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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

आल्हाका बिवाह । १५५ . ३६ उतरिकै पलकी ते सुनवाँफिरि महलन तुरत पहुंचीजाय १४९ मुहँ दिखलाई रानी मल्हना गलको दीन नौलखाहार ॥ पायँ लागेकै सुनवाँ तहँपर करको कंकण दीन उतार १५० बाजन बाजे चौगिर्दा ते घर घर भये मंगलाचार ॥ फिरि परिमालिक की ड्योढ़ीमाँ पहुंचे सबै शूर सरदार १५१ राजा पूँछें मलखाने ते ओ बिरमा के राजकुमार ॥ अमरढोल रहे नयपाली के कैसे किह्यो तहाँपर मार १५२ इतना सुनिकै मलखे बोले तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥ दया तुम्हारी जापर होवै ताकीबिजयहोयसबकाल १५३ हृदय लगायो सब कुँवरन को सबको कीन बड़ा सतकार ॥ जीतिके डंका बाजन लागे नौबति झौरै रजा के द्वार १५४ सौ सौ तोपें दर्गी सलामी चकरन पाई खूब इनाम ॥ पिता हमारे किरपाशंकर कीन्हेनिसबैद्विजनकेकाम १५५ माथ नवाबों पितु अपने को जिनबल पूरिकीन यह गाथ ॥ मोर सहायी जग एकै हैं स्वामी अवधनाथ रघुनाथ १५६ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ सुखसों जीवो तुम दुनियामें दिनदिनहोउधनीअधिकाय १५७ रहे समुन्दर में जबलों जल जबलौं रहें चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौंतुम यशसों रहौ सदाभरपूर १५८ इति श्रीलखनऊ निवासि ( सी, आई, ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसाद कृत आल्हापाणिग्रहणवर्णनोनाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥ नैनागढ़आल्हाबिवाहसम्पूर्ण इति ॥

४० आल्हखण्ड । १५६

राखौ गति अद्भुत दर्शानी २ ॥ निशि दिन पापकर्मरत प्राणी सत्यासत्य भुलानी ॥ हत्यालाख धरत शिर ऊपर मोह बेदना ठानी ॥ १ ॥ नाती पूत शोच बश परकर आतमज्ञान हिरानी ॥ अहं अहं डहकत दरवाजे देखत नारि बिरानी ॥ २ ॥ अभिमानी नित देखत आंखिन मरतजात बहुप्रानी ॥ तवहूं तनक चेत मननाहीं रटै रामगुणखानी ॥ ३ ॥ हटै अकाल सुकाल बढ़ै जग नाशाय रोग निशानी ॥ सो नहिं होनहार हम देखत होयँ बहुतनरज्ञानी ॥४॥ अभिमानी लाखन हम देखत ज्ञानी दशहु न जानी ॥ होत प्रपंच साधु सन्तनमें पंचन नाहिं ठिकानी ॥ ५ ॥ तजि दुर्गा अर्चन नर पामर गति मुर्गाकी आनी ॥ लैहँड़िपुत्र पौत्र उपजावत अनशिक्षित अभिमानी॥६॥ तेइ मर्य्याद धर्मकी नाशत भाषत झूठ गुमानी ॥ मात पिताको मूरख कहिकै देवत कष्ट महानी ॥ ७ ॥ यह कलियुगकी देखि बड़ाई कहत ललित यहबानी ॥ राघौ राम और रघुनन्दन इन बन्दन दुखहानी ॥ ८ ॥ चलो मन जहाँ बसैं रघुराज । चलो मन जहाँ बसैं रघुराज ॥ यहि दुनिया में कौन हमारो हम क्याहिके क्याहिकाज ॥ देखत जो कछु रहत न सो कछु ढहत काल शिरताज ॥ १ ॥ गहत कौनके रहत कौन नर सोइ कहत हम आज ॥ रघुनन्दन जगवन्दन ज्यहि सुत त्यहि शिरपर दुखभ्राज ॥ २ ॥ सेयो यशोदा नन्द कृष्णको सोऊ न आये काज ॥ वैरिनि त्रिपाति सबहिं शिरऊपर देखिलेहु महराज ॥ ३ ॥ जो मन फैसे जगत के अन्दर बन्दरसम बिनलाज ॥ द्वारद्वार नट तिन्है नचावत ललित पेट के काज ॥ ४ ॥

अथ आल्हखण्ड ॥ मलखानका बिवाह अथवा पथरी- गढ़की लड़ाई ॥ सवैया ॥ ध्यावत तोहिं सदा हनुमान यही बरदान मिलै मोहिं स्वामी । हाथ लिये धनुबान कृपान मिलैं भगवान जे अन्तरयामी ॥ टारे टरैं न कबों उरते तिन राम नमामि नमामि नमामि । जान यही ललिते बरदान सुनो हनुमान सदा सुखधामी १ सुमिरन ॥ तुलसी हुलसी अब दुनिया में झुलसी सकल नरनकीकावि ॥ घर घर पोथी रामायण की दर दर फिरैं बगल में दाबि १ गिरिगिरि चन्दन नहिं होवैंकहुँ बन बन नहीं रहैं गजराज ॥ नारि पतिव्रत नाहिं घर घर हैं थल थल नहीं होयँ कविराज २ ग्राहक होवैं नहिं दुनिया में तब गुण जावैं सबै हिराय ॥

