भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

अध्याय ४६ अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस अद्भुतभक्तिरस अद्भुतभक्तिरस की अनुभूति दो प्रकार से होती है—प्रत्यक्ष रूप से अपनी आँखों के अनुभव के द्वारा और परोक्ष रूप से दूसरों से सुनकर । जब नारदजी द्वारका में भगवान् की लीलाओं को देखने आये तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण उसी रूप में अनेक महलों में विराजमान हैं और नाना क्रियाएँ कर रहे हैं। यह सब देखकर वे आश्चर्यचकित रह गये । यह साक्षात् अद्भुतभक्तिरस का उदाहरण है। यशोदा मैया की एक सखी ने कहा, "हे यशोधरे ! जरा इस आनन्द को तो देखो ! एक ओर तो तुम्हारा नन्हा सा बालक है जो सदा तुम्हारा स्तनपान करने को मुग्ध रहता है और दूसरी ओर यह विशाल गोवर्धन पर्वत है जो गगन को छू रहा है। फिर भी देखो कैसा आश्चर्य है कि यह महान् गोवर्धन तुम्हारे पुत्र के नन्हे हाथ की उँगली पर ठहरा हुआ है, मानो कोई खिलौना हो। क्या यह महान् विस्मय की बात नहीं है ?" यह भी साक्षात् अद्भुतभक्तिरस का दृष्टान्त है। परोक्ष अद्भुतभक्तिरस का अनुभव महाराज परीक्षित को हुआ जब उन्होंने शुकदेव गोस्वामी के मुख से श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध का वर्णन सुना, जो ग्यारह अक्षौहिणी सेना के साथ श्रीकृष्ण के साथ युद्ध कर रहा था। एक अक्षौहिणी सेना में हजारों हाथी, हजारों घोड़े और रथ तथा लाखों सैनिक रहते हैं। नरकासुर के पास ऐसी ग्यारह अक्षौहिणी सेना थी और वे सब श्रीकृष्ण पर बाण चला रहे थे। परन्तु फिर भी श्रीकृष्ण ने अपनी ओर से केवल तीन बाण चलाकर उन सबका नाश कर दिया। जब महाराज परीक्षित ने इस अद्भुत विजय को सुना तो वे तुरन्त अपने नेत्रों से विगलित अश्रुधारा को पोंछते हुए हर्षातिरेक में मग्न हो गये। यह सुनने से होने वाला परोक्ष अद्भुतभक्तिरस है।

अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [ ३२१ परोक्ष अद्भुत भक्तिरस का एक अन्य उदाहरण इस प्रकार है— यह परीक्षा कर देखने के लिये कि क्या श्रीकृष्ण वास्तव में भगवान् हैं, ब्रह्माजी ने उनके सारे गोपबालकों और गायों को चुरा लिया। परन्तु कुछ ही क्षण बाद उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण अब भी अपने सब गोपबालकों, गायों और बछड़ों के साथ ठीक पहले के ही समान क्रीड़ा कर रहे हैं। जब उन्होंने अपने सत्यलोकवासियों को यह घटना सुनाई तो वे सब के सब चकित रह गये। ब्रह्मा ने बताया कि बालकों का हरण करने पर भी उन्होंने श्रीकृष्ण को फिर उसी प्रकार उन्हीं बालकों के साथ खेलते हुए देखा है। उनके शरीर का वर्ण प्रायः श्रीकृष्ण के जैसा श्यामल था। वे सब चतुर्भुजधारी थे। वे ही सब बछड़े और गायें पहले की भाँति वहाँ थे। इस घटना का वर्णन करते-करते ब्रह्मा प्रायः आप्यायित हो गये और आगे कहने लगे कि सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि अन्य अनेक ब्रह्माण्डों से भिन्न-भिन्न ब्रह्मा वहाँ श्रीकृष्ण और उनके पार्षदों की आराधना के लिये आए हुए थे। इसी प्रकार जब भाण्डीर वन में आग लगी तो श्रीकृष्ण ने अपने सखाओं को अपनी-अपनी आँखें मींच लेने की आज्ञा दी। फिर जब श्रीकृष्ण ने अग्नि को बुझा दिया और गोपबालकों ने अपनी आँखें खोलीं तो देखा कि वे अग्नि के भय से बच गये हैं, उनका गोधन और बछड़े सब सुरक्षित हैं। श्रीकृष्ण द्वारा अपनी रक्षा हुई देखकर वे आश्चर्य में भर गये। यह भी अद्भुतभक्तिरस की अनुभूति का उदाहरण है। जो हृदय को प्रिय हो उसकी तनिक सी असाधारण क्रिया भी विस्मय को उत्पन्न करने वाली होती है। परन्तु अप्रिय की एकदम अलौकिक क्रिया भी विस्मय को जन्म नहीं देती। प्रेम के कारण ही किसी अद्भुत क्रिया की मन पर छाप पड़ती है। वीरभक्तिरस जब भगवान् के लिये प्रेम और भक्ति के कारण एक विशेष प्रकार का वीरतापूर्ण उत्साह होता है तो परिणाम में होने वाली क्रियाओं को वीररस कहते हैं। उनकी अभिव्यक्ति युद्धवीरता, कामवीरता, दयावीरता और धर्मवीरता—इन चार रूपों में होती है। इन सब प्रकार की वीररस की क्रियाओं के श्रीकृष्ण आलम्बन हैं। जब कोई सखा किसी वीररस की क्रिया से श्रीकृष्ण को संतुष्ट करना चाहता है तो श्रीकृष्ण को विरोधी समझ कर वह स्वयं उन्हें चुनौती

३२२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु देता है। अथवा श्रीकृष्ण स्वयं तो ऐसे युद्ध को देखते हैं और उनकी इच्छा से अन्य सखा विरोधी की भूमिका निभाता है। किसी सखा ने एक बार श्रीकृष्ण को चुनौती देते हुए कहा, "हे माधव ! तुमको अपने कभी न हारने का बड़ा अभिमान हो चला है। परन्तु यदि तुम यहाँ से भागो नहीं तो मैं तुमको हरा कर दिखा दूँगा और इससे मेरे सब मित्रों को बड़ा सन्तोष होगा।" श्रीकृष्ण और श्रीदामा बड़े अन्तरंग सखा थे। फिर भी श्रीदामा ने क्रोधवश उन्हें ललकारा। जब वे दोनों आपस में लड़ने लगे तो यमुना तट पर खड़े अन्य सखाओं ने दो मित्रों में होने वाले इस अद्भुत युद्ध का आनन्द लिया। वे युद्ध-अभिनय के लिये कुछ बाण बनाने लगे और श्रीकृष्ण उन्हें श्रीदामा के ऊपर छोड़ने लगे। श्रीदामा अपनी लाठी को घुमा- घुमाकर उन बाणों को बचाता और इस प्रकार श्रीदामा की वीररसमयी क्रियाओं से श्रीकृष्ण को बड़ा आनन्द हुआ। ऐसा युद्ध प्रायः वीरपुरुषों में हुआ करता है जिससे सब देखने वालों को बड़ी अद्भुत उत्तेजना होती है। 'हरिवंश' में उल्लेख है कि कभी-कभी जब कुन्ती की उपस्थिति में अर्जुन और श्रीकृष्ण आपस में लड़ते तो अर्जुन श्रीकृष्ण से परास्त हो जाता। मित्रों में होने वाले इस प्रकार के वीर युद्धों में कभी-कभी आत्म- श्लाघा, ताल ठोकना, गर्व, बल, अस्त्रों का उठाना, पैंतरे बाजी, एक दूसरे को ललकारना आदि होते हैं। ये सब वीरभक्तिरस के उद्दीपन हैं। एक मित्र ने श्रीकृष्ण को चुनौती दी, "हे सखे दामोदर ! तुम केवल खाने में ही कुशल हो। तुमने छल से दुर्बल सुबल को हरा दिया, इसमें कौन बड़ी बात है। इस आधार पर अपने को वीर योद्धा घोषित न करो। तुमने अपने को सर्प बताया है और मैं मोर हूँ; इसलिए तुम्हें अवश्य परास्त कर दूँगा।" मोर सर्प का सबसे शक्तिशाली शत्रु है। सखाओं में होने वाले इस प्रकार के युद्ध में आत्मश्लाघा को विद्वानों ने अनुभाव बतलाया है। पैंतरा बदलना, अकेले होने पर भी युद्ध की इच्छा तथा युद्ध से न भागना, ये सब वीररस की क्रियाएँ भी अनुभाव हैं। एक मित्र श्रीकृष्ण से बोला, 'हे मधुसूदन ! तुम मेरे बल-पराक्रम को जानते हो; फिर भी तुम बलशाली बलदेव को चुनौती देने के लिये भद्रसेन को उत्साहित कर रहे हो, मुझे नहीं। इससे मेरा अपमान हुआ है। मेरी भुजाएँ अर्गला की प्रतिद्वन्द्वी हैं।"

अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [३२३ एक भक्त बोला, “हे कृष्ण ! मेघगर्जन और सिंहनाद जैसी वीररस की क्रियाओं के लिये तुम्हारा प्रतिद्वन्द्वी श्रीदामा सर्वोत्कर्षशाली है।” युद्ध, दान, दया और धर्म सम्बन्धी वीररस की क्रियाओं को सात्त्विक कहते हैं जबकि गर्व, भावुकता, वृत्ति, घृणा, मति, हर्ष, उत्साह, अमर्ष, असूया, और स्मृति आदि व्यभिचारिभाव हैं। जब स्तोककृष्ण नामक श्रीकृष्ण का एक सखा उनसे लड़ रहा था तो उसके पिता ने श्रीकृष्ण से लड़ने के लिये उसे डाँटा; श्रीकृष्ण सम्पूर्ण व्रजवासियों के जीवन-प्राण जो ठहरे। पिता की डाँट को सुनकर स्तोककृष्ण ने लड़ना छोड़ दिया । परन्तु श्रीकृष्ण उसे चुनौती देते रहे; इसलिये इस ललकार का मुकाबला करने के लिये स्तोककृष्ण ने अपनी लाठी पकड़ कर और फिर उसे घुमा-घुमाकर अपनी दक्षता का परिचय दिया । एक बार भद्रसेन को ललकार कर श्रीदामा बोला, “हे सखे ! तुम्हें अभी मुझसे कोई भय नहीं होना चाहिये। पहले बलराम को हराकर, श्रीकृष्ण को पीटकर ही मैं तुम्हारे सामने आऊँगा।” यह कहकर भद्रसेन बलराम के दल को छोड़कर श्रीकृष्ण के साथ हो गया । इससे उसके मित्रों को उतना ही क्षोभ हुआ जैसे मन्दराचल से मथे जाने पर समुद्र को हुआ था। अपने गम्भीर गर्जन से उसने अपने सब सखाओं को बहरा कर दिया और श्रीकृष्ण को अपनी वीर क्रियाओं से आह्लादित किया । एक समय श्रीकृष्ण ने अपने सब मित्रों को चुनौती देते हुए कहा “हे सखाओ ! देखो-देखो मैं महान् वीरता के साथ कूद रहा हूँ; इसलिये, यहाँ से भागो मत ।” इन चुनौती भरे शब्दों को सुनकर वरूथप नामक सखा श्रीकृष्ण की ललकार को स्वीकार करते हुए उनसे भिड़ गया । एक सखा बोला, “श्रीदामा दामोदर को हारा देखने के लिये पूरा प्रयास कर रहा है। मैं समझता हूँ कि यदि हमारा शक्तिशाली सुबल उसके साथ हो जाए तो फिर दोनों की जोड़ी रत्नजड़ित स्वर्ण जैसी मनोहर लगेगी।” इन वीररस की क्रियाओं में श्रीकृष्ण के सखा ही प्रतिद्वन्द्वी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण के शत्रु वास्तव में उनका विरोध कभी नहीं कर सकते। अत- एव श्रीकृष्ण के सखाओं का उन्हें इस प्रकार चुनौती देना वीरभक्तिरस कहलाता है। दानवीर दो प्रकार के होते हैं—उदार और त्यागी । जो श्रीकृष्ण के सुख के लिये सर्वस्व त्याग कर सकता है उसे उदार कहते हैं। जब कोई श्रीकृष्ण को देखकर त्याग करने की इच्छा करता है तो श्रीकृष्ण उस दान-

३२४ ] भक्त्तिरसामृतसिन्धु क्रिया के उद्दीपन माने जाते हैं। जब श्रीकृष्ण उनके घर पुत्र रूप से अव- तरित हुए तो नन्द महाराज ने शुद्धभाव से अपने पुत्र के लिये सम्पूर्ण मंगल की कामना की। वे सब ब्राह्मणों को मूल्यवान गायों का दान देने लगे। इस दानक्रिया से ब्राह्मण इतने सन्तुष्ट हुए कि उन्हें कहना पड़ा कि नन्द महाराज ने अपने दान से महाराज पृथु और नृग जैसे पूर्ववर्ती उदार राजाओं को भी हरा दिया। जब कोई भगवान् की कीर्ति को पूर्णरूप से जानता है और इस लिये उनके लिये सर्वस्व अर्पण करने को तैयार रहता है तो उसे सम्प्रदानक कहते हैं। जिस समय महाराज युधिष्ठिर राजसूय मण्डलयज्ञ में श्रीकृष्ण के साथ जा रहे थे तो वे मन ही मन श्रीकृष्ण के शरीर में चन्दन का आलेप करने लगे और गले में अजानुलम्बित माला सुशोभित करने लगे। उन्होंने श्रीकृष्ण को सोने की कसीदाकारी से युक्त वस्त्रालंकार पहनाए और नाना रत्नों से विभूषित अलंकारों से अलंकृत किया। श्रीकृष्ण को बहुत से सुसज्जित हाथी, घोड़े और रथ भी दिए। उन्होंने आगे श्रीकृष्ण को अपने सारे राज्य, अपने परिवार और स्वयं अपनी आत्मा तक का दान करने का संकल्प किया। ऐसा करने के बाद जब उन्होंने पाया कि वास्तव में श्रीकृष्ण को दान देने के लिये ऐसा कुछ भी नहीं है तो महाराज युधिष्ठिर अत्यन्त उद्विग्न और व्याकुल हो उठे। इसी प्रकार महाराज बलि ने एक समय अपने पुरोहित शुक्राचार्य से कहा था, "हे ऋषे ! आप वेदों के ज्ञान में पूर्ण निष्णात् हैं और इसलिए वैदिक कर्मकाण्ड के द्वारा भगवान् विष्णु की आराधना करते हैं। जहाँ तक इन वामन देव ब्राह्मण का सम्बन्ध है; ये चाहे स्वयं भगवान् विष्णु हों, कोई साधारण ब्राह्मण हों अथवा मेरे शत्रु ही क्यों न हों, मैंने संकल्प कर लिया है कि इनके द्वारा माँगी गई सारी भूमि इन्हें अवश्य दूंगा।" महा- राज बलि इतने भाग्यवान् थे कि भगवान् ने उनके आगे अपने उसी हाथ को फैलाया जो लक्ष्मीदेवी के कुंकुम उपलिप्त वक्षःस्थल के स्पर्श से लाल सा हो गया। भाव यह है कि यद्यपि श्रीभगवान् की ऐसी अपार महिमा है कि साक्षात् लक्ष्मीदेवी उन्हें आनन्द प्रदान करने के लिये उनके आधीन रहती हैं; फिर भी उन्होंने बलि महाराज से दान लेने के लिये अपना हाथ फैलाया। जो पुरुष श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व दान करना चाहता है, परन्तु बदले में कुछ नहीं चाहता वह सच्चा त्यागी समझा जाता है। अतएव

अद्भुतभक्तिरस और वीरभक्तिरस [ ३२५ स्वयं भगवान् द्वारा दिये जाने पर भी भक्त मुक्ति को भी नहीं लेता। कृष्णप्रेम का वास्तविक प्रकाश तभी होता है जब श्रीकृष्ण दान को लेने वाले बन जाते हैं और भक्त दान देने वाला बन जाता है। 'हरिभक्तिसुधोदय' में ध्रुव महाराज का एक अन्य उदाहरण है। वे कहते हैं, "हे स्वामिन् ! मैं आपसे किसी अभिलाषा को लेकर तप-त्याग के अध्यात्म में प्रवृत्त हुआ था। परन्तु इसके बदले में आपने मुझे अपना मुनि- दुर्लभ दर्शन प्रदान किया है। मैं केवल कुछ काँच के टूटे टुकड़े ढूँढ रहा था। परन्तु उसके स्थान पर मुझे अमूल्य रत्न मिल गया। अतएव अब मैं पूर्ण सन्तुष्ट हो चुका हूँ। हे नाथ ! मुझे अब आपसे और कुछ नहीं चाहिये।" इसी के अनुरूप श्रीमद्भागवत (३.१५.४८) में उल्लेख हैं—'सनक आदि चारों कुमार भगवान् को सम्बोधन करते हुए कहते हैं, "हे भगवन् ! आपकी निर्मल कीर्ति बड़ी आकर्षक है; अतएव आपकी ही कीर्ति गान के योग्य है और वास्तव में आप ही सम्पूर्ण तीर्थों के निवास हैं। सौभाग्य- शाली पुरुष आपका गुणगान किया करते हैं और वास्तव में आपके दिव्य स्वरूप को जानते हैं; वे आपके द्वारा दी हुई मुक्ति की भी परवाह नहीं करते। उन्हें दिव्य महानिधि प्राप्त हो जाती है, इसलिये वे देवराज इन्द्र का स्थान भी नहीं चाहते। वे जानते हैं कि स्वर्ग का आसन भी भय से खाली नहीं है, जबकि जो केवल आपकी दिव्य कीर्ति के गान में लगे रहते हैं उनके लिये केवल आनन्द और निर्भयता रहती है। ऐसे में इस प्रकार के ज्ञानी पुरुष स्वर्ग के सिंहासन के प्रति आकृष्ट क्यों हों?" एक भक्त ने राजा मयूरध्वज की दानपरायणता पर अपने भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है, "जिनकी दान-परायणता का वर्णन करना भी मेरे लिए असम्भव है उन राजा मयूरध्वज को सादर प्रणाम है।" मयूर- ध्वज बड़े बुद्धिमान् थे; अतएव एक समय जब श्रीकृष्ण ब्राह्मण रूप में उनके पास गये तो वे उनका प्रयोजन समझ गये। श्रीकृष्ण ने उनसे उनकी देह का आधा भाग माँगा। यह भी कहा कि स्वयं पत्नी और पुत्र उनके शरीर को काटें। राजा मयूरध्वज ने इसको मान लिया। अपने प्रगाढ़ भक्तिभाव के कारण वे निरन्तर श्रीकृष्ण के चिन्तन में निमग्न रहते थे। इसलिये जब उन्होंने जाना कि श्रीकृष्ण स्वयं ब्राह्मण रूप में आये हैं तो अपनी देह का आधा भाग देने में तनिक भी संकोच न किया। श्रीकृष्ण के लिये महाराज मयूरध्वज का यह त्याग जगत् में अद्वितीय है। अतएव हमें उनकी सादर वन्दना करनी चाहिये। उन्हें ब्राह्मण रूपधारी भगवान् का पूर्ण ज्ञान था और वे पूर्ण दानवीर कहलाते हैं।

३२६] भक्तिरसामृतसिन्धु जो पुरुष निरन्तर भक्तियोग के आचरण में बहुत कुशल हों उन्हें धर्म- वीर कहा जाता है। धर्मानुष्ठान में लगे उत्तम भक्त ही इस धर्मवीर श्रेणी में आ सकते हैं। प्रामाणिक शास्त्रों के अध्ययन, नीति के पालन, श्रद्धाभाव, सहिष्णुता और इन्द्रियसंयम के द्वारा धर्मवीर बना जा सकता है। जो पुरुष श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये धर्मानुष्ठान करते हैं वे भक्ति- योग में स्थिर रहते हैं, जबकि दूसरे जो श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की इच्छा के बिना धर्मानुष्ठान करते हैं वे केवल पुण्यात्मा कहलाते हैं। धर्मवीरता के सर्वोत्तम प्रतीक महाराज युधिष्ठिर हैं। एक भक्त ने श्रीकृष्ण से कहा है, "हे कृष्ण ! हे दनुज-दमन ! महाराज पाण्डु के ज्येष्ठ पुत्र महाराज युधिष्ठिर ने आपकी प्रसन्नता के लिये नाना प्रकार के सब यज्ञों का आयोजन किया है। उनमें भाग लेने के लिये वे निरन्तर स्वर्ग के देवता इन्द्र का आह्वान किया करते हैं। इन्द्र की स्वर्ग से अनुपस्थिति में शची देवी प्रायः अपना समय कपोल को हथेली पर धारण किये हुए बिताती हैं।" देवताओं के लिये नाना यज्ञ करना श्रीभगवान् के अंगों की आराधना करना है। देवताओं को विष्णुरूपधारी भगवान् के नाना अंग माना जाता है। इसलिये उनकी आराधना का अंतिम प्रयोजन अंगों की उपासना से साक्षात् श्रीभगवान् को प्रसन्न करना हो है। महाराज युधिष्ठिर की ऐसी कोई लौकिक इच्छा नहीं थी। उन्होंने सब यज्ञों का अनुष्ठान साक्षात् श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार किया। वे उनसे कोई निजी लाभ नहीं उठाना चाहते थे। उनकी एकमात्र इच्छा श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने की थी। अतएव वे भक्तों के शिरोमणि माने गये। युधिष्ठिरजी वास्तव में निरन्तर प्रेममयी भक्ति के सागर में निमग्न रहते थे।

