध्यात्मरामायण [सर्ग १४
उपयाति समृद्धार्थः ससीतः सहलक्ष्मणः ॥५७॥ हो सीता और लक्ष्मणजीके सहित आ रहे हैं" ॥५७॥
एवमुक्तो महातेजा भरतो हर्षमूर्च्छितः । पपात भुवि चाश्वस्थः कैकयीप्रियनन्दनः ॥५८॥ श्रीहनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर कैकेयीके प्रिय पुत्र महातेजस्वी भरतजी हर्षसे मूर्च्छित हो अपनी सुध-बुध भुला पृथिवीपर गिर पड़े ॥५८॥ (फिर
आलिङ्ग्य भरतः शीघ्रं मारुतिं प्रियवादिनम् । आनन्दजैरश्रुजलैः सिषेच भरतः कपिम् ॥५९॥ सँभलकर उठनेके अनन्तर) भरतजीने तुरन्त ही प्रियवादी हनुमान्जीको हृदयसे लगा लिया और आनन्दके कारण उमड़े हुए अश्रुजलसे उन वानरश्रेष्ठको सींचने लगे ॥५९॥ (और बोले—) "भैया ! तुम कोई
देवो वा मानुषो वा त्वमनुक्रोशादिहागतः । प्रियाख्यानस्य ते सौम्य ददामि ब्रुवतः प्रियम् ६० गवां शतसहस्रं च ग्रामाणां च शतं वरम् । सर्वाभरणसम्पन्ना मुग्धाः कन्यास्तु षोडश ॥६१॥ देवता हो या मनुष्य हो, जो दया करके यहाँ आये हो ? हे सौम्य ! इस प्रिय समाचारके सुनानेके बदले में तुम्हें एक लक्ष गौ, अच्छे-अच्छे सौ गाँव और समस्त आभूषणोंसे युक्त परमसुन्दरी सोलह कन्याएँ देता हूँ" ॥६०-६१॥ ऐसा कह श्रीभरतजीने हनुमान्-
एवमुक्त्वा पुनः प्राह भरतो मारुतात्मजम् । बहूनीमानि वर्षाणि गतस्य सुमहद्वनम् ॥६२॥ शृणोम्यहं प्रीतिकरं मम नाथस्य कीर्तनम् । कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मे ॥६३॥ एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि । राघवस्य हरीणां च कथमासीत्समागमः ॥६४॥ तत्त्वमाख्याहि भद्रं ते विश्वसेयं वचस्तव । जीसे फिर कहा—"आज, भयंकर वनमें जानेके कितने ही वर्ष बीतनेपर मैं अपने प्रभुका यह प्रिय समाचार सुन रहा हूँ । आज मुझे यह कल्याणमयी लौकिक कहावत बहुत ठीक मालूम होती है कि 'जीवित रहनेपर सौ वर्षमें भी मनुष्यको आनन्द मिल सकता है।' तुम्हारा शुभ हो, तुम यह सच-सच बताओ कि श्रीरघुनाथजीके साथ वानरोंका समागम कैसे हुआ ? जिससे मैं तुम्हारे वचनका पूर्ण विश्वास करूँ ।"
एवमुक्तोऽथ हनुमान् भरतेन महात्मना ॥६५॥ आचचक्षेऽथ रामस्य चरितं कृत्स्नशः क्रमात् । श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतो मारुतात्मजात् ॥६६॥ महात्मा भरतजीके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीका क्रमशः सम्पूर्ण चरित्र सुना दिया । मारुतिसे वह चरित्र सुनकर श्रीभरतजीको अत्यन्त आनन्द हुआ ॥६२—६६॥ और उन्होंने अति प्रसन्न
