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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

[ ८ ] अनाकारमविच्छिन्नमग्राह्यमचलं ध्रुवम् । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सर्वकामविवर्जितम् ॥ २५ ॥ परम तत्त्व निराकार, अविच्छिन्न अर्थात् जन्म, मरण आदि से रहित अर्थात् शाश्वत, मन और वाणी का अगम्य, निश्चल, अविनश्वर, सब उपा- धियों से रहित एवं सब कामनाओं से शून्य है ॥ २५ ॥ प्रथमं पृथिवीतत्त्वं जलतत्त्वं द्वितीयकम् । तेजस्तत्त्वं तृतीयं च¹ वायुतत्त्वं चतुर्थकम् ॥ २६ ॥ आकाशं पंचमं तत्त्वं मनः षष्ठमुदीरितम् । सप्तमं परमं तत्त्वं यो जानाति स मोक्षभाक् ॥ २७ ॥ पहला पृथिवी तत्त्व कहा गया है, दूसरा जलतत्त्व, तीसरा तेजस्तत्त्व, चौथा वायुतत्त्व, पाँचवाँ आकाश तत्त्व, एवं छठाँ मनस्तत्त्व कहा गया है । सातवाँ परम तत्त्व है उसे जो जानता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ २६ ।: २७ ॥ परं तत्त्वं समाख्यातं जन्मबन्धविनाशनम् । तस्याभ्यासं प्रवक्ष्यामि येन संजायते लयः ॥ २८ ॥ “परतत्त्व” जन्मरूप बन्धन का विनाशक कहा गया है। मैं उसके अभ्यास की विधि बतलाऊंगा जिससे लय होता है ॥ २८ ॥ विविक्तदेशे सुखसंनिविष्टः समासने किंचिदुपेत्य पश्चात् । बाहुप्रमाणं स्थिरदृक् स्थिरांग- श्चिन्ताविहीनोऽभ्यसनं² कुरुष्व ॥२६॥³ निर्जन और पवित्र स्थान में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर झुक कर अर्थात् तन कर सुख से बैठे हुए तुम एक हाथ दूर तक दृष्टि को स्थिर कर निश्चल शरीर और चिन्ताविहीन होकर उस परमतत्त्व का अभ्यास करो ॥ २६ ॥ १. (ख) स्यात् । २. (ख) स्थिरांगं । ३. श्लोक १६ की यहाँ पर जो पुनरावृत्ति हुई है इसका कारण आसन के पश्चात् ही ध्यान की प्रक्रिया द्वारा अमनस्क योग का निरूपण करना है ।

भुजंगासन पश्चिमोत्तानासन मत्स्यासन

पृर्वोत्तानासन ( हलासन ) शवासन मयूरासन ( सव्य )

[ ६ ] सुखासने समासीनस्तत्त्वाभ्यासं समाचरेत् । सदाभ्यासेन तत्कुर्यात् परतत्त्वप्रकाशनम्१ ॥ ३० ॥ सुखासन पर बैठकर परतत्त्व का अभ्यास करना चाहिये । साधक को चाहिये कि सदा के अभ्यास द्वारा उस परतत्त्व को प्रकाश में लावे ॥ ३० ॥ ब्रह्माण्डं पंचभूतस्थं पंचभूतमयी तनुः । सर्वं भूतमयं चेति२ त्यक्त्वा नास्तीति चिन्तय३ ॥३१॥ सारा ब्रह्माण्ड पंचभूतों पर आधृत है, शरीर भी पंचभूतमय है, यही क्यों सब कुछ भूतमय है, इसलिए उन सबका परित्याग कर “ये है ही नहीं” ऐसी भावना करो ॥ ३१ ॥ न किंचिन्मनसा ध्यायेत्सर्वचिन्ता विवर्जितः । सबाह्याभ्यन्तरे योगी जायते तत्त्वसंमुखः ॥ ३२ ॥४ सब तरह की चिन्ताओं से रहित होकर मन से किसी का भी चिन्तन न करे ऐसे योगी के बाहर और भीतर तत्त्व सम्मुख हो जाता है अर्थात् उसे बाहर और भीतर तत्त्व का स्फुरण हो जाता है ॥ ३२ ॥ तत्त्वस्य संमुखे जाते अमनस्क५ प्रजायते । असनस्केऽपि संजाते चित्तादि६विलयो भवते ॥ ३३ ॥ तत्त्व के संमुख होने पर७ अमनस्क योग हो जाता है । अमनस्क योग की प्राप्ति होने पर चित्त आदि का भली भांति लय हो जाता है ॥ ३३ ॥ १. (ख) परं तत्त्वं प्रकाशते । २. (ख) वेति । ३. (ख) भावयेत् । ४. हठयोगप्रदीपिका में भी लिखा है कि :- बाह्यचिन्ता न कर्तव्या तथैवान्तरचिन्तनम् । सर्वचिन्ता परित्यज्य न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ ५. (ख) त्वमनस्कं । ६. (ख) चिन्तादिविलयो । ७. आत्मा के संमुख होने पर ।

