अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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अष्टाङ्गहृदये
नासारोगेषु नासाग्रे स्थितां—
नासारोग में सिराबेध—नासारोगों में नासिका के अग्रभाग की सिरा का वेधन करना चाहिए।
—नासाललाटयोः ॥ १० ॥
पीनसे—
पीनसरोग में सिराबेध—पीनस (प्रतिश्याय) रोग में नासिका के अग्रभाग की तथा ललाट (माथा) की सिरा का वेधन करें ॥ १० ॥
—मुखरोगेषु जिह्वाछहनुतालुगाः ।
मुखरोग में सिराबेध—मुख सम्बन्धी रोगों में जीभ, ओष्ठ (होंठ), हनु (ठुंडी) अथवा तालु की सिरा का वेधन करें।
जत्रुर्ध्वग्रन्थिषु ग्रीवाकर्णशङ्खशिरःभ्रिताः ॥ ११ ॥
ऊर्ध्वजत्रु के रोगों में—जत्रुअस्थि के ऊपर की ग्रन्थियों में होने वाले रोगों में ग्रीवा (गरदन), कर्ण, शंख (कनपटी) तथा सिर की सिराओं का वेधन करना चाहिए ॥ ११ ॥
उरोपाङ्गललाटस्था उन्मादे—
उन्मादरोग में—उन्मादरोग में उरसु (छाती), अपांग (आँख का कोण) तथा ललाट की सिरा का वेधन करें।
—ऽपस्मृतौ पुनः ।
हनुसन्धी समस्ते वा शिरां भ्रूमध्यगामिनीम् ॥ १२ ॥
अपस्माररोग में—अपस्माररोग में हनुसन्धि में अथवा सम्पूर्ण हनुप्रदेश की सिराओं में अथवा दोनों भाँहों के बीच में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए ॥ १२ ॥
विद्रघौ पार्श्वशूलं च पार्श्वकक्षास्तनान्तरे ।
विद्रधि तथा पार्श्वशूल में—विद्रधि तथा पार्श्वशूल में पसलियों में, कक्षाओं में तथा स्तनों के बीच में स्थित सिराओं का वेधन करना चाहिए।
तृतीयकेंऽस्योर्मध्ये—
तृतीयकज्वर में—तृतीयकज्वर में दोनों असफलकों के बीच में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
—स्कन्धस्याधश्चतुर्थके ॥ १३ ॥
चतुर्थकज्वर में—चतुर्थकज्वर में दोनों स्कन्धसन्धियों के निचले भाग में सिरावेधन करना चाहिए।
प्रवाहिकायां शूलिन्यां श्रोणितो द्रघङ्गुले स्थिताम् ।
प्रवाहिकारोग में—शूल युक्त प्रवाहिकारोग में किसी एक श्रोणि (नितम्ब या चूतड़) में कमर के नीचे दो अंगुल दूरी पर स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
शुक्रमेद्दामये मेद्रे—
शुक्र एवं शिशन रोगों में—शुक्र सम्बन्धी रोगों में तथा शिशन (पुरुष-मूत्रेन्द्रिय) सम्बन्धी (शूकदोष, उपदंश एवं परिवर्तिका आदि) रोगों में शिशन (लिंग) की सिरा का वेधन करना चाहिए।
—ऊर्गां गलगण्डयोः ॥ १४ ॥
सिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
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गलगण्डरोगं—गलगण्ड (घेघा) तथा गण्डमाला रोगों में ऊष्ममूलगत सिरा का वेधन करना चाहिए ॥ १४ ॥
गृधस्यां जानुनोऽधस्तादूर्ध्वं वा चतुरङ्गुले ।
गृधसीरोगं—गृधसीरोग में जानुसन्धि के चार अंगुल नीचे अथवा चार अंगुल ऊपर में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए ।
इन्द्रबस्तेरधोऽपच्यां द्रघङ्गुले—
अपचीरोगं—अपचीरोग में इन्द्रबस्ति नामक मर्म के दो अंगुल नीचे सिरावेधन करना चाहिए ।
वक्तव्य—इन्द्रबस्ति-मांसमर्म तथा कालान्तर प्राणहरमर्म है, 'पार्णि प्रति जह्नामध्ये इन्द्रबस्तिः' अर्थात् पार्णि (एडी) के ऊपर जंघा के बीच में 'इन्द्रबस्ति' नामक मर्म है। इसी से दूसरी टाँग और बाँह के मर्मों को भी समझ लेना चाहिए। देखें—सु. शा. ६।२४। इसका वर्णन सु.चि. १।८२५ में भी किया है। और देखें—अ.हू.शा. ४।५। गण्डमाला और अपची में भेद है। देखें—सु.नि. १।१११।
—चतुरङ्गुले ॥ १५ ॥
ऊर्ध्वं गुल्फस्य सव्यथर्तौ, तथा क्रोष्टुकशीर्षके ।
प्रमुख वातरोगों में—सविगगत वातज रोगों (खंजता, पंगुता आदि) में और क्रोष्टुशीर्षक रोग में गुल्फ (एडी के ऊपर की गाँठ, टखना या घुट्टी की) सन्धि के चार अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १५ ॥
पादवाहे खुडे हर्षे विपाद्यां वातकण्टके ॥ १६ ॥
चिप्पे च द्रघङ्गुले विध्येदुपरि क्षिप्रमर्मणः ।
पादवाह आदि में—पादवाह, खुड (वातरक्त) रोग, पादहर्ष, विपादिका, वातकण्टक तथा विष्प नामक नखरोग में क्षिप्र नामक मर्म (अंगुष्ठ एवं अंगुलि के बीच में स्थित) के दो अंगुल ऊपर सिरावेध करना चाहिए ॥ १६ ॥
गृधस्यामिव विश्वाच्यां—
विश्वाचीरोगं—विश्वाचीरोग में गृधसीरोग के समान कूर्पर सन्धि के नीचे या ऊपर चार अंगुल पर सिरावेध करना चाहिए ।
—यथोक्तानामदर्शने ॥ १७ ॥
मर्महीने यथासन्ने देशेऽन्यां व्यधयेत् सिराम् ।
अन्यत्र सिरावेध-निर्देश—ऊपर कहे गये रोगों में निर्दिष्ट सिराएँ उभार युक्त न दिखलायी दें, तो समीप में स्थित एवं मर्मरहित किसी अन्य सिरा का वेधन सावधानी से कर लेना चाहिए ॥ १७ ॥
अथ स्निग्धतनुः सज्जसर्वोपकरणो बली ॥ १८ ॥
कृतस्वस्थयनः स्निग्धरसात्प्रतिभोजितः । अग्रितापातपस्विन्नो जानुच्चासनसंस्थितः ॥ १९ ॥
मृदुपट्टातकेशान्तो जानुस्थापितकूर्परः । मुष्टिभ्यां वस्त्रगर्भाभ्यां मन्ये गाढं तिपीडयेत् ॥ २० ॥
दन्तप्रपीडनोत्कासगण्डाध्माननि चाचरेत् । पृष्ठतो यन्त्रयेच्चैवं वस्त्रमावेष्टयन्नरः ॥ २१ ॥
कन्धरायां परिक्षिप्य न्यस्यान्तर्वाभतर्जनीम् । एषोऽन्तर्मुखवर्ज्यानां सिराणां यन्त्रणे विधिः ॥
सिरायन्त्रण-विधि—सिरावेधन करने के पहले स्वस्तिवाचन आदि मांगलिक कार्य करकर जब उन व्यक्ति (रोगी) का भलीभाँति स्नेहन करना चाहिए और सिरावेधन के उपयोग में आने वाले सभी यन्त्रों (रस्सी, पट्टी, कुठारिका आदि शस्त्र, रक्तप्रावक तथा रोधक औषध-द्रव्य) तैयार रखे जायें हो किन्तु
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अष्टाङ्गहृदये
सिरावेधन करना है, वह बलवान् हो। उसे स्निग्ध रस (मांसरस) युक्त भोजन करा दिया हो, अग्निताप से अथवा आतप (धूप) से उसका स्वेदन कराकर जानुभर ऊँचे आसन (कुर्सी) पर उसे बैठाये। उसके बालों को कोमल वस्त्र से बाँध दें, उसकी दोनों कोहनियों को दोनों घुटनों पर रख दें और दोनों हाथों में कपड़े के टुकड़े देकर मुद्रियाँ बाँधकर उनसे दोनों मन्चाओं (गरदन की दोनों ओर की धमनियों) को जोर से दबाये। इस समय रोगी दाँतों को कसकर दबाये, खाँसने का प्रयत्न न करे और अपने गालों को फुलाये। इसी समय परिच्चारक (कम्माउण्डर) पीठ की ओर खड़ा होकर कपड़े से इसके गला को लपेटता हुआ अपने बायें हाथ की तर्जनी अँगुली को कपड़ा के दोनों भागों के मध्य में रखकर उसके गले को कसकर बाँधे। यह मुख के भीतरी सिराओं के अतिरिक्त शिरःप्रदेश में स्थित सभी शिराओं को उभाड़ने के लिए यन्त्रणविधि कही गयी है। १८-२९॥
बक्तव्य —इस सिरायन्त्रण कार्य में यह सावधानी रखनी चाहिए कि कहीं अधिक रोगी के श्वास-प्रश्वास न रुके। इस प्रकार यन्त्रित कर देने पर रोगी का मुखमण्डल लाल होकर सभी सिराएँ उभरी हुई दिखलायी देती हैं, इसके बाद ही सिरावेध किया जाता है।
ततो मध्यमयाऽङ्गुल्या वैद्योऽङ्गुष्ठविमुक्त्या। ताडयेत्—
सिरावेधन-विधि—समुचित विधि से सिरायन्त्रण कर देने के बाद चिकित्सक अँगूठा द्वारा छटकायी हुई मध्यम अँगुली से निर्दिष्ट सिरा का ताडन करें।
—उत्थितां ज्ञात्वा स्पर्शाद्वाऽङ्गुष्ठपीडनैः ॥ २३ ॥
कुठार्या लक्षयेन्मध्ये वामहस्तगृहीतया। फलोद्देशे सुनिष्कम्पं सिरां, तद्रुच्च मोक्षयेत् ॥ २४ ॥
