भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

अठारहवाँ प्रकरण । ३६५

मूलम् । भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते । भावेषु गलिता यस्य शोभनाऽऽशोभना मतिः ॥ ९१ ॥

पदच्छेदः । भिक्षुः, वा, भूपतिः, वा, अपि, यः, निष्कामः, सः, शोभते, भावेषु, गलिता, यस्य, शोभनाऽशोभना, मतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भावेषु=सब भावों मेंयः=जो
गलिता=गलित हुई हैसः=वह
शोभनाऽऽशोभना=श्रेष्ठ, अश्रेष्ठशोभते=शोभायमान होता है
मतिः=बुद्धिवा=चाहे
यस्य=जिसकीभिक्षु=भिक्षु हो
तस्मात्=इसीलियेअपि=और
निष्कामः=कामना-रहित हैवा=चाहे
भूपतिः=राजा हो ॥

भावार्थ । जिस विद्वान् की उत्तम पदार्थों में इच्छा-बुद्धि नहीं है, और अनुत्तम पदार्थों में दोष-बुद्धि नहीं है, ऐसा जो निष्काम है, वह चाहे भिक्षुक हो, अथवा राजा हो, संसार में वही शोभा को प्राप्त होता है । राजाओं में निष्काम जनक और श्रीरामचन्द्रजी हुए हैं, जिनके यश को आज तक संसार में लोग गान करते हैं । और विरक्तों में जड़भरत, दत्तात्रेय और याज्ञवल्क्य आदि हुए हैं, जिनके शुद्ध चरित्र हस्तामल-कवत् सबकी दृष्टि में दिखाई दे रहे हैं ॥ ९१ ॥

३६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् । क्व स्वाच्छन्द्यं क्व संकोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः ।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥

पदच्छेदः । क्वः, स्वाच्छन्द्यम्, क्व, संकोचः, वा, तत्त्वविनिश्चयः,
निर्व्याजार्जवभूतस्य, चरितार्थस्य, योगिनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निर्व्याजार्जव-भूतस्य =निष्कपट और सरल-रूपस्वाच्छन्द्यम् =स्वतन्त्रता है
क्व =कहाँ
च =औरसंकोचः =संकोच है
चरितार्थस्य =यथोचितवा =अथवा
योगिनः =योगी कोक्व =कहाँ
क्व =कहाँतत्त्वविनिश्चयः =तत्त्व का निश्चय है ॥

भावार्थ । जो निष्कपट योगी है, कोमल स्वभाववाला है, आत्म-निष्ठावाला है, पूर्णार्थी है, स्वेच्छा-पूर्वक आचारवाला है, उसको संकोच कहाँ है ? और वृत्त्यादि संचरण कहाँ है ? उसको कर्तृ त्व कहाँ है ? कहीं नहीं है; क्योंकि पदार्थों में उसका अध्यास नहीं है ॥ ९२ ॥

मूलम् । आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना ।
अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते ॥ ९३ ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३६७

पदच्छेदः ।

आत्मविश्रान्तितृप्तेन, निराशेन, गतार्तिना, अन्तः, यत्, अनुभूयेत, तत्, कथम्, कस्य, कथ्यते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आत्मविश्रान्ति-तृप्तेन =$\Big{$ आत्मा में विश्राम कर तृप्त हुएयत् =जो
अनुभूयेत =अनुभव होता है
च =औरतत् =सो
निराशेन =आधार-रहित हुएकस्य =$\Big{$ किस याने किस अधिकारी के प्रति
गतार्त्तिना =ज्ञानी केकथम् =कैसे
अन्तः =अभ्यन्तरकथ्यते =कहा जावे ॥

भावार्थ ।

जो विद्वान् अपने आत्मा में तृप्त है, वह शान्त है; संसार से निराश है । जो आनन्द वह अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है; वह उस आनन्द को लोगों के प्रति कह नहीं सकता है । क्योंकि उसके तुल्य दूसरा कोई आनन्द उसको नहीं मिलता है ।