अध्याय ४७ करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस करुणभक्तिरस जब भक्तिभाव के कारण कृष्ण के सम्बन्ध में किसी प्रकार की शोकरति की उत्पत्ति हो तो उसे करुणभक्तिरस कहते हैं। इस भक्तिरस का उद्दीपन हैं श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, रूप, लीला आदि । इस भक्तिरस में कभी-कभी शोक करना, भारी साँस लेना, रोना, भूमि पर गिर पड़ना और छाती पीटना आदि अनुभाव होते हैं। कभी-कभी आलस्य, निर्वेद, अपयश, दैन्य, चिन्ता, विषाद, ग्लानि, उत्सुकता, चपलता, उन्माद, विस्मृति, मरण, मोह और व्याधि आदि लक्षण भी होते हैं। भक्त के मन में श्रीकृष्ण के अनिष्ट की आशंका को शोकरति कहते हैं। वही इस करुणभक्तिरस में स्थायिभाव मानी जाती है। श्रीमद्भागवत (१०.१६.१०) में यह विवरण है। श्रीकृष्ण को यमुना में कालिय नाग के फनों में लिपटा हुआ देखकर उनके सर्वप्रिय गोपबालक बड़े उद्विग्न हो उठे। शोक, संताप और भयवश, मूढ़ होकर वे भूमि पर गिर पड़े । वे मोहवश समझ रहे थे कि श्रीकृष्ण किसी विपत्ति में पड़ गये हैं। अतएव उनमें इन लक्षणों का प्रकट होना बिल्कुल आश्चर्यजनक नहीं। उन्होंने अपनी मित्रता, अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपनी इच्छा और आत्मा भी श्रीकृष्ण को अर्पण कर रखी थी। श्रीकृष्ण के भयंकर विषमय कालिय हृद में उतर जाने पर यशोदा मैया नाना प्रकार की शंका करती हुई गरम-गरम साँस लेने लगीं। नेत्रों से विगलित अश्रुधारा ने उनके वस्त्रों को भिगो डाला । इस प्रकार वे प्रायः मूर्च्छित हो गईं । इसी प्रकार जब शंखासुर दैत्य एक-एक करके श्रीकृष्ण की महिषियों पर आक्रमण कर रहा था तो श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी एकदम काले पड़ गये ।

३२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'हंसदूत' में निम्नलिखित घटना का उल्लेख है। गोपियों ने हंसदूत से निवेदन किया कि वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों के चिह्नों का अन्वेषण करे और मिल जाने पर उन्हें उसी प्रकार सिर पर धारण करे जिस प्रकार श्रीकृष्ण के सारे गोपबालकों को चुराने के बाद ब्रह्माजी ने उन्हें शिरोधार्य किया था। श्रीकृष्ण को चुनौती देने की भूल के लिये शोक करते हुए ब्रह्माजी ने उनके सामने झुककर प्रणाम किया था, जिससे उनका मुकुट श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से अंकित हो गया। गोपियों ने हंसदूत को स्मरण कराया कि कभी-कभी नारद जैसे महान् ऋषि भी इन चरण- चिह्नों को देखकर भाव-विह्वल हो जाते हैं और कभी-कभी जीवन्मुक्त महर्षियों में भी उन्हें देखने की लालसा जाग उठती है। "अतएव तुम्हें बड़े उत्साहपूर्वक श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों को खोजना चाहिये," उन्होंने निवेदन किया। यह भी करुणभक्तिरस का सन्दर्भ है। एक बार नकुल के अनुज सहदेव को श्रीकृष्ण के चरणों से निस्सृत तेजोमय दीप्ति को देखकर बड़ा आनन्द हुआ। वह रोते हुए पुकार उठा, "माता माद्री तुम कहाँ हो ? पिता पाण्डु आप अब कहाँ हैं ? हा शोक ! हा शोक ! इस अवसर पर श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों को देखने के लिये आप यहाँ नहीं हैं।" यह भी करुणभक्तिरस है। श्रीकृष्णविषया दृढ़ रति से रहित भक्ति में स्मित आदि लक्षण तो हो सकते हैं परन्तु करुणभक्तिरस का शोकभाव कभी नहीं हो सकता। इस करुणरति के मूल में सदा प्रेम रहता है। श्रीकृष्ण अथवा उनकी प्रियाओं को भय की आशंका को जैसे बलदेव और युधिष्ठिर प्रकट करते हैं, वैसा ऊपर वर्णन किया गया है। इस आशंका में श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्तियों का अज्ञान कारण नहीं है; इनके मूल में है उनके लिये भक्त का प्रगाढ़ प्रेम। श्रीकृष्ण को भय होने की ऐसी आशंका पहले-पहल शोक के आश्रय के रूप में प्रकट होती है; परन्तु शनैः-शनैः वह करुणभक्तिरस में विकसित होकर विशिष्टता को प्राप्त हो जाती है और इस प्रकार अनिर्वचनीय आनन्द देती है। रौद्रभक्तिरस श्रीकृष्ण के लिये रौद्रभक्तिरस में श्रीकृष्ण ही निरन्तर क्रोध के विषय अर्थात् आलम्बन विभाव होते हैं। विदग्धमाधव (२.३७) में ललिता गोपी श्रीकृष्ण के कारण हुए अपने क्रोध को राधारानी के सामने व्यक्त करती है, "हे सखि ! मेरा चित्त संताप से भर गया है; इसलिये अब मैं

करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस [ ३२६

मरकर यमराज के पास जाऊँगी। परन्तु मुझे दुःख है कि मुझे छल कर अब भी यह कृष्ण हँसे जा रहा है। हे राधिके ! तुम तो बड़ी बुद्धिमान् हो। फिर कैसे तुमने अपनी सारी प्रेम-सम्पदा को इस कामुक ग्वाले नव- युवक में लगा दिया है।" कभी-कभी श्रीकृष्ण को देखकर जरती कहने लगती, “अरे ओ ! युवतियों को लूटने वाले धूर्त ! मैं तेरे पास अपनी बहू के दुपट्टे को स्पष्ट देख रही हूँ। फिर भी तू झूठ बोल रहा है।" फिर वह चिल्ला-चिल्ला कर व्रजवासियों से कहने लगती, “हे वृन्दावनवासियो ! देखो इस नन्द महाराज के पुत्र ने मेरी बहू की गृहस्थी में आग लगा दी है।" श्रीकृष्ण जिन अर्जुन वृक्षों से बँधे हुए थे, उनके गिरने की गर्जना को सुनकर रोहिणीदेवी ने भी कृष्ण के लिए इसी प्रकार प्रेम को अभिव्यक्त किया था। सारा अडौस-पड़ौस तुरन्त दुर्घटना के स्थान पर दौड़ पड़ा। रुक्मिणीदेवी ने उस अवसर पर यशोदा मैया को डाँटते हुए कहा, “हे व्रजेन्द्रगेहनी ! अपने पुत्र को रस्सी से बाँध कर तुम उसे शिक्षा देने में बड़ी कुशल हो; सो ठीक है। परन्तु क्या तुम यह भी नहीं देख सकतीं कि तुम्हारा पुत्र संकट में पड़ गया है। वृक्ष पृथ्वी पर गिर रहे हैं और वह फिर भी इधर-उधर घूम रहा है।” यशोदा पर रोहिणीदेवी का यह क्रोध श्रीकृष्ण के कारण हुए रौद्रभक्तिरस का प्रतीक है। एक बार जब श्रीकृष्ण अपने गोप-सखाओं के साथ गोचारण भूमि में विचर रहे थे तो उनके मित्रों ने उनसे तालवन जाने का अनुरोध किया, जहाँ गर्धभासुर रहता था। श्रीकृष्ण के मित्र उस वन के वृक्षों के फल खाना चाहते थे; परन्तु उस असुर से भयवश वहाँ जाने में उनको संकोच था। अतएव उन्होंने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वे वहाँ जाकर गर्दभा- सुर का वध कर दें। जब श्रीकृष्ण ने ऐसा किया तो वे सब घर लौट आये और उनके इस समाचार से यशोदा मैया को बड़ी चिन्ता हुई, क्योंकि श्रीकृष्ण को अकेले ही तालवन जैसे भयंकर स्थान पर भेज दिया गया था। इस पर वे बालकों की ओर क्रोधभरी दृष्टि से देखने लगीं। राधारानी की एक सखी के क्रोध का भी एक उदाहरण मिलता है। जब श्रीकृष्ण के व्यवहार से रुष्ट होकर राधारानी ने उनसे बोलना बन्द कर दिया तो श्रीमती राधारानी के असन्तोष से कृष्ण को बडा दुःख हुआ और क्षमा-विनती के लिये वे उनके चरणकमलों में गिर पड़े। परन्तु फिर भी राधारानी सन्तुष्ट नहीं हुईं; उन्होंने श्रीकृष्ण से बातचीत नहीं की। इस पर एक सखी ने उन्हें इन शब्दों में डांटा, “तू