ताडयन् पीडयंश्चैनां—
कुठारिका-प्रयोग—जब सिरा उभर आये तब उसे मसल कर अथवा अँगूठा से दबाकर उसे और भी उभार लें, उसके बाद बायें हाथ से मूठ पर पकड़ी गयी कुठारिका को उस उठी हुई सिरा के ऊपर रखकर अँगूठा द्वारा छटकायी गयी मध्यम अँगुली से उस कुठारिका पर आघात करें (चोट मारे), जिससे सिरावेध हो जाता है, फिर रक्तध्राव होने दें। २३-२४॥
—विध्येद्व्रीहिमुखेन तु। अङ्गुष्ठेनोन्नमम्याग्रे नासिकामुपनासिकाम् ॥ २५ ॥
उपनासिका-सिरावेध—नासिका के अगले भाग को अँगूठा से ऊपर की ओर उठाकर उपनासिका सिरा का वेधन ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से करना चाहिए। २५॥
अभ्युन्नतविदष्टाग्रजिह्वस्याधस्तदाश्रयाम्।
जिह्वा-सिरावेध—जीभ को तालु की ओर ले जाकर उसे दाँतों से दबाकर जीभ के निचले भाग में स्थित सिरा का वेधन करना चाहिए।
यन्त्रयेत्तनयोर्हर्षं ग्रीवाश्रितसिराव्यधे ॥ २६ ॥ ॥
ग्रीवा-सिरावेध—ग्रीवाप्रदेश में आश्रित सिरा का वेधन करने के लिए दोनों स्तनों के ऊपर की ओर यन्त्रण करें। २६॥
पाषाणगर्भहस्तस्य जानुस्थे प्रसूते भुजे। कुशेराश्व्य मृदिते विध्येद्दोर्ध्वपट्टके ॥ २७ ॥
फिर रोगी दोनों हाथों में पत्थर के टुकड़ों को पकड़कर दोनों भुजाओं को घुटनों के ऊपर रख कर और उन्हें फैलाकर बैठ जाय तथा उसके पेट से लेकर गरदन तक के अंगों को मसला जाय और उसके ऊपर पट्टी बाँध दी जाय, तदनन्तर ग्रीवा में सिरावेध करें। २७॥
बक्तव्य —पेट तथा छाती की सिराओं के वेधन के लिए देखें—‘उदरो’...‘देहस्य’। (सु.शा. ८।८)
सिराव्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
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विध्यैद्वस्तशिरां बाहवाक्वाकुञ्चितकूपैर । बद्ध्वा सुलोपविष्यस्य मुष्टिमङ्गुष्ठगर्भिणम् ॥ २८ ॥ ऊर्ध्वं वेध्यप्रदेशान्च पट्टिकां चतुरङ्गुले ।
बाहु-सिरावेध—बाँह को फैलाकर तथा अँगूठा को बीच में रखकर मुट्ठी बाँधकर सुख (आराम) से बैठे हुए रोगी के बाँह पर वेधन योग्य स्थान से चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेध करें ॥ २८ ॥
विध्यैदालम्बमानस्य बाहुभ्यां पार्श्वयोः सिराम् ॥ २९ ॥
पार्श्वस्य सिरावेध—बाहुओं के बल से लटकते हुए दाहिने तथा बायें पार्श्व की किसी एक सिरा का वेधन करें ॥ २९ ॥
प्रहृष्टे मेहने—
लिंग का सिरावेध—मेहन (पुरुष-मूत्रेन्द्रिय) के उत्तेजित होने पर इसकी सिरा का वेधन करें।
—जङ्गासिरां जानुन्यकुञ्चिते ।
जंघा-सिरावेध—प्राँनों को फैलाकर जंघा की सिरा का वेधन करना चाहिए।
पादे तु सुस्थितेऽधस्ताज्जानुसन्धेर्निपीडिते ॥ ३० ॥
गाढ़ं कराभ्यामागुल्फं चरणे तस्य चोपरि । द्वितीये कुञ्चिते किञ्चिदारूढे हस्तवत्ततः ॥ ३१ ॥
बद्ध्वा विध्यैस्तिराम्—
पाद-सिरावेध—पैरों को समतल भूमि पर रखकर जानुसन्धि के नीचे से लेकर गुल्फसन्धि तक हाथों से दबाकर उस पैर के ऊपर दूसरे पैर को कुछ मोड़कर रखें और उसे कुछ ऊँचा करके बाँह के सिरावेध की भाँति जहाँ सिरावेध करना है उससे चार अंगुल ऊपर पट्टी बाँधकर सिरावेधन करें। यह पादसिराओं के यन्त्रण-विधि से लेकर सिरावेध तक का वर्णन कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥
—इत्यमनुक्तेष्वपि कल्पयेत् । तेषु तेषु प्रदेशेषु तत्तद्यन्त्रमुपायवित् ॥ ३२ ॥
सिरावेध-निर्देश—उक्त निर्देशों के अनुसार उपाय को जानने वाला चिकित्सक शरीर के उन-उन अनुक्त अंगों का बन्धन कर सिरा को उभाड़ कर उसका वेधन करें ॥ ३२ ॥
मांसले निक्षिपेदेशे ब्रीह्यास्य ब्रीहिमात्रकम् । यवार्धमस्मान्मुपरि सिरां विध्यन् कुठारिकाम् ॥
वेध का परिमाण—मांसल शरीर के अवयवों में ब्रीहिमुख नामक शस्त्र से जी के बराबर गहरा घाव बनाना चाहिए। अस्थियों के ऊपर से गई हुई सिरा का वेधन करना हो तो कुठारिका नामक शस्त्र से आधा जी के बराबर गहरा घाव करना चाहिए ॥ ३३ ॥
सम्यविद्वा स्रवेद्वारां यन्त्रे मृक्ते तु न स्रवेत् ।
सम्यक् वेध का वर्णन—सिरावेध समुचित रूप से हो जाने पर उसमें से रक्त की तेज धारा निकलती है और ज्यों ही यन्त्रण (बन्धन) खोल दिया जाता है, फिर रक्त नहीं निकलता या थोड़ा निकलता है।
अल्पकालं वहत्यल्पं, दुर्विद्वा तैलचूर्णनैः ॥ ३४ ॥
सशब्दमतिविद्वा तु स्रवेद् दुःखेन धार्यते ।
दुर्बेध आदि का वर्णन—सिरा का मिथ्यावेध होने पर थोड़ा-सा रक्त थोड़े समय तक बहता है अथवा तैलमिश्रित चूर्णों के प्रयोग करने पर थोड़ा निकलता है। अतिवेध होने पर अत्यन्त शब्द के साथ रक्त बहने लगता है और रोकने का प्रयास करने पर वह (रक्त) रुक पाता है ॥ ३४ ॥
भीमूर्च्छायन्त्रशैथिल्यकुण्ठशस्त्रातितुतयः ॥ ३५ ॥
क्षामत्त्ववैगितास्वेदा रक्तस्यास्रुतिहेतवः ।
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अष्टाङ्गहृदये
रक्त न बहने के कारण—भय, मूर्च्छा, यन्त्रण कर्म का ढीलापन, यन्त्र के कुण्ठित होने से सिरा का समुचित वेध न हो पाना, अधिक भोजन करने के बाद सिरावेध करना, शरीर की क्षीणता, मल-मूत्र आदि के वेग की तीव्र प्रवृत्ति तथा सिरावेध के पहले समुचित स्वेदन कर्म का अभाव—ये सभी सिरावेध में से रक्त न निकल पाने में प्रमुख कारण माने गये हैं ॥ ३५ ॥
असम्यगस्ते स्रवति वेत्तव्योषनिशानतैः ॥ ३६ ॥
सागरधूमलवणतैलैर्दिग्वाच्छिरामुखम् ।
रक्तप्रावण के उपाय—यदि सिरावेध करने पर उचित रूप से रक्त न निकल रहा हो तो जिस स्थान पर सिरावेध किया गया है उसके मुखमार्ग पर वायविंडा, साँठ, मरिच, पीपल, हल्दी, तगर, गृहधूम तथा नमक के चूर्ण को तेल में मिलाकर लेप लगा दें ॥ ३६ ॥
सम्यक्प्रवृत्ते कोण्णेन तैलेन लवणेन च ॥ ३७ ॥
जब समुचित ढंग से रक्त निकल रहा हो तो भी सिरामुख में गुनगुना तेल में नमक मिलाकर लेप कर दें। इस उपाय से रक्त के निकलने में कोई बाधा ( हकावट ) नहीं होती ॥ ३७ ॥
अग्रे स्रवति दुष्टाद्यं कुसुम्भादिव पीतिका।
रक्तप्राव का वर्णन—सिरावेध करते ही सबसे पहले दोषदूषित रक्त उस प्रकार निकलता है, जैसे कुसुम्ब के फूलों में से पीला रंग।
सम्यक्प्रवृत्वा स्वयं तिष्ठेच्छुद्धं तदिति नाहरेत् ॥ ३८ ॥
प्रावण-उपायों का निषेध—यदि सिरावेध करने पर उचित मात्रा में दूषित रक्त निकल कर स्वयं रुक जाय तो फिर ऊपर श्लोक ३६-३७ में कहे गये रक्तप्रावण के उपायों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्वयं रक्तप्राव के रुक जाने के बाद उक्त प्रयत्न करने पर जो रक्त निकलेगा वह शुद्ध रक्त होगा, उसकी रक्षा करें ॥ ३८ ॥
यन्त्रं विमुच्य मूर्च्छायां वीजिते व्यजनैः पुनः । प्रावयेन्मूर्च्छति पुनस्त्वपरेद्युस्थ्यहेऽपि वा ॥ ३९ ॥
मूर्च्छा में कर्तव्य—यदि सिरावेध करते समय रोगी को रक्तदर्शन से मूर्च्छा ( बेहोशी ) आ जाय तो शीघ्र ही बन्धन को खोलकर उसे पंखे से हवा करनी चाहिए, इससे उसकी मूर्च्छा शान्त हो जाती है। इतने पर भी शान्त न हो तो मूर्च्छानाशक अन्य उपाय करें। स्वास्थ्य-लाभ हो जाने पर पुनः सिरावेध करें, यदि फिर मूर्च्छित हो जाय तो दूसरे अथवा तीसरे दिन फिर सिरावेध करें ॥ ३९ ॥
