ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ऋग्वेदीय ऐतरेयारण्यकान्तर्गत द्वितीय आरण्यकके अध्याय ४, ५
श्रीहरिः प्रस्तावना ऋग्वेदीय ऐतरेयारण्यकान्तर्गत द्वितीय आरण्यकके अध्याय ४, ५ और ६ का नाम ऐतरेयोपनिषद् है। यह उपनिषद् ब्रह्मविद्याप्रधान है। भगवान् शंकराचार्यने इसके ऊपर जो भाष्य लिखा है वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसके उपोद्घात-भाष्यमें उन्होंने मोक्षके हेतुका निर्णय करते हुए कर्म और कर्मसमुच्चित ज्ञानका निराकरण कर केवल ज्ञानको ही उसका एकमात्र साधन बतलाया है। फिर ज्ञानके अधिकारीका निर्णय किया है और बड़े समारोहके साथ कर्मकाण्डीके अधिकारका निराकरण करते हुए संन्यासीको ही उसका अधिकारी ठहराया है। वहाँ वे कहते हैं कि 'गृहस्थाश्रम' अपने गृहविशेषके परिग्रहका नाम है और यह कामनाओंके रहते हुए ही हो सकता है तथा ज्ञानीमें कामनाओंका सर्वथा अभाव होता है। इसलिये यदि किसी प्रकार चित्तशुद्धि हो जानेसे किसीको गृहस्था- श्रममें ही ज्ञान हो जाय तो भी कामनाशन्य हो जानेसे अपने गृहविशेषके परिग्रहका अभाव हो जानेके कारण उसे स्वतः ही भिक्षुकत्वकी प्राप्ति हो जायगी। आचार्यका मत है कि 'यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति' आदि श्रुतियाँ केवल अज्ञानियोंके लिये हैं; बोधवान्के लिये इस प्रकारकी कोई विधि नहीं की जा सकती। इस प्रकार विद्वान्के लिये पारिव्राज्यको अनिवार्यता दिखलाकर वे जिज्ञासुके लिये भी उसकी अवश्यकर्तव्यताका विधान करते हैं। इसके लिये उन्होंने 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः' 'अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम्' 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः' आदि श्रुति और 'ज्ञात्वा नैष्कर्म्यमाचरेत्' 'ब्रह्माश्रमपदे वसेत्' आदि स्मृतियोंको उद्धृत किया है। ब्रह्मजिज्ञासु ब्रह्मचारीके लिये भी चतुर्थाश्रमका विधान करते हुए आचार्य कहते हैं कि उसके विषयमें
[ २ ] यह शंका नहीं की जा सकती कि उसे ऋणत्रयको निवृत्ति किये बिना संन्यासका अधिकार नहीं है, क्योंकि गृहस्थाश्रमको स्वीकार करनेसे पूर्व तो उसका ऋणी होना ही सम्भव नहीं है। अतः आचार्यका सिद्धान्त है कि जिसे आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा है और जो साध्य-साधनरूप अनित्य संसारसे मुक्त होना चाहता है, वह किसी भी आश्रममें हों उसे, संन्यास ग्रहण करना ही चाहिये। इस सिद्धान्तके मुख्य आधार दो ही हैं—(१) जिज्ञासुको तो इसलिये गृहत्याग करना चाहिये कि उसके लिये गृहस्थाश्रममें रहते हुए ज्ञानोपयोगिनी साधनसम्पत्तिको उपार्जन करना कठिन है और (२) बोधवान्में कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है, इसलिये उसका गृहस्थाश्रममें रहना सम्भव नहीं है। अतः ज्ञानोपयोगिनी साधन- सम्पत्तिको उपार्जन करना तथा कामनाओंका अभाव—ये ही गृहत्यागके मुख्य हेतु हैं। जो लोग घरमें रहते हुए ही शम-दमादि साधनसम्पन्न हो सकते हैं और जिन बोधवानोंकी निष्कामतामें अपने गृहविशेषमें रहना बाधक नहीं होता वे घरमें रहते हुए भी ज्ञानोपार्जन और ज्ञानरक्षा कर ही सकते हैं। वे स्वरूपसे संन्यासी न होनेपर भी वस्तुतः संन्यासधर्मसम्पन्न होनेके कारण आचार्यके मतका ही अनुसरण करनेवाले हैं। अस्तु। इस उपनिषद्में तीन अध्याय हैं। उनमेंसे पहले अध्यायमें तीन खण्ड हैं तथा दूसरे और तीसरे अध्यायोंमें केवल एक-एक खण्ड है। प्रथम अध्यायमें यह बतलाया गया है कि सृष्टिके आरम्भमें केवल एक आत्मा ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। उसने लोक- रचनाके लिये ईक्षण ( विचार ) किया और केवल संकल्पसे ही अम्भ, मरीचि और मर—इन तीन लोकोंकी रचना की। इन्हें रचकर उस परमात्माने उनके लिये लोकपालोंकी रचना करनेका विचार किया और जलसे ही एक पुरुषकी रचनाकर उसे अवयवयुक्त किया। परमात्माके सङ्कल्पसे ही उस विराट् पुरुषके इन्द्रिय, इन्द्रियगोलक और इन्द्रियाधिष्ठाता
[ ३ ]
