भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

द्वादशोऽध्यायः

अथातो दोषभेदीयाध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम यहाँ से दोषभेदीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम —दोषविज्ञानीय अध्याय के बाद अब यहाँ दोषभेदीय अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है। क्योंकि बात आदि दोषों के भेदों का वर्णन किये बिना दोषों के सम्बन्ध में उनकी विशेष चर्चा नहीं की जा सकती। ग्यारहवें अध्याय में दोषों के बारे में अनेक विषयों की चर्चा करनी थी, अतः वहाँ हमने दोषभेदों का वर्णन नहीं किया। अन्य संहिताओं में इस विषय का वर्णन कहीं-कहीं है, देखें।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —च.सू. ११, १७, १९, २०, २८; च.शा. १ तथा च.चि. २८; सु.सू. २१, २४; सु.नि. १, ३; सु.उ. ६६ एवं अ.सं.सू. २०, २२ में देखें।

पक्वाशयकटीसकियश्रोत्रास्थिस्यर्शनेन्द्रियम्। स्थानं वातस्य, तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ॥ १ ॥

वात के प्रमुख स्थान —पक्वाशय (मलाशय), कमर, दोनों टॉगें, दोनों कान, अस्थियाँ तथा त्वचा ये वात के स्थान कहे गये हैं। इन सबमें पक्वाधान अर्थात् जठराग्नि द्वारा पुनः पके हुए आहार का स्थान मलाशय इसका प्रमुख स्थान है ॥ १ ॥

वक्तव्य —यद्यपि शरीरस्थ वातदोष सम्पूर्ण शरीर में भ्रमण करता है, फिर भी सामान्य-विशेष की दृष्टि से ऊपर वात के स्थानों का परिचय दिया गया है। अन्त्य यह भी वर्णन मिलता है—‘हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले। उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः’ ॥ ये सब भेद प्राचीन आचार्यों के विचार-भेद हैं और सभी तथ्यपूर्ण हैं। उक्त स्थानों पर वातदोष की विकृति का प्रभाव विशेषरूप से देखा जाता है।

नाभिरामाशयः स्वेदो लसीका रुधिरं रसः। दूकं स्पर्शनं च पित्तस्य, नाभिरत्र विशेषतः ॥ २ ॥

पित्त के प्रमुख स्थान —नाभि, आमाशय, स्वेद (पसीना), लसीका, रुधिर, रस, दूष्टि तथा त्वचा सामान्य रूप से ये पित्त के स्थान हैं। इन सबमें पित्त का प्रमुख स्थान नाभि है ॥ २ ॥

वक्तव्य —यहाँ ‘नाभि’ शब्द से ढोंढी या धुन्नी का ग्रहण नहीं किया गया है, जो उदर के बाहर देखी जाती है। सुश्रुत में नाभि का परिचय इस प्रकार है—‘पक्वामाशययोर्मध्ये सिराप्रभवा नाभिः’। (सु.शा. ६।२५) अर्थात् पक्वाशय एवं आमाशय के बीच में सिराओं का उत्पत्तिस्थान नाभि नामक मर्म है। इसी को ‘धुद्वान्त्र’ भी कहते हैं। लसीका —‘यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते’। (च.शा. ७।१५) अर्थात् लसीका की स्थिति त्वचा के भीतर मानी है। यही कारण है कि त्वचा के रगड़ जाने से उससे जो लसीका द्रव पदार्थ निकलता है, उसे लसीका कहते हैं।

स्पर्शनम् —यहाँ त्वचा को केवल पित्त का स्थान कहा गया है। आप ध्यान दें—सुश्रुत ने ‘सप्त त्वचो भवन्ति’ (सु.शा. ४।४) अर्थात् सात त्वचाएँ होती हैं कहा है और चरक ने ‘शरीरे षट् त्वचः’ (च.शा. ७।४) अर्थात् छः त्वचाएँ होती हैं, स्वीकार किया है। इन दोनों आचार्यों के मतभेद की चर्चा हम शारीरस्थान में करेंगे। सुश्रुत ने पहली त्वचा का नाम अवभासिनी रखा है, इसमें ब्राजक नामक पित्त

वोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१७१

रहता है और पाँचवीं त्वचा का नाम 'वेदनी' है, इसी को स्पर्शनेन्द्रिय भी कहते हैं। वास्तव में बात का स्थान यही है, इसी से शीत-उष्ण स्पर्श का ज्ञान होता है।

उरःकण्ठशिरःक्लोमपर्वण्यामाशयो रसः । मेदो घ्राणं च जिह्वा च कफस्य, सुतरामुरः ॥ ३ ॥

कफ के प्रमुख स्थान—उरु ( छाती ), कण्ठ, सिर, क्लोम, पर्व ( सन्धियों ), आमाशय, रसधातु, मेदोधातु, घ्राण ( नासिका ) तथा जीभ ये सब कफ के स्थान हैं। प्रमुख रूप से कफ का स्थान उरुस् है ॥ ३ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने शरीरसंख्याव्याकरण नामक ५वें अध्याय के ५वें गद्य में जो त्वचा से स्रोतों तक के अवयवों की गणना की है, उसमें हृदय तथा फुफ्फुस आदि का समावेश किया गया है। अष्टाङ्गहृदय में इसका वर्णन शारीरस्थान अध्याय ३ में देखें। ये सब कफ के स्थान हैं।

प्राणदिभेदात्पञ्चात्मा वायुः—

बात के पाँच भेद—प्राण, उदान, व्यान, समान तथा अपान भेद से यह बात पाँच प्रकार का होता है।

—प्राणोऽत्र मूर्धगः । उरःकण्ठचरो बुद्धिहृदयेन्द्रियचित्तधृक् ॥ ४ ॥

छीवनक्षत्रयुद्धारनिःश्वासान्नप्रवेशकृत् ।

पाँच बातों का वर्णन—उक्त पाँच बातों में प्राण नामक वायु शिरःप्रदेश में गतिशील रहता है। कण्ठ तथा उरःप्रदेश में उदानवायु विचरण करता हुआ बुद्धि, हृदय, सभी इन्द्रियों एवं मन को धारण करता है। यह छीवन ( थूकना तथा लालासाव ), छींक, उद्गार, निःश्वास तथा अन्नप्रवेश ( मुख से अन्न को भीतर ) की ओर ढकैलना कर्मों को करता है ॥ ४ ॥

वक्तव्य—चरक ने 'उत्तमाङ्ग' शिरःप्रदेश का वर्णन इस प्रकार किया है—'प्राणाः प्राणभूता यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च । यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते' ॥ ( च.सू. १७।१२ ) अर्थात् जहाँ प्राणियों के प्राण तथा सभी इन्द्रियाँ आश्रित रहती हैं और जो सभी अंगों में उत्तम अंग है, उसे सिर कहते हैं। सुश्रुत ने जबु के ऊपरी भाग में स्थित गरदन सहित अंगों को सिर कहा है और यह ३७ मर्मा का अधिष्ठान है। देखें—'जबुण'***अधिपतिरिति' । ( सु.शा. ६।६ )

उरःस्थानमुदानस्य नासानाभिंगलांश्चरेत् ॥ ५ ॥

वाक्प्रवृत्तिप्रयत्नोर्जाबलवर्णस्मृतिक्रियः ।

उदानवायु का वर्णन—उदानवायु का प्रमुख स्थान उरुस् ( छाती ) है। वह वायु नासिका ( नाक ), नाभि ( इसका परिचय श्लोक २ के वक्तव्य में ऊपर दिया गया है ) तथा गल ( कण्ठ ) प्रदेश में विचरण करता रहता है। वाक्प्रवृत्ति ( वाणी का निकलना ), प्रयत्न ( कर्म करने के प्रति उत्साह ), ऊर्जा ( शक्ति ), बल, वर्ण और स्मृति ये सब क्रियाएँ उसी वायु के अधीन हैं ॥ ५ ॥

व्यानो हृदि स्थितः कृत्स्नदेहचारी महाजवः ॥ ६ ॥

गत्यपक्षेपणोत्क्षेपनिमेषोन्मेषणादिकाः । प्रायः सर्वाः क्रियास्तस्मिन् प्रतिबद्धाः शरीरिणाम् ॥

व्यानवायु का वर्णन—व्यानवायु का प्रमुख स्थान हृदय है। यह वायु सम्पूर्ण शरीर में विचरण करता रहता है, क्योंकि यह अत्यन्त वेगवान् होता है। गति ( घूमते रहना ), अपक्षेपण ( अंगों को नीचे की ओर ले जाना ), उत्क्षेपण ( ऊपर की ओर ले जाना ), निमेष ( आँख बन्द करना ), उन्मेष ( आँख खोलना ), आदि शब्द से जैभाई आदि का ग्रहण—ये सभी क्रियाएँ व्यानवायु के अधीन होती हैं ॥ ६-७ ॥

वक्तव्य—व्यानवायु के जिन कर्मों की यहाँ चर्चा की गयी है, उनसे भी महत्त्वपूर्ण वर्णन शारीरस्थान ३।६८ में इनका किया है, उसका अवलोकन अवश्य कर लें।

समानोऽग्रिमसौपस्यः कोष्ठे चरति सर्वतः । अन्नं गृह्णाति पचति विवेचयति मुञ्चति ॥ ८ ॥

१७२

अष्टाङ्गहृदये

समानवायु का वर्णन—समानवायु पाचकाग्नि के समीप रहता है। यह कोष्ठप्रदेश में चारों ओर घूमता रहता है। यह आमाशय से अन्न को लेता है, फिर उसे पचाता है, उसकी विवेचना करता है और उस पके हुए आहार में से रस, मल तथा मूत्र को अलग-अलग करके उन्हें वयास्थान छोड़ देता है ॥८॥

अपानोऽपानगः श्रोणिबस्तिमेद्वोरुगोचरः । शुकार्तवशकृन्मूत्रगर्भनिष्क्रमणक्रियः ॥९॥

अपानवायु का वर्णन—अपानवायु प्रधानरूप से अपान (गुद) प्रदेश में रहता है। सामान्य रूप से कमर, बस्ति (मूत्राशय एवं मूत्रवाही श्रोतों), मेहन (मूत्रमार्ग) तथा ऊरुओं में पाया जाता है और यही शुक्र, आर्तव, मल, मूत्र, गर्भाशय से गर्भ को समय पर बाहर निकालना भी इसी का कार्य है ॥९॥

पित्तं पञ्चवात्सकं—

पित्त के पाँच भेद—पित्त के पाँच भेद इस प्रकार हैं—१. पाचक, २. रंजक, ३. साधक, ४. आलोचक तथा ५. भ्राजक।

—तत्र पञ्चमाशयमध्यगम्। पञ्चभूतात्सकत्वेऽपि यत्तैजसगुणोदयात् ॥१०॥

त्यक्तद्रवत्वं पाकादिकर्मणाऽनलशब्दितम्। पचत्यन्नं विभजते सारकिट्टौ पृथक् तथा ॥११॥

तत्रस्थमेव पित्तानां शेषाणामप्यनुग्रहम्। करोति बलदानेन पाचकं नाम तत्समूतम् ॥१२॥

पाचक पित्त का वर्णन—उक्त पाँच पित्तों में जो पित्त पञ्चमाशय तथा आमाशय के मध्यभाग (क्षुद्रान्न) में गतिशील होता है और जो पञ्चमहाभूतात्सक होने पर भी तैजस् (आग्नेय) गुण की प्रधानता के कारण जिसने अपना द्रव स्वरूप छोड़ कर कठिन (अग्नि) रूप धारण कर लिया है और पाचन आदि कर्मों को करने के कारण जो अग्नि संज्ञा को धारण कर लिया है। जो खाये हुए आहार को पचाता है तथा सार (रस) एवं किट्ट (मल-मूत्र) को विभाजित करता है। वही रहकर रंजक आदि पित्तों को जो शक्ति प्रदान करके उनके ऊपर कृपा करता है, उसे 'पाचक पित्त' कहते हैं ॥१०-१२॥