वक्तव्य—रक्तदर्शन का प्रभाव ऐसा होता है कि इससे डरपोक तथा साहसी दोनों भी मूर्च्छित होते देखे जाते हैं। देखें—'वातादिभिः शोणितेन' ( सु.उ. ४६।८ ) अर्थात् छः प्रकार से होने वाली मूर्च्छा में शोणित ( रक्त ) भी अन्यतम कारण होता है। सिरावेध द्वारा साध्य रोगों में इसे कराना आवश्यक होता है। रक्त को देखकर आने वाली मूर्च्छा बार-बार नहीं आती। इससे सम्बन्धित सु.शा. ८।१३-१५ के इन पद्यों का भी परिशीलन अवश्य कर लेना चाहिए।
वाताच्छचावारुणं रुक्षं वेगप्राग्व्यच्छफेनितम् ।
वातदूषित रक्त के लक्षण—वातदोष से दूषित रक्त का वर्ण श्याव तथा अरुण ( ईट के वर्ण का ), रुक्ष, वेग से निकलने वाला, पतला तथा झागदार होता है।
पित्तात् पीतासितं विघ्नमस्कन्दौष्यात्सचन्द्रिकम् ॥ ४० ॥
पित्तदूषित रक्त के लक्षण—पित्तदोष से दूषित रक्त का वर्ण कुछ पीला, कुछ काला, विघ्न ( आमगन्ध वाला ), शीघ्र न जमने वाला, उष्ण होने के कारण चन्द्रिकाओं ( चमकीली रेखाओं ) से युक्त देखा जाता है ॥ ४० ॥
सिराब्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
३०१
कफात् स्निग्धमसुक्पाण्डु तन्तुमप्लिच्छिन् धनम्।
कफदूषित रक्त के लक्षण—कफदोष से दूषित रक्त स्निग्ध ( चिकना ), पीले वर्ण वाला, तन्तुमत् ( लार के सदृश ), प्लिच्छिन् ( चिपचिपा ) तथा गाढ़ा होता है।
संयुष्टलिङ्गं संसर्गात्—
द्वन्द्वज रक्त के लक्षण—दो-दो दोषों द्वारा दूषित रक्त में उन-उन दोषों के लक्षण दिखलायी देते हैं, जिन्से वह रक्त युक्त होता है।
—त्रिदोषं मलिनाविलम् ॥ ४१ ॥
त्रिदोषज रक्त के लक्षण—त्रात आदि तीनों दोषों से दूषित रक्त मलिन वर्ण वाला तथा आविल ( गदला ) होता है ॥ ४१ ॥
अशुद्धौ बलिनोऽप्यन्नं न प्रस्थात्तावयेत्परम्। अतिसुतो हि मृत्युः स्याद्वाऋणा वा चलाभयाः ॥
सिरावेध में रक्त का परिमाण—बलवान् रोगी का भी अशुद्ध रक्त एक बार में एक प्रस्थ से अधिक नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि अधिक मात्रा में रक्त के निकल जाने पर अत्यन्त कष्टकारक वातरोग हो सकते हैं अथवा मृत्यु भी हो सकती है ॥ ४२ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने भी रक्तमोक्षण का १ प्रस्थ परिमाण माना है। 'बलवान्, प्रचुर दोष वाले तथा युवा पुरुष का अधिक-से-अधिक १ प्रस्थ रक्त निकालना चाहिए'। देखें—सु. शा. ८।१६। इस सम्बन्ध में कहा गया है—'वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे। सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहूर्मनीषिणः'। ( शा.सं.उ. ३।१८ ) इसके अनुसार १ प्रस्थ ६४ तोला का नहीं अपितु १३ १/३ पल = ५४ तोला का होता है। सिरावेध से निकले हुए रक्त का किसी चौड़े पात्र में संग्रह करके देखें कि कहीं अधिक रक्त तो नहीं निकल गया। क्योंकि अधिक रक्त न निकल जाय, अतएव कहा है—'देहस्थ रघिरे मूलं रघिरेणैव धार्यते। तस्माद्यलनेन संस्थं रक्तं जीव इति स्थितिः' ॥ ( सु.सू. १।४४ )
तत्राभ्यङ्करसक्षीररक्तपानानि भेषजम्।
विविध चिकित्सा—यदि अधिक मात्रा में रक्त निकल गया हो तो शीघ्र ही अभ्यंग, मांसरस, दूध अथवा बकरा आदि नीरोग प्राणी का रक्त उसे पिलाना चाहिए। इसे 'स्वयोनिवर्धन' चिकित्सा कहते हैं।
सुते रक्ते शतैर्यन्त्रमपनीय हिमाञ्चुना ॥ ४३ ॥
प्रक्षाल्य तैलप्लोताक्तं बन्धनीयं सिरामुखम्।
उपचार-विधि—यदि रक्त का स्त्राव अधिक मात्रा में हो गया हो तो तत्काल बन्धन को खोलकर उस सिरा के मुख को बरफ के पानी से धोकर उसके ऊपर तेल में भिगाया हुआ रुई का फाहा रखकर पट्टी बाँध दें ॥ ४३ ॥
अशुद्धं स्त्रावयेद्भ्यः सायमहृद्यपरैऽपि वा ॥ ४४ ॥
स्नेहोपस्कृतदेहस्थ पक्षाद्वा भृशदूषितम्।
पुनः सिरावेध—यदि कुछ अशुद्ध रक्त शेष रह गया हो तो उसका पुनः सिरावेध-विधि से उसी दिन सायंकाल अथवा दूसरे दिन रक्त-निर्हरण करा दें। अधिक रक्त दूषित हो तो रोगी को स्नेहन कराकर १५ दिन में फिर सिरावेध कराना चाहिए ॥ ४४ ॥
किञ्चिद्वि शेषे दुष्टास्ते नैव रोगोऽतिवर्तते ॥ ४५ ॥
सशेषमप्यतो धार्यं न चातिस्रुतिमाचरेत्।
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अष्टाङ्गहृदये
अधिक रक्तस्राव का निषेध—यदि कुछ दूषित रक्त बच भी जाता है तो रोग बढ़ता नहीं, अतः भले ही दूषित रक्त शेष रह जाता है तो बुरा नहीं है; किन्तु रक्त का अधिक स्राव नहीं होना चाहिए ॥ ४५ ॥
हरेच्छङ्गादिभिः शेषम्—
शृंगयन्त्र का प्रयोग—जो दूषित रक्त पहली बार में नहीं निकल पाया उसका निर्हरण सिंघी आदि यन्त्रों के प्रयोग से करें।
—प्रसादमथवा नयेत् ॥ ४६ ॥
शीतोपचारपित्ताघ्नक्रियाशुद्धिविशेषणैः । दुष्टं रक्तमनुद्विक्तमेवमेव प्रसादयेत् ॥ ४७ ॥
रक्तशुद्धि के उपाय—अथवा जो अशुद्ध रक्त शेष रह गया है, उसे शुद्ध करने के लिए निम्नलिखित उपायों का प्रयोग करें। शीतल उपचारों (आहार-विहार तथा औषध-प्रयोगों) से, रक्तपित्त-अधिकार में कहीं गयी चिकित्सा-विधि से, वमन-विरेचन आदि शोधन उपायों से, लंघन आदि सुखाने के उपायों से वह दूषित रक्त, जो बाहर नहीं निकल पाया है, उसे इन विधियों से शुद्ध करें ॥ ४६-४७ ॥
रक्ते त्वतिष्ठति क्षिप्रं स्तम्भनीमाचरेक्रियाम् ।
स्तम्भनक्रिया-निर्देश—यदि रक्त का स्राव न रुक रहा हो तो शीघ्र ही निम्नलिखित स्तम्भनकारक (रोकने वाली) चिकित्सा करें।
रोधप्रियङ्गुपत्तङ्गमाषयष्टद्याहुरैरैकैः ॥ ४८ ॥
मृत्कपालाज्जनक्षौममघीक्षीरित्वगङ्कुरैः । बिचूर्णयेद्व्रणमुखं पश्चादिहिमं पिबेत् ॥ ४९ ॥
तामेव वा सिरां विधेद्व्यधात्तस्मादनन्तरम् । सिरामुखं वा त्वरितं दहेत्तपशलाकया ॥ ५० ॥
रक्तस्तम्भन-उपचार—व्रणमुख (जहाँ सिरावेध किया है) पर लोह, प्रियंगु, पतंग, उड़द, मुलेठी, गेरु, मृत्कपाल (मिट्टी के घड़े के टुकड़े), सफेद या काला सुरमा, रेशमी वस्त्र की राख, क्षीरी वृक्षों (जिन वृक्षों की छाल से दूध निकलता हो) की छाल तथा अंकुरों का चूर्ण बनाकर डालें या बुरक दें अथवा पश्चादि गण (अ.हृ.सू. १५।१२) के द्रव्यों का हिम पीना चाहिए अथवा पहले किये हुए वेधस्थल से ३-४ अंगुल ऊपर की ओर सिरावेध कर दें अथवा आग में तपाईं हुई लोहे की शलाका से उस सिरावेध वाले छिद्र को जला दें। इन उपचारों से रक्त का निकलना बन्द हो जाता है ॥ ४८-५० ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने भी प्रायः ये ही उपाय रक्तस्राव को रोकने के लिए बतलाये हैं। देखें—सू. सू. १५।३९-४०।
उन्मार्गगा यन्त्रनिपीडनेन स्वस्थानमायान्ति पुनर्न यावत् ।
दोषाः प्रदुष्टा रुधिरं प्रपन्नास्तावद्विताहारविहारभाक् स्यात् ॥ ५१ ॥
रक्तस्रावण का पश्चात्कर्म—रक्तधातु में गये हुए दूषित वात आदि दोष यन्त्रण (बन्धन) क्रिया द्वारा जब उलटी ओर को गतिशील हो जाते हैं और जब तक वे दोष अपने स्थान में नहीं आ जाते, तब तक उक्त रोगी को हितकर आहार-विहार का सेवन करते रहना चाहिए ॥ ५१ ॥
नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमत्तपानम् ।
तदा शरीरं ह्यनवस्थितासुगप्रिविशेषादिति रक्षितव्यः ॥ ५२ ॥