देव उत्पन्न हो गये। जब वे इन्द्रियाधिष्ठाता देवता इस महासमुद्रमें आये तो परमात्माने उन्हें भूख-प्याससे युक्त कर दिया। तब उन्होंने प्रार्थना की कि हमें कोई ऐसा आयतन प्रदान किया जाय जिसमें स्थित होकर हम अन्न-भक्षण कर सकें। परमात्माने उनके लिये एक गौका शरीर प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने 'यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है' ऐसा कहकर उसे अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात् घोड़ेका शरीर लाया गया किन्तु वह भी अस्वीकृत हुआ। अन्तमें परमात्मा उनके लिये मनुष्यका शरोर लाया। उसे देखकर सभी देवताओंने एकस्वरसे उसका अनु- मोदन किया और वे सब परमात्माकी आज्ञासे उसके भिन्न-भिन्न अवयवों- में वाक्, प्राण, चक्षु आदि रूपसे स्थित हो गये। फिर उनके लिये अन्नकी रचना की गयी। अन्न उन्हें देखकर भगने लगा। देवताओंने उसे वाणी, प्राण, चक्षु एवं श्रोत्रादि भिन्न-भिन्न करणोंसे ग्रहण करना चाहा; परन्तु वे इसमें सफल न हुए। अन्तमें उन्होंने उसे अपानद्वारा ग्रहण कर लिया। इस प्रकार यह सारी सृष्टि हो जानेपर परमात्माने विचार किया कि अब मुझे भी इसमें प्रवेश करना चाहिये, क्योंकि मेरे बिना यह सारा प्रपञ्च अकिञ्चित्कर ही है। अतः वह उस पुरुषकी मूर्द्धसीमाको विदीर्णकर उसके द्वारा उसमें प्रवेश कर गया। इस प्रकार जीवभावको प्राप्त होनेपर उसका भूतोंके साथ तादात्म्य हो जाता है। पीछे जब गुरुकृपासे बोध होनेपर उसे अपने सर्वव्यापक शुद्ध स्वरूपका साक्षात्कार होता है तो उसे 'इदम्'—इस तरह अपरोक्षरूप- से देखनेके कारण उसकी 'इन्द्र' संज्ञा हो जाती है। इस प्रकार ईक्षणसे लेकर परमात्माके प्रवेशपर्यन्त जो सृष्टिक्रम बतलाया गया है, इसे ही विद्यारण्यस्वामीने ईश्वरसृष्टि कहा है। 'ईक्षणादिप्रवेशान्तः संसार ईशकल्पितः'। इस आख्यायिकामें बहुत-सी विचित्र बातें देखी जाती हैं। यों तो मायामें कोई भी बात कुतूहलजनक नहीं हुआ करती; तथापि आचार्यका तो कथन है कि यह केवल अर्थवाद है। इसका अभिप्राय आत्मबोध करानेमें है। यह केवल आत्माके अद्वितीयत्व-
का ही संकल्प होनेके कारण आत्मस्वरूप ही है। द्वितीय अध्यायके
[ ४ ] का बोध करानेके लिये ही कही गयी है, क्योंकि समस्त संसार आत्मा- का ही संकल्प होनेके कारण आत्मस्वरूप ही है। द्वितीय अध्यायके आरम्भमें इसी प्रकार उपक्रम कर भगवान् भाष्यकारने आत्मतत्त्वका बड़ा सुन्दर और युक्तियुक्त विवेचन किया है। इस अध्यायमें आत्मज्ञानके हेतुभूत वैराग्यकी सिद्धिके लिये जीवकी तीन अवस्थाओंका—जिन्हें प्रथम अध्यायमें 'आवसथ' नामसे कहा है— वर्णन किया गया है। जीवके तीन जन्म माने गये हैं—(१) वीर्य- रूपसे माताकी कुक्षिमें प्रवेश करना, (२) बालकरूपसे उत्पन्न होना और (३) पिताका मृत्युको प्राप्त होकर पुनः जन्म ग्रहण करना। 'आत्मा वै पुत्र नामासि' (कौषी० २। ११) इस श्रुतिके अनुसार पिता और पुत्रका अभेद है; इसीलिये पिताके पुनर्जन्मको भी पुत्रका तृतीय जन्म बतलाया गया है। वामदेव ऋषिने गर्भमें रहते हुए ही अपने बहुत-से जन्मोंका अनुभव बतलाया था और यह कहा था कि मैं लोहमय दुर्गोंके समान सैकड़ों शरीरोंमें बंदी रह चुका हूँ, किन्तु अब आत्मज्ञान हो जानेसे मैं श्येन पक्षीके समान उनका भेदन कर बाहर निकल आया हूँ। ऐसा ज्ञान होनेके कारण ही वामदेव ऋषि देहपातके अनन्तर अमरपदको प्राप्त हो गये थे। अतः आत्माको भूत एवं इन्द्रिय आदि अनात्मप्रपञ्चसे सर्वथा असंग अनुभव करना ही अमरत्व-प्राप्तिका एकमात्र साधन है। इस प्रकार द्वितीय अध्यायमें आत्मज्ञानको परमपद-प्राप्तिका एक- मात्र साधन बतलाकर तीसरे अध्यायमें उसीका प्रतिपादन किया गया है। वहाँ बतलाया है कि हृदय, मन, संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति, स्मृति, संकल्प, क्रतु, असु, काम एवं वश ये सब प्रज्ञानके ही नाम हैं। यह प्रज्ञान ही ब्रह्मा, इन्द्र, प्रजापति, समस्त देवगण, पञ्चमहाभूत तथा उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज आदि सब प्रकारके जीव-जन्तु है। यही हाथी, घोड़े, मनुष्य तथा सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् है। इस प्रकार यह सारा संसार प्रज्ञानमें
प्रथम अध्यायमें देवताओंके आयतन याचना करनेपर उन्हें क्रमशः गौ
[ ५ ] स्थित है, प्रज्ञानसे ही प्रेरित होनेवाला है और स्वयं भी प्रज्ञानस्वरूप ही है, तथा प्रज्ञान ही ब्रह्म है। जो इस प्रकार जानता है वह इस लोकसे उत्क्रमण कर उस परमधाममें पहुँच समस्त कामनाओंको प्राप्तकर अमर हो जाता है। यही इस उपनिषद्का सारांश है। इसका प्रधान उद्देश्य ब्रह्मका सर्वात्म्य-प्रतिपादन ही है। आदिसे अन्ततक इसका यही उद्देश्य रहा है। प्रथम अध्यायमें देवताओंके आयतन याचना करनेपर उन्हें क्रमशः गौ और अश्वके शरीर दिखलाये गये; परन्तु उन्हें वे अपने अनुरूप प्रतीत न हुए। उसके पश्चात् मनुष्य-शरीर दिखलाया गया। उसे देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उसे ही अपने आयतनरूपसे स्वीकार भी किया। देवताओंकी उत्पत्ति विराट् शरीरके अवयवोंसे हुई थी; अतः विराट्के अनुरूप होनेके कारण उन्हें मानव-शरीर ही आयतनरूपसे ग्राह्य हुआ। इससे यही सिद्ध होता है कि मानव-शरीर ही जीवके परमकल्याण- का आश्रय है; उसमें स्थित होनेपर ही वह परमपद प्राप्त कर सकता है। अकारणकरुणामय श्रीभगवान्की कृपासे हमें वह परमलाभ प्राप्त करनेका सौभाग्य हुआ है, अतः हमें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि यह अत्यन्त दुर्लभ सुअवसर निष्फल न हो जाय। अनुवादक
