आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
मलखानका विवाह । १७५ १६ लाग घुमावन तब खंभा को क्षत्री गये सनाकाखाय ४६ लात मारिकै इक छत्री को ताकी लीन ढाल तलवार ॥ मलखे ठाकुर के मारुन में आँगन बही रक्तकी धार ५० सिंह गरज्जनि मलखे गर्जे इत उत हनें बीर दश पांच ॥ जितने कायर रहें आँगन में देखत ढीलिहोइ तिन कांच ५१ फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान ॥ लरि लरि गिरिगे कितन्यो छत्री भारी लाग तहाँ खरिहान ५२ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ॥ तैसे मलखे के मुर्चा में कोउ राजपूत न रोके पायँ ५३ सूरज ठाकुर तहँ पाछे सों कम्मरपकरिलीन फिरिआय ॥ बहुतक छत्री यकमिल हैकै बन्धन फेरि लीन करवाय ५४ त्यालिया खंदक में गजराजा फिरि मलखे को दीन डराय ॥ हाल पायकै फुलिया मालिनि बेटी पास पहुंची जाय ५५ कही हकीकत सब मलखे की मालिनि बार बार तहँ गाय ॥ सुनिसुनिबातें तहँ मालिनिकी बेटी बार बार पछिताय ५६ तुम्हें विधाता अस चहिये ना जैसी कीन हमारे साथ ॥ बड़े दयालू औ बरदाता हमपर कृपाकरो रघुनाथ ५७ फिरि फिरि बिनवै रघुनन्दनको धरिकै भूमि आपनो माथ ॥ कैसे देखैं हम बालम को मालिनि फेरिकहौ यहगाथ ५८ सुनिकै बातें गजमोतिनिकी मालिनिकही कथा समुझाय ॥ दिवस बीतिगा इन बातन में संध्याकाल पहुंचा आय ५६ थार मँगायो तब चाँदी का भोजन सबै लीन धरवाय ॥ चाँदी केरे फिरि लोटा में निर्मल पानी लीन भराय ६० पाँच पान को बीरा लैके रेशम रस्सी लीन मँगाय ॥
२० आल्हखण्ड । १७५ कीन तयारी त्यहि खंदक को जहँपर परा बनाफरराय ६१ आधी रातिके फिरि अमला में बेटी अटी तहाँ पर जाय ॥ रेशम रस्सी को लटकायो औयह बोली बचन सुनाय ६२ बप्पा हमरे वैरी ह्वैगे तुमका खंदक दीन डराय ॥ अब चढ़िआवो गहि रस्सीको बालम बार बार बलिजायँ ६३ सुनिकै बातैं गजमोतिनिकी बोला मोहबेका सरदार ॥ घटिहा राजाकी बेटी हौ तुम्हरो कौन करै इतवार ६४ किरिया करिकै म्वहिं लै आयो औ खंदक में दियो डराय ॥ बातैं सुनिकै मलखाने की बेटी बोली शीश नवाय ६५ मोहिं शपथ है रघुनन्दन की मानो सत्य बचन तुम नाथ ॥ क्वारी रहिहौं मैं दुनिया में की फिरि ब्याहहोय तुमसाथ ६६ सुनिकै बातैं गजमोतिनि की मलखे बोले बचन उदार ॥ धर्म क्षत्तिरिन को मिटिजावै जो हम बचैं नारि उपकार ६७ चोरी चोरा हम निकरैं ना ओ गजमोतिनि बातबनाय ॥ हमको चाहौ जो ठकुराइनि लश्कर खबरिदेउ पहुँचाय ६८ तुमचलिजावोनिजमहलनको बीती अर्द्धरात अब आय ॥ इतना सुनिकै बेटी चलिभै महलन सोयगई फिरिजाय ६६ भोर भये यह आया आल्हा फिरिमालिनिको लीनबुलाय ॥ लिखिकै चिट्ठी बघऊदन को मालिनि हाथ दीन पंकराय ७० मालिनि बोली गजमोतिनिसों बेटी बार बार बलिजायँ ॥ जो सुधिपाई गजराजा कहुँ हमरे जाय प्राणपर आय ७१ बेटी बोली तब फुलिया ते मालिनि सत्य देयँ बतलाय ॥ पर उपकारी जो मरिजावै पहुँचे रामधाम में जाय ७२ इक दिन मरनो है आखिरको ताको कौन सोच है माय ॥
[Header] मलखानका बिवाह । १७७ २१
डोला जाई जब मोहवे को तुमको द्रव्य देउँ अधिकाय ७३ इतना सुनिकै मालिनि चलिभै फाटक ऊपर पहुँची आय ॥ सूरज बेटा गजराजा को द्वारे ठाढ़रहै सो भाय ७४ सो हँसि बोला तहँ मालिनि सों मालिनि कहाँ चली तू धाय ॥ मालिनि बोली तहँ सूरज सों बेटा फूल लेन को जायँ ७५ मोहिं पठायो गजमोतिनि है तुम सों सत्य दीन बतलाय ॥ सूरज बोला दरवानिन सों याकी लेउ तलाशी भाय ७६ सुनिकै बातें ये सूरज की नंगाझोरी लीन कराय ॥ चिट्ठी खोंसे सो जूरा में ताको पता मिला नहिं भाय ७७ मालिनि चलिभै फिरि आगेको फौजन पास पहुँची जाय ॥ जहँ जनवासा था आल्हा का मालिनिअटी तहांपर आय ७८ मालिनि पूछ्यो तहँ माहिलसों कहँ पर बैठ उदयसिंहराय ॥ माहिल पूछ्यो तहँ मालिनिसों आपन हाल देय बतलाय ७९ नाम हमारो उदयसिंह है आई कौन काज तू धाय ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की मालिनि कथागई सबगाय ८० सुनिकै बातें सब मालिनिकी माहिल चाबुक लीन उठाय ॥ पीटन लाग्यो सो मालिनिको औ यह कह्योबचनसमुझाय ८१ जल्दी जावै घर अपने को अब ना कहे कथा अस गाय ॥ बड़े जोर सों मालिनि रोई पहुँचा उदयसिंह तब आय ८२ पूछी हकीकति उदयसिंह तब मालिनि कथागई फिरिगाय ॥ मोहिं पठायो गजमोतिनिहै चिट्ठी हाथ दीन पकराय ८३ पढ़तै चिट्ठी बघऊदन के आँखन बही आँसुकी धार ॥ डाटन लाग्यो फिरि माहिलको का तुम कीनवहौ अपकार ८४ सुनिकै बातें बघऊदन की बोला उरई का सरदार ॥ १२
२२ आल्हखण्ड । १७८ हाल बिसेने जो सुनि पावैं तो यहि डरैं जानसों मार ८५ हल्ला करिकै यह बोलतभै तब हम कहा याहि समुझाय ॥ धीरे बोलै जनवासे में नहिं कहुँ सुनी बिसेनोराय ८६ इतना सुनतै मुहँ मटकायो गारी दियो बनाफरराय ॥ ढोलक नारिन औ शूदन की तुमसों कथा कहौं मैं गाय ८७ जैसे पीटे ढोलक बाजै नारी दशा स्वई है भाय ॥ गगरीदाना शूद उताना यहहू मिला खूब ह्याँ आय ८८ भला तुम्हारो हम नित चाहैं साँची सुनो बनाफरराय ॥ जैसे मैने म्वर ब्रह्मा हैं तैसे तुम्हूँ लहुरवा भाय ८६ घाटि न जानैं हम ब्रह्मा ते कैसी कहौ उदयसिंहराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभे सँगमेंमालिनिलीन लिवाय ६० जहाँ पर बैठे थे आल्हाजी ऊदन तहाँ पहुँचे जाय ॥ कही हकीकति तहँ मालिनिने ऊदन पाती दीन सुनाय ६१ बड़ा शोचभा सुनि आल्हाके मनमें वार वार पछितायँ ॥ हमहीं पठवा था मलखे को तबचलिगयो लहुरवाभाय ६२ दिह्यो अशर्फी बहु मालिनिको कीन्ह्यो बिदा बनाफरराय ॥ मालिनि चलिभै जनवासेते पहुँची फेरि महलमें जाय ६३ कह्योहकीकति गजमोतिनिते ऊदन बोले शीश नवाय ॥ हुकुम जो पावैं हम दादा को तौ मलखे को लवैं छुड़ाय ६४ बातैं सुनिकै ये ऊदन की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥ हुकुम लगायो फिरि ऊदन ने डङ्का तुरत दीन बजवाय ६५ बाजे डङ्का अहतङ्का के सबियाँ फौज भई तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ६६ पहिल नगाड़ा में जिनबंदी दुसरे बांधि लीन हथियार ॥
मलखानका बिवाह । १७६ २३
तिसर नगाड़ा के बाजतखन चलिभे सबै शूर सरदार ९७ कूच करायो पथरीगढ़ते भुन्नागढ़ै पहुँचे जाय ॥ गा हरिकारा पथरीगढ़ते राजै खबरि दीन बतलाय ९८ सुनिकै बातें हरिकारा की सूरज बेटा लीन बुलाय ॥ काँतामल औ मानसिंह सों राजा कह्यो खूब समुझाय ९९ जितने आये हैं मोहबेते सो बिन घाव एक ना जायँ ॥ बिदा माँगिकै सो राजा सों डङ्का तुरत दीन बजवाय १०० झीलमबख्तर पहिरि सिपाहीन हाथम लीन ढाल तलवार ॥ रणकी मोहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १०१ कूच करायो भुन्नागढ़ सों पहुँचे समरभूमि मैदान ॥ ढोल औ तुरही बाजन लागीं घूमनलागे लालनिशान १०२ इतसों आगे सूरज ठाकुर उतसों बेंदुलको असवार ॥ सूरज ठाकुर के देखत खन ऊदन गरु दीन ललकार १०३ छलिकै लैकै मलखाने को औ खन्दक में दीन डराय ॥ बिना बिहाये हम जैहैं ना बहुतन धजी २ उड़िजाय १०४ इतना सुनिकै सूरज जरिगे अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा उदयसिंह को अब तुम खबरदार है जाय १०५ वार हमारी सों बचिहैना ऊदन मोहबे के सरदार ॥ इतना कहिकै सूरज ठाकुर जल्दी खैंचिलीन तलवार १०६ ऐंचिकै मारा बघऊदन को ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय ॥ मानसिंह औ फिरि देबाका परिगा समर बरोबरि आय १०७ सूँदि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केर ॥ हौदा हौदा यकमिल हैगे मारैं एक एक को हेर १०८ गोली ओलासम वर्षन भईं कहूँ कहूँ कड़ाबीनकी मार ॥