रक्तस्रावण में पथ्य—सिरावेध-विधि से रक्त-निर्हरण करने के बाद वह अन्न (आहार), पान (पेय) हितकर होता है, जो न अधिक गरम हो और न जो अधिक शीतल हो, लघु (सुपाच्य) तथा दीपनीय (अग्निवर्धक) हो; क्योंकि उस समय अर्थात् रक्तमोक्षण काल में रक्तधातु अत्यन्तस्थित हो जाता है, अतएव पाचक आदि शरीरस्थ अग्नियों की विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए ॥ ५२ ॥
सिराब्यधविधिरध्यायः २७ ]
सूत्रस्थानम्
३०३
वक्तव्य—सुश्रुत में उक्त विषय को इस प्रकार कहा गया है—'रक्तधातु के क्षीण हो जाने पर, रक्त का प्राप्त हो जाने पर पाचकाग्नि मन्द पड़ जाता है और वातदोष प्रकुपित हो जाता है। इसलिए न अधिक गरम, न अधिक शीतल, हल्के, स्निग्ध, रक्तवर्धक, खट्टे तथा मीठे भोजन उसे खिलायें'। चरक सू. २४ में उक्त ५१ तथा ५२ श्लोक अविकलरूप से क्रम संख्या २३ तथा २४ में दिये हैं।
प्रसन्नवर्णोन्दिप्रमिन्दिप्रार्थानिच्छन्तमव्याहतपक्ववेगम् । सुखान्वितं पुष्टिबलोपपन्नं विशुद्धरक्तं पुरुषं वदन्ति ॥५३॥ इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूत्रश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने शिराब्यधविधिनाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
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रक्तशुद्धि के लक्षण—जिसका वर्ण प्रसन्न ( कान्ति = प्रभासम्भ्रम ) हो, ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न हों अर्थात् अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में समर्थ हों, जो श्रोत्र आदि विषयों के अर्थों ( विषयों ) को ग्रहण करना चाहता हो, जिसकी पाचन क्रिया में किसी प्रकार की रुकावट न हो, जो सुख, पुष्टि तथा बल से युक्त हो, उस पुरुष को विशुद्ध रक्त वाला कहते हैं ॥५३॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिल्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में सिराब्यधविधि नामक सताईसवर्ग अध्याय समाप्त ॥ २७ ॥
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अष्टाविंशोऽध्यायः
अथातः शल्यहर्षणविधिमध्येषां व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से विविध प्रकार के शल्यों को निकालने की विधियों का व्याख्यान करेंगे। जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम —सुश्रुत ने शल्य का परिचय इस प्रकार दिया है—‘त्र्व मनःशरीराऽऽबाधकराणि शल्यानि’। (सु.सू. ७।४) तथा ‘सर्वशरीराऽऽबाधकरं शल्यम्’। (सु.सू. २६।५) अर्थात् जो सम्पूर्ण शरीर तथा मन को पीड़ित करता है, उसे शल्य कहते हैं। आशुगमनार्थक शलू धातु से यत् प्रत्यय जोड़कर शल्य शब्द निष्पन्न होता है। इसके उपादान ये हैं—बर्छां, सींग, बाण, कांटा, हड्डी, दूषित रक्त, गर्भ, शोक, शत्रु, विषाद आदि। सिराबेध-विधि के बाद अब यहाँ से शल्यहर्षण-विधि का वर्णन प्रारम्भ किया जा रहा है, क्योंकि पहले अध्याय में सम्पूर्ण शरीरव्यापी दूषित रक्त रूप शल्य को निकालने का उपक्रम किया गया था। अब इस अध्याय में शरीर के प्रत्येक अवयव में प्रविष्ट लोह आदि शल्य के लक्षणों तथा उनको निकालने के उपायों का वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत —सु.सू. २६-२७ तथा अ.सं.सू. ३७ में देखें। इस विषय का वर्णन चरकसंहिता में उनके सिद्धान्तानुसार नहीं है।
वक्रजूर्तिर्यगुर्धार्धः शल्यानां पञ्चधा गतिः ।
शल्य की गतियाँ—शरीरावयवों में प्रविष्ट होते समय शल्यों की गति पाँच प्रकार से होती है। यथा—१. वक्र ( टेढ़ी ), २. ऋजु ( सीधी ), ३. तिर्यक् ( तिरछी ), ४. ऊर्ध्व ( ऊपर की ओर ) तथा ५. अधः ( नीचे की ओर ) ।
वक्तव्य —उक्त पाठ के आधारस्थलों का अवलोकन करें—सु.सू. २६।८ तथा अ.सं.सू. ३७।३ पर। शल्यशास्त्र में शल्य शरीर एवं आगन्तुज भेद से दो प्रकार का माना जाता है। इनको निकालने की विधियों का इस अध्याय में वर्णन किया गया है।
ध्यामं शोफरुजावन्तं श्रवन्तं शोणितं मुहुः ॥ १ ॥
अभ्युद्गतं बुद्धवत्पिटिकोपचितं ब्रणम्। मुदुमांसं च जानीयादन्तःशल्यं समासतः ॥ २ ॥
अन्तःशल्य के लक्षण —संक्षेप से अन्तःशल्य ( भीतर गये हुए शल्य ) के ये लक्षण होते हैं—ध्याम ( काला या मलिन ) वर्ण वाला, उस स्थान पर शोथ तथा पीड़ा का होना, जिस स्थान से बार-बार रक्तस्राव हो रहा हो, जो स्थान बुलबुला की भाँति उभार युक्त हो, जिसके आस-पास में अनेक छोटी-छोटी पिडकाएँ हो गयी हों और जहाँ का मांस मुदु ( कोमल ) हो गया हो, ये अन्तःशल्य के लक्षण हैं ॥ १-२ ॥
विशेषात्स्वगते शल्ये विवर्णः कठिनायतः । शोफो भवति—
त्वचागत शल्य के लक्षण —विशेष करके यदि शल्य त्वचा में प्रविष्ट होता है, तो उस स्थान की त्वचा का रंग बदल जाता है। वह स्थान स्पर्श में कठोर तथा चौड़ा हो जाता है।
—मांसस्थे चोषः शोफो विवर्द्धते ॥ ३ ॥
शल्याहरणविधिर्ध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०५
पीडनाक्षमता पाकः शल्यमार्गो न रोहति।
मांसगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसाधतु में प्रविष्ट होता है तो चोष ( चूसने की जैसी पीड़ा ) होता है, उस स्थान पर शोथ बहने लगता है, उस स्थान को छूने में कष्ट होता है, वह स्थान पक जाता है और चिकित्सा करने पर शल्यमार्ग ( जहाँ से शल्य भीतर घुसा वह ) शोष भरता नहीं है ॥ ३ ॥
पेश्यन्तरगते मांसप्राप्तवच्छ्रयं विना ॥४॥
पेशीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मांसपेशियों ( मांसाधतु में ही प्रविष्ट होकर वायुपेशियों का विभाजन करता है ) के भीतर प्रविष्ट हो जाता है, तो इसमें भी मांसगत शल्य के उक्त सभी लक्षण हो जाते हैं, किन्तु इसमें सूजन नहीं होती ॥ ४ ॥
आक्षेपः स्नायुजालस्य संरम्भस्तम्भवेदनाः । स्नायुगे दुर्हरं चैतत्—
स्नायुगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्नायुओं में प्रविष्ट हो जाता है तो स्नायुजाल में आक्षेप ( विंचाव ), संरम्भ ( क्षोभ—हलचल ), स्तम्भ ( जड़ता ) तथा पीड़ा होती है और यह शल्य बड़े कष्ट से निकाला जा सकता है।
बक्तव्य—स्नायु-परिचय—इनसे शरीर में स्थित मांसपेशियाँ, अस्थियाँ, मेदोधातु तथा सन्धियाँ दृढ़ता से बँधी रहती हैं। ये शिराओं से अधिक मजबूत होती हैं। देखें—शा. सं. पू. खं. ५५५।
—सिराध्मानं सिराश्रिते ॥५॥
सिरागत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सिराओं में प्रविष्ट हो जाता है तो सिराएँ आध्मान युक्त हो जाती हैं अर्थात् फूल जाती हैं ॥ ५ ॥
स्वकर्म्मगुणहानिः स्यात्स्रोतसां स्रोतसि स्थिते ।
स्रोतोगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य स्रोतों में प्रविष्ट हो जाता है तो स्रोतों के कर्मा तथा गुणों की हानि हो जाती है।
बक्तव्य—स्रोतसु-परिचय—सु.शा. ५६; सु.शा. ९१२ तथा च.शा. ७१२ में देखें। शरीर के भीतर मन, प्राण, अन्न, जल, दोष, धातु, उपधातु, धातुओं के मल तथा मूत्र आदि जिन मार्गों में से होकर संचार करते हैं, उन्हें स्रोतसु कहते हैं। इनका निर्माण—वायु ऊष्मा से युक्त होकर यथायोग्य इन स्रोतों का निर्माण करता है।
धमनीस्थेऽनिलो रक्तं फेनयुक्तमुदीरयेत् ॥६॥
नियर्याति शब्दवान् स्याच्च हृत्लासः साङ्ख्यवेदनः ।
धमनीगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य धमनी में प्रविष्ट हो तो वायु झागदार रक्त को बाहर की ओर निकालता है तथा शब्द करता हुआ वायु भी उसमें से निकलता है और सम्पूर्ण शरीर में वेदना होती है, जो मिचलता है ॥ ६ ॥
सङ्ख्यो बलवानस्थिसन्धिप्राप्तेऽस्थिपूर्णता ॥७॥
अस्थिसन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि की सन्धि में प्रविष्ट होता है तो उसमें जोरदार रगड़ लगती है और अस्थि का वह पोल्ला भाग उस शल्य से भर जैसा जाता है, यही उसकी पूर्णता है ॥ ७ ॥
बक्तव्य—यहाँ महर्षि वाग्भट पूर्णतया सुश्रुत से प्रभावित हैं। देखें—‘अस्थिविवरणतेऽस्थि-पूर्णताऽस्थिनित्तोदः संहर्यो बलवांश्च’ । ( सु.सू. २६१० ) वाग्भट ने जहाँ ‘अस्थिसन्धि’ कहा है, उसे सुश्रुत
२० अ० ह०
३०६
अष्टाङ्गहृदये
ने 'अस्थिविवर' कहा है। इस दृष्टि से सुश्रुतकोष पाठ अधिक समीचीन है, क्योंकि विवर की पूर्णता बाहरी शल्य से हुई है, यह स्थिति अस्थिसन्धि में नहीं होती। क्या यहाँ ऐसा पाठ तो नहीं रहा? 'सद्घर्षं बलवान्स्थिमध्यप्राप्ते'। विद्वान् विचार करें, क्योंकि आगे अस्थिसन्धि का वर्णन दिया है।
नैकरूपा रुजोऽस्थिस्थे शोफः—
अस्थिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य अस्थि में प्रविष्ट (धँसा) होता है तो अनेक प्रकार की (भ्रम, लूण, मुदित, पीडित, नीचे की ओर को झुकाना आदि) पीड़ाओं की उत्पत्ति होती है और उसके आसपास सूजन भी हो जाती है।
—तद्वच्च सन्धिगे।
चेष्टानिवृत्तिश्च भवेत्—
सन्धिगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य सन्धियों में धँसा होता है तो अस्थिशल्य के समान लक्षण इसमें भी होते हैं और उस सन्धि में पहले की भाँति लोच नहीं रह जाती अर्थात् वह सन्धि ठीक से मुड़ नहीं सकती।
—आटोपः कोष्ठसन्धिते ॥ ८ ॥
आनाहोऽन्नशकृन्मूत्रदर्शनं च व्रणानने।
कोष्ठगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य कोष्ठ में प्रविष्ट हुआ हो तो व्रण के मुख में अन्न, मल तथा मूत्र का दिखलायी देना, पेट में हलचल तथा आनाह (अफरा) ये लक्षण दिखलायी पड़ते हैं ॥ ८ ॥
विद्यान्मर्मगतं शल्यं मर्मविद्रोपलक्षणैः ॥ ९ ॥
मर्मगत शल्य के लक्षण—यदि शल्य मर्मस्थान में धँसा हो तो उसमें मर्मविद्र के लक्षण दिखलायी देते हैं ॥ ९ ॥
वक्तव्य—देखें—सू. सू. २५।३५; सु. शा. ६।१९-२० तथा अ. हू. शा. ४।४७ में मर्मविद्र के लक्षण।
यथास्वं च परिस्रावैस्त्वगादिषु विभावयेत्।
सामान्य निर्देश—'यथास्वं' का अर्थ है लचा आदि के स्रावों को देखकर शल्य कहाँ धँसा है, उसका निर्णय इस दृष्टि से करें। यथा—त्वचा में लसीकास्राव को देखकर, सिरा में रक्तस्राव से, अस्थि में मज्जास्राव से, आमाशय में अन्न के निकलने से, मलाशय में मल के निकलने से और मूत्राशय में मूत्र के निकलने को देखकर शल्य का निर्णय कर लेना चाहिए।
रुह्यते शुद्धदेहानामनुलोमस्थितं तु तत् ॥ १० ॥
शल्यव्रण का रोपण—वमन तथा विरेचन आदि शोधन-क्रियाओं द्वारा शुद्ध शरीर वालों का वह शल्य के चुभने से हुआ व्रण शल्य के अनुलोम गति से भीतर स्थित रहने पर भी स्वयं ही भर गया है, ऐसा प्रतीत होता है ॥ १० ॥
दोषकोपाभिघातादिशोभाद्रयोऽपि ब्राधते।
पुनः पीडाकर्तृत्व—शल्य के निकल जाने पर ही व्रण को सम्यक् रुद्ध नहीं समझ लेना चाहिए, क्योंकि इस व्रणस्थान पर पुनः कभी दोषों का प्रकोप होने पर, चोट लगने पर या धक्का आदि के लगने पर भीतर स्थित शल्य फिर भी पीड़ा पहुँचा सकता है।
त्वङ्नष्टे यत्र तत्र स्युरभ्यङ्गस्वेदमर्दनैः ॥ ११ ॥
शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०७
रागरुढाहसंरम्भा यत्र चाज्यं विलीयते। आशु शूष्यति लेपो वा तत्स्थानं शल्यबद्धते॥ १२॥
शल्यज्ञान के उपाय—त्वचा आदि स्थानों में अदृश्य हुए शल्य को कैसे जानना चाहिए, इसके उपायों का क्रमशः वर्णन किया जा रहा है। त्वचागत शल्य—जहाँ त्वचा में शल्य प्रवेश कर अदृश्य हो गया हो, उसका पता लगाने के ये उपाय हैं—वहाँ अभ्यंग, स्वेदन तथा मर्दन करने से उस स्थान-विशेष पर लालिमा, पीड़ा, दाह तथा संरम्भ ( हलचल ) होता है; वहाँ घी सरलता से पिघल जाता है और लगाया हुआ लेप शीघ्र सूख जाता है। ऐसे स्थान को शल्य युक्त समझें॥ ११-१२॥
मांसप्रणष्टं संशुद्ध्या कर्शनाच्छूलयतां गतम्। क्षोभद्रागादिभिः शल्यं लक्षयेत्—
मांसगत शल्य—मांसपेशियों में खोये हुए शल्य को वमन-विरचन द्वारा शरीर-शोधन करने के कारण शरीर के शिथिल हो जाने पर, शरीर के हिलने-डुलने से, लालिमा दिखलायी देने से तथा पीड़ा आदि से यहाँ शल्य होना चाहिए, ऐसा समझना चाहिए।
—तद्वदेव च॥ १३॥
पेश्यस्यिसन्धिकोष्ठेषु नष्टम्—
पेशीगत आदि शल्य—इसी प्रकार मांसपेशियों के मध्य में, अस्थिसन्धियों में तथा कोष्ठप्रदेश के अन्तर्गत अदृश्य शल्य के प्रमुख स्थान को पहचान लेना चाहिए॥ १३॥
—अस्थिषु लक्षयेत्। अस्न्यामभ्यज्जनस्वेदबन्धपीडनमर्दनैः॥ १४॥
अस्थिगत शल्य—अस्थियों में अदृश्य हुए शल्य को अभ्यंग, स्वेदन, बन्धन, पीडन तथा मर्दन विधियों से उसका स्थान-निर्धारण कर लें॥ १४॥
प्रसारणाकुञ्चनतः सन्धिन्ष्टं तथाऽस्थिवत्।
सन्धिगत शल्य—सन्धिगत अदृश्य शल्य का ज्ञान अस्थिगत शल्य की भाँति करें। विशेष करके प्रसारण ( फैलाना ) तथा आकुंचन ( सिकोड़ना या बटोरना ) आदि क्रियाओं से समझें।
नष्टे स्नायुशिराघ्नोतोधमनीञ्चसमे पथि॥ १५॥
अधयुक्तं रथं खण्डचक्रमारोप्य रोगिणम्। शीघ्रं नयेतस्तस्य संरम्भाच्छल्यमादिशेत्॥ १६॥
स्नायु आदि गत शल्य—स्नायु, सिरा, घ्नोतसों तथा धमनियों में प्रविष्ट शल्य जब अदृश्य हो जाय तो उस रोगी को टूटे पहिये वाले रथ पर बैठाकर उसमें घोड़ा जोतकर शीघ्र ले जाय। उसके संरम्भ से जहाँ शल्य होगा-वह स्थान दुःखने लगेगा॥ १५-१६॥
मर्मनष्टं पृथङ्नोक्तं तेषां मांसादिसंश्रयात्।
मर्मगत शल्य—यहाँ मर्मगत शल्य को अलग से नहीं कहा गया है, क्योंकि मर्मस्थलों के आश्रयस्थल मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि तथा सन्धियाँ ही हैं।
सामान्येन सशल्यं तु क्षोभिण्या क्रियया सख्यु॥ १७॥
सामान्य निर्देश—सामान्य रूप से वहाँ शल्य समझना चाहिए, जहाँ हिलाने-डुलाने तथा दबाने से पीड़ा हो॥ १७॥
वृत्तं पृथु चतुष्कोणं त्रिपुटे च समासतः। अदृश्यशल्यसंस्थानं ब्रणाकृत्या विभावयेत्॥ १८॥
शल्य के स्वरूपों का अनुमान—अदृश्य ( जो देखा गया न हो ऐसे ) शल्य के स्वरूप का ज्ञान ब्रण ( घाव ) की आकृति से समझने का प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि प्रायः सभी शल्यों के अवयव नष्ट
३०८
अष्टाङ्गहृदये
से चार प्रकार के होते हैं—१. वृत्त (गोल), २. पुष्प (चौड़ा), ३. चतुष्कोण (चौकोर) तथा त्रिपुट (तिकोना) ॥ १८ ॥
बक्तव्य —इन आकृतियों के अनुसार उस-उस शल्य को निकालने का प्रयत्न करना चाहिए।
तेषामाहरणोपायाः प्रतिलोमानुलोमकौ।
शल्य-निर्हरण के उपाय —उन शल्यों को निकालने के उपाय दो प्रकार के हैं—१. प्रतिलोम (वह शल्य शरीर के भीतर जैसे ही घुसा उससे उल्टा अर्थात् उसी मार्ग से बाहर को निकालना; जैसे कोटा निकाला जाता है) और २. अनुलोम (जहाँ से निकालना सरल हो, उसे अनुलोम कहते हैं)।
अर्वाचीनपराचीने निहिरेतद्विपर्यायात् ॥ १९ ॥
अर्वाचीन आदि शल्य —अर्वाचीन शल्य को प्रतिलोम-विधि से निकालना चाहिए और पराचीन शल्य को अनुलोम-विधि से निकालना चाहिए ॥ १९ ॥
बक्तव्य —अर्वाचीन शल्य वह है, जो पास में उभार युक्त दिखलायी देता है और पराचीन शल्य वह है जो इस पार से दूसरी ओर को चला जाता है। अतएव कहा गया है कि अर्वाचीन शल्य को उसने जिधर से प्रवेश किया है, उधर से ही निकाल लें और पराचीन शल्य जहाँ तक पहुँच चुका है उसके आगे कुछ अवयव काटकर निकालें, वही उसके लिए अनुलोम होगा। इस प्रसंग में सुश्रुतको निम्न उद्धरणों को भी देखें—सु.सू. २७।६-७।
सुखाहार्थं यतश्चिच्छत्वा ततस्तिर्यगातं हरेत्।
तिर्यग्गत शल्य —तिर्यग्गत (तिरछे गये हुए) शल्य को उस ओर से काटकर निकाले, जहाँ से वह सुख से निकल सके।
बक्तव्य —तिर्यग्गत शल्य को निकालने के सम्बन्ध में वृद्धवाग्भट का भी यही मत है। देखें—अ.सं. सू. ३७।१४।
शल्यं न निर्घात्यमुरः कक्षावृद्धानुपाश्वगम् ॥ २० ॥
प्रतिलोममनुतुण्डं छेद्यं पुष्पमुखं च यत्।
निर्घातन के अयोग्य शल्य —उरस, कक्षा, वंशण तथा पाश्व (पशुकास्थियों) के भीतरी अवयवों में गये या बिधे हुए शल्यों का निर्घातन नहीं करना चाहिए। जो शल्य प्रतिलोम हो, जो अनुतुण्ड (जिस शल्य का मुख दूसरी ओर न निकला) हो, जो छेदन के योग्य हो तथा जो चौड़े मुखवाला हो—इन शल्यों का भी निर्घातन न करे ॥ २० ॥
बक्तव्य —निर्घातन नामक एक यन्त्रकर्म है, जिसका वर्णन अ. द्ब. सू. २५।४१ में है। इसी अध्याय के १५वें पद्य में 'शल्यनिर्घातनी नाडीयन्त्र' का भी उल्लेख है। इस सम्बन्ध में देखें—सु.सू. २७।८-९।
नैवाहरेद्विशल्यघ्नं नष्टं वा निरुपद्रवम् ॥ २१ ॥
विशल्यघ्न शल्यारुण-निषेध —विशल्यघ्न (शल्य को निकाल देने पर मार देने वाले) शल्य को, नष्ट शल्य ('णश्च अदक्षति' अर्थात् जो न दिखलायी दे रहा हो और जो पीड़ादायक भी न हो) को अथवा उपद्रव रहित शल्य को निकालने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए ॥ २१ ॥
बक्तव्य —उक्त विषय के स्पष्टीकरण के लिए सुश्रुतको निम्न सन्दर्भों का अवलोकन करें—'तान्येतानि पञ्चविकल्पानि भवन्ति; तद्यथा—सद्यः प्राणहराणि, कालन्तरप्राणहराणि, विशल्यघ्नानि, वैकल्पकराणि, रूजाहराणि चेति'। (सु.शा. ६।८) 'तस्मात् सशल्यो जीवत्युद्भूतशल्यो प्रियते (पाकात् पतितशल्यो वा जीवति)'। (सु.शा. ६।१६) तथा 'तत्र सशल्यो जीवति पाकात् पतितशल्यो वा नोद्भूतशल्यः'। (सु.शा. ६।२७) इस
शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३०९
प्रकार एक ही विषय का दो स्थानों पर समान वर्णन करना यह प्रमाणित करता है कि विश्लयन्धन शल्य का आहरण नहीं करना चाहिए।
अथाहरेत्करप्राप्य करेणैव—
शल्यनिर्हरण-विधि —तदनन्तर हाथ से पकड़ने योग्य शल्य को हाथ से ही पकड़कर खींच लेना चाहिए। क्योंकि सुश्रुत ने हाथ को ही प्रधान यन्त्र माना है। देखें—सू.सू. ७३।
—इतरत्युतः। दृश्यं सिंहाहिमकरवर्मिककटकाननैः ॥ २२ ॥
दृश्य शल्य-निर्हरण —जो हाथ से न पकड़ा जा रहा हो किन्तु दिखलाई दे रहा हो, उसे सिंहमुख, अहि (सर्प) मुख, मकरमुख, वर्मि (मत्स्य-विशेष) मुख अथवा कर्कटमुख नामक यन्त्रों द्वारा पकड़कर निकालना चाहिए ॥ २२ ॥
अदृश्यं ब्रणसंस्थानादग्रहीतुं शक्यते यतः। कङ्कभृङ्गाह्नुकरशरारीवायसाननैः ॥ २३ ॥
अदृश्य शल्य-निर्हरण —अदृश्य शल्य का आहरण ब्रण (घाव) की आकृति को देखकर जिन यन्त्रों से पकड़ कर निकाला जा सकता है, वे यन्त्र हैं—कंकमुख, भृंगराजमुख, कुररमुख, शरारिमुख अथवा काकमुख। यहाँ मुख शब्द का अर्थ है—इन पक्षियों की चोंच की आकृति के यन्त्र ॥ २३ ॥
सन्दंशाभ्यां त्वगादित्यं—
सन्दंशयन्त्र-प्रयोग —त्वचा तथा मांस में घँसे हुए शल्य को संदंश (सँइसी) नामक यन्त्रों से पकड़कर निकालना चाहिए।
—तालाभ्यां सुषिरं हरेत्।
तालयन्त्र-प्रयोग —त्वचा आदि में स्थित सुषिर (भीतर से छिद्रवाले) शल्य को तालयन्त्रों की सहायता से निकालना चाहिए, न कि सन्दंशयन्त्रों से।
सुषिरस्यं तु नलकैः—
नाडीयन्त्र-प्रयोग —सुषिरस्य (भीतर से पोली अस्थि अथवा अस्थियों में चुभे हुए) शल्य को नाडीयन्त्रों से पकड़कर खींचना चाहिए।
शेषं शेषैर्यथायथम् ॥ २४ ॥
शेष यन्त्र-प्रयोग —शेष (ऊपरवर्णित शल्यों से अतिरिक्त) शल्यों को उन यन्त्रों से सोच-समझकर निकालना चाहिए, जिनका वर्णन ऊपर नहीं किया गया है तथा जो यन्त्र जिस शल्य को निकालने में समर्थ हों। २४ ॥
शस्त्रेण वा विशास्यादौ ततो निर्लोहितं ब्रणम्। कृत्वा घृतेन संस्वेद्य बद्ध्वाऽऽचारिकमादिशेत् ॥
निर्हित शल्य का पश्चात्कर्म —अथवा (जब शल्य चुभे हुए स्थान को बिना काटे यन्त्रों की सहायता से न निकल सके तो) पहले उस स्थान को जहाँ शल्य घँसा हो, काटकर शल्य को निकालकर उसमें बहते हुए रक्त को रोकने का उपाय कर तदनन्तर घाव में लगे हुए रक्त को धोकर अर्थात् साफ करके गुनगुने घी से उस ब्रणस्थान का स्वेदन करके उसमें ब्रणरोपण लेप (मलहम) लगाकर उसे ब्रणीपचार की विधि समझा देनी चाहिए ॥ २५ ॥
बक्तव्य —अष्टगृह्दय-सूत्रस्थान अध्याय १६।२६-२८ में इसके उपचारों का निर्देश किया गया है।
सिरास्तायुबिलस्यं तु चालयित्वा शलाकाया।
सिरा-स्तायुगत शल्य —सिरा तथा स्नायु में घँसे हुए शल्य को शलाकायन्त्र से हिला-डुला करके उसे ढीला करके निकालें।
३१०
अष्टाङ्गहृदये
हृदये संस्थितं शल्यं त्रासितस्य हिमाम्बुना ॥ २६ ॥
ततः स्थानान्तरं प्राप्तमाहरेत्तद्यथायथम् । यथामार्गं दुराकर्म्म—
हृदयगत शल्य—जिसके हृदय में शल्य चुभा हो उस व्यक्ति को शीतल जल के छींटों को डालकर उसे घबड़ा दें (यह विवासन जाड़े में ही हो सकता है), तब तत्काल उचित यन्त्र की सहायता से उसे निकाल डालें। यदि इसी प्रकार निकालना सम्भव न हो अथवा हानिकारक हो तो शल्य को इधर-उधर ले जाकर जैसे सम्भव हो, उसे निकाल दें। यदि जहाँ से शल्य घुसा है, उस मार्ग से निकालने में कठिनाई हो तो ॥ २६ ॥
—अन्यतोऽध्येवमाहरेत् ॥ २७ ॥
शल्याहरण की अन्य विधि—उसे खाँचकर के दूसरी ओर से ऐसे ही निकाल लें ॥ २७ ॥
अस्थिदण्डे नरं पद्म्यां पोडयित्वा विनिहरेत् ।
अस्थिगत शल्य—यदि शल्य अस्थि में चुभा हो तो उस पुरुष को पैरों से दबाकर शल्य को पकड़कर जोर से निकालें।
इत्यशक्ये सुबलिभिः सुगृहीतस्य किङ्कुरैः ॥ २८ ॥
दूसरी विधि—यदि अस्थिगत शल्य को अकेला चिकित्सक न निकाल सके तो बलवान् सेवकों द्वारा उसे पकड़वा कर शल्य को निकलवा दें ॥ २८ ॥
तथाऽप्यशक्ये वारङ्गं वक्रीकृत्य धनुर्ज्याया । सुबद्धं वक्त्रकटके बन्धीयात्सुसमाहितः ॥ २९ ॥
सुसंयतस्य पञ्चाङ्ग्या वाजिनः कशयाऽथ तम् । ताडयेदिति मूर्धानं वेगेनोन्नमयन् यथा ॥ ३० ॥
उद्धरेच्छल्यम्—
तीसरी विधि—यदि उक्त विधि से शल्य न निकल सके तो शल्य के पकड़ने योग्य ऊपरी भाग वारंग (मूठ) को टेढ़ा करके धनुष की डोरी से भलीभाँति बाँधकर उस डोरी के दूसरे छोर को सावधान होकर पंचांगी (चारों पैर तथा मुख) से बाँधे गये घोड़े के मुखकटक (लगाम) से बाँध दे और फिर उस घोड़े को कोई से इस प्रकार मारे जिससे घोड़ा अपने सिर को बैग (झटका) से उठाये और शल्य निकल जाय ॥ २९-३० ॥