प्रथम अध्याय
श्रीहरिः विषय-सूची
[बायाँ स्तम्भ] विषय पृष्ठ १. शान्तिपाठ ... १ प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड २. सम्बन्धभाष्य ... २ ३. आत्माके ईक्षणपूर्वक सृष्टि २४ ४. सृष्टिक्रम ... २७ ५. पुरुषरूप लोकपालकी रचना ३० ६. इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओंकी उत्पत्ति ... ... ३१ द्वितीय खण्ड ७. देवताओंकी अन्न एवं आयतनयाचना ... ३४ ८. गो और अश्वशरीरकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा उनकी अस्वीकृति ... ... ३६ ९. मनुष्यशरीरकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा उसकी स्वीकृति ३७ १०. देवताओंका अपने-अपने आयतनमें प्रवेश ... ३८ ११. क्षुधा और पिपासाका विभाग ३९ तृतीय खण्ड १२. अन्नरचनाका विचार ४२ १३. अन्नकी रचना ४३
[दायाँ स्तम्भ] विषय पृष्ठ १४. अन्नका पलायन और उसके ग्रहणका उद्योग ... ४३ १५. अपानद्वारा अन्नग्रहण ... ४६ १६. परमात्माका शरीरप्रवेशसम्बन्धी विचार ... ४७ १७. परमात्माका मूर्द्धद्वारसे शरीरप्रवेश ... ५० १८. जीवका मोह और उसकी निवृत्ति ... ५३ १९. 'इन्द्र' शब्दकी व्युत्पत्ति ... ५४ द्वितीय अध्याय प्रथम खण्ड २०. प्रस्तावना ... ५६ २१. पुरुषका पहला जन्म ... ७१ २२. पुरुषका दूसरा जन्म ... ७४ २३. पुरुषका तीसरा जन्म ... ७७ २४. वामदेवकी उक्ति ... ७९ २५. वामदेवकी गति ... ८० तृतीय अध्याय प्रथम खण्ड २६. आत्मसम्बन्धी प्रश्न ... ८२ २७. प्रज्ञानसंज्ञक मनके अनेक नाम ८५ २८. प्रज्ञानकी सर्वरूपता ... ८९ २९. आत्मैक्यवेत्ताकी अमृतत्व- प्राप्ति ... ... ९३ ३०. शान्तिपाठ ... ९४
मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः ऐतरेयोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित मनस्तापतमःशान्त्यै यस्य पादनखच्छटा । शरच्चन्द्रनिभा भाति तं वन्दे नीलचिन्मणिम् ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरा- वीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीते- नाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मेरी वागिन्द्रिय मनमें स्थित हो और मन वाणीमें स्थित हो [ अर्थात् मेरी वागिन्द्रिय और मन एक-दूसरेके अनुकूल रहें ] । हे स्वप्रकाश परमात्मन् ! तुम मेरे समक्ष आविर्भूत होओ । [ हे वाक् और मन ! ] तुम मेरे प्रति वेदको लाओ । मेरा श्रवण किया हुआ मेरा परित्याग न करे । अपने इस अध्ययनके द्वारा मैं रात और दिनको एक कर दूँ [ अर्थात् मेरा अध्ययन अहर्निश चलता रहे ]। मैं ऋत (वाचिक सत्य) का भाषण करूँ और सत्य ( मनमें निश्चय किया हुआ सत्य ) बोलूँ । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे; वह वक्ताकी रक्षा करे । वह मेरी रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे—वक्ताकी रक्षा करे । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।
प्रथम अध्याय
प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड सम्बन्धभाष्य परिसमाप्तं कर्म सहापरब्रह्म- | यहाँतक अपरब्रह्म (हिरण्यगर्भ) [ग्रन्थस्य] विषयविज्ञानेन । सैषा | विषयक विज्ञान (उपासना) के [प्रयोजनम्] कर्मणो ज्ञानसहितस्य | सहित कर्मका निरूपण समाप्त परा गतिरुक्थविज्ञानद्वारेणोप- | हुआ * । उस ज्ञानसहित कर्मकी संहृता । “एतत्सत्यं ब्रह्म प्राणा- | परा गतिका उक्थविज्ञानके† द्वारा ख्यम्” “एष एको देवः” | उपसंहार किया गया है। [ उस “एतस्यैव प्राणस्य सर्वे देवा | उपसंहारका मूलके वाक्योंद्वारा विभूतयः” “एतस्य प्राणस्या- | प्रदर्शन कराते हैं—] “यह प्राण- त्मभावं गच्छन्देवत। अप्येति” | संज्ञक सत्यब्रह्म है” “यह एक देव इत्युक्तम् । सोऽयं देवताप्पय- | है” “सम्पूर्ण देव इस प्राणकी ही लक्षणः परः पुरुषार्थः, एष | विभूतियाँ हैं।” “इस प्राणके मोक्षः । स चायं यथोक्तेन | तादात्म्यको प्राप्त होकर उपासक | देवतामें लीन हो जाता है”—ऐसा | कहा गया। यह देवतामें लय होना | ही परम पुरुषार्थ है, यही मोक्ष है | और वह यह (देवतालयस्वरूप मोक्ष)
- ऐतरेय ब्राह्मणान्तर्गत द्वितीय आरण्यकके अध्याय ४, ५ और ६ का नाम ऐतरेयोपनिषद् है। इसमें केवल ब्रह्मविद्याका ही निरूपण किया गया है। इससे पूर्ववर्ती अध्यायोंमें अपर ब्रह्मकी उपासनाके सहित कर्मका वर्णन है। अतः इस वाक्यसे यहाँ उसका परामर्श किया है। † उक्थ प्राणको कहते हैं। अतः ‘वह उक्थ यानी प्राण मैं हूँ’ ऐसी दृढ भावनाके द्वारा उसीमें लय हो जाना ‘उक्थविज्ञान’ है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३