२४ आल्हखण्ड । १८० तेगा घमकैं बर्दवान के कोताखानी चलै कटार १०९ बड़ी लड़ाई भै भुन्नागढ़ ऊदन सूरज के मैदान ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं नाहर एक एक को ज्वान ११० मानसिंह जगनिक को राजा देवा मैनपुरी चौहान ॥ काँतामल्ल औ बनरसवाला भारी कीन घोर घमसान १११ तीनि सिरोही सूरज मारी ऊदन लीन्ही वार बचाय ॥ साँम उठाई बघऊदनने औ सूरजपर दई चलाय ११२ भागा घोड़ा तब सूरजको लश्कर भागि गयो भयखाय ॥ जहां कचहरी गजराजाकी सूरज तहां पहुँचा जाय ११३ हाथ जोरि औ पायन परिकै राजै बहुत कहा समझाय ॥ बड़े लड़ैया मोहवे वाले तिनकीमारु सही ना जाय११४ सुनिकै बातें ये सूरज की सेमा भगतिनि लीन बुलाय ॥ कही हकीकति सब सेमाते राजा बार बार समझाय ११५ सेमाभगतिनि सूरज लै कै तुरतै कूचदीन करवाय ॥ कूच कराये भुन्नागढ़ ते पथरीगढ़ै पहुँची आय ११६ दीख्यो ऊदन जब सूरज को धावा तुरत दीन करवाय ॥ सेमा बरसी तब जादूको पत्थर सबै फौज है जाय ११७ इकलो देवा बचि लश्करगा आल्हा पास पहुँचा आय ॥ कही हकीकति सब सेमाकी आल्हागये सनाकाखाय ११८ धीरज धरिकै आल्हा बोले देवा नगर मोहोबे जाय ॥ जल्दी लावो तुम इन्द्ल को तासों कह्यो कथासमझाय ११९ इतना सुनिकै देवाठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ सातरोज को धावा करिकै पहुँचा नगर मोहोबा द्वार १२० आल्हा केरे फिरि मंदिर में देवा अटा तुरतही जाय ॥
मलखानका विवाह । १८१ २५ कही हकीकति सब सुनवाँसों इन्दल फेरि पहुँचा आय १२१ इन्दल बोल्यो तहँ देबाते चाचा हाल देउ समुझाय ॥ कैसी गुजरी पधरीगढ़ में कस तुम गयो अकेले आय १२२ सुनिकै बातें ये इन्दल की देबा लीन दुःखकी श्वास ॥ सेमाभगतिनि पधरीगढ़ की त्यहिकरिडराबंशकीनाश १२३ तुम्हें बुलैबे को आये हैं बेटा चलौ हमारे साथ ॥ इतना सुनिकै इन्दल चलिभे देबी जाय नवायो माथ १२४ बड़ी अस्तुती की देबी की इन्दल तंत्रशास्त्र अनुसार ॥ अमृतसानी भइ मठवानी इन्दल आल्हा केर कुमार १२५ सवैया ॥ बैठुमठी कछु देर कुमार अबार नहीं करिहउँ मैं काजा। या कहिकै गय देबि तहाँ जहँ बैठ सुराधिप सोहत राजा॥ जायबिनै बहुभांति कियो सुरराज लख्यो तहँ देबिअकाजा। लैकर अमृत देतजबै ललिते मठिमें फिरि होत अवाजा १२६ छिपिकै चलिबे त्येरेसाथ में इन्दल करो तयारी जाय ॥ इतना सुनिकै इन्दल चलिभे देबी बार बार शिरनाय १२७ माता केरे फिरि मंदिर में इन्दल बिनय सुनाई आय ॥ आज्ञा पावैं महतारी कै दादा पास पहुँचैं जायँ १२८ सुनवाँ बोली फिरि इन्दलते बेटा बार बार बलिजायँ ॥ सेमा भगतिनि के देखैको हमहूं चलब पूत तहँधाय १२६ बिस्मय कीन्ह्यो कछु मनमें ना पक्षीरूप धरी तब माय ॥ चूम्यो चाट्यो बदनलगायो पाछे हुकुम दियो फर्माय १३० आज्ञापितुकी सब कोउ कीन्ह्यो राम औ परशुराम लों जानु ॥ जल्दी जावो पितु दर्शन को बेटा कही हमारी मानु १३१
२६ आल्हखण्ड । १८२ इतना सुनिकै इन्दल चलिभे देबै तुरत जुहारयो जाय ॥ जल्दी चलिये अब दादा ढिग मातै हुकुमदीन फर्माय १३२ इतना सुनिकै देवा ठाकुर अपने घोड़ भयो असवार ॥ घोड़ करिलिया इन्दल बैठे नाहर-आल्हाकेर कुमार १३३ चील्ह रूप द्वै सुनवाँ उड़िगै आधे सरग रही मड़राय ॥ देबी चलिकै फिरि मंदिरते पथरीगढ़ै पहुँचीजाय १३४ देवा इन्दल दोऊ नाहर आल्हा निकट पहूंचेजाय ॥ आल्हा दीख्यो जबइन्दलको तबछातीसौलियो लगाय १३५ आल्हा बोले फिरि इन्दल ते बेटा कही कथा ना जाय ॥ सेमाभगतिनि के कर्तब ते पत्थर भई फौज सब आय १३६ इन्दल बोले फिरि आल्हा ते अब नहिं देरकरो महराज ॥ जल्दी चलिये अब सुन्नागढ़ चलिकैकरियआपनोकाज १३७ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर हाथी उपर भये असवार ॥ घोड़ मनोहरकी पीठीपर ठाकुर मैनपुरी सरदार १३८ चढ़े करिलियाकी पीठीपर इन्दल कूचदीन करवाय ॥ घड़ी अढ़ाई के अरसा माँ पहुँचे समरभूमि में आय १३६ देखिकै फौजैं तहँ पत्थर की इन्दल गयो सनाकाखाय ॥ उतरिकै घोड़ा ते भुइँ आयो बोल्यो देवी शीश नवाय १४० हेअघनाशिनिसवसुखराशिनि नाशिनिबिपतिकेरिसमुदाय॥ चरण शरण में हम तुम्हरी हैं फौजैं देवो मातु जियाय १४१ तब तो देवी पथरीगढ़ में अमृत बूंद दीन बरसाय ॥ अमृत बूंदी के परतैखन फौजैं उठीं तुरत हरषाय १४२ उठा बेंडुला का चढ़वैया इन्दल निकट पहुँचा आय ॥ चूम्यो चाट्यो गरे लगायो पूंछन लाग बनाफरराय १४३
कैसे आयो तुम पथरीगढ़ हम को हाल देउ बतलाय ॥ बातें सुनिकै ये ऊदन की इन्दल यथातथ्य गा गाय १४४ गा हरिकारा पथरीगढ़ ते झुन्नागढ़ै पहुँचा जाय ॥ दीख तमाशा जो फौजन का राजै हाल दीन बतलाय १४५ सुनिकै बातें हरिकारा की सूरजमल का लीन बुलाय ॥ कही हकीकति सब सूरजते जल्दी हुकुमदीनफरमाय १४६ हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥ हाथी घोड़ा औ रथ सजिगे पैदर सजे शूर समुदाय १४७ जितनी फौजें रहैं झुन्नागढ़ सबियाँ बेगि भई तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथी चढ़िगे बांके घोड़न भे असवार १४८ 'रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार १४६ कूचको डंका बाजन लाग्यो घूमन लाग्यो लाल निशान ॥ फौजै चलिकै झुन्नागढ़ ते पहुँचीं समरभूमि मैदान १५० धूलि देखिकै आसमान में भारी देखि गर्द गुब्बार ॥ बोल्यो फौजन में त्यहि समया ठाकुर बेंदुलको असवार १५१ फौजै आईं गजराजाकी भारी अंधकार गा छाय ॥ जल्दी सजिकै ओ रणबाघो तुमहूं कूच देव करवाय १५२ बातें सुनिकै बघऊदन की सबियाँ फौज भई तय्यार ॥ झीलमबख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार १५३ पहिल नगाड़ा में जिनबंदी दुसरे फांदि भये असवार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार १५४ पहिले मारुइ भई तोपन की दूसरि भई तीरकी मार ॥ तीसरि मारुइ बंदूकन की चौथे चलनलागितलवार १५५
३८ आल्हाखण्ड। १८४ पांच कदम पर बरछी छूटैं भालन तीन कदम पर मार ॥ कदम कदम पर चलैं कटारी ऊनाचलै बिलाइति क्यार १५६ तेगा धमकैं बर्दवान के कटि कटि गिरैं शूर सरदार ॥ बड़ी लड़ाई दोउ दल कीन्हो नदिया बही रक्तकी धार १५७ सूरज ऊदन फिरि दोउ का परिगा समर बरोबरि आय ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ लेवैं वार बचाय १५८ को गति बरणै तहँ दोऊकै दोऊ समर धनी सरदार ॥ बैस बरोबरि हैं दोऊ कै दोऊ खूब करैं तलवार १५६ यहु रणरंगी लै असि नंगी जंगी मैनपुरी चौहान ॥ धरि धरि धमकै राजपूतन को देवा बड़ा लड़ैया जवान १६० को गति बरणै कंतामल की हंता क्षत्रिन को सरदार ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै दोऊ हाथ करै तलवार १६१ सिर्गा घोड़ा की पीढ़ी पर सय्यद बनरस का सरदार ॥ अली अली कहि जैसी दौरै भागैं गली गली सबयार १६२ भली भली कहि ऊदन बोलैं काँपैं थली थली सरदार ॥ हली हली तहँ पृथ्वी डोलै काँपैं डली डली लखिमार १६३ को गति बरणै तहँ सूरज की यहु गजराजा केर कुमार ॥ खैंचि सिरोही ली कम्मर सों ऊदन उपर हनी तलवार १६४ वार बचाई बघऊदन ने आपो दियो तड़ाका मार ॥ परी सिरोही सो घोड़ा के औशिरगिखो तुरतत्यहिबार१६५ उतरि बेंदुलाते सूरज को पकरो उदयसिंह सरदार ॥ बांधिकै मुशकें सूरजमलकी बेंदुल उपर भयो असवार १६६ औ ललकारयो कंतामल को क्षत्री खबरदार है जाय ॥ घाटि बिसेनेने जस कीन्ह्यों तैसी सजा लेउ अबआय १६७