[ १० ] चित्तादिविलये जाते पवनस्य लयो भवेत्¹ । मनःपवनयोर्नाशादिन्द्रियार्थं विमुञ्चति ॥ ३४ ॥ चित्त आदि का विलय हो जाने पर पवन ( वायु ) का लय हो जाता है । मन और पवन दोनों का विनाश ( विलय ) होने पर साधक इन्द्रियार्थों ( रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श ) का त्याग कर देता है । 'इन्द्रियार्थाद् विमुच्यते' ऐसा पाठ मानने पर इन्द्रियार्थों से मुक्त हो जाता है, यह अर्थ करना चाहिये ॥ ३४ ॥ इन्द्रियार्थैर्यदा मुक्तो² बाह्यज्ञानं न जायते । बाह्यज्ञाने विनष्टे च ततः सर्वसमो भवेत् ॥ ३५ ॥ जब साधक इन्द्रियार्थों से ( रूप, शब्द, गन्ध आदि से ) मुक्त हो जाता है तब उसे बाहरी ज्ञान नहीं होता है । बाहरी ज्ञान के विनष्ट होने पर वह “सर्वसम” यानी विषमता रहित हो जाता है ॥ ३५ ॥ यदा सर्वसमे जाते³ भवेद् व्यापारवर्जितः । परब्रह्मणि⁴ सम्पन्नो⁵ योगी प्राप्तलयस्तदा ॥ ३६ ॥ जब साधक सर्वसम होने पर व्यापाररहित होता है तब परब्रह्म में सम्पन्न योगी लय को प्राप्त कहा जाता है । ३६ ॥ सदाभ्यासरतानां च यः परो जायते लयः । तस्याहं संप्रवक्ष्यामि लक्षणं मुक्तचेतसः ॥ ३७ ॥ सदा परतत्त्व के अभ्यास में निरत योगियों का जो उत्कृष्ट लय होता है उसका, जिसमें चित्त मुक्त हो जाता है, लक्षण मैं आगे कहूँगा ॥ ३७ ॥ १. ( ख ) यह पूरी पंक्ति नहीं है । २. (ख) इन्द्रियार्थे विनिर्मुक्ते । ३. (ख) यदासर्वसमो जातो । ४. (ख) परे ब्रह्मणि । ५. (ख) संबुद्धः ।

" is there a space? Yes. In L8, is it "काष्ठवत्तिष्ठेत्"? क + ा + ष + ठ + व + त् + त् + ि + ष + ् + ठ + े + त् = काष्ठवत्तिष्ठेत्. Wait, let's look at "लयस्थश्चाभिधीयते": ल - य - स्थ - श्च - ा - भि - धी - य - ते. Yes!

Let's check L9-10: "जो पुरुष न जीवित है, न मृत है, न पलक खोलता है और न पलक" "गिराता है, निर्जीव काष्ठ के तुल्य रहता है वह लयस्थ कहा जाता है ॥ ३६ ॥" Yes, perfectly clear.

Let's check L11-12: "निर्वातस्थापितो दीपो भासते निश्चलो यथा ।" "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा योगी लयं गतः ॥ ४० ॥" Wait, in L12: "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा" or "जगद्व्यापारनिर्मुक्तस्तथा"? There is a slight space: "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा" (or maybe space between words). Let's keep the space if there is one, or look: "जगद्व्यापार निर्मुक्तस्तथा". Yes, there's a space.

Let's check L13-15: "वायु रहित स्थान पर रखा हुआ

[ १२ ] लवणं तोयसंस्पर्शाद् यथा१ तोयमयं भवेत् । मनोऽपि ब्रह्म संस्पर्शात्तथा ब्रह्ममयं भवेत् ॥ ४३ ॥ जैसे नमक जल के सम्पर्क से जलमय हो जाता है वैसे ही ब्रह्म के संस्पर्श से मन भी ब्रह्ममय हो जाता है ॥ ४३ ॥ यथाक्षारमयत्वेन प्राप्नोति२ लवणं स्वकम् । ब्रह्मज्ञानमयत्वेन निर्वाणं मनसस्तथा ॥ ४४ ॥ जैसे जल में लवण की सत्ता जल के क्षारमय होने से प्राप्त होती है वैसे ही मन का ब्रह्म में निर्वाण मन के ब्रह्मज्ञानमय होने से प्रतीत होता है ॥४४॥ घृतात् पृथ'क्तारहितं घृते लीनं घृतं यथा । तत्त्वे लीनस्तथा योगी पृथग्भावं न विन्दति ॥ ४५ ॥ जैसे घृत में डुबा हुआ घृत घृत से पृथकता ( भेद ) रहित अर्थात् भिन्न नहीं है वैसे ही तत्त्व ( सत्ता ) में लीन हुआ योगी पृथग्भाव अर्थात् तत्त्व से अपना भेद नहीं जानता है ॥ ४५ ॥ निमेषेण श्वासपलै३ र्नाडी