ज्ञानकर्मसमुच्चयसाधनेन प्राप्तव्यो | इस ज्ञानकर्मसमुच्चयरूप [पूर्वोक्त] साधनसे नातः परमस्तीत्येके प्रतिपन्नाः । | ही प्राप्त होने योग्य है; इससे परे तन्निराचिकीर्षुरुत्तरं केवलात्म- | और कुछ नहीं है—ऐसा कुछ ज्ञानविधानार्थम् 'आत्मा वा | लोग समझते हैं। उन [ समुच्चय- इदम' इत्याद्याह । | वादियोंके मत ] का निराकरण करने- | की इच्छासे श्रुति केवल आत्म- | विज्ञानका विधान करनेके लिये | 'आत्मा वा इदम्' इत्यादि ग्रन्थका | उल्लेख करती है। कथं पुनरकर्मसंबन्धिकेवला- | पूर्व०—परन्तु यह कैसे ज्ञात होता [प्रतिपाद्य-विचारः] त्मविज्ञानविधानार्थ | है कि आगेका ग्रन्थ कर्मके सम्बन्ध- उत्तरो ग्रन्थ इति | से रहित केवल आत्मज्ञानका ही गम्यते ? | विधान करनेके लिये है ? अन्यार्थानवगमात् । तथा च | सिद्धान्ती—क्योंकि इससे [ ब्रह्म- पूर्वोक्तानां देवतानामग्न्यादीनां | ज्ञानके सिवा ] किसी और अर्थका संसारित्वं दर्शयिष्यत्यशनाया- | ज्ञान नहीं होता। इसके सिवा श्रुति दिदोषवत्त्वेन "तमशनापिपा- | "उसे भूख और पिपासासे युक्त कर साभ्यामन्ववार्जत्" (१।२।१) | दिया" इत्यादि वाक्योंसे उन अग्नि इत्यादिना । अशनायादिमत्सर्वं | आदि पूर्वोक्त देवताओंको क्षुधा आदि संसार एव; परस्य तु ब्रह्मणो- | दोषोंसे युक्त दिखलाते हुए उनका ऽशनायाद्यत्ययश्रुतेः । | संसारित्व भी प्रदर्शित करेगी । पर- | ब्रह्म भूख-प्यास आदिसे अतीत है— | ऐसी श्रुति होनेके कारण क्षुधा | आदिसे युक्त तो सब-का-सब संसार | ही है। भवत्वेवं केवलात्मज्ञानं मोक्ष- | पूर्व०—इस प्रकार केवल आत्मज्ञान [समुच्चयवादिन आक्षेपः] साधनं न त्वत्रा- | ही मोक्षका साधन भले ही हो, परन्तु कर्म्येणाधिक्रियते, | उसमें केवल कर्मत्यागी पुरुषका ही | अधिकार नहीं है, क्योंकि इस
४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ विशेषाश्रवणात्। अकर्मिण आश्र- | विषयमें कोई विशेष श्रुति नहीं है; | अर्थात् किसी कर्मत्यागी आश्रमान्तर- म्यन्तरस्येहाश्रवणात् । कर्म च | का यहाँ उल्लेख नहीं है । | और बृहतीसहस्र नामक कर्मकी बृहतीसहस्रलक्षणं प्रस्तुत्यानन्तर- | अवतारणाकर उसके अनन्तर ही मेवात्मज्ञानं प्रारभ्यते । तस्मात् | आत्मज्ञानका प्रारम्भ कर दिया है । | अतः इसमें कर्मठ पुरुषका ही कर्म्येवाधिक्रियते । | अधिकार है । न च कर्मासंबन्ध्यात्मविज्ञानं | इसके सिवा आत्मज्ञान कर्मसे पूर्ववदन्त उपसंहारात् । यथा | सर्वथा असम्बद्ध भी नहीं है, क्योंकि | यहाँ भी अन्तमें उसका पहले- कर्मसंबन्धिनः पुरुषस्य सूर्यात्मनः | हीके समान उपसंहार किया गया स्थावरजङ्गमादिसर्वप्राण्यात्मत्व- | है । जिस प्रकार ब्राह्मणमन्त्रने | "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च¹" इस मुक्तं ब्राह्मणेन मन्त्रेण च "सूर्य | वाक्यद्वारा सूर्यके आत्मभावको प्राप्त आत्मा" (ऋ०सं० १।११५।१) | हुए [ सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती ] कर्म- | सम्बन्धी पुरुषको स्थावरजंगमादि इत्यादिना, तथैव 'एष ब्रह्मैष | सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा बतलाया है इन्द्रः' ( ३।१।३) इत्या- | उसी प्रकार श्रुति 'एष ब्रह्मैष इन्द्रः²' | इत्यादि मन्त्रसे समस्त प्राणियोंके द्युपक्रम्य सर्वप्राण्यात्मत्वम् | आत्मस्वरूपत्वका उपक्रम कर उसका 'यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्' | 'यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्³' (३।१।३) इत्युपसंहरिष्यति । | इत्यादि वाक्यद्वारा उपसंहार करेगी। *
१. सूर्य जङ्गम और स्थावरका आत्मा है । २. यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है । ३. जो कुछ स्थावर-जङ्गम है सब प्रज्ञा ( चेतन ) द्वारा प्रवृत्त होनेवाला है ।
- इस प्रकार जैसे पूर्व अध्यायमें कर्मसम्बन्धी उपासनाका विषय होनेसे
