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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

(50) अगस्त्य-संहिता लगता है, उसे मात्रा कहते हैं। पैंतालीस मात्रा का प्राणायाम उत्तम, तीस मात्रा का मध्यम और पन्द्रह मात्रा का अधम होता है। सभी शुभ एवं अशुभ कर्मों के आरम्भ और अन्त में प्राणायाम करना चाहिए। चार सौ प्राणायाम करने से सैकड़ो महापाप मिट जाते हैं। प्राणायाम के बिना किए गये सभी निष्फल होते हैं। आगे योग के शेष अंगों का वर्णन है। इस प्रकार आठो अंगों को पूरा कर योगी सूर्यमण्डल का भेदन कर परमगति को प्राप्त करते हैं। कर्म योग अथवा ज्ञान योग अथवा दोनों से सगुण अथवा निर्गुण राम की आराधना कर योग के नियमों का पालन करता हुआ साधक भोग और मोक्ष प्राप्त करते हैं। 'कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग मैं कल से आरम्भ करूँगा' यह सोचनेवाला तो स्वयं अपनी आँखों में धूल झोंकता है। मानव शरीर में स्थित इन्द्रियाँ विष्ठा के बीच रहनेवाले कीड़े से भी अधिक अपवित्र हैं। जो अपने शरीर पर विश्वास करते हैं, वे मूर्ख हैं। ईश्वर ने केवल दुःख का अनुभव करने के लिए इस शरीर का निर्माण किया है। सकाम कर्म करने से पुनर्जन्म अवश्यम्भावी है अतः सिद्धान्त यही है कि फल प्राप्ति की कामना से कोई कर्म न करें। एकविंशाध्याय अध्याय के आरम्भ में पूर्व पक्ष के रूप में कर्म को भी मुक्ति का साधन मानते हुए उसकी साधकता बतलायी गयी है, किन्तु कर्म को साधन मानने पर क्या क्या विषमताएँ होती हैं उनका उल्लेख करते हुए कर्म की साधकता का खण्डन किया गया है और अन्त में सिद्धान्त के रूप में कहा गया है कि ज्ञान के बिना मुक्ति का दूसरा साधन नहीं है इस ज्ञान के साथ अष्टांग योग का मार्ग अपना कर योगी मुक्त हो जाता है। हृदय में स्थित श्रीराम सर्वत्र प्रकाशित होते हैं, जो शरीर के विनष्ट होने पर स्वयं अवशिष्ट रहते हैं। वस्तुतः ऐसे श्रीराम से ऊपर कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान और अष्टांग योग का समन्वय वैराग्य और यतित्व के बिना दुर्लभः है, अतः शास्त्रानुसार स्वीकृत यतित्व का आचरण करते हुए हर प्रकार से ब्रह्म-कैवल्य का अभ्यास करना चाहिए। द्वाविंशाध्याय इस अध्याय के आरम्भ में सुतीक्ष्ण का प्रश्न है कि योग क्या है और किस उपाय से चित्त को जीता जा सकता है। इसपर अगस्त्य कहते हैं कि जिस प्रयत्न से शरीर के अन्तः में वायु का निरोध होता है उसी प्रयत्न से मन भी निरुद्ध होकर आत्मलीन हो जाता है। प्राणवायु और अपानवायु समान कर चित्त को

प्रस्तावना (51) आत्मा में स्थित कराकर द्वादशार चक्र से निःसृत अमृत को पाकर योगी अमरत्व प्राप्त कर लेता है। इस सिद्धान्त कथन के बाद इस अध्याय में शरीर की उत्पत्ति की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है, जो आयुर्वेद शास्त्र में उत्पत्ति-स्थान का विषय है। सर्वप्रथम प्राणियों के चार प्रकार हैं- उद्भिज, अण्डज, स्वेदज तथा जरायुज। उनके अतिरिक्त तृण, वृक्ष आदि भी पंचमहाभूतों से ही निर्मित हैं। अपने भाग्य दुर्बल होने पर जरायुज शरीर प्राप्त करते हैं। स्त्री और पुरुष के ग्राम्यधर्म से शुक्र और शोणित के सम्मेलन से इनके शरीर का निर्माण होता है। यह गर्भ में प्रविष्ट होकर वायु, जल और अग्नि के प्रभाव से गीला होता है, उबलता है और धीरे धीरे बढ़ता हुआ दशवें मास में जन्म लेकर रोने लगता है। मनुष्य का यह शरीर विष्ठा और मूत्र से लिपटा हुआ अत्यन्त घृणित है। इस शरीर में ईडा, पिंगला, सुषुम्णा, गान्धारी, हस्तजिह्वा, अलंबुषा आदि नाडियाँ होती हैं। पचास हजार शिराएँ हैं, दस जल के स्थान हैं, रस के नौ स्थान हैं, जिनमें पुरुष में सात ही होते हैं। रक्त के आठ, मूत्र के पाँच, वसा के चार, मेद के दो और मज्जा एवं रेत के एक स्थान होते हैं। शरीर में दश वायु का संचार होता है- प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवल एवं धनञ्जय। जब शिशु का जन्म होता है, तो सर्वत्र दुःख ही भोगना पड़ता है। इस अध्याय का यह शरीरोत्पत्ति-वर्णन मानव शरीर के प्रति आसक्ति से विमुख करने के उद्देश्य से किया गया है। त्रयोविंशाध्याय इस अध्याय में ब्रह्मविद्या का निरूपण किया गया है। प्रारम्भ में अगस्त्य परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अद्वैत, आनन्दमय, चैतन्य, शुद्ध एक मात्र ईश्वर हैं, जो बाहर और भीतर प्रकाशित हैं। चैतन्य स्वरूप में परमात्मा स्थावर और जंगम प्राणियों में निश्चित रूप से स्थित है। उस परमात्मा को प्राणी जान नहीं पाते हैं, जिसके लिए अविद्या जिम्मेदार है। वह ज्ञानियों के मन में भी परदा की तरह है। इस अविद्या के कारण ही प्राणियों में सुख और दुःख की अनुभूति होती है। इस अविद्या का नाश होने पर साधक चैतन्य स्वरूप परमात्मा का साक्षात् दर्शन कर लेता है। यह स्थिति प्राणायाम से होती है। इसके लिए आधार-चक्र पर श्रीराम का ध्यान कर पूरक क्रिया के योग से बाह्य स्थित चैतन्य को भीतर लेकर कुम्भक कर शरीर के पूर्वोक्त दश प्रकार के वायु को एकीकृत करें। इन वायुओं को दृढ़