[ १३ ] योगी निमेषमात्रेण लयेन लभते ध्रुवम् । स्पर्शनं परतत्त्वस्याप्युत्थानं च पुनः पुनः ॥ ४८ ॥ योगी एक निमेषमात्र के लय से निश्चय ही परतत्त्व के स्पर्श को प्राप्त होता है और उससे पुनः पुनः व्युत्थान को प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥ घर्मशान्तिः प्रजायेत मुहुर्निद्रा च मूर्च्छना । निमेषषट्कमात्रेण लयेनान्तःस्थ योगिनः१ ॥ ४६ ॥ छह निमेषों तक के लय से अन्तर्वृत्तिवाले योगी की तापशान्ति होती है, बार बार निद्रा और मूर्च्छा आती है ॥ ४६ ॥ श्वासमात्रलयेनापि तेन प्राणादिवायवः । श्वासप्रवाहसम्बन्धात् स्वे स्वे स्थाने वहन्ति ते ॥ ५० ॥ एक श्वास तक रहनेवाले लय से भी प्राण आदि वायु श्वास प्रवाह के साथ सम्बन्ध होने से अपने अपने स्थान में बहते हैं ॥ ५० ॥ श्वासद्वयलयेनापि कूर्मनागादिवायवः२ । निवर्तन्ते च धातूनां बन्धं कुर्वन्ति धातुगाः३ ॥ ५१ ॥ दो श्वास तक रहने वाले लय से भी कूर्म, नाग आदि वायु निवृत्त हो जाते हैं और धातुगत होकर धातुओं को पुष्ट करते हैं ॥ ५१ ॥ चतुःश्वासलयेनापि सप्तधातुगताः रसाः । रसपुष्टिं४ प्रकुर्वन्ति धातूनां समवायवः ॥ ५२ ॥ चार श्वास तक के लय से भी सातों धातुओं (कफ, पित्त, रस, रक्त, वसा, मज्जा, शुक्र) के रस समवायु होकर धातुओं के रसों की पुष्टि करते हैं ॥ ५२ ॥

१. (ख) लयेनिष्ठा च योगिनः । २. (ख) कूर्मवातादिवायवः । ३. (ख) धातवः । ४. (ख) समं पुष्टिं ।

[ १४ ] लयेन पलमात्रेण१ चासनस्थो न खिद्यते२ । स्वल्पश्वासो भवेद् योगी स्वल्पोन्मेषयुतस्तदा३ ॥ ५३ ॥ एक पल तक के लय से भी आसन पर चाहे कितनी ही देर तक क्यों न बैठे, योगी को थकान मालूम नहीं होती है । तब उसके श्वास-प्रश्वास कम हो जाते हैं और निमेष-उन्मेष भी बहुत कम होते हैं ॥ ५३ ॥ पलद्वयलयेनापि हृन्नाड्याश्चालनं४ भवेत् । अनाहतः स विज्ञेयो मनस्तत्रैव विन्यसेत्५ ॥ ५४ ॥ दो पल तक के लय से भी हृदय-नाड़ी का चालन ( जागना ) होता है६, उसे अनाहत जानना चाहिये । योगी मन को उसी में लगावे ॥ ५४ ॥ चतुःपलप्रमाणेन लयेनानुभवो भवेत् । अकस्मान्निपतत्येव शब्दः कर्णो शुभावहः७ ॥ ५५ ॥ चार पल तक के लय से अनुभव होता है । अकस्मात् कान में सुन्दर सुमधुर शब्द सुनाई पड़ता है ॥ ५५ ॥ पलाष्टकलयेनापि कामस्तस्य निवर्तते । कदापि८ नैव जायेत कामिन्यालिंगितस्य च ॥ ५६ ॥ आठ पल तक के लय से उसकी कामवासना निवृत्त हो जाती है । कामिनी द्वारा आलिंगित होने पर उसे कभी भी कामोत्पत्ति नहीं होती है ॥ ५६ ॥ १. (ग) लयेन लयमात्रेण । २. (ख) विद्यते । ३. (ख) स्वल्पो मेखलयस्तथा । ४. (ख) हृन्नाड्याश्चलनं । ५. (ख) तत्रैवमभ्यसेन्मनः । ६. "हृदय-नाडी का चालन" का अर्थ है अनाहत का क्रियाशील होना । ७. (ख) शब्दस्पातं शुभाशुभम् । ८. (क) तथापि ।