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 तथा च संहितोपनिषदि | इसी प्रकार संहितोपनिषद्में भी “एतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे | “इसीको बह्वृच (ऋग्वेदी) बृहती- मीमांसन्ते” ( ऐ० आ० ३।२। | सहस्र नामक सत्रमें विचारते हैं” | इत्यादि श्रुतिसे उसका कर्मसम्बन्धित्व ३।१२) इत्यादिना कर्मसंबन्धि- | प्रतिपादन कर “सम्पूर्ण भूतोंमें त्वमुक्त्वा “सर्वेषु भूतेष्वेवमेव | इसीको ‘ब्रह्म’ ऐसा कहते हैं” इस ब्रह्मेत्याचक्षते” इत्युपसंहरति । | प्रकार उपसंहार किया है । तथा | “जो यह अशरीरी चेतन आत्मा तथा तस्यैव “योऽयमशरीरः | है” इस प्रकार बतलाये हुए उस | आत्माका ही “जो यह सूर्यके प्रज्ञात्मा” इत्युक्तस्य “यश्चासा- | अन्तर्गत है वह एक ही है—ऐसा वादित्य एकमेव तदिति विद्यात्” | जाने” इस वाक्यद्वारा एकत्व प्रति- इत्येकत्वमुक्तम् । इहापि “कोऽय- | पादन किया है । तथा यहाँ (इस | उपनिषद्में) भी “यह आत्मा कौन मात्मा” (३।१।१) इत्युपक्रम्य | है” इस प्रकार उपक्रम कर “प्रज्ञान प्रज्ञात्मत्वमेव “प्रज्ञानं ब्रह्म” (३। | ब्रह्म है” इस वाक्यसे इसका प्रज्ञा- | स्वरूपत्व ही प्रदर्शित करेंगे । अतः १।३) इति दर्शयिष्यति । तस्मा- | आत्मज्ञान कर्मत्यागसे संबन्ध नहीं न्नाकर्मसंबन्ध्यात्मज्ञानम् । | रखता । पुनरुक्त्यानर्थक्यमिति चेत् । | यदि कहो कि पुनरुक्ति होनेके | कारण तो यह प्रकरण व्यर्थ ही है;* कथम् ? “प्राणो वा अहमस्म्यृषे” | किस प्रकार [व्यर्थ है सो बतलाते हैं—] | “हे ऋषे ! मैं निश्चय प्राण ही हूँ” इत्यादिब्राह्मणेन “सूर्य आत्मा” | इत्यादि ब्राह्मणसे तथा “सूर्य आत्मा है” ──────────────────────────────────────────────────────── अन्तमें उपास्यका सर्वात्मत्व प्रतिपादन किया है उसी प्रकार इस अध्यायमें ‘एष ब्रह्मा’ इत्यादि वाक्योंसे बतलाया गया है । अतः जिस प्रकार वह देवता ज्ञानकर्मसम्बन्धी था उसी प्रकार यह आत्मज्ञान भी कर्मसम्बन्धी ही है—ऐसा अनुमान होता है ।
- क्योंकि कर्मका तो पहले ही निरूपण किया जा चुका है ।
६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ इति मन्त्रेण च निर्धारितस्यात्मन इत्यादि मन्त्रद्वारा निश्चित किये आत्माका “यह आत्मा कौन है” "आत्मा वा इदम्" इत्यादि- इस प्रकार प्रश्न करके “[पहले] ब्राह्मणेन “कोऽयमात्मा" (३।१। यह सब आत्मा ही [था]” इस प्रकार निश्चय करना पुनरुक्ति १) इति प्रश्नपूर्वकं पुनर्निर्धारणं और निरर्थक ही है—यदि कोई ऐसा पुनरुक्तमनर्थकमिति चेत्, न; कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि उसीके किसी अन्य तस्यैव धर्मान्तरविशेषनिर्धार- विशेष धर्मका निश्चय करनेके लिये णार्थत्वान्न पुनरुक्ततादोषः । होनेसे इसमें पुनरुक्तिका दोष नहीं है। कथम् ? तस्यैव कर्मसंबन्धिनो वह किस प्रकार दोषयुक्त नहीं है [सो बतलाते हैं-] उस कर्मसम्बन्धी जगत्सृष्टिस्थितिसंहारादिधर्मवि- आत्माके ही जगत्की रचना, पालन और संहार आदि विशेष धर्मोंका शेषनिर्धारणार्थत्वात् केवलोपा- निर्धारण करनेके लिये किंवा केवल उसकी उपासनाके [निरूपणके] लिये [ इस प्रकारकी पुनरुक्ति सदोष स्त्यर्थत्वाद्वा । अथवा आत्मे- नहीं है ] । अथवा यों समझो कि त्यादिपरो ग्रन्थसन्दर्भ आत्मनः कर्मका निरूपण करते समय विधान न करनेके कारण कर्मी आत्माकी कर्मिणः कर्मणोऽन्यत्रोपासना- उपासना कर्मको छोड़कर प्राप्त नहीं होती थी; अतः “आत्मा वा प्राप्तौ कर्मप्रस्तावेऽविहितत्वात्के- इदमग्रे” आदि ग्रन्थसमूह यह बतलानेके लिये ही है कि केवल वलोऽप्यात्मोपास्य इत्येवमर्थः । आत्मा भी उपासनीय है । भेद और अभेदरूपसे उपास्य होनेके कारण भेदाभेदोपास्यत्वाद्बैक एवात्मा एक ही आत्मा कर्मके विषयमें
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७
कर्मविषये भेददृष्टिभाक्, स एवा- | भेददृष्टिसे युक्त है और वही कर्म- कर्मकालेऽभेदेनाप्युपास्य इत्येव- | दृष्टिको छोड़ देनेके समय अभेद- मपुनरुक्तता । | रूपसे भी उपासनीय है—इस प्रकार | यह अपुनरुक्ति ही है । “विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदो- | “जो पुरुष विद्या ( उपासना ) भयꣳ सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा | और अविद्या ( कर्म ) इन दोनोंको | साथ-साथ जानता है वह अविद्यासे विद्ययामृतमश्नुते” ( ई० उ० ११) | मृत्युको पार करके विद्यासे अमरत्व इति, “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजी- | प्राप्त कर लेता है” तथा “इस | लोकमें कर्म करता हुआ ही सौ विषेच्छतꣳ समाः” ( ई० उ० २) | वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे” | —ऐसा [ ईशोपनिषद्में ] वाजसनेयी इति च वाजिनाम् । न च वर्ष- | शाखावालोंका कथन है । मनुष्योंकी शतात्परमायुर्मर्त्यानाम् । येन | परमायु भी सौ वर्षसे अधिक नहीं | है, जिससे कि वह कर्मपरित्याग- कर्मपरित्यागेनात्मानमुपासीत । | द्वारा आत्माकी उपासना कर सके। दर्शितं च “तावन्ति पुरुषा- | “पुरुषकी आयुके इतने ( छत्तीस ) युषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति” | ही* सहस्र दिन होते हैं” ऐसा | [ इस ऐतरेयारण्यकमें ही ] दिख- इति । वर्षशतं चायुः कर्मणैव | लाया भी गया है । और वह सौ व्याप्तम् । दर्शितश्च मन्त्रः “कुर्व- | वर्षकी आयु कर्मसे ही व्याप्त है; | इसके लिये “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” न्नेवेह कर्माणि” इत्यादिः । | इत्यादि मन्त्र पहले दिखलाया ही है।†