३३० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अतृप्ति की मथनी से अपने-आपको मथने दे रही है। तो फिर मैं क्या कह सकती हूँ? जा मेरे पास से दूर चली जा। तेरे पास रहने से मेरे शरीर में आग सी लग जाती है। मैं तेरे इस निष्ठुर व्यवहार को नहीं देख सकती, क्योंकि अपने मोरपंख से तेरे चरणों को छूते हुए प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रति भी तू क्रोध से ऐंठी रही।" भक्तियोग में इस रूठने अथवा क्रोध के भाव को 'ईर्ष्या' कहते हैं। जब अक्रूर वृन्दावन को छोड़कर जा रहे थे तो कुछ वृद्धा गोपियों ने उन्हें डाँटते हुए कहा, "हे गन्दिनीनन्दन! तेरी निष्ठुरता यदुवंश को अपयश दे रही है। तू श्रीकृष्ण को लिए जा रहा है। इससे उनकी विरह की आशंका के कारण हम अत्यन्त करुण अवस्था को पहुँच रहे हैं। अब तेरे जाने से भी पहले सब की सब गोपियों के प्राणपखेरू प्रायः उड़ से गये हैं।" जब महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया तो पाण्डवों और कुरुओं में बड़ी हलचल हो गई। पिता- मह भीष्म भी इससे अछूते न रहे। उस समय नकुल ने बड़े क्रोध में भरकर कहा, "श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। उनके चरणनख वेदरूपी ज्योति से देदीप्यमान हैं। यदि कोई उनका अपमान करता है तो मैं पाण्डव घोषणा करता हूँ कि मैं उसके मस्तक पर अपनी उल्टी लात का प्रहार करूंगा और यमदंड के समान भयंकर अपने बाणों का उसे निशाना बनाऊँगा।" यह भी श्रीकृष्ण के लिये रौद्रभक्तिरस का उदाहरण है। इस प्रकार के दिव्य क्रोध में कभी-कभी हँसना, व्यंग्य वचन, कटु आक्षेप करना, अनादर करना आदि लक्षण होते हैं। कभी-कभी हाथों का मलना, दाँत किटकिटाना, आँखों का लाल हो जाना, होंठ चबाना, अत्यन्त भौंहें चढ़ाना, भुजाओं का फड़कना, भुजाओं का ठोंकना, चुप हो जाना, सिर झुका लेना, निःश्वास, टेढ़ी दृष्टि, धिक्कारना, सिर हिलाना, नेत्रों के किनारों पर लालिमा छा जाना, भौंहों का टेढ़ा होना, होंठों का फड़कना आदि अनुभाव होते हैं। कभी नेत्र लाल हो जाते हैं तो कभी म्लान पड़ जाते हैं। कभी क्रुद्ध पुरुष फटकारता है, तो कभी चुप पड़ जाता है। क्रोध के इन लक्षणों के दो भाग किये जा सकते हैं—सात्त्विक तथा व्यभिचारी। कभी-कभी आवेश, जड़ता, गर्व, निर्वेद, मोह, चपलता, असूया, उग्रता, अमर्ष एवं श्रम आदि व्यभिचारिभाव भी होते हैं। इन सब भावों में क्रोधरति स्थायिभाव मानी गई है।

करुणभक्तिरस और रौद्रभक्तिरस [ ३३१ मथुरा पर आक्रमण करते हुए क्रुद्ध जरासन्ध ने श्रीकृष्ण पर व्यंग्य- भरी दृष्टि डाली। उस समय बलरामजी ने अपना हल धारण कर लिया और जरासन्ध को लाल-लाल आँखों से देखने लगे । 'विदग्धमाधव' के एक श्लोक में श्रीमती राधारानी क्रोध की मुद्रा में अपनी माता से बोलीं। राधारानी पर श्रीकृष्ण के पास जाने का आरोप लगाया गया था। वे कहने लगीं, "हे माता! मैं तुमसे क्या कहूँ ? कृष्ण ऐसा निर्दयी है कि अनेक बार मार्ग में मुझ पर आक्रमण करता है और यदि मैं रोना भी चाहूँ तो यह मोरमुकुटधारी धूर्त मेरे मुख को ढक लेता है, जिससे मैं रो भी नहीं पाती। यदि मैं उससे डरकर वहाँ से भागना चाहूँ तो वह तुरन्त मेरा मार्ग रोक लेता है। यदि मैं दीन भाव से उसके चरणों में गिर जाऊँ तो वह मधुसूदन क्रोध में भरकर मेरे मुख को काटता है। हे माता ! मेरी परिस्थिति को समझने का प्रयत्न करो। मुझ पर अनावश्यक क्रोध न करो। मुझे डाँटने के स्थान पर बताओ कि मैं कृष्ण के इन भयंकर आक्रमणों से कैसे बचूँ ?" कभी-कभी बराबर वालों में श्रीकृष्ण के प्रेम को लेकर क्रोध के भाव प्रकट होते हैं। इसका एक उदाहरण जटिला और मुखरा की लड़ाई है। जटिला राधारानी की सास थी और मुखरा उसकी नानी थी। ये दोनों चर्चा कर रही थीं कि किस प्रकार मार्ग में जाती हुई राधारानी को कृष्ण व्यर्थ सताया करता है। मुखरा बोली, "हे दुर्मुखी जटिले ! तेरी बातों को सुनकर मेरे हृदय और मस्तिष्क दोनों में आग लगी जा रही है। तेरा यह कहना किसी प्रमाण के बिना है कि कृष्ण मेरी दौहित्री (लड़की की पुत्री) राधारानी को छेड़ता है।" एक बार जब राधारानी श्रीकृष्ण के दिए हुए रत्नहार को उतार कर रख रही थीं तो उनकी सास जटिला एक सखी से कहने लगी, "हे सखि ! इस सुन्दर हार को देख जो कृष्ण ने राधारानी को भेंट किया है। वह अब उसे पकड़े हुए है और फिर भी हमें यह बतलाना चाहती है कि उसका कृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस लड़की की क्रिया ने तो हमारे सारे कुल को कलंकित कर दिया है।" शिशुपाल जैसे व्यक्तियों में श्रीकृष्ण के लिये प्राप्त होने वाली स्वाभाविक ईर्ष्या को श्रीकृष्ण के साथ रौद्रभक्तिरस नहीं माना जा सकता ।

अध्याय ४८ भयानकभक्तिरस तथा बीभत्सभक्तिरस भयानकभक्तिरस श्रीकृष्ण के लिए भयानकभक्तिरस में श्रीकृष्ण स्वयं अथवा श्रीकृष्ण के लिए भयानक अन्य व्यक्ति आलम्बन विभाव होते हैं। जब भक्त अपने को श्रीकृष्ण के चरणकमलों का अपराधी अनुभव करता है तो श्रीकृष्ण स्वयं भयानकभक्तिरस के आलम्बन बन जाते हैं। जब प्रेमवश श्रीकृष्ण के सखा और सुहृद उनके लिए किसी भय की आशंका करते हैं तो वह अवस्था भी उनके भय का आलम्बन बन जाती है। जब ऋक्षराज श्रीकृष्ण के सामने खड़ा हुआ उनसे लड़ रहा था, तब अकस्मात् उसे अनुभव हुआ कि वे साक्षात् भगवान् हैं। ऐसे अवसर पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा, "हे ऋक्षराज ! तुम्हारा मुख सूखा क्यों जा रहा है। मन से मेरे भय को निकाल दो। तुम्हारा हृदय इस प्रकार काँप क्यों रहा है। तनिक विश्राम करके स्वस्थ हो जाओ। मुझे तुम पर तनिक भी क्रोध नहीं है। परन्तु तुम जितना चाहो मुझ पर क्रोध कर सकते हो, क्योंकि इससे मेरे साथ लड़कर मुझे आनन्दित करके तुम अपनी सेवा का विस्तार करोगे।" कृष्णभक्तिरस की इस भयानक अवस्था में श्रीकृष्ण स्वयं भयानकरस के आलम्बन हैं। एक ऐसी भयानक अवस्था, जिसमें श्रीकृष्ण विषय हों, इस प्रकार है—बालकृष्ण से यमुना जल में अच्छी प्रकार से पराजित होकर कालिय नाग उनसे कहने लगा, "हे मुरारि ! मैंने अपने तप-त्याग से अनेक योग- सिद्धियों का अर्जन किया है। परन्तु फिर भी आपके सामने मैं कुछ भी नहीं हूँ। मैं परम तुच्छ हूँ। अतएव मुझ दीन जीव पर कृपा करें और मेरे प्रति अपने क्रोध को त्याग दें। मैं आपके यथार्थ स्वरूप को नहीं जानता। इसी अज्ञानवश अनेक भयंकर अपराध कर बैठा हूँ। कृपया मुझे बचायें। मैं परम अधम मूर्ख जीव हूँ। मुझ पर कृपा करें।" यह भयानक भक्तिरस का एक अन्य उदाहरण है।

भयानकभक्तिरस तथा वीभत्सभक्तिरस [ ३३३ जिस समय केशी दानव बड़े भारी घोड़े का रूप धारण कर पेड़ों पर से कूद-कूद कर वृन्दावन में उत्पात कर रहा था, तो यशोमति मैया नन्द महाराज से कहने लगीं, "हमारा लाला बड़ा चंचल है । अतएव इसे बलपूर्वक घर में बन्द करके रखना चाहिये । मुझे घोड़े का रूप धारण कर उत्पात करते हुए केशी दैत्य से बड़ा भय लग रहा है ।" जब यह पता चला कि वह असुर क्रुद्ध होकर गोकुल में प्रवेश कर रहा है तो यशोदा मैया अपने बालक की रक्षा के लिये इतनी आतुर हो गईं कि उनका मुख सूख गया और नेत्रों में आँसू भर आए । श्रीकृष्ण के लिये भयानक लगने वाली किसी वस्तु को देखने अथवा सुनने से होने वाले भयानकभक्तिरस के ये कुछ अनुभाव हैं । पूतना राक्षसी के मारे जाने पर यशोदा मैया की कुछ सखियाँ उनसे घटना के विषय में पूछने लगीं । यशोदा मैया ने तुरन्त अपनी सखियों से निवेदन किया, "चुप हो जाओ, चुप हो जाओ । पूतना के बारे में कुछ न पूछो । उस घटना का स्मरण होते ही मैं दुःखी हो जाती हूँ । पूतना राक्षसी मेरे पुत्र को खाने आई थी और उसने मुझसे छल करके बालक को अपने अंक में भी ले लिया था । इसके बाद वह मर कर गिर पड़ी, जिस कारण उसके विशालकाय शरीर से भयानक शब्द हुआ ।" भयानकभक्तिरस में मुख का सूखना, निःश्वास, मुड़ कर देखना, अपने को छिपाना, घबराहट, शरण की खोज और जोर-जोर से रोना—ये सब अनुभाव हैं । कुछ अन्य व्यभिचारिभाव हैं—मोह, विस्मृति, भय की आशंका, इत्यादि । सब में भयरति स्थायिभाव है। किसी भी प्रकार का भय अपराधों अथवा भयानक परिस्थितियों के कारण होता है। अपराध नाना प्रकार से हो सकते हैं और भय का अनुभव अपराधी को होता है। जब भय किसी भयानक पदार्थ के कारण होता है तो उस पदार्थ की आकृति-प्रकृति तथा प्रभाव भयानक होते हैं। इसका एक उदाहरण पूतना राक्षसी है । भय राजा कंस जैसे आसुरी चरित्र के कारण भी हो सकता है और महान् शक्तिशाली इन्द्र, शंकर जैसे देवताओं के कारण भी हो सकता है। कंस जैसे असुरों को श्रीकृष्ण से भय होता था । परन्तु उनके भावों को भयानकभक्तिरस के अन्तर्गत नहीं समझा जा सकता । बीभत्सभक्तिरस प्रामाणिक सूत्रों से जाना जाता है कि जुगुप्सा के कारण श्रीकृष्ण में

