अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
४ भाषार्थसंहिता-
क्षत्रियस्यापियजनं दानमध्ययनंतपः । शस्त्रोपजीवनंभूत रक्षणंचेतिवृत्तयः ॥ १४ ॥ दानमध्ययनंवार्ता यजनंचेतिवैविशः * । शूद्रस्यवार्ताशुश्रूषा द्विजानांकारुकर्मच ॥ १५ ॥ तदेतत्कर्माभिहितं संस्थितायत्रवर्णिनः । बहुमानमिहप्राप्य प्रयान्तिपरमांगतिम ॥ १६ ॥ येव्यपेताःस्वधर्मात्ते परधर्मेव्यवस्थिताः । तेषांशास्तिकरोराजा स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १७ ॥ आत्मीयेसंस्थितोधर्मे शूद्रोपिस्वर्गमश्नुते । परधर्मोभवेत्त्याज्यः सुरुपपरदारवत् ॥ १८ ॥
भा०-यज्ञ करना, दान देना, साङ्गवेद पढ़ना और तप करना, ये क्षत्री के कर्म हैं और शस्त्रसे आजीविका और भूतों की रक्षा ये दो धर्मानुकूल क्षत्रियकी जीविका हैं ॥१४॥ दान देना, साङ्गवेद पढ़ना, खेती गौओं की रक्षा, व्यवहार, यज्ञ करना, ये वैश्यके कर्म हैं खेती, गौओंकीरक्षा, व्यवहार, तीनों वर्णों की सेवा, और कारीगरी, ये शूद्र के कर्म हैं॥१५॥ जिस कर्म में तत्पर रहने से चारों वर्ण इहलोक में बड़े मान को प्राप्त होकर परलोक में परमगति को प्राप्त होते हैं सो यह वर्णकर्म हमने कहा ॥१६॥ जो अपने धर्म को छोड़ के दूसरे के धर्म में तत्पर होते हैं उन को शिक्षा देने वाला राजा स्वर्गलोक में पूजा को प्राप्त होता है ॥१७॥ अपने धर्म में तत्पर हुआ शूद्र भीस्वर्ग को भोगता है और पराया धर्म इस प्रकार त्यागने योग्य है किजैसे श्रेष्ठरूप वाली पराई स्त्री ॥ १८ ॥
(१८) जैसे विष में पैदा हुआ कीड़ा विषसे मरतानहीं किन्तु विष ही उस का रक्षक होता है । इसी के अनुसार अपने २ बाप दादों की परम्परा से जो २ धर्म जिस वर्ण के अनुसार चला आता है उसी को अपना प्राकृत धर्म कर्म मानकर मनुष्यों को सेवन करना चाहिये । प्रत्येक मनुष्य का प्रयोजन सर्वोत्कृष्ट सुख स्वर्ग प्राप्त करने का है सो जब शूद्रादि को स्वधर्म के सेवन से स्वर्ग और पराये उत्तम धर्म से भी नरक होना सिद्ध है तब किसी को भी भयदायकपरधर्म का सेवन न करना चाहिये ॥ * विचार्यमत्र ॥
अग्निसमृतिः ॥ ५
वध्योराज्ञासवैशूद्रो जपहोमपरश्चयः ।
ततोराष्ट्रस्यहन्तासौ यथावन्हेेश्चवैजलम् ॥१९॥
प्रतिग्रहोऽध्यापनंच तथाऽविक्रेयविक्रयः ।
याज्यंचतुर्भिरप्येतैः क्षत्रविट्पतनंस्मृतम् ॥२०॥
सद्यःपततिमांसेन लाक्षयालवणेनच ।
त्र्यहेणशूद्रोभवति ब्राह्मणःक्षीरविक्रयी ॥२१॥
अव्रताश्चानधीयाना यत्रभैक्ष्यचराद्विजाः ।
तंग्रामंदण्डयेद्राजा चौरभुक्तप्रदण्डवत् ॥२२॥
विद्वद्भोज्यमविद्वांसो येपुराष्ट्रेपुभुञ्जते ।
भा०-जो शूद्र वेदोक्त जप और होम में तत्पर है वह राजा से कठोर दण्ड पाने के योग्य है क्योंकि वह जप होम में तत्पर होने के कारण राजा के देश का नाश करने वाला है जैसे अग्नि का जल नाशक है ॥ १९ ॥ दान लेना वेदादि का पढ़ाना, निषिद्ध वस्तु का बेचना, और यज्ञ कराना इन चारों कर्मों के करने से क्षत्रिय और वैश्य का पतित होना कहा गया है ॥२०॥ मांस लाख और लवण इन के बेचने से ब्राह्मण शीघ्र ही पतित होजाता है दूध के बेचने से तीन दिन में शूद्र तुल्य होजाता है ॥२१॥ व्रतों के न करने वाले और बिना पढ़े ब्राह्मण जिस ग्राम में निवास करते हुए भिक्षा मांगते हैं उस ग्राम के लोगों को राजा वह दण्ड दे जो चोरी की वस्तु के भोगने वाले को होता है ॥ २२ ॥ जिस देशों में विद्वानों के भोगने योग्य पदार्थों को मूर्ख भोगते हैं वे
( १९ ) यदि राजदण्ड का भय न होता तो अब तक पाखाना कमाने के लिये एक भी भंगी न मिलता। क्योंकि मिहतरों को यदि अपने से उत्तम काम मिल सके तो वे कदापि अपने अतिनिकृष्ट काम को नहीं करेंगे ( २० ) दान लेना वेदादि का पढ़ाना यज्ञ कराना ये ख़ास ब्राह्मण के ही काम हैं अन्यके लिये निषेध है ( २३ ) विद्वानों को उत्तम भोग मिलने से विद्या का आदर है विपरीत करने से अविद्या का आदर होता इस लिये अनावृष्टि आदि अनिष्ट फल कहते हैं ॥
६ भाषार्थसहिता-
तेप्यनावृष्टिमिच्छन्ति महद्वाजायतेभयम् ॥२३॥
ब्राह्मणान्वेदविदुषः सर्वशास्त्रविशारदान् ।
तत्रवर्षतिपर्जन्यो यत्रैतान्पूजयेन्नृपः ॥२४॥
त्रयोलोकास्त्रयोवेदा आश्रमाश्चत्रयोऽग्नयः ।
एतेषांरक्षणार्थाय संसृष्टाब्राह्मणाःपुरा ॥२५॥
उभेसंध्येसमाधाय मौनंकुर्वन्तियेद्विजाः ।
दिव्यवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोकेमहीयते ॥२६॥
यएवंकुरुतेराजा गुणदोषपरीक्षणम् ।
यशःस्वर्गनृपत्वंच पुनःकोशंसअर्जयेत् ॥२७॥
दुष्टस्यदण्डःसुजनस्यपूजा न्यायेनकोशस्यचसंप्रवृद्धिः ।
अपक्षपातोर्थिषुराष्ट्ररक्षा पंचैवयज्ञाःकथितानृपाणाम् ॥२८॥