२ आल्हाखण्ड । १५८ भोजन खावै हरिको ध्यावै साँचो ग्राहक दीन बताय ३ नाहक जग में कोउ पछतावै भावै नहीं दूसरो काज ॥ देही आपनि गलि गलि जावै आवै फेरि जगत में लाज ४ छूटि सुमिरनी गै ह्वाँते अब शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ ब्याह बखानों मलखाने का लड़िहैं बड़े बड़े सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ यहु गजराजा पथरीगढ़ को ज्याहिको भरी लाग दरबार ॥ बैठक बैठे सब छत्री हैं एकते एक शूर सरदार १ सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में महलन नाचिरहे कहुँ मोर ॥ बैठि कबूतर कहुँ घुटकत हैं तीतर बोलिरहे कहुँ जोर २ घोड़ अगिनिया त्यहि राजाके साजा सबै विधाता काज ॥ है गजमोतिनि त्यहिकी बेटी विद्या रूप शील शिरताज ३ सो नित खेलै सँग सखियन में मेलै सदा गले में हाथ ॥ सेमा भगतिनि की चेली है गुटवा ख्यलै सखिन के साथ ४ खेलत खेलत कछु सखियों ने कीन्ही तहाँ ब्याह की बात ॥ कोउकोउ सखियाँ तहँ ब्याहीथीं जानैं भलो श्वशुरपुर नात ५ ब्याही बोलैं अनब्याहिन सों सखियो सुनो हमारी बात ॥ सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुख मिलै श्वशुरपुरंरात ६ सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी तहँ अनब्यहीमनै अकुलायँ ॥ फिरिफिरिपूँछैं तिन सखियनसों कासुखश्वशुरपुरैअधिकाय ७ बतियाँ घतियाँ जे बालम की छतियाँ छुवैं और अठिलायँ ॥ रतियाँ केरी सब बतियाँ को सखियाँ कहैं और हरपायँ ८ सुरपुर हरपुर हरिपुर नाहीं जो सुखश्वशुरपुरै अधिकाय ॥ सुनि सुनि बातें ये ब्याहिनकी मनमाँ गई बात ये छाय ६

मलखानका बिवाह । १५६ ३ सब अनब्याही ब्याकुल ह्वैकै घरका चलीं मनै पछिताय ॥ गै गजमोतिनि निज महलनमें सोई समय रातिको पाय १० जागे रोवन् शय्या लागी माता लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥ काहे रोवत तुम बेटीहौ हमको हालदेउ बतलाय ११ दीख्यो सपना मैं माता है ब्याहे लिये कोऊ घरजाय ॥ मैं सुधि कीन्ह्यों तहँ बप्पाकी माता रोय उठिउँ अकुलाय १२ सुनिकै बातें ये बेटी की चंपा गोद लीन बैठाय ॥ चूम्यो चाट्यो गले लगायो बातनदियो ताहि बहलाय १३ अवसर पायो जब रानी ने राजा पास पहुंची जाय ॥ बेटी लायक है ब्याहन के टीका देउ आप पठवाय १४ समया आयो अब कलियुगका औ युगधर्म रहा दर्शाय ॥ बातें सुनिकै ये रानी की राजा नेगी लीन बुलाय १५ सूरज बेटा को बुलवायो तासों हाल कह्यो समुझाय ॥ दिल्ली कनउज चहु तहँ जायो जायो जहँ न चँदेलौराय १६ तीन लाख को टीका लैके सूरज कूच दीन करवाय ॥ आठ रोज की मैजलि करिकै पहुँच्च्यो जहाँ पिथौराँराय १७ को गति बरणै तहँ दिल्ली कै जहँपर रहै कौरवनराज ॥ जहँपर गर्जत दुर्योधनरहै जहँपर अये कृष्णमहराज १८ भीषम ऐसे जहँ योधा थे द्रोणाचार्य ऐस द्विजराज ॥ तहँपर गरजे शिरीकृष्णजी जयजयनमोनमो ब्रजराज १९ जब सुधि आवत है दिल्ली कै तब मन आय जात ब्रजराज ॥ सदा पियारे हैं विप्रन के अबहूं देत खानको नाज २० तहँपर पहुँचे सूरज ठाकुर चिट्ठी तुरत दीन पकराय ॥ आँक आँक सब पृथ्वी बांचा जो कुछ लिखा बिसेनेराय २१

४ आल्हखण्ड । १६० ब्याह बिसेने के करिवे ना टीका तुरत दीन लौटाय ॥ सूरज चलिभे तहँ दिल्ली ते • कनउज फेरि पहुंचे आय २२ हैं कनौजिया जहाँ बाम्हन बहु बड़ बड़ महल परैं दिखराय ॥ वेद पुराणन की चर्चा तहँ घरघरअधिक२ अधिकाय २३ सूरज पहुँचे जब ड्योढ़ी में बोला द्वारपाल शिरनाय ॥ कौने राजाके लड़िकाहौ राजै खबरि देयँ पहुँचाय २४ बातें सुनिकै द्वारपाल की सूरज हाल दीन समुझाय ॥ द्वारपाल सुनि गा राजा ढिग तुरतै खबरि सुनाई जाय २५ सुनिकै बातें दरवानी की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ द्वारपाल सूरज ढिग आयो लैके सभा पहुँचा जाय २६ चिट्ठी दीन्ह्यो तहँ सूरज ने जयचँद पढ़ा बहुत मनलाय ॥ क्यहिका लड़का घरभारू है पथरीगढ़ै बियाहन जाय २७ घोड़ अगिनिया जिनकेघरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥ तुरतै टीकाको लौटारयो यहु महराज कनौजीराय २८ चलिभे सूरज तहँ कनउजे ते ठरई फेरि पहुंचे आय ॥ पांचकोस मोहबे के आगे मारै हिरन उदयसिंहराय २६ सूरज ऊदन यकमिल हैगे दूनों कीन्ह्यो रामजुहार ॥ ऊदन पूछैं तहँ सूरज ते ठाकुर पथरी के सरदार ३० टीको ऐसो का लै गमन्यो नेगी संग तुम्हारे चार ॥ सूरज बोलो तब ऊदन ते ठाकुर बेंदुलके असवार ३१ निकरे हनवन हम गङ्गा के साँचे हाल दीन बतलाय ॥ काह शिकारै तुम आयो है अकसर बनै उदयसिंहराय ३२ सुनिकै बातें ये सूरज की बोला तुरत बनाफरराय ॥ कियो बहाना तुम सूरज है नेगी संग लियेहौ भाय ३३

मलखानका विवाह । १६१ ५ हनवन केरी यह सामा ना झूंठी बात रह्यो बतलाय ॥ सूरज बोले फिरि ऊदन ते सांची सुनो बनाफरराय ३४ टीका लाये हम बहिनी का दिल्ली कनउज आये मँझाय ॥ टीका लीन्ह्यो क्यहु क्षत्री ना जावैं लौटि बनाफरराय ३५ इतना सुनिकै ऊदन बोले हमपर शारद भई सहाय ॥ दादा कोर मलखाने हैं टीका लिहे चलो तुम भाय ३६ सुफल तुम्हारी मेहनत होई हमरो काज सिद्ध है जाय ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की सूरज बोला बचन रिसाय ३७ नहीं आज्ञा महराजा की टीका नग्र मोहोबे जाय ॥ जाति बनाफर की हीनी है कीरति रही जगत में छाय ३८ सुनिकै बातें ये सूरज की बोला उदयसिंह सरदार ॥ नीके जैहौ तौ लैजैहौं नहिं यह देखिलेउ तलवार ३६ सुनिकै बातें ये ऊदन की नाई बारी उठे डेराय ॥ ते समुझावैं भल सूरजको मानो कही बिसेनेराय ४० रारि न करियो तुम ऊदनते नामी देशराज को लाल ॥ पाँच कोस मोहबा है बाकी जहँ पर बसैं रजापरिमाल ४१ सुनि सुनि बातें सबनेगिनकी सूरज मनै गयो तसआय ॥ नेगिन लैके सूरज ऊदन पहुँचे जहाँ चँदेलोराय ४२ सजी कचहरी परिमालिक की भारी लाग राज दरबार ॥ ब्रह्मा आल्हा मलखे देबा सय्यद बनरसका सरदार ४३ देखिकै सूरजको परिमालिक बोले मधुर वचन मुसुकाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ४४ सुनिकै बातें परिमालिककी सूरज यथातथ्य गे गाय ॥ हाल जानिकै सब चंदेलो बोला सुनो बनाफरराय ४५ ११

६ • आल्हाखण्ड । १६२ टीका आयो पथरीगढ़का ताको तुरत देउ लौटाय ॥ ब्याह बिसेने घर करिबे ना मानों कही उदयसिंहराय ४६ घोड़ अगिनियाँ तिनके घरमाँ ज्यहिके मारे फौज बिलाय ॥ सुनिकै बातें परिमालिक की बोले तुरत बनाफरराय ४७ दतिया मारि उरैछोमारो पहुँचे सेतुबंध लों जाय ॥ पेशावर मुल्तान कमायूं बूंदी थहर थहर थहराय ४८ अटक पारलों झंडा गड़िगो औ मेवात लीन लुटवाय ॥ गर्व न राखा क्यहु क्षत्री का मानो कही चंदेलोराय ४६ गिनती किनमें बिसियानन की ठाढ़े तखत देउँ उलटाय ॥ हीनी मुखसों तुम भाषतहौ मेरो रजपूती धर्म नशाय ५० मलखे ब्याहनको रैहैं ना यहु दिन कहिबेको रहिजाय ॥ टीका लौटी ना मोहबे ते राजा सत्य दीन बतलाय ५१ बोला चंदेला तब देबा ते अब तुम शकुन विचारो भाय ॥ कैसी गुजरी पथरीगढ़ में सो सब हाल देउ बतलाय ५२ सुनिकै बातें परिमालिककी देबा पोथी लीन उठाय ॥ शकुन सोचिकै देबा बोला साँची कहौं चंदेलोराय ५३ जीति तुम्हारी है पथरीगढ़ काहू बार न बाँको जाय ॥ आजु कि साइति भल नीकीहै टीका अबै देउ चढ़वाय ५४ सुनिकै बातें ये देबाकी महलन खबरिदीन पहुँचाय ॥ गा हरिकारा दशहरिपुरखा द्यावलि बिरमा लवालवाय ५५ आँगन लीपागा गोबर सों मोतिन चौक दीन पुरवाय ॥ चूड़ामणि पण्डित फिरिआये तुरतै सूरज लये बुलाये ५६ चारो नेगी सँग में लैके सूरज महल पहुँचे आय ॥ चरण लागिकै मलखाने के बीरा मुखमें दीन खवाय ५७

मलखानका बिवाह । १६३ ७

सखियाँ गावन मंगल लागीं नेगिन झगर मचावा आय ॥ सोने चाँदी के गहना को सूरज सबै दीन पहिराय ५८ ऊदन पहुँचे निज कमरामें डिब्बा लाये तुरत उठाय ॥ खूब पहिरावा सब नेगिन को चारों खुशीभये अधिकाय ५६ बचा बचावा जो गहना रहे नेगिन स्वऊ दीन पकराय ॥ औरो नेगी जो पथरीगढ़ तिनको यहौ दिह्यो पहिराय ६० ऊदन बोले फिरि नेगिनसे तुम गजराज दिह्यो समुझाय ॥ माघ शुक्ल तेरसि की साइति होई ब्याह तहांपर आय ६१ हाथ जोरिकै सूरज बोले आज्ञा देउ चंदेलोराय ॥ हम चलिजावें पथरीगढ़ को राजै खबरि सुनावैं जाय ६२ बातें सुनिकै ये सूरज की राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ राम जुहार तुरत फिरिकरिकै सूरज कूच दीन करवाय ६३ सौ सौ तोपैं दगीं सलामी पठवन चले लहुरवाभाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि ऊदनसों अपने नेगी संगलिवाय ६४ सूरज चलिभे पथरीगढ़को माहिल कथा कहौं अब गाय ॥ कहुँ सुधिपाई माहिल ठाकुर टीका चढ़ा मोहोबे जाय ६५ लिल्हीघोड़ी को मँगवायो तापर तुरत भयो असवार ॥ सूरजतेनी आगे पहुँचा ठाकुर उरई का सरदार ६६ सजी कचहरी गजराजा की भारी लाग राज दरबार ॥ झारि बिसेने सब बैठे हैं टिहुननधरे नाँगि तलवार ६७ माहिल पहुँचे त्यहि समया में राजै कीन्ह्यो राम जुहार ॥ बड़ी खातिरी राजै कीन्ह्यो बैठा उरई का सरदार ६८ राजा बोले फिरि माहिलते नीके रहे खूब तुम भाय ॥ माहिल बोले फिरि राजाते भइ अनहोनी कहींनाजाय ६६

८ आल्हाखण्ड । १६४ बेटी तुम्हरी गजमोतिनि का टीका चढ़ा मोहोबे जाय ॥ जाति बनाफर की हीनी है जानौं भलीभांति तुमभाय ७० पानी पीहै को घर तुम्हरे आपन धर्म गँवैहै आय ॥ अबै न बिगरा कछु राजा है साँचे हाल दीन बतलाय ७१ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा गयो सनाकाखाय ॥ तबलों सूरज अटा कचहरी राजै शीश नवायो आय ७२ राजा बोल्यो फिरि सूरजते टीका कहाँ चढ़ायो जाय ॥ दोउ कर जोरे सूरज बोले दादा सत्य देउँ बतलाय ७३ दिल्लीकनउज हम फिरि आयन टीका क्यहुन लीन महिपाल ॥ मोहबे उरई के अन्दर में मिलिगे देशराज के लाल ७४ लै बरजोरी गे मोहबे को टीका चढ़ा वीर मलखान ॥ जो कछु रारिकरत मोहबे में दादा जात प्रान पर आन ७५ माघ शुक्ल तेरसिको अइहैं यह सच साइतिका परमान ॥ मारब ब्याहब जो कछु कहिहौं उतनै घनै भई है हान ७६ जितना टीका में दै आये लाये आपन प्राण बचाय ॥ साम दाम अरु दण्ड भेद सों कीन्हे काज तहांपर जाय ७७ सुनिकै बातें ये सूरज की राजै पास लीन बैठाय ॥ फिरि शिरसूंघ्यो गजराजा ने लीन्ह्यो तुरतै गले लगाय ७८ राजा बोल्यो फिरि माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ ब्याहन अइहैं जब हमरे घर तबहीं चली तुरत तलवार ७६ ब्याह न होई गजमोतिनि का तुमते साँच दीन बतलाय ॥ बिदा मांगिकै फिरि राजासों माहिल चले बड़ा सुखपाय ८० माघ महीना आवन लाग्यो धावन लगे मोहोबे दूत ॥ लिखिलिखिचिट्ठी परिमालिकने न्यवतन हेत पठावा दूत ८१

मलखानका विवाह। १६५ ६ दिल्ली कनउज औ नैनागढ़ उरई न्यवत दीन पठवाय ॥ सिरउज पनउज औ बौरी में न्यवता भेजा चँदेलोराय ८२ पायके चिट्ठी परिमालिककै इनको मानि बड़ो ब्यवहार ॥ नगर मोहोबे के जानेको राजा होन लागि तय्यार ८३ बाजे डंका अहर्तका के राजन कूचदीन करवाय ॥ तेरस केरो शुभ मुहूर्त पढ़ मोहबे गये सबै नृप आय ८४ तम्बू गड़िगे महराजन के खातिर कीन उदयसिंहराय ॥ पढ़े पढ़ाये सब क्षत्री रहें अपने धर्म कर्म समुदाय ८५ उचित औ अनुचितके ज्ञातारहें जानैं राजनीति सब भाय ॥ देश आरिया यह बाजत है आर्य कहै बसिंदा जायँ ८६ आर्य ऊदन त्यहि समया में सबको खुशी कीन अधिकाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो तासों कह्यो हाल समुझाय ८७ बाजे डंका अब मोहवे माँ सबियाँ फौज होय तय्यार ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की डंका भजनलाग त्यहिबार ८८ मलखे आये फिरि महलन में होवन लाग तेल त्योहार ॥ एक कुमारी तेल चढ़ावै गावैं सबै मंगलाचार ८६ माय मन्तरा भे दूसरे दिन नहखुर समयगयो फिरिआय ॥ लैके महाउर नाइनि आई नहखुर करन लागि हर्षाय ६० जो कछु माँग्यो ज्यहि नेगी ने मल्हना दीन ताहिसमुझाय ॥ मनके भाय जब सब पाये नेगिन खुशी कहीनाजाय ६१ कुँवाँ बियाहन के समया में मलखे चढ़ पालकी धाय ॥ बिटिया मल्हना की चन्द्रावाले राई नोन उनारति जाय ६२ जायकै पहुंचे फिरि कुँवनापर बिरमा पैर दीन लटकाय ॥ भाँवरि घूम्यो मलखाने ने लीन्ह्यो माता पैर उठाय ६३

[Header] १० आल्हखण्ड । १६६


बहू लय आवौं त्वरि सेवा को | माता बाग दिह्यौ लगवायं ॥ ऐसा कहिकै मलखाने ने | भाँवरि घुमी सातहू धाय ९४ पाँय लागिकै फिरि मल्हनाके | द्यावलि चरणनशीशनवाय ॥ चरणन लाग्यो जब बिरमा के | मातालीन्ह्यो हृदय लगाय ९५ पंजा फेस्यो फिरि मल्हना ने | तुम्हरो बार न बाँका जाय ॥ बैठि पालकी मलखाने गे | मनमें श्रीगणेशकोध्याय ९६ बाजन बाजे फिरि मोहबे माँ | हाहाकारी शब्द सुनाय ॥ हाथी सजिगा पचशब्दा तहँ | आल्हा चढ़े रामकोध्याय ९७ हरनागर की फिरि पीठी माँ | ब्रह्मा फाँदि भये असवार ॥ बीरशाह बौरी का राजा | रूपन सिर्रउज का सरदार ९८ देवकुँवरि रानी के बालक | पनउज केरे मदन गुपाल ॥ ये सब क्षत्री चढ़ि घोड़नपर | औरौ सजे बहुत नरपाल ९६ घोड़ मनोहर देवा बैठे | सय्यद सिर्गापर असवार ॥ सजा बेंदुला का चढ़वैया | जो दिनरात करै तलवार १०० घोड़ी कबूतरी मलखाने की | कोतल तुरत भई तय्यार ॥ लख्खा गर्रा पँचकल्यानी | हरियलमुश्की घोड़अपार १०१ सुर्खा सब्जा सिर्गा मुँरगा | ताजी तुरकी रंग बिरंग ॥ कच्छी मच्छी काबुल वाले | तिनकीकसीगईफिरि तंग १०२ डारि रकाबै गंगा यमुनी | मुखमें दीन लगाम लगाय ॥ परीं हयकलें सब घोड़न के | मेंहदी बूटा रहे बनाय १०३ नवल बछेड़ा सब साजेगे | एकते एक रूप अधिकाय ॥ हथी महावत हाथी लै कै | तिनपर हौदादये धराय १०४ हाथी सजिगे जब मोहबे में | तोपै सबै भई तय्यार ॥ पहिल नगाड़ामें जिनबन्दी | दूसरे फाँदिभये असवार १०५

मलखानका बिवाह । १६७ १३ तिमर नगाड़ाके बाजत खन क्षत्रिन कूच दीन करवाय ॥ बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर समुदाय १०६ मारु मारुकै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बाचले पवनकी चाल १०७ लक्ष पताका यकमिल हैगे नभमाँ गई लालरी छाय ॥ धूरि उड़ानी हय टापन सों बाबा सूरज गये छिपाय १०८ ब्याकुल हैकै पक्षी भागे जंगल जीव गये थर्राय ॥ चलीं बरातें मलखाने की हमरे बूत कहीं ना जाय १०६ सात रोजकी मैजलि करिकै पहुँचे तुरत धुरेपर आय ॥ तम्बू गड़िगे महराजन के झंडा सरग फरहरा खायँ ११० सजिगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी लाग खूब दरबार ॥ चूड़ामणि पण्डित तहँ आयौ साइति लाग्योकरनबिचार १११ साइति नीकी अब आई है ऐपनवारी देउ पठाय ॥ हाथ जोरिकै रूपन बोला नेगी कौन तहाँ को जाय ११२ हम नहिं जैहैं पथरी गढ़को सांची सुनो बनाफरराय ॥ बातें सुनिकै ये रूपन की बोलातुरत ललुरवा भाय ११३ घोड़ी कबूतरी दादावाली रूपन चढ़ो ताहिपर जाय ॥ बानाराखे रजपूती का कैसे बने जनाना भाय ११४ सवैया ॥ प्राण न प्यार करें रणशूर कहैं ललिते हम सत्य विचारी । सोनकोधारि झमा झमकारि सो जातसदा पियसेजमें नारी ॥ पाय निशा चमकै तहँ नारि सो रारिकिये चमकै तलवारी । शेरिकिये यश शूरने होत सो कूरनकी अपकीरति भारी १६५

१२ आल्हखण्ड । १६८ सुनिकै बातें ये ऊदनकी रूपन बहुतगयो शर्म्याय ॥ घोड़ी कबुतरी पर चढ़ि बैठ्यो ऐपनवारी लीन उठाय ११६ माथ नायकै सब क्षत्रिन को मनियादेव हृदय सों ध्याय ॥ चारिघरी के फिरि अरसा माँ फाटक ऊपर पहूँचा आय ११७ हुकुम दर्ररै हुकुम दर्ररै साहेबजादे बात बनाय ॥ कहाँते आये औ कहँ जैहै आपन काम देय बतलाय ११८ सुनिकै बातें दरबानी की बोला घोड़ी का असवार ॥ नगर मोहोबा जगमें जाहिर नामी मोहबे के सरदार ११९ ब्याहन मलखे को आयन हैं मानो साची कही हमार ॥ ऐपनवारी बारी लायो बोलो ठाढ़ो राज दुवार १२० नेग आपने को झगरत है भारी नेग चहै कछुदार ॥ नेग आपनो का तुमचाहौ बोलो घोड़ी के असवार १२१ घोड़ी जोड़ी लैके जाई डांड़े परे तासु भर्त्तार ॥ बोलु गवाँरे अब ऐसे ना द्वारे चहौं चलै तलवार १२२ सुनिकै बातें ये रूपन की चक्रुत द्वारपाल भा द्वार ॥ फिरि २ देखै दिशि रूपन के फिरि २ लावै शोच बिचार १२३ ऐसो बारी हम देखा ना जैसो आयो आज दुवार ॥ सोचि समुझिकै फिरिसो बोला बोलो घोड़े के असवार १२४ गरमी तुम्हरी अब कछु उतरी बोलो नेग काह तुम द्वार ॥ चार घरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्त की धार १२५ नेग हमारो यह साँचा है याँचा द्वार तुम्हारे आय ॥ जौन शूरमा हो पथरीगढ़ हमरो नेग देय चुकवाय १२६ ऐसे वैसे हम बारी ना मारी सदा शूर दश पांच ॥ खबरि सुनावै तू राजा का तेरी निकरिपरै कस कांच १२७

मलखानका विवाह । १६९ १३ सुनिकै बातें ये रूपन की पहुँचा द्वारपाल दरबार ॥ झारि बिसेने सब बैठे हैं एकते एक शूर सरदार १२८ हाथ जोरि औ बिनती करिकै बोला द्वारपाल शिरनाय ॥ ऐपनावारी बारी लायो भारी नेग चहै ह्याँ आय १२९ चार पहरभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ नेग आपनो बारी बोलै लीन्हे हाथ ढाल तलवार १३० सुनिकै बातें द्वारपाल की तब गजराजा उठा रिसाय ॥ बाँधिकै मुशकें त्यहि बारी की सूरज मोहिं दिखावै आय १३१ इतना सुनिकै मानसिंह तहँ द्वारे तुरत पहुँचा आय ॥ सेल चलायो त्यहि रूपनापर रूपनालीन्ह्यो वारबचाय १३२ मार्यो लटुवा फिरि भालाको शिरते चली खूनकी धार ॥ ऐँड़ा मसक्यो फिरि घोड़ी के फाटकनिकरिगयोवहिपार१३३ बहुतक दौरे फिरि पाछे सों धरु धरु मारु करें लतकार ॥ घोड़ी कबुतरी मलखेवाली नामी मोहबेका सरदार १३४ त्यहिके बलसों रूपन बारी बहुतन मारि मिलायो खार ॥ जायकै पहुँचा फिरि तम्बुन में भारी लाग जहाँ दरबार १३५. दीख्यो ऊदन तहँ रूपन का मानों फगुई का त्यवहार ॥ कैसी गुजरी रहै द्वारेपर बोले उदयसिंह सरदार १३६ सुनिकै बातें ये ऊदन की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाको आय१३७ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ परे आलसी खटिया.तकितकि घों घों कण्ठ रहा घर्राय १३८ करौं बन्दना गणनायक की दोनों चरणकमल शिरनाय ॥ शीश नवावों पितु अपने को मनमें सदा रामपदध्याय १३६

१४ आल्हाखण्ड । १७० करौं तरंग यहाँ सों पूरण तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ को यशगावै शिवशंकर को जिनको वेद न पावैं अन्त १४० इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागना- Rayanjiकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपूँदरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखानविवाहविषय वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ सवैया ॥ दीननके मन मीनन को मेघवा है वरषत हौ नितवारी। होय भिखारि चहौ नरनारि किये प्रभुआश सदा सुखकारी ॥ दीन पुकार विभीषणकी सुनि आप हर्यो विपदासबहारी ॥ कौन सो दीन रहा शरणागत जो न भयो ललिते हितकारी १ सुमिरन ॥ धन्य बखानों मैं नारद को कीन्ह्यो बड़ा जगत उपकार ॥ शिक्षा देते नहिं दुष्टन को तौ कस धरत राम अवतार १ जो रघुनन्दन जग होते ना तौ यहचरित करत को भाय ॥ 'काह बखानत तुलसी कलियुग कैसे जात जगत यशछाय २ कृष्ण न होते जो द्वापर में कैसे सूर जात भवपार ॥ कोधों मारत शिशुपालै को कोधों करत कंस सों रार ३ कैसे अर्जुन भारत जीतत कैसे करत युधिष्ठिर राज ॥ कौन सो दुनिया में ऐसो भो जैसे भये कृष्ण महराज ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै - शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ माहिल अइहैं उरई वाले जहँ गजराज केर दरबार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ गा जब रूपन बनि द्वारे पर माहिल आयगयो ततकाल ॥

मलखानका बिवाह । १७१ १५ आदर करिकै बड़ माहिल का बोले मधुर बचन नरपाल १ ऐपनवारी बारी लायो कीन्ह्यो कठिन द्वार तलवार ॥ कैसे मरिहैं मोहबे वाले बोलो उरई के सरदार २ सुनिकै बातें ये राजा की माहिल बोले बचन उदार ॥ ज्यहि की नीकी बेटी ब्याखैं ऊदन गाँसैं तासु दुवार ३ मिर्चवान ब्याहे की पठवो तामें जहर देव मिलवाय ॥ बिना बयारी जूना टूटै औ बिन औषध हटै बलाय ४ बातें सुनिकै ये माहिल की राजा मनै फूलिगा भाय ॥ जहर घुरायो त्यहिं शर्बत माँ सूरज पुत्र दीन पठवाय ५ दिय जनवासा फिरि पथरीगढ़ पाछे शर्बत दीन पठाय ॥ आदर करिकै सूरज ठाकुर चाँदी आबखोर मँगवाय ६ लै अबखोरा भरि त्यहि शर्बत आल्हा पास पहुंचा जाय ॥ जब अबखोरा आल्हा लीन्ह्यों सम्मुख भई छींक तब आय ७ ऊदन बोले तब देवा ते अब तुम शकुन बताओ भाय ॥ देवा बोला तब ऊदन ते साँची सुनो लहुरवा भाय = कालरूप यहु शर्बत आयो सबकी मृत्यु गई नगच्याय ॥ धारि जनेऊ तब काने में सूरज उठा तड़ाका भाय ६ ऊदन बोले तब आल्हा ते कुत्ते देवो आप पियाय ॥ जो मरिजावै पी कुत्ता यह तौ सब जहर देव फिकवाय १० इतना सुनिकै नेगी चलिभे मारन लागि लहुरवा भाय ॥ बड़े दयालू आल्हा बोले ऊदन छाँड़ि देव यहि ठायाँ ११ प्रजा हमारी सम परजा हैं ठाकुर भागि गयो भयखाय ॥ नामी ठाकुर तुम मोहबे के इनपर दयाकरो यहि ठार्य १२ माधै राजा के नौकर हो तुम्हरो करै काह उपकार ॥

९६ आल्हखण्ड । १७२ संग न देवै जो राजा का तौ हनिमरै काढ़ि तलवार १३ । ऐसे दीनन के मारे ते ऊदन जावै धर्म नशाय ॥ बड़ी कठिनता नर परिजावै औ परिजायँ जानपर आय १४ 'ललिते दशरथ त्यहिसमयामाँ प्राणै दीन धर्म पर आय ॥ तैसे ऊदन कहा मानिकै धर्मै राखु दया पर आय १५ दया राखिकै इन नेगिन को सुखसों देव घरे पहुँचाय ॥ बड़ी दीनता इन नेगिन की सबकर गये प्राणघट आय १६ ऊदन ऐसे केहरि सम्मुख लरिकै कौन शूरमाँ जाय ॥ किह्यो बड़ाई बड़ भाई की आल्हा धर्म दीन समुझाय १७ ऊदन छाँड़यो तब नेगिन को नेगी घरे पहुंचे आय ॥ हाल बतायो गजराजा को सुनतै गयो सनाकाखाय १८ लिल्ली घोड़ी पर चढ़ बैठ्यो माहिल उरई को सरदार ॥ जायकै पहुँच्यो मुन्नागढ़माँ जहँपर भरी लाग दर्बार १६ बड़ी खातिरी भै माहिल कै राजा पास लीन बैठाय ॥ माहिल बोले वहि समया में ओ महराजा बात बनाय २० शर्बत खन्दक में डारागा सबकै कुशल भई यहि ठाएँ ॥ लड़े बनाफर ते जितिहौ ना तुमते सत्य दीन बतलाय २१ अब चलि जावो यहि समयामें आल्हा निकट तुरत महराज ॥ हाथ जोरिकै पाँयन परिकै कीन्ह्योअवाशि आपनोकाज२१ बली भयेपर छल करिये ना निर्बल भये छलौ सों काज ॥ होय हँसौवा कन्या बेहे औ नहिं रहै जगतमें लाज २३ ऐसे समया में महराजा करिये कौन दूसरो साज ॥ छली न बाजैं हम दुनियाँ में औ रहिजाय हमारी लाज २४ छल बल राजाका कर्मै है कर्म न होय प्रजनकर भाय ॥