आमाशयाश्रयं पित्तं रंजकं रसरंजनात्।

रंजक पित्त का वर्णन—जो पित्त आमाशय में रहता है, वह रस को रंग देने के कारण रंजक पित्त कहा जाता है।

वक्तव्य—सुश्रुत के अनुसार—'स खलु आप्यो रसो यकृत्-प्लीहानी प्राप्य रागमुपैति'। (सु.सू. १४४) अर्थात् शरीर का पोषक रसघातु ही यकृत-प्लीहा में पहुँचकर ललिमा को प्राप्त हो जाता है। और भी देखें—'यत्तु यकृत्प्लीहोः पित्तं तस्मिन् रंजकोऽग्निरिति संज्ञा'। (सु.सू. २१॥१०) अर्थात् जो पित्त यकृत-प्लीहा में रहता है, उसका नाम 'रंजक पित्त' है। इस दृष्टि से महर्षि वाग्भट का यह पाठ 'आमाशयाश्रयं पित्तं रंजकं' समुचित प्रतीत नहीं होता। यहाँ वाग्भट का उक्त कथन आधुनिक विचारों से प्रभावित है, ऐसा लगता है। देखें—यह आमाशयाश्रय पित्त 'हाइड्रोक्लोरिक अम्ल' नामक वह आमाशयिक रस है जो पित्त की भाँति खाये हुए आहार को पचाने में सहायक होता है और उसके मिश्रण से यकृत-प्लीहा में पहुँचने पर वही रस राग को पाकर रक्त का रूप धारण कर लेता है। यही चरितार्थता है वाग्भट के उक्त वचनों की।

बुद्धिमेधाभिमानाद्यैरभिप्रेतार्थसाधनात् ॥१३॥

साधकं हृन्नतं पित्तं—

साधक पित्त का वर्णन—जो पित्त हृदय में रहता है, उसे 'साधक पित्त' कहते हैं। यह पित्त बुद्धि, मेधा, अभिमान (अहंकार) आदि द्वारा इच्छित पदार्थों की सिद्धि करता है ॥१३॥

—रूपालोचनतः स्मृतम्। दूकस्थमालोचकं—

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१७३

आलोचक पित्त का वर्णन—जो पित्त दृष्टिगण्डल में रहता है, उसे आलोचक पित्त कहते हैं। यह पित्त रूप (स्वरूप, आकार या वर्ण) को देखने में उपयोगी (सहायक) होता है।

—त्वकस्यं भ्राजकं भ्राजनात्त्वचः ॥ १४ ॥

भ्राजक पित्त का वर्णन—जो पित्त सबसे बाहरी अतएव प्रथम (अवभासिनी) त्वचा में रहता है वह त्वचा को कान्तियुक्त करता है, इसीलिए इसे 'भ्राजक पित्त' कहते हैं ॥ १४ ॥

वक्तव्य—त्वचागत द्रव में जो पीलापन दिखलायी देता है, यही भ्राजक पित्त है। इसी से त्वचा में चमकीलापन दिखलायी देता है।

श्लेष्मा तु पञ्चधा—

कफ का वर्णन—शरीर में कफ भी पाँच प्रकार का होता है—१. अवलम्बक, २. क्लेदक, ३. बोधक, ४. तर्पक तथा ५. श्लेषक—ये उसके नाम हैं।

—उरस्यः स त्रिकस्य स्ववीर्यतः । हृदयस्यान्नवीर्याच्च तत्स्य एवाम्बुक्कर्मणा ॥ १५ ॥

कफधात्मां च शेषाणां यत्करोत्यवलम्बनम् । अतोऽबलम्बकः श्लेष्मा—

अवलम्बक कफ का वर्णन—जो कफ उरःप्रदेश में रहता है वह अपनी शक्ति से त्रिकास्थि का तथा आहार से हृदय का अवलम्बन (सहारा) करता है और वहाँ (हृदय में) रहकर जलकर्म द्वारा आमाशय आदि दूसरे कफस्थानों की भी सहायता (अवलम्बन) करता है, अतएव इसे 'अवलम्बक' कहा जाता है ॥ १५ ॥

वक्तव्य—'पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः' । (सु.सू. १।२२) के अनुसार शरीर में स्थित जल तत्त्व 'कफ' की संज्ञा है। इसी को श्लेष्मा भी कहते हैं। देखें—सु.सू. २१।१४। इस प्रकार ये वात-पित्त-कफ क्रमशः यहाँ वायु, अग्नि एवं जल तत्त्वों के प्रतिनिधि हैं; इन्हीं से शरीर की उत्पत्ति होती है। देखें—'वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भव हेतवः' । (सु.सू. २१।३) ध्यान रहे, जलतत्व में कुछ अंश पृथिवी तत्व का भी होता है, अतएव इसमें स्थिरता तथा गुठ्ठा बनी रहती है।

—यत्स्वामाशयसंस्थितः ॥ १६ ॥

क्लेदकः सोऽन्नसङ्गतक्लेदनात्—

क्लेदक कफ का वर्णन—जो कफ आमाशय में रहकर अपना कार्य करता है वह अन्न (आहार-समूह) को गीला करता है, अतः इसे 'क्लेदक' कहते हैं ॥ १६ ॥

—रसबोधनात् । बोधको रसनास्थायी—

बोधक कफ का वर्णन—जो कफ रसना (जीभ) में रहता है वह वहाँ रहकर मधुर आदि रसों का बोध कराता है, अतएव उसे 'बोधक' कहते हैं।

—शिरःसंस्थोऽक्षतर्पणात् ॥ १७ ॥

तर्पकः—

तर्पक कफ का वर्णन—जो कफ सिर (मस्तिष्क) में रहता है वह सभी ज्ञानेन्द्रियों का तर्पण करता है अर्थात् इन्द्रियों को अपने सहयोग से नुप्त करता है, अतएव इसे 'तर्पक' कहते हैं ॥ १७ ॥

—सन्धिंसंश्लेषाच्छ्लेषकः सन्धिषु स्थितः ।

श्लेषक कफ का वर्णन—जो कफ शरीर के सन्धिस्थलों में रहता है वह सन्धियों को सटाता है, अतः उसे 'श्लेषक' कहते हैं।

वक्तव्य—यहाँ एक-एक वात, पित्त, कफ के पाँच-पाँच नाम रखकर जो उनका परिचय दिया गया है, वह उनके कार्यक्षेत्रों के नाम हैं। जैसे एक ही व्यक्ति सम्बन्ध-विशेष से पिता, चाचा, मामा, भाई

१७४

अष्टाङ्गहृदये

आदि कहा जाता है; ऐसे ही कार्यभेद से उसके भिन्न-भिन्न नाम हो जाते हैं, वैसी ही उक्त संज्ञाएँ बात आदि दोषों की भी निर्धारित की गयी हैं।

इति प्रायेण दोषाणां स्थानान्यविकृतात्मनाम् ॥ १८ ॥

व्यापिनासपि जानीयात्कर्मणि च पृथक्पृथक् ।

उपसंहार—यहाँ तक अविकृत अर्थात् प्रकृतिस्थ बात, पित्त तथा कफ नामक दोषों और उनके पाँच-पाँच भेदों के प्रमुख स्थानों एवं उनके कार्यो का वर्णन कर दिया गया है। यद्यपि उक्त बात आदि दोष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं, फिर भी उनके उक्त कर्मों के कारण उनके मानवशरीर में भिन्न-भिन्न स्थानों को समझ लेना चाहिए ॥ १८ ॥

उष्णेन युक्ता रुक्षाद्या वायोः कुर्वन्ति सञ्चयम् ॥ १९ ॥

शीतेन कोपमुष्णेन शमं स्निग्धादयो गुणाः ।

बात के चय, कोप, शम का वर्णन—उष्णवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वातदोष का संचय करते हैं, शीतवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वातदोष को प्रकृपित करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वातदोष का शमन करते हैं ॥ १९ ॥

वक्तव्य—रुक्ष आदि गुण—रुक्ष, शीत, खर, सूक्ष्म, चल तथा विशद इत गुणों वाले पदार्थों का सेवन करने से वातदोष की वृद्धि होती है, क्योंकि 'वृद्धिः समानैः सर्वेषाम्' अथवा 'सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्' आदि अनेक प्रमाण हैं। यह वृद्धि संचय तथा प्रकोप रूप से दो प्रकार की होती है। ध्यान दें—यदि रुक्ष आदि (उपर्युक्त) गुणों वाले द्रव्यों का सेवन उष्णवीर्य वाले द्रव्यों के साथ किया जायेगा तो उसका संचय तो होगा किन्तु प्रकोप नहीं होगा, इसका ध्यान सर्वत्र रखें।

शीतेन युक्तास्तीक्ष्णाद्याश्रयं पित्तस्य कुर्वते ॥ २० ॥

उष्णेन कोपं, मन्दाद्याः शमं शीतोपसंहिताः ।

पित्त के चय, कोप, प्रशम का वर्णन—शीतवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का संचय करते हैं, उष्णवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष को प्रकृपित करते हैं और शीतवीर्य से युक्त मन्द आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का शमन करते हैं ॥ २० ॥

वक्तव्य—तीक्ष्ण आदि गुण—तीक्ष्ण, स्निग्ध, उष्ण, लघु, विन्न, सर तथा द्रव गुण वाले अम्ल, लवण तथा कटु रस वाले। उक्त गुणों वाले पदार्थों का सेवन यदि शीतवीर्य पदार्थों के साथ किया जाता है, तो पित्त का संचय होता है, किन्तु शीतवीर्य पदार्थों के कारण पित्त का प्रकोप नहीं होने पाता।

शीतेन युक्ताः स्निग्धाद्याः कुर्वते श्लेष्मणश्रयम् ॥ २१ ॥

उष्णेन कोपं, तेनेव गुणा रुक्षादयः शमम् ।

कफ के चय, कोप, प्रशम का वर्णन—शीतवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुणवाले पदार्थ कफदोष का संचय करते हैं। उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का प्रकोप करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त रुक्ष आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का शमन करते हैं ॥ २१ ॥

वक्तव्य—स्निग्ध आदि गुण—स्निग्ध, शीत, गुरु, मन्द, श्लक्ष्ण, मुक्तन, स्थिर, मुदु, मधुर तथा पिच्छिल गुण वाले पदार्थों का सेवन करने से कफदोष का संचय तो होता है, किन्तु उसका प्रकोप नहीं होता, क्योंकि शीतवीर्य द्रव्यों के प्रभाव से कफदोष जमा रहता है और इसके विपरीत उष्णवीर्य वाले पदार्थों का सेवन करने से कफदोष पिघल कर कुपित हो जाता है।

चयो वृद्धिः स्वधान्येव प्रहेषो वृद्धिहेतुषु ॥ २२ ॥

दोषभेदीयाध्यायः ११ ]

सूत्रस्थानम्

१७५

विपरीतगुणेच्छा च—

दोषों के चय का वर्णन—इसके पहले इसी अध्याय में बात आदि दोषों के स्थानों का वर्णन किया जा चुका है। जब बात आदि दोषों की वृद्धि अपने ही स्थानों में होती है, उसे आयुर्वेदीय परिभाषा के अनुसार चय या संचय कहा जाता है। इस स्थिति में जिन कारणों से उक्त दोषों की वृद्धि हुई है, उन कारणों के प्रति विशेष करके द्वेष हो जाता है और उक्त कारणों के विपरीत कारणों (आहार-विहारों) के प्रति इच्छा अर्थात् उनके सेवन करने के प्रति रुचि बलवती होती है ॥ २२ ॥

—कोपस्तूष्मार्गागमिता । लिङ्गानां दर्शनं स्वेष्टामस्वास्थ्यं रोगसम्भवः ॥ २३ ॥ स्वस्थानस्थस्य समता विकारासम्भवः शमः ।