देश भी वृष्टि के अभाव की इच्छा करते हैं अथवा उन में महान् भय उत्पन्न होता है ॥ २३ ॥
भा०-साङ्गोपाङ्ग वेद को जानने वाले और संपूर्ण शास्त्रों में कुशल ब्राह्मणों की पूजा जिस देश में राजा करता है वहां मेघ ठीक २ वर्षता है ॥ २४ ॥ तीनों लोक तीनों वेद आश्रम और तीनों अग्नि इन की रक्षा के लिये सृष्टि के आरम्भ में ब्राह्मण रचे गये हैं ॥ २५॥ जो दोनों सन्ध्याओं के समय एकाग्रचित्त होके मौन हुए जप करते हैं वे द्विज देवताओं के हजार वर्ष तक स्वर्गलोक में पूजा को प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ जो राजा इस प्रकार गुण दोष की परीक्षा करता है वह यश स्वर्ग, राज्य और कोश का ( क्षीण वा नष्ट होने पर भी ) फिर संचय करता है ॥ २७ ॥ ये पांच यज्ञ राजाओं के लिये कहे हैं कि दुष्ट को दण्ड-श्रेष्ठ जन की पूजा, न्याय से कोश का बढ़ाना-मांगने वालों के लिये पक्षपात का न करना. और अपने देश की रक्षा ॥ २८ ॥
( २४ ) विद्वान् ब्राह्मणों का ठीक आदर से सत्कार किया जाय तो वे लोग अग्निहोत्रादि वेदोक्त कर्म ठीक २ करें जिस से देवता लोग प्रसन्न होकर ठीक २ समय पर वर्षा करें इसी रीति से त्रिलोकी की रक्षादि हो सकती है ॥
अत्रिस्मृतिः ॥ ७
यत्प्रजापालनेपुण्यं प्राप्नुवतीहपार्थिवाः ।
नतुक्रतुसहस्रेण प्राप्नुवंतिद्विजोत्तमाः ॥ २९ ॥
अलाभेदेवखातानाम् ह्रदेषुसरसीषुच ।
उद्धृत्यचतुरःपिण्डान् पारक्येस्नानमाचरेत् ॥३०॥
वसाशुक्रमसृङ्मज्जा मूत्रंविट्कर्णविण्नखाः ।
श्लेष्मास्थिदूपिकास्वेदोद्वादशैतेनृणांमलाः ॥३१॥
षण्णांषण्णांक्रमेणैव शुद्धिरुक्तामनीषिभिः ।
मृद्वारिभिश्चपूर्वेषा-मुत्तरेषांतुवारिणा ॥ ३२ ॥
शौचंमंगलमायास * अनसूयास्पृहादमः ।
भा०-प्रजा के ठीक पालन करने से इस संसार में जिस पुण्यसुख को राजा प्राप्त होते हैं—उस पुण्य को हज़ार यज्ञ करने से भी ब्राह्मण लोग नहीं प्राप्त हो सक्ते ॥ २९ ॥ देवताओं के खोदे तीर्थों (गंगा आदि) के अभाव में दूसरे कुंड अथवा तालाबों में से मिट्टी के चार पिंड (डेले) निकाल कर स्नान करे ॥ ३० ॥ वसा-वीर्य-रुधिर-मज्जा-मूत्र-विष्ठा-कानकामैल-नख, कफ-हाड़-नेत्रों का मल और पसीना ये बारह मनुष्यों के मल हैं ॥ ३१ ॥ विद्वान् लोगों ने पहिले वसादि छः अंगों की शुद्धि मिट्टी और जल से तथा पिछले छः अंगों की शुद्धि केवल जल से क्रमशः वर्णन की है ॥ ३२ ॥ शुद्ध रहना-मंगलकाम-परिश्रम करना-दूसरे के गुणों में दोषों को न देखना-तृष्णालोभ
( २९ ) राजा में यदि १८ प्रकार के दोष न हों और ठीक धर्मानुकूल प्रजा की रक्षा करे तो अवश्य वैसा पुण्य होगा परन्तु ब्राह्मण विरक्त जितेंद्रिय होके योगाभ्यास सहित तप करे तो उसका पुण्य राजा से भी बहुत बड़ा अवश्य होगा ( ३३ ) जैसे अग्नि का लक्षण गर्मी जलका लक्षण शीतलता दीपक का लक्षण प्रकाश द्वारा अन्धकार की निवृत्ति होती है । दीप ज्योति न दीखने पर भी प्रकाश के देखने मात्र से दीपक का होना मानने पड़ता है वैसे उत्तम कक्षा के शौचादि को देख कर जाति से ब्राह्मण होना प्रत्यक्ष न होने पर भी उस को ब्राह्मण ही मानना चाहिये । क्यों कि उक्त गुण असली ब्राह्मण पन को सिद्ध करते हैं ॥ * चिन्त्यमेतत् ।
८ भाषाथसहिता-
लक्षणानिचविप्रस्य तथादानंदयापिच ॥ ३३ ॥
नगुणान्गुणिनोहन्ति स्तौतिचान्यान्गुणानपि ।
नहसेच्चान्यदोषांश्च सानसूयाप्रकीर्तिता ॥३४॥
अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः ।
आचारेष्वव्यवस्थानं शौचमित्यभिधीयते ॥ ३५ ॥
प्रशस्ताचरणंनित्यमप्रशस्तविवर्जनम् ।
एतद्विमंगलंप्रोक्त मृषिभिर्धर्मवादिभिः ॥ ३६ ॥
शरीरंपीड्यतेयेन शुभेनह्यशुभेनवा ।
अत्यन्तंतन्नकुर्वीत अनायासःसउच्यते ॥ ३७ ॥
यथोत्पन्नेनकर्तव्यः संतोषःसर्ववस्तुषु ।
नस्पृहेत्परदारेषु साऽस्पृहापरिकीर्तिता । ३८ ॥
न करना-इन्द्रियों को विषयों से रोकना-दान देना-और दया करना ये ब्राह्मणों के लक्षण हैं इन का विशेष व्याख्यान ग्रन्थकार ने आगे स्वयं किया है॥३३॥
भा०-गुण वाले के उत्तम गुणों को न छिपावे किन्तु अन्य के गुणों की स्तुति करे और अन्य के दोषों की हँसी न करे उसे अनसूया कहते हैं ॥ ३४ ॥ अभक्ष्य वस्तु का त्याग और सज्जनों का संग--और उत्तम आचरणों से न विचलना इसे शौच कहते हैं ॥३५॥ प्रतिदिन उत्तम आचरण का करना और निन्दित आचरण को त्याग देना धर्म को कहने वाले ऋषियों ने इसे मंगल कहा है ॥ ३६ ॥ जिस शुभ वा अशुभ कर्म से शरीर विशेष पीडित हो उस को अधिक न करना उसे अनायास कहते हैं ॥ ३७ ॥ धर्मानुकूल परिश्रम से जो कुछ अन्न धनादि प्राप्त हो उसी में संतोष करना और पराई स्त्रियों में भोग की इच्छा न करना उस को अस्पृहा कहते हैं ॥ ३८ ॥