[ १५ ] कलापादलयेनापि सुषुम्णां यान्ति वायवः¹ । सुषुम्णावदने गत्या आशु शुद्ध्यन्ति वायवः² ॥ ५७ ॥ चौथाई कला ( घड़ी ) तक के लय से भी प्राणादि वायु सुषुम्णा में चले जाते हैं । सुषुम्णा के मुख में गमन से तत्काल सब वायु शुद्ध हो जाते हैं ॥५७॥ घटिकार्द्धलयेनापि शक्तिः कुण्डलिनी परा³ । मनोवातनिरोधेन जागर्त्याधारसंस्थिता⁴ ॥ ५८ ॥ आधी घड़ी तक के लय से निश्चय ही मूलाधार में स्थित परा कुण्डलिनी शक्ति मन और वायु के निरोध से जाग जाती है ॥५८ ॥ कलामात्रलयेनापि⁵ शक्तिः संचलते ध्रुवम् । ⁶ऊर्द्ध्वपश्चिममार्गेण वातरोधेन जाग्रती⁷ ॥ ५६ ॥ एक घड़ी तक के लय से भी वायु का रोध होने पर जगी हुई कुण्डलिनी शक्ति पश्चिम मार्ग ( सुषुम्णा मार्ग ) द्वारा ऊर्ध्वमुखी होकर चलने लगती है ॥ ५६ ॥ कलाद्वयलयेनापि शक्तेः संचलनेन वा⁸ । क्षणादुत्पद्यते तस्य मनसः कम्पनं सकृत् ॥ ६० ॥ दो घड़ी तक के लय से तथा शक्ति के संचलन से एक क्षण में एक बार योगी के मन कम्पन उत्पन्न होता है ॥ ६० ॥ १. (ख) सुषुम्णामार्गवाहिनी । २. (ख) तदा पश्चिममार्गेण तस्य भोगेन गच्छति । (क) मील्या (शुचिवद्यान्ति ) वायवः । ३. (क) शक्तिः संचलते ध्रुवम् । (ख) शक्ति कुण्डलिनी परा । ४. (क) ऊर्ध्वपश्चिममार्गेण वातरोधेन जाग्रति ( जाग्रती ? ) । ५. (क) घटिकैकलयेनापि सुषुम्णा मार्गवाहिनी । ६. कला । ७. गच्छति । ८. (क) शक्तिसंचालनेन वा । (ख) शक्ते संचलनेन च ।

[ १६ ] चतुः कलालयेनापि निद्राभावो निवर्तते । हृदि स्फुलिंगवद् योगी तेजोबिन्दुं प्रपश्यति ॥ ६१ ॥ चार घड़ी तक के लय से योगी का निद्राभाव निवृत्त हो जाता है और वह हृदय में चिनगारी के सदृश तेजो बिन्दु का दर्शन करता है ॥ ६१ ॥ दिनपादलयेनापि स्वल्पाहारो भवेन्नरः१ । स्वल्पमूत्रपुरीषश्च लघुता स्निग्धता तनोः२ ॥ ६२ ॥ चौथाई दिन तक के लय से भी योगी पुरुष का आहार बहुत घट जाता है, उसका मूत्र और पुरीष ( मल ) भी बहुत अल्प मात्रा में होता है एवं शरीर में हल्कापन और स्निग्धता आ जाती है ॥ ६२ ॥ वासरार्धलयेनापि स्वात्मज्योतिः प्रकाशते । सूर्यो गोभिरिवोद्दीप्तो३ योगी विश्वं प्रकाशते ॥ ६३ ॥ आधे दिन तक के लय से आत्मज्योति प्रकट होती है। सूर्य जैसे किरणों से उद्दीप्त रहता है वैसे ही योगी उद्दीप्त होकर विश्व को प्रकाशित करता है ॥ ६३ ॥ दिनमात्रलयेनापि स्वात्मतत्त्वं प्रकाशते । इन्द्रियज्ञानविस्तारो ब्रह्माण्डेऽप्यनुवर्तते४ ॥ ६४ ॥ दिन भर तक रहने वाले लय से आत्मतत्त्व प्रकाशित होता है और इन्द्रियों के ज्ञान का विस्तार सारे ब्रह्माण्ड तक हो जाता है ॥ ६४ ॥ १. (ख) भवेत्ततः । २. (ख) स्वल्पमूत्रपुरीषत्वं लघुता स्निग्धता तथा । ३. (ख) स सुगोभिरिवोद्धीप्तो । ४. (ख) ब्रह्माण्डेप्यस्य जायते ।