दोषों के प्रकोप का वर्णन—बात आदि दोषों का जो उन्मार्ग (विलोम) गमन होता है, उसे 'कोप' या 'प्रकोप' कहते हैं। दोषों का प्रकोप होने पर उन-उन के लक्षण दिखलाये देते हैं। मनुष्य को अस्वस्थता का अनुभव होने लगता है, फिर रोग-विशेष की उत्पत्ति हो जाती है और जब बात आदि दोष अपने-अपने स्थान में रहते हैं तब रोगों की उत्पत्ति नहीं होती। इसी को समता (साम्यावस्था) अथवा 'शम' कहते हैं ॥ २३ ॥

चयप्रकोपप्रशमा वायोर्ग्रीष्मादिषु त्रिषु ॥ २४ ॥ वर्षादिषु तु पित्तस्य, श्लेष्मणः शिशिरादिषु ।

चय, कोप, प्रशम का वर्णन—अब कालस्वभाव के अनुसार बात आदि दोषों के चय, प्रकोप और प्रशम का परिचय दिया जा रहा है—ग्रीष्म ऋतु में वातदोष का चय, वर्षा ऋतु में प्रकोप और शरद् ऋतु में प्रशम होता है। वर्षा ऋतु में पित्तदोष का चय, शरद् ऋतु में प्रकोप तथा हेमन्त ऋतु में प्रशम होता है। शिशिर ऋतु में कफदोष का चय, वसन्त ऋतु में प्रकोप एवं ग्रीष्म ऋतु में प्रशम होता है ॥ २४ ॥

चीयते लघुरुक्षामिरोषधीभिः समीरणः ॥ २५ ॥

तद्विधस्तद्विधे देहे कालस्यौष्यान्न कृष्यति । अद्विरस्त्वपिकाभिरोषधीभिश्च तादृशम् ॥ २६ ॥ पित्तं याति च्यं कोपं न तु कालस्य शैत्यतः । चीयते स्निग्धशीताभिरुदकीषधिभिः कफः ॥ तुल्येऽपि काले देहे च स्कन्तत्वात्र प्रकृतिः ।

चय आदि का विशेष वर्णन—ग्रीष्म ऋतु में लघु एवं रुक्ष गुणों वाली औषधियों के सेवन करने से लघु तथा रुक्ष गुण-प्रधान शरीर में लघु एवं रुक्ष गुण वाले वातदोष का संचय तो हो जाता है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु की उष्णता के कारण वह वातदोष प्रकृपित नहीं होता। वर्षा ऋतु में जल तथा औषधियों का विपाक अम्ल होता है, अतः अम्लविपाक वाले पित्त का संचय हो जाता है, किन्तु वर्षा काल की शीतता के कारण वह कुपित नहीं होता। हेमन्त ऋतु में स्निग्ध एवं शीतल जल तथा औषधियों से स्निग्ध तथा शीत गुण वाले कफ का संचय तो हो जाता है, किन्तु काल एवं शरीर के समान गुण वाला होने पर भी जमा हुआ कफदोष प्रकृपित नहीं हो पाता ॥ २५-२७ ॥

वक्तव्य—इस प्रसंग में 'औषधीभिः' पद का प्रयोग 'आहार' के अर्थ में हुआ है। आप देखें—'नानौषधि-भूतं जगति किञ्चिद् विद्यते' इस सूक्ति से सम्पूर्ण द्रव्य या पदार्थ औषधि हैं। यहाँ सूक्ष्म की निम्न सूक्ति का भी अवश्य स्मरण कर लेना चाहिए—'सञ्चयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थानसंशयम्'। व्यक्ति भेदं च यो वेत्ति दोषाणां स भवेद् भिषक् ॥ (सु.सु. २१।३६) अर्थात् जो दोषों के संचय, प्रकोप तथा प्रसर काल को, स्थानसंशय को तथा रोगव्यक्ति के भेदों (पूर्वक, रूप) को जानता है, वास्तव में वही चिकित्सक है।

इति कालस्वभावोऽयमाहारादिवशात् पुनः ॥ २८ ॥ चयादीन् यान्ति सद्योऽपि दोषाः कालेऽपि वा न तु ।

१७६

अष्टाङ्गहृदये

कालस्वभाव का वर्णन—यह सब काल (ऋतु) का स्वभाव है अथवा उसका प्रभाव है और यह आहार-विहार के प्रभाव से तत्काल या असमय में भी बात आदि दोषों का चय (संचय), प्रकोप अथवा प्रशम हो जाता है और कभी उक्त कालों में बात आदि दोषों का चय, कोप, प्रशम नहीं भी होता॥ २८॥

वक्तव्य—इन विषयों का विस्तृत वर्णन—सु.सू. ६ सम्पूर्ण में देखें।

व्याप्नोति सहसा देहमापादतलमस्तकम्॥ २९॥

निवर्तते तु कुपितो मलोऽल्पान् जलोघवत्॥

दोषों की व्याप्ति एवं निवृत्ति—कुपित हुआ दोष पैरों से लेकर चोटी तक अर्थात् सम्पूर्ण शरीर में सहसा (एकाएक) फैल जाता है, परन्तु जब वह शान्त होता है तो धीरे-धीरे पानी के बहाव की भाँति। वास्तव में यह स्थिति वातज विकारों की ही होती है, अन्य की नहीं॥ २९॥

नानारूपैरसङ्ख्येयैर्विकारैः कुपिता मलाः॥ ३०॥

तापयन्ति तन् तु तस्मात्तद्वेत्वाकृतिसाधनम्। शक्यं नैकैकशो वक्तुमतः सामान्यमुच्यते॥ ३१॥

निदान, रूप, चिकित्सा वर्णन—अपने प्रकोपक कारणों से कुपित हुए अनेक लक्षणों वाले वात आदि दोष अनशिनत रोगों द्वारा शरीर को पीड़ित कर देते हैं, अतएव प्रत्येक रोग के निदान, आकृति (पूर्वरूप तथा रूप) तथा साधन (चिकित्सा) का वर्णन यहाँ (सूत्रस्थान में) नहीं किया जा सकता, इसलिए यहाँ उनका सामान्य वर्णन कर दिया गया है॥ ३०-३१॥

दोषा एव हि सर्वेषां रोगाणामेककारणम्। यथा पक्षी परिपतन् सर्वतः सर्वमप्यहः॥ ३२॥

छायामत्येति नात्सीयां यथा वा कृत्स्नमप्यदः। विकारजातं विविधं त्रीन् गुणात्रातिवर्तते॥ ३३॥

तथा स्वधातुवैषम्यनिमित्तमपि सर्वदा। विकारजातं त्रीन् दोषान्—

रोगों की उत्पत्ति के कारण—सभी प्रकार के रोगों की उत्पत्ति के एक मात्र कारण वात आदि दोष ही हैं। जैसे—पक्षी दिनभर चारों ओर उड़ता हुआ भी अपनी छाया का अतिक्रमण नहीं कर पाता, अथवा (नूसरा उदाहरण देते हैं—) यह विकार-समूह अनेक प्रकार का होता हुआ भी सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीनों गुणों का अतिक्रमण नहीं कर पाता; उसी प्रकार शरीर में स्थित वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरोष आदि मलों की विषमता से उत्पन्न यह विकार (रोग) समूह वात आदि दोषों का भी अतिक्रमण नहीं कर सकता॥ ३२-३३॥

—तेषां कोपे तु कारणम्॥ ३४॥

अयैरसात्यैः संयोगः कालः कर्म च दुष्कृतम्। हीनातिमिथ्यायोगेन भिद्यते तत्पुनस्त्रिधा॥ ३५॥

दोषों के प्रकोप का कारण—उक्त वात आदि दोषों के कारण हैं—असात्य (प्रतिकूल) अर्थों (विषयों) के साथ इन्द्रियों का संयोग, काल (शीत, उष्ण आदि का प्रभाव) तथा दुष्कृत कर्मों का प्रभाव। फिर इन कारणों के भी तीन भेद होते हैं—हीनयोग, अतियोग और मिथ्यायोग॥ ३४-३५॥

वक्तव्य—महर्षि सुश्रुत ने इस सम्पूर्ण विषय को इस प्रकार कहा है—‘सर्वेषां’...‘व्याधिरिति’। (सु.सू. २४४) अर्थात् सब रोगों के मूल कारण वात, पित्त, कफ ही हैं। क्योंकि सभी रोगों में वात आदि दोषों के लक्षण दिखायी देते हैं तथा तदनुसार चिकित्सा करने से लाभ होता है। शास्त्र भी इस बात का समर्थन करता है। जिस प्रकार महत् आदि २४ तत्त्व जगत् रूप में स्थित होते हुए भी सत्त्व, रजस्, तमस् तत्वों से अलग नहीं होते, वैसे ही रोगों की भी स्थिति है। दोषों द्वारा रसादि धातुओं के दूषित होने से रस आदि की दूष्य संज्ञा हो जाती है। दोषज रोगों में यह रसज तथा यह रक्तज रोग है, इस प्रकार का व्यवहार होता ही है।

हीनोऽर्थेनन्दिश्यत्याल्पः संयोगः स्वेन नैव वा। अतियोगोऽतिसंसर्गः सूक्ष्मभासुरभैरवम्॥ ३६॥

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१७७

अत्यासन्नातिदूरस्थं विप्रियं विकृतादि च । यदक्षणा बीक्ष्यते रूपं मिथ्यायोगः स दारुणः ॥ ३७ ॥ एवमत्युच्चपूत्यादीनिन्द्रियार्थान् यथाययम् । विद्यात्—

हीनयोग आदि का वर्णन—चक्षु ( नेत्र ) आदि इन्द्रियों का अपने रूप आदि विषयों के साथ थोड़ा संयोग अथवा संयोग का अभाव 'हीनयोग' कहा जाता है, अधिक योग को 'अतियोग' कहते हैं। चक्षुरिन्द्रिय द्वारा जो अतिसूक्ष्म, अधिक चमकीला, अतिभयानक, अतिसमीपस्थ, अतिदूरस्थ, अतिअप्रिय या अधिक विकार युक्त जो रूप देखा जाता है, वह चक्षुरिन्द्रिय का मिथ्यायोग कहा जाता है। यह अत्यन्त हानिकारक होता है। इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय, प्राणेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और स्पर्शनेन्द्रिय के भी अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग की कल्पना कर लेनी चाहिए ॥ ३६-३७ ॥

—कालस्तु शीतोष्णवर्षाभेदात् त्रिधा मतः ॥ ३८ ॥

स हीनो हीनशीतादिरित्योगोऽतिलक्षणः । मिथ्यायोगस्तु निर्दिष्टो विपरीतस्त्वलक्षणः ॥ ३९ ॥

काल का वर्णन—काल तीन प्रकार का होता है—१. शीतकाल, २. उष्णकाल तथा ३. वर्षाकाल। जिस काल में उस ऋतु के थोड़े लक्षण दिखलायी पड़ते हैं, वह उस काल का हीनयोग है, जिसमें उस काल के अधिक लक्षण होते हैं, वह उस काल का अतियोग है और जिसमें उस काल के स्वाभाविक लक्षणों से विपरीत लक्षण होते हैं, वह उस काल का 'मिथ्यायोग' है ॥ ३८-३९ ॥

कायवाकृचित्भेदेन कर्मापि विभजते त्रिधा । कायादिकर्मणो हीना प्रवृत्तिर्हीनसंज्ञकः ॥ ४० ॥

अतियोगोऽतिवृत्तित्पु, वेगोदीरणधारणम् । विषमाङ्गक्रियारम्भपतनस्त्वलादिकम् ॥ ४१ ॥

भाषणं सामिभूक्तस्य रागद्वेषभयादि च । कर्म प्राणातिपातादि दशधा यच्च निन्दितम् ॥ ४२ ॥ मिथ्यायोगः समस्तोऽसाविह वाऽमुत्र वा कृतम् ।