आज्ञापयच्छत्रुघ्नं मुदा युक्तं मुदान्वितः । दैवतानि च यावन्ति नगरे रघुनन्दन ॥६७॥ नानोपहारबलिभिः पूजयन्तु महाधियः । होकर आनन्दमग्न शत्रुघ्नजीको आज्ञा दी कि "हे रघुनन्दन ! नगरमें जितने देवता हैं महाबुद्धि पण्डितजन उन सबका नाना प्रकारकी भेंट और बलि आदि देकर पूजन करें ।
सूता वैतालिकाश्चैव वन्दिनः स्तुतिपाठकाः ॥६८॥ वारमुख्याश्च शतशो निर्यान्त्वद्यैव सङ्घशः । सूत, वैतालिक, स्तुति-गान करनेवाले वन्दीजन और मुख्य मुख्य वाराङ्गनाएँ आज ही सैकड़ोंकी संख्यामें टोली बनाकर नगरके बाहर निकलें ।
राजदारास्तथाऽमात्याः सेना हस्त्यश्वपत्तयः॥६९॥ ब्राह्मणाश्च तथा पौरा राजानो ये समागताः । निर्यान्तु राघवस्याद्य द्रष्टुं शशिनिभाननम् ॥७०॥ इनके अतिरिक्त राजमहिलाएँ, मन्त्रिगण, हाथी-घोड़े और पदाति आदि सेना, ब्राह्मणलोग, पुरवासी और यहाँ आये हुए समस्त राजालोग भी श्रीरघुनाथजीका मुखचन्द्र निहारनेके लिये नगरके बाहर चलें ॥६७-७०॥
सर्ग १४] युद्धकाण्ड ३१३
भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नपरिचोदिताः ।
अलञ्चक्रुश्च नगरीं मुक्कारत्नमयोञ्ज्वलैः ॥७१॥
तोरणैश्च पताकाभिर्विचित्राभिरनेकधा ।
अलङ्कुर्वन्ति वेश्मानि नानाबलिविचक्षणाः ॥७२॥
निर्यान्ति वृन्दशः सर्वे रामदर्शनलालसाः ।
हयानां शतसाहस्रं गजानामयुतं तथा ॥७३॥
रथानां दशसाहस्रं स्वर्णसूत्रविभूषितम् ।
पारमेष्ठ्यान्युपादाय द्रव्याण्युच्चावचानि च ॥७४॥
ततस्तु शिविकारूढा निर्ययु राजयोषितः ।
भरतः पादुके न्यस्य शिरस्येव कृताञ्जलिः ॥७५॥
शत्रुघ्नसहितो रामं पादचारेण निर्ययौ ।
तदैव दृश्यते दूराद्विमानं चन्द्रसन्निभम् ॥७६॥
पुष्पकं सूर्यसङ्काशं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।
एतस्मिन् भ्रातरौ वीरौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ ॥७७॥
सुग्रीवश्च कपिश्रेष्ठो मन्त्रिभिश्च विभीषणः ।
दृश्यते पश्यत जना इत्याह पवनात्मजः ॥७८॥
ततो हर्षसमुद्भूतो निःस्वनो दिवमस्पृशत् ।
स्त्रीबालयुववृद्धानां रामोऽयमिति कीर्तनात् ॥७९॥
रथकुञ्जरवाजिस्था अवतीर्य महीं गताः ।
ददृशुस्ते विमानस्थं जनाः सोममिवाम्बरे ॥८०॥
प्राञ्जलिर्भरतो भूत्वा प्रहृष्टो राघवोन्मुखः ।
ततो विमानाग्रगतं भरतो राघवं मुदा ॥८१॥
ववन्दे प्रणतो रामं मेरुस्थमिव भास्करम् ।
ततो रामाभ्यनुज्ञातं विमानमपतद्भुवि ॥८२॥
आरोपितो विमानं तद्भरतः सानुजस्तदा ।
राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत् ॥८३॥