- ऐतरेय आरण्यकमें छत्तीस-छत्तीस अक्षरके एक सहस्र बृहतीछन्द हैं। अतः उसमें कुल छत्तीस सहस्र अक्षर हुए। इतने ही दिन मनुष्यकी परमायुमें होते हैं। † इससे यह नहीं समझना चाहिये कि दशरथादिके समान जो सौ वर्षसे भी अधिक जीवित रहनेवाले पुरुष हैं वे तो सौ वर्षसे ऊपर जाने- पर कर्मत्याग कर ही सकते हैं । उनके लिये भी आगेकी श्रुतियाँ जीवनपर्यन्त कर्मानुष्ठानकी आवश्यकता बतलाती हैं ।
८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ तथा “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहो- | ऐसा ही “यावज्जीवन अग्निहोत्र ति” “यावज्जीवं दर्शपूर्णमासा- | करता है” “जीवनपर्यन्त दर्श- भ्यां यजेत” इत्याद्याश्च । “तं | पूर्णमाससे यजन करे” इत्यादि यज्ञपात्रैर्दहन्ति” इति च । | तथा [ वृद्धावस्था में भी कर्मत्यागका ऋणत्रयश्रुतेश्च । तत्र पारिव्रा- | निषेध सूचित करनेवाली ] “उस- ज्यादि शास्त्रं “व्युत्थायाथ | को [ मरनेके अनन्तर ] यज्ञपात्रोंके भिक्षाचर्यं चरन्ति” ( बृ० उ० | सहित जलाते हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे ३।५।१, ४।४।२२) इति | और ऋणत्रयकी सूचना देनेवाली आत्मज्ञानस्तुतिपरोऽर्थवादः । | श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । श्रुतिमें अनधिकृतार्थो वा । | जो “[ यतिजन ] सर्वसंग परित्याग | करके भिक्षाटन किया करते हैं” | इत्यादि संन्याससम्बन्धी शास्त्र है | यह आत्मज्ञानकी स्तुति करनेवाला | अर्थवाद है । अथवा जिसे कर्मका | अधिकार नहीं है उसके लिये है । न; परमार्थविज्ञाने फलादर्शने | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक · आक्षेपनिरासः क्रियानुपपत्तेः। य- | नहीं, क्योंकि उस परमार्थ—आत्म- दुक्तं कर्मिण आत्म- | तत्त्वका ज्ञान हो जानेपर क्रियाका ज्ञानं कर्मसंबन्धि च | कोई फल नहीं देखा जाता; इसलिये इत्यादि, तन्न । परं ह्याप्तकामं | क्रिया नहीं हो सकती । तुमने सर्वसंसारदोषवर्जितं ब्रह्माहम- | जो कहा कि आत्मज्ञान कर्मीको ही स्मीत्यात्मत्वेन विज्ञाते, कृतेन | होता है और वह कर्मसे सम्बन्ध कर्तव्येन वा प्रयोजनमात्मनो- | रखनेवाला है, सो ठीक नहीं । | 'सम्पूर्ण सांसारिक दोषोंसे रहित | पूर्णकाम ब्रह्म मैं हूँ' इस प्रकार ब्रह्मका | आत्मभावसे ज्ञान हो जानेपर कर्म- | फलको न देखनेके कारण कृत | अथवा कर्तव्यसे अपना कोई प्रयोजन
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ऽपश्यतः फलादर्शने क्रिया नोप- | न देखनेवाले पुरुषसे कोई क्रिया पद्यते । | नहीं हो सकती । फलादर्शनेऽपि नियुक्तत्वा- | यदि कहो कि फल दिखायी न आत्मदर्शिनो त्करोतीति चेन्न, | देनेपर भी शास्त्राज्ञा होनेके कारण नियोगाविषयत्वम् नियोगाविषयात्म- | वह कर्म करता ही है तो ऐसा दर्शनात् । इष्टयोगमनिष्टवियोगं | कहना उचित नहीं, क्योंकि वह चात्मनः प्रयोजनं पश्यंस्तदुपा- | शास्त्राज्ञाके अविषयभूत आत्माका यार्थी यो भवति स नियोगस्य | दर्शन कर लेता है। जो पुरुष अपना विषयो दृष्टो लोके । न तु त- | इष्टप्राप्ति और अनिष्टपरिहाररूप द्विपरीतनियोगाविषयब्रह्मात्मत्व- | प्रयोजन देखकर उसके उपायका दर्शी । | अर्थी होता है, लोकमें वही [ विधि- ब्रह्मात्मत्वदर्श्यपि संश्चेन्नि- | निषेधरूप ] नियोगका विषय होता युज्येत नियोगाविषयोऽपि सन्न | देखा गया है; उसके विपरीत कश्चिन्न नियुक्त इति सर्वं कर्म | नियोगके अविषयभूत ब्रह्ममें आत्मत्व- सर्वेण सर्वदा कर्तव्यं प्राप्नोति । | का दर्शन करनेवाला पुरुष नियोग- तच्चानिष्टम् । न च स नियोक्तुं | का विषय होता नहीं देखा जाता । शक्यते केनचित् ; आम्ना- | यदि ब्रह्मात्मत्व-दर्शन करनेवाला यस्यापि तत्प्रभवत्वात् । न हि | पुरुष नियोगका अविषय होनेपर | भी शास्त्रसे नियुक्त हो तो कोई | नियुक्त न होनेवाला तो रहा ही | नहीं । इससे यही प्राप्त होता है कि | सबको सर्वदा सम्पूर्ण कर्म करते | रहना चाहिये । किन्तु यह अभीष्ट | नहीं है । वह ( आत्मदर्शी ) तो | किसीसे भी नियोजित नहीं हो | सकता, क्योंकि शास्त्र भी उसीसे | उत्पन्न हुआ है । अपने विज्ञानसे
१० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
१० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ स्वविज्ञानोत्थेन वचसा स्वयं | उत्पन्न हुए वचनसे ही कोई स्वयं नियुज्यते । नापि बहुवित्स्वा- | नियुक्त नहीं हो सकता और न म्यविवेकिना भृत्येन । | बहुज्ञ स्वामी ही अपने अल्पज्ञ सेवक- | से नियुक्त हो सकता है । आम्नायस्य नित्यत्वे सति | यदि कहो कि नित्य होनेके स्वातन्त्र्यात्सर्वान्प्रति नियोक्तृत्व- | कारण वेदका नियोक्तृत्व-सामर्थ्य सामर्थ्यमिति चेन्न उक्तदोषात् । | स्वतन्त्रतापूर्वक सबके प्रति है; तो तथापि सर्वेण सर्वदा सर्वमविशिष्टं | उपर्युक्त दोषके कारण ऐसा कहना कर्म कर्तव्यमित्युक्तो दोषोऽप्य- | ठीक नहीं । ऐसी अवस्थामें भी परिहार्य एव । | 'सबको सब कर्म अविशेषरूपसे | करने चाहिये'—यह ऊपर बतलाया | हुआ दोष अपरिहार्य ही रहता है। तदपि शास्त्रेणैव विधीयत | यदि कहो कि उसका विधान शास्त्रस्य विरुद्धार्थ- इति चेद् यथा कर्म- | भी शास्त्रने ही किया है अर्थात् बोधकत्वानुपपत्तिः कर्तव्यता शास्त्रेण | जिस प्रकार शास्त्रने कर्मकी कृता तथा तदप्यात्मज्ञानं तस्यैव | कर्तव्यता बतलायी है उसी प्रकार कर्मणः शास्त्रेण विधीयत इति | उस कर्मीके लिये ही उस आत्मज्ञान- चेत्, न; विरुद्धार्थबोधकत्वा- | का भी शास्त्रने ही विधान किया है नुपपत्तेः । न ह्येकस्मिन्कृताकृत- | तो ऐसा कहना भी उचित नहीं, संबन्धित्वं तद्विपरीतत्वं च | क्योंकि उसका विरुद्ध-अर्थ-बोधकत्व बोधयितुं शक्यम्, शीतोष्ण- | सम्भव नहीं है । अग्निकी शीतलता तामिवाग्नेः । | और उष्णताके समान एक ही | शास्त्रमें पाप-पुण्यके सम्बन्धित्व और | उसके विपरीतत्वका बोध कराना— | [ये दोनों विरुद्धधर्म] सम्भव | नहीं हैं।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
न चेष्टयोगचिकीर्षा आत्म- | इसके सिवा अपनी इष्टवस्तुके [सिद्धवस्तुनः] नोऽनिष्टवियोगचि- | संयोगकी इच्छा तथा अनिष्ट पदार्थके [शास्त्रबोध्यत्वम्] कीर्षा च शास्त्रकृता, | परित्यागकी अभिलाषा भी शास्त्र- सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । शास्त्र- | जनित नहीं है, क्योंकि यह सभी कृतं चेत्तदुभयं गोपालादीनां न | प्राणियोंमें [ स्वभावसे ही ] देखी दृश्येत, अशास्त्रज्ञत्वात्तेषाम् । | जाती है । यदि शास्त्रजनित होतीं यद्धि स्वतोऽप्राप्तं तच्छास्त्रेण | तो ये दोनों इच्छाएँ ग्वाले आदिमें बोधयितव्यम् । तच्चेत्कृतकर्तव्य- | दिखायी न देतीं; क्योंकि वे अशास्त्रज्ञ ताविरोध्यात्मज्ञानं शास्त्रेण | होते हैं । जो वस्तु स्वतः प्राप्त नहीं कृतम्, कथं तद्विरुद्धां कर्तव्यतां | होती वही शास्त्रद्वारा बोद्धव्य होती पुनरुत्पादयेच्छीततामिवाग्नौ तम | है । इस प्रकार यदि शास्त्रने कृत इव च भानौ । | और कर्तव्यताके विरोधी आत्मज्ञान- | का उपदेश किया है तो फिर वह | अग्निमें शीतलताके समान तथा | सूर्यमें अन्धकारके समान उसकी | विरुद्ध कर्तव्यताको किस प्रकार | उत्पन्न करेगा ? न बोधयत्येवेति चेन्न, "स | यदि कहो कि वह ऐसा बोध म आत्मेति विद्यात्" (कौ० उ० | कराता ही नहीं है तो ऐसा कथन ३।९)"प्रज्ञानं ब्रह्म"(३।१।३) | भी ठीक नहीं, क्योंकि "वह मेरा इति चोपसंहारात् । "तदात्मा- | आत्मा है-ऐसा जाने" तथा "प्रज्ञान नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४। | ही ब्रह्म है" इस प्रकार उपसंहार ९) "तत्त्वमसि" (छा० उ० | किया गया है, तथा "उस (जीव- ६। ८-१६) इत्येवमादिवा- | रूपसे अवस्थित ब्रह्म) ने अपनेको क्यानां तत्परत्वात् । उत्पन्नस्य | ही जाना" "वह तू ही है" | इत्यादि वाक्य भी आत्मज्ञानपरक | ही हैं । उत्पन्न हुआ ब्रह्मात्मविज्ञान
१२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
च ब्रह्मात्मविज्ञानस्याबाध्यमान- | भी बाधित होने योग्य न होनेके त्वान्नानुत्पन्नं भ्रान्तं वेति शक्यं | कारण अनुत्पन्न या भ्रान्तिजनित वक्तुम् । | नहीं कहा जा सकता । त्यागेऽपि प्रयोजनाभावस्य | यदि कहो कि “उसे इस लोकमें [प्रयोजनाभावे] तुल्यत्वमिति चेत् | अकृत ( कर्मत्याग ) से भी कोई [संन्यासस्य] “नाकृतेनेह कश्चन” | प्रयोजन नहीं है” इस स्मृतिके [स्वतःसिद्धत्वम्] (गीता ३ । १८) | अनुसार बोधवान्को त्याग करनेमें | भी प्रयोजनाभावकी समानता ही इति स्मृतेः, य आहुर्विदित्वा | है; अर्थात् जो लोग कहते हैं कि ब्रह्म व्युत्थानमेव कुर्यादिति | ब्रह्मको जानकर व्युत्थान ( कर्म- | त्याग ) ही करना चाहिये उनके तेषामप्येष समानो दोषः प्रयो- | लिये भी यह प्रयोजनाभावरूप दोष जनाभाव इति चेन्न; अक्रिया- | समान ही है, तो उनका यह कथन | ठीक नहीं क्योंकि व्युत्थान तो मात्रत्वाद् व्युत्थानस्य । अविद्या- | अक्रिया ही है * । प्रयोजनका