कर्म का वर्णन—कर्म तीन प्रकार का होता है—१. कायकर्म, २. वाक्कर्म तथा ३. चित्तकर्म। कायकर्म आदि की स्वल्प वृत्ति का नाम 'हीनयोग', उसकी अत्यधिक वृत्ति का नाम 'अतियोग' एवं पूरीप आदि के वेगों को प्रेरित करना अथवा इनके वेगों को रोकना, हाथ-पैर आदि अंगों से विषम कर्म या कर्मों को करना, गिरना, फिसल जाना आदि कायकर्मों का मिथ्यायोग कहा गया है। आधा आहार निगला जा रहा हो, उस समय का बोलना वाक्कर्म का 'मिथ्यायोग' है। राग, द्वेष, भय तथा शोक आदि भाव 'चित्तकर्म' के 'मिथ्यायोग' हैं। प्राणातिपात ( आत्महत्या ) आदि कर्म, जिनका वर्णन अ.हू.सू. १।२२ में किया गया है, वे सब इस लोक अथवा उस लोक में किया गया काय, वाक् तथा चित्त के कर्मों का मिथ्यायोग है ॥ ४०-४२ ॥

वक्तव्य—इस विषय की चर्चा च.सू. ११, च.नि.१, च.शा. १।९८ में द्रष्टव्य है।

निदानमेतद्वोषाणां, कुपितास्तेन नैकधा ॥ ४३ ॥

कुर्वन्ति विविधान् व्याधीन् शाखाकोष्ठास्थिसन्धिषु ।

उपसंहार एवं रोगमार्ग—यह बात आदि दोषों के हीनयोग, अतियोग तथा मिथ्यायोग का निदान कह दिया गया है। ये बात आदि दोष कुपित हो जाने पर अनेक प्रकार के शाखागत, कोष्ठगत तथा अस्थिसन्धिगत रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ ४३ ॥

वक्तव्य—'शाखाकोष्ठास्थिसन्धिषु'—इनको महर्षि पुनर्वसु ने रोगमार्ग कहा है। देखें—'त्रयो रोग-मार्गाः' 'मार्ग आभ्यन्तरः' । ( च.सू. ११।४८ ) अर्थात् ये तीन रोगमार्ग हैं, जिनसे विविध प्रकार के रोगों का शरीर के भीतर प्रवेश होता है। इस प्रकरण में रक्त आदि धातुओं तथा त्वचा को भी शाखा संज्ञा प्रदान की गयी है।

शाखा रक्तादयस्त्वक् च बाहुरोगेनायनं हि तत् ॥ ४४ ॥

तदाश्रया मषव्यङ्गण्डालज्यर्बुदादयः । बहिर्भागाश्च दुर्निमगुलमशोफादयो गवाः ॥ ४५ ॥

१२ अ० ह०

१७८

अष्टाङ्गहृदये

बाहरी रोगमार्ग—इस प्रसंग में रक्त आदि धातुओं तथा त्वचा का नाम भी 'शाखा' है, यह बाह्य रोगमार्ग है। इस रोगमार्ग में आश्रित मष (मषक, मत्से, तिल आदि), व्यंग (झाई), गण्ड (घेचा), अलजी, अर्बुद आदि रोग और शरीर के बाह्यमार्ग में अर्श, गुल्म, ब्रण तथा शोथ आदि भी होते हैं ॥ ४४-४५ ॥

अन्तःकोष्ठो महास्रोत आमपक्वाशयाश्रयः। तत्स्थानाः ज्वरतीतीसारकासश्चासोदरज्वराः ॥ अन्तर्भागं च शोफाशौगुल्मबीसर्पविद्रधिः।

आभ्यन्तर रोगमार्ग—आभ्यन्तर (भीतरी) रोगमार्ग के पर्यायवाचक शब्द इस प्रकार हैं—अन्तः, कोष्ठ, महास्रोतस, आमाशय तथा पक्वाशय (इन दोनों के बीच में स्थित क्षुद्रान्त भी)। ये छर्दि (वमन), अतिसार, कास, श्वास, उदररोग तथा ज्वर आदि रोगों की उत्पत्ति के स्थान हैं। भीतरी शोथ, अर्श, गुल्म, विसर्प और विद्रधि का भी स्थान है। इसे आभ्यन्तर रोगमार्ग कहते हैं ॥ ४६ ॥

शिरोहृदयबस्त्यादिमर्माण्यस्त्यां च सन्ध्यः ॥ ४७ ॥

तन्निबद्धाः शिरान्त्यायुक्कण्डराद्याश्च मध्यमः। रोगमार्गः स्थितास्तत्र यक्षमपक्षवर्धारिताः ॥ ४८ ॥

मूध्ादिरोगाः सन्ध्यस्थित्रिकशूलग्रहादयः।

मध्यम रोगमार्ग—सिर, हृदय, बस्ति आदि मर्म और अस्थियों की सन्धियाँ एवं इनसे सम्बन्धित सिरा, स्नायु और कण्डराएँ आदि ये सभी 'मध्यम रोगमार्ग' हैं। इनमें होने वाले रोग राजयक्ष्मा, पक्षाघात, अर्दित (मुखप्रदेश का लकवा) आदि वातविकार, शिरोरोग, हृदयरोग आदि, सन्धिशूल, अस्थिशूल, त्रिकशूल तथा ग्रह (जकड़न) आदि रोग हैं ॥ ४७-४८ ॥

संसव्यासन्व्यहस्वापसादरुक्तोदभेदनम् ॥ ४९ ॥

सङ्गाङ्गभङ्गसङ्कोचवर्तहर्षणतर्पणम् । कम्पपारुष्यसौषिष्यशोघस्पन्दनवेष्टनम् ॥ ५० ॥

स्तम्भः कषायरस्ता वर्णः श्यावोऽरुणोऽपि वा। कर्माणि वायोः—

वातदोष के कर्म—स्रम (शरीर के किसी अंग का अपने स्थान से खिसक जाना), व्यास ( फैल जाना), व्यध (बिघने की जैसी पीड़ा का होना), स्वाप (अंग-विशेष का सुख हो जाना), साद (अवसाद), रुक् (पीड़ा), तोद (सूर्द चुभने की-सी पीड़ा), भेदन (फटने की-सी पीड़ा), संग (हकावट), अंगों का टूटना या टूटने की-सी पीड़ा का होना, संकोच (सिकुड़ जाना), वर्त (घूमना या ऐटना—आवर्त, परिवर्त, विवर्त आदि इसी के रूप हैं), हर्षण (रोमांच), तर्पण (तृषा या प्यास का लगना), कम्प (कैंपकैपी), पारुष्य (खुरदरापन), सौषिष्य (खोखलापन), शोष (सूखना), स्पन्दन (फड़कना), वेष्टन (लपेटना), स्तम्भ (जकड़ जाना), मुख में कसैलेपन का अनुभव होना और उस स्थान का वर्ण श्याव (काला) या अरुण वर्ण का हो जाना—ये सभी वातदोष के कर्म हैं ॥ ४९-५० ॥

—पित्तस्य दाहरागोष्मपाकिताः ॥ ५१ ॥

स्वेदः क्लेदः सूतिः कोथः सदनं मूर्च्छनं मदः। कटुकाम्लो रसो वर्णः पाण्डुरारुणवर्जितः ॥ ५२ ॥

पित्तदोष के कर्म—दाह, लालिमा, उष्णता का अनुभव, पकना या पकाना, स्वेद (पसीना), क्लेद (सड़न), स्राव, कोथ (दुर्गन्धित सड़न), सदन (अवसाद), मूर्च्छा, मद (नशा की स्थिति), मुख में कटु तथा अम्ल रस का अनुभव होना तथा पित्तदोष से युक्त स्थान का वर्ण पाण्डु तथा अरुण से रहित अतएव अन्य वर्णों वाला होना—ये लक्षण होते हैं ॥ ५१-५२ ॥

श्लेष्मणः स्नेहकाठिन्यकण्डूशीतत्वगौरवम्। बन्धोपलेपस्तैमित्यशोफापकल्पतिनिद्रताः ॥ ५३ ॥

वर्णः श्वेतो रसो स्वादुलवणो चिरकारिता।

कफदोष के कर्म—स्निग्धता (चिकनापन), कठोरता, खजुली का होना, हाथ-पैरों में शीत का अनुभव होना, भारीपन, बन्ध (स्रोतों में हकावट), उपलेप (जीभ के ऊपर मैल की पत का जमनः),

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१७९

चिपचिपाहट्, सूजन, पाक का न होना, नींद का अधिक आना (यही कारण है कि कफप्रकृति के प्राणी अधिक मोते हैं; जैसे—भैंस), वर्ण सफेद, रस मधुर एवं नमकीन और किसी भी कार्य को देर से करना ॥५३॥

इत्यशेषामयव्यापि यदुक्तं दोषलक्षणम् ॥५४॥

दर्शनाचैरवहितस्तत्सम्भूगुपलक्षयेत् । व्याध्यवस्थाविभागजः पश्यन्त्रार्तन् प्रतिक्षणम् ॥५५॥

दोषलक्षण निर्वाचन का हेतु—यहाँ तक बात-पित्त-कफदोषों के लक्षण कहे गये हैं, जो उन-उन के सभी रोगों में पाये जाते हैं। शास्त्रनिर्देशानुसार रोगों की अवस्था के विभागों (भेदों) को जानने वाला चिकित्सक प्रतिक्षण देखता हुआ सावधान होकर उक्त दोषों का परीक्षण—दर्शन, स्पर्शन आदि विधियों से रोगी के शरीर में करे ॥५४-५५॥

अभ्यासात्प्राप्यते दृष्टिः कर्मसिद्धिप्रकाशिनी । रत्नाविदसदस्ज्जनं न शास्त्रादेव जायते ॥५६॥

चिकित्सा में अभ्यास का महत्त्व—चिकित्साविधि को तथा बात आदि दोषों के लक्षणों को बार-बार ध्यानपूर्वक देखने से चिकित्सा में सफलता दिलाने वाली दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। इसी दृष्टि से कर्म (चिकित्सा) में सिद्धि मिलती है। यह वह दृष्टि है जिससे जीहरी देखते ही पहचान लेता है कि यह रत्न ठीक है या दोषयुक्त। यह ज्ञान केवल शास्त्र के अध्ययन से प्राप्त नहीं होता ॥५६॥

वक्तव्य—शास्त्रकार का यह पारम्परिक निर्देश चिकित्सक होने की इच्छा वाले व्यक्ति के लिए कहा गया है। महर्षि सुश्रुत का भी यही मत है—‘अधिगत’ ‘प्रवेष्टव्या’। (सु.सू. १०।३) अर्थात् बार-बार शास्त्रों तथा चिकित्सा-कर्मों का अभ्यास करने के बाद ही चिकित्सक को विशिखा (कर्मभूमि) में प्रवेश करना चाहिए। और भी देखें—‘उभयजो हि भिषग् राजाहं भवति’। (सु.सू. ३।४७) तथा ‘यस्तुभयजो मतिमान् स समर्थोऽर्थसाधने। आहवे कर्म निर्वाह् द्विचक्रः स्यन्दनो यथा’ ॥ (सु.सू. ३।५३) दोनों ही उद्धरणों के अर्थ स्पष्ट हैं। वे सभी लक्षण सुव्यय चिकित्सक के हैं।

दृष्टापचारजः कश्चित्कश्चिस्तूषपिपराधजः । तत्सङ्ग्राहवत्यन्तो व्याधिरिव त्रिधा स्मृतः ॥५७॥