भरतजीके वचन सुनकर शत्रुघ्नजीकी प्रेरणासे नाना प्रकारकी रचनाओंमें कुशल पुरवासियोंने अपने घरोंको सजाना आरम्भ किया तथा अनेक प्रकारके उज्ज्वल मोतियों और रत्नोंकी बन्दनवारोंसे एवं चित्र-विचित्र पताकाओंसे अयोध्यापुरीको सजा दिया ॥ ७१-७२ ॥ तब, भगवान् रामके दर्शनोंकी लालसासे सब लोग अनेकों टोलियाँ बनाकर उनकी भेंटके लिये एक लाख घोड़े, दश सहस्र हाथी और सुनहरी बागडोरोंसे विभूषित दश सहस्र रथ आदि बहुतसी ऐश्वर्यसूचक छोटी-बड़ी वस्तुएँ लेकर नगरके बाहर निकलने लगे॥७३-७४॥ उनके पीछे पालकीमें चढ़कर राजमहिलाएँ चलीं और फिर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी शिरपर भगवान्की पादुकाएँ रखकर हाथ जोड़े हुए पैरों-पैरों चले । इसी समय दूरहीसे ब्रह्माजीका मनोनिर्मित चन्द्रमाके समान कान्तिमान् और सूर्यके समान तेजस्वी पुष्पक विमान दिखायी दिया । उसे देखकर श्रीहनुमान्जीने कहा—"अरे लोगो ! देखो, इसी विमानमें श्रीजानकीजीके सहित दोनों वीर भ्राता राम और लक्ष्मण तथा कपिश्रेष्ठ सुग्रीव और मन्त्रियोंके सहित विभीषण दिखायी दे रहे हैं" ॥ ७५-७८ ॥ तब तो 'राम ये हैं, राम ये हैं' ऐसा कहनेसे स्त्री, बालक, युवा और वृद्धोंका हर्षके कारण ऐसा शब्द हुआ कि जिससे आकाश गूँज उठा ॥ ७९ ॥ जो लोग रथ, हाथी और घोड़ोंपर चढ़े हुए थे वे उतरकर पृथिवीपर खड़े हो गये । उस समय वे सभी लोग विमानपर चढ़े हुए भगवान् रामको आकाशमें चन्द्रमाके समान देखने लगे ॥ ८० ॥
फिर प्रसन्नचित्त भरतजीने विमानपर बैठे हुए श्रीरघुनाथजीके सम्मुख हो उन्हें सुमेरु पर्वतपर प्रकट हुए सूर्यके समान अति विनीतभावसे हर्षपूर्वक प्रणाम किया । तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे विमान पृथिवीपर उतरा ॥ ८१-८२ ॥ तदनन्तर भगवान् रामने भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजीको भी विमानपर चढ़ा लिया; रामचन्द्रजीके निकट पहुँचनेपर भरतजीने अति आनन्दित हो उन्हें फिर प्रणाम किया ॥ ८३ ॥ तब बहुत दिनोंमें
३१४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १८
समुत्थाप्य चिराद्दृष्टं भरतं रघुनन्दनः ।
भ्रातरं स्वाङ्कमारोप्य मुदा तं परिषस्वजे ॥८४॥
ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीं नाम कीर्तयन् ।
अभ्यवादयत प्रीतो भरतः प्रेमविह्वलः ॥८५॥
सुग्रीवं जाम्बवन्तं च युवराजं तथाऽङ्गदम् ।
मैन्दद्विविदनीलांश्च ऋषभं चैव सस्वजे ॥८६॥
सुषेणं च नलं चैव गवाक्षं गन्धमादनम् ।
शरभं पनसंचैव भरतः परिषस्वजे ॥८७॥
सर्वे ते मानुषं रूपं कृत्वा भरतमादृताः ।
पप्रच्छुः कुशलं सौम्याः प्रहृष्टाश्च प्लवङ्गमाः ॥८८॥
ततः सुग्रीवमालिङ्ग्य भरतः प्राह भक्तितः ।
त्वत्सहायेन रामस्य जयोऽभूद्रावणो हतः ॥८९॥
त्वमस्माकं चतुर्णां तु भ्राता सुग्रीव पञ्चमः ।
शत्रुघ्नश्च तदा राममभिवाद्य सलक्ष्मणम् ॥९०॥
सीतायाश्चरणौ पश्चाद्ववन्दे विनयान्वितः ।
रामो मातरमसाद्य विवर्णां शोकविह्वलाम् ॥९१॥
जग्राह प्रणतः पादौ मनो मातुः प्रसादयन् ।
कैकेयीं च सुमित्रां च ननामेतरमातरौ ॥९२॥
भरतः पादुके ते तु राघवस्य सुपूजिते ।
योजयामास रामस्य पादयोर्भक्तिसंयुतः ॥९३॥
राज्यमेतन्न्यासभूतं मया निर्यातीतं तव ।
अद्य मे सफलं जन्म फलितो मे मनोरथः ॥९४॥
यत्पश्यामि समायातमयोध्यां त्वामहं प्रभो ।
कोष्ठागारं बलं कोशं कृतं दशगुणं मया ॥९५॥
स्वत्तेजसा जगन्नाथ पालयस्व पुरं स्वकम् ।
इति ब्रुवाणं भरतं दृष्ट्वा सर्वे कपीश्वराः ॥९६॥
मुमुचुर्नेत्रजं तोयं प्रशंसुर्मुदान्विताः ।
ततो रामः प्रहृष्टात्मा भरतं स्वाङ्कगं मुदा ॥९७॥
ययौ तेन विमानेन भरतस्याश्रमं तदा ।
अवरुह्य तदा रामो विमानाग्र्यान्महीतलेम् ॥९८॥
देखे हुए भाई भरतको रघुनाथजीने तुरन्त ही उठाकर प्रसन्नतासे गोदमें लेकर आलिंगन किया ॥८४॥ फिर प्रेमसे विह्वल हुए भरतजीने लक्ष्मणजीसे मिलकर श्रीसीताजीको अपना नाम उच्चारण करते हुए प्रीतिपूर्वक प्रणाम किया ॥८५॥ तत्पश्चात् भरतजीने सुग्रीव, जाम्बवान्, युवराज अंगद, मैन्द, द्विविद, नील और ऋषभको तथा सुषेण, नल, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ और पनसको भी हृदयसे लगाया ॥८६-८७॥ इस प्रकार भरतजीसे सत्कार पाकर प्रसन्न हुए उन सौम्य वानरों-ने मनुष्यरूप धारणकर उनकी कुशल पूछी ॥८८॥ तब भरतजीने सुग्रीवको हृदयसे लगाकर अति प्रेम-पूर्वक कहा— "सुग्रीव! तुम्हारी सहायतासे ही श्रीराम-चन्द्रजीकी विजय हुई और रावण मारा गया; अतः हम चारोंके तुम पाँचवें भाई हो।" तदनन्तर शत्रुघ्नजीने लक्ष्मणजीके सहित श्रीरामचन्द्रजी-को प्रणामकर अति विनीत भावसे सीताजीके चरणोंकी वन्दना की। फिर श्रीरामचन्द्रजीने शोकके कारण अति व्याकुल और कृश हुई माता कौसल्याके पास जाकर अति विनीत भावसे उनके चरण छुए और उनके चित्तको प्रसन्न किया तथा अपनी विमाता कैकेयी, और सुमित्राको भी नमस्कार किया ॥८९-९२॥ तदुपरान्त भरतजीने श्रीरामचन्द्रजीकी भली प्रकार पूजा की हुई पादुकाओंको भक्तिपूर्वक उनके चरणोंमें पहना दिया ॥९३॥ (और कहा—) "प्रभो! मुझे धरोहररूपसे सौंपे हुए आपके इस राज्यको मैं फिर आपहीको सौंपता हूँ; आज, मैं आपको अयोध्यामें आया हुआ देखता हूँ—इससे मेरा जन्म सफल हो गया और मेरी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं। हे जगन्नाथ! आपके प्रतापसे मैंने अन्न-भण्डार, सेना और कोशादि पहलेसे दशगुने कर दिये हैं। अब आप अपने नगरका स्वयं पालन कीजिये।" भरतजीको इस प्रकार कहते देख सभी मुख्य-मुख्य वानर हर्षसे आँसू गिराते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे।