दृष्टांत—एक कुमारी कन्या ने विवाहिता कन्या से पूछा कि पति के साथ संभोग में कैसा आनन्द है ? उसने कहा; वह आनन्द मैं कह नहीं सकती हूँ । उस आनन्द की उपमा कोई नहीं है । जब तू विवाही जावेगी; तब आप ही तू जान लेगी । क्योंकि वह स्वसंवेद्य है वैसे ज्ञानवान् का आनंद भी स्वसंवेद्य है; वह वाणी द्वारा कहा नहीं जा सकता है ॥ ९३ ॥

३६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च ।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ ९४ ॥

पदच्छेदः ।

सुप्तः, अपि, न, सुषुप्तौ, च, स्वप्ने, अपि, शयितः, न, च, जागरे, अपि, न, जागर्ति, धीरः, तृप्तः, पदे, पदे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धीरः= ज्ञानीअपि= भी
सुषुप्तौ= सुषुप्ति में= नहीं
सुप्तः= सुप्तवान् हैअपि= भी
= और= नहीं
स्वप्ने= स्वप्न मेंजागर्ति= जागता है
अपि= भीअतएव= इसी लिये
= नहींसः= वह
शयितः= सोया हुआ हैपदेपदे= क्षण-क्षण में
= औरतृप्तः= तृप्त है ॥
जागरे= जाग्रत् में

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त विद्वान् सुषुप्ति के होने पर भी सुषुप्तिवाला नहीं होता है। और स्वप्न अवस्था के प्राप्त होने पर भी वह स्वप्न अवस्थावाला नहीं होता है। जाग्रत् अवस्थाओं में जागता हुआ भी वह जागता नहीं है। क्योंकि तीनों अवस्थाओंवाली जो बुद्धि है; उसका वह साक्षी होकर उससे पृथक् है ॥ ९४ ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३६९

मूलम् ।

ज्ञः सचिन्तोऽपिनिश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपिनिरिन्द्रियः । सबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहंकारोऽनहंकृति ॥ ९५ ॥

पदच्छेदः ।

ज्ञः, सचिन्तः, अपि, निश्चिन्तः, सेन्द्रियः, अपि, निरिन्द्रियः, सबुद्धिः, अपि, निर्बुद्धिः, साहंकारः, अनहंकृतिः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
ज्ञः = ज्ञानीसबुद्धिः = बुद्धि-सहित
सचिन्तः = चिन्ता-रहितअपि = भी
अपि = भीनिर्बुद्धिः = बुद्धि-रहित है
निश्चिन्तः = चिन्ता-रहित हैसाहंकारः = अहंकार-सहित
सेन्द्रियः = इन्द्रियों-सहितअपि = भी
अपि = भीअनहंकृतिः = अहंकार-रहित है ॥
निरिन्द्रियः = इन्द्रिय-रहित है

भावार्थ ।

ज्ञानवान् जीवन्मुक्त लोगों की दृष्टि में चिन्ता-युक्त प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में वह चिन्ता-रहित है । लोक-दृष्टि से वह इन्द्रियों के सहित है, वास्तव में वह निरिन्द्रिय है । लोगों की दृष्टि में वह बुद्धि-युक्त प्रतीत होता है; वास्तव में वह बुद्धि-रहित है । लोगों की दृष्टि में अहंकार के सहित है, वास्तव में वह अहंकार-रहित है । क्योंकि सर्वत्र ही उसकी आत्म-दृष्टि है । जो अपने आपमें आनन्द है, वह और किसी में देखता नहीं है ॥ ९५ ॥

३७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न संगवान् ।
न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किञ्चिन्नच किञ्चन ॥ ९६ ॥