रोगों के तीन भेद—रोगों के भेदों की चर्चा प्रस्तुत है—१. जो देखकर मिथ्या आहार-विहार के सेवन करने से होता है, वह प्रथम, २. जो पूर्वजन्म के अपराधों से होता है, वह दूसरा और ३. जो उक्त दोनों कारणों के संयोग से होता है, वह तीसरा भेद है ॥५७॥

यथानिदानं दोषोत्पत्तः कर्मजो हेतुभिर्विना । महारम्भोऽल्पके हेतावातङ्गो दोषकर्मजः ॥५८॥

रोगों का परिचय—प्रथम प्रकार के रोग को ‘दोषोत्पत्त’ (बात आदि दोषों से उत्पन्न) कहते हैं। यह रोग अपने निदान के अनुसार होता है। दूसरे प्रकार का रोग ‘कर्मज’ होता है। इसमें दोषज रोग की भांति कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता। तीसरे प्रकार के रोग का नाम है—‘कर्मदोषज’। यह रोग थोड़ा-सा भी कारण होने पर बहुत कष्टदायक होता है ॥५८॥

विपक्षशीलनात्पूर्वः कर्मजः कर्मसङ्ख्यात् । गच्छत्युभयजन्मा तु दोषकर्मक्षयात्म्यम् ॥५९॥

त्रिविध रोग-चिकित्सा—प्रथम ‘दोषोत्पत्त रोग’ विपक्षशीलन से अर्थात् जिन आहार-विहारों का सेवन करने से रोग की उत्पत्ति हुई हो, उनके विपरीत पदार्थों का सेवन करने से तथा तदनुरूप चिकित्सा करने से शान्त हो जाता है। दूसरा ‘कर्मज रोग’ कर्मों के क्षीण हो जाने पर शान्त हो जाता है और तीसरा ‘कर्मदोषज रोग’ दोष तथा कर्म का क्षय होने पर शान्त हो जाता है ॥५९॥

वक्तव्य—शास्त्रानुकूल विधिवत् चिकित्सा करने से भी जो रोगी रोगमूक्त न हो रहा हो, उस समय उक्त दृष्टिकोण को ध्यान में रखना चाहिए और रोगी के परिजनों को भी समझाना चाहिए कि इसके ठीक न होने में यह प्रधान कारण है।

द्विधा स्वपरतन्त्रत्वाद्ब्याधयोऽल्प्याः पुनर्द्विधा ।

१८०

अष्टाङ्गहृदये

रोगों के दो भेद—स्वतन्त्र तथा परतन्त्र भेद से रोग पुनः दो प्रकार के होते हैं। इनमें परतन्त्र रोग भी दो प्रकार के होते हैं।

पूर्वजाः पूर्वरूपाख्या, जाताः पश्चादुपद्रवाः ॥ ६० ॥

रोगभेदों के नाम—परतन्त्र रोग के दो भेद—१. पूर्वज और २. पश्चात्जात। पूर्वरूपों को ही पूर्वज रोग कहते हैं और जो रोग के अन्त में उत्पन्न होते हैं, उन्हें 'उपद्रव' (पश्चात्जात) नाम से कहा जाता है। ॥ ६० ॥

यथास्वजन्मोपशयाः स्वतन्त्राः स्पष्टलक्षणयाः ।

स्वतन्त्र रोग—स्वतन्त्र रोग वे हैं, जो अपने-अपने निदानोक्त कारणों से पैदा होते हैं और तदनुकूल चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार के रोगों के लक्षण भी स्पष्ट होते हैं।

विपरीतास्ततोऽन्ये तु—

परतन्त्र रोग—परतन्त्र रोग स्वतन्त्र कहे जाने वाले रोगों से विपरीत होते हैं।

—विद्यादेवं मलानपि ॥ ६१ ॥

मलों का विचार—इसी प्रकार प्रत्येक रोग में विकारों को पैदा करने वाले मलों (दोषों) को भी समझ लेना चाहिए ॥ ६१ ॥

तांलक्षयेदबहिर्तो विकुर्वाणान् प्रतिज्वरम् ।

दोषों का विचार—इसी प्रकार दोषों का भी स्वतन्त्र-परतन्त्र भेद से 'प्रतिज्वरम्' अर्थात् प्रत्येक रोग में सावधानी से विचार करने का प्रयत्न करना चाहिए।

बक्तव्य—जिसे महर्षि वामभट ने स्वतन्त्र तथा परतन्त्र की संज्ञा दे रखी है, उसे भगवान् पुनर्वसु ने च.वि. ६।११ में अनुबन्ध (प्रधान) तथा परतन्त्र रोग को अनुबन्ध (अप्रधान) कहा है। देखा जाता है कि कहीं कोई दोष प्रधान होता है और दूसरा अप्रधान। यह रोग की प्रकृति के अनुसार सर्वत्र होता रहता है। यथा—'न रोगोऽप्येकदोषजः'।

तेषां प्रधानप्रशमे प्रशमोऽशाम्यतस्तथा ॥ ६२ ॥

पश्चाच्चिकित्सेतूर्णं वा बलबन्तमुपद्रवम् ।

चिकित्सा-सूत्र—इनमें प्रधान दोष अथवा प्रधान रोग की शान्ति हो जाने पर अप्रधान (गौण) की शान्ति स्वयं ही हो जाती है। यदि किसी कारण दोष या रोग की शान्ति न हुई हो तो उसकी शीघ्र चिकित्सा करे अथवा कोई बलवान् उपद्रव (रोगोत्तरकालीन रोग) की भी चिकित्सा करे ॥ ६२ ॥

व्याधिकिल्पशरीरस्य पीडाकरतरो हि सः ॥ ६३ ॥

उपद्रवचिकित्सा-निर्देश—प्रधान रोग के अन्त में जो रोग उत्पन्न होता है, उसे 'उपद्रव' कहते हैं। यह 'उपद्रव' प्रधान रोग से पीड़ित हुए शरीर वाले रोगी को और भी अधिक पीड़ित कर देता है ॥ ६३ ॥

बक्तव्य—उपद्रवों एवं उपसर्गों के परिचय के लिए देखें—च.चि. २१।४० तथा सु.सू. ३५।१८।

विकारनामाकुशलो न जिह्वीयात् कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥

रोगनामनिर्धारण-विचार—वर्तमान रोग को किस नाम से कहा जाय, इस विषय में अनजान चिकित्सक को लज्जित नहीं होना चाहिए। क्योंकि सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना तत्त्वकार के लिए सम्भव नहीं है ॥ ६४ ॥

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१८१

बक्तव्य—ऐसे अवसरों पर त्रिदोष-सिद्धान्त को आधार मानकर चिकित्सा करनी चाहिए।

स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः। स्थानान्तराणि च प्राप्य विकारान् कुरुते बहुम् ॥ ६५ ॥

दोषों का रोगकर्तृत्व—वही दोष ( वात आदि में से कोई एक ) निदान ( कारण ) भेद से तथा शरीर के अलग-अलग अवयवों में आश्रित होकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है ॥ ६५ ॥

तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च। बुद्ध्वा हेतुविशेषांश्च शीघ्रं कुर्यादुपक्रमम् ॥ ६६ ॥

चिकित्साविधि-निर्देश—इसलिए रोग की प्रकृति ( वात आदि मूल कारण ), स्थान-विशेषों तथा विशेष कारणों ( आहार-विहार ) आदि को भलीभाँति समझकर तदनुसार शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिए ॥ ६६ ॥

बक्तव्य—यहाँ दिये गये ६४ से ६६ तक के ये तीन पद्य अविकलरूप से च.सू. १८।४४-४६ से लिये गये हैं। इसके आगे ४७वें श्लोक में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है—जो चिकित्सक रोग के मूल कारणों को समझकर बुद्धिपूर्वक तथा शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट विधि से चिकित्सा करता है, वह कभी असफल नहीं होता है। वास्तव में इन निर्देशों का स्मरण चिकित्साकाल में अवश्य कर लेना चाहिए। 'विकारनामाऽकुशलो' ( ऊपर श्लोक ६४ ) का युक्तिसंगत समाधान करते हुए भगवान् पुनर्वसु कहते हैं—'तत्र व्याधयोऽपरिसङ्क्षेया भवन्ति, अतिबहुलात्; दोषास्तु खलु परिसङ्क्षेया भवन्ति, अनतिबहुलात्'। ( च.वि. ६।५ ) अतएव सभी रोगों का नाम-निर्धारण करना सम्भव नहीं है। अतः दोषानुसार तथा लक्षणानुसार चिकित्सा करने से अवश्य स्वास्थ्यलाभ होता है।

दूष्यं देशं बलं कालमनलं प्रकृतिं वयः। सत्त्वं सात्त्व्यं तथाऽऽहारमवस्थाश्च पृथग्विद्याः ॥ ६७ ॥

सूक्ष्मसूक्ष्माः समीक्ष्यैषां दोषौषधनिरूपणे। यो वर्तते चिकित्सायां न स स्वस्वति जातुचित् ॥

दूष्य आदि ज्ञान-निर्देश—जो चिकित्सक रस-रक्त आदि धातुओं तथा मल-मूत्र आदि दूष्यों, अनूप, जांगल आदि देशों और आमाशय, पक्वाशय आदि शरीर सम्बन्धी देशों, रोगबल तथा रोगी का बल, शीत, उष्ण आदि काल, लंघन, बमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण आदि का काल, मन्द, तीक्ष्ण, विषम आदि अनल ( अग्नि ) की स्थिति, वात आदि प्रकृति, बाल, यौवन आदि वयस, सत्त्व ( मनसु ), सात्त्व्य ( अनुकूलता ) तथा आहार और अनेक प्रकार की सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवस्थाओं का समुचित विचार कर दोषों के अनुसार औषध का प्रयोग करता है, वह चिकित्सक कभी भी चिकित्सा-कार्य में चूकता नहीं है ॥ ६७-६८ ॥

गुर्वल्पव्याधिसंस्थानं सत्त्वेहेबलाबलात्। दृश्यतेऽप्यन्यथाकारं तस्मिन्नभवितो भवेत् ॥ ६९ ॥

रोग की गुरुता-लघुता का विचार—कभी-कभी रोगी के सत्त्व ( मनसु ) तथा शरीर के सबल अथवा निर्बल होने के कारण गुरु अथवा लघु रोग के लक्षण विपरीत ( उल्टे-पुल्टे ) दिखलायी पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सक को सावधान रहना चाहिए ॥ ६९ ॥

गुरुं लघुमिति व्याधिं कल्पयन्तु भिषग्बुवः। अल्पदोषाकलनया पथ्ये विप्रतिपद्यते ॥ ७० ॥

भिषग्बुव की निन्दा—भिषग्बुव ( जो भिषक् न होते हुए भी अपने को भिषक् कहा करता है, वह चिकित्सक ) गुरु रोग को लघु समझकर अर्थात् इसमें अधिक दोष नहीं है, अतः वह चिकित्सा करते समय भूल कर बैठता है ॥ ७० ॥

बक्तव्य—उक्त ६९ तथा ७० श्लोकों के विषय को समझने के लिए आप च.वि. ७।५-७ पद्यों का आशय समझने का प्रयत्न करें। वहाँ यह स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उक्त प्रकार की भूल मूर्ख चिकित्सक ही कर सकता है, न कि विद्वान् चिकित्सक।

ततोऽल्पमल्पवीर्यं वा गुरुव्याघौ प्रयोजितम्। उदीर्येतत्रां रोगान् संशोधनमयोगतः ॥ ७१ ॥