[ १७ ] अहोरात्रलयेनापि योगी च स्वासने स्थितः१ । चित्तवृत्तिनिरोधेन२ गन्धं जानाति दूरतः ॥ ६५ ॥ एक दिनरात तक के लय से भी अपने आसन पर स्थित ही योगी चित्त- वृत्ति का निरोध होने से दूर से ही गन्ध जान जाता है ॥ ६५ ॥ अहोरात्रद्वयेनापि लयेनानन्दमूर्च्छितः।३ दूरादपि रसं वेत्ति योगी संकल्पवर्जितः ॥ ६६ ॥ दो दिनरातों तक के लय से भी लयजनित आनन्द से मूर्छित हुआ संकल्परहित योगी दूर से ही रस को जान जाता है ॥ ६६ ॥ अहोरात्रत्रयेणापि लयेनान्तस्थयोगिनः४। दूरदर्शनविज्ञानं५ स्वभावेनैव वर्तते ॥ ६७ ॥ तीन अहोरात्रव्यापी लय से अन्तर्मुख हुए योगी का स्वभावतः ही दूर- दर्शन विज्ञान हो जाता है ॥ ६७ ॥ अहोरात्रचतुष्केण लयभावप्रभावतः । स्पर्शं जानाति योगीन्द्रो दूरादपि न संशयः ॥ ६८ ॥ चार अहोरात्र व्यापी लयभाव के प्रभाव से योगिराज दूर से भी स्पर्श को जान जाता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६८ ॥ पंचरात्रलयेनापि तस्याप्युत्पद्यते ध्रुवम् । दूरश्रवणविज्ञानं मनसाश्चर्य कारणम् ॥ ६६ ॥ पांच अहोरात्रव्यापी लय से उस योगिराज का निश्चय ही आश्चर्यजनक मन से दूर के शब्द को सुनने का विज्ञान उत्पन्न हो जाता है ॥ ६६ ॥ १. (क) लयादानन्दमूर्च्छितः । २. (ख) स्थितिवृत्तिनिरोधेन । ३. (ख) लयानन्दसमूर्च्छितः । (क) लयनादेषु मूर्च्छित । ४. (ख) लयानन्दस्य योगिनः । ५. (ख) दूराद् दर्शन विज्ञानं । २

[ १८ ] एकत्वं चेन्द्रियज्ञानं महत्त्वानुभवात्मकम्¹। जानात्यनेन योगीन्द्रः सकलं विश्ववर्तनम् ॥ ७० ॥ इससे योगिराज स्वानुभवात्मक एकत्व, विस्तृत ब्रह्माण्डव्यापी इन्द्रियज्ञान तथा सकल विश्व में स्थिति जान जाता है ॥ ७० ॥ रात्रिषट्कलयेनापि² महाबुद्धिः प्ररोहति । तावत्कार्यमतीतं³ च विश्वज्ञानं प्रवर्तते ॥ ७१ ॥ छह अहोरात्रव्यापी लय से महाबुद्धि उत्पन्न होती है जिससे सब कार्यों तथा अतीत और अनागत विश्व का ज्ञान होता है ॥ ७१ ॥ सप्तरात्रलयेनापि परे लीनस्य योगिनः । आब्रह्मविश्ववेत्तृत्वं श्रुतिज्ञानं च वर्तते⁴ ॥ ७२ ॥ सात अहोरात्रव्यापी लय से भी परतत्त्व में लीन हुए योगी का ब्रह्म- पर्यन्त विश्वज्ञान तथा श्रुतिज्ञान हो जाता है ॥ ७२ ॥ अष्टरात्रलयेनापि भवेद् योगी निरामयः । क्षुत्पिपासादिभावैश्च सहजस्थो न पीड्यते⁵ ॥ ७३ ॥ आठ अहोरात्रव्यापी लय से सहजस्थ ( परतत्त्व में लीन ) योगी, निरोग हो जाता है एवं क्षुधा, प्यास आदि से भी पीड़ित नहीं होता है ॥ ७३ ॥ नवरात्रलयेनापि निर्वेदस्यात्मवर्त्मनः⁶। वाचः सिद्धिर्भवेत्येव⁷ शापानुग्रहकारिणी ॥ ७४ ॥ नौ अहोरात्रव्यापी लय से अपरोक्ष आत्मज्ञान के मार्गरूप निर्वेद ( वैराग्य ) की सिद्धि तथा शाप और अनुग्रहकारिणी वाक्सिद्धि अवश्य ही होती है ॥ ७४ ॥ १. (ख) एवं पंचेन्द्रियज्ञानं महत्तत्त्वस्य कारणम् । २. (ख) षड्रात्रिविलयेनापि । ३. (क) यावत्कर्ममतीतं च । (ख) यावत्तर्कमतीतं च । ४. (ख) आब्रह्मविश्वेश्वरत्वं श्रुतिज्ञानं च जायते । ५. (ख) सहजैरपि न पीड्यते । ६. (ख) निर्भेदः स्वात्मवर्तिनः । ७. (ख) वाचःसिद्धि भवेत्तस्य ।

[ १६ ] दशरात्रलयेनपि योगीन्द्रः स्वात्मनि स्थितः । यानि कानि च गुप्तानि१ महाचित्राणि पश्यति ॥ ७५ ॥ दस अहोरात्रव्यापी लय से स्वात्मनिष्ठ योगीन्द्र भाँति-भाँति के गुप्त महाश्चर्यों को देखता है ॥ ७५ ॥ २ततश्चैकादशाहेन३ लयस्थस्य जवोदयात् । मनसा सहितस्यापि गन्तुमिच्छति विग्रहः ॥ ७६ ॥ ग्यारह अहोरात्र तक लय में स्थित योगीन्द्र की मन के साथ-साथ काया की गति होती है ॥ ७६ ॥ द्वादशाहलयेनापि भूचरत्वं हि सिद्धयति । निमेषार्धप्रमाणेन४ पर्यटत्येव भूतले५ (लम् ?) ॥ ७७ ॥ बारह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को भूचरत्व की सिद्धि होती है जिसके कारण केवल आधे निमेष ( पलक मारने ) में सारे भूतल में चारो ओर घूम लेता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७७ ॥ ततस्त्रयोदशाहेन लयेनापि महाद्भुताम्६ । योगीन्द्रः खेचरीसिद्धिं लभते चिन्तनादपि७ ॥ ७८ ॥ तदनन्तर तेरह अहोरात्रव्यापी लय से योगिराज को केवल चिन्तनमात्र ( ख्याल करने ) से अद्भुत खेचरी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ७८ ॥ १. (ख) सुगुप्तानि । २. (क) तथा । ३. (क) तस्य चैकादशाहेन लयस्थस्य जयोदयात् । ४. (क) निमिषार्धप्रमाणेन । ५. (ख) भूतलम् । ६. (क) और (ख) महाद्भुतम् । ७. (ख) चेतनादपि ।

[ २० ] चतुर्दशदिनान्तं तु¹ लयस्थो यदि तिष्ठति । अणिमाख्या च सिद्धिः² स्यादणुत्वं प्राप्यते यया ॥७६॥ यदि योगी चौदह दिन पर्यन्त लगातार लयस्थित रह जाता है तो अणिमा नाम की सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिससे अणुत्व प्राप्त किया जाता है ॥७६॥ आत्मन्येवात्मना लीनो योगी षोडशवासरान्³। लभते महिमासिद्धिं महारूपस्य धृग् यया⁴ ॥ ८० ॥ यदि योगी लगातार सोलह दिनों तक आत्मा में स्वयं लीन रहे तो 'महिमा' नाम की सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिससे वह महान् रूप धारण करता है ॥ ८० ॥ अष्टादशदिनान्तं तु⁵ लयस्थो यदि तिष्ठति । गरिमाख्या भवेत् सिद्धिर्ययाभूभारधृग्⁶ भवेत् ॥ ८१ ॥ यदि योगी अठारह दिनों तक लगातार लयस्थ रहता है तो उसे 'गरिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह आवश्यकता पर भूमिका-सा भारीपन धारण कर लेता है ॥ ८१ ॥ अभिन्नार्थे लये वापि यश्च विंशतिवासरान्⁷ । लघिमाख्या भवेत्सिद्धिर्ययाणुत्वस्य⁸ भारधृक् ॥ ८२ ॥ जो योगी परतत्त्व में लगातार बीस अहोरात्र लीन रहता है उसे 'लघिमा' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिसमे वह अणु का भार धारण कर लेता है ॥ ८२ ॥ १. (ख) चतुर्दशदिनानां च । २. (ख) अणिमाद्यष्टसिद्धिः स्याद० । ३. (ख) वासरात् । ४. (ख) स महारूपधृक् यथा । ५. (ख) अष्टादश दिनानां च । ६. (ख) गरिमाख्यां लभते सिद्धि यथा । ७. (ख) पंचविंशतिवासन् । ८. (ख) सिद्धिर्यथा ।