मलखानका बिवाह । १७३ १७ धर्म व्यवस्था जहँ परिजावै तहँ सब करैं कहैं हम गाय २५ बातैं सुनिकै ये माहिल की राजा बड़ा कीन सतकार ॥ हमरे नीके के साथी हौ राजा उरई के सरदार २६ माहिलचलिभे फिरितम्बुनको राजै नेगी लीन बुलाय ॥ लैके तोड़ा दो रुपियन के औ नौ हीरा लीन उठाय २७ चलिभे राजा भुन्नागढ़ सों पथरीगढ़ै पहुंचे आय ॥ तहँपर पहुँचे त्यहि तम्बुन में जहँपर रहें बनाफरराय २८ जो कछु सामा लैके गेते आल्है नजरि दीन सो जाय ॥ देखिकै सामा महराजा की हर्षित भये बनाफरराय २६ ऊदन बोले फिरि राजा सों काहे किह्यो परिश्रम आय॥ तब गजराजा बोलन लागे मानो कही लहुरवाभाय ३० देश हमारे की रीती यह परचव लेयँ प्रथमही आय ॥ जहर पठावैं ते शर्वत में देखे बिना पियैं जे भाय ३१ बिना बुद्धिके ते नर कहिये उनके निकट कबौं ना जायँ ॥ पास परीक्षा तुमको जान्यो लरिकाभागिगयो भयखाय३२ पै जो पीवन आल्हा शर्बत सूरज तुरत देत बतलाय ॥ कछु छल नाहीं हम कीन्होरहै लरिकाभागिगयो भयखाय ३३ इकलो लड़का यहिसमयामें माड़ोतरे चलै हर्षाय ॥ भाँवरि होवैं त्यहि लड़का की हाथ न छुवै लोह कछुभाय ३४ सुनिकै बातें ये राजा की मलखे कहा बचन मुसुकाय ॥ छल की सानी सब बातें हैं घातैं सबै परैं दिखलाय ३५ इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों कही विसेनेराय ॥ किरिया करिल्यो श्रीगंगा की तौ बर तुरत देयें पठवाय ३६ गङ्गा कीन्ही गजराजा ने औ यह कहा बचन परमान ॥

१८ आल्हखण्ड । १७४ छल जो राखैं तुम्हरे सँग में तौ म्वहिं सजायैं भगवान ३७ बातैं सुनिकै ये राजा की आल्हा कहा सुनो मलखान ॥ बैठि पालकी में अब जावो तुम्हरो भलो करैं भगवान ३८ सुनिकै बातैं ये आल्हा की मलखे सुमिरि दुर्गामाय ॥ तुरत पालकी में चढ़ि बैठे महरन पलकी लीन उठाय ३६ चारि घरी के फिरि अर्सा में महलन तुरत पहुँचे आय ॥ उतरि पालकी ते मलखाने मड़ये तरे पहुँचे जाय ४० फाटक बन्दी गजराजा करि क्षत्री सबै लीन बुलवाय ॥ रीति बिवाहे की जस चाही तैसे खंभ गड़ा तहँ भाय ४१ गाफिल दीख्यो मलखाने को बन्धन तुरत लीन करवाय ॥ बाँधिकै खंभा में मलखे को हरियर बांस लीन कटवाय ४२ मारन लागे मलखाने को जामा टूक टूक है जाय ॥ देखि तमाशा फुलियामालिनि महलन गई तड़ाका धाय ४३ खबरि सुनाई गजमोतिनि को जो कुछ कियो बिसेनेराय ॥ सुनि गजमोतिनि तहँ ते धाई कोठे ऊपर पहुंची आय ४४ नीचे दीख्यो त्यहि दुलहाको कङ्कण रहा हाथ दर्शाय ॥ तब गजराजा सों गजमोतिनि बोली आरत वचन सुनाय ४५ कहाँ को बँधुवा यहु आयो है जो अति सहै बाँस के घाय ॥ तुरतै छाँड़ो यहि बँधुवा को मोसों बिपतिदीखिनाजाय ४६ तब गजराजा कह बेटी सों खेलो सखिन साथ तुम जाय ॥ पैसा मारयो यहि ठाकुर ने तासों सहै बाँसके घाय ४७ मलखे दीख्यो तब कोठे को चारों नैन एक द्वैजायँ ॥ धरिकै हुमक्यो मलखाने ने खंभा उखरि गयो त्यहिठायँ ४८ बन्धन ढीलेभे मलखे के खंभा लीन हाथ तब भाय ॥