शोधनं त्वतियोगेन विपरीतं विपर्यये। क्षिणुयान्न मलानेव केवलं वपुरस्यति ॥ ७२ ॥

१८९

अष्टाङ्गहृदये

भूल का दुष्परिणाम —उक्त चिकित्सकीय प्रमाद से गुरु (महान्) रोग में थोड़ी मात्रा में अथवा अल्पशक्तिशाली दी गयी संशोधन औषधि पूर्णरूप से संशोधन नहीं करा सकती अथवा अल्पमात्रा में संशोधन करने के कारण रोग को और अधिक बढ़ा देती है। इसके विपरीत लघु लक्षणों वाले रोग में अधिक मात्रा में उग्र बीर्य वाली संशोधन (वमन-विरचनकारक) औषधि का प्रयोग करा देने के कारण उसका अतियोग हो जाता है। इससे न केवल कफ एवं पुरीष आदि मलों का ही क्षय नहीं होता, अपितु ये औषधियाँ रोगों के शरीर को भी क्षीण कर देती हैं ॥७१-७२॥

अतोऽभियुक्तः सततं सर्वमालोच्य सर्वथा । तथा युञ्जीत भैषज्यमारोग्याय यथा ध्रुवम् ॥७३॥

चिकित्सक का कर्तव्य —अतः चिकित्सा-कर्म में लगे हुए चिकित्सक को चाहिए कि वह पूर्वापर (आगे-पीछे) का भलीभाँति विचार कर औषध (विशेषकर संशोधन औषध) का प्रयोग उस प्रकार करें, जिससे औषधप्रयोग लाभदायक हो ॥७३॥

वक्तव्य —इस विषय पर चरक के विचार इस प्रकार हैं—‘ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽविशति योगिवत्। आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगान् चिकित्सति’ ॥ (च.वि. ४।१२) अर्थात् जो चिकित्सक अपने शास्त्रीय ज्ञान से प्रज्वलित बुद्धि रूपी दीपक को लेकर योगी की भाँति रोगी के अन्तरात्मा में प्रवेश नहीं कर जाता वह रोगी के रोगों की चिकित्सा नहीं कर सकता। यह सत्य है।

वक्ष्यन्तेऽतःपरं दोषा बुद्धिभयविभेदतः ।

दोषभेदों का वर्णन —अब इसके आगे बात आदि दोषों के वृद्धि तथा क्षय भेदों का सहारा लेकर वर्णन किया जायेगा।

पृथक् त्रीन् विद्धि—

दोषवृद्धि के तीन भेद —१. वातवृद्ध, २. पित्तवृद्ध तथा ३. कफवृद्ध।

—संसर्गस्त्रिधा, तत्र तु तात्रव ॥७४॥

संसर्ग के तीन भेद —१. वातपित्तवृद्ध, २. वातकफवृद्ध तथा ३. पित्तकफवृद्ध। इस प्रकार संसर्ग के तीन भेद कहे गये हैं। इस संसर्ग में नौ दोषभेदों को अपने प्रमाण से अधिक समझें ॥७४॥

त्रोनेव समया वृद्ध्या षडेकस्यातिशायने ।

संसर्ग के छः भेद —एक दोष की अधिक वृद्धि के छः भेद—१. वातवृद्ध पित्तवृद्धतर, २. पित्तवृद्ध वातवृद्धतर, ३. वातवृद्ध कफवृद्धतर, ४. कफवृद्ध वातवृद्धतर, ५. पित्तवृद्ध कफवृद्धतर, ६. कफवृद्ध पित्तवृद्धतर। उक्त संसर्ग ३ तथा ६ भेदों को मिला देने से ये ९ भेद हो जाते हैं।

त्रयोदश समस्तेषु—

समस्त दोषवृद्धि के १३ भेद —इनके भेदों में दो-दो दोषों की वृद्धि तथा १-१ की अतिवृद्धि होने पर ६ भेद, तुल्यवृद्धि तथा तर-तम भेद से ६ और १ भेद के जोड़ने से ये १३ भेद होते हैं, जिन्हें आगे कहा जायेगा। उनका क्रम यह है।

—षड् दृष्टेकातिशयेन तु ॥७५॥

१३ भेदों के उदाहरण —इस दृष्टि से दो दोषों के अतिशय से तीन भेद और एक दोष के अतिशय से भी तीन भेद होते हैं, इस प्रकार ६ भेद हुए—१. कफवृद्ध, वात-पित्त अधिक वृद्ध; २. पित्तवृद्ध, वात-कफ अधिक वृद्ध; ३. वातवृद्ध, पित्त-कफ अधिक वृद्ध; ४. पित्त-कफवृद्ध, वात अधिक वृद्ध; ५. वात-कफवृद्ध, पित्त अधिक वृद्ध; ६. वात-पित्तवृद्ध, कफ अधिक वृद्ध ॥७५॥

एकं तुल्याधिकेः—

दोषभेदीयाध्यायः १२ ]

सूत्रस्थानम्

१८३

एक भेद का निर्देश—१. वातवृद्ध, पित्तवृद्ध, कफवृद्ध।

वक्तव्य—उक्त तरह भेद सन्निपातज विकारों में देखे जाते हैं।

—षट् च तारतम्यविकल्पनात्।

पुनः छः भेद—दोषों के तर-तम भेदों के विकल्प से पुनः छः भेद होते हैं। यथा—१. वातवृद्ध, पित्तवृद्धतर, कफवृद्धतम। २. वातवृद्ध, कफवृद्धतर, पित्तवृद्धतम। ३. पित्तवृद्ध, कफवृद्धतर, वातवृद्धतम। ४. पित्तवृद्ध, वातवृद्धतर, कफवृद्धतम। ५. कफवृद्ध, वातवृद्धतर, पित्तवृद्धतम। ६. कफवृद्ध, पित्तवृद्धतर, वातवृद्धतम।

पञ्चविंशतिमित्येवं वृद्धैः—

वृद्धदोषों का योग—इस प्रकार ऊपर कही गयी विधि से वृद्ध ( बढे हुए ) दोषभेदों की २५ संख्या होती है।

—क्षीणैश्च तावतः ॥ ७६ ॥

क्षीणदोषों का योग—इस प्रकार ऊपर कही गयी विधि से क्षीण ( घटे हुए ) दोषभेदों की संख्या भी २५ होती है ॥ ७६ ॥

वक्तव्य—ऊपर दिये गये दोषभेदों में 'वृद्ध' शब्द के स्थान पर 'क्षीण' शब्द को जोड़ देने से आप स्वयं क्षीण दोषभेदों का आकलन कर लेंगे। अतः ग्रन्थवृद्धि के भय से यहाँ क्षीण भेदों को नहीं दिया गया। इस प्रकार यहाँ तक कुल मिलाकर ५० दोषभेदों का वर्णन कर दिया गया है।

एकैकवृद्धिसमताक्षयैः षट् ते—

वृद्धि-सम-क्षयभेद से छः—एक-एक दोषों के वृद्धि, सम तथा क्षय भेद से निम्नलिखित ६ भेद होते हैं। यथा—१. वातवृद्ध, पित्तसम, कफक्षीण; २. पित्तवृद्ध, वातसम, कफक्षीण; ३. कफवृद्ध, पित्तसम, वातक्षीण; ४. कफवृद्ध, वातसम, पित्तक्षीण; ५. वातवृद्ध, कफसम, पित्तक्षीण; ६. पित्तवृद्ध, कफसम, वातक्षीण।

—पुनश्च षट्। एकक्षयद्वन्द्ववृद्ध्या सविपर्ययाऽपि ते ॥ ७७ ॥

क्षय-वृद्धिभेद से पुनः छः भेद—एक दोष का क्षय तथा दो दोषों की वृद्धि जहाँ विपर्यय गति से देखी जाती है, वहाँ ये छः भेद इस प्रकार होते हैं—१. वातक्षीण, पित्त-कफवृद्ध; २. पित्तक्षीण, वात-कफवृद्ध; ३. कफक्षीण, वात-पित्तवृद्ध। १. वात-पित्तक्षीण, कफवृद्ध; २. वात-कफक्षीण, पित्तवृद्ध; ३. पित्त-कफक्षीण, वातवृद्ध ॥ ७७ ॥

भेदा द्विषष्टिर्निर्दिष्टाः—

बासठ दोषभेद—यहाँ तक ५० + ६ + ६ = ६२ भेदों की उक्त प्रकार से गणना कर दी गयी है।

—त्रिषष्ठः स्वास्थ्यकारणम्।

तिरसठबाँ भेद—तिरसठबाँ भेद स्वास्थ्य का कारण माना गया है। वह इस प्रकार है—वातपित्त-कफसम।

वक्तव्य—यहाँ तक जो दोषभेद गिनाये गये हैं, उनमें ६२ भेद तो वे हैं जो रोगों की उत्पत्ति के कारण होते हैं और ६३वाँ भेद वह है, जो मानव को नीरोग अथवा स्वस्थ बनाये रखने में कारण होता है। यहाँ कुल मिलाकर दो प्रकार के दोषभेद कहे गये हैं—विषम दोषभेद ६२ और सम दोषभेद १; इस प्रकार इनकी संख्या ६३ होती है। अर्थात् आयुर्वेदशास्त्र का मूल उद्देश्य है—'धातुसाम्य्यक्रिया चोक्ता तत्रत्यास्य प्रयोजनम्'। वात आदि दोषों को समान स्थिति में बनाये रखना। इसी को प्रकारान्तर से इस प्रकार कहा

१८४

अष्टाङ्गहृदये

गया है—‘समदोषः समाश्रिश्च समधातुमलङ्क्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते’ ॥ अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान १।२० में कहा गया है—‘रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता’ । दोषभेदों का वर्णन देखें—च.सू. १७४१ से ४४ तक ।

संसारग्राहसहधिरादिभित्तयेषां दोषांस्तु क्षयसमताविवृद्धिभेदैः । आनन्त्यं तरतमयोगतश्च यातान् जानीयादवहितमानसो यथास्वम् ॥ ७८ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने दोषभेदीयो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥


दोषों के अनन्त भेद—उपर्युक्त दोषभेदों का रस-रक्त आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों के साथ संसर्ग हो जाने से और उनके क्षय, समता एवं वृद्धि के भेदों से, तर-तम के संयोगों से उत्क्त वात आदि दोषों के असंख्य भेद हो सकते हैं। चिकित्सक का कर्तव्य है कि उन भेदों-उपभेदों को भी सावधान होकर ठीक प्रकार से समझने का प्रयत्न करे ॥ ७८ ॥

वक्तव्य—यहाँ जिस प्रकार दोषों के भेदों की चर्चा की गयी है, इसी प्रकार अष्टांगहृदय-सूत्रस्थान के १०वें अध्याय में मधुर आदि रसों के विविध संयोगों की चर्चा की गयी है। उसे भी चिकित्सा की दृष्टि से देखें। रसभेदों की संख्या भी इसी प्रकार अनगिनत हो सकती है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में दोषभेदीय नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १२ ॥


त्रयोदशोऽध्यायः

अथातो दोषोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।

अब यहाँ से हम दोषोपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।

उपक्रम—उपक्रमण का अर्थ है—चिकित्सा। इसके पहले अध्याय में विकारयुक्त अर्थात् घटे-बढ़े हुए वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों की शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिए, कहा गया है। अतः उनकी चिकित्सा करने के दृष्टिकोण से प्रस्तुत अध्याय का यहाँ उपक्रम किया जा रहा है। अथवा उक्त विषय को हम इस प्रकार भी कह सकते हैं—लक्षणस्कन्ध का वर्णन करने के बाद अब यह औषधस्कन्ध प्रस्तुत है।

संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.चि. ३०; सु.उ. ६४ तथा अ.सं.सू. २१ एवं २३ में देखें।

वातस्योपक्रमः स्नेहः स्वेदः संशोधनं मृदु। स्वादुमूललवणोष्णानि भोज्यान्मध्यङ्गमर्दनम् ॥ १ ॥

वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यं पैंष्टिकगौडिकम्। स्निग्धोष्णा बस्तयो बस्तिनियमः सुखशीलता ॥ २ ॥