[ २१ ] द्वाविंशतिदिनान्येवं स्वलक्ष्ये विलयं गतः¹। प्राप्तिसिद्धिर्भवेत्तस्य प्रापयेद्धि जगत्स्थितिम् ॥ ८३ ॥ यदि योगी अपने लक्ष्यभूत परतत्त्व में इस प्रकार से लगातार बाईस दिनों तक विलय को प्राप्त होता है तो उसे 'प्राप्ति' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह सारे जगत् को स्थिति प्राप्त कराता है ॥ ८३ ॥ परे लयं गतो योगी चतुर्विंशतिवासरान् । तस्य प्राकाम्यसिद्धिः स्यादिच्छितं लभते ध्रुवम्² ॥ ८४ ॥ यदि योगी लगातार २४ दिनों तक परतत्त्व में लय को प्राप्त रहता है तो उसे 'प्राकाम्य' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे अवश्य ही उसे मनोभि- लषित पदार्थों की प्राप्ति होती है ॥ ८४ ॥ यस्यैवास्तगतं चित्तं षड्‌विंशतिदिनानि वै । लभते जगतीशित्वं³ येन विश्वगुरुर्भवेत् ॥ ८५ ॥ जिसका चित्त लगातार छब्बीस दिनों तक परतत्त्व में अस्त (लीन) रहता है वह जगत् में 'ईशित्व' नाम की सिद्धि प्राप्त करता है जिससे वह विश्वगुरु होता है ॥ ८५ ॥ अष्टाविंशत्यहान्यस्य⁴ लयस्तिष्ठेत् स्थिरात्मनः⁵ । वशित्वसिद्धिराप्तिः स्याद्ययावै वशयेज्जगत्⁶ ॥ ८६ ॥ जिस स्थिरात्मा योगिराज का लगातार अट्ठाईस दिनों तक पर तत्व में लय स्थायी रहता है उसे 'वशित्व' नाम की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह सम्पूर्ण जगत् को अपने वश में कर सकता है ॥ ८६ ॥ १. (ख) द्वाविंशतिदिनानि स्याल्लयक्षेपो लयंगतः । २. (ख) वशित्वं लभते तथा । ३. (क) जगदीशित्वम्' और (ख) 'जगदीशत्वम्' । ४. (क) और (ख) अष्टविंशत्यहर्यस्य । ५. (ख) लयस्थस्यस्थिरासने । ६. (ख) वश्यकृज्जगत्।

[ २२ ] गन्तुमिच्छन्ति ये केचित् परे ब्रह्मपदे लयम् । भवन्ति सिद्धयस्तेषां 'सर्वा विध्वंसकारिकाः ।'१ ८७ ॥ जो कोई महापुरुष परब्रह्म पद में लीन होना चाहते हैं उनके लिये ये पूर्वोक्त सब सिद्धियां सर्वनाशकारिणी होती हैं इसलिए उन्हें सिद्धियों की ओर आकृष्ट नहीं होना चाहिये ॥ ८७ ॥ मासमेकं लयो यस्य लग्नस्तिष्ठत्यखण्डितः२ । न जागर्ति स योगीन्द्रो यावन्मोक्षं' न विन्दति३ ॥ ८८ ॥ जिस योगी का एक मास तक लगातार अखण्डित लय रहता है वह योगिराज जब तक मोक्ष नहीं होता तब तक जागता नहीं है ॥ ८ ८ ॥ नवमासलयेनापि पृथवीतत्त्वं स विन्दति४ । पृथवीतत्त्वे तु५ संसिद्धे योगीन्द्रो वज्रसंनिभः ॥ ८६ ॥ नौ महीने तक के लय से योगिराज को पृथिवी तत्त्व का लाभ हो जाता है । पृथिवी तत्त्व के सिद्ध हो जाने पर योगिराज वज्र तुल्य देह हो जाता है अर्थात् उसकी काय-सिद्धि हो जाती है ॥ ८६ ॥ सार्धसंवत्सरेणापि लयस्थस्यापि योगिनः । तोयतत्त्वस्य सिद्धिः स्यात् तोयतत्त्वमयो भवेत्६ ॥ ६० ॥ डेढ़ वर्ष तक लगातार परतत्त्व में लीन योगी को जलतत्त्व की सिद्धि होती है जिससे योगी जलतत्त्वमय होता है ॥ ६० ॥ १. (ख) सर्वास्तेषां । २. (ख) मासमेकं लये यस्य लयस्तिष्ठेदखण्डितः । ३. (ख) यावन्मोक्षं स गच्छति । ४. (ख) स गच्छति । ५. (ख) पृथवीतत्त्वेति संसिद्धे । ६. (ख) तोयतत्त्वमयो हि सः ।