तब श्रीरामचन्द्रजी अति हर्षपूर्वक भरतजीको गोदमें लिये उसी विमानपर चढ़े हुए भरतजीके आश्रमको गये। वहाँ विमानश्रेष्ठ पुष्पकसे नीचे पृथिवीपर उतरकर
युद्धकाण्ड - सर्ग १५: श्रीराम-राज्याभिषेक
सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३१५
अब्रवीत्पुष्पकं देवो गच्छ वैश्रवणं वह ।
अनुगच्छानुजानामि कुबेरं धनपालकम् ॥९९॥
रामो वसिष्ठस्य गुरोः पदाम्बुजं
नत्वा यथा देवगुरोः शतक्रतुः ।
दत्त्वा महार्हासनमुत्तमं गुरो-
रुपाविवेशाथ गुरोः समीपतः ॥१००॥
भगवान् रामने उससे कहा—"जाओ, मैं आज्ञा देता हूँ—अब, तुम धनपति कुबेरका अनुसरण करते हुए उन्हींको वहन करो" ॥९४-९९॥ फिर, इन्द्र जैसे बृहस्पतिजीकी वन्दना करते हैं वैसे ही, श्रीरामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठजीके चरणकमलोंमें प्रणाम कर और उन्हें एक अति सुन्दर बहुमूल्य आसन दे स्वयं भी उन्हींके पास बैठ गये ॥१००॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥
पञ्चदश सर्ग
श्रीराम-राज्याभिषेक ।
श्रीमहादेव उवाच
ततस्तु कैकयीपुत्रो भरतो भक्तिसंयुतः ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय ज्येष्ठं भ्रातरमब्रवीत् ॥ १ ॥
माता मे सत्कृता राम दत्तं राज्यं त्वया मम ।
ददामि तत्ते च पुनर्यथा त्वमददा मम ॥ २ ॥
इत्युक्त्वा पादयोर्भक्त्या साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च ।
बहुधा प्रार्थयामास कैकेय्या गुरुणा सह ॥ ३ ॥
तथेति प्रतिजग्राह भरताद्राज्यमीश्वरः ।
मायामाश्रित्य सकलां नरचेष्टामुपागतः ॥ ४ ॥
स्वराज्यानुभवो यस्य सुखज्ञानैकरूपिणः ।
निरस्तातिशयानन्दरूपिणः परमात्मनः ॥ ५ ॥
मानुषेण तु राज्येन किं तस्य जगदीक्षितुः ।
यस्य भ्रूभङ्गमात्रेण त्रिलोकी नश्यति क्षणात् ॥ ६ ॥
यस्यानुग्रहमात्रेण भवन्त्याखण्डलश्रियः ।
लीलासृष्टमहासृष्टेः कियदंतद्रमापतेः ॥ ७ ॥
तथापि भजतां नित्यं कामपूरविधित्सया ।
लीलामानुषदेहेन सर्वमप्यनुवर्तते ॥ ८ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! फिर कैकेयीपुत्र भरतजीने शीश झुकाये अञ्जलि बाँधकर अति भक्तिपूर्वक ज्येष्ठ भ्राता रामजीसे कहा—॥१॥ "हे राम ! आपने मुझे राज्य दिया था, इससे मेरी माताका सत्कार तो हो चुका । अब, जैसे आपने मुझे दिया था वैसे ही मैं फिर आपहीको उसे सौंपता हूँ" ॥ २ ॥ ऐसा कह उन्होंने चरणोंमें भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम कर (राज्य स्वीकार करनेके लिये) कैकेयी और गुरुजीके सहित बहुत कुछ प्रार्थना की ॥३॥ तब अपनी मायाको आश्रय कर सब प्रकारकी मनुष्य-लीलाएँ करनेमें प्रवृत्त हुए भगवान् रामने 'बहुत अच्छा' कह भरतजीसे राज्य ले लिया ॥