दीपनैः पाचनैः सिद्धाः स्नेहाश्रानेकयोनयः। विशेषान्मेद्यपिशिरसतैलानुवासनम् ॥ ३ ॥

वातदोष-चिकित्सा—स्नेह-प्रयोग (पान), स्वेदन (पसीना लाने के उपाय), हलका संशोधन (वमन, विरेचन आदि), मधुर, अम्ल, लवण रस तथा उष्ण भोजनों का प्रयोग, अभ्यंग (उबटन), मर्दन (मूट्टी, चम्पी, दबाना आदि), वेष्टन (पट्टी आदि से बाँधना), त्रासन (डराना-धमकाना), संक, मद्य का सेवन, उसमें भी पीठी और गुड़ से निर्मित मद्य का सेवन, स्निग्ध तथा उष्ण बस्तियों का नियमानुसार सेवन करना, सुखपूर्वक समय बिताना (व्यर्थ की दौड़-धूप से वातदोष बढ़ जाता है, अतः आराम करना), अग्निवर्धक तथा पाचनकारक द्रव्यों द्वारा तैयार किये गये अनेक प्रकार के स्नेहों का सेवन करना, विशेष रूप से सूअर, भैंसा आदि मेदस्वी प्राणियों के मांस तथा मांसरस का सेवन अथवा वातहर तैलों (नारायण तैल, एरण्ड तैल आदि) की अनुवासन बस्ति का प्रयोग करें ॥ १-३ ॥

पित्तस्य सर्पिषः पानं स्वादुशीतैर्विरेचनम्। स्वादुतिक्तकषायणि भोजनान्मौषधानि च ॥ ४ ॥

सुगन्धिशीतहृद्यानां गन्धानामुपसेवनम्। कण्ठे गुणानां हाराणां मणीनामुरसा धृतिः ॥ ५ ॥

कपूरचन्दनोशीरैरनुलेपः क्षणे क्षणे। प्रदोषश्चन्द्रमाः सौधं हारि गीतं हिमोऽनिलः ॥ ६ ॥

अयन्त्रणसुखं मित्रं पुत्रः सन्दिग्धमृधवाक्। छन्दानुवर्तिनो दाराः प्रियाः शीलविभूषिताः ॥ ७ ॥

शीताम्बुधारगर्भाणि गृहाण्युद्यानदीर्घिकाः। सुतीर्थविपुलस्वच्छसलिलाशयसेकते ॥ ८ ॥

साम्भोजजलतीरान्ते कायमाने द्रुमाकुले। सौम्या भावाः पयः सर्पिविरेकश्च विशेषतः ॥ ९ ॥

पित्तदोष-चिकित्सा—घृतपान, मधुर तथा शीतवीर्य द्रव्यों द्वारा विरेचन कराना, मधुर, तिक्त तथा कषाय रस-प्रधान भोजनों एवं औषधों का प्रयोग, सुगन्धित, शीतल तथा हृदय को प्रिय लगने वाले गन्धों का समीप से सेवन करना, गले में कण्ठियों, हारों तथा मणियों को (हृदय में) धारण करें। कपूर, चन्दन, खस का बार-बार अनुलेप लगायें। वास्तव में ये लेप सूख जाने पर कष्टकारक होते हैं, अतः सूखे हुए लेप को हटाकर तब ताजा लेप उन-उन अवयवों पर लगायें। प्रदोष (सायंकाल) का समय, चन्द्रमा, सौध (चूना पुता हुआ भवन—यह कुछ दिन शीतल रहता है) में निवास, मनोहर गीत, शीतल वायु, अयन्त्रणसुखमित्र

१८६

अष्टाङ्गहृदये

(ऐसा मित्र जो मनचाहा सुख दे सके), मधुर तथा तोतली बोली बोलने वाला पुत्र, मन के अनुरूप व्यवहार करने वाली, प्रिय, सुशील तथा सुशोभित स्त्रियाँ, शीतल जल की धाराओं वाले फुहारों से युक्त घर, बगीचे, बावड़ियाँ, सुन्दर घाट वाले, विस्तृत, साफ-सुथरे जल वाले जलाशय के समीप बालू से बने हुए ऊँचे स्थान पर बैठना, खिले हुए कमलों से युक्त तालाब के तट पर जहाँ घास-फूस का घर बनाया गया हो और जो चारों ओर हरे-भरे पेड़ों से घिरा हुआ हो ऐसे स्थानों पर निवास करना, सभी मन को प्रसन्न करने वाले भावों (रहन-सहन की व्यवस्था) से युक्त स्थान पर विहार करना; विशेष करके दूध तथा ची का सेवन करना और विरेचन करना—ये पित्तदोष की चिकित्सा है ॥ ४-१ ॥

वक्तव्य —अयन्त्रणसुखं मित्रम्—मित्र का पास में रहना सुखद होता है और उसकी बात को मानना यन्त्रणा जैसा कष्ट नहीं देती। कायमानम्—अन्यत्र इसका अर्थ है—शरीर के बराबर और यहाँ 'तृणादिरचिता-गारम्'। प्रदोषः—यह समय चन्द्रमा के न रहने पर भी सुखद एवं शीतल होता है।

॥लेख्मणो विधिना युक्तं तीक्ष्णं वमनरेचनम्। अत्रं हृक्षालपतीक्ष्णोष्णं कटुतिक्तकपायकम् ॥ १० ॥

दीर्घकालस्थितं मद्यं रतिप्रोतिः प्रजागरः। अनेकरूपो व्यायामश्चिन्ता रूक्षं विमर्दनम् ॥ ११ ॥

विशेषाद्भ्रमनं यूषः शोर्डं मेदोन्मसोपधम्। धूमोपवासगण्डूषा निःसुखत्वं सुखाय च ॥ १२ ॥

कफदोष-चिकित्सा —इसमें विधिपूर्वक तीक्ष्ण वमन तथा विरेचन का प्रयोग करें। आहार—रूक्ष, मात्रा में थोड़ा, तीक्ष्ण (मरिच आदि द्रव्य), उष्णवीर्य वाले पदार्थ; कटु, तिक्त, कपाय रस से युक्त पदार्थों का सेवन करें; पुराना मद्य, स्त्री-सहवास में प्रीति, रात में अधिक जागना, विविध प्रकार का व्यायाम (परिश्रम वाले कार्य), चिन्तन (फिकर) करना, रूक्ष पदार्थों (सोठ आदि) को शरीर पर मलना, विशेष करके इसमें वमन कराना, दालों का यूष (रस), मधु, मेदोनाशक चिकित्सा, धूमपान, उपवास, गण्डूष धारण करना तथा सुखसाधनों का त्याग करना—ये सब सुखद होते हैं ॥ १०-१२ ॥

वक्तव्य —महर्षि वाग्भट के उक्त विवेचन का मूल आधार च.सू. २०।१२ से १९ तक है, इन्हें देखें। विशेष रूप से वातज विकारों में बस्तिप्रयोग, पित्तज विकारों में विरेचन और कफज विकारों में वमन-प्रयोग चिकित्सा के मूल आधार हैं। 'उपक्रम' का अर्थ है—चिकित्सा। देखें—मैदनी-कोष।

उपक्रमः पुण्यदोषान् योऽयमुद्दिश्य कीर्तितः। संसर्गसन्निपातेषु तं यथास्वं विकल्पयेत् ॥ १३ ॥

विषयोपसंहार —यहाँ जो यह वात आदि दोषों की चिकित्सा का निर्देश किया गया है, इसे संसर्गज (ब्रह्मज) रोगों तथा सन्निपातज रोगों में दोषानुसार देखकर प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥

ग्रीष्मः प्रायो महत्पित्ते वासन्तः कफमाष्टते। महतो योगवाहिल्वातु, कफपित्ते तु शारदः ॥ १४ ॥

चिकित्सा-निर्देश —वातज एवं पित्तज रोगों में प्रायः ग्रीष्म-ऋतुचर्या में कहे गये आहार-विहारों का सेवन, कफज तथा वातज रोगों में वसन्त-ऋतुचर्या का सेवन करें। क्योंकि वात या वायु योगवाही होता है अर्थात् वह उष्णकाल में उष्ण और शीतकाल में शीत हो जाता है। कफज और पित्तज रोगों में शरद-ऋतुचर्या में कहे गये पदार्थों का सेवन करें ॥ १४ ॥

चय एव जयेदोषं कुपितं त्वविरोधयन्। सर्वकोपे बल्योपासं शेषदोषाविरोधतः ॥ १५ ॥

चिकित्सा का समय —जब दोषों का संचय होता है, उसी समय उनको शान्त कर देना चाहिए। यदि उस समय कोई दोष कुपित हुआ हो तो संचित दोष को शान्त करते समय उसके साथ विरोध न करते हुए कुपित दोष की भी चिकित्सा कर लेनी चाहिए। यदि सब दोष कुपित हुए हों तो उनमें जो बलवान् दोष हो उसकी पहले शान्त करनी चाहिए, किन्तु ध्यान रहे कि शेष दोषों के साथ उस चिकित्साक्रम का विरोध नहीं होना चाहिए ॥ १५ ॥

प्रयोगः शमयेद्वचाधिमेकं योऽन्यमुदीरयेत्। नाऽसौ विशुद्धः शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत् ॥ १६ ॥

दोषोपक्रमणीयाध्यायः १३ ]

सूत्रस्थानम्

१८७

शुद्ध प्रयोग का परिचय—जो औषध-प्रयोग (चिकित्सा) एक रोग अथवा एक दोष को शान्त करता है और दूसरे रोग या दोष को उन्माड देता है, वह प्रयोग विशुद्ध (उत्तम) नहीं कहा जा सकता है। शुद्ध प्रयोग तो वह है जो एक रोग या दोष को शान्त तो कर दे, किन्तु दूसरे रोग को न उन्माडे ॥ १६ ॥

बक्तव्य—इस दृष्टि से प्रचलित चिकित्सा-पद्धतियों की ओर देखिये, क्या इतना उदार सिद्धान्त किसी अन्य पद्धति का है? आयुर्वेद के अतिरिक्त अन्य पद्धतियों तो रोग के तात्कालिक लाभ तक ही मात्र अपना कर्तव्य समझती हैं, अस्तु।

व्यायामादूषणस्तैक्षण्यादहिताचरणादपि। कोष्ठाच्छाखास्थिमर्माणि द्रुतत्वान्मास्तस्य च ॥ दोषा यान्ति—

दोषों का स्थानान्तर गमन—व्यायाम अथवा शारीरिक श्रम करने से, जठराग्नि की तीक्ष्णता से, अहित-कर आहार-विहार करने से तथा वातदोष के शीघ्रगामी होने से उक्त वात आदि दोष कोष्ठ (नामक आभ्यन्तर रोगमार्ग में) से शाखा (नामक बाह्य रोगमार्ग) में अथवा अस्थि (मध्यम रोगमार्ग) में पहुँच जाते हैं ॥ १७ ॥

—तथा तैश्चः स्रोतोमुखविशोधनात्। वृद्ध्याऽभिष्यन्दान्त्याकात्कोष्ठं बायोश्च निग्रहात् ॥ १८ ॥

दोषों का कोष्ठगमन—और स्रोतों के मुखों की शुद्धि हो जाने से, उनकी वृद्धि होने से, अभिष्यन्द होने से, पाक होने से अथवा वातदोष के निग्रह (अवरोध) से बाह्य तथा मध्यम रोगमार्ग से कोष्ठ की परिधि में दोष पहुँच जाते हैं ॥ १८ ॥

तत्रस्थाश्च विलम्बेन् भूयो हेतुप्रतीक्षिणः।

पुनः रोगोत्पादन—जब तक दोष कोष्ठप्रदेश में रहते हैं कोई रोग-विशेष को उत्पन्न नहीं करते, किन्तु वे पुनः विकारोत्पादक हेतुओं (निदानों) की प्रतीक्षा करते रहते हैं। अपने अनुरूप कारणों को पाकर वे रोगोत्पत्ति कर देते हैं।