मलखानका विवाह । १८५ २५ इतना कहतै बघऊँदन ने औझड़ हना ढालकी जाय ॥ कांतामल घोड़ा ते गिरिगा पकरा तुरत बनाफरराय १६८ बांधिकै मुशकें काँतामल की तम्बू तुरत दीन पहुँचाय ॥ गा हरिकारा तब मुन्नागढ़ राजै खबरि सुनायो जाय १६६ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लाग्यो संतन धुनी दीन परचाय १७० माथ नवावों पितु अपने को ध्यावौं तुम्हें भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरिभगवन्त १७१ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी,आई,ई ) मुंशी नवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्र वंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसादकृतऊदनविजय वर्णनौनामाद्वितीयस्तरंगः ॥ २ ॥ सवैया ॥ होत नहीं जपडू तपहू अपने मन में यहही पछतावैं । काम औ क्रोध बढ़ें नितही दुखही दुखसों हम देह बितातैं ॥ शान्ति औ शील दया अरु धर्म बिना इन कौन कहौ सुखपावैं । गावैं सदा रघुनन्दन को गुण बन्दन कै ललिते बर पावैं १' सुमिरन ॥ हम पद ध्यावैं पुरुषोत्तम के नरनारायण शीश नवाय ॥ नर तो जानो तुम अर्जुन को गीतासुना सकल जयहिभाय १ हैं नारायण कृष्णचन्द्र तहँ जिनकासुयश रहाजगआज ॥ को गति बरणै पुरुषोत्तम कै जिनको नाम राम महराज २ कोधौं पैदा फिरि दुनियां मा कोधौं बैठि करै असराज ॥
१० आल्हखण्ड । १८६ धर्म छत्तिरी के सब पाले कीन्ह्यो रामचन्द्र जस काज ३ काव्य पुरानी बालमीकि की यहही ठीक ठाक परमान ॥ याको देखै जब कोउ मानुष होवैं रामचन्द्र तत्र भान ४ भानै होतै त्यहि प्रानी के आनी मनो पुरबले भाग ॥ भागै द्वैकै सो जागै उर भागै सबै विपति की आग ५ छूटि सुमिरनी मै ह्यांते अब शाका सुनो शूरमन केर ॥ फौजै सजि हैं गजराजा की लड़ि हैं दऊ शूरमा फेर ६ अथ कथाप्रसंग ॥ खबरि पायकै गजराजा ने सेमा भगतिनि लीन बुलाय ॥ सेमा भगतिनि ते गजराजा सबियाँ कथा कह्यो समुझाय १ सुनि अकुलानी सेमाभगतिनि राजै बार बार शिरनाय ॥ आज्ञा देवो मोहिं जाने को मानो कही बिसेनेराय २ राजा बोले फिरि सेमाते आइव यही काज बुलवाय ॥ अब तुम जावो पथरीगढ़ को मारो सबै मोहबिया जाय ३ आज्ञा पावत महाराजा की सेमा अटी भवन में जाय ॥ लैकै पुरिया सब जादू की तुरतै कूच दीन करवाय ४ तुरत पौरिया को बुलवायो राजै हुकुम दीन फर्माय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवाओ डंका तुरत देव बजवाय ५ हुकुम पायकै महाराजा को धावन अटा तुरतही जाय ॥ बाजे डंका अहंतका के हाहाकारी शब्द सुनाय ६ जितनी फौजैं गजराजा की सबियाँ बेगि भई तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ७ घोड़ अगिनिया गजराजाको सोऊ सजा खड़ा तय्यार ॥ सुमिरि भवानी जगदम्बा को राजा फाँदि भयो असवार ८
मलखानका बिवाह । १८७ २१ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उघार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग व्यवहार ९ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्बा चले पवन की चाल ॥ मारु मारु करि मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल १० आगे हलका है हाथिन का पाछे चले जायँ असवार ॥ पैदल क्षत्री त्यहि पाछे सों हाथम लिये नाँगि तलवार ११ सुनि सुनि चोबें तहँ डङ्का की बोला तुरत बनाफरराय ॥ चढ़िकै आवत गजराजा है मानो कही शूर समुदाय १२ सुनिकै बातें बघऊदन की सँभले सबै शूर सरदार ॥ घड़ी न बीती ना दिन गुजरा फौजैं सबै भई तय्यार १३ दोऊ ओरते तोपैं छूटीं मानो प्रलय मेघ घहरान ॥ मारत मारत फिरि तोपन के संगम भये समर मैदान १४ ऊदन राजा सम्मुख हैगे राजा गरू दीन ललकार ॥ मुशकें छोड़ो दुउ पुत्रनकी ऊदन मानो कही हमार १५ लड़िकै बेटी तुम पैहौ ना मरिकै आन धरो अवतार ॥ सुनिकै बातें ये राजा की बोला उदयसिंह सरदार १६ घाटि बिसेने तुम कीन्ही है मलखे खन्दक दिये डराय ॥ बेटी ब्याहो औ फिरि जावो नाहीं गई प्राणपर आय १७ काम बिटेवन तें परिगा है कबहुँ न परा मर्द ते काम ॥ सम्मुख लड़िकै उदयसिंह ते अबहीं जानचहत यमधाम १८ इतना सुनिकै गजराजा ने आपनि ऐंचि लीन तलवार ॥ हनिकै मारा बघऊदन को ऊदन लीन ढालपर वार १६ फिरि ललकारा गजराजा को ठाकुर खबरदार हैंजाय ॥ पहिली कीन्हे दूसरि कैलै क्षत्री तोरि आहि रहिजाय २०
३२ आल्हखण्ड । १८८ दूध लरिकई मा पाये ना तेरे मेरे चढ़े ना घाव ॥ इतना सुनिकै गजराजा ने जल्दी हना दूसरा दाँव २१ वार बचाई बघऊदन ने राजा बहुत गयो शर्माय ॥ उसरिन उसरिन दुउ मारत भे शोभा कही बूत ना जाय २२ चिल्हिया बनिकै सेमाभगतिनि सुनवाँ पास पहुँची जाय ॥ दोनों चिल्हिया संगम ह्वैकै पंजन परन लड़ें नभधाय २३ इन्दल दीख्यो घोड़ा पर सों ऊपर आसमान की ओर ॥ दोनों चिल्हिया आसमान में भारी करें युद्ध अतिघोर २४ लड़िकै सटिकै संगम ह्वैकै दोऊ गिरीं धरणि में आय ॥ सुनवाँ बोली तब इन्दल ते मारो पूत याहि असिघाय २५ इन्दल बोले तब सुनवाँ ते माता सत्य कहौं समझाय ॥ हाथ मिहिरियापर डारें जो तौ रजपूती धर्म नशाय २६ सुनवाँ बोली फिरि इन्दल ते बेटा बार बार बलिजायँ ॥ जूरा काटो इह भगतिनि को तौ सबकाम सिद्धि ह्वैजायँ २७ सुनिकै बातें ये माताकी जूरा काटि लीन त्यहिकाल ॥ जादू झूठी भई सेमाकी सेमा परी बिपति के जाल २८ ज्यों त्यों करिकै झुन्नागढ़ को सेमाचली गई पछताय ॥ मनै सराहै भल सुनवाँ को आपनलिह्योबदलह्वॉआय २९ हवा चलाई जब पहिले मैं सुनवाँ बन्दकीन तब आय ॥ अपने हाथे मैं विष बोयों बनिकैचील्हलड़ियूँजोजाय ३० ह्वाँ गजराजा हल्ला करिकै अति खलभला दीन मचाय। लड़ै इकला सो घोड़ा पर कद्धादीन भूमि बिथराय ३१ पल्ला दै कै सय्यद ठाढ़े अल्हाऔबिसमिल्लागयेहिराय ॥ जैसे होरी बल्ला छूटै गल्ला यथा उसावा जाय ३२
मलखानका बिवाह । १८६ ३३ मारे मारे तलवारिन के तस गजराजा दीन बिछाय ॥ फिरि फिरि मारै औ ललकारै अद्भुतसमर कहा ना जाय ३३ सुनवाँ बोली फिरि इन्दल ते बेटा कहा मानि ले मोर ॥ पूंछ काटिले यह घोड़ाकी तौ नहिंरहै फेरि अस जोर ३४ इतना सुनिकै इन्दल तुरतै घोड़ा पास पहुंचे जाय ॥ पूंछ काटकै वहि घोड़ा की औ धरती माँ दीन गिराय ३५ सेमाभगतिनि घोड़ अगिनियाँ दोऊ बिना जोर भे भाय ॥ राजा सोच्यो अपने मनमाँ हमरो काल पहुँचा आय ३६ छोड़ि आसरा जिंदगानी का अपनो मया मोह बिसराय ॥ प्राण गदोरी पर धरि लीन्ह्यों आल्हा पास पहुँचा जाय ३७ औ ललकारा फिरि आल्हाको ठाकुर खबरदार है जाय ॥ धोखे भूले ना माड़ो के जहँ लै लिये बापका दायँ ३८ मैं गजराजा भुन्नागढ़ को सम्मुख लड़ो आजु सरदार ॥ ऐंड़ा मसके फिरि घोड़ा के आल्हा उपर हनी तलवार ३९ टूटि सिरोही गै राजाकै कबुजा रहा इकेलो हाथ ॥ साँकरि लै कै फिरि हाथी को आल्हा दीन सुमिरिरघुनाथ ४० साँकरि फेरी पचशब्दा ने औ घोड़ाते दीन गिराय ॥ बाँधिकै मुशकें फिरि राजाकी आल्हा कूचदीन करवाय ४१ ऊदन बोले गजराजा सों म्वहिं मलखे को देउ बताय ॥ राजा बोलो तब ऊदन सों मानो कही बनाफरराय ४२ संग हमारे अब तुम चलिये औ मलखे को लवैं लिवाय ॥ इतना सुनिकै दूनों चलिभे खंदक पास पहुँचे जाय ४३ बज्रशिला को फिरि टारत भे रस्सा तुरत दीन लटकाय ॥ बाहर निकरे मलखे ठाकुर रोवा बहुत लहुरवा भाय ४४
