अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
सूत्र- १३ ६१ यावन्न चालयेद्योगी ह्यक्षसूत्रकरस्थितम्। सप्तकोटिजपं कृत्वा हंसस्त्वेवं निवर्तते ॥ 15 ॥ एवं विश्वगतश्चारः प्राणिनां शुभदायकः। हंसरूपे स्थिताः प्राणाः प्राणास्तत्त्वैः प्रकीर्तिताः ॥ 16 ॥ इस प्रकार के हंसयोग के जाप में योगी अपने हाथ में अक्षमाला नहीं चलाता है तथापि उसके जाप सात करोड़ इस हंसत्व से पूरे निवर्त हो जाते हैं। इस प्रकार का विश्वगत सञ्चार समस्त प्राणियों के लिए शुभदायक है। इसीलिए हंस रूप में इन प्राणों के स्थित होने से ही इनको प्राणतत्त्व नाम से कहा गया है। अथ हृदयकमलमाह — हृदये सहजं पद्ममष्टपत्रं सबिन्दुकम्। इच्छाशक्तिस्तथा मध्ये दलान्ते कुलदेवताः ॥ 17 ॥ शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः। बीभत्साद्भुतशान्ताश्चाल्पाष्टौ ? कमले स्थिताः ॥ 18 ॥ कुलदेव्यष्टकोपेतमिच्छाशक्तिर्हदिस्थिता। अब हृदय के भावों का विशेष परिचय दिया जा रहा है— हृदय में सहज ही आठ पँखड़ियों और मध्य में बिन्दू युक्त कमल कहा गया है। इसमें बिन्दू रूप मध्य में तो इच्छा शक्ति है और आठों दलों-पँखड़ियों में कुल देवता हैं। इस कमल में (1.) शृङ्गार, (2.) हास्य, (3.) करुणा, (4.) रौद्र, (5.) वीर, (6.) भयानक, (7.) वीभत्स, (8.) अद्भुत- ये आठ (अल्परूप से शान्त भी) रस और मध्य बिन्दु में कुल देवियाँ भी स्थित हैं तथा इच्छा शक्ति भी हृदय में ही स्थित हैं। ऊर्ध्वाकारैः स्थिता ख्यातेन्द्रियैर्बुद्धिरनुक्रमात् ॥ 19 ॥ शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः। मनो बुद्धिरहंकारः सत्त्वं रजस्तमस्तथा ॥ 20 ॥ इस हृदय में ही ऊर्ध्वाकार में स्थित इन्द्रियाँ भी बुद्धि के अनुक्रम में स्थित हैं। इसी हृदय-कमल में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा मन, बुद्धि और आठवाँ अहङ्कार तथा सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण युक्त स्थित है। कामः क्रोधश्च मोहश्च लोभो हर्षो मदो भयम्। विषादश्चाष्टमः प्रोक्त इत्यष्टौ च गुणाः स्मृताः ॥ 21 ॥ इसी प्रकार हृदय कमल की अष्ट पँखड़ियों में ही काम, क्रोध, मोह, लोभ, हर्ष, मद, भय और आठवाँ विषाद स्थित हैं। इन्हीं आठों को गुण भी कहा गया है।
न्द्रपीठे च संस्थिता ? ॥ 3 ॥Wait, look at line 29:कामाख्यनिलयः प्रोक्तश्चन्द्रपीठे च संस्थिता ? ॥ 3 ॥There is a question mark before॥ 3 ॥! ? ॥ 3 ॥And in line 19:विदुः ? ॥ 1 ॥- also a question mark! This means the editor/proofreader was working with corrupt manuscripts, and where readings are corrupt or doubtful, they put a?or left the corrupt reading! Now look at line 28: Is there a question mark? No. But is the reading in the manuscript corrupt? Yes! In G.O.S. (Gaekwad's Oriental Series) edition of Aparajitaprccha, Sutra 14, verse 3: Let's see how Mankad or the editor transcribed it: Could it beहृग्रिममध्ये? Wait, look at the letters: हृ ग्रि म म ध्येWait, let's look atग्रिम: Is it ग्रि+म+म+ध्ये? Wait, why would it be ग्रिममध्ये? "हृग्रिममध्ये"? Wait! Look at the first letter: हृThenा? No, wait! Could it be ह
सूत्र-१४ 63 प्रविष्टा पद्मनालेऽपि सूर्यपीठे लयं गता। संस्थिता कामरूपान्ते सूर्येन्दुग्रहणे रता ॥ ४ ॥ विश्वकर्मा कहने लगे — ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् ब्रह्माण्ड की पोल में चन्द्रमा स्थित है और अग्नि के बीच में रवि या सूर्य विद्यमान है तथा जिसे कामाख्य निलय कहते हैं वह चन्द्र के पीठ के पीछे संस्थित है। पद्मनाल में प्रवेश करने पर भी वह सूर्य के पीछे ही लय हो गई। जब सूर्य और चन्द्र ग्रहण में रत होते हैं, तब उन्हें कामरूपान्त में संस्थित कहा जाता है। रविचन्द्रयुते काले शक्तिः सङ्क्रमते यदा। तत्काले ग्रहणं प्रोक्तं सङ्क्रान्तिर्विष्णुसम्भवा ॥ ५ ॥ ग्रहणान्ते पराशक्तिः पद्मतन्तुनिभा स्थिता। सृजति स्वेच्छया कामः भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ ६ ॥ रवि-चन्द्र की युति होने के समय जब शक्ति का सङ्क्रमण होता है, उस समय को ग्रहण कहा जाता है और इससे सङ्क्रान्ति तो विष्णु से ही सम्भव होती है। ग्रहण के अन्त में पराशक्ति पद्मतन्तु के समान स्थित रहकर अपनी स्वयं की इच्छा से काम का सृजन करती है जिससे चार प्रकार के भूतग्राम अर्थात् प्राणियों के समूह उत्पन्न होते हैं। कर्मकर्तृमणिर्बन्धुः करहीनाऽपि कर्षति। सृजति ज्ञानतस्तद्वच्चक्षुर्हीना जगत्त्रयम् ॥ ७ ॥ भ्रामको(की) भ्रामयेद् बन्धूः करहीनोऽपि भागशः ?। सृष्टिमार्गस्थिता शक्तिः करहीना करोति च ॥ ८ ॥ कर विहीन होने पर भी यह काम करने वाली कलाई (मणिबन्ध) पकड़कर खींचती है और चक्षु विहीन होने पर भी चक्षु वाले की तरह ज्ञान से ही तीनों लोकों की रचना कर देती है। यही भ्रामकी सभी बन्धुओं को स्वयं कर हीन होने पर भी उनकी कलाई पकड़कर भ्रामती, नचाती है। इस तरह यह पराशक्ति कर हीन होने पर भी अपने सृष्टि मार्ग पर चलती हुई सृष्टि की रचना करती है।¹ चन्द्रः कोऽपि मणिर्बद्धो नष्टचन्द्रः प्रमुञ्चति ?। मुखहीना तथा शक्तिर्वाङ्मयं दर्शयेत् खलु ॥ ९॥