४॥ जिन्हें हर समय स्वर्गीय राज्यका अनुभव होता है उन एकमात्र सुख और ज्ञानस्वरूप, समस्त विषयानन्दोंसे रहित परमानन्दमूर्ति परमात्मा जगदीश्वरको तुच्छ मानवी राज्यसे क्या काम है ? जिनके भ्रुकुटिविलासमात्रसे तीनों लोक एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ॥५-६॥ जिनकी कृपासे इन्द्रकी राज्यलक्ष्मी प्राप्त होती है तथा जिन्होंने लीलासे ही यह महान् सृष्टि रची है उन लक्ष्मीपतिके लिये यह (अयोध्याका राज्य) कितना है ? ॥७॥ तथापि अपने भक्तोंकी कामनाओंको सदैव पूर्ण करनेके लिये वे माया-मानवदेहसे सर्वदा सभी कुछ अभिनय करते हैं ॥८॥
| ३१६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग १५ |
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| ततः शत्रुघ्नवचनान्निपुणः श्मश्रुकृन्तकः ।<br>सम्भाराश्चाभिषेकार्थमानीता राघवस्य हि ॥९॥<br>पूर्वं तु भरते स्नाते लक्ष्मणे च महात्मनि ।<br>सुग्रीवे वानरेन्द्रे च राक्षसेन्द्रे विभीषणे ॥१०॥<br>विशोधितजटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपनः ।<br>महार्हवसनोपेतस्तस्थौ तत्र श्रिया ज्वलन् ॥११॥<br>प्रतिकर्म च रामस्य लक्ष्मणश्च महामतिः ।<br>कारयामास भरतः सीताया राजयोषितः ॥१२॥<br>महार्हवस्त्राभरणैरलंञ्चक्रुः सुमध्यमाम् ।<br>ततो वानरपत्नीनां सर्वासामेव शोभना ॥१३॥<br>अकारयत कौसल्या प्रहृष्टा पुत्रवत्सला ।<br>ततः स्यन्दनमादाय शत्रुघ्नवचनात्सुधीः ॥१४॥<br>सुमन्त्रः सूर्यसङ्काशं योजयित्वाऽग्रतः स्थितः ।<br>आरुरोह रथं रामः सत्यधर्मपरायणः ॥१५॥<br>सुग्रीवो युवराजश्च हनुमांश्च विभीषणः ।<br>स्नात्वा दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिताः ॥१६॥<br>राममन्वीयुरग्रे च रथाश्वगजवाहनाः ।<br>सुग्रीवपत्न्यः सीता च ययुर्यानैः पुरं महत् ॥१७॥<br>वज्रपाणिर्यथा देवैर्हरिताश्वरथे स्थितः ।<br>प्रययौ रथमास्थाय तथा रामो महत्पुरम् ॥१८॥<br>सारथ्यं भरतश्चक्रे रत्नदण्डं महाद्युतिः ।<br>श्वेतातपत्रं शत्रुघ्नो लक्ष्मणो व्यजनं दधे ॥१९॥<br>चामरं च समीपस्थो न्यवीजयदरिन्दमः ।<br>शशिप्रकाशं त्वपरं जग्राहासुरनायकः ॥२०॥<br>दिविजैः सिद्धसङ्घैश्च ऋषिभिर्दिव्यदर्शनैः ।<br>स्तूयमानस्य रामस्य शुश्रुवे मधुरध्वनिः ॥२१॥ | तब शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे कुशल क्षौरकार (नाई)<br>बुलाया गया और रघुनाथजीके अभिषेकके लिये सामग्री<br>इकट्ठी की गयी ॥९॥ पहले भरतजीने और फिर महात्मा<br>लक्ष्मणजीने स्नान किया तदुपरान्त वानरराज सुग्रीव<br>और राक्षसराज विभीषण नहाये ॥