( ३७ ) शरीर पीड़ा से मतलब यह है कि शरीर को ऐसी बाधा न पहुंचे जिस से नष्ट हो सके अर्थात् अच्छे काम में भी अधिक श्रम न करे । शरीर बना रहा तो इसी जन्म में अधिक पुण्य कर सकेगा । इस से तपादि में भी उतना कष्ट सहे जिस से शरीर को धक्का न लगे । अर्थात् क्रमशः जप तपादि को बढ़ावे ( आत्मानं सततं रक्षेत् ) - अपने जीवन की रक्षा निरन्तर करे ॥
अत्रिस्मृतिः ॥
ग्राह्यमाध्यात्मिकंवापि दुःखमुत्पाद्यतेपरैः । नकुप्यतिनचाहन्ति दमइत्यभिधीयते ॥ ३९ ॥ अहन्यहनिदातव्य-मदीनेनान्तरात्मना । स्तोकादपिप्रयत्नेन दानमित्यभिधीयते ॥ ४० ॥ परेस्मिन्बन्धुवर्गेवा मित्रेद्वेष्येरिपौतथा । आत्मवद्वर्त्तितव्यंहि दयैषापरिकीर्तिता ॥ ४१ ॥ यश्चैतैर्लक्षणैर्युक्तो गृहस्थोपिभवेद्द्विजः । सगच्छतिपरंस्थानं जायतेनेहवैपुनः ॥ ४२ ॥ इष्टापूर्तंचकर्त्तव्यं ब्राह्मणेनैवयत्नतः । इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्तंमोक्षोविधीयते ॥ ४३ ॥ अग्निहोत्रंतपःसत्यं वेदानांचैवपालनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवश्च इष्टमित्यभिधीयते ॥ ४४ ॥ वापीकूपतडागादि देवतायतनानिच । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते ॥ ४५ ॥
भा०—अन्य लोग भीतरी वा बाहिरी कैसा ही दुःख पहुंचावें तौभी उन पर न क्रोध करे और न उन को तंग करे इस को दम कहते हैं ॥ ३९ ॥ यदि अपने पास थोड़ा ही निर्वाह मात्र अन्न धनादि हो तौभी उसी में से कुछ प्रसन्न चित्त से नित्य २ किसी को दिया करे इस को दान कहते हैं ॥ ४० ॥ कुटुंबी में—मित्र में द्वेष करने योग्य और शत्रु इन सब में अपने आत्मा के समान जो बर्त्ताव करना है उसे दया कहते हैं ॥ ४१ ॥ जो गृहस्थी भी द्विज इन लक्षणों से युक्त होता है वह उत्तम स्थान ब्रह्मलोक वा मोक्ष को प्राप्त हो जाता है और फिर इस लोक में उत्पन्न नहीं होता ॥ ४२ ॥ इष्ट और पूर्त कर्म के करने में ब्राह्मण ही को यत्न करना उचित है इष्ट से स्वर्ग मिलता है और पूर्त से मोक्ष होता है ॥ ४३ ॥ अग्निहोत्र—तप—सत्यभाषण—वेदों की रक्षा—अतिथि का सत्कार और बलिवैश्वदेव करना इन्हें इष्ट कहते हैं ॥ ४४ ॥ बावड़ी कूप, तालाब—देवताओं के मंदिर बनवाना—अन्न का दान करना आराम (बाग) लगवाना इन्हें पूर्त कहते हैं ॥ ४५ ॥
२
१०
भाषार्थसहिता-
इष्टापूर्तेद्विजातीनां सामान्येधर्मसाधने ।
अधिकारोभवेच्छूद्रः पूर्तेधर्मेनवैदिके ॥ ४६ ॥
यमान्सेवेतसततं ननित्यंनियमान्बुधः ।
यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन् ॥४७॥
आनृशंस्यंक्षमासत्य-महिंसादानमार्जवम् ।
प्रीतिःप्रसादोमाधुर्य्य-मार्दवंचयमादश ॥ ४८ ॥
शौचमिज्यातपोदानं स्वाध्यायोपस्थनिग्रहौ ।
व्रतमौनोपवासञ्च स्नानंचनियमादश ॥ ४९ ॥
प्रतिनिधिंकुशमयं तीर्थवारिपुमज्जति ।
यमुद्दिश्यनिमज्जेत अष्टभागंलभेतसः ॥ ५० ॥
मातरंपितरंवापि भ्रातरंसुहृदंगुरुम् ।
भाषार्थ—इष्ट और पूर्त ये दोनों द्विजाति (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तीनों के सामान्य धर्म हैं और शूद्र पूर्त धर्म का अधिकारी है परन्तु वेदोक्त धर्म का अधिकारी नहीं है ॥ ४६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि यमों का निरंतर सेवन करे और केवल नियमों का नित्य सेवन न करे क्योंकि केवल नियमों का सेवन करता और यमों को न करता हुआ पतित होता है । तात्पर्य यह है कि यमोंके साथ नियमों का भी सेवन करके तब तो बहुत ही अच्छा है । पर ऐसा न होतो केवल यमों का सेवन नित्य नियम से करे क्यों कि केवल नियमों के सेवन करने और यमों का सेवन न करने इन दोनों दशा में मनुष्य पतित हो जाता है ॥ ४७ ॥ अक्रूरता-क्षमा-सत्य-अहिंसा-दान-नम्रता-प्रीति, प्रसन्नता-मधुरवाणी-कोमलस्वभाव ये दश यम हैं ॥४८॥ शौच-यज्ञ-तप-दान-वेद का पढ़ना-उपस्थ इन्द्रिय को रोकना व्रत-मौन-उपवास-स्नान ये दश नियम हैं ॥ ४९ ॥ जिस मनुष्य की कुशाकी प्रतिनिधि (प्रतिमा) को उसी का उद्देश लेकर तीर्थ के जलों में स्नान करावे तो उस मनुष्य को स्नान के फल का आठवां भाग प्राप्त होता है ॥ ५० ॥ माता-पिता-भ्राता मित्र और गुरु इन में से जिस के उद्देश (नाम) से पुत्रादि
अत्रिस्मृतिः ॥ १२
यमुद्दिश्यनिमज्जेत द्वादशांशफलंभवेत् ॥ ५१ ॥
अपुत्रेणैवकर्तव्यः पुत्रप्रतिनिधिस्सदा ।
पिण्डोदकक्रियाहेतो—र्यस्मात्तस्मात्प्रयत्नतः ॥५२॥
पितापुत्रस्यजातस्य पश्येच्चेज्जीवतोमुखम् ।
ऋणमस्मिन्संनयति अमृतत्वंचगच्छति ॥ ५३ ॥
जातमात्रेणपुत्रेण पितृणामनृणीपिता ।
तदहिशुद्धिमाप्नोति नरकात्त्रायतेहिसः ॥ ५४ ॥