- तथा चौपनिषद्वाक्यम्- 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः' — वे परमात्मा हाथ- पैरों से रहित होने पर भी ग्रहण करने में समर्थ और वेगपूर्वक चलने वाले हैं। वे नेत्रों के बिना ही देखते हैं और कानों के बिना ही सुनते हैं। (श्वेताश्वतरोपनिषद् 3, 19)
64 अपराजितपृच्छा अद्रवाऽपि द्रावयति यत्किञ्चित्काञ्चनादिकम्। ज्ञानशक्तिस्तथा चैवं निद्रवेत्सृष्टितोऽम्बरम् ॥ 10 ॥ इसी तरह वह किसी चन्द्र को भी उनकी कलाई पकड़कर छुड़ाती है। यह पराशक्ति मुखहीन होने पर भी समस्त वाङ्मय साहित्य-शास्त्रादि को कहकर प्रकट करती है। यह पराशक्ति स्वयं अद्रवा होने पर भी काञ्चनादि जो कुछ भी धातुएँ हैं, उनको द्रवित करती हैं, पिघलाती है। यह पराशक्ति ही अपनी सृष्टि से समस्त ज्ञानशक्ति को आकाश में प्रसारित करती है। अग्नितेजोगुणा यद्वत् सूर्यरश्मिगुणा यथा। रवेरिव गुणास्तद्वत् सहजाः शक्तिसंस्थिताः ॥ 11 ॥ निर्गुणाऽपि गुणैर्युक्ता रूपहीनाऽपि रूपिणी। सञ्चरेत्पादहीनाऽपि कर्णहीना श्रृणोति च ॥ 12 ॥ जिघ्रति घ्राणहीनाऽपि वक्त्रहीनाऽपि जल्पति। चक्षुर्हीना लोकते च त्रैलोक्यं च करस्थितम् ॥ 13 ॥ जिस प्रकार सूर्य की रश्मियों के साथ गुण का सम्बन्ध है, उसी प्रकार अग्नि का अपने तेज से गुण-सम्बन्ध है। रवि के समान ही सभी गुण उसी तरह शक्ति के साथ सहज ही स्थित है। यह पराशक्ति निर्गुणा होने पर भी गुणों के साथ है और रूप हीन होते हुए भी रूपवती है। यह पाँव विहीन होने पर भी चलती है और कानों के नहीं होने पर सुनती है। यह नासिका से विहीन होने पर भी सूंघती है और मुख हीन होने पर भी बोलती है। चक्षुहीना होकर भी यह देखती है और सारे तीनों लोक उसके कर-कमलों में स्थित है।¹ एवं सा सर्वरूपस्था ह्यमूर्ता मूर्तिचारिणी। पराशक्तिरितिख्याता ह्येका त्रैकोल्यनायिका ॥ 14 ॥ एषा सा परमा शक्तिरिच्छाज्ञानक्रियात्मिका। पृथगेकाष्टकैर्युक्ता ह्यज्ञानां ज्ञानदा स्मृता ॥ 15 ॥ इस प्रकार वह पराशक्ति सभी रूपों में स्थित होकर अमूर्त होने पर भी मूर्ति रूप में चलने वाली है इसीलिए तो इसे पराशक्ति नाम से विख्यात किया जाता है १. तथा च गीतायां— सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिरोमुखम्। सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ (13, 13-14) गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है—बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥ (रामचरितमानस 1, 118, 3-4)
सूत्र- १४ 65 जो तीनों लोकों— स्वर्गलोक, मर्त्यलोक व पाताललोक की नायिका अकेली एकछत्रा रूप में है। इस तरह की यह परमशक्ति इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मिका है। यही पराशक्ति पृथक्-पृथक् अठारह रूपों से युक्त होकर ही सब अज्ञानियों को ज्ञान देने वाली मानी गई है। अनेकभाविकं कर्म दग्धबीजमिवाम्भसि। भविष्यदपि संरुद्धं ज्ञानकं भुवि गोचरम्॥ 16 ॥ सहजं भोगजं कर्मानर्गलं भविष्यत्तथा। शक्तित्रयविभागेन दद्यात् सर्वं शुभाशुभम् ॥ 17 ॥ अनेक भावों से उत्पन्न कर्म भी इस पराशक्ति की कृपा से वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे जले हुए बीजों को अङ्कुरण के अर्थ में जल से सींचना व्यर्थ है। इस महामाया की कृपा से बन्धे और अवरुद्ध कार्य भी होने लगते हैं और ऐसे दिखने लगते हैं मानो ये पहले ही हमारे ज्ञान में हों और हमें गोचर होते रहे हों। इस पराशक्ति की कृपा से जन्म के साथ उत्पन्न होने वाले तथा पूर्वजन्म के प्रारब्ध, भोग के कारण उत्पन्न होने वाले कर्म भी अनर्गल हो जाते हैं अर्थात् अर्गला, बाधा रहित हो जाते हैं और तीनों ही शक्तियों के विभागानुसार सभी शुभाशुभ फल देने में समर्थ हो जाते हैं।¹ अथ शक्त्याप्रमाणानि — कारणे च क्रियाशक्तिरिच्छाशक्तिः प्रवर्तने। ज्ञानशक्तिस्तथाचारे सञ्चरेत्सचराचरम् ॥ 18 ॥ सर्वाङ्गसन्धिसञ्चारे नखकेशाग्रमध्यके। व्यापिनी संस्थिता देहे रेणुमात्रस्वरूपिणी ॥ 19 ॥ ये शक्तियाँ इस प्रकार हैं— (1.) कारण में क्रियाशक्ति लगती है, (2.) प्रवर्तन या चलने में, बढ़ने में इच्छाशक्ति लगती है और (3.) आचरण में ज्ञानशक्ति लगती है। इस तरह ये तीनों ही शक्तियाँ समस्त चराचर जगत में सञ्चरित होती है। देह के सभी अङ्गों के सञ्चारण के लिए, सभी सन्धियों को गति देने के लिए जैसे नख व केश के अग्रभाग में, मध्यभाग में भी सञ्चरण के लिए यह पराशक्ति रेणु- मात्र स्वरूप की होकर समस्त देह में स्थित रहती है। १. तथा च श्रीमद्भगवद्गीतायां— अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ (13, 17) पुराणेऽपि— सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्माविष्णुशिवात्मकः। स सञ्ज्ञां याति भगवान्एक एव जनार्दनः॥ (पद्मपुराण सृष्टिखण्ड 2, 114)