पदच्छेदः ।

न, सुखी, न, च, वा, दुःखी, न, विरक्तः, न, संगवान्,
न, मुमुक्षुः, न, वा, मुक्तः, न, किञ्चित्, न, च, किञ्चन ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानीज्ञान
संगवान्संगवान् है
सुखीसुखी है
च वाऔरमुमुक्षुःमुमुक्षु है
न वाअथवा न
दुःखीदुःखी हैमुक्तःमुक्त है
नःनकिञ्चित्न कुछ है
विरक्तःविरक्त हैन चऔर न
किञ्चनकिंचन है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त ज्ञानी लोक-दृष्टि से तो वह विषय-भोगों द्वारा बड़ा सुखी प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में वह विषय जन्य सुख से रहित है और फिर लोक-दृष्टि से शारीरिकादिक रोग करके दुःखी भी प्रतीत होता है, परन्तु आत्म-दृष्टि से वह रोगादिकों से रहित ही है । क्योंकि अन्तःकरणादिकों के साथ उसका अध्यास नहीं रहा है ।

**प्रश्न—**अध्यास किसको कहते हैं ?

अठारहवाँ प्रकरण । ३७१

उत्तर-सत्यानृतवस्त्वभेदप्रतीतिरध्यासः । सत्य वस्तु और मिथ्या वस्तु की जो अभेद प्रतीति है, उसी का नाम अध्यास हैं, सो सत्य वस्तु आत्मा है, और मिथ्या वस्तु अन्तःकरण हैं, इन दोनों की अभेद प्रतीति अज्ञानी को होती है, इसी वास्ते अन्तःकरण के धर्म जो सुख-दुःखादिक हैं, उनको वह अपने में मानता है, इसी से वह सुखी-दुःखी होता है । ज्ञानी का अध्यास रहा नहीं इसी वास्ते वह सुख-दुःखादिकों को अन्तःकरण में मानता है, अपने में नहीं मानता है । इसी कारण वह सुख-दुःखादिकों से रहित ही रहता है । ऐसा जीवन्मुक्त विरक्त भी नहीं है, क्योंकि उसका विषयों में द्वेष नहीं है, और वह मुक्त भी नहीं है, क्योंकि प्रथम से ही उसको बन्ध नहीं है । यदि बन्ध होता, तब वह मुक्त भी होता । बन्ध उसको न था, न है, ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है ॥ ९६ ॥

मूलम् । विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान् । जाड्योऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः ॥ ९७ ॥

पदच्छेदः । विक्षेपे, अपि, न, विक्षिप्तः, समाधौ, न, समाधिमान्, जाड्यो, अपि, न, जडः, धन्यः, पाण्डित्ये, अपि, न, पण्डितः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धन्यः=ज्ञानीन=नहीं
विक्षेपे=विक्षेप मेंविक्षिप्तः=विक्षेपवान् है
अपि=भीसमाधौ=समाधि में

३७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

न=नहींजडः=जड़ है
समाधिमान्=समाधिवान् हैपाण्डित्ये=पंडिताई में
जाड्ये=जड़ता मेंअपि=भी
अपि=भीन=नहीं
न=नहींपण्डितः=पंडित है ॥

भावार्थ ।

संसार में ज्ञानवान् पुरुष धन्य है क्योंकि लोक-दृष्टि द्वारा उसको विक्षेप होने पर भी वह विक्षिप्त नहीं होता है । क्योंकि उसको स्वप्रकाश आत्मा का अनुभव हो रहा है, और लोक-दृष्टि करके वह समाधि में भी स्थित है । परन्तु वास्तव में वह समाधि में स्थित भी नहीं है, क्योंकि उसको कर्त्तृत्वाध्यास नहीं है । फिर वह लोक-दृष्टि द्वारा जड़ प्रतीत होता है, क्योंकि जड़ की तरह वह विचरता है । परन्तु वास्तव में वह आत्म-दृष्टि होने से जड़ नहीं है ।

फिर वह लोक-दृष्टि करके पंडित प्रतीत होता है, परन्तु वह पंडित भी नहीं है, क्योंकि उसको अभिमान नहीं है, इन्हीं हेतुओं से वह जीवन्मुक्त धन्य हैं ॥ ९७ ॥

मूलम् ।

मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः । समः सर्वत्र वैतृष्णान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ९८ ॥