जायन्तेबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांव्रजेत् ।
यजतेचाश्वमेधंच नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ ५५ ॥
गोता लगावे उसको स्नान के फल का बारहवां भाग मिलता है ॥ ५१ ॥
पुत्र हीन पुरुष को पिण्ड और जलदान के लिये बड़े यत्न से जिस किसी के पुत्र को प्रतिनिधि (दत्तक पुत्र) करना चाहिये ॥ ५२ ॥ जो पैदा हुये जीवित पुत्र के मुख को पिता देख लेवे तो पुत्र को ऋण सौंप कर पिता पितृ-ऋण से छूट जाता है और मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ ५३ ॥ पुत्र के उत्पन्न होने मात्र से ही पिता पितरों का अनृणी हो जाता है और उसी दिन शुद्ध हो जाता है क्योंकि वह पुत्र पिता को नरक से रक्षा करता है ॥ ५४ ॥ उत्पन्न हुये बहुत पुत्रों में से यदि एक पुत्र भी गया जी को जाय अथवा नीले बैल से वृषोत्सर्ग करे वह मानों अश्वमेध यज्ञ करता है ॥ ५५ ॥
वि०:— (५२) श्राद्ध तर्पण का सिल सिला चला जाना शास्त्रकारों के सिद्धान्ता-नुसार ऐसा ही आवश्यक है जैसा कि मनुष्य के लिये नित्य २ अन्न जल अपेक्षित है (५३ : ५४) पुत् नाम नरक से पिता की त्राण (रक्षा) करने वाला होने से ही मनु जी ने उस का सार्थकनाम पुत्र रक्खा है। जैसे राजकुमार के उत्पन्न होते ही भविष्यत् में राजकार्य चलाने की आशा सब को हो जाती राज कार्यों का भार रूप ऋण उसी दिन से उस पर आजाता है वैसा यहां भी जानो। (५५) अच्छे काम भी किसी खास स्थान में जैसे उत्तम होते हैं वैसे सर्वत्र नहीं हो सक्ते जैसे संस्कृत के सार्वभौम पण्डित काशी में ही होते अन्यत्र पढ़ने से नहीं। बेरिस्टरी आदि पास लंदन में ही होता अन्यत्र नहीं। ऐसे ही श्राद्ध का सबसे उत्तम स्थान गया क्षेत्र ही है यह सर्वस्मृति सम्मत जानो।
| १२ | भाषार्थसंहिता- |
|---|
कांक्षन्तिपितरःसर्वे नरकान्तरभीरवः ।
गयांयास्यतियःपुत्र-स्सनस्त्राताभविष्यति ॥ ५६ ॥
फल्गुतीर्थेनरःस्नात्वा दृष्ट्वादेवंगदाधरम् ।
गयाशीर्षंपदाक्रम्य मुच्यतेब्रह्महत्यया ॥ ५७ ॥
महानदीमुपस्पृश्य तर्पयेत्पितृदेवताः ।
अक्षयान्लभतेलोकान् कुलंचैवसमुद्धरेत् ॥ ५८ ॥
शंकास्थानेसमुत्पन्ने भक्ष्यभोज्यविवर्जिते ।
आहारशुद्धिंवक्ष्यामि तन्मेनिगदतःशृणु ॥ ५९ ॥
अक्षारंलवणंरौक्षं पिबेद्ब्राह्मींसुवर्चलाम् ।
त्रिरात्रंशंखपुष्पींवा ब्राह्मणःपयसामह ॥ ६० ॥
मद्यभांडेद्विजःकश्चि-दज्ञानात्पियतेजलम् ।
प्रायश्चित्तंकथंतस्य मुच्यतेकेनकर्मणा ॥ ६१ ॥
पालाशविल्वपत्राणि कुशान्पद्मान्युदुम्बरम् ।
भा०—अन्य २ नरकों से डरते हुये पितर यह चाहते हैं कि जो पुत्र गया को जायगा वह हमारा रक्षक होगा ॥ ५६ ॥ फल्गुतीर्थ में स्नान और गदाधर (जो गया में है) देवता के दर्शन करके और गयासुर के शिर पर चरण रख कर ब्रह्महत्या से भी मनुष्य छूट जाता है ॥ ५७ ॥ जो पुरुष महानदी में स्नान करके पितर और देवताओं का तर्पण करता है वह अक्षय लोकों को प्राप्त होता और अपने कुल का उद्धार करता है ॥ ५८ ॥ जहां भक्ष्याभक्ष्य का विचार नहीं ऐसे देश में शंका उत्पन्न हो सकती है इस से भोजन की शुद्धि कहते हैं उसको कहते हुए हम से सुनो ॥ ५९ ॥ अभक्ष्य भक्षण कर लेनेकी शंका हो गई हो तो क्षार जिस में न हो ऐसे अन्न, लवण, रुखा अन्न, कांति बढ़ाने वाली ब्राह्मी ओषधि अथवा शंख पुष्पी ओषधि को दूध के संग तीन दिन तक पीवे ॥ ६० ॥ मदिरा के पात्र में यदि कोई द्विज अज्ञान से जलपान करले तो उस का कैसे प्रायश्चित्त हो और वह किस कर्म के करने से दोष से छूटे ॥ ६१ ॥ उ०—ढांक तथा बेल के पत्ता कुशा, कमल और गूलर, इन के क्वाथ के जल को तीन दिन तक पीने से शुद्धि
अत्रिसमृतिः ॥ १२
क्वाथयित्वापिबेदाप-स्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥ ६२ ॥ सायंप्रातस्तुयःसन्ध्यां प्रमादाद्विक्रमेत्सकृत् । गायत्र्यास्तुसहस्रंहि जपेत्स्नात्वासमाहितः ॥ ६३ ॥ रोगाक्रांताथवाऽस्नातः स्थितःस्नानजपाद्बहिः ॥ ब्रह्मकूर्चं चरेद्भक्त्या दानंदत्वाविशुद्ध्यति ॥ ६४ ॥ गवांशृंगोदकेस्नात्वा महानद्युपसंगमे । समुद्रदर्शनेवापि व्यालदष्टःशुचिर्भवेत् ॥ ६५ ॥ वृकश्वानशृगालैस्तु यदिदष्टस्तुब्राह्मणः । हिरण्योदकसंमिश्रं घृतंप्राश्याविशुद्ध्यति ॥ ६६ ॥ ब्राह्मणीतुशुनीदष्टा जंबुकेनवृकेणवा । उदितंग्रहनक्षत्रं दृष्ट्वासद्यःशुचिर्भवेत् ॥ ६७ ॥ सत्रतस्तुशुनादष्ट-स्त्रिरात्रमुपवासयेत् । सघृतेपावकंप्राश्य व्रतशेषंसमापयेत् ॥ ६८ ॥