बीजरूपा तु सा देवी जगन्माता व्यवस्थिता। तां ज्ञात्वा मुच्यते पाशैस्सर्वज्ञस्तु नरो भवेत् ॥ 20 ॥ क्रियेच्छयोस्तथा ज्ञाने त्रिकरूपे व्यवस्थिता। प्रातर्यस्तु प्रबुद्धात्मा विन्द्यात् शक्तिपतिं तु सः ॥ 21 ॥ यह पराशक्ति बीज रूपा होकर ही जगन्माता के रूप में व्यवस्थित है। इस जगन्माता को ही सही-सही जान लेने पर सभी पाशों से मुक्ति मिल जाती है और इस प्रकार जान लेने वाला व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। क्रियाशक्ति, इच्छाशक्ति और ज्ञानशक्ति के इस त्रिक् रूप व्यवस्था से वह सर्वज्ञ प्रबुद्धात्मा भवसागर को तैर जाता है और शक्तिपति को पाने का अधिकारी हो जाता है। एवं शारीरिकं चक्रं शक्तित्रयसमन्वितम्। शक्त्यन्ते च शिवं विद्याद्यो दशान्ते कलौर्विना ? ॥ 22 ॥ इस प्रकार उक्त तीनों शक्तियों¹ के समन्वय को पाया हुआ यह शारीरिक चक्र शक्ति को जान लेने के अन्त में शिवतत्त्व को जान लेता है और इस तरह भवदशा के अन्त में बिना किसी कलह (कला ?) के भवसागर से तर जाता है, उसका मोक्ष हो जाता है।¹ एकः शिवः परं ब्रह्मपदमेव निराश्रयम्। पश्येत् संसारबीजं यो रम्भास्तम्भपुटं यथा ॥ २३ ॥ यस्य शिवशक्तिज्ञानं तस्य मुक्तिर्विधीयते। शक्तित्रयविमुक्तस्य भुक्तिर्मुक्तिविमोचनम् ॥ 24 ॥ दर्पणेषु यथा छाया पिण्डः पिण्डाकृतिर्भवेत्। तथा सर्वगतः शम्भुर्द्दश्यते जलचन्द्रवत् ॥ 25 ॥ एक ही शिव परम ब्रह्मपद है और वह निराश्रय है अर्थात् वह किसी के सहारे से नहीं है। जो इस संसार-बीज रूप शिव को केले के स्तम्भ की परतों की तरह देख लेता है, उसे ही शिव-शक्ति का ज्ञान प्राप्त कहा जाता है और उसकी मुक्ति निश्चित विधि के अनुसार हुई मानी जाती है क्योंकि शक्तित्रय के द्वारा हुए विमुक्त नर की प्रारब्ध भुक्ति भी और मुक्ति भी विमोचन को प्राप्त हो जाती है अर्थात् भुक्ति- मुक्ति भी छूट जाती है। उदाहरण के लिए जैसे दर्पण में अपनी परछाईं भी पिण्ड शरीर की आकृति जैसी दिखाई पड़ती है, उसी तरह ऐसे जीवन्मुक्त पुरुष को समस्त चराचर में शिव ही दिखाई देते हैं; यह दर्शन जल की उर्मियों पर सर्वत्र चन्द्र ही चन्द्र की भाँति दृष्टिगोचर होता है।
- तथा च— इच्छाज्ञानक्रियारूपास्त्रिशूलं शक्तयो मताः। उक्तास्ता एव खट्वाङ्गं शुद्धसत्त्वप्रवर्तिकाः ॥
सूत्र- १५ 67 स्वयं देवी स्वयं देवः स्वयं शिष्यः स्वयं गुरुः । स्वयं ध्यानं स्वयं धाता स्वयमेव परात्परम् ॥ २६ ॥ यत्र यत्र मनो याति ( यायात् ) तत्र तत्र परः शिवः । वेदो वेद्यं जपो मौनमाचारः प्रार्थना क्रिया ॥ २७ ॥ व्रतं स्नानं तीर्थयात्रा चोपवास्यं त्रिरात्रिकम् । इत्येतदाश्रयस्थानं मुक्तिस्थानं निराश्रयम् ॥ २८ ॥ ( इससे निष्कर्ष यह हुआ कि 'सोऽहं' का जाप करने वाला पराशक्ति को पाकर शिवतत्त्व को पा लेता है जिसमें) वह स्वयं को देवी तथा स्वयं को देव, स्वयं को शिष्य और स्वयं को गुरु, स्वयं को ध्यान और स्वयं को ध्यान करने वाला जानकर स्वयं को ही परात्परम् परमात्मा जान लेता है। ऐसी अवस्था में जहाँ-जहाँ उसका मन जाता है, वहाँ-वहाँ उसे परम शिव के ही दर्शन होते हैं और उसे समस्त वेद जाने हुए हो जाते हैं और उसके समस्त जप भी मौन में समा जाते हैं। उसके समस्त आचार-व्यवहार ही उसकी प्रार्थना की क्रिया बन जाती है। इस संसार के भवसागर में व्रत, स्नान, तीर्थयात्रा, उपवास, त्रिरात्रिक जपादि सब आश्रय के स्थान है, परन्तु जीवन्मुक्त को प्राप्त मुक्तिस्थान ही एक मात्र निराश्रय है अर्थात् स्वतन्त्र है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां शिवशक्तिब्रह्मज्ञानाधिकारो नाम चतुर्दश सूत्रम् ॥ 14 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शिव शक्ति ब्रह्मज्ञान अधिकार नामक चौदहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 14 ॥ गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनार्थं पञ्चदशं सूत्रम् ॥ 15 ॥ अपराजित उवाच — बीजरूपा कथं जाता वृद्धिंयाता परेश्वर । क्रियाशक्तिः कथं भूता बीजयोनिरथाम्भसि ॥ 1 ॥ अपराजित बोले — हे परमेश्वर ! यह प्राणी बीज रूप में कैसे जन्म लेता है, जन्म के बाद वृद्धि को कैसे प्राप्त करता है ? इस प्राणी में क्रियाशक्ति कैसे होती है जो कि बीज योनि को जैसे जल से सींचने पर बीज बढ़ता है, वैसे ही बढ़ती है। गुरुमार्गाः कथं प्रोक्ताः कुलाकुलोभयोद्भवाः ? । कथयस्व महाभाग मम भ्रान्तिहरं प्रभो ॥ 2 ॥ इसी प्रकार गुरु प्रदर्शित मार्ग किसे कहते हैं और कुल व अकुल इस भव में