१०॥ फिर जटा-<br>जूटके कट जानेपर श्रीरघुनाथजीने स्नान किया और<br>रङ्ग-बिरङ्गी मालाओं, अङ्गरागों तथा बहुमूल्य वस्त्रोंसे<br>सुसज्जित हो वे अपनी कान्तिसे देदीप्यमान होकर<br>विराजमान हुए ॥११॥ महामति लक्ष्मण और भरतने<br>श्रीरामचन्द्रजीको विभूषित कराया और राज-महिलाओं-<br>ने सीताजीका शृङ्गार किया ॥१२॥ उन्होंने उस<br>सुन्दरीको नाना प्रकारके बहुमूल्य वस्त्र और आभूषणों-<br>से सुसज्जित किया । तदनन्तर पुत्रवत्सला शोभामयी<br>कौसल्याजीने अति प्रसन्न होकर समस्त वानरपत्नियों-<br>का भी शृङ्गार कराया ।<br><br>इसी समय शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे बुद्धिमान् सुमन्त्रने<br>सूर्यके समान तेजस्वी रथ जोड़कर सामने ला खड़ा<br>किया । तब सत्यधर्मपरायण भगवान् राम उस रथपर<br>चढ़े ॥१३–१५॥ उस समय सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्<br>और विभीषण स्नानादि कर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे<br>सुसज्जित हो रथ, घोड़े और हाथी आदि वाहनोंपर<br>चढ़कर श्रीरामचन्द्रजीके आगे-पीछे चले तथा सुग्रीवकी<br>पत्नियां और सीताजी सुन्दर पालकियोंपर बैठकर अति<br>विशाल अयोध्यापुरीको चलीं ॥१६–१७॥ जिस प्रकार<br>हरितवर्ण घोड़ोंके रथमें बैठकर वज्रपाणि इन्द्र देवताओं<br>के साथ चलते हैं उसी प्रकार भगवान् राम रथपर चढ़-<br>कर महापुरी अयोध्याको चले ॥१८॥ तब महातेजस्वी<br>भरतजीने सारथी होकर रथ चलाया, शत्रुघ्नजीने<br>रत्नजटित दण्डयुक्त श्वेत छत्र लिया और लक्ष्मणजीने<br>व्यजन (पंखा) धारण किया ॥१९॥ एक ओर पास ही<br>स्थित शत्रुदमन सुग्रीवने और दूसरी ओर राक्षस-<br>राज विभीषणने चन्द्रमाके समान कान्तियुक्त चँवर<br>डुलाया ॥२०॥ उस समय भगवान् रामकी स्तुति<br>करते हुए दिव्यदर्शन देवताओं, सिद्धसमूहों और<br>ऋषियोंकी सुमधुर ध्वनि सुनायी देने लगी ॥२१॥ |
सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३१७
| मानुषं रूपमास्थाय वानरा गजवाहनाः ।<br>भेरीशङ्खनिनादैश्च मृदङ्गपणवानकैः ॥२२॥<br>प्रययौ राघवश्रेष्ठस्तां पुरीं समलङ्कृताम् ।<br>ददृशुस्ते समायन्तं राघवं पुरवासिनः ॥२३॥ | वानरगण मनुष्यरूप धारणकर हाथियोंपर सवार हुए। इस प्रकार रघुश्रेष्ठ भगवान् राम सहनाई, शङ्ख, मृदङ्ग, ताशे और नगाड़े आदि बाजोंके घोषके साथ भली प्रकार सजायी हुई अयोध्यापुरीमें गये। उस समय पुरवासी लोग श्रीरघुनाथजीको आते हुए देखने लगे ॥२२-२३॥ |