३४ आल्हखण्ड । १६० पकरिकै बाहू दउ ऊदन की मलखे छाती लीन लगाय ॥ तीनों चलिभे फिरि खन्दकसों आल्हा निकट पहुँचे आय ४५ राजा बोल्यो फिरि आल्हा सों मानो कही बनाफराय ॥ कैदी छोड़ो दउ पुत्रन को अबहीं ब्याह लेउ करवाय ४६ ऊदन बोले फिरि राजाते तुम्हरी कौन 'करै परतीति ॥ गंगा करिकै दादै लैके घरमाँ किह्योजाय अनरीति ४७ दया आयगे फिरि आल्हाके गंगा फेरि लीन करवाय ॥ कैद छुड़ायो दउ पुत्रन को पण्डित तुरतै लीन बुलाय ४८ देखिपत्तरा पण्डित बोल्यो भाँवरि आजु लेउ करवाय ॥ इतना सुनिकै राजा चलिभा दोऊ पुत्रन साथ लिवाय ४६ आल्हा पहुंचे जनवासे में राजा महल पहुँचा जाय ॥ लिल्ली घोड़ी माहिल चढ़िकै राजा घरै गये फिरि धाय ५० बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो माहिल बैठि महल में जाय ॥ माहिल बोले फिरि राजाते मानो कही बिसेनेराय ५१ जितने ठाकुर आल्हा घरके मड़येतरे लेउ बुलवाय ॥ शूर कुठरियन में बैठारो सबके मूड़लेउ कटवाय ५२ इतना कहिकै माहिल चलिभे पथरीगढ़ै पहुँचे आय ॥ किह्यो तयारी ह्याँ मड़ये की यहु गजराजा खंभ गड़ाय ५३ सूरज बेटा को बुलवायो तासों कह्यो हाल समुझाय ॥ सुनिकै बातैं सब राजा की सूरज चलिभा शीशनवाय ५४ जायकै पहुँच्यो जनवासे में जहाँ पर बैठि बनाफरराय ॥ कह्यो हकीकति सबआल्हासों सूरज बार बार शिरनाय ५५ सुनिकै बातें सब सूरज की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥ आवै घोरैया सब मड़ये को यहु कहिदियो बिसेनेराय ५६
मलखानका बिवाह । १६१ ३५ इतना सुनिके ऊदन देवा जोगा भोगा भये तयार ॥ मलखे सुलखे ब्रह्मा लाखनि इनहुन वांधिलीन हथियार ५७ चन्दनबेटा पृथ्वीराज को जगनिक भैने चँदेलो क्यार ॥ मोहनबेटा बीरशाह को बौरीगढ़ को जो सरदार ५८ हाथी सजिगा पचशब्दाफिरि आल्हा तापर भये सवार ॥ बारहु ठाकुर अपने अपने सबहिन बाँधिलियेहथियार ५६ कूच करायो जनवासे ते मड़ये तरे पहुंचे जाय ॥ चन्दन चौकी मलखे बैठे पण्डित साइति दियो बताय ६० घर औ कन्या इकठौरी भे भाँवरिसमय गयो नगच्याय ॥ पहिली भाँवरि के परतैखन सूरज ठाकुर उठा रिसाय ६१ वार चलाई सो मलखे पर ऊदन लीन्हो वार बचाय ॥ दूसरि भाँवरि के परतैखन कांतामलहू गयो रिसाय ६२ खैंचिकै मारा सो मलखेपर रोंका तुरत लहुरवाभाय ॥ तीसरि भाँवरि के परतैखन सबियाँ शूर पहुँचे आय ६३ बड़ी लड़ाई भै आँगन में तुरतै बही रकतकी धार ॥ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लाग पहार ६४ आधे आँगन भौंरी होवैं आधे खूब चलै तलवार ॥ नाई बारी जी लैभागे जूझे बड़े बड़े सरदार ६५ को गति बरणै राजपूतन कै भारी हाँक देयँ ललकार ॥ चलै कटारी बूंदी वाली आँगन चमकिरही तलवार ६६ चन्दन मोहन लाखनि ऊदन दोऊ हाथ करैं तलवार ॥ को गति बरणै जगनायक कै भैने जौन चँदेले क्यार ६७ जोगा भोगा सुलखे देवा इनहुन खूब मचाई मार ॥ इतने क्षत्रिन के मारुन में कोउ न खड़ा होय सरदार ६८
३६ आल्हखण्ड । १६२ ब्रह्मा सूरज दोऊ ठाकुर रणमाँ घोर कीन घमसान ॥ बड़ा लड़ैया गजराजा यहु नाहर समरधनी मैदान ६६ कांतामलहू आँगन लडिकै अपने तजी प्राण की आश ॥ सातसै क्षत्री आँगन लड़िकै तुरतै भये तहाँपर नाश ७० कांतामल औ फिरि सूरज की आल्हा मुशकें लीन बँधाय ॥ कठिन लड़ाई भै माड़ोतर सातो भाँवरि लीन डराय ७१ तब गजराजा पाँयन परिकै सब को बार बार शिरनाय ॥ हारि देखिकै अपने दिशिकी कन्यादान दीनाफिरिआय ७२ ऊदन बोले फिरि राजा ते मानों कही बिसेनेराय ॥ आल्हा गर्जी हैं दायज के मलखेदुलहिनिकोललचायँ७३ भातके गर्जी हम सब ठाकुर सो अब बेगि होय तय्यार ॥ छोरिकै मुशकें दोउ पुत्रन की चलिभे मोहबे के सरदार ७४ ई सब पहुंचे जनवासे में माहिल तुरत भयो तैयार ॥ आयके पहुंच्यो सुन्नागढ़ माँ राजै कीन्हो रामजुहार ७५ राजा बोले तब माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ बड़े लड़ैया मुहवे वाले नाहर कठिन करें तलवार ७६ माहिल बोले तब राजा ते मानों कही बिसेनेराय ॥ भातखान को अब बुलवावो चौका मूड लेउ कटवाय ७७ यह मन भाई महराजा के लाग्यो भात होन तय्यार ॥ विदा माँगिकै महराजा ते चलिभा उरई का सरदार ७८ राजा चलिभे जनवासे में आल्हा पास पहुँचे जाय। त्यार भातहै मोरे महलन में जल्दी चलो बनाफरराय ७९ कहा मानिकै हम लुम्बनको तुमन सरिस कीन सब काम ॥ तुम सों दूजी अब राखै ना सोऊ जान रहे श्रीराम ८०
[Header] मलखानका बिवाह । १६३ ३७
धन्य सराही त्यहि ठाकुर को तुम सों मिलैं नात समरस्त ॥ क्यहु अभिलाषा कछु बाकीना द्वैगे सबै ज्वान अब पस्त ८१ बातैं सुनिकै ये राजा की आल्हा हुकुम दीन फर्माय ॥ बारह ठाकुर गे मौरिन में तेई फेरि सजे सब भाय ८२ भाला बरछी औ ढालै लै हाथ म लई सबन तलवार ॥ नाई दारी गडुवा लीन्हेनि चलिभे सबै शूर सरदार ८३ मलखे बैठे फिरि पलकी में बाजन सबै रहे लहराय ॥ एकपहर के फिरि अर्सा में राजा भवन पहुंचे जाय ८४ नाई आवा फिरि भीतर सों आल्है शीश नवावा आय ॥ जल्दी चलिये अब भोजनको करिये न देर बनाफरराय ८५ इतना सुनिकै सब क्षत्रिनने अपने कपड़ा धरे उतार ॥ ढालैं धरिकै गैंड़ावाली हाथ म लई नाँगि तलवार ८६ तब गजराजा कह आल्हा सों ठाकुर मोहबे के सरदार ॥ हमरे कुलकी यह रीती ना भोजन करत गहै हथियार ८७ एकरीति नहिं सब देशन में अपने कुला कुला व्यवहार ॥ बातैं सुनिकै ये राजा की सबहिन धराफेरि हथियार ८८ चलिकै ठाकुर गे चौका में पीढ़न उपर बैठिगे जाय ॥ षटरस व्यंजन सब परसेगे उत्तम भातगयो फिरिआय ८९ लक्ष्मी बोलत परलै द्वैगै आये सबै शूर समुदाय ॥ जान न पावैं मुहबेवाले सबका कटा देव करवाय ९० बातें सुनिकै गजराजा की आल्हा गये सनाकाखाय ॥ गडुवा लैंकै ऊदन ठाढ़े मलखे पाटा लीन उठाय ९१ बड़ी मारु भै फिरि चौका में अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ पाटा लागै ज्यहि ठाकुर के घुर्मित गिरै मूर्च्छा खाय ९२
३८ आल्हखण्ड । १६४ को गति बर्णै तहँ ऊदन की गडुवन मारि कीन खरिहान ॥ लाखनि ब्रह्मा के मुर्चा में सम्मुख लड़ै न एकोजवान ६३ कांतामल औ सूरज ठाकुर दोऊ हाथ करैं तलवार ॥ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ठाकुर समरधनी सरदार ६४ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ मारे मारे तलवारिन के चौका बही रक्तकी धार ६५ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडोरै गाय ॥ तैसे ठाकुर मोहबे वाले मारिकैदीन्हों समरसोवाय ६६ बहुतक जूझे भुन्नागढ़ के रानी राजै लीन बुलाय ॥ रानी बोली फिरि राजा सों मानों कही त्रिसैनेराय ६७ बड़े लड़ैया मोहबे वाले ओ महाराजा बात बनाय ॥ लड़िकैजिनिहौनहिंआल्हा सों तुम करि थाके सबै उपाय ६८ कहा न मानो तुम माहिल को नहिं सब जैहैं काम नशाय ॥ हँसी खुशी सों बेटी पठवो याहि में भला परै दिखराय ६६ बातें सुनिके ये रानी की राजा समर पहुँचा आय ॥ भुजा उठाये फिरि बोलत भा अबहीं मारु बन्द है जाय १०० मारु बन्द भै दोऊ दिशिसों राजा बोला वचन सुनाय ॥ बिदा करावो अब बेटी को नहिं कछु देर बनाफरराय १०१ बातें सुनिकै गजराजा की द्वारेगये बराती आय ॥ कपड़ा पहिरे अपने अपने सीताराम चरण मनध्याय १०२ हुकुम लगायो हाँ गजराजा बेटी बेगि होय तय्यार ॥ हुकुम पायकै गजराजा को सोलह करनलागि श्रृंगार १०३ सवैया ॥ मज्जेन चीर ओ कुण्डैल अंजन नाक में मोक्तिक बेसे सवाँरी ।