निमित्तो हि प्रयोजनस्य भावो न | भाव तो अविद्याके कारण रहता है। वस्तुधर्मः सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । | वह वस्तुका धर्म नहीं है क्योंकि | यह बात सभी प्राणियोंमें देखी प्रयोजनतृष्णया च प्रेर्यमाणस्य | जाती है; अर्थात् प्रयोजनकी तृष्णा- वाङ्मनःकायैः प्रवृत्तिदर्शनात् । | से प्रेरित होते हुए प्राणियोंकी वाणी “सोऽकामयत जाया मे स्यात्” | मन और शरीरद्वारा प्रवृत्ति होतो देखी (बृ० उ० १ । ४ । १७) | गयी है तथा वाजसनेयी ब्राह्मणमें | भी “उस ( आदिपुरुष ) ने इच्छा इत्यादिना पुत्रवित्तादि पाङ्क्त- | की कि मेरे पत्नी हो” इत्यादि कथनके लक्षणं काम्यमेवेति “उभे ह्येते | द्वारा “ये दोनों (साध्य-साधनरूप)
- प्रयोजन तो क्रियाके लिये अपेक्षित होता है; इसलिये अक्रियारूप व्युत्थानके लिये किसी प्रयोजनकी अपेक्षा नहीं है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
एषणे एव" (बृ० उ० ३।५।१; | एषणाएँ ही हैं" इस निश्चयके अनुसार ४।४।२२) इति वाजसनेयि- | यही ज्ञात होता है कि पुत्र-वित्तादि ब्राह्मणेऽवधारणात् । | पाङ्कलक्षण* कर्म काम्य ही है। अविद्याकामदोषनिमित्ताया | अतः विद्वान्के अविद्या आदि दोषोंका अभाव हो जानेके कारण वाङ्मनःकायप्रवृत्तेः पाङ्कलक्ष- | अविद्या एवं कामनारूप दोषसे णाया विदुषोऽविद्यादिदोषाभा- | होनेवाली मन, वाणी और शरीरकी पाङ्क्तरूपा प्रवृत्ति उपपन्न नहीं वादनुपपत्तेः क्रियाभावमात्रं | है; इसलिये व्युत्थान क्रिया- का अभावमात्र है, वह यागादि- व्युत्थानम्, न तु यागादिवदनु- | के समान अनुष्ठेयरूप और भावा- ष्ठेयरूपं भावात्मकम् । तच्च | त्मक नहीं है। वह तो विद्यावान् पुरुषका धर्म ही है; अतः उसके विद्यावत्पुरुषधर्म इति न प्रयो- | लिये किसी प्रयोजनका अन्वेषण करनेकी आवश्यकता नहीं है। जनमन्वेष्टव्यम् । न हि तमसि | अन्धकारमें प्रवृत्त होनेवाला पुरुष यदि प्रकाशके उदित होनेपर गड्ढे, प्रवृत्तस्योदित आलोके यद्गर्त- | कीचड़ और काँटे आदिमें नहीं पङ्ककण्टकाद्यपतनं तत्किंप्रयो- | गिरता तो 'इस (उसके न गिरने) का क्या प्रयोजन है?' ऐसा प्रश्न जनमिति प्रहार्हम् । | नहीं किया जा सकता । व्युत्थानं तर्ह्यर्थप्राप्तत्वान्न | तब तो स्वभावतः प्राप्त होनेके कामाभावे चोदनार्हमिति गा- | कारण व्युत्थान चोदना (विधिवाक्य) आत्मज्ञस्यापि र्हस्थ्ये चेत्परं ब्रह्म- | का विषय नहीं है। इसपर यदि गार्हस्यानुपपत्तिः विज्ञानं जातं तन्नै- | कहो कि यदि किसीको गृहस्थाश्रममें ही परब्रह्मका ज्ञान हो जाय तो उसे
- पंक्ति छन्द पाँच अक्षरका होता है। उससे सदृशता होनेके कारण जिस कर्ममें पत्नी, पुत्र, दैववित्त, मानुषवित्त और कर्म इन पाँच साधनोंका योग होता है वह पांक्त कर्म कहलाता है।
१४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
१४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ वास्तवकुर्वत आसनं न ततोऽन्यत्र | उस आश्रममें ही कुछ न करते हुए | बैठा रहना चाहिये, वहाँसे कहीं गमनमिति चेन्न, कामप्रयुक्तत्वा- | अन्यत्र नहीं जाना चाहिये, तो द्गार्हस्थ्यस्य; "एतावान्वै कामः" | ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि | "इतनी ही कामना है" "ये दोनों (बृ० उ० १।४।१७) इति "उभे | एषणाएँ ही हैं" इत्यादि वाक्योंसे ह्येते एषणे एव" (बृ० उ० ३।५। | निश्चित किया जानेके कारण | गृहस्थाश्रम तो कामनासे ही प्रयुक्त १; ४।४। २२) इत्यवधार- | है। कामनाके निमित्तभूत पुत्र- णात् । कामनिमित्तपुत्रवित्तादि- | वित्तादिके सम्बन्धके नियमका संबन्धनियमाभावमात्रं न हि | अभावमात्र ही 'व्युत्थान' है; | उनके पाससे कहीं अन्यत्र चला ततोऽन्यत्र गमनं व्युत्थान- | जाना 'व्युत्थान' नहीं कहा जाता । मुच्यते । अतो न गार्हस्थ्य एवा- | अतः जिसे ज्ञान उत्पन्न हुआ है | उसके लिये कुछ न करते हुए कुर्वत आसनमुत्पन्नविद्यस्य । | गृहस्थाश्रममें ही स्थित रहना सम्भव एतेन गुरुशुश्रूषातपसोरप्यप्रति- | नहीं है । इससे विद्वान्के लिये | गुरुशुश्रूषा और तपस्याकी भी पत्तिर्विदुषः सिद्धा । | अनुपपत्ति सिद्ध होती है । अत्र केचिद् गृहस्था भिक्षा- | इस विषयमें कोई-कोई गृहस्थ टनादिभयात्परिभ- | पुरुष भिक्षाटनादिके भय और .गृहस्थानामाक्षेपः | वाच्च त्रस्यमानाः | तिरस्कारसे डरनेके कारण अपनी | सूक्ष्मदर्शिता प्रकट करते हुए उत्तर सूक्ष्मदृष्टितां दर्शयन्त उत्तरमाहुः। | देते हैं- 'केवल देहधारणमात्रके भिक्षोरपि भिक्षाटनादिनियम- | इच्छुक भिक्षुके लिये भी भिक्षाटनादि- दर्शनाद्देहधारणमात्रार्थिनो गृह- | का नियम देखा जाता है; अतः