हो जाता है ॥ ६२॥ सायं वा प्रातः काल यदि प्रमाद से संध्योपासन को जो त्याग दे तो स्नान कर सावधान होके एक सहस्र गायत्री का जप करे ॥ ६३॥ किसी रोग के कारण रोग जो स्नान न कर सके और स्नान करके जो जप न कर सके वह मनुष्य भक्ति से ब्रह्मकूर्चव्रत कर और दान देकर शुद्ध होता है ॥ ६४ ॥ जिस मनुष्य को सांपने काटा हो वह गौओं के सींगों के जल से अथवा बड़ी नदी गंगा यमुना आदि के संगम में स्नान करके अथवा समुद्र के दर्शन से शुद्ध होता है ॥ ६५ ॥ भेड़िया-कुत्ता और गीदड़ ने जिस ब्राह्मण को काटा हो वह सोने के जल से मिले घीको खाकर शुद्ध होता है ॥ ६६ ॥ जिस ब्राह्मणी को कुत्ती, गीदड़ी अथवा भिड़िया काटे तो वह उदय हुए ग्रह नक्षत्रों के दर्शन करने से शीघ्र ही शुद्ध हो जाती है ॥ ६७ ॥ चान्द्रायणादि व्रतवाला ब्राह्मण कुत्ते के काटने से तीन दिन तक उपवास करे फिर घृत सहित चीते की छाल के चूर्ण को खाकर शेष व्रत को समाप्त करे ॥ ६८ ॥
१५ भाषार्थसहिता-
मोहात्प्रमादात्संलोभा-द्व्रतभंगंतुकारयेत् ।
त्रिरात्रेणैवशुद्ध्येत पुनरेवव्रतीभवेत् ॥ ६९ ॥
ब्राह्मणानांयदुच्छिष्ट-मश्नीयाद्यज्ञानतोद्विजः ।
दिनद्वयंतुगायत्र्या जपंकृत्वाविशुद्ध्यति ॥ ७० ॥
क्षत्रियान्नंयदुच्छिष्ट-मश्नीयाद्यज्ञानतोद्विजः ।
त्रिरात्रेणभवेच्छुद्धि-र्यथाक्षत्रेतथाविशि ॥ ७१ ॥
अभोज्यान्नंतुभुंक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेववा ।
जग्ध्वामांसंसमक्षंच सप्तरात्रंयवान्पिबेत् ॥ ७२ ॥
असंस्पृष्टेनसंस्पृष्टः स्नानंतेनविधीयते ।
तस्यचोच्छिष्टमश्नीया-त्षण्मासान्कृच्छ्रमाचरेत् ॥७३॥
अज्ञानात्प्राश्यविण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेववा ।
पुनःसंस्कारमर्हंति त्रयोवर्णाद्विजातयः ॥ ७४ ॥
**भा०:—**मोह प्रमाद अथवा लोभ से जो व्रत को बिगाड़ दे तो वह तीन दिन उपवास कर शुद्ध होता है और फिर व्रत वाला हो जाता है ॥ ६९ ॥ जो ब्राह्मण अज्ञान से ब्राह्मणों के उच्छिष्ट को खाले तो दो दिन तक गायत्री का जप कर के शुद्ध होता है ॥ ७० ॥ क्षत्रिय अथवा वैश्य के उच्छिष्ट को जो ब्राह्मण अज्ञान से भक्षण करले तो तीन दिन गायत्री के जप से शुद्ध होता है ॥ ७१ ॥ भक्षण के अयोग्य अन्न को अथवा स्त्री और शूद्र के उच्छिष्ट अन्न को अथवा प्रत्यक्ष में मांस को खाकर ब्राह्मण सात दिन तक एक बार जौ के सत्तू पीवे ॥७२॥ स्पर्श करने के अयोग्य चाण्डालादि का जो मनुष्य स्पर्श करे तो वह स्नान करने से ही शुद्ध होजाता है और उस के झूठे अन्न को खाकर छः महीने तक कृच्छ्र व्रत करे ॥७३॥ अज्ञान से विष्ठा मूत्र अथवा मदिरा जिस में मिली हो ऐसी वस्तु के खाने से तीनों (द्विजाति) वर्ण फिर संस्कार के योग्य होते हैं ॥ ७४ ॥
विशो०:—(७४) उन २ प्रायश्चित्तों से उस २ अनिष्ट की शुद्धि ऐसे ही जानो कि जैसे कि उस २ औषधि से उस २ रोग की निवृत्ति होती है ॥
अत्रिस्मृतिः ॥ १५
वपनंमेखलादंडं भैक्षचर्याव्रतानिच । निवर्त्तंतेद्विजातीनां पुनःसंस्कारकर्मणि ॥ ७५ ॥ गृहशुद्धिंप्रवक्ष्यामि अंतःस्थशवदूषिताम् । प्रयोज्यंमृन्मयंभांडं सिद्धमन्नंतथैवच ॥ ७६ ॥ गृहान्निष्क्रम्यतत्सर्वं गोमयेनोपलेपयेत् । गोमयेनोपलिप्यथा छागेनाघ्रापयेत्पुनः ॥ ७७ ॥ ब्राह्मैर्मंत्रैश्चपूतंतु हिरण्यकुशवारिभिः । तेनैवाभ्युक्ष्यतद्देशम शुद्धयतेनात्रसंशयः ॥७८॥ राज्ञाऽन्यैःश्वपचैर्वापि बलाद्विचलितोद्विजः। पुनःकुर्वीतसंस्कारं पश्चात्कृच्छ्रत्रयंचरेत् ॥ ७६ ॥ शुनाचैवस्तुसंस्पृष्ट-स्तस्यस्नानंविधीयते । तदुच्छिष्टंतुसंप्राश्य यत्नेनकृच्छ्रमाचरेत् ॥ ८० ॥ अतःपरंप्रवक्ष्यामि सूतकस्यविनिर्णयम् ।
मुंडन-मेखला तथा-दंड का धारण-भिक्षा का मांगना-और व्रत ये सब काम ( जो यज्ञोपवीत के समय होते हैं ) पुनः संस्कार में नहीं होते किन्तु निवृत्त होजाते हैं ॥ ७५ ॥ भीतर पड़ा है शव ( मुर्दा ) जिस में ऐसे घर की शुद्धि कहते हैं मिट्टी के पात्रों को वर्ते और सिद्ध ( अन्य ने बनाये ) अन्न को अ-लग करे ॥७६॥ घर से बाहर मुर्दे को निकाल कर गोबर से घर को लिपावे और गोबर से लिपा कर बकरा से सुंघावे ( बकरे का मुख शुद्ध होता है ) ॥ ७७ ॥ जिनका देवता ब्रह्मा है ऐसे वेद मंत्रों के पाठ से पवित्र किये घर को सोने और कुशाओं के जल द्वारावेद मन्त्रों से छिड़कने से शुद्ध होता है इस में संश-य नहीं है ॥ ७८ ॥ राजा वा अन्य चांडालादि ने यदि द्विज को बलात्कार धर्म से चलायमान किया हो तो वह द्विज फिर सस्कार करे और पीछे तीन कृच्छ्रव्रत करें ॥ ७६ ॥ जिस को कुत्ते ने छू लिया हो वह स्नान करे और कुत्ते के छूट को खाकर यत्न से कृच्छ्र व्रत करे ॥ ८० ॥ इस से आगे सूतक का निर्णय
| १६ | भाषापार्थसंहिता ॥ |
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प्रायश्चित्तंपुनश्चैत्र कथयिष्याम्यतःपरम् ॥ ८१ ॥