ते कालादिबलं लब्ध्वा कुष्यन्त्याश्रयेष्वपि ॥ १९ ॥

अन्य स्थानों में दोषप्रकोप—वे वात आदि दोष काल, देश, अपथ्य आहार-विहार द्वारा बल (शक्ति) पाकर अतएव प्रबल होकर दूसरे-दूसरे दोषों के आशयों में जाकर भी कुपित होकर रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ १९ ॥

तत्रान्यस्थानसंस्थेषु तदीयामबलेषु तु। कुर्याच्चिकित्साम्—

चिकित्सा-निर्देश—इस स्थिति में यदि दूसरे दोष के आशय में स्थित दोष यदि दुर्बल हो तो उस स्थान में स्थित दोष सम्बन्धी चिकित्सा करनी चाहिए। यदि दोष बलवान् हो तो पहले उसी दोष की चिकित्सा करनी चाहिए।

—स्वामेव बलेनान्याभिभाषिषु ॥ २० ॥

आगन्तु शमयेद्वोषं स्थानिनं प्रतिकृत्य वा।

यदि वह दोष अपनी शक्ति से निर्दिष्ट स्थान (आशय) वाले दोष को दबाकर स्थित हो तो उस (बलवान्) दोष की चिकित्सा करे। अथवा स्थानीय मूल दोष की चिकित्सा करके तब आगन्तुज (दूसरे स्थान से आये हुए) दोष की चिकित्सा करनी चाहिए ॥ २० ॥

प्रायस्तिर्यगता दोषाः क्लेशयन्त्यातुरांश्चिरम् ॥ २१ ॥

कुर्यान्न तेषु त्वरया देहाग्निबलवित् क्रियाम्।

तिर्यगता दोष-चिकित्सा—प्रायः तिर्यक् (तिरछे अर्थात् मध्यम रोग) मार्गों में गये हुए दोष चिरकाल तक रोगियों को कष्ट देते रहते हैं, अतः शरीरबल एवं अग्निबल को जानने वाला चिकित्सक शीघ्रता से इनकी चिकित्सा न करे अर्थात् धीरे-धीरे इनकी चिकित्सा करे ॥ २१ ॥

१८८

अष्टाङ्गहृदये

शमयेत्तान् प्रयोगेण सुखं वा कोष्ठमानयेत् ॥ २२ ॥

ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नाश्च यथासन्नं विनिर्हरेत्।

चिकित्सा-विधि —तिर्यगत दोषों के लंघन या पाचन आदि विधियों से अथवा स्नेहन तथा स्वेदन विधियों से सरलता से उन दोषों को कोष्ठ की ओर ले आये और जब वे दोष कोष्ठ में आ जाते हैं, तो उन्हें विरेचन विधि से बाहर निकालने का प्रयास करे ॥ २२ ॥

स्रोतोरोधबलघ्रंशगौरवानिलमुद्भताः ॥ २३ ॥

आलस्यापत्तिनिष्ठीवमलसङ्काहचिकलमाः । लिङ्गं मलानां सामानां, निरामाणां विपर्ययः ॥

साम-निराम दोषों के लक्षण —स्रोतों में ह्कावट, शारीरिक बल का क्षीण होना, शरीर में भारीपन, वातदोष का प्रतिलोम होना, आलस्य (शक्ति रहने पर भी काम करने की इच्छा का न होना), भोजन का न पचना, बार-बार थूक का आना, पुरीष आदि मलों के निकलने में ह्कावट, अरुचि और वलम (मुस्ती) —ये लक्षण आमदोषयुक्त वात आदि दोषों के होते हैं और इनके विपरीत लक्षण निरामदोषों के होते हैं ॥ २३-२४ ॥

ऊष्णोऽल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितम्। दुष्टामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते ॥ २५ ॥

आम का वर्णन —ऊष्मा (अग्नि) का बल घट जाने से जिस रसधातु का भलीभाँति पाक नहीं हो पाता और जो आमाशय में वात आदि दोषों से दूषित हो जाता है, उस रस को 'आम' कहते हैं ॥ २५ ॥

वक्तव्य —इस विषय को विस्तृत रूप से समझने के लिए सुश्रुत-उत्तरतन्त्र अध्याय ५६ का सम्पूर्ण अवलोकन करें।

अन्ये दोषेभ्य एवाति दुष्टेभ्योऽन्योऽन्यमूर्च्छनात्। कोद्रवेभ्यो विषस्येव वदन्त्यामस्य सम्भवम् ॥

आम-सम्बन्धी मतान्तर —कुछ आचार्यों का मत है कि अत्यन्त दुष्ट वात आदि दोषों का आपस में मिश्रण होने से उस प्रकार 'आम' की उत्पत्ति हो जाती है, जैसे कोद्रों नामक धान्य में से विष की ॥ २६ ॥

आमेन तेन सम्युक्ता दोषा दूष्याश्च दूषिताः । सामा इत्युपदिश्यन्ते ये च रोगास्तदुद्भवाः ॥ २७ ॥

सामदोष एवं सामरोग —उक्त 'आम' से युक्त वात आदि दोष एवं रस आदि सातों धातु दूषित होने पर 'साम' अर्थात् आमदोषयुक्त कहे जाते हैं। उन दोषों तथा दूष्यों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग भी 'साम' कहे जाते हैं। यथा—आमज्वर, आमातिसार आदि ॥ २७ ॥

सर्वदेहप्रविसृतान् सामान् दोषान् न निर्हरेत्। लीनान् धातुष्वनुकिल्लिष्टान् फलादामाद्व्रसानिव ॥

आश्रयस्य हि नाशाय ते स्युर्दुर्निर्हरत्वतः ।

सामदोषों की चिकित्सा —सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए सामदोषों को निकालने का प्रयत्न न करें, क्योंकि वे दोष रस आदि धातुओं में विलीन (मिले-जुले) रहते हैं और बाहर निकलने के लिए उन्मुख नहीं होते, ऐसी स्थिति में उन्हें न निकाले और वे दोष भी उस प्रकार नहीं निकल पाते, जैसे कच्चे फूल में से रस नहीं निकलता। ऐसी स्थिति में यदि उन दोषों को निकालने का प्रयास किया जायेगा तो वे आश्रय (उस-उस शरीरावयव) के ही विनाशक हो सकते हैं ॥ २८ ॥

पाचनैर्दीपनैः स्नेहेस्तात् स्वेदैश्च परिष्कृतान् ॥ २९ ॥

शोधयेच्छोधनैः काले यथासन्नं यथाबलम्।

दोषनिर्हरण-विधि —अतः उन आमदोषों को निकालने के लिए उन्हें पाचन, दीपन, स्नेहन एवं स्वेदन प्रयोगों के द्वारा परिष्कृत (शोधन योग्य) करके शोधन योग्य काल (ऋतु) में यथासन्न (जिस ओर से आकर दोष हके हों) और यथाबल (रोग तथा रोगी की शक्ति के अनुसार) शोधनविधियों से उनका शोधन करें ॥ २९ ॥

दोषोपक्रमणीयाध्यायः १३ ]

सूत्रस्थानम्

१८९

हन्त्याशु युक्ते वक्त्रेण द्रव्यमाभाशयान्मलां ॥ ३० ॥ प्राणेन चोर्ध्वजन्मृतान् पक्वाधानादुदेन च ।

आसन्न दोष का निर्हरण—इस स्थिति में प्रयोग किया गया शोधनकारक औषधद्रव्य आभाशय में स्थित दोषों ( मलों ) को वमन विधि से मुख द्वारा निकाल देता है। नासिका के छिद्रों द्वारा जन्म के ऊपरी भाग में स्थित विकारों को निकाल देता है। पक्वाशयगत मलों को शोधन औषध गुदमार्ग से निकाल देता है ॥ ३० ॥

बक्तव्य—तात्पर्य यह है कि मुख द्वारा प्रयुक्त औषधद्रव्य वमन द्वारा, नासिका द्वारा प्रयुक्त रेचकनस्य नासिका के छिद्रों द्वारा दोष-निर्हरण करता है और निरुत्पन्नवस्ति द्वारा दिये गये औषधद्रव्य पक्वाशयस्थित दोषों को गुदमार्ग से निकाल देते हैं। यही तात्पर्य 'यथासन्न' शब्द का है।

उत्किल्लष्टानध ऊर्ध्वं वा न चामान् वहतः स्वयम् ॥ ३१ ॥ धारयेदौषधैर्दोषान् विधृतास्ते हि रोगवाः ।

दोषनिर्हरण-निर्देश—बाहर निकलने के लिए ऊपर तथा नीचे से प्रवृत्त अथवा गुदमार्ग से स्वयमेव बहते हुए आमदोषों को स्तम्भन औषधों का प्रयोग करके न रोकें, क्योंकि रोके गये वे आमदोष अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देते हैं ॥ ३१ ॥

प्रवृत्तान् प्रागतं दोषानुपेक्षेत हित्ताशिनः ॥ ३२ ॥ विबद्धान् पाचनेस्तैस्तैः पाचयेन्निरहरेत वा ।

दोषनिर्हरण-विवेक—अतएव हित भोजन करने वाले रोगी के स्वयं प्रवृत्त हुए दोषों की पहले उपेक्षा करें अर्थात् उन्हें प्रवृत्त होने ( निकल जाने ) दें और जो आमदोष शरीर में रके हुए हों, उन्हें उचित पाचनकारक औषधद्रव्यों से पचायें अथवा उनको निकालने का प्रयत्न न करें। उक्त ३१ तथा ३२वें पद्य में प्रयुक्त 'दोष' शब्द का अर्थ—मल है ॥ ३२ ॥

श्रावणे कार्तिके चैत्रे मासि साधारणे क्रमात् ॥ ३३ ॥ ग्रीष्मवर्षाहिमचितान् वाय्वादीनाशु निरहरेत् ।

शोधन का काल—श्रावण, कार्तिक, चैत्र ये मास साधारण ( सम-शीतोष्ण ) होते हैं, अतएव इन मासों में व्रम से ग्रीष्म, वर्षा, हिम ( हेमन्त ) ऋतु में संचित वात, पित्त तथा कफ दोषों को शीघ्र शोधन द्रव्यों के प्रयोगों से निकाल डालें ॥ ३३ ॥

अत्युष्णवर्षशीता हि ग्रीष्मवर्षाहिमागमाः ॥ ३४ ॥ सन्धौ साधारणे तेषां दुष्टान् दोषान् विशोधयेत् ।

सहेतुक शोधन काल—उक्त कालों में शोधन कराने का कारण-निर्देश—ग्रीष्मकाल में गर्मी अधिक होती है, वर्षाकाल में वर्षा अधिक होती है और हेमन्त ऋतु में शीत अधिक पड़ता है, अतः ऋतुसन्धि में तथा उक्त साधारण काल में ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त ऋतुओं में दूषित हुए दोषों का शोधन करना चाहिए ॥ ३४ ॥

स्वस्थवृत्तमभिप्रेत्य, व्याधी व्याधिवशेन तु ॥ ३५ ॥

शोधन का दृष्टिकोण—उक्त दोषशोधन का निर्देश सामान्य रूप से स्वस्थ पुरुष के लिए कहा गया है, क्योंकि समय पर संचित दोषों का निर्हरण हो जाने से उसका स्वास्थ्य बना रहेगा। रुग्णावस्था में तो रोग की स्थिति के अनुसार दोषों का निर्हरण करना पड़ता है ॥ ३५ ॥

कृत्वा शीतोष्णवृष्टीनां प्रतीकारं यथायथम् । प्रयोजयेत्क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥ ३६ ॥

शोधन की विशिष्ट विधि—रुग्णावस्था में शीत, उष्ण, वर्षा के कारण होने वाली बाधाओं का प्रतीकार करके यथोचित विधि से वमन-विरचन ( संशोधनों ) का प्रयोग कराना ही चाहिए। इसमें क्रियाकाल को हाथ से न जाने दें ॥ ३६ ॥