३३४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु होने वाली आसक्ति कभी-कभी भक्ति के बीभत्सरस के रूप में प्रकट होती है। इस प्रकार के कृष्णभक्तिरस का अनुभव करने वाला प्रायः शान्तरस में स्थित रहता है। बीभत्सभक्तिरस का वर्णन निम्नलिखित है। "यह व्यक्ति पहले केवल कामक्रिया और इन्द्रियतृप्ति में रुचि रखता था। अपने कामविकार की पूर्ति के लिये इसने रतिचौर्य में बड़ी निपुणता प्राप्त कर ली थी; परन्तु यह कैसा आश्चर्य है कि अब यह वही मनुष्य आँखों में आँसू भर कर श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन कर रहा है। अब जैसे ही किसी स्त्री के मुख को देखता है, तुरन्त मुँह सिकोड़ लेता है। इसकी मुखमुद्रा से प्रतीत होता है कि इसे अब मैथुन से घृणा हो गई है।" भक्ति के इस बीभत्सरस के अनुभाव हैं-अपने पूर्व जीवन के विचार पर थूकना, मुँह सिकोड़ना, नाक बन्द कर लेना, हाथ धोना, भागना, काँपना, रोमांचित हो जाना, पसीना आ जाना इत्यादि। इसमें ग्लानि, श्रम, मोह, निर्वेद, विषाद, चपलता, आवेग, जाड्य आदि व्यभिचारिभाव भी रहते हैं। जब कोई भक्त अपने पूर्व जीवन की जघन्य क्रियाओं पर शोक करता हुआ शरीर पर विशेष लक्षणों को प्रकट करता है तो उसके भाव को बीभत्सभक्तिरस कहा जाता है। यह कृष्णभावना के जाग्रत हो जाने के कारण होता है। इस सन्दर्भ में यह कथन है, "भगवान् की भक्ति के लवलेश का भी उदय हो जाने पर फिर इस हाड़-माँस से बने, रुधिर से भरे, दुर्गन्ध से पूर्ण शरीर में कोई रति का आनन्द कैसे ले सकता है?" यह अनुभव उसी को हो सकता है जो कृष्णभावना को प्राप्त हो गया हो और जिसे इस बात का पूर्ण बोध हो गया हो कि यह प्राकृत देह परम अधम प्रकृति की है। माता के गर्भ में कोई भाग्यवान बालक श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है, "हे कंस के शत्रु ! मैं इस प्राकृत देह के कारण बड़ा दुःख पा रहा हूँ। इस समय मैं अपनी माता के गर्भ में रुधिर, मूत्र और मल के बीच पड़ा हुआ हूँ। ऐसी विगर्हित स्थिति में जीवन धारण करता हुआ मैं अत्यन्त दुःख पा रहा हूँ। इसलिये हे कृपा के सागर ! मुझ पर प्रसन्न हों। मुझ में आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होने की कोई योग्यता नहीं है; परन्तु फिर भी कृपया मेरी रक्षा करें।" नरक में गिरा प्राणी भी इसी प्रकार प्रार्थना करता है। वह भगवान् से कहता है, "हे नाथ ! यमराज ने मुझे गन्दे, कीड़ों से भरे और दुर्गन्धयुक्त स्थान में रखा है। मैं नाना प्रकार के

भयानकभक्तिरस तथा बीभत्सभक्तिरस [ ३३५ ] व्याधिग्रस्त लोगों के मल-मूत्र से घिरा हुआ हूँ। इस भयानक दृश्य को देखकर मेरी आँखों में घाव हो गये हैं और मैं प्रायः अन्धा हो चला हूँ। इसलिये हे नाथ ! आपसे प्रार्थना है कि इस नारकीय स्थिति से मेरी रक्षा करें। इस समय मैं नरक में गिरा पड़ा हूँ; परन्तु फिर भी निरन्तर आपके पावन नाम को स्मरण करने की चेष्टा करूँगा और इस प्रकार मेरे लिये प्राणधारण करना सम्भव होगा।" यह अधम स्थिति के कारण होने वाली कृष्णरति का उदाहरण है। जो निरन्तर पावन भगवन्नाम—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे के कीर्तन में संलग्न रहता है, उसे श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम को प्राप्त हुआ समझा जाता है। ऐसी अवस्था में जीवन की किसी भी परिस्थिति में वह पूर्ण स्नेह और प्रेमभाव के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण करता हुआ सन्तुष्ट रह सकता है। सारांश में, कहा जा सकता है कि बीभत्स कृष्णभक्तिरस का प्रादुर्भाव सुप्त शान्तरस के उन्नत स्नेहभाव में विकसित होने की अवस्था में होता है।

अध्याय ४६ रसों की मैत्री-वैर स्थिति पूर्ववर्णन के अनुसार, श्रीकृष्ण, के साथ बारह प्रकार के रस (सम्बन्ध) होते हैं। इनमें से पाँच रस मुख्य हैं—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य। सात रस गौण हैं—हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक तथा बीभत्स । पाँचों मुख्य रस वैकुण्ठ-जगत् में नित्य-निरन्तर प्रकाशित रहते हैं, जबकि सातों गौण रस केवल गोकुल वृन्दावन में, जहाँ श्रीकृष्ण प्राकृतजगत् के अन्तर्गत अपने दिव्य लीलारस का परिवेषण करते हैं, निरन्तर प्रकट-अप्रकट हुआ करते हैं। प्रायः मुख्य अंगीरस के साथ-साथ कुछ अन्य रस भी पाए जाते हैं और इन रसों के मिश्रणों की कभी मैत्री होती है तो कभी विरोधी स्थिति होती है। इन नाना रसों की मैत्री और विरोधी स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण निम्नलिखित है। शान्तरस के बीभत्स और अद्भुत—ये दोनों मित्र रस हैं। माधुर्य, वीर, रौद्र और भयानक—ये शान्तरस के विरोधी हैं। दास्यरस में भयानक, शान्त, वीर (जैसे दानवीर, धर्मवीर आदि) मित्र रस हैं। युद्धवीर और रौद्ररस स्वयं श्रीकृष्ण से उत्पन्न होते हैं। सख्यरस के साथ माधुर्य, हास्य अथवा वीर की मैत्री स्थिति है। परन्तु भयानक अथवा वात्सल्यरस इसके विरोधी हैं। यद्यपि वात्सल्य, हास्य, करुण और भयानक में गम्भीर अन्तराल है; फिर भी इसका मिलना संगत है। वात्सल्यरस के साथ. माधुर्य, वीर अथवा रौद्र की विरुद्ध स्थिति है। माधुर्यरस के साथ हास्य और सख्य मित्ररस हैं। कतिपय विद्वानों के मत में माधुर्यरस में वीररस के केवल युद्धवीर और धर्मवीर नामक रसों की ही मित्र स्थिति है। इस दृष्टि के अनुसार इन

रसों की मैत्री वैर स्थिति [ ३ ३७ दोनों के अतिरिक्त अन्य, सब अभिव्यक्तियों को माधुर्यरस के विपरीत समझा जाता है । हास्यरस के भयानक, मधुर तथा वात्सल्य—ये तीनों रस मित्र हैं तथा करुण और बीभत्स ये दोनों विरोधी हैं । वीर और शान्त—ये दोनों अद्भुतरस के मित्र हैं; परन्तु रौद्र और भयानक, दोनों विरोधी हैं । वीररस के मित्र अद्भुत, हास्य तथा दास्यरस हैं, जबकि भयानक और माधुर्य ये दोनों विरोधी हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार शान्तरस सदा वीररस का मित्र है । करुणभक्तिरस के मित्र हैं रौद्र और वात्सल्य । हास्य, माधुर्य तथा अद्भुत विरोधी हैं । रौद्रभक्तिरस के साथ करुण अथवा वीररस के मिलने की मैत्री स्थिति है; जबकि हास्य, माधुर्य, अथवा भयानक वैरी हैं । भयानक भक्तिरस के साथ बीभत्स तथा करुणरस मित्र हैं। वीरभक्तिरस के साथ मधुर, हास्य और रौद्ररस का मिश्रण सदा मित्र स्थिति में होता है । बीभत्सभक्तिरस में शान्त, हास्य और दास्य मित्र रस हैं, जबकि सख्य और माधुर्य वैरी हैं । उपरोक्त विश्लेषण रसाभास के अध्ययन का सार संकलन है । रसाभास की यह दिव्य विद्या भक्ति के उन सभी रसों को पूर्ण रूप से समझा सकती है जो एक दूसरे के परस्पर मित्र और विरोधी हैं । जिस समय भगवान् चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी में विराज रहे थे, उस समय अनेक कवि और भक्त उनके पास आकर अपने नाना प्रकार के काव्यों का समर्पण करते थे । परन्तु यह नियम था कि श्रीचैतन्यदेव के निजी सचिव स्वरूप दामोदर पहले इन सब रचनाओं का बड़ी गम्भीरता से विश्लेषण करते थे । जब वे पाते कि इनमें कोई रसाभास नहीं है, तभी श्रीचैतन्यदेव के निकट जाकर कोई अपने काव्य का पाठ कर सकता था । रसाभास का विषय बड़ा महत्त्वपूर्ण है । जो शुद्ध भक्त हैं वे भगवान् से नाना रसों (सम्बन्धों) के विवरण में सदा पूर्ण मैत्री देखने की आशा रखते हैं । रसों की मैत्री अथवा विरोध का अध्ययन कभी-कभी बड़ा जटिल हो जाता है । इसके कारण की ओर निम्नलिखित संकेत है । जब दो मित्र आपस में मिलते हैं तो इस मिलन से उत्पन्न रस को प्रायः अत्यन्त मित्र रस माना जाता है । परन्तु वास्तव में मित्रों के ऐसे मिलन में इतने प्रकार