पदच्छेदः ।

मुक्तः, यथास्थितिस्वस्थः, कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः, समः, सर्वत्र, वैतृष्णात्, न, स्मरति, अकृतम्, कृतम् ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३७३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मुक्तः= ज्ञानीसमः= सम है
यथास्थितस्वस्थः= कर्मानुसार यथा- प्राप्ति वस्तु में स्वस्थ चित्तवाला है= और
वैतृष्ण्यात्= तृष्णा के अभाव से
अकृतम्= नहीं किए हुए
कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः= किये हुए और करने-योग्य कर्म में संतोषवान्= और
कृतम्= किए हुए
कर्म= कर्म को
सर्वत्र= सर्वत्रन स्मरति= नहीं स्मरण करता है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त को प्रारब्ध के वश से जैसी स्थिति प्राप्त होती है, उसी में स्वस्थचित्तवाला ही वह रहता है । वह उद्वेग को कदापि नहीं प्राप्त होता है, और पूर्व किए हुए तथा आगे करनेवाले दोनों कर्मों में संतुष्ट चित्त ही रहता है, क्योंकि उसमें हठ अर्थात् आग्रह किसी प्रकार का भी नहीं है, इसी वास्ते वह किए हुए और न किए हुए कर्मों का स्मरण भी नहीं करता है ॥ ९८ ॥

मूलम् ।

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति ।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ ९९ ॥

पदच्छेदः ।

न, प्रीयते, वन्द्यमानः, निन्द्यमानः, न, कुप्यतिः, न, एव, उद्विजति, मरणे, जीवने, न, अभिनन्दति ॥

३७४अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानी= ज्ञानी= और
वन्द्यमानः= स्तुति किया हुआमरणे= मरण में
= नहींन व= कभी नहीं
प्रीयते= प्रसन्न होता हैउद्विजति= उद्वेग करता है
= और= और
निन्द्यमानः= निन्दा किया हुआजीवने= जीवन में
= नहीं= नहीं
कुप्यति= कोप करता हैअभिनन्दति= हर्ष करता है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त ज्ञानी इतर पुरुषों द्वारा स्तुति को प्राप्त हुआ भी हर्ष को नहीं प्राप्त होता है, और इतर पुरुषों द्वारा निन्दा किया हुआ भी क्रोध को नहीं प्राप्त होता है; और मृत्यु के आने पर भी वह भय को भी नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि उसकी दृष्टि में आत्मा नित्य है; जन्म-मरण कोई वस्तु नहीं है । उसको अधिक जीने की न इच्छा है, न मरने का शोक है, वह सदा एकरस है ॥ ९९ ॥

मूलम् ।

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः ।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १०० ॥

पदच्छेदः ।

न, धावति, जनाकीर्णम्, न, अरण्यम्, उपशान्तधीः, यथा, तथा, यत्र, तत्र, समः, एव, अवतिष्ठते ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३७५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
उपशान्तधीः =शान्त बुद्धिवाला पुरुषअरण्यम् =वन के सम्मुख
न =धावति =दौड़ता है
जनाकीर्णम् =मनुष्यों से व्याप्त देश के सम्मुखपरन्तु =परन्तु
यत्र तत्र =जहाँ है नहीं
च =औरसमः एव =समभाव से ही
न =अवतिष्ठते =स्थित रहता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! जो जीवन्मुक्त शान्तचित्त है, वह जनों द्वारा भरे पुरे देश को भी नहीं दौड़ता है, क्योंकि उसके साथ उसका राग नहीं, और वन की ओर भी नहीं दौड़ता है, क्योंकि मनुष्यों के साथ उसका द्वेष नहीं है, जहाँ तहाँ वन में अथवा नगर में वह स्वस्थचित्त होकर एकरस ज्यों का त्यों ही रहता है ॥ १०० ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीताभाषाटीकायां शान्तिशतकं नामाष्टा-
दशप्रकरणं समाप्तम् ॥

—:०:—

उन्नीसवाँ प्रकरण (आत्मविश्राम)

उन्नीसवाँ प्रकरण।

—:०:—

मूलम्।

तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १ ॥

पदच्छेदः।

तत्त्वविज्ञानसंदंशम्, आदाय, हृदयोदरात्, नानाविध-परामर्शशल्योद्धारः, कृतः, मया ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भवतः= आपसेनानाविधपरामर्शशल्योद्धारः= नाना प्रकार के विचार-रूपबाण का उद्धार
तत्त्वविज्ञानसंदंशम्= तत्त्वज्ञानरूप संसी कोमया= मुझ करके
आदाय= ले करकेकृतः= किया गया है ॥
हृदयोदरात्= हृदय और उदर से

भावार्थ।

अब एकोनविंशति प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
शिष्य गुरु के मुख से तत्त्व-ज्ञानी की स्वाभाविक शान्ति को श्रवण करके, अपने को कृतार्थ मानकर, अब गुरु के तोष के लिये अपनी शान्ति को आठ श्लोकों द्वारा कहता है।
हे गुरो! मैंने आपके सकाश से तत्त्वज्ञान के उपदेश की संसीरूपी शास्त्र द्वारा अपने हृदय से नाना प्रकार के संकल्पों और विकल्पों को निकाल दिया है ॥ १ ॥

उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७७

मूलम् ।

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेककता ।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेककता,
क्व, द्वैतम्, क्व, च, वा, अद्वैतम्, स्वमहिम्न, स्थितस्य, मे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वमहिम्नि= अपनी महिमा में= और
स्थितस्य= स्थित हुएक्व= कहाँ
मे= मुझकोअर्थः= अर्थ है ?
क्व= कहाँवा= अथवा
धर्मः= धर्म है ?क्व= कहाँ
= औरद्वैतम्= द्वैत है ?
क्व= कहाँवा= अथवा
कामः= काम है ?क्व= कहाँ
अद्वैतम्= अद्वैत है ?

भावार्थ ।

शिष्य कहता है कि मेरे को धर्म कहाँ है ? और काम कहाँ है ? मैंने धर्म, अर्थ, और काम को अपने हृदय से निकाल दिया है । क्योंकि ये सब विनाशी हैं, और जो मैं अपनी महिमा में स्थित हूँ, तो मेरे को विवेक कहाँ ? विवेक से भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है, और चेतन आत्मा में जो विश्रान्ति को प्राप्त हुआ है, उसको द्वैत और अद्वैत से भी कुछ प्रयोजन नहीं है ।

३७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

दृष्टांत-उत्तीर्णे तु गते पारे नौकायाः किं प्रयोजनम्। जब कि पुरुष नदी के परलेपार उतर जाता है, तब नौका का भी कुछ प्रयोजन नहीं रहता है। इसी तरह द्वैत का जब आत्मज्ञान करके बाध हो जाता है, तब फिर द्वैत के साथ अद्वैत का भी कुछ प्रयोजन नहीं रहता है, क्योंकि अद्वैत भी द्वैत की अपेक्षा करके कहा जाता है। जब द्वैत न रहा, तब अद्वैत कहना भी व्यर्थ ही है। इस वास्ते द्वैत और अद्वैत दोनों मेरे में नहीं हैं ॥ २ ॥

मूलम् । क्व भूतं भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा । क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ३ ॥

पदच्छेदः । क्व, भूतम्, क्व, भविष्यत्, वा, वर्तमानम्, अपि, क्व, वा, क्व, देशः, क्व, च, वा, नित्यम्, स्वमहिम्नि, स्थितस्य, मे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
नित्यम्= नित्यभविष्यत्= भविष्यत् है ?
स्वमहिम्नि= अपनी महिमा मेंवा= अथवा
स्थितस्य= स्थित हुएक्व= कहाँ
मे= मुझकोवर्तमानम् अपि= वर्तमान भी है ?
क्व= कहावा= अथवा
भूतम्= भूत है ?क्व= कहाँ
क्व= कहाँदेशः= देश है ?