| दूर्वादलश्यामर्तनुं महार्ह-<br>किरीटरत्नाभरणाश्रिताङ्गम् ।<br>आरक्तकञ्जायतलोचनान्तं<br>दृष्ट्वा ययुर्मोदमतीव पुण्याः ॥२४॥<br>विचित्ररत्नान्वितसूत्रनद्ध-<br>पीताम्बरं पीनभुजान्तरालम् ।<br>अनर्घ्यमुक्ताफलदिव्यहारै-<br>र्विरोचमानं रघुनन्दनं प्रजाः ॥२५॥<br>सुग्रीवमुख्यैर्हरिभिः प्रशान्तै-<br>र्निषेव्यमाणं रवितुल्यभासम् ।<br>कस्तूरिकाचन्दनलिप्तगात्रं<br>निषीतकल्पद्रुमपुष्पमालम् ॥२६॥ | वे महाभाग पुरजन दूर्वादलके समान श्याम-शरीर, महामूल्य मुकुट और रत्नजटित आभूषणोंसे विभूषित, कमलके समान कुछ अरुणवर्ण विशाल नयनोंवाले, रङ्ग-बिरङ्गे रत्नोंसे युक्त (सुनहरी) तारके कामका पीताम्बर धारण किये, विशाल वक्षःस्थलवाले, बहुमूल्य मोतियोंके दिव्य हारोंसे सुशोभित, सुग्रीवादि शान्तस्वभाव वानरोंसे सेवित, सूर्यके समान तेजस्वी, समस्त शरीरमें कस्तूरी और चन्दनका लेप किये तथा कल्पवृक्षके पुष्पोंकी माला धारण किये श्रीरघुनाथजीको देखकर परम आनन्दको प्राप्त हुए ॥२४-२६॥ |
| श्रुत्वा स्त्रियो राममुपागतं मुदा<br>प्रहर्षवेगोत्कलिताननश्रियः ।<br>अपास्य सर्वं गृहकार्यमाहितं<br>हर्म्याणि चैवारुरुहुः स्वलङ्कृताः॥२७॥ | जब स्त्रियोंने भगवान् रामको आते सुना तो प्रसन्नतासे महान् हर्षके कारण उनके मुखकी कान्ति उज्ज्वल हो गयी और वे जिस गृहकार्यमें लगी हुई थीं उसे छोड़ भली प्रकार सज-धजकर अपने-अपने घरोंके ऊपर चढ़ गयीं ॥२७॥ |
| दृष्ट्वा हरिं सर्वदृगुत्सवाकृतिं<br>पुष्पैः किरन्त्यः सितशोभिताननाः ।<br>दृग्भिः पुनर्नेत्रमनोरसायनं<br>स्वानन्दमूर्तिं मनसाभिरेभिरे ॥२८॥ | सुमधुर मुसकानसे जिनका मुख मनोहर हो रहा है वे पुरनारियाँ, सबके नयनानन्दस्वरूप भगवान् रामको देखकर, फूलोंकी वर्षा करने लगीं और फिर उन्होंने, नेत्र और मनको प्रिय लगनेवाली उस आनन्दमयी मूर्तिको नेत्रोंद्वारा हृदयमें ले जाकर, मनसे आलिङ्गन किया ॥२८॥ |
| रामः स्मितस्निग्धदृशा प्रजास्तथा<br>पश्यन्प्रजानाथ इवापरः प्रभुः ।<br>शनैर्जगामाथ पितुः स्वलङ्कृतं<br>गृहं महेन्द्रालयसन्निभं हरिः ॥२९॥ | इस प्रकार विष्णुरूप भगवान् राम दूसरे प्रजापतिके समान मुसकानयुक्त मनोहर दृष्टिसे अपनी प्रजाको देखते हुए धीरे-धीरे भली प्रकार सजाये हुए अपने पिताके इन्द्रभवनके समान महलमें गये ॥२९॥ |
| प्रविश्य वेश्मान्तरसंस्थितो मुदा<br>रामो ववन्दे चरणौ स्वमातुः ।<br>क्रमेण सर्वाः पितृयोषितः प्रभु-<br>र्ननाम भक्त्या रघुवंशकेतुः ॥३०॥ | राजमहलके भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रसन्नचित्तसे अपनी माता (कौसल्या) के चरणोंकी वन्दना की और फिर उन रघुवंशशिरोमणि प्रभुने क्रमशः सभी विमाताओंको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया ॥३०॥ |