एकाहात्शुद्ध्यतेविप्रो योऽग्निवेदसमन्वितः ।
त्र्यहात्केवलवेदस्तु निर्गुणोदशभिर्दिनैः ॥ ८२ ॥
व्रतिनःशास्त्रपूतस्य आहिताग्नेस्तथैवच ।
राज्ञांतुसूतकंनास्ति यस्यचेच्छंतिब्राह्मणाः ॥ ८३ ॥
ब्राह्मणोदशरात्रेण द्वादशाहेनभूमिपः ।
वैश्यःपञ्चदशाहेन शूद्रोमासेनशुद्ध्यति ॥ ८४ ॥
सपिंडानांतुसर्वेषां गोत्रजःसप्तपौरुषः ।
पिडांश्चोदकदानंच शावाशौचंतथानुगम् ॥ ८५ ॥
चतुर्थेदशरात्रंस्या-त्षडहःपंचमेतथा ।
षष्ठेचैवत्रिरात्रंस्यात् सप्तमेऽहर्मेववा ॥ ८६ ॥
मृत्सूतकेतुदासीनां पतीनांचानुलोमिनाम् ।
स्वामितुल्यंभवेच्छौचं मृतेभर्तरियौनिकम् ॥ ८७ ॥
कहते हैं और उस के आगे प्रायश्चित्त (पाप की शुद्धि) कहेंगे ॥ ८१ ॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्री और वेदपाठी भी हो वह एक दिन में शुद्ध होता है जो केवल वेदपाठी ही हो वह तीन दिन में और (निर्गुण) जो न अग्निहोत्री हो और न वेदपाठी हो वह ब्राह्मण दश दिन में शुद्ध होता है ॥ ८२ ॥ व्रतवाला हो वा शास्त्र के अनुसार पवित्र हो अथवा जो अग्निहोत्र करता हो और राजा को सूतक नहीं लगता और जिस के सूतक को ब्राह्मण न चाहें उस को भी सूतक नहीं लगता ॥ ८३ ॥ ब्राह्मण दश दिन में क्षत्रिय बारह दिन में वैश्य पंद्रह दिन में और शूद्र एक महीने में शुद्ध हो जाता है ॥ ८४ ॥ सब सपिंडों में सात पीढ़ी पर्य्यन्त गोत्रज होता है उस को पिंडी के दान का जल दान का और शव के आशौच का अधिकार है ॥ ८५ ॥ चौथी पीढ़ी तक दश दिन और पांचवीं पीढ़ी में छदिन, और छठी पीढ़ी में तीन दिन और सातवीं में तीन दिन का आशौच होता है ॥ ८६ ॥ मरे के सूतक में दासी और अनुलोम (पति से नीचे वर्ण की) पत्नियोंको पतिके तुल्य शौच होताहै और पति के मरने पर अपनी योनि (जाति के अनुसार) का शौच होता है ॥ ८७ ॥
६
चतुर्थेसप्तभिक्षंस्या-देषशावविधिःस्मृतः ॥ ८८ ॥
अत्रिसमृतिः ॥ १७
शवस्पृक्प्रस्तृतीयेतु सचैलंस्नानमाचरेत् ।
चतुर्थेसप्तभिक्षंस्या-देषशावविधिःस्मृतः ॥ ८८ ॥
एकत्रसंस्कृतानांतु मातृणामेकभोजिनाम् ।
स्वामितुल्यंभवेच्छौचं विभक्तानांपृथक्पृथक् ॥८९॥
उष्ट्रीक्षीरमवीक्षीरं पक्वान्नंमृतसूतके ।
पावकार्कनवश्राद्धं भुक्त्वाचान्द्रायणंचरेत् ॥ ९० ॥
सूतकान्नमधर्माय यस्तुप्राश्नातिमानवः ।
त्रिरात्रमुपवासःस्या-देकरात्रंजलेवसेत् ॥ ९१ ॥
महायज्ञविधानंतु नकुर्यान्मृतजन्मनि ।
होमंतत्रप्रकुर्वीत शुष्कान्नेनफलेनवा ॥ ९२ ॥
बालस्त्वन्तर्दशाहैतु पंचत्वंयदिगच्छति ।
जिस तीसरी पीढ़ी के मनुष्य ने शव का स्पर्श किया हो वह सचैल स्नान करे और चौथी पीढ़ी का मनुष्य सात घर की भिक्षा का भक्षण करे—यह शव (मुद्दे) के सूतक की विधि शास्त्र में कही है ॥ ८८ ॥
एक पुरुष के साथ जिस का विवाह संस्कार हुआ और जो एक चौके में नित्य भोजन करती हों ऐसी माताओं को पति की जाति के समान शौच होता है और जो पृथक् २ रहती हों तो अपनी २ जाति का शौच होता है ॥ ८९ ॥
ऊँटनी और भेड़ का दूध तथा मृतसूतक में पक्वान्न और रसोइया का अन्न और नवक श्राद्ध जो सूतक के निमित्त ग्यारहवें दिन होता है इन को खाकर चान्द्रायण व्रत करे ॥ ९० ॥
जो मनुष्य सूतक का अन्न खाता है वह तीन दिन उपवास करे और एक दिन रात जल में रहे क्योंकि मरण या जन्म सम्बन्धी दोनों प्रकार के सूतक वाले का अन्न शुद्धि से पहिले अधर्म का निमित्त होता है ॥ ९१ ॥
मृतक और जन्म के सूतक में पञ्चमहायज्ञ न करे किन्तु उस समय शुष्क अन्न अथवा फल से होम मात्र करे ॥ ९२ ॥
स्त्री अथवा बालक दश दिन के अन्तर्गत ही मृत्यु को प्राप्त हो जावे तो शीघ्र ही शुद्धि होजाती है मरण
३
१८ भाषार्थसहिता-
सद्यएवविशुद्धिःस्यान्मृतेतनैवसूतकम् ॥९३॥
कृतचूडेप्रकुर्वीत उदकंपिंडमेवच ।
स्वधाकारंप्रकुर्वीत नामोच्चारणमेवच ॥ ९४ ॥
ब्रह्मचारीयतिश्चैव मन्त्रेपूर्वंक्रृतेतथा ।
यज्ञेविवाहकालेच सद्यःशौचंविधीयते ॥९५॥
विवाहोत्सवयज्ञेषु अन्तरामृतसूतके ।
पूर्वंसंकल्पितार्थस्य नदोषश्चात्रिरब्रवीत् ॥९६॥
मृतसंजननोधुं तु सूतकादौविधीयते ।
स्पर्शनाचमनाच्छुद्धिः सूतिकाञ्चेन्नसंस्पृशेत् ॥९७॥
पंचमेऽहनिविज्ञेयं संस्पर्शंक्षत्रियस्यतु ।
सप्तमेऽहनि वैश्यस्य विज्ञेयंस्पर्शनंबुधैः ॥९८॥
दशमेऽहनि शूद्रस्य कर्तव्यंस्पर्शनंबुधैः ।
और जन्म के दोनों सूतक नहीं लगते अर्थात् दश आदि दिन में शुद्धि का नियम वहां नहीं रहेगा ॥ ९३ ॥ जो मुंडन करने के पीछे बालक का मृत्यु होवे तो पिंड और जल का दान तथा स्वधाकार एवं नाम का उच्चारण करें ॥ ९४ ॥ ब्रह्मचारी-संन्यासी और सूतक से पूर्व मंत्र के जप का अनुष्ठान प्रारंभ करने वाले की तथा यज्ञ और विवाह के समय में, उसी समय शुद्धि होजाती है ॥ ९५ ॥ विवाह-उत्सव और यज्ञ में जो मरण का या जन्म का सूतक होजाय तो पूर्व से संकल्प वस्तु के लेने वा खाने आदि में दोष नहीं यह अत्रि जी ने कहा है ॥ ९६ ॥ यदि मरा हुआ बालक जन्मे तो सूतक के आरंभ में ही जल का स्पर्श तथा आचमन करने से शुद्धि हो जाती है परन्तु सूतिका का स्पर्श न करे तो ॥ ९७ ॥ दोनों प्रकार के सूतक में पांचवें दिन क्षत्रिय का और सातवें दिन वैश्य का स्पर्श करना बुद्धिमानों को जानना चाहिये ॥ ९८ ॥ दशवें दिन शूद्र का स्पर्श बुद्धिमान् करे । परन्तु गरू
अत्रिसमृतिः ॥ १९
मासेनेवात्मशुद्धिःस्यात् सूतकेमृतकेतथा ॥९९॥
व्याधितस्यकदर्यस्य ऋणग्रस्तस्यसर्वदा ।
क्रियाहीनस्यमूर्खस्य स्त्रीजितस्यविशेषतः ॥१००॥
व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्यनित्यशः ।
श्राद्धत्यागविहीनस्य भस्मान्तंसूतकंभवेत् ॥१०१॥
द्विकृच्छ्रेपरिवित्तेस्तु कन्यायाःकृच्छ्रमेवच ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रंमातुःस्यात्पितुःसांतपनंकृतम् ॥१०२॥
कुब्जवामनषण्ढेषु गद्गदेषुजडेषुच ।
जात्यन्धेबधिरेमूके नदोषःपरिवेदने ॥१०३॥
क्लीवेदेशान्तरस्थेच पतितेव्रजितेऽपिवा ।
योगशास्त्राभियुक्तेच नदोषःपरिवेदने ॥१०४॥
और जन्म दोनों प्रकार के सूतक में एक महीने में अपनी ( शूद्र की ) शुद्धि होती है ॥ ९९ ॥ रोगी-कृपण, जो सदा ऋणी रहे-क्रिया से हीन-मूर्ख विशेष कर स्त्री ने जिसे जीता हो अर्थात् सदा स्त्री के आधीन जो रहे ॥१००॥ जुआ आदि व्यसनों में जिस का धनादि लगा हो और जो नित्य पराधीन हो-जो कभी भी श्राद्ध के भोजन को न त्यागता हो, इतने मनुष्यों को मृतक के भस्म करने तक सूतक रहता है अर्थात् उन को जीवन पर्यन्त सदा ही सूतक लगा रहता है ॥ १०१ ॥ परिवित्ति ( जिस ने बड़े भाई के विवाह से पहिले अपना विवाह किया हो ) को दो कृच्छ्र व्रत कन्या को एक कृच्छ्र, और कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र कन्या की माता को, और पिता को सांतपन कृच्छ्र करना चाहिये ॥ १०२ ॥ कुबड़ा वामन ( बौना ) षंढ ( नपुंसक ) तोतला, या बला-जन्म से अंधा, बहरा-गूंगा-ऐसे बड़े भाइयों से पहिले छोटा भाई विवाह करे तो कुछ दोष नहीं है ॥ १०३ ॥ नपुंसक, दूर परदेश में रहता हो, पतित, संन्यासी-योगशास्त्र में तत्पर इनके भी परिवेदन में दोष नहीं है १०४
२० भाषार्थसहिता-
पितापितामहोयस्य अग्रजोष्यापिकस्यचित् ।
अग्निहोत्राधिकार्यस्ति नदोषःपरिवेदने ॥१०५॥
भार्य्यामरणपक्षेवा देशान्तरगतेपिवा ।
अधिकारीभवेत्पुत्र-स्तथापातकसंयुगे ॥ १०६ ॥
ज्येष्ठोभ्रातायदानष्टो नित्यंरोगसमन्वितः ।
अनुज्ञातस्तुकुर्वीत शंखस्यवचनंयथा ॥ १०७ ॥
नाग्नयःपरिविन्दन्ति नवेदानतपांसिच ।
नचश्राद्धंकनिष्ठोवै विनाचैवाभ्यनुज्ञया ॥ १०८ ॥
तस्माद्धर्मं सदाकुर्यात्-श्रुतिस्मृत्युदितंचयत् ।
नित्यंनैमित्तिकंकाम्यं यच्चस्वर्गस्यसाधनम् ॥१०९॥
एकैकंवर्धयेन्नित्यं शुक्लेकृष्णेचह्रासयेत् ।
अमावास्यांनभुञ्जीतएषचांद्रायणोविधिः ॥ ११० ॥
जिस का पिता, पितामह या बड़ा भाई अग्निहोत्र का अधिकारी हो उस को बड़े भाई से पूर्व विवाह करने में दोष नहीं है ॥ १०५ ॥ पिता की स्त्री वा पुत्र की माता के मरने पर, पिता के परदेश में जाने पर अथवा पिता को पातक लगने पर पिता के स्थान पर पुत्र अग्निहोत्र आदि कर्मों का अधिकारी होता है ॥१०६॥ यदि बड़ा भाई खोगया हो यद्वा सदा रोगी रहता हो तो उसकी आज्ञा से छोटा भाई शंख ऋषि के वचनके अनुसार विवाहकरके अग्निहोत्रलेनेवे॥१०७॥छोटे भाई ज्येष्ठ भ्राता की आज्ञा के विना न अग्निहोत्र कर सकते, न वेद पढ़ सकते, न तप करसकते, और न श्राद्ध कर सकते हैं ॥ १०८ ॥ अतएव वेद और स्मृतियों में कहे हुए नित्य ( संध्या आदि ) नैमित्तिक ( जात कर्म आदि ) काम्य ( पुत्रेष्टि आदि ) कर्म जो स्वर्ग का साधन ( दान आदि ) रूप धर्म है उसे सदा करे ॥ १०९ ॥ शुक्ल पक्ष में एक२ ग्रास बढ़ावे और कृष्णपक्ष में एक २ ग्रास घटावे एवं अमावास्या को भोजन सर्वथा न करे यह चांद्रायण व्रत की विधि है ॥ ११० ॥
अत्रिस्मृतिः ॥
२२
एकैकंग्रासमश्नीयात् त्र्यहानित्रीणिपूर्ववत् ।
त्र्यहं परं च नाश्नीया-दतिकृच्छ्रं तदुच्यते ॥ १११ ॥
इत्येतत्कथितंपूर्वै-र्महापातकनाशनम् ।
वेदाभ्यासरतंक्षान्तं महायज्ञक्रियापरम् ॥ ११२ ॥
नस्पृशन्तीहपापानि महापातकजान्यपि ।
वायुभक्षोदिवातिष्ठे-द्रात्रीन्नीत्वाप्सुसूर्यदृक् ॥११३॥
जप्त्वासहस्रंगायत्र्याः शुद्धिस्त्र्यह्वयधाहते ।
पद्मोदुंबरबिल्वान्न कुशाश्वत्थपलाशकाः ॥ ११४ ॥
एतेषामुदकंपीत्वा पर्णकृच्छ्रं तदुच्यते ।
पंचगव्यंचगोक्षीरंदधिमूत्रंशकृद्घृतम् । ११५ ॥