भावार्थ । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! काल का भी मेरे को स्फुरण

उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७९

नहीं होता है । मेरी दृष्टि में भूत, भविष्यत्, और वर्तमान कोई नहीं हैं; और न कोई देश है । क्योंकि मैं नित्य अपनी महिमा में ही स्थित हूँ और सबमें मेरी एक आत्मदृष्टि है ॥ ३ ॥

मूलम् । क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा । क्व चिन्ताक्व चवा ऽचिन्तास्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥४ ॥

पदच्छेदः । क्व, च, आत्मा, क्व, च, वा, अनात्मा, क्व, शुभम्, क्व, अशुभम्, तथा, क्व, चिन्ता, क्व, च, वा, अचिन्ता, स्व- महिम्नि, स्थितस्य, मे ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । स्वमहिम्नि = अपनी महिमा में | शुभम् = शुभ है ? स्थितस्य = स्थित हुए | क्व = कहाँ मे = मुझको | अशुभम् = अशुभ है क्व = कहाँ | तथा = और आत्मा = आत्मा है ? | क्व = कहाँ च = और | चिन्ता = चिन्ता है ? वा = अथवा | वा = अथवा क्व = कहाँ | क्व = कहाँ अनात्मा = अनात्मा है ? | अचिन्ता = अचिन्ता है ? क्व = कहाँ |

भावार्थ । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! अपनी महिमा में स्थित जो मैं हूँ, मेरी दृष्टि में आत्मा कहाँ ? और अनात्मा कहाँ

३८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है ? अर्थात् आत्मा और अनात्मा का व्यवहार अज्ञानी मूर्ख की दृष्टि में होता है। और शुभ कहाँ है ? और अशुभ कहाँ है ? चिन्ता और अचिन्ता कहाँ है ? किन्तु केवल चेतन ही अपनी महिमा में स्थित है ॥४॥

मूलम् ।

क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा । क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥५॥

पदच्छेदः ।

क्व, स्वप्नः, क्व, सुषुप्तिः, वा, क्व, च, जागरणम्, तथा, क्व, तुरीयम्, भयम्, वा, अपि, स्वमहिम्नि, स्थितस्य, मे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वमहिम्नि= अपनी महिमा मेंतथा= और
स्थितस्य= स्थित हुएजागरणम्= जाग्रत् है ?
मे= मुझकोक्व= कहाँ
क्व= कहाँतुरीयम्= तुरीय है ?
स्वप्नः= स्वप्न है ?अपि= और
= औरवा= अथवा
वा= अथवाक्व= कहाँ
क्व= कहाँभयम्= भय है ?
सुषुप्तिः= सुषुप्ति है ?

भावार्थ ।

हे गुरो ! मेरी दृष्टि में जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति ये तीनों अवस्थाएँ भी नहीं हैं; क्योंकि ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धि के धर्म हैं, सो बुद्धि ही मिथ्या भान होती है। तुरीय अवस्था

उन्नीसवाँ प्रकरण । ३८१

कहाँ है ? और भय कहाँ है ? और अभय कहाँ है ? ये सब
अन्तःकरण के ही धर्म हैं, सो अन्तःकरण ही मिथ्या है ॥ ५ ॥

मूलम् ।

क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा ।
क्वस्थूलंकवचवा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, दूरम्, क्व, समीपम्, वा, बाह्यम्, क्व, आभ्यन्तरम्,
क्व, वा, क्व, स्थूलम्, क्व, च, वा, सूक्ष्मम्, स्वमहिम्नि,
स्थितस्य, मे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वमहिम्नि= अपनी महिमा मेंसमीपम्= समीप है ?
स्थितस्य= स्थित हुए= और
मे= मुझकोक्व= कहाँ
क्व= कहाँअभ्यन्तरम्= आभ्यन्तर है ?
दूरम्= दूर है ?= और
= औरक्व= कहाँ
क्व= कहाँस्थूलम्= स्थूल है ?
बाह्यम्= बाह्य है ?= और
= औरक्व= कहाँ
क्व= कहाँसूक्ष्मम्= सूक्ष्म है ?