68 अपराजितपृच्छा उद्भव करने वाले क्या हैं ? हे महाभाग ! यह सब ठीक-ठीक कहकर हे प्रभो, मेरी भ्रान्ति को दूर करें। विश्वकर्मोवाच — वटो यथा च बीजस्थस्तथा शुक्रगता तनुः । सङ्घाटे काञ्चनं यद्वत् क्रियादीपेन दृश्यते ॥ ३ ॥ हे वत्स ! जिस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म वट बीज में सम्पूर्ण वट वृक्ष समाया हुआ है उसी प्रकार जीव के शुक्र में उसका समस्त शरीर सम्पूर्ण रूप से समाया हुआ है। जिस प्रकार कञ्चन में स्थित आभूषण का घड़ा गया रूप क्रिया अर्थात् घड़ाई रूपी दीप से दिखाई पड़ता है, वैसे यह सब है। क्रियामाध्यात्मिकीं विद्यात् क्रियाशक्तेरनुक्रमात् । देहस्थं दीपकं दिव्यं शक्तिरूपण बोधितम् ॥ ४ ॥ तेन बोधितमात्रेण पश्यन्ति भुवनत्रयम् । त्रैलोक्यदीपकं दिव्यं तत्त्वद्योतकरं परम् ॥ ५ ॥ प्राणी की क्रिया शक्ति को आध्यात्मिक समझा जाता है। इसी क्रियाशक्ति के अनुक्रम से बढ़ते-बढ़ते देह में स्थित दिव्य दीपक प्रज्वलित हो जाता है, उसे ही शक्ति रूप से समझा जाता है। यह समझ में आते ही तीनों लोकों के चराचर जगत के प्राणी समूहों का ज्ञान से स्पष्ट दर्शन होने लगता है। इस तरह यह ज्ञान, तत्त्व को प्रकाशित करने वाला परम दिव्य त्रैलोक्य दीपक स्वरूप है। मूढात्मानो न बुध्यन्ति गुरुमार्गविवर्जिताः । गुरुवक्त्रे स्थितं तत्त्वं प्राप्यते तत्प्रसादतः ॥ ६ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु । इस तत्त्व को गुरुमार्ग पर नहीं चलने वाले मूढ़ लोग नहीं समझ सकते क्योंकि यह परम तत्त्व तो गुरुदेव के मुख में ही स्थित होता है और वह गुरु की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए यह तत्त्व प्राप्त करने के लिए सभी प्रयत्नों से गुरुदेव की आराधना करो। गुरुपूजननिर्देशमाह — गुरुपूजा प्रकर्त्तव्यागन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥ ७ ॥ पुष्पधूपैश्च नैवेद्यैर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः । गृहक्षेत्रपुरग्रामैर्गजाश्वशयनासनैः ॥ ८ ॥
सूत्र- १५ ६९ तस्मात् पूजा प्रकर्तव्या ह्यात्मना च धनेन च। गुरुदेव की पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षतादि से करनी चाहिए। गुरु पूजार्थ पुष्प, धूप, नैवेद्य, वस्त्रालङ्कार, गृह, खेत, नगर, ग्राम, हाथी-घोड़े, शयन-आसनों को समर्पित करना चाहिए। उन्हें यह सब भेंट में अर्पण करना चाहिए। इसलिए गुरुतत्त्व प्राप्ति के लिए स्वयं अपने आपको और धनादि को समर्पण करके गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए। गुरुमाहात्म्यमाह — गुरुलोपो न कर्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत् ॥ 9 ॥ यावत्कालं भवेद्देहस्तावदेव गुरुं स्मरेत्। गुरुर्माता पिता देवो गुरुर्ज्ञानं कुलाकुलम् ॥ 10 ॥ गुरु का लोप कभी नहीं करना चाहिए अर्थात् कभी भी गुरु विहीन नहीं रहना चाहिए। यदि कभी ऐसा अवसर भी आ जाए कि गुरु से दूर, स्वच्छन्द, अकेला रहना पड़े तो भी जब तक इस देह से जीवित रहो, तब तक गुरुदेव का सदा स्मरण करते रहो क्योंकि गुरुदेव ही माता, पिता, देव और सर्वस्व है, कुल और अकुल का बोधक भी गुरुज्ञान ही है। यस्यैवं संस्थितो भावस्तस्य देवसमं कुलम्। आसनं शयनं यानं मणिकाञ्चनभूषणम् ॥ 11 ॥ साधकेन न कर्तव्यं गुरो ( वै ) चाधिकं ननु। यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि जिस देव के प्रति आपका भाव दृढ़ता से संस्थित हो गया हो, उसी देव के समान कुल के आप हो जाते हैं। साधक को चाहिए कि वह अपने आसन, शयन, यान तथा मणिकाञ्चन, आभूषणादि को किसी भी प्रकार से गुरु से अधिक महत्व न दें। गुरु के सामने अपना वैभव प्रदर्शन नहीं करें। गुरोः शय्यासने यानं पादुकोपानहौ पदम् ॥ 12 ॥ स्नानोदकं तथाच्छायां लङ्घयेन्न कदाचन। कर्मणा मनसा वाचा यैश्च नाराधितो गुरुः ॥ 13 ॥ तस्माद् ज्ञानं महारत्नमत्यन्तं गूढतां गतम्। योगिनी शाकिनी कर्म ? यस्य भक्तिस्तु निश्चला ॥ 14 ॥ गुरुदेव की शय्या, आसन, यान, पादुका, पनही-पगरखी, चरणचिह्न, स्नान का जल तथा गुरुदेव के शरीर की परछाई को कभी नहीं लांघना चाहिए क्योंकि जिसने
70 अपराजितपृच्छा मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु तत्त्व की आराधना की है अर्थात् उसके लिए यह परम कर्तव्य है। इस तरह जिस साधक की गुरुतत्त्व में निश्चला, अडिग भक्ति है, वह योगिनी, शाकिनी क्रम के अत्यन्त गूढ़ता को पहुँचे हुए ज्ञान महारत्न का अधिकारी हो जाता है। तस्य प्रवर्तते शीघ्रं निर्वाणं परमं पदम्। इत्थं समययुक्त्या च गुरुभक्तो यतेन्द्रियः ॥ 15 ॥ दृढचित्तेन चादद्याद् ज्ञानं त्रैलोक्यपूजितम्। मूलसूत्रमहारत्नं रत्नपीठविनिर्गतम् ॥ 16 ॥ ऐसा साधक शीघ्र ही निर्वाण के परमपद की ओर अग्रसर हो जाता है। यही यतेन्द्रिय गुरुभक्त के लिए युक्त समय समझना चाहिए और वह दृढ़चित्त से साधना करने से प्राप्त इस ज्ञान के बल पर त्रैलोक्य पूजित हो जाता है। यह ज्ञान मूलसूत्र रूपी महारत्न है जो गुरुतत्त्व रूपी रत्नपीठ से निकला हुआ समझना चाहिए। सारभूतं महातत्त्वं मुक्तिमार्गप्रकाशकम्। आदेयं गुरुभक्ताय वज्रकपाटमुत्तमम् ॥ 17 ॥ यही सारतत्त्व, महातत्त्व है जो मुक्तिमार्ग को प्रकाशित करने वाला है और गुरुभक्त को गुरुदेव के द्वारा दिया गया, उसकी रक्षा करने वाला, सर्वोत्तम वज्रकपाट रूप से मिला हुआ तत्त्वज्ञान है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनाधिकारो नाम पञ्चदश सूत्रम् ॥ 15 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गीता सद्भाव अपरनाम अपराजितबोध अधिकार नामक पन्द्रहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 15 ॥ सत्वरजस्तमः षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥ अपराजित उवाच - सत्त्वं रजस्तमः कीदृक् कथं तेषां समुद्भवः। संसारस्य समस्तस्य जननी जगमालिनी ? ॥ 1 ॥ समुद्भूता कथं देव संसारसृष्टिमालिका। सत्त्वं रजस्तमश्चैवं कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥ अपराजित बोले – सत्व, रज और तम (गुण) क्या हैं? इनका उद्भव कैसे होता है? इस समस्त संसार की जननी इन्हीं सत्व, रज, तम की शृङ्खला ही है? हे
सूत्र-१६ 71 देव! यह संसार की सृष्टि शृङ्खला सत्व, रज, तम की किस प्रकार उत्पन्न हुई, इसके विषय में आप कृपा करके कहिए। विश्वकर्मोवाच — उत्पत्तिर्जगतो हेतुर्निर्मिता किल विष्णुना। स्रष्टा वै सर्वशिल्पाना शङ्खशार्ङ्गादिधारिणा ॥ ३॥ तत्रोद्भूतं रजः सत्त्वं तमश्चापि तृतीयकम्। तदुद्भवा च सृष्टिस्तु जनसन्तानसन्ततिः ॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले — जगत की उत्पत्ति के लिए ही शङ्ख, शार्ङ्गपाणि भगवान् विष्णु ने इन सब सत्व, रज व तम का निर्माण किया है और वे विष्णु ही समस्त शिल्पों के सृष्टा है। श्रीविष्णु भगवान् से ही सत्व, रज और तीसरा तम उत्पन्न हुआ है और इनसे ही सृष्टि की जन सन्तान परम्परा का उद्भव हुआ है। रजो ब्रह्मा तमो विष्णुः सत्त्वं चैव महेश्वरः। ततस्त्रिकं समुत्पन्नं संसारसृष्टिकोद्भवम् ॥ ५॥ इस सृष्टिक्रम में रज ब्रह्मा स्वरूप, तम विष्णु स्वरूप और सत्व महेश्वर रूप है। इस त्रिक् से समस्त संसार की सृष्टि का उद्भव हुआ है। चतुरशीतिलक्षाणि जीवयोनिरनेकधा। तमस्सतामसी शक्तिस्तपस्तेजोविवर्द्धिनी ॥ ६॥ चौरासी लाख की संख्या में अनेक प्रकार की जीव योनियाँ हैं। तम से उत्पन्न होने वाली तामसी शक्ति तप और तेज को बढ़ाने वाली है। रजसो राजसी ख्याता रजो ज्ञाने ब्रह्मात्मजा। माया मोहश्च तत्कार्यं वैष्णवी मोहशालिनी ॥ ७॥ रजस से राजसी शक्ति विख्यात है। वह ब्रह्मात्मजा है और ज्ञान क्षेत्र का वर्द्धन करने वाली है। भगवान् विष्णु से उत्पन्न होने वाली तामसी शक्ति मोहशालिनी है और उसके कार्य माया और मोह है। सत्त्वाच्च सात्त्विकी शक्तिः सत्त्वज्ञाने शिवात्मजा। संसारप्रीतिमुक्तानां मोक्षदा सत्त्वसात्त्विकी ॥ ८॥ सत्त्वगुण से सात्विकी शक्ति शिव से उत्पन्न हुई है और सत्त्वज्ञान का वर्द्धन करने वाली है। यह सत्त्वज्ञान शक्ति संसार की वासनाओं से मुक्तात्माओं को मोक्ष प्रदान करने वाली है।
72 अपराजितपृच्छा तमः पिता रजो माता गुरुः सत्त्वं प्रतिष्ठितम् । एवं प्रवर्तते सृष्टिः संसारे मोहशालिनी ॥ ९ ॥ रजो रक्तं समाख्यातं तमः शुक्रं प्रतिष्ठितम् । सत्त्वं पवन इत्युक्तं संसारे सृष्टिमालिनी ॥ १० ॥ तम पिता के रूप में, रज माता के रूप में और सत्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इन तीनों से संसार में मोहशालिनी यह सृष्टि प्रवर्तित हुई है। रज रक्त रूप में विख्यात है और तम शुक्र के रूप में प्रतिष्ठित है। सत्व पवन रूप में कहा गया है। इस तरह इस संसार में सृष्टि होने से इन तीनों रज, तम और सत्व की शृङ्खला बनी हुई है। रजः सूर्यः समाख्यातस्तमश्चैवं तु चन्द्रमाः । सत्त्वं पवनमित्याहुः संसारमोघमालिका ॥ ११ ॥ इसी प्रकार रज सूर्य के रूप में विख्यात है और तम चन्द्रमा के रूप में है जबकि पवन के रूप में सत्व है। इससे संसार में अमोघ शृङ्खला चलिष्णु है। रजः पृथ्वी समाख्याता तमश्चाकाशसम्भवम् । सत्त्वं पवनमित्युक्तं वर्तते मोघमालिनी ॥ १२ ॥ पुनः देखें कि रज पृथ्वी कही गई है और तम को आकाश तथा सत्व को पवन कहा गया है। इस तरह यह पवन इस रज-तम की मोघमाला को वर्तता है अर्थात् चलाता है। रज आपस्तथा ख्याता तमस्तेजः समुद्भवम् । सत्त्वं मारुतमित्याहुस्त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १३ ॥ रज जो जल के रूप में विख्यात है और तम अग्नि के रूप में उद्भूत है। सत्व मारुत के रूप में है। इन तीनों से ही यह संसार सम्भव हुआ है। इच्छाशक्ती राजसी स्यात् तामसी तु क्रियात्मिका । सात्त्विकी ज्ञानशक्त्याख्या शम्भुसंसारसम्भवाः ॥ १४ ॥ इच्छा शक्ति को राजसी कहा है और क्रियात्मिका शक्ति को तामसी कहा है जबकि ज्ञानशक्ति को सात्विकी कहा है जो शम्भू स्वरूप है और इन तीनों से ही यह संसार हुआ है अर्थात् यह सृष्टि रचना हुई है। शक्तिरूपे रजः ख्यातं शिवरूपे तमो मतम् । बीजरूपे स्थितं सत्त्वं त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १५ ॥ शक्ति रूप में रज विख्यात है और शिव रूप में तम विख्यात है, ऐसा समझें।
सूत्र- १७ 73 इनमें बीज रूप से सत्व स्थित है। इस प्रकार इन तीनों से इस संसार की उत्पत्ति सम्भव हुई है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सत्त्वरजस्तमोऽधिकारो नाम षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सत्व- रज-तम अधिकार नामक सोलहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 16 ॥ ग्रहादिध्रुवमण्डलं सप्तदश सूत्रम् ॥ 17 ॥ अपराजित उवाच - कथं दिनं कथं रात्रिः संसारसृष्टिकोद्भवः । केन साऽऽक्रमते चेत्थं चन्द्रसूर्यभ्रमणे रता ॥ 1 ॥ नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव ध्रुवाद्याश्च समस्तकाः । तेषां मृत्युः कथं प्रोक्तः कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥ अपराजित बोले – इस संसार में दिन कैसे उत्पन्न हुआ और रात्रि कैसे हुई और किसके द्वारा इन चन्द्र-सूर्य को भ्रमण कराने में क्रम से शक्ति लगी हुई है ? समस्त ग्रहों, नक्षत्रों और ध्रुवादिक की विलुप्ति कैसे होती है, इसे आप कृपापूर्वक कहिए। विश्वकर्मोवाच – तेजसः काश्यपस्यर्कचन्द्रमृत्युसमुद्भवः । शिवशक्तिसमायोगात् संसारसृष्टिसम्भवः ॥ 3 ॥ शिवः सूर्यः शशी शक्तिः संसारसृष्टिकोद्भवः । दिवाकरः शिवो भूत्वा शशी चैव निशाकरः ॥ 4 ॥ दिवारात्रिसमायोगो योगश्च चन्द्रसूर्ययोः । तेजसो मृत्युसंयोगः संयोगः सृष्टिकारकः ॥ 5 ॥ विश्वकर्मा बोले – काश्यप के तेज से सूर्य-चन्द्र और मृत्यु समुद्भूत हुए। शिव-शक्ति के सहयोग से ही यह सृष्टि सम्भव हुई है। शिव सूर्यरूप है और शक्ति चन्द्ररूप, इन दोनों से सृष्टि उत्पन्न हुई और दिवाकर सूर्य होकर तथा निशाकर शक्ति होकर दिन और रात्रि का समायोग करते हैं। यही योग सूर्य और चन्द्र दोनों का है। इसी तरह तेजस से मृत्यु का संयोग होता है और इस संयोग को सृष्टिकारक भी कहते हैं।
अथ सूर्यचन्द्रवंशानुकीर्तनम् — सूर्यवंशोद्भवाश्चैव चन्द्रवंशोद्भवा नृपाः । प्रवर्तते मही राज्य नृपश्च पृथिवीपतिः ॥ 6 ॥ (प्रारम्भिक वंशों में) सूर्यवंश में उत्पन्न होने वाले राजाओं और चन्द्रवंश में उत्पन्न होने वाले राजाओं ने इस पृथ्वी पर राज्य सञ्चालित किया और पृथिवीपति कहलाए। सूर्यवंशे पृथूराजा बुधः शशिकुलोद्भवः । सूर्यवंशसमृद्धौ तु क्षीयते सोमवंशकः । सोमवंशसमृद्धौ च क्षीयते सूर्यवंशकः ॥ 7 ॥ एकोत्तरशतं यावत् क्षीयते वंशकावुभौ । पृष्ठोरुस्पर्शभूतश्च सम्प्रवेत दूंसाधिपः ? ॥ 8 ॥ सूर्यवंश में राजा पृथु हुए और चन्द्रवंश में बुध राजा हुए। इस तरह जब-जब सूर्यवंश समृद्ध हुआ तब-तब चन्द्रवंश क्षीण हुआ और जब चन्द्रवंश समृद्ध हुआ तो सूर्यवंश क्षीण हुआ। इन दोनों ही वंशों में एक सौ एक वंशज जब तक क्षय होते हैं, तब उनके पीछे, उरुस्पर्शभूत अर्थात् अन्य वंशों के विकास के साथ-अन्य नए वंशाधिपति राजा होते हैं। ब्रह्मापुत्रो मरीचिश्च तज्जातः कश्यपो मुनिः । सूर्यो जातः कश्यपाच्च सूर्यपुत्रो मनुस्तथा ॥ 9 ॥ मनोश्चैक्ष्वाकुरुत्पन्नस्ततश्च कुक्षिसम्भवः । कुक्षिपुत्रो विकुक्षिश्च विकुक्षेर्वेनसम्भवः ॥ 10 ॥ पितामह ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के कश्यप हुए जो मुनि हुए। कश्यप मुनि के सूर्य हुए और सूर्य के पुत्र मनु हुए। मनु के इक्ष्वाकु उत्पन्न हुए और इक्ष्वाकु के कुक्षिवान् हुए। कुक्षिवान के विकुक्षि हुए जबकि विकुक्षि के वेन नामक राजा हुआ।¹
- चन्द्रगुप्त वेदालङ्कार ने अपने 'बृहत्तरभारत' में मेसोपोटामिया के सुमेर राजवंश और भारत के सूर्यवंशी राजवंश का एक तुलनात्मक परिचय देते हुए लिखा है कि सुमेर-सुराष्ट्र भारत से गए व्यापारी थे जिनके इतिहास में भारतीय राज्य के रूप में मेसोपोटामिया समाहित हुआ। इसी से वहाँ की वंशावली भारतीय वंशावली ही है:— सुमेरिया की वंशावली भारत की सूर्यवंशावली 1.................... 1. वैवस्वत मन
सूत्र- १७ 75 वेनो नाम महाराजो महावीर्यो महाबलः । शरीरमथनात्तस्य तथा पृथुः समुद्भवः ॥ 11 ॥ पृथुश्चैवं समुद्भूतस्तथा ख्यातः कुलाधिपः । रामश्च रघुवंशोऽभूत् सूर्यवंशे महाबलः ॥ 12 ॥ उक्त वेन नामक महाराजा महा पराक्रमी और महाबली थे। इनके शरीर के मन्थन से पृथु का जन्म हुआ। पृथु से कई एक विख्यात राजा इस कुल में हुए। सूर्यवंश में महा बलवान रघुवंश में राम का जन्म हुआ। इत्यमनन्तरकेत्वादीनामाह — सूर्यपुत्रः शनिजीतः केतुकश्च समुद्भव ?। अष्टोत्तरशतं₁₀₈ चैव केतुकश्च ब्रह्मकोद्भवः ?( दण्डकौः ) ॥ 13 ॥ शम्भुतेजोभवं चोध्वं दृश्यते ज्ञानचक्षुषा। (अब केतु व ग्रहादि के विषय में कहा जा रहा है) सूर्य के शनि नामक पुत्र हुआ और केतु भी हुए। केतु ब्रह्मा से भी हुए। इनकी संख्या 108 हैं।¹ ये समस्त केतु शम्भू के तेज से ऊँचे आकाश में ज्ञानचक्षु से ही दिखाई देते हैं, सामान्य आँखों से नहीं। 2. उक्कुसी 2. इक्ष्वाकु 3. बकुस 3. विकुक्षि 4. पुनपुन 4. पुरञ्जय 5. (नक्ष) अनेना 5. अनेना (वेन)-पृथु.... राम यह अनेना ही मेसोपोटामिया में ओनेस नाम से और भारत में वेन नाम से पुराणों में विख्यात हुआ है। मेसोपोटामिया के बोगजकोई नामक स्थान पर वकुस (विकुक्षि) की विशाल मूर्ति चट्टान पर खुदी हुई है जिसके एक हाथ में गेहूँ की बाली और दूसरे हाथ में हल धारण किया हुआ है। यह आर्यों का कृषि प्रचार है। वहीं 1360 ई. पू. का मितन्नी राजा दशरथ और मिस्र के फराहों के बीच हुआ सन्धिनामा लिखा हुआ शिलालेख ह्यूगोविकलर को खुदाई करते हुए मिला था जिसमें आर्यदेवता- मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्य को साक्षी मानकर सन्धि की गई। ये लोग भारत से गए आर्य हैं। मोहनजोदाड़ा की खुदाई से भी यही लगता है। (बृहत्तरभारत, गुरुकुल कांगड़ी, 1939, पृष्ठ 470)
- नारदीय मयूरचित्रकम् में सूर्यपुत्र केतु का वर्णन आया है जो मोती व सोने के समान पचीस संख्या वाले, पूर्व या पश्चिम दिखाई देने वाले हैं जिनके उदय होने पर भय होता है— मुक्ता कनक संकाशाः पञ्चविंशतिसंख्यकाः। प्राक् परस्याञ्च ते दृष्टाः सूर्यपुत्राः भयप्रदाः॥ (1, 6) 'ब्रह्मकोद्भव' या 'ब्रह्मदण्डको' भी केतु माने गए हैं जो ब्रह्मा के पुत्र हैं और क्रूर, तीन रङ्गवाले और तीन शिखा वाले तथा क्षयकारी कहे गए हैं— क्रूरस्त्रिवर्णस्त्रिशिखः क्रूरो ब्रह्मसुतः स्मृतः। सर्वास्वाशासु संदृष्टो ब्रह्मदण्डः क्षयावहः॥ (तत्रैव 1, 11) ग्रन्थकार ने यहाँ ब्रह्मा के पुत्र केतुओं की संख्या 108 बताई है जबकि मयूरचित्रकम् में इनकी संख्या 204 दी गई है।
अथ पञ्चाङ्गलक्षणानि — नक्षत्रयोगा राशिश्च तिथयः करणादिकम् ॥ 14 ॥ तारकालिङ्गमित्युक्तं मातृमण्डलसम्भवम्। वैष्णवे च पदे चैव भ्राम्यतीत्थं ध्रुवावृतम् ॥ 15 ॥ नक्षत्र, योग, राशि, तिथियाँ और पाँचवाँ करण— ये सभी पञ्चाङ्ग कहे जाते हैं। इन सबको तारक नाम से कहा गया है और ये सभी मातृमण्डल से उत्पन्न हुए हैं। ये समस्त तारक विष्णु के पद से ध्रुववृत्त के चारों ओर भ्रमणरत हैं। ग्रहनामादीनां — दिवाकरः शशाङ्कश्च भौमश्च बुध एव च। त्रिदशाचार्यशुक्रौ च शनिश्च राहुकेतुकौ ॥ 16 ॥ सूर्याद्यं च समं त्वेवं ध्रुवग्रहादिकं तथा। भ्राम्यति दक्षिणावर्तमचाल्यं ध्रुवसत्पदम् ॥ 17 ॥ सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू और केतु ये ग्रह कहलाते हैं। सूर्य से लेकर सभी ग्रह समान रूप से अचल ध्रुव के चारों ओर प्रदक्षिणा क्रम से भ्रमण करते हैं। प्रदक्षिणं तथर्क्षाणां सम्पूर्णा सप्तविंशतिः₂₇। ऋक्षमध्ये यथा राशौ ग्रहास्तिथ्यादयस्तथा ॥ 18 ॥ चारः क्रामति योगेन मेरुमावृत्य दक्षिणम्। प्रदक्षिणा करने वाले सम्पूर्ण नक्षत्रों की संख्या 27 है। इन्हीं नक्षत्रों के बीच में ग्रह राशियाँ, तिथियाँ आदि होती हैं। ये सब मेरु पर्वत को दक्षिणावर्त करके विविध योगों में भ्रमण या चार करते हैं। तत्रैव मण्डलपृथुत्वञ्च बिम्बमानमाह — मण्डलानि पृथुत्वं च बिम्बमानं च कथ्यते ॥ 19 ॥ क्षारार्णवोदकं भूमौ कथ्यते ग्रहमण्डलम्। योजनैर्व्योमसङ्ख्यातं कथयामि समासतः ॥ 20 ॥ अब मैं इनके मण्डल, प्रसार और बिम्बमान आदि के विषय में कहूँगा। भूमि पर लवणीय समुद्र के बारे में, ग्रहमण्डल के बारे में और असंख्य योजन की दूरी तक व्यास इस व्योम आकाश के बारे में भी संक्षेप से कहूँगा। चतुर्दशलक्षाणां च योजनानां तु सङ्ख्यया।
सूत्र- २७ ११ ध्रुवचक्रसमुत्थाध्वा चक्षुर्ज्ञानेन व्योम्नि च ॥ २१ ॥ समलक्षार्धमादित्यं सहस्राणां द्विसप्ततिः। भूमिक्षारार्णवोर्ध्वं च योजनान्यर्कमण्डलम् ॥ २२ ॥ ब्रह्माण्ड के इस व्योमाकाश में चौदह लाख योजनों की संख्या तक असंख्य ध्रुवचक्र (निहारिकाएँ) फैले हुए हैं जो खुली आँखों से दिखाई देते हैं (अर्थात् दृग्गणित ज्योतिष के विषय हैं, दूरवीक्षण यन्त्रों की सहायतासे दिखाई सकने वाले ध्रुवचक्रों की तो बात नई नहीं है)। इन दिखाई देने वाले ध्रुवमण्डलों में साढ़े सात लाख तो आदित्य हैं, जो इस लवणीय समुद्र के ऊपर चौदह हजार योजनों की ऊँचाई पर स्थित अर्कमण्डलों अर्थात् सूर्यलोकों में फैले हुए हैं। तत्परं चन्द्रमण्डलं पञ्चाशतसहस्रैः स्थितम्। अष्टाशीतिसहस्राणि भौमोर्ध्वं भौमसंस्थितिः ॥ २३ ॥ इनके परे चन्द्र मण्डल अर्थात् चन्द्रलोक है जो पचास हजार योजनों की दूरी पर स्थित है। इसी तरह चन्द्र मण्डल के ऊपर अठासी हजार योजन दूरी पर मङ्गल मण्डल की स्थिति है। लक्षं त्रिषष्टिसहस्राणि भौमोर्ध्वं बुधमण्डलम्। चतुर्विंशसहस्राणि बुधोर्ध्वं च बृहस्पतिः ॥ २४ ॥ एक लाख तिरसठ हजार योजनों की दूरी पर स्थित, भौममण्डल से ऊपर बुध मण्डल है और बुध मण्डल से चौबीस हजार योजन ऊपर बृहस्पति मण्डल है। सूर्योर्ध्वं चैव लक्षार्द्धं शुक्रस्य मण्डलं विदुः। शुक्रलोकात्तथा चोर्ध्वं षट्षष्टिभिः सहस्रकैः ॥ २५ ॥ सूर्यतश्च परे ख्यातः सूर्यपुत्रशनैश्वरः। सूर्य के ऊपर आधे लाख योजन की दूरी पर शुक्र का मण्डल विद्यमान है। शुक्रलोक से ऊपर, छासठ हजार योजन दूरी पर सूर्य से परे सूर्यपुत्र शनैश्वर का मण्डल विख्यात है। सूर्याधः षष्टिसहस्रै राहुमण्डलमास्थितम् ॥ २६ ॥ रवेः समन्तात् केतुश्च रथपृष्ठेऽनुगच्छति। शतकोटियोर्जनानां ब्रह्माण्डम्य प्रमाणकम् ॥ २७ ॥ इसी प्रकार सूर्य से नीचे, साठ हजार योजन पर राहुमण्डल स्थित है और रवि या सूर्य के अन्त में साथ-साथ सूर्यरथ के पीछे-पीछे केतु जाता है। इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड का विस्तार प्रमाण सौ करोड़ योजनों का है।
मेरुलिङ्गं समाख्यातं पृथ्वी च जलधारिका। वितानं व्योमचाख्यातं लम्बतीत्थमुमापतिः ॥ २८ ॥ भूमण्डल में मेरु पर्वत शिवलिङ्ग के समान आख्यात है और यह पृथ्वी उस शिवलिङ्ग की जलधारिक स्वरूप है, यह व्योमाकाश विशाल वितान के रूप में आख्यात है जिसमें उमापति महेश्वर लाम्बायमान रूप में मेरु स्वरूप स्थित है। ध्रुवमण्डलमुत्पन्नं ब्रह्माण्डाकाररूपकम्। तारामण्डलमित्युक्तं कथ्यते तच्च सङ्ख्यया ॥ २९ ॥ सप्तदशार्बुदमेव लक्षाणां षष्टिरेव च। षष्टिश्च तारकायुक्तं खङ्ख्यातं ध्रुवमण्डलम् ॥ ३० ॥ अरुन्धती विष्णुपदी सप्तर्षयस्तथोत्तमाः। ध्रुवाद्यं तारकालिङ्गमेतेषां बाह्यतो ध्रुवम् ॥ ३१ ॥ ध्रुव मण्डल में ब्रह्माण्डाकार रूप में जो तारा मण्डल कहा गया है, उसकी संख्या सत्रह अरब, साठ लाख और साठ तारों के साथ संख्या वाला यह ध्रुव मण्डल है। अरुन्धन्ती, विष्णुपदी, सप्तऋषि उत्तम और ध्रुव से आरम्भ होने वाले समस्त तारक लिङ्ग है जो ध्रुव के बाहर की ओर है अर्थात् ध्रुव केन्द्र में है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां ग्रहादिध्रुवमण्डलाधिकारो नाम सप्तदश सूत्रम् ॥ १७ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ग्रहादि ध्रुवमण्डल अधिकार नामक सत्रहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥ ग्रहगतिमानमुहूर्तादिप्रमाणमष्टादश सूत्रम् ॥ १८॥ अपराजित उवाच - कथितानि मण्डलानि ध्रुवादेर्ग्रहसङ्ख्यया। अतस्तेषां पुनस्त्वेवं बिम्बमानं निबोधय ॥ १ ॥ बिम्बमानगतिश्चैव ग्रहाद्याः क्रमयोगतः। भ्रमन्ति दक्षिणावर्ते ह्यध्वनि स्वप्रमाणतः ॥ २ ॥ तिथिसङ्ख्याप्रमाणं च पक्षमासौ तथैव च। ऋतुकालं वत्सरांश्च कथयस्व समासतः ॥ ३ ॥ अपराजित बोले - ध्रुवादि ग्रह मण्डलों की संख्या आपने कही, अब पुनः कृपा करके उनके बिम्बमानों के बारे में भी कुछ बताएँ। ग्रहों के क्रमवार बिम्बमान
सूत्र- १८ 79 और गति बताते हुए उनके किसी भी प्रकार की ध्वनि किए बिना अपने आप स्व प्रमाणतः दक्षिणावर्त भ्रमण करने के बारे में भी कहिए। हे प्रभो! तिथियों की संख्या, प्रमाण, पक्ष, मास, ऋतुकाल, वर्ष आदि के बारे में भी संक्षेप से बताइए। विश्वकर्मोवाच – बिम्बमानं ततस्तात शृणुचैकाग्रमानसः। अनुक्रमेण कथये सूर्यादीनामथोऽधुना॥ ४॥ सूर्यादीनां ग्रहाणां तु कथ्यन्ते बिम्बकानि तु। वृत्तव्यासौ बिम्बमाने कथयामि समासतः॥ ५॥ विश्वकर्मा कहने लगे – हे तात! मैं सूर्यादि से लेकर अभी तक के बिम्बमानों के बारे में अनुक्रम से कहता हूँ जिसे तुम एकाग्र मन से सुनो। सूर्यादि ग्रहों के बिम्बों के वृत्त और व्यास तथा उनके बिम्बमानों को संक्षेप से कहता हूँ। सूर्यादिग्रहाणां बिम्बप्रमाणमाह – षट्सहस्रपञ्चशतयोजनैः स्याच्च विस्तरः। सूर्यबिम्बप्रमाणं तु विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ६॥ सूर्य के बिम्बमान का विस्तार छह हजार पाँच सौ योजन का है और उसकी प्रभा अर्थात तेज चमक करोड़ों विद्युत तड़ितों के समान है। चतुर्भिंश्च सहस्राणां द्व्यष्टाशीत्या च योजनैः। सोमबिम्बप्रमाणं तत् सुधातेजः समुद्भवम्॥ ७॥ चन्द्रमा का बिम्बमान चार हजार अठासी योजनों का है, उससे अमृत रूपी तेज निकलता रहा है। भौमस्य बिम्बमानं तु पृथु योजनविंशतिः। बुधस्य बिम्बमानं च विस्तृतं शतयोजनैः॥ ८॥ मङ्गल के बिम्बमान का प्रमाण बीस योजन के विस्तार का है और बुध के बिम्बमान का प्रमाण एक सौ योजन के विस्तार में है। द्वाचत्वारिंशश्च सार्ध गुरुबिम्बं प्रमाणतः। पञ्चसप्ततिः शुक्रस्य शतार्धं पञ्च वै शनैः॥ ९॥ साढ़े बयालीस योजन गुरु का बिम्बमान है और पिचहत्तर योजन शुक्र का बिम्बमान है। इसी प्रकार पचपन योजन का बिम्बमान शनि ग्रह का कहा गया है। अष्टसहस्रयोजनप्रमाणं राहुमण्डलम्।
80 अपराजितपृच्छा केतोश्च भौमतुल्यं स्यात् कथितं च प्रमाणतः ॥ 10 ॥ इसके अतिरिक्त राहु मण्डल का प्रमाण आठ हजार योजन का है तथा केतु का बिम्बमान मङ्गल के तुल्य अर्थात् बीस योजन का है। यह मैंने प्रमाणतः कहा है। ध्रुवस्य प्रदक्षिणागतिक्रमाह — गतिक्रमं च वक्ष्याति ध्रुवमेकं प्रदक्षिणम्। योजनैश्च गतिस्त्वेवं गम्यते च प्रदक्षिणम् ॥ 11 ॥ अब मैं ध्रुव की एक प्रदक्षिणा के गतिक्रम तथा प्रदक्षिणा में जाते समय की उनकी योजनों में होने वाली गति के बारे में कहता हूँ। निमिषे द्विशतं भानुः ग्लौः सार्धद्विसहस्रकम्। त्रयस्त्रिंशदधिकशतयोजनैर्भौमगतिः ॥ 12 ॥ बुधश्च सूर्यमानेन भ्रमति ध्रुवदक्षिणम्। गुरुश्च क्रमते चैव योजनैर्दशपञ्चभिः ॥ 13 ॥ शुक्रसूर्यगतिश्चैव द्विशतं निमिषान्तरे। समयोजनत्रिभागं निमिषात्तु शनैश्चरः ॥ 14 ॥ योजनरकादशभी राहोश्च निमिषे गातः। केतुर्भानोः समन्ताच्च भ्रमते दक्षिणावृतम् ॥ 15 ॥ निमिष में सूर्य की गति दो सौ योजन और ग्लौ (चन्द्रमा) की एक निमिष में ढाई हजार योजन गति होती है। एक निमिष में ही मङ्गल की गति एक सौ तैतीस योजन की होती है। बुध की गति सूर्य के मान के बराबर एक निमिष में दो सौ योजन होती है जो ध्रुव के दक्षिण में भ्रमण करता है। गुरु की भ्रमण गति भी एक निमिष में पन्द्रह योजन की होती है। शुक्र की भी सूर्य की गति के समान ही एक निमिष में दो सौ योजन की होती है तथा शनि की गति एक निमिष में पौने आठ योजन की होती है। इसी प्रकार राहु की गति एक निमिष में ग्यारह योजन और केतु का गतिमान भी राहु के समान ही ग्यारह योजन प्रति निमिष होता है जो दक्षिणावृत्त में भ्रमण करता है। आमध्याह्नमुदयतो ह्यष्टधा च दिनार्धकम्। चत्वारिंशत्त्वेकहीनं सहस्राण्याद्यसङ्क्रमे ॥ 16 ॥ सूर्योदय से मध्याह्न तक अष्टधा अर्थात् दिनार्द्ध होता है। इस अवधि से चालीस से एक कम अर्थात् उनतालीस हजार संक्रमण सूर्योदय से मध्याह्न तक होते हैं।