—एवं वा शाखायां कल्पयेत्तरोः ।
चाँची विधि—अथवा इसी प्रकार वृक्ष की डाल को नीचे की ओर झुकाकर उस शल्य में बाँधी हुई डोरी का दूसरा छोर इस झुकाई हुई डाल में बाँधकर झटके से उस डाल को छोड़ दें, वह अपने बैग से शल्य को निकाल देगी। इन दोनों स्थितियों में शल्यविद्ध रोगी को आत्मीयजन सावधानी से पकड़े रहें।
बद्ध्वा दुर्बलवारङ्गं कुशाभिः शल्यमाहरेत् ॥ ३१ ॥
पाँचबीं विधि—जिस शल्य का वारंग (मूठ) कमजोर हो तो उसे कुश आदि की रस्सियों से कसकर तब शल्य का निर्हरण करना चाहिए ॥ ३१ ॥
श्वयथुग्रस्तवारङ्गं शोफमुत्पीड्य युक्तिः ।
छठी विधि—जिस शल्य का वारंग (मूठ) सूजन से ढक जाय तो उसके सूजन को दबाकर यन्त्र द्वारा युक्तिपूर्वक शल्य को निकालें।
मुद्गराहतया नाड्या निर्घात्योत्पिडतं हरेत् ॥ ३२ ॥
सातवीं विधि—यदि शल्य फफोले की भाँति सामने आ गया हो तो नाडीयन्त्र से उसे इधर-उधर से हिलाकर मुद्गर से उस शल्य का मुख टेढ़ा करके उसे निकालें ॥ ३२ ॥
शल्याहरणविधिध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३११
तैरेव चानयेन्मार्गममार्गोत्पिण्डतं तु यत्।
आठवीं विधि—जो शल्य दूसरे मार्ग से दूसरी ओर को निकल आया हो, उसे सही मार्ग (जहाँ से उसे निकालने में सरलता हो) में ले जाकर निकाल दें।
मृदित्वा कर्णिनां कर्णं नाड्यास्थेन निगृह्य वा ॥ ३३ ॥
नबीं बिधि—एक, दो अथवा तीन कर्णों (फरों) वाले शल्यों के कर्णों को रेतीयन्त्र से घिसकर और नाडीयन्त्र से दबाकर शल्य को निकाल दें। ॥ ३३ ॥
अयस्कात्तेन निष्कर्णं विवृतास्यमुजुस्थितम्।
दसवीं विधि—जो लौहनिर्मित शल्य सीधा शरीर के किसी भाग में स्थित हो, जिसमें कर्ण (फर) न हों और जिस ब्रण का मुख खुला हो उसे चुम्बक लगाकर खींच लेना चाहिए।
पक्वाशयगतं शल्यं विरेकेण विनिर्हरेत् ॥ ३४ ॥
पक्वाशयगत शल्य—यदि शल्य पक्वाशय में पहुँच गया हो तो उसे विरेचन करा कर निकाल लेना चाहिए। ॥ ३४ ॥
दुष्टवातविषस्तन्यरक्तोयादि चूषणेः ।
वात आदि शल्य—दूषित वात, दष्टस्थान का विष, दुष्टतन्य (इसी से स्त्रियों को धनेला रोग हो जाता है), दूषित रक्त तथा जल में डूबने से पानी का भर जाना आदि की चिकित्सा चूषणयन्त्रों (सिंगी, तुम्बी आदि) से करें।
कण्ठघ्रोतोगते शल्ये सूत्रं कण्ठे प्रवेशयेत् ॥ ३५ ॥
बिसेनासे ततः शल्ये बिसं सूत्रं समं हरेत्।
कण्ठघ्रोतगत शल्य—कण्ठ (गले) के घ्रोतस् में शल्य के फँस जाने पर बिस(कमल)नाल के साथ धागा का प्रवेश करें। धागा या बिसनाल में शल्य के फँस जाने पर उन दोनों को शल्य के साथ बाहर निकाल लें। ॥ ३५ ॥
नाड्याऽग्नितापितां क्षिप्त्वा शलाकामप्थिरीकृताम् ॥ ३६ ॥
आनयेज्जातुषं कण्ठात्—
जतुशल्य-निर्हरण—यदि कण्ठ (गले) के घ्रोतस् में जतु = लाख का टुकड़ा रूपी शल्य फँस गया हो तो आग में तपायी गयी लाख की सीक को नाडीयन्त्र के भीतर से उस जतुशल्य तक पहुँचाकर उससे सटा दें और वह शल्य उस सीक के साथ सट जायेगा। उसके बाद उस व्यक्ति को पानी पिला दें, जिससे सीक ठण्डी होकर शल्य को अपने साथ जोड़ लेगी। अब आप उस जतुशल्य को गले से बाहर नाडी के साथ निकाल लें। ॥ ३६ ॥
—जतुदिग्धामजातुषम्।
अन्य शल्य-निर्हरण—इसी प्रकार लाख से अतिरिक्त अन्य लकड़ी आदि शल्यों को भी लाख की गरम शलाका को नाडीयन्त्र के भीतर से डालकर कण्ठघ्रोतस् के भीतर धँसे हुए शल्य का भी निर्हरण कर सकते हैं।
केशोन्दुकेन पीतेन द्रवैः कण्टकमाक्षिपेत् ॥ ३७ ॥
सहसा सूत्रबद्धेन वमतः—
३१२
अष्टाङ्गहृदये
गले में फँसे हुए शल्य को निकालना—यदि अस्थि ( हड्डी या हड्डों का टुकड़ा ) अथवा कण्टक ( मछली का काँटा ) आदि शल्य गला के भीतर फँस गया हो तो बालों को सुदृढ़ धागा से बाँधकर दूध आदि के साथ निगला दें और फिर उसे उल्टी करा कर उसके साथ उक्त शल्य को खींचकर निकाल लें॥ ३७॥
—तेन चेतर्त् ।
यदि उक्त शल्य ऊपर कही गयी विधि से न निकल सके या न निकाला जा सके तो चिकित्सक अपनी बुद्धि से दूसरी विधि से निकालने का प्रयत्न करें।
अपानकं मुखनासाभ्यामहर्तु परतो नुदेत्॥ ३८॥
कभी-कभी इस प्रकार के प्रयत्नों के द्वारा छोटे शल्य वमन के साथ मुख अथवा नासिका के छिद्रों से निकल जाते हैं। यदि न निकल सकें तो कुछ पेय पदार्थ उसे पिलाकर आहारनलिका से उसे भीतर की ओर प्रेरित कर ( ढकेल ) दें॥ ३८॥
अपानस्कन्धघाताभ्यां ग्रासशल्यं प्रवेशयेत् ।
यदि आहारनलिका में ग्रास ( कौर ) नामक शल्य फँस गया हो तो उसे जल अथवा घी-तेल आदि पिलाकर स्कन्ध भाग में मुड़ी आदि द्वारा मार या ठोक कर ग्रास को भीतर की ओर जाने में सहायता करें।
वक्तव्य—प्रायः ऐसी परिस्थिति बालकों के भोजन काल में देखी जाती है। पास में बैठी हुई माता, दादी आदि इसी प्रकार के व्यवहार से 'ग्रासशल्य' को भीतर या बाहर की ओर करते-कराते देखी जाती है। यह वाग्भट की सूक्ष्म दृष्टि है।
सूक्ष्माक्षिन्नशल्यानि श्लोमवालजलैर्हरिर्त्॥ ३९॥
आँख एवं ब्रण में पड़े शल्य को निकालना—आँख में घुसे तथा घाव में पड़े हुए सूक्ष्म छोटे से छोटे शल्य ( बाल या बालू के कण ) को रेशमी वस्त्र के कोने से केश ( बाल ) की सहायता से निकाले अथवा पानी के छींटे डालकर निकालें ( इस प्रकार के लघु शल्यों को अनुभववी बूढ़े लोग सरलता से निकाल देते हैं )॥ ३९॥
अपां पूर्णं विघ्नयुयादवाक्षिरसमायतम् । वामयेच्चामुखं भस्मराशीं वा निखनेन्नरम्॥ ४०॥
उदरगत जल निकालने की विधि—तैरते समय डूब जाने से पेट में पानी भर जाता है। यह जल भी शल्य है, न कि भोजन के साथ पीया गया जल। उक्त जल को निकालने की विधि—जिसके पेट में पानी भर गया हो, उसे तत्काल उलटा करके झकझोरें, लटकायें; जब कुछ शान्त हो जाय तो उसे वमन कराये तथा मुख तक उसे भस्म के ढेर में गाड़ दें। इस विधि से बहुत-सा जल भस्म अपने में सुखा लेता है॥ ४०॥
कर्णोऽम्बुपूर्णं हस्तेन मथित्वा तैलवारिणी । क्षिपेदधोमुखं कर्णं हन्याद्वाऽऽचूषयेत् वा॥ ४१॥
कर्णगत जल एवं क्रिमि निकालने की विधि—कान के छिद्रों में जल भर जाने पर तेल और पानी को हाथ से मथकर जब वह घी जैसा हो जाता है तब उसे कान में डालें। उसके कान को उलटा करके हाथ से थपथपायें, ठोके अथवा कोई दूसरा व्यक्ति उसके कान में मुख लगाकर पानी को चूसकर थूक दें॥ ४१॥
कीटे द्रोतोगते कर्णं पूर्येल्लवणाम्बुना । सुक्तेन वा सुखोष्णेन मृते क्लेदहरो विधिः॥ ४२॥
शल्याहरणविधिर्ध्यायः २८ ]
सूत्रस्थानम्
३१३
यदि कान के छेद में कोई कीड़ा या कनखरूरा चला जाय तो उसमें नमक मिला हुआ पानी डाल दें अथवा गुनगुना सिरका डाल दें। इससे कीड़ा स्वयं बाहर चला आता है या मर जाता है। मर जाने पर कान का मैल निकालने के लिए जो विधि निर्दिष्ट है, उसे करें ॥ ४२ ॥
जातुषं हेमरूपादिधातुजं च चिरस्थितम्। ऊष्मणा प्रायशः शल्यं देहजेन विलीयते ॥ ४३ ॥
शरीर में शल्य का विलयन—लाख, सोना, चाँदी आदि से सम्बन्धित शल्य यदि छोटे हों और बहुत समय तक शरीर में पड़े रह गये हों तो वे शरीर सम्बन्धी गर्मी से स्वयं ही पिघल जाते हैं ॥ ४३ ॥
मुद्रेणुदारुशुङ्गास्थितव्तालोपलानि न । विषाणवेण्वयस्तालदारुशल्यं चिरादपि ॥ ४४ ॥ प्रायो निर्भुज्यते तद्धि पचत्याशु पलासुजी।