भावार्थ ।

मेरे में दूर कहाँ है ? समीप कहाँ है ? बाह्य कहाँ है? अन्तर

३८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

कहाँ है ? स्थूल कहाँ है ? सूक्ष्म कहाँ है ? जो सर्वत्र परिपूर्ण है, उसमें कुछ भी नहीं बनता है ॥ ६ ॥

मूलम् ।

क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम् । क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, मृत्युः, जीवितम, वा, क्व, लोकाः, क्व, अस्य, क्व, लौकिकम्, क्व, लयः, क्व, समाधिः, वा, स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वमहिम्नि= अपनी महिमा मेंलोकाः= भू आदि लोक है ?
स्थितस्य= स्थित हुएअस्य= इस मुझ ज्ञानी को
मे= मुझकोक्व= कहाँ
क्व= कहाँलौकिकम्= लौकिक व्यवहार है ?
मृत्युः= मृत्यु है ?क्व= कहाँ
वा= अथवालयः= लय है ?
क्व= कहाँवा= अथवा
जीवितम्= जीवित है ?क्व= कहाँ
क्व= कहाँसमाधि= समाधि है ?

भावार्थ ।

मृत्यु कहाँ है ? और जीवन कहाँ है ? आत्मा तीनों कालों में एकरस ज्यों का त्यों अपनी महिमा में स्थित है । उसमें जन्म कहाँ ? मरण कहाँ ? लोक कहाँ ? लोकों में

उन्नीसवाँ प्रकरण । ३८३

होनेवाले पदार्थ कहाँ हैं ? लय कहाँ है ? और समाधि कहाँ ? अपनी महिमा में जो स्थित है, उसमें लयादिक भी तीनों कालों में नहीं है ॥ ७ ॥

मूलम् । अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाऽप्यलम् । अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥

पदच्छेदः । अलम्, त्रिवर्गकथया, योगस्य, कथया, अपि, अलम्, अलम्, विज्ञानकथया, विश्रान्तस्य, मम, आत्मनि ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आत्मनि=आत्मा मेंयोगस्य=योग की
विश्रान्तस्य=विश्रान्त हुएकथया=कथा से
मम=मुझकोअलम्=पूर्णता है
त्रिवर्गकथया=धर्म, अर्थ और काम की कथा से=और
अलम्=पूर्णता है ?विज्ञानकथया=विज्ञान की कथा से भी
अलम्=पूर्णता है ॥

भावार्थ । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनकी कथाओं से, योग की कथाओं से विज्ञान की कथाओं से भी कुछ प्रयोजन नहीं है । क्योंकि मैं आत्मा में विश्रान्ति को प्राप्त हुआ हूँ ॥ ८ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायामेकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ।

—:०:—

बीसवाँ प्रकरण (जीवन्मुक्त-स्वरूप)

बीसवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः ।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, भूतानि, क्व, देहः, वा, क्व, इन्द्रियाणि, क्व, वा, मनः, क्व, शून्यम्, क्व, च, नैराश्यम्, मत्स्वरूपे, निरञ्जने ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
निरञ्जने = निरञ्जनइन्द्रियाणि = इन्द्रियाँ हैं ?
मत्स्वरूपे = मेरे स्वरूप मेंवा = अथवा
क्व = कहाँक्व = कहाँ
भूतानि = आकाशादि भूत हैं ?मनः = मन है ?
क्व = कहाँक्व = कहाँ
देहः = देह है ?शून्यम् = शून्य है ?
वा = अथवाक्व = कहाँ
क्व = कहाँनैराश्यम् = आकाश का अभाव है ? ॥

भावार्थ ।

अब बीसवें प्रकरण का आरंभ करते हैं—
विद्वानों की स्वभाव-भूत जो जीवन्मुक्ति दशा है, उसको अब चौदह श्लोकों करके इस प्रकरण में निरूपण करते हैं—