[ २३ ] संवत्सरत्रयेणापि लयस्थस्यापि योगिनः । तेजस्तत्त्वस्य सिद्धिः स्यात्तेजस्तत्त्वमयो भवेत्¹ ॥ ६१ ॥ तीन वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को तेजस्तत्त्व की सिद्धि होती है, जिससे वह तेजस्तत्त्वमय हो जाता है ॥ ६१ ॥ षड्भिः संवत्सरेरेवमखण्डलयसंस्थितः² । वायुतत्त्वस्य सिद्धिः स्यात् वायुतत्त्वमयो भवेत्³ ॥ ६२ ॥ इसी प्रकार छह वर्षों तक यदि योगी अखण्ड परतत्त्वलय में स्थित हो तो उसे वायुतत्त्व की सिद्धि होती है । वायुतत्त्व की सिद्धि से वह वायुतत्त्वमय हो जाता है ॥ ६२ ॥ तथा द्वादशभिर्वर्षैर्लयस्थस्य निरन्तरम् । व्योमतत्त्वस्य सिद्धिः स्याद् व्योमतत्त्वमयो भवेत्⁴ ॥६३॥ इसी प्रकार बारह वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को आकाश तत्त्व की सिद्धि होती है जिससे वह आकाश तत्त्वमय (सर्वव्यापक) हो जाता है ॥६३॥ चतुर्विंशतिभिर्वर्षैर्लयस्थस्य निरन्तरम् । शक्तितत्त्वस्य सिद्धिः स्याच्छक्तितत्त्वमयो भवेत्⁵ ॥६४॥ चौबीस वर्षों तक निरन्तर लयस्थ योगी को शक्तितत्त्व की सिद्धि प्राप्त होती है जिससे वह शक्तितत्त्वमय हो जाता है ॥६४॥ ब्रह्माण्डसकलं पश्येत् करस्थमिव मौक्तिकम्⁶ । आत्मकायस्वरूपं च निर्धार्याथ यथेप्सितम्⁷ ॥ ६५ ॥ तदनन्तर वह (योगिराज) अपने शरीर का मनचाहा स्वरूप छांट कर अर्थात् अपना जैसी इच्छा हो वैसा स्वरूप बना कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को हथेली में रखे मोती के समान देखे ॥६५॥ १. (ख) तेजस्तत्त्वमयो हि सः । २. (ख) षड्भिः संवत्सरैर्भूतैरखण्डलयसंस्थिते । ३. (ख) वायुतत्त्व मयो हि सः । ४. (ख) व्योमतत्त्वमयो हि सः । ५. (ख) शक्तितत्त्वमयो हि सः । ६. (ख) ब्रह्माण्डान् सकलान् पश्येत्पाणिस्थमिव मौक्तिकम् । ७. (ख) निर्धार्याथ यथास्थितम् ।

[ २४ ] कायस्थो दृश्यते लोके१ तत्त्वचर्यां समाचरेत् (चरन् ?) । तत्त्वचर्यां करोत्येव शक्तितत्त्वक्षयाय च ॥ ६६ ॥ कायस्थ ( शरीर स्थित ) योगी लोक में तत्त्वचर्या का आचरण करता हुआ दिखाई देता है क्योंकि शक्तितत्त्व के विनाश के लिए उसे तत्त्वचर्या अवश्य ही करनी पड़ती है ॥६६॥ इत्थं क्रमविवृद्धेन लयाभ्यासेन योगिनः । भुंजते परमानन्दं भुशुण्ड्यादिमहात्मवत् ॥ ६७ ॥ इस प्रकार क्रम से वृद्धि प्राप्त हुए लयाभ्यास से योगी भुशुण्डि आदि महात्माओं के तुल्य परमानन्द का भोग करते हैं ॥६७॥ ब्रह्मविष्णुमहेशानां प्रलयेष्वपि योगिनाम् । नास्ति पातो लयस्थानां महातत्त्वे विवर्तिनाम् ॥ ६८ ॥ ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के प्रलय होने पर महातत्त्व में अधिष्ठित लयस्थ योगियों का पात (विनाश) नहीं होता है ॥६८॥ इत्यमनस्कखण्डे२ ईश्वरपार्वतीसंवादे३ प्रथमोऽध्यायः ॥

१. (ख) लोको । २. (ख) पुस्तक पाठः, अमनस्केयोगशास्त्रे । ३. (ख) पाठः—ईश्वरवामदेवसंवादे ।

उत्तरार्ध श्रीवामदेव उवाच- भगवन् देवदेवेश परमानन्दसुन्दरम् । अपरं किंचिदाख्याहि भवता यदुदीरितम् ॥ १ ॥ श्रीवामदेव जी ने कहा—भगवन्, हे देवाधिदेव, आपने जो पहले कहा था उसी तरह का परमानन्ददायक वृत्तान्त कहने की कृपा कीजिये ॥१ ॥ श्री ईश्वर उवाच- बहिर्मुद्रान्वितं पूर्वं बहिर्योगेन तन्मयम् । अन्तर्मुद्राख्यमपरं तयोर्योग (ग:?) तदेव हि ॥ २ ॥ श्री महादेव जी ने कहा—हे मुने, पूर्वोक्त तारक और अमनस्क दो योगों में पूर्वयोग अर्थात् तारक योग बाहरी मुद्रा से युक्त होने के कारण बाह्ययोग अर्थात् बहिर्योगमय है दूसरा अर्थात् अमनस्क अन्तर्मुद्रा नामक है, अतएव वही यथार्थ योग है ॥ २ ॥