३३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के भाव मिले रहते हैं कि यह कहना बहुत कठिन है कि ये भाव कब वास्तव में मित्र स्थिति को प्राप्त हो रहे हैं और कब विरोध की स्थिति में पहुँच गये हैं। एक दूसरे से रसों की मित्रता दिखाने के लिये विद्वानों ने किसी विशेष मिश्रण में पाए जाने वाले रसों के अंगीरस और अंगरस—इस प्रकार दो भेद किये हैं। इस विधि के अनुसार मुख्यरस को अंगीरस कहते हैं और गौणरस अंगरस कहलाता है। अंगरस और अंगीरस का विवरण निम्नलिखित वाक्य से स्पष्ट हो जाता है, “सब जीव परब्रह्म रूपी अग्नि के स्फुलिंग जैसे हैं। अतः मुझ जीवरूप स्फुलिंग को अग्नि रूप भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा में नियुक्त होने का अवसर क्या मिलेगा।” इस वाक्य में शान्तरस अंगीरस है और भगवान् की सेवा का दास्यरस अंगरस है। वास्तव में तो ब्रह्मज्योति में भगवान् और भक्त में होने वाले प्रेमरस-विनिमय की कोई सम्भावना ही नहीं होती। एक अन्य भक्त कहता है, “मैं त्वचा से ढके, कफ, वात, पित्त, शुक्र और शोणित के ढेररूप शरीर में नाना प्रकार से रमण कर रहा हूँ। मुझे धिक्कार है, क्योंकि इस देहात्मबुद्धि के कारण मैं भगवत्स्मरण रूप दिव्य आनन्द का आस्वादन नहीं कर सकता।” इस वाक्य में शान्त और बीभत्स —दोनों रस हैं। शान्तरस अंगीरस है, जबकि बीभत्सरस अंगरस है। एक अन्य भक्त कहता है, “अब मैं चँवर की हवा डुलाते हुए सिंहासन पर विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में प्रवृत्त हो सकूँगा। वे नील मेघ वर्ण श्यामल सच्चिदानन्द विग्रह परब्रह्म हैं। इसलिये अब मैं मांस और रुधिर से सने शरीर के स्नेह को छोड़ दूँगा।” इस वाक्य में भी दास्य और बीभत्स का मिश्रण है। दास्य अंगी है और बीभत्स अंगरस है। एक अन्य वाक्य इस प्रकार है, “वह दिन कब होगा जब मैं अविद्या से मुक्त होकर शुद्ध हुआ निरन्तर कृष्णसेवा की अवस्था को प्राप्त हो सकूँगा। उनके सुन्दर मुखमण्डल और कमलनयनों को निहारता हुआ तब मैं निरन्तर उनकी सेवा करने के योग्य हो जाऊँगा।” इस वाक्य में शान्त- रस अंगी है और दास्यरस अंग है। एक अन्य कथन है, “श्रीकृष्ण के चरणकमल का स्मरण करते हुए भावविह्वल हुए इस भगवद्भक्त के नृत्य को तो देखो। इसे देखने मात्र से

रसों की मैत्री वैर स्थिति [ ३३६ बड़ी से बड़ी सुन्दरी स्त्री में भी सारी रुचि जाती रहेगी।" इस वाक्य में शांत रस अंगी है और वीभत्सरस अंगरस है । एक भक्त ने दृढ़तापूर्वक कहा, "प्रभो ! अब मेरा मुख इन युवतियों का संग प्राप्त होने पर युवतियों के संग के विचार से एकदम मुड़ जाता है। जहाँ तक ब्रह्मसाक्षात्कार का सम्बन्ध है, आपके चिन्तन में मग्न होने से मेरी उसमें कुछ भी रुचि नहीं रही है। इस दिव्य आनन्द में मेरे चित्त में कोई वासना भी शेष नहीं रही है। यहाँ तक कि मैं अब योगसिद्धि भी नहीं चाहता। मेरा मन तो केवल आपके चरणकमलों की आराधना की ओर आकृष्ट हो रहा है।" इस वाक्य में शान्तरस अंगी है और वीररस अंगरस है। एक अन्य वाक्य में सुबल का इस प्रकार से सम्बोधन है, "हे सुबल ! जिन्हें मोरमुकुटधारी श्रीकृष्ण के अधरामृत के पान का अवसर मिला है वे ये व्रजांगनाएँ त्रिभुवन में परम धन्यातिधन्य हैं।" इस दृष्टान्त में सख्यरस अंगी है और माधर्यरस अंग है। श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं, "हे ललनाओ ! इस प्रकार लालसाभरे नेत्रों से मेरी ओर न देखो। सन्तोष करके वृन्दावन में अपने-अपने घरों को लौट जाओ। तुम्हारे यहाँ खड़े रहने की कोई आवश्यकता नहीं है।" जिस समय श्रीकृष्ण गोपियों से इस प्रकार परिहास कर रहे थे, जो बड़ी उत्कंठा के साथ उनसे रासलीला का आनन्द लेने आई थीं, तो वहाँ उप- स्थित सुबल श्रीकृष्ण की ओर हँसते हुए बड़ी-बड़ी आँखों से देखने लगा। सुबल की अनुभूति में सख्य और हास्यरस का मिश्रण था, यहाँ सख्य अंगी है और हास्य उसका अंग है। निम्नलिखित उदाहरण में सख्यरस और हास्यरस क्रमशः अंगी और अंगरस हैं। जब श्रीकृष्ण ने सुबल को राधारानी की वेशभूषा में यमुना तट पर अशोक वृक्ष के नीचे चुपचाप छिपे हुए देखा तो वे एकदम आश्चर्य से अपने आसन को छोड़कर उठ बैठे। श्रीकृष्ण को देखकर सुबल ने अपने कपोलों को छुपाकर अपनी हँसी रोकने का प्रयास किया। वत्सलरस और करुणरस के मिश्रण का भी उदाहरण है--जब यशोदा मैया को यह विचार हुआ कि उनका पुत्र वन में छाते के बिना नंगे पाँव विचर रहा होगा तो कृष्ण को कितना कष्ट हो रहा होगा, यह सोचकर अत्यन्त व्यथित हो उठीं। यह अंगी वत्सलरस और अंग करुण- रस के मिश्रण का उदाहरण है। वत्सलरस और हास्य के मिश्रण का उदाहरण इस प्रकार है।