जग्ध्वापरंन्ह्युपवसे-त्कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ।
पृथक्सांतपनैर्द्रव्यैः षडहःसोपवासकः ॥११६॥
प्रथम तीन दिन तक एक २ ग्रास का भोजन करै और अगले तीन दिन में सर्वथा भोजन न करै इस को अतिकृच्छ्र व्रत कहते हैं ॥ १११ ॥ वेदों के अभ्यास में तत्पर तथा कृश और पांच महायज्ञों के करने में रत के लिये पूर्वज ऋषियों ने महापातक के नाश करने वाला यह प्रायश्चित्त कहा है ॥११२॥ जो दिन में सूर्य को देखता हुआ वायु को खाकर रहे और रात्रि को जलों में खड़ा हो व्यतीत करे उस को इस लोक में महापातक से उत्पन्न हुए पाप भी स्पर्श नहीं करते ॥ ११३ ॥ एक हजार गायत्री का जप करके ब्रह्महत्या से भिन्न सब पापों से शुद्धि होती है—कमल–गूलर–बेल–कुशा पीपल और ढाक ॥११४॥ इन के जल को पीकर दिन को व्यतीत करे उसे पर्णकृच्छ्र व्रत कहते हैं पंच गव्य ये हैं कि गौका दूध दही, मूत्र, गोबर—घी ॥ ११५ ॥ इन को प्रथम दिन खाकर अगले एक दिन उपवास करे इसे सांतपनकृच्छ्र कहते हैं—सांतपनकृच्छ्र के पञ्चगव्य तथा कुशोदक इन छः पदार्थों को क्रमशः एक २ दिन खाकर छः दिन व्यतीत करे और एक सातवें दिन उपवास करे ॥ ११६ ॥
| २२ | भाषाऽर्थसहिता- |
|---|
सप्ताहेनतुकृच्छ्रोयं महासांतपनंस्मृतम् ।
त्र्यहंसायं त्र्यहंप्रातस्त्र्यहंभुङ्क्तत्वयाचितम् ॥११७॥
त्र्यहंपरंचनाश्नीयात्प्राजापत्योविधिःस्मृतः ।
सायंतुद्वादशग्रासाः प्रातःपंचदशस्मृताः ॥११८॥
अयाचितैश्चतुर्विंश परैस्त्वनशनंस्मृतम् ।
कुक्कुटाण्डप्रमाणंस्याद् यावद्वास्याविशेन्मुखे ॥११९॥
एतद्ग्रासंविजानीया-च्छुद्ध्यर्थं कायशोधनम् ।
त्र्यहमुष्णंपिवेदाप-स्त्र्यहमुष्णंपिवेत्पयः ॥ १२० ॥
त्र्यहमुष्णंघृतंपीत्वा वायुभक्षोदिनत्रयं ।
षट्पलानि पिवेदाप-स्त्रिपलं तुपयः पिवेत्* ॥१२१॥
पलमेकंतुवैसर्पि-स्तप्तकृच्छ्रं विधीयते ।
त्र्यहंतुदधिनाभुङ्क्ते त्र्यहंभुङ्क्तेचसर्पिषा ॥१२२॥
यह सात दिन में महासांतपनकृच्छ्र कहा है तीन दिन सायंकाल में तीन दिन प्रातःकाल में भोजन करे तथा तीन दिन बिना मांगे जो मिले उसे भोजन करे ॥ ११७ ॥ और अन्त के तीन दिनों में सर्वथा भोजन न करे यह प्राजापत्य की विधि कही है--सायंकाल को बारह ग्रास और प्रातःकाल को पन्द्रह कहे हैं ॥११८॥ बिना याचना के तीन दिनों में चौबीस ग्रास खाने से श्रेष्ठ ऋषियों ने अनशन व्रत कहा है मुर्गे के अण्डे के समान एक ग्रास का प्रमाण होवे अथवा जितना व्रती के मुख में मापके वही उसका एक ग्रास है ॥ ११९ ॥ शुद्धि के अर्थ इसे ग्रास जाने और यही देह की शुद्धि करने वाला है-तीन दिन गर्म जल पीवे और तीन दिन गर्म दूध पीवे ॥ १२० ॥ तीन दिन गरम घी पीकर अन्त के-तीन दिन वायु का भक्षण करे, छः पल जल पीवे और तीन पल दूध पीवे ॥ १२१ ॥ एक पल घी पीवे इसे तप्त-कृच्छ्रव्रत कहते हैं-तीन दिन दही भोजन करे और तीन दिन घी ॥ १२२ ॥
* चार तोला का एक पल कहाता है ॥
अत्रिसमृतिः ॥ =३
क्षीरेणत्र्यहंभुङ्क्ते वायुभक्षोदिनत्रयम् । त्रिपलं दधिक्षीरेण पलमेकंतुसर्पिषा ॥१२३॥ एतदेवव्रतंपुण्यं वैदिकंकृच्छ्रमुच्यते । एकभक्तेननक्तेन तथैवायाचितेनच ॥१२४॥ उपवासेनचैकेन पादकृच्छ्रं प्रकीर्तितम् । कृच्छ्रातिकृच्छ्रः पयसा दिवसानेकविंशतिः ॥१२५॥ द्वादशाहापवासेन पराकःपरिकीर्तितः । पिण्याकश्चामतक्रांबु सक्तूनांप्रतिवासरम् ॥ १२६ ॥ एकैकमुपवासःस्या-त्सौम्यकृच्छ्रःप्रकीर्तितः । एषां त्रिरात्रमभ्यासा-देकैकस्ययथाक्रमम् ॥ १२७ ॥ तुलापुरुषइत्येष ज्ञयःपंचदशान्हिकः । कपिलायास्तुदुग्धाया धारोष्णंयत्पयःपिबेत् ॥ १२८ ॥ एषश्यामकृतःकृच्छ्रः श्वपाकमपिशोधयेत् । निशायांभोजनंचैव तज्ज्ञेयंनक्तमेवतु ॥ १२९ ॥
तीन दिन दूध को और तीन दिन वायु को भक्षण करे, दही और दूध तीन २ पल और घी एक पल भोजन करे ॥१२३॥ यही पवित्र और वेदोक्त कृच्छ्रव्रत कहा है-एक दिन हविष्य वस्तु का भोजन करे द्वितीयदिनबिना मांगे जो पदार्थ मिलेउसकाभोजन करे ॥१२४॥ और एक तीसरे दिन अन्त में उपवास करने से यह तीन दिन का पादकृच्छ्र कहा है-दूध को ही पीकर इक्कीसदिन बिताने से कृच्छ्रातिकृच्छ्रव्रत कहा है १२५॥ बारह दिन के उपवास से पराक व्रत कहा है, खली-कच्चामठा जल और सत्तू इन को क्रम से एक २ दिन खावे।१२६। और एक उपवास करै इसे सौम्यकृच्छ्र कहते हैं। इन पांचों में से एक २ के तीन दिन क्रम से अभ्यास करने से ॥१२७॥ यह पंद्रह दिन का तुला पुरुषव्रत है दुही हुई कपिला गौ के धारोष्ण दूध को जो पीवे ॥१२८॥ यह श्याम जी कृत (किया) कृच्छ्रव्रत चांडाल को भी शुद्ध करता है रात्रि में ही जो भोजन हो उसे नक्त कहते हैं ॥ १२९ ॥