(52) अगस्त्य-संहिता

बाँधकर एक मुहूर्त के आधे समय अर्थात् 24 मिनट तक स्थिर रहकर मुख खोलें। आगे के चरण में इस रुद्ध वायु से एक एक कर ग्रन्थियों का भेदन करें। भूमध्य में स्थित द्विदत्त कमल से अमृत की टपकती हुई धारा का पान कर उसी धारा में समस्त असत् को प्रवाहित कर साधक अमर हो जाता है। जब पाँचवीं ग्रन्थि का भी भेदन सम्पन्न हो जाता है, तब शब्दब्रह्म से साक्षात्कार होने पर सर्वज्ञता आ जाती है। आगे मूलाधार में स्थित वायु को सुषुम्णा नाडी के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करायें। इससे यह जन्म सफल हो जाता है और मुक्ति मिल जाती है। हे योगीन्द्र सुतीक्ष्ण! यह सब संन्यास से होता है। यहीं मुक्ति का मार्ग है, जो सभी दर्शनों में कहा गया है। श्रीराम सत्य हैं, परब्रह्म हैं, राम से ऊपर कुछ भी नहीं है। यह रहस्य अगस्त्य-संहित में कही गयी है। यह 'अगस्त्य-संहिता' अध्यात्म मार्ग की दीपशिखा है। जिसके घर में यह पुस्तक पूजित है, वे सद्यः अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं, आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्र प्रपौत्र आदि की वृद्धि होती है। चतुर्विंशाध्याय अध्याय के आरम्भ में अगस्त्य-संहिता में उक्त मार्ग को परम मार्ग मानते हुए श्रीराम के माहात्म्य का वर्णन है। श्रीराम परम ज्योतिःस्वरूप हैं, इस संसार के विस्तार की आत्मा हैं। वसिष्ठ, वामदेव, नारद आदि ऋषियों ने वेद, स्मृति, पुराण आदि का अवलोकन कर यह निश्चय किया है कि श्रीराम यज्ञ स्वरूप हैं, जिससे स्थावर और जंगम प्राणियों की उत्पत्ति हुई है। श्रीराम के मन्त्र शब्द प्रकाश स्वरूप है और श्रीराम से ही इसकी भी उत्पत्ति हुई है, अतः इन मन्त्रों के जप से भोग और मोक्ष दोनों मिल जाते हैं। इस अध्याय में श्रीराम के अनेक मन्त्रों का निर्देश किया गया है। जिनमें एकाक्षर मन्त्र 'राम्', द्व्यक्षर मन्त्र 'राम', षडक्षर मन्त्र ॐ रामाय नमः, क्लीं रामाय नमः, ह्रीं रामाय नमः आदि विवेचित हैं। आगे 'राम' पद के साथ 'चन्द्र' एवं 'भद्र' जोड़कर भी ह्रीं, श्रीं, क्लीं ॐ ये बीज पर्याय से लगाकर अनेक प्रकार के मन्त्र होते हैं। इन मन्त्रों के ऋषि, ब्रह्मा, शिव और अगस्त्य हैं, छन्द गायत्री है, देवता श्रीराम हैं, आदि और अन्त के बीज शक्तियाँ हैं तथा भोग और मोक्ष प्रयोजन हैं। इन मन्त्रों में से किसी एक का न्यास सभी अंगों में करना चाहिए। इसके बाद हृदय रूपी कमल के समान आँखोंवाले परात्पर पुरुष श्रीराम का ध्यान कर मानस-पूजा कर एकान्त में जप करें। श्रीसीताराम की विलासमयी युगलमूर्ति का ध्यान कर साधक भोग और मोक्ष पाते हैं। आगे जप, होम, अर्चना आदि

प्रस्तावना (53) करें। श्रीराम के मन्त्र उन्हीं के स्वरूप हैं, जिनका स्मरण और कीर्तन करने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र, सभी पापमुक्त हो जाते हैं। इसलिए सद्गुरु के उपदेश से मण्डल में श्रीराम के मन्त्र का अनुष्ठान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। पंचविंशाध्याय इस अध्याय में षडक्षर मन्त्र के अतिरिक्त जो श्रीराम के मन्त्र हैं, उनके अनुष्ठान की विधि बतलायी गयी है। इस अध्याय में सर्वप्रथम पूजा-विधानों एवं जपविधानों का त्याग कर भक्तिभाव से श्रीहरि के समक्ष कीर्तन, भजन, नामोच्चारण आदि करके भी मुक्ति प्राप्त करने की बात कही गयी है। ऐसे भक्तों के लिए दीक्षा और अन्य विधानों की व्यर्थता कही गयी है। बाद में कहा गया है कि सभी मन्त्रों में षडक्षर मन्त्र श्रेष्ठ है, अतः अन्य मन्त्रों के भी मूल विधान षडक्षर मन्त्र के समान है। दीक्षा-विधि में भी कोई अन्तर नहीं है। पुरश्चर्या विधि की पूर्वोक्त ही है। इस अध्याय में सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित श्रीराम सीता एवं हनुमान् का ध्यान किया गया है। बाह्यपूजा की विधि यहाँ संक्षेप में वर्णित है। यहाँ देवता को अर्घ्य नैवेद्यों का उल्लेख किया गया है। षड्विंशाध्याय इस अध्याय में रामनवमी व्रत का विस्तृत विवरण दिया गया है। चैत्र शुक्ल नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न में परमपुरुष श्रीराम कौशल्या के गर्भ से उत्पन्न हुए। इस उपलक्ष्य में इस दिन उपवास, व्रत, रात्रि-जागरण करना चाहिए तथा दूसरे दिन प्रातःकाल में दशमी तिथि में श्रीराम की पूजा कर ब्राह्मण- भोजन कराना चाहिए। गाय, भूमि, तिल, सोना आदि दान करना चाहिए। आगे श्रीराम की प्रतिमा की पूजा कर दान करने का विधान किया गया है। रामनवमी से एक दिन पूर्व स्नानादि क्रिया कर श्रीराम के मन्त्र के साधक का विधिपूर्वक वरण कर उन्हें आचार्य बनायें। फिर उन्हें स्नानादि कराकर नवीन वस्त्र पहनाकर स्वयं भी श्वेत वस्त्रादि धारण कर आचार्य के मुख से रामकथा सुनते हुए रात्रि में भूमि पर सोकर दूसरे दिन वेदी निर्माण कर अन्य विद्वानों के मुख से स्वस्तिवाचन सुनते हुए उसी स्वर्णमयी प्रतिमा का पूजन करें तथा अन्त में संकल्पपूर्वक उसके दान का संकल्प करें। आगे पूजन में प्रयुक्त चन्दन, कुंकुम आदि के निर्माण की विधि वर्णित है। इस दिन नृत्य, उत्सव भजन-कीर्तन आदि करते हुए दिन-रात व्यतीत करें। अगले दिन श्रीराम की विधिवत् पूजा कर

(54) अगस्त्य-संहिता मूलमन्त्र से एक सौ आठ बार पायस से हवन करें। तब आचार्य को सन्तुष्ट कर संकल्प लेकर वह स्वर्णप्रतिमा दान करें। तब दक्षिणा देकर आचार्य और ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करें। इससे अनेक जन्मों के पाप मिट जाते हैं और तुलापुरुष आदि दान का फल मिलता है। सप्तविंशाध्याय रामनवमी के दिन प्रतिमा-दान से भिन्न कल्प का विधान किया गया है। आरम्भ में पूर्व अध्याय का अनुकल्प है कि स्वर्ण प्रतिमा के दान करने में यदि आर्थिक कठिनाई हो, तो एक पल के सोलहवें भाग के बराबर सुवर्ण की प्रतिमा दान की जा सकती है। दूसरा कल्प है कि नवमी के दिन व्रत कर रात्रि में जागरण कर भक्तिपूर्वक श्रीराम का पूजन करें। दशमी तिथि को गाय, भूमि, तिल, हिरण्य आदि वित्त के अनुसार दान करें। इस प्रकार जो रामनवमी का व्रत करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। यह रामनवमी का व्रत नित्यकर्म है। अर्थात्, जो यह व्रत नहीं करते, वे पाप के भागी होते हैं। आगे इस अध्याय में कहा गया है कि दशम अध्याय में वर्णित विधि से षोडशोपचार से विधिपूर्वक पूजन करें। इस दिन मौन व्रत धारण कर एकान्त में रहते हुए श्रीराम-मन्त्र का जप उस पाप को नष्ट कर देता है, जो पाप बारह वर्षों में भी नष्ट नहीं होता। रामनवमी के दिन प्रत्येक प्रहर में पूजा करनी चाहिए। अष्टाविंशाध्याय इस अध्याय में भी रामनवमी व्रत और उस दिन पूजन का माहात्म्य बतलाया गया है। इस दिन उपवास, जागरण, पितृ-तर्पण करना चाहिए। जो रामनवमी के दिन पितरों के निमित्तं तर्पण करते हैं, उनके पितर उसी क्षण विष्णु के परमधाम को चले जाते हैं। इस दिन व्रत करने से तुलापुरुष दान का फल मिलता है। रामनवमी का निर्णय करते हुए कहा गया है कि अष्टमीविद्धा नवमी का त्याग वैष्णवों को करना चाहिए। नवमी में व्रत कर दशमी में पारणा करें। इसी अध्याय में आगे सुतीक्ष्ण द्वारा पूछे जाने पर तत्त्व, जाप्य मन्त्र एवं ध्यान का विस्तृत विवेचन किया गया है। यहाँ त्रिगुणातीत, निर्मल ज्योतिःस्वरूप को तत्त्व मानकर 'श्रीराम' को परम जाप्य मन्त्र माना गया है। 'श्रीराम, राम, राम' का जप जो करते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं। इसके बाद श्रीराम का ध्यान बतलाया गया है कि अयोध्या नगर में रत्नमण्डप पर कल्पतरु

(55) की जड़ में रत्न सिंहासन पर आसीन श्रीराम का ध्यान करें। यहाँ अष्टदल कमल पर विभिन्न दलों में अंग, परिजन और परिवार देवताओं की स्थिति का वर्णन कर षोडशोपचार-पूजन का विवरण दिया गया है। यहाँ उल्लेख है कि प्रत्येक मास शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पौराणिक स्तोत्रों एवं वेदपाठ के साथ श्रीराम की पूजा करनी चाहिए। एकोनत्रिंशाध्याय इस अध्याय के आरम्भ में न्यास को मन्त्र का कवच कहते हुए जप से पूर्व न्यास का अनिवार्य विधान किया गया है कि केशवकीर्त्यादि-न्यास, तत्त्वन्यास, परमहंसन्यास, प्रणवन्यास, मातृकान्यास आभ्यन्तरमातृकान्यास क्रमशः कर मन्त्र का जप करें। यदि इन न्यासों को करने में अशक्त हों, तो केवल मन्त्र का भी जप किया जा सकता है। इस अध्याय में आगे श्रीराम के मन्दिर में प्रतिष्ठा के लिए शुभ दिन की गणना की गयी है। चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्र, तारा आदि का बलाबल देखे बिना श्रीराम की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। अथवा माघ शुक्ल नवमी को चन्द्रमा और तारा शुभ होने पर करें। मार्गशीर्ष अथवा वैशाख की पूर्णिमा के दिन भी मूल आदि दोष न होने पर प्रतिष्ठा करें। गोपाल कृष्ण की स्थापना के लिए श्रावण, नृसिंह और केशव की प्रतिमा-स्थापन के लिए वैशाख एवं राम के लिए चैत्र प्रशस्त मास है। भगवान् अनन्त की प्रतिमा भी माघ में स्थापित करें। मन्दिर की वास्तु का विधान किया गया है कि मन्दिर के स्थान से काँटा, ईंट, पत्थर आदि हटाकर वहाँ तबतक खोदें जबतक जल छूटने लगे। फिर पत्थर और बालू से भरकर उस स्थान को दृढ़ कर पत्थर कूटकर ठोंक पीट कर दो हाथ ऊँचा चबूतरा (भूमिका) बनावें। इसपर सुन्दर देवालय का निर्माण करें। इसके चारों ओर गोपुर से युक्त प्राकार का निर्माण करावें। मन्दिर के गर्भगृह में दो हाथ की चौकोर वेदी बनाकर पीठ के आगे हनुमान्, अग्निकोण में सुग्रीव, दक्षिण में भरत, नैर्ऋत्य में विभीषण, उत्तर में शत्रुघ्न और ईशान कोण में जाम्बवान् का अंकन करें एवं बीच में श्रीराम का अंकन करें। इस यन्त्र का अंकुरारोपण आदि कर प्रतिष्ठापन करें और कुटुम्बवाले दरिद्र ब्राह्मण को यह मन्दिर दान करें। त्रिंशाध्याय इस अध्याय में दशाक्षर आदि मन्त्र का विधान किया गया है। तथा प्रत्येक मन्त्र के लिए अलग-अलग ध्यान बतलाये गये हैं। आगे लक्ष्मण भरत, शत्रुघ्न, हनुमान् इन अंग देवताओं के मालामन्त्र का विधान किया गया है। अन्त

(56) अगस्त्य-संहिता

में कहा गया है कि श्रीराम के अनेक मन्त्र हैं, उन मन्त्रों के साथ लक्ष्मण का मन्त्र भी जपना चाहिए, तभी दशाक्षर आदि मन्त्रों की सिद्धि होगी। कौन मन्त्र किस साधक के लिए अनुकूल होगा, इसकी विवेचना के क्रम में शत्रु और मित्र का जो विचार किया जाता है, वह भी लक्ष्मण के मन्त्र में नहीं किया जाता है। इस प्रकार श्रीराम के मन्त्र के साथ लक्ष्मण के मन्त्र का जो जप करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त होकर सभी कामनाओं को पाता है। एकत्रिंशाध्याय इस अध्याय में श्रीराम एवं लक्ष्मण के मन्त्रों के विविध प्रयोग संकलित हैं। श्रीराम एवं लक्ष्मण के विभिन्न ध्यानों का स्मरण करते हुए षडक्षर मन्त्रराज के जप करने से विभिन्न प्रकार की लौकिक सिद्धियों का प्रतिपादन किया गया है। जैसे- अयोध्या में राज्याभिषिक्त श्रीराम का ध्यान करें और एकाग्र होकर पचास हजार मन्त्र का जप कर अपने नष्ट राज्य को पावें। नागपाश से विमुक्त श्रीराम का ध्यान करते हुए एकान्त में रहकर दस हजार जप कर बेड़ी के बन्धन से मुक्त हो जाता है। हनुमानजी के द्वारा लायी गयी औषधियों से कष्ट से मुक्त श्रीराम का ध्यान करते हुए दस हजार जप करने से मनुष्य अपनी अपमृत्यु को जीत लेता है। मेघनाद का वध करनेवाले श्रीलक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकाग्र होकर जप करने से शीघ्र ही बहुत सारे दुर्जय शत्रुओं को जीत लेते हैं। शूर्पणखा की नाक काटने के लिए उन्मुख श्री लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एक हजार जप करने से इन्द्र आदि को भी जीत लेते हैं। श्रीराम के चरणकमल की सेवा करने के लिए द्वार बनाकर अवस्थित श्री लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकान्त में जप करते हुए साधक अनेक महारोगों को जीत लेते हैं। यहाँ कहा गया है कि भौतिक सिद्धि के लिए श्रीराम के मन्त्रों का प्रयोग पापकारक भी हो सकता है, किन्तु लक्ष्मण-मन्त्र का प्रयोग पापकारक नहीं होता है। अतः विशेष रूप से लक्ष्मण की पूजा लौकिक सिद्धि के लिए करनी चाहिए। द्वात्रिंशोऽध्याय इस अध्याय में हनुमान् के कवच मन्त्र का पाठोद्धार का विवरण देते हुए इसके जप करने से भूत, प्रेत, पिशाच आदि के दूर भागने की बात कही गयी है। इस हनुमत्कवच में एक सौ वर्ण हैं और पचीस से अधिक शब्द हैं। इस मन्त्र के एक हजार जप का पुरश्चरण श्रीराम अथवा शिव के मन्दिर में करना चाहिए। छोटे- मोटे रोगों की शान्ति के लिए एक सौ आठ जप करना चाहिए। तीन दिन तक

(57) जप करने से साधक संकटों से छुटकारा पा लेते हैं। भयंकर रोगों की शान्ति के लिए एक हजार आठ जप करें। इस अध्याय में हनुमान् के माला मन्त्र का भी विधान किया गया है तथा अनेक कामनाओं की सिद्धि के लिए जप से पूर्व अनेक प्रकार के ध्यान बतलाये गये हैं। यही हनुमान् यन्त्र का वर्णन है तथा उसे ताबीज में जड़कर पहनने का विधान है। आगे श्रीराम के यन्त्र और कवच का वर्णन किया गया है। श्रीराम के यन्त्र में कुल मिलाकर इक्कीस कोष्ठ हैं। यह वज्रपंजर नामक यन्त्र कहलाता है। आगे श्रीराम का कवच है, जिसका लेखन यन्त्र पर करने का विधान किया गया है। इस यन्त्र पर पूजन कर इसे धारण करने से शत्रुओं का शमन, सभी उपद्रवों का नाश, आयु, आरोग्य में वृद्धि, पुत्र-पौत्रादि में वृद्धि तथा सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।

विषयसूची 1 अगस्त्यसुतीक्ष्णसंवादे शिवपार्वत्युपाख्यानम् 1 2 परमेश्वरस्वरूपाख्यानम् 6 3 रामावतारोपक्रम् 10 4 ब्रह्मणा षडक्षरमन्त्रग्रहणम् 15 5 सगुणोपासनम् 21 6 श्रीतुलसीमाहात्म्यकथनम् 28 7 मन्त्रराजमाहात्म्यम् 35 8 गुरु-शिष्यलक्षणम् 41 9 यन्त्र-विधिः 47 10 पूजा-विधिः 51 11 पूजाविधि-भूतशुद्धिः 58 12 शरीर-न्यासः 65 13 रामपूजा-विधिः 77 14 कुण्डमान-होमान्तादिविधिः 85 15 प्रयोग-विधिः 95 16 पुरश्चरण-विधिः 103 17 पूजा-विधानम् 112 18 आसन-मुद्रा-प्रदर्शनम् 122

(59)

19 यम-नियम-व्रतम् 132 20 प्राणायाम-विधिः 142 21 ब्रह्मविद्या-निरूपणम् 151 22 शरीरोत्पत्तिः 158 23 योग-वर्णनम् 165 24 मन्त्रमहिमाख्यानम् 173 25 मन्त्रान्तरवर्णनम् 181 26 श्रीरामव्रत-कथनम् 188 27 रामनवमी-महिमाख्यानम् 198 28 रामनवमीव्रत-विधानम् 204 29 श्रीरामप्रतिष्ठा-विधिः 210 30 लक्ष्मणादिपूजन-विधिः 217 31 लक्ष्मणादिमन्त्र-कथनम् 225 32 श्रीरामयन्त्रमन्त्रकवचोद्धारकथनम् 229 परिशिष्ट : हेमाद्रि-कृत 'चतुर्वर्गचिन्तामणि' में उद्धृत अगस्त्य-संहिता 242 'अगस्त्य-संहिता' से उद्धृत रामनवमी-व्रत-कथा· 245 रामतापिनीयोपनिषद् में उद्धृत रामोपासना की फलश्रुति 256 श्रीमदगस्त्यसंहितान्तर्गत श्रीरामानन्दाचार्यजन्मोत्सवकथा 261


अगस्त्य-संहिता श्रीरामो जयति। १ अगस्त्यो नाम विप्रर्षिः सत्तमो गौतमीतटे। कदाचिद्दण्डकारण्यं सुतीक्ष्णस्याश्रमं ययौ।।१।। अगस्त्य नाम के श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि किसी समय में दण्डकारण्य में गौतमी नदी के तट पर स्थित सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पर पहुँचे। प्रत्युज्जगाम तं भक्त्या गन्धपुष्पाक्षतोदकैः। पाद्यार्घ्याद्यर्हणां चक्रे तस्मै ब्रह्मविदे मुनिः।।२। सुतीक्ष्णस्तं प्रणम्याह² सुखासीनं तपोनिधिम्। श्रीमदागमनेनैव जीवितं सफलं मम।।३।। अद्य जन्मसहस्रेषु तपः फलति संचितम्। मुनि सुतीक्ष्ण ने उनकी आगवानी की और चन्दन, पुष्प, अक्षत, जल, हाथ-पैर धोने का जल देकर उस ब्रह्मवेत्ता मुनि का पूजन किया। जब वे सुखपूर्वक आसन पर बैठ गये, तब सुतीक्ष्ण मुनि ने कहा कि श्रीमान् के आगमन से ही मेरा जीवन सफल हो गया। आज सैकड़ों जन्मों की तपस्या का फल मुझे मिल गया। कामक्रोधादिभिर्भूयो भूयोऽहं पीडितो मुने।।४।। नाद्राक्षं सम्यगिष्ट्वापि क्रतुभिर्बहुदक्षिणैः। ३ सत्पात्रे सर्वदानानि दत्वा तु मुनिसत्तम।।५।। भवाब्धेस्तरणोपायं तपस्तप्त्वा सुदुष्करम्। किं करिष्याम्यहं तात क्व यास्यामीति तद्वद।।६।। हे महामुनि! मैं काम क्रोध आदि से अत्यन्त पीड़ित हूँ। मैंने कई यज्ञ किये, जिनमें पर्याप्त दक्षिणा दी, सत्पात्र को दान किया, किन्तु संसार को पार लगाने का

  1. क. श्रीमते रामानुजाय नमः। ख. श्री गणेशाय नमः। 2. ख. मुनिं प्राह। 3.ख. ºभूरिदक्षिणैः।

(2) ————————— अगस्त्य-संहिता ————————— उपाय मैंने नहीं देखा। कठिन तपस्या भी की; किन्तु अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? इसका उपदेश करें। इत्युक्तः सोऽब्रवीत्तेन कुम्भभूर्विगतस्पृहः।¹ क्षणं विचार्य तत्पौर्वापर्य्येण मुनिपुङ्गवः॥7॥ ऐसा कहने पर वीतराग महामुनि अगस्त्य ने कुछ देर सोचकर बारी बारी से सुतीक्ष्ण को कहने लगे। अगस्त्य उवाच अस्ति वक्ष्यामि ते सर्वं रहस्यं वृषभध्वजः। यत्प्रत्यपादयत्पूर्वं ² पार्वत्यै कृपयात्मवित्॥8॥ अगस्त्य बोले – 'इसका भी उपाय है। प्राचीन काल में आत्मज्ञानी भगवान् शिव ने प्रेमपूर्वक पार्वती से जो रहस्य कहा था, वहीं मैं तुमसे कह रहा हूँ। ³कदाचित् पार्वती प्राह भर्तारं भक्तवत्सलम्। कथं मे देव निस्तारो भवाब्धेस्तरणं भवेत्॥9॥ भवाब्धौ मोहिताः सर्वे सद्गतिं प्राप्नुवन्ति ते। किसी समय में पार्वती ने भक्तवत्सल भगवान् शंकर से पूछा – हे देव! मुझे मुक्ति कैसे प्राप्त होगी और संसार से कैसे पार लगेगा? इस संसार रूपी समुद्र में मोह-ग्रस्त होकर कैसे सभी सद्गति को प्राप्त कर सकेंगे? ईश्वर उवाच कामक्रोधादिभिर्दोषैर्दुष्टास्तत्र पुनः पुनः। उत्पद्यन्ते विलीयन्ते⁴ पुनर्व्यामोहितास्त्वया॥10॥ ईश्वर बोले – काम, क्रोध आदि दोषों से इस संसार में लोग आपके द्वारा माया से मोहित होकर बार-बार उत्पन्न और विलीन होते देखे जाते हैं। रौरवादिषु पच्यन्ते पुनः संसारिणो भुवि। कर्मशेषात् प्रजायन्ते पंग्वन्धबधिरादयः॥11॥ वे पृथ्‍वी पर उत्पन्न होकर रौरव आदि नाम के नरकों में पचते हैं और पुण्य कर्म के क्षीण होने से लँगडे, अन्धे, बहरे आदि हो जाते हैं।

  1. क. बभूव विगतस्पृहः। 2. क. प्रीत्योत्पादयत्पूर्वं। 3. घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध। 4. घ. प्रलीयन्ते।

प्रथमोऽध्यायः (3) कृमिकीटादयो भूत्वा पुनः संसारिणो भुवि। कुष्ठाद्युपहताः¹ केचिच्चौरव्याघ्रादिभिर्हताः ।।12।। फिर पृथ्वी पर कीड़े-मकोड़े के रूप में जन्म लेकर ये संसारी कुष्ठ आदि रोगों से जकड़े हुए तथा कुछ चोर-डाकू, बाघ आदि के द्वारा मार डाले जाते हैं। प्रविशन्ति जलेऽग्नौ वा देशाद् देशं व्रजन्ति हि। परस्त्रीधनहन्तारस्तापयन्ति सतः सदा ।।13।। जो लोग दूसरे की स्त्री अथवा धन का हरण करते हैं और सज्जनों को सताते हैं; वे पानी मे डूबते हैं, आग में झुलसते हैं अथवा इस स्थान से उस स्थान भटकते रहते हैं। देवब्राह्मणवित्तैस्तु येषां जीवनमन्वहम्। राजसाः तामसाश्चैव हर्तारो धनजीविनः ।।14।। पुत्रदारादिभिर्युक्ता दुःखवर्ते भ्रमन्त्यहो। जो देवता, ब्राह्मण और पुरोहितों के धन से जिनका जीवन चलता है, ऐसे राजस और तामस स्वभाव के लोग पुत्र, पत्नी आदि से युक्त होकर इस दुःख के भँवर में घूमते रहते हैं। ²कलौ प्रायेण सर्वेऽपि राजसा तामसास्तथा ।।15।। निसिद्धाचारिणः सन्तो मोहयन्त्यपरान्बहून्। यथाभूतः प्रभुल्लोके सेवकाः स्युस्तथाविधाः ।।16।। अतो मदीयाः सर्वेऽपि हिंसकाःस्वप्रियाः प्रिये। वश्याकर्षणविद्वेषस्तम्भनोच्चाटनादिषु ।।17।। शश्वदावां समाराध्य भवन्ति फलभागिनः। आवाभ्यां पिशितं रक्तं सुरां चापि सुरेश्वरि ।।18।। वर्णाश्रमोचितो धर्ममविचार्य्यार्पयन्ति ये। भूतप्रेतपिशाचास्ते भवन्ति ब्रह्मराक्षसाः ।।19।। कलियुग में प्रायः सभी राजस या तामस प्रवृत्ति के लोग होते हैं। निषिद्ध कर्म करनेवाले हैं और वे बहुत से दूसरे लोगों को कष्ट देते हैं। संसार में जैसा मालिक होता है, वैसे ही सेवक भी होते हैं। इसलिए हे प्रिये! वे सभी हिंसक मेरे

  1. घ. केचिच्छस्त्रहताः। 2. क. एवं ख. में पंक्ति के क्रम में अन्तर है ।

(4) अगस्त्य-संहिता प्रिय हैं। वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, स्तम्भन, उच्चाटन आदि प्रयोगों में लीन रहनेवाले वे नित्य हम दोनों की आराधना करके फल पाते हैं। हमदोनों को तो मांस, रक्त, सुरा भी समर्पित करते हैं, किन्तु हे सुरेश्वरि! वर्ण और आश्रम के लिए विहित धर्म का विचार किए विना जो हमदोनों को मांस, रक्त, मदिरा अर्पित करते हैं, वे भूत, प्रेत, पिशाच और ब्रह्मराक्षस होते हैं। पुनस्तदन्ते जायन्ते विप्रदेवाधिकारिणः। तत्तद्रूपेण जायन्ते स्वस्वदोषानुरूपतः।।20।। और फिर मृत्यु पाकर पुरोहित और मन्दिर के अधिकारी होते हैं, फिर अपने दोषों के अनुसार भूत, प्रेत, पिशाच आदि के रूप में जन्म लेते हैं। पार्वत्युवाच नायं धर्मो हि देवेश परेषामुपकारकृत्। अतो मे ब्रूहि देवेश धर्मो यस्त्वं कृपानिधे।।21।। पार्वती बोली- हे देवाधिदेव, हे करुणानिधि! यह वशीकरण आदि धर्म दूसरे का उपकार करनेवाला नहीं हैं, अतः जो धर्म है, वह मुझे बतलाइए। ईश्वर उवाच सत्यं वदाम्यहं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि। हन्ताहं सर्वलोकानां यतो हिंसैव मे प्रिया।।22।। महादेव बोले- हे देवि! मैं ठीक ही तो कहता हूँ, जो तुम मुझे पूछ रही हो। मैं तो सभी लोकों का अन्तक हूँ; अतः हिंसा मुझे प्रिय हैं। ये वा भूतानि निघ्नन्ति विधिनाविधिनापि वा। समर्पयन्ति भूतेभ्यो मत्प्रियास्ते सदा प्रिये¹।।23।। जो प्राणियों का वध विधानपूर्वक या विना विधान के भी करते हैं और भूत-प्रेतों को समर्पित करते हैं वे सदा मेरे प्रिय हैं। अहं तमोमयो नित्यं हन्मि भूतानि भामिनि। मत्कर्म हननं नित्यमतो हिंसैव मे प्रिया।।24।। हे भामिनि! मैं नित्य तमोमय हूँ और प्राणियों का संहार करता हूँ। संहार करना मेरा कर्म है, अतः हिंसा ही मेरा प्रिय है।


  1. घ. मत्प्रियाः सर्व्वदा प्रिये।

प्रथमोऽध्यायः (5) मत्कृत्याचारिणः सर्वे वल्लभा मम वल्लभे। लोके स्वाम्यनुकल्पेन सेवां कुर्वन्ति सेवकाः।।२५।। भक्त्यार्पयन्ति ये मह्यं तवापि पिशितादिकम्। उत्पादयन्ति चानन्दं गणेभ्यो वा सुरप्रिये।।२६।। हे स्वामिनि! प्रिये! जो कार्य मैं करता हूँ, उन कार्यों को करनेवाले सभी मेरे प्रिय हैं। इस संसार में स्वामी के समान ही सेवक भी सेवा करते हैं। हे देवप्रिये पार्वति! मुझे या तुम्हें जो भी व्यक्ति भक्तिपूर्वक मांस आदि अर्पित करते हैं उससे हमें या हमारे गणों भूत-प्रेत पिशाच आदि को प्रसन्नता होती है। तवापि च मदीयानामस्माकं पिशितादिकम्। तृप्तिमुत्पादयन्त्येव विधिनाविधिनार्पितम् ।।२७।। तुम्हें और मुझे दोनों को विधिपूर्वक या विना विधि के भी अर्पित किये गये मांस आदि संतुष्टि तो देते ही हैं। ब्रह्मा सृजति भूतानि विष्णुः तान्परिपालयेत्।¹ तान्यहं हन्मि भूतानि कृतिरस्भाकमीदृशी ।।२८।। ब्रह्मा प्राणियों की सृष्टि करते हैं, विष्णु उनका पालन करते हैं और मैं उनका संहार करता हूँ। हमलोगों के तो ये ही कार्य हैं। रजोगुणालयो ब्रह्मा विष्णुः सत्त्वगुणालयः। तमोगुणालयोऽहं स्यां स्वस्वकार्याणि कुर्महे।।२९।। ब्रह्मा में रजोगुण का निवास है, विष्णु सत्त्वगुण के आलय हैं और तमोगुण का आलय मैं हूँ। हमसब अपने अपने कार्य करते हैं। तत्तद्गुणानुगुण्येन क्रियतेस्माभिरीदृशम्। उन उन गुणों के अनुरूप हमसब इस प्रकार कार्य करते हैं। भवाब्धेस्तरणं देवि हिंसकानान्तु दुर्लभम्।।३०।। कामादिग्रस्तचित्तानां कुतो मुक्तिर्वद प्रिये।।३१।। हे प्रिये! लेकिन इस संसार रूपी सागर को पार करना हिंसकों के लिए दुर्लभ है। काम आदि से ग्रस्त लोगों के लिए मुक्ति कैसे होगी यह कहो। इत्यगस्त्यसंहितायां शिवपार्वत्युपाख्यानम् नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।।

  1. घ. विष्णुस्तान्येव पाति वै।

(6) अगस्त्य-संहिता अथ द्वितीयोऽध्यायः पार्वत्युवाच। कमुपास्य लभेन्मुक्तिं क्रियया च कया प्रभो। मुमुक्षोः पुनरावृत्तिदुर्लताभयभञ्जन¹।।1।। हे शंकर! मोक्षार्थियों के लिए पुनर्जन्मरूपी दुष्टलता के भय का नाश करनेवाले! हे प्रभो! हे संसार का संहार करनेवाले! किस देवता की उपासना और कैसा कर्म करने से मुक्ति मिलेगी? ईश्वर उवाच शृणु देवि महाभागे रहस्यं कथयाम्यहम्। यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।।2।। ईश्वर बोले- हे देवि, मैं उस रहस्य को बतला रहा हूँ, जिसे जान लेने पर प्राणी संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है। अपाणिपादो जवनो ग्रहीतापीक्ष्यतेऽप्यदृक्। अकर्णः स शृणोत्येतच्छब्दरूपं² परं महः।।3।। वेत्ति वेद्यं स सर्वज्ञानवेद्यो विद्यते प्रभुः।³ स महापुरुषः पुंसां स्त्रीणां पुंव्यक्तिलक्षणः ।।4।। वे महापुरुष परमेश्वर विना पैर के भी गतिशील हैं, विना हाथ के भी ग्रहण करने में समर्थ हैं, विना आँख देखते हैं और विना कान के सुनते हैं और शब्द के रूप में महान् हैं। वे सभी ज्ञातव्य विषयों को जानते हैं और वे प्रभु समग्र ज्ञान के द्वारा ज्ञेय हैं। पुरुषों में महापुरुष और स्त्रियों में पुरुष स्वरूप हैं। स्त्रीपुन्नपुंसकाकाररहितः पुरुषोत्तमः। सर्वेश्वरः सर्वरूप सर्वदेवमयो हरिः।।5।। स्त्री, पुरुष और नपुंसक के आकार से रहित निराकार पुरुषोत्तम हरि सबके स्वामी हैं, सभी रूपों में हैं तथा सभी देवताओं के रूप में हैं। सत्त्वज्ञानमयोऽनन्तोऽनादिरानन्द उच्यते। अजः स्मरणमात्रेण जन्मादिक्लेशभञ्जनः।।6।। तस्यात्मधीश्र्च सर्वेषां पुनरावृत्तिकर्त्तनी।

  1. क. एवं ख. पुरावृत्तिं दुर्लभां भवभञ्जक। 2. घ. छन्दोरूपे। 3. घ. वित्ति वेद्यं स सर्वज्ञो नावेद्यं विद्यते प्रभोः।

द्वितीयोऽध्यायः (7) सत्त्व-स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप, अनन्त, अनादि, आनन्दमय तथा अजन्मा कहे जाते हैं तथा केवल स्मरण करने से जन्म आदि के कारण उत्पन्न कष्ट को दूर करते हैं। उनमें जो ध्यान लगाते हैं उनकी बुद्धि इस संसार में पुनर्जन्म को काटनेवाली कैंची बन जाती है। नियमेनैव वर्णानां स्वाश्रमोक्तेन स प्रभुः ।। 7 ।। ध्येयः संसारनाशाय १ न चैवावर्तते पुनः । सभी वर्णों के अपने अपने आश्रमों के अनुरूप बने नियमों के अनुरूप ध्यान किये गये वे प्रभु पुनः संसार में जन्मग्रहण के नाशक हैं। वह भक्त इस संसार में पुनः उत्पन्न नहीं होता। स्वाश्रमोक्तं परित्यज्य य आत्मानमुपासते ।। 8 ।। तद्रूपेण ततो देवि मुच्यते भवबन्धनात्। हे देवि! अपने आश्रम के लिए कथित विधान को छोड़कर अर्थात् संन्यास लेकर जो आत्मा की उपासना करते हैं, वे उसी रूप में इस संसार के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। श्रुतिस्मृतिपुराणेषु यो यो नियम उच्यते ।। 9 ।। यस्य यस्याश्रमन्वायो न मोक्तव्यो मुमुक्षुभिः । अतो नियममादृत्य कुर्याद् ध्यानमनन्यधीः ।। 10 ।। वेद, स्मृति एवं पुराणों में जो जो नियम बतलाये गये हैं तथा जिसका जो आश्रम है, उस आश्रम के अनुरूप जो नियम बनाये हैं, मोक्षार्थियों को उन नियमों का त्याग नहीं करना चाहिए। नियमों के अनुसार एकचित्त होकर प्रभु का ध्यान करें। एतच्चराचरं विश्वं स्वप्नप्रत्ययवत्सुधीः । मिथ्यादृग्व्यतिरिक्तं यद् दृश्यतेद्धा तथा प्रिये ।। 11 ।। दृग्रूपेणात्मना ज्ञानं सत्यानन्दात्मनः स्वयम्। एकाकी जितचित्तात्मा चिन्तयेत् तदनन्यधीः ।। 12 ।। सोऽहमित्यात्मनात्मानं त्वाज्ञानपरिकल्पितम्। एतत् स्वव्यतिरिक्तं यद्यतः स्वेनैव कल्पते ।। 13 ।। न पारमार्थिकं देवि यद्यद् बालो हि कल्पयेत् ।। बालाज्ञयोर्वा को भेदः कल्पेते न तु चक्षुषा ।। 14 ।।

  1. क. संसृतिनाशाय।

(8) अगस्त्य-संहिता विद्वान् इस चराचर जगत् को स्वप्न के ज्ञान के समान मानते हैं। यह संसार दिखाई पड़ता है, अतः मिथ्या है। कुछलोग इसे मिथ्यादृष्टि से भिन्न अर्थात् वास्तविक मानते हैं। आत्मदृष्टि से ज्ञान को सत्य रूप और आनन्द स्वरूप समझते हुए स्वयं साधक एकाकी होकर चित्त और आत्मा को जीतकर उस ज्ञानमय ब्रह्म का चिन्तन करे कि 'वह ब्रह्म मैं हूँ '(सोऽहम्)। किन्तु मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण इस संसार को स्वप्न से भिन्न वास्तविक मानता है और उसी के अनुसार चलता है। बच्चे जो जो कल्पना करते हैं, वे परम तत्त्व (वास्तविक) नहीं हैं, तब बच्चे और अज्ञानियों में भेद भी कहाँ है? वे दोनों तत्त्वचक्षु से अवधारण नहीं करते हैं। ¹अयं पन्थाः पुराणः स्यादनुप्राप्तः पुरातनः। अध्यात्मविद्भिरर्चितो ज्ञापितः स परः स्मृतः।।15।। ब्रह्मज्ञान का यह प्राचीन मार्ग है, जो परम्परा से परम्परा के द्वारा प्राप्त है। अध्यात्मज्ञानियों ने देवता की अर्चना के द्वारा इसे लोगों को समझाया है, अतः वह परम तत्त्व है। आब्रह्मशुद्धवंश्यानां मातापित्रोः कुले च ये। स्त्रियो वाऽव्यभिचारिण्यः पुरुषाश्चैव धार्मिकाः।।16।। जो ब्रह्म से लेकर शुद्ध वंशवाले कुल में उत्पन्न माता-पिता से उत्पन्न पुरुष हैं तथा पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, वे धार्मिक हैं। यज्ञाश्च वेदाध्ययनमेधेते प्रतिपूरुषम्। पूज्यन्तेऽतिथयो यत्र गुरुशिष्यपरम्परा।।17।। स्वप्नेऽपि चलनं नैव² स्त्रीष्वपि ब्रह्मचारिषु। नियमोऽप्याश्रमस्थेषु कदाचिदपि भामिनि³।।18।। यज्ञ और वेद का अध्ययन ये दोनों प्रति व्यक्ति में वृद्धि प्राप्त करते हैं। जहाँ गुरु-शिष्य की परम्परा और अतिथियों की पूजा होती है। उन आश्रमों में स्थित स्त्रियों और ब्रह्मचारियों के नियमों में स्वप्न में भी विचलन नहीं होता।

  1. क. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध। 2. घ. स्वल्पोऽपि स्खलते नैव। 3. घ. कदाचिन्न विमुच्यते।

द्वितीयोऽध्यायः (9) तत्तत्कालेषु¹ दानं हि तदर्थिभ्यः प्रदीयते। येषु वंशेषु सर्वेषां तेषामेव प्रकाशते।।19।। ब्रह्म ब्रह्मविदा देवि गुरुशिष्योक्तिशिक्षया। हे देवि! गुरु और शिष्य द्वारा किए गये उपदेश से जिन वंशों में विहित अवसरों पर प्रार्थियों को दान किए जाते हैं उन वंशों के ब्रह्मज्ञानी के द्वारा ब्रह्म प्रकाशित होते हैं। अयमेव परं ब्रह्म नान्यत्किञ्चिन्न विद्यते।।20।। इदमेव परं ब्रह्म ततोऽन्यं नास्ति किंचन। तदेतदखिलं ब्रह्म सत्यं सत्यं प्रकाशते।।21।। एक परम ब्रह्म स्वयं है, इससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, यह समग्र ब्रह्माण्ड सत्य स्वरूप है, जो निश्चय ही प्रकाशवान् है। जन्मकोटिसहस्रेषु प्रक्षीणाशेषदुष्कृतैः। कैश्चिदेव नियम्यासूनपरोक्षं निरीक्ष्यते।।22।। सुखामृतरसास्वादसत्यज्ञानैकरूपता । भागाश्रयेण विदुषा स्वयमेवानुभूयते।।23।। अहो पुण्यमहो धर्म्यं नातः परतरं क्वचित्। अकृत्येषु च सर्वेषु प्रायश्चित्तमिदं परम्।।24।। सैकड़ो करोड़ जन्मों की तपस्या से जिन्होंने अपने सभी दुष्कर्म के फलों का नाश कर लिया है, वह कोई कोई प्राणवायु को नियंत्रित कर प्रत्यक्ष रूप में ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं। सुख, अमृत रस का आस्वादन और वास्तविक ज्ञान इन तीनों भेदों को एक रूप में अद्वैत की भावना का आश्रय लेकर विद्वान् स्वयं अनुभव करते हैं। अहो! यह पुण्य है, यह धर्म का फल है, इससे भिन्न कुछ भी नहीं सभी दुष्कर्मों में यही परम प्रायश्चित्त है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमेश्वरस्वरूपाख्यानम् नाम द्वितीयोऽध्यायः।

  1. घ. स्व स्वकालेषु।

(10) अगस्त्य-संहिता अथ तृतीयोऽध्यायः पार्वत्युवाच सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन। सर्वेषां सुगमः१ पन्थाः को मे वद दयानिधे।।1।। पार्वती बोलीं- हे सभी लोकों के स्वामी! सबके दुःखों का निवारण करने वाले हे दयानिधि! मोक्ष पाने के लिए ऐसा उपाय बतलायें, जो सबके लिए आसान हो। ईश्वर उवाच शृणुष्वावहिता देवि यदेतत्प्रतिपाद्यते। सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतहिते रतः।।2।। सर्वेषामुपकाराय साकारोऽभून्निराकृतिः। हे देवि! मैं जो कह रहा हूँ उसे ध्यानपूर्वक सुनो। निराकार प्रभु जो सबके ईश्वर हैं, सभी रूपों में हैं तथा सभी प्राणियों की भलाई में लगे रहते हैं, सबके उपकार के लिए आकार ग्रहण कर अवतार लेते हैं। स भक्तवत्सलो लोके संसारीव व्यचेष्टत।।3।। भक्तानुकम्पया देवो दुःखं सुखमिवान्वभूत्। भक्तवत्सल भगवान् इस संसार में संसारी प्राणी के समान क्रियाएँ करते हैं और भक्त पर अनुकम्पा के कारण वे प्रभु दुःखों को सुख के समान अनुभव करते हैं। यदा यदा च भक्तानां भयमुत्पद्यते तदा।।4।। तत्तद्भक्तस्य चिन्तायै तत्तद्रूपो व्यजायत। जब जब भक्तों पर किसी प्रकार का भय उपस्थित होता है, तब उन उन भक्तों की चिन्ता करते हुए उसी रूप में अवतार लेते हैं। मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थवित्२।।5।। तत्तत्कालेषु संभूय सर्वेषामप्युपाकरोत्। मत्स्य, कूर्म, वराह आदि रूप ग्रहण कर परोपकार करनेवाले वे महाप्रभु उन उन कालों में उत्पन्न होकर सबकी भलाई करते हैं।

  1. घ. निगमः। 2. घ. परमात्मदृक्।