विलीन न होने वाले शल्य—मिट्टी, वेणु ( बाँस ), लकड़ी, साँग, अस्थि ( हड्डी ), दांत, बाल, विषाण ( हाथीदांत ), वेणु ( ईख का छिलका ), लोह, ताड़ तथा दारु ( कच्चा लोहा या पीतल, देखें—वी. एस्. आर्प्टे-कोश ) इनके शल्य भले ही कुछ समय के बाद टेढ़े तो हो जाते हैं परन्तु विलीन नहीं होते। ये शल्य अपने द्वारा रक्त एवं मांस पका देते हैं ॥ ४४ ॥
बक्तव्य—'मुद्रेणु'...'पलासुजी'। यहाँ तक कुछ संस्करणों में ४ पंक्तियाँ हैं, वहाँ दूसरी पंक्ति इस प्रकार है—'शल्यानि न विशीर्यन्ते शरीरे मुन्मयानि'। यह पंक्ति अन्य संस्करणों में सम्भवतः इसलिए नहीं ली गयी कि इसका ग्रहण करने से 'मुद्' एवं 'मुन्मय' दोनों एकार्थवाची शब्दों का ग्रहण हो रहा था, किन्तु 'न विशीर्यन्ते' यह क्रिया इसके अभाव में दुर्लभ हो रही है। श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमाद्रि टीका युक्त वाग्भट में जिन तीन पंक्तियों का ग्रहण किया है, उनमें 'विषाण, वेणु तथा दारु' इन तीन शब्दों की पुनरक्ति हो रही है। हमने महर्षि वाग्भट की सदाशयता को ध्यान में रखकर उनके दूसरे अर्थ दिये हैं। इस दृष्टि से अष्टांगसंग्रह-सूत्रस्थान ३७।२७-२८ श्लोक निर्घन्त हैं। इसी प्रकार सु.सू. २६।२२ पद्य भी इस प्रसंग में अनुकरणीय है।
शल्ये मांसावगाढे चेत्स देशो न विदह्यते ॥ ४५ ॥
ततस्तं मर्दनस्वेदशुद्धिकर्षणबुंहणेः । तीक्ष्णोपनाहपानाश्रयनशस्त्रपदाङ्गनैः ॥ ४६ ॥ पाचयित्वा हरेच्छल्यं पाटनैषणभेदनैः।
शल्य-निर्हरणोपाय—जब शल्य मांसल प्रदेश में घँसा हो और घँसने के बाद भी उसमें विदाह आदि पाक के लक्षण न दिखायी दे रहे हों तो उस स्थान पर मसल्ला, स्वेदन, शोधनों ( वमन-विरंजन आदि ) द्वारा कर्षणकर्म, बुंहणकर्म, तीक्ष्ण उपनाह ( जिससे उसका शीघ्र पाक हो ), उचित पेय पदार्थों को पिलाना, आहारों को खिलाना तथा शस्त्र द्वारा सघन पदांकन ( पच्छ लगाना ) आदि विधियों से उसे पकाने का प्रयत्न करना चाहिए। पक जाने पर उस शल्य को निकालें। यदि इस प्रकार भी न निकले तो पाटन, एषण तथा भेदन क्रियाओं द्वारा शल्य को निकाल देना चाहिए ॥ ४५-४६ ॥
बक्तव्य—यहाँ 'पाटनैषणभेदनैः' ये क्रियाएँ उन आशुकारी शल्यों को निकालने के लिए हैं, जिनके शरीर में कुछ समय तक रह जाने से मृत्यु का भय होता है अथवा उस अवयव को काट देना पड़ता है। शेष के लिए तो पकाकर निकालने का शास्त्र ने आदेश दिया ही है। देखें—सू. सू. २७।२७।
शल्यप्रदेशयन्त्राणामवेक्ष्य बहुरुपताम् ॥ ४७ ॥
तैस्तैरुपायैर्मतिमान् शल्यं विद्यातथाऽऽहरेत्।
इति श्रीवेद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गद्वयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने शल्याहरणविधिर्नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
३१४
अष्टाङ्गहृदये
शल्यनिर्हरण-निर्देश—शल्यों की, शरीर के अवयवों की तथा शल्य निकालने वाले यन्त्रों की विविधरूपता का ध्यान रखकर उन-उन शल्य निकालने के उपायों का प्रयोग कर जो जैसा शल्य हो उसे उस प्रकार निकालना चाहिए ॥ ४७ ॥
वक्तव्य—सुश्रुत ने मूलतः शल्यों का विभाजन दो प्रकार से किया है—१. अवबद्ध ( जो मांस-अस्थि आदि में फँसा हो और दूसरा ) २. अनवबद्ध ( जो प्रथम के विपरीत हो )। इनमें दूसरे प्रकार के शल्यों को निकालने के पन्द्रह उपायों का इस प्रकार उल्लेख किया है—१. स्वभाव, २. पाचन, ३. भेदन, ४. दारण, ५. पीडन, ६. प्रमार्जन, ७. निर्धमपन, ८. वमन, ९. विरेचन, १०. प्रक्षालन, ११. प्रतिमर्श ( यह नस्य वाला नहीं है, इसमें अँगुली आदि से घिसा जाता है ), १२. प्रवाहण ( गर्भशल्य में इसका उपयोग होता है ), १३. आनूषण ( पृथ्यशल्य को निकालने में ), १४. अयस्कात्त ( चुम्बक ) और १५. हर्ष ( शोकशल्य को दूर करने के लिए )। अष्टांगसंग्रह में शल्य रहित व्रण का लक्षण इस प्रकार दिया है—'व्रणस्थान स्वच्छ हो, उसके आसपास दबाने में कष्ट न हो, शोथ तथा सन्ताप घट रहा हो तो अब व्रणस्थान में शल्य नहीं है, ऐसा समझ लेना चाहिए। देखें—अ. सं. सू. ३७।३२।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान में शल्याहरणविधि नामक अष्टाईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २८ ॥
एकोनत्रिशोऽध्यायः
अथातः शस्त्रकर्मविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षेयः ।
अब हम यहाँ से शस्त्रकर्मविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—अब यहाँ से शस्त्रकर्मविधि नामक अध्याय की प्रस्तावना की जा रही है। क्योंकि इसके पहले २५वें अध्याय में वारभट ने 'शस्त्रेण वा विशस्यादौ' कहकर शस्त्रकर्म की उपादेयता का निर्देश किया है। अतएव इस अध्याय में शस्त्रकर्म का विधान प्रस्तुत है।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—सु.सू. ५, १७, १८, १९, २५; च.चि. २५।५५ से ६० तक तथा अ.सं.सू. ३८ में देखें।
ब्रणः सज्जायते प्रायः पाकाच्छ्रयथुपूर्वकात्। तमेवोपचरेत्समाद्रक्षन् पाकं प्रयलतः ॥ १ ॥ सुशीतलेपसेकाद्रमोक्षसंशोधनादिभिः ।
ब्रण के उपचार—प्रायः ब्रण की उत्पत्ति के पहले स्थान-विशेष पर शोथ होता है। सर्वप्रथम उस ब्रणोत्पादक शोथ की ही चिकित्सा करनी चाहिए, जिससे वह शोथ फोड़ा का रूप धारणकर पकने न पाये।
ब्रणशोथ-चिकित्सा—उस ब्रणशोथ को बैठाने के लिए शीतल लेप, शीतल सेचन, रक्तप्रावण तथा शोधन ( वमन-विरचन ) आदि उपायों का प्रयोग करें। यहाँ शीतल का अर्थ है—शीतवीर्य पदार्थ, जो स्पर्श में भी शीत हो ॥ १ ॥
वक्तव्य—ब्रण के सम्बन्ध में ऊपर जो सुश्रुत के अध्यायों का निर्देश किया है, उनके अतिरिक्त सु.सू. २१, २२, २८ अध्यायों का भी अवलोकन कर लें। शेष देखें—अ.हू.उ. २५ में। इसकी प्रस्तावना यहाँ केवल इस उद्देश्य से की है कि ब्रणशोथ के दर्शन होते ही उसकी शान्ति के उपाय करने चाहिए, क्योंकि ब्रणशोथ का पाक हो जाने पर अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है।
शोफोऽल्पोऽल्पोष्मरुक्सामः सवर्णः कठिनः स्थिरः ॥ २ ॥
आमशोथ के लक्षण—आमशोथ ( जो शोथ अभी पका नहीं ) उसे कहते हैं जिसमें थोड़ी-थोड़ी ऊष्मता ( गर्मी ) और पीड़ा होती हो, जिसका वर्ण त्वचा के समान हो, जो स्पर्श करने में कठिन ( कड़ा ) तथा स्थिर ( अचल ) हो ॥ २ ॥
वक्तव्य—इसी ब्रणशोथ को बैठाने ( न पकने ) के लिए विम्लापन, सुशीतल लेप, सेक, रक्तमोक्षण, संशोधन आदि का निर्देश ऊपर श्लोक १ में दिया गया है, न कि पच्यमान ब्रणशोथ में।
पच्यमानो विवर्णस्तु रागी बस्तिरिवाततः। स्फुटतीच सनिस्तोदः साङ्गमर्दविजृम्भिकः ॥ ३ ॥ संरम्भारुचिदाहोपातृइवरात्रिन्द्रतान्तिः। स्यान् विध्यन्द्यत्याज्यं ब्रणवत्स्पर्शनासहः ॥ ४ ॥
पच्यमान ब्रणशोथ के लक्षण—जब पच्यमान वह शोथ फोड़ा का रूप धारण करने लगता है तो वहाँ की त्वचा का वर्ण विशिष्ट वर्ण का हो जाता है। उसमें कुछ लालिमा दिखलायी देती है और वह बस्ति ( भरी हुई मशक ) की भाँति तन जाता है। उसमें ऐसी पीड़ा होती है मानो वह फूट रहा हो, उस समय अन्य सभी अंगों में पीड़ा होती है और जैभाइयों आने लगती हैं। और भी अनेक प्रकार की