भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
वेणुधर भगवान् गोविन्द ब्रह्मा, विष्णु, महेश
जगन्नाथ रामराज्याभिषेक
महारासलीला
स्वच्छता भी आ जाती है। ऐसी यह विलक्षण मुखछवि है कि गोस्वामी तुलसीदासजीके शब्दोंमें कहें तो 'कहि न जात मुख बानी।' अधरोंमें अरुणिमा, दिव्य नासिका और गण्डस्थलकी दिव्यातिदिव्य, दीप्तिविशिष्ट नीलिमा और नानाविध भूषणों और कुण्डलोंकी पीतारुण जगमग ज्योतिसे ये कुन्तल अति विलक्षण सुरंजित दीप्तिका प्रकाश करते हैं। ऐसे इन दिव्य नील अलकोंपर वृन्दारण्यधामकी गो-चारण-लीलामें उठी हुई गोधूलि आकर ऐसे जमी हुई है, जैसे नीलकमलका यह पराग हो। ऐसे इस परागक्षुरित अलिकुलमालासंकुलित मुखारविन्दपर स्वेदबिन्दु प्रसन्न तुषार-बिन्दुओंके समान या दिव्यातिदिव्य मोतियोंके समान सुशोभित हो रहे हैं। ऐसे दिव्यातिदिव्य मुखारविन्दके भालदेशमें विद्युत्की लकीरों-सा जो दिव्य तिलक है, वह नीचेकी दोनों भौंहोंकी कमानोंसे छूटनेवाले जैसे दिव्य बाण हों। महालक्ष्मी जिस पद्ममें निवास करती हैं, उस मीनद्वययुक्त अलिकुल-समाश्रित दिव्य पद्मको तिरस्कृत करनेवाला यह दिव्यातिदिव्य मुखारविन्द है। भगवान्के कर्ण अति देदीप्यमान नीलवर्णके हैं, जिनमें नीचे दिव्य कुण्डल लटक रहे हैं। भगवान्के स्कन्ध सिंहके समान विशाल हैं। सुन्दर दिव्य कण्ठ कम्बुरेखासे युक्त है और उसमें आत्मज्योति-स्वरूप कौस्तुभमणि ऐसी शोभा पा रही है, जैसे सारी शोभाओंका यहींसे उद्गम होता हो। कण्ठमें फिर दिव्य मौक्तिकमाल और नीलपीत रत्नहार पड़ा हुआ है, नानाविध रत्नजटित मुक्ताहार तथा वन्य पुष्पमालाएँ हैं। कोई कण्ठमें कण्ठकूपतक हैं, कोई वक्षःस्थलतक हैं, कोई उदर और कटिप्रान्ततक हैं और कोई पादाम्बुजतक हैं। बड़ी ही विलक्षण शोभाका यह बड़ा ही सुन्दर कौशलपूर्ण क्रम है। ये मौक्तिकमाल कण्ठसे पादाम्बुजतक इस दिव्य मंगलमय विग्रहपर ऐसे सोह रहे हैं, जैसे महेन्द्रनीलमणिपर्वतपर गंगाकी दिव्य निर्मल धारा हो अथवा ये मुक्तामाल ऐसे सुशोभित हैं, जैसे नील आकाशमें हंसोंकी पंक्तियाँ उड़ी जाती हों। नील आकाशमें उडुगणोंके समान भगवान्के वक्षःस्थलपर यह रत्न अत्यन्त शोभित होते हैं; मध्य-मध्यमें महामणियाँ अनेक चन्द्रमा तथा सूर्यके समान दीप्यमान होती हैं। दिव्य दीप्त नीलवर्णपर ये नानाविध मौक्तिक, स्तबक, रत्न और वन्य पुष्प आदिके द्वारा विविध प्रकारके वर्ण परस्परसे सुरंजित हो रहे हैं। इन सबकी सम्मिलित शोभा अति विलक्षण है। इस दिव्यातिदिव्य शोभा और सौन्दर्यपर, इसके अति सुरम्य सौरभ और मधुरतम मकरन्दपर मँडराते हुए गुंजारव करनेवाले भ्रमर भगवान्के गुणगान करनेवाले नित्यमुक्त भक्त हैं। दिव्य विग्रहके अनुलेपनकी शोभा इस दिव्य मंगलमय विग्रहके सर्वांगमें कुंकुम- मिश्रित हरिचन्दनका ऐसा सुन्दर शुभ्र विलेपन है, जैसे महेन्द्र-नीलमणिपर्वतपर चन्द्रमाकी चन्द्रिका फैली हो और उस चन्द्रिकामें उज्ज्वल नीलिमा जगमगा रही हो। ऐसी इस उज्ज्वल नीलिमायुक्त चान्द्रमसी ज्योत्स्नासे सुशोभित स्वरूपसे दिव्यातिदिव्य अष्टविध सौगन्ध्यका प्रादुर्भाव हो रहा है। भगवान्के देवदुर्लभ दिव्यातिदिव्य वदनारविन्दका दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्य परम भावुकोंको ही अनुभूत होता है। इस (१) भगवदीय दिव्य- वदनारविन्दके परम दुर्लभ सौगन्ध्यके साथ, (२) सर्वांगमें हरिचन्दनका जो विलेपन है, उसका सौगन्ध्य है, (३) उस हरिचन्दनमें जो कुंकुम मिली हुई है, उसका भी एक अति मनोहर सौगन्ध्य है, (४) पुष्पमालाओंके मध्यमें जो तुलसिका है, उसका शीतल मधुर दिव्य सौगन्ध्य कुछ और ही है, फिर (५) अनेकविध सौगन्ध्योपेत वन्यपुष्पस्तबकोंका सौगन्ध्य अपनी सत्ता अलग बता रहा है, (६) हरिचन्दनका सौगन्ध्य और कुंकुम-कस्तूरीका सौगन्ध्य दोनों मिलकर एक तीसरा ही अद्भुत सौगन्ध्य अनुभूत करा रहे हैं, (७) कुंकुममिश्रित हरिचन्दन और वन्य पुष्प दोनोंके सौगन्ध्य मिलकर भी एक विलक्षण सौगन्ध्य उत्पन्न कर रहे हैं और (८) भगवदीय, वदनारविन्दका सौगन्ध्य तथा इन सब पुष्पादि
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सामग्रियोंका सौगन्ध्य—ये सब मिलकर एक अति विलक्षण, अति दिव्य, अति मनोहर सौगन्ध्य समुत्पन्न कर रहे हैं। ये भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहके दिव्यातिदिव्य अष्टसौगन्ध्य हैं और ऐसे ही दिव्यातिदिव्य अष्टसौगन्ध्य भगवान्के वामपार्श्वमें विराजनेवाली श्रीवृषभानुनन्दिनीजीके भी मंगलमय विग्रहसे प्रादुर्भूत हो रहे हैं। दोनोंके द्विविध अष्टसौगन्ध्य मिलकर एक अलौकिक सौगन्ध्य-माधुर्य-सुधाका वर्षण कर रहे हैं। दयितास्तनमण्डलवर्त्ति कुंकुमस्तूरिका-मिश्रित हरिचन्दन-विलेपनके दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यकी कल्पना और अनुभव परम भावुकके सिवा कौन कर सकता है? फिर इनपर भगवान्के दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्योपेत श्रीचरणोंका संयोग और उससे उत्पन्न होनेवाला दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्य! परम मनोहर, अत्यन्त सुकोमल चरण! उन श्रीचरणोंको परम भक्त व्रजांगनाएँ अपने वक्षःस्थलपर लेती हुई सकुचाती हैं और कहती हैं कि ये कठोर अंग श्रीभगवान्के सुकोमल चरणोंमें गड़ेंगे! इस दिव्यातिदिव्य भावकी कल्पना भी कोई पूर्ण कामजित् परम भावुक ही ठीक तरहसे कर सकता है और तब दयितास्तनमण्डलवर्त्ति कुंकुम-कस्तूरिका- मिश्रित हरिचन्दन-विलेपनके सौगन्ध्यके साथ श्रीभगवान्के श्रीचरण-सौगन्ध्यके दिव्यातिदिव्य संयोग- सौगन्ध्यके समास्वादनका अधिकारी हो सकता है। जिन्होंने व्रजमें विहार करते हुए कहीं तृणमें लगा हुआ कोई दिव्यातिदिव्य कुंकुम देखा और उसके परम दिव्य सौगन्ध्यसे निश्चय किया कि यह दयितास्तनमण्डलवर्त्ति परम पावन हरिचन्दन-विलेपन दिव्य सौगन्ध्यसे युक्त श्रीभगवान्के सुकोमल श्रीचरणोंका सौगन्ध्य है—यह कुंकुम श्रीवृषभानुनन्दिनीजीकी हृदयश्री और श्रीभगवान्के सुकोमल अरुणचरणपंकजश्रीके संयोगका परम सौभाग्यस्वरूप है, उस कुंकुमसे उन्होंने अपना सर्वांग विलेपन किया। कैसा अलौकिक प्रेम और भगवद्भावतादात्म्य है! भगवान्के इस अष्टविध दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यको तथा श्रीवृषभानु- नन्दिनीके अष्टविध दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यको और दोनोंके संयोगजन्य दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यको परम भावुक उपासक ही जानते हैं। उपास्यके ये दिव्य सौगन्ध्य उपासकोंको भी प्राप्त होते हैं। भगवान्की कामकलभशुण्डके समान सुडौल, गोल, सुन्दर चढ़ाव-उतारवाली दिव्य उज्ज्वलनील भुजाओंपर भी अन्य अंगोंके समान ही कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित शरच्चन्द्रमरीचिवत् दिव्य हरिचन्दनका लेप है। उसपर उज्ज्वल सुवर्णकंकणों और बाजूबन्दोंकी उज्ज्वल पीतिमा भी कुछ-कुछ प्रतिबिम्बित हो रही है। हाथके पंजोंके साथ ये हाथ ऐसे मालूम हो रहे हैं, जैसे दिव्यलोकके पंचशीर्ष नाग हों। ये पाँचों उँगलियाँ उन्हींके पंचशीर्ष-जैसे हैं और इन उँगलियोंमें जो नख हैं, वे पंचशीर्ष नागोंके शीर्षस्थ मणियोंके समान ही चमक रहे हैं। करतलकी सुकोमल अरुणिमा अरुण कमलकी- सी ही विकसित हो रही है और करपृष्ठ सर्वांगके समान ही उज्ज्वल नील हैं और उनपर कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित दिव्य हरिचन्दनकी चाँदनी छिटक रही है। उँगलियोंकी सन्धिमें अरुणिमा और नीलिमाका तारतम्य है। पृष्ठभागसे संलग्न सन्धिका सूक्ष्म भाग अधिकतर उज्ज्वल नील और तल संलग्न सन्धिभाग अरुणिमा-विशिष्ट है। भगवान् अपने इन अरुण करतलोंमें अपना शंख लेकर जब बजाते हैं, तब यह धवलोदर शंख अरुणायमान होकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इन दो अब्जखण्डोंके बीच कोई कलहंस कलनाद कर रहा हो। श्रीभगवान्के दिव्य श्रीमुखाम्बुजमें कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनके द्वारा नाना भावपूर्ण नानाविध चित्र ललाट, कपोल, चिबुक और करोंपर भावुक लोग चित्रित करते हैं। उज्ज्वल नील मुखाम्बुज, उसपर मकरन्द-पानके लोभी मधुपोंकी नीलिमा, मकराकृत कुण्डलोंकी चंचल दीप्तिमत्ता और किरीटकी दिव्यातिदिव्य शोभा और इन्हीं विविध आभाओंके भीतर कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित दिव्य हरिचन्दनके परम मनोरम चित्र
भगवान्का मंगलमय स्वरूप ३५ मिलकर ऐसी शोभा उत्पन्न करते हैं, जिसका शब्दोंद्वारा वर्णन नहीं हो सकता। उसका समास्वादन तो भावुकोंको ही होता है। दिव्य सौन्दर्यसम्पन्न मुखाम्बुज तो मुखाम्बुज ही है, भगवान्के दिव्य करोंकी छटाको भी कोई लेशमात्र ही देख ले तो उसके दुःखगर्भ सारे सांसारिक सुख ही छूट जायँ। इस प्रसंगमें श्रीराधावल्लभजीके मन्दिरमें एक वेश्यासक्त राजकुमारकी कथा प्रसिद्ध है। यह राजकुमार इतना वेश्यासक्त था कि उस वेश्याका एक क्षणके लिये भी विरह नहीं सह सकता था। वेश्या सामने न हो तो वह खा-पी नहीं सकता था और न कोई काम कर सकता था। उसकी वेश्यासक्ति छुड़ाकर उसे भगवद्भक्ति प्राप्त करा देनी चाहिये, ऐसी अनुकम्पा सम्प्रदायके आचार्यश्रीके हृदयमें हुई। उन्होंने राजकुमारको अपने यहाँ लिवा लानेका प्रबन्ध किया। बिना वेश्याके राजकुमार भगवान्के मन्दिरमें भी नहीं जा सकता था। इसलिये आचार्यश्रीने उसे वेश्याके साथ ही आनेकी अनुमति दी। वेश्याके साथ, वेश्याका ही मुँह निहारते हुए, राजकुमार पधारे और श्रीभगवान्के मन्दिरमें भी ऐसे बैठ गये कि उनके सामने तो वेश्या थी और वेश्याके पीछे श्रीभगवान्की दिव्य मंगलमय मूर्तिको राजकुमार नहीं देख सकते थे। आचार्यश्रीने वेश्याको राजकुमारके सामने ही रहने दिया, पर ऐसा उपाय किया कि वेश्याके पीछेसे भगवान्का करारविन्द इनकी दृष्टिमें आ जाय। यहाँ भक्तपरवश भगवान्ने आचार्यश्रीकी इच्छाके अनुसार अपने करारविन्दमें वह सौन्दर्य प्रकट कर दिया कि वह वेश्यासक्त क्षणमात्रमें भगवदासक्त हो गया। वेश्याको देखते- देखते ही वेश्याके पीछे चमकते हुए करारविन्दपर इसकी जो दृष्टि पड़ी तो सदाके लिये वहाँ गड़ ही गयी। करारविन्दके उस सौन्दर्यको देखते ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डका मदन-सौन्दर्य अधोभूत हो गया। अधोक्षज भगवान्के करारविन्दकी दिव्य छटाने राजकुमारको सदाके लिये अपने वशमें कर लिया। भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य ऐसा ही है कि एक क्षणके लिये भी उस सौन्दर्य-माधुर्यका लेशमात्र भी किसीपर प्रकट हो जाय तो फिर वहाँसे वह लौट नहीं सकता। इस सौन्दर्य-माधुर्यकी स्फूर्ति भगवान्की अनुकम्पासे विशुद्धातिविशुद्ध अन्तःकरणमें ही होती है। भगवान्की अनुकम्पा जीवको दो प्रकारसे प्राप्त होती है, एक तो अपने साधनसे जैसे ध्रुवको प्राप्त हुई और दूसरे भगवान्की अपनी दयामयी इच्छासे जैसे राजा परीक्षित्को गर्भमें ही प्राप्त हुई। श्रीभगवान्के गलेमें अनेकविध दिव्य वन्यपुष्पोंके स्तबकादिसे युक्त दिव्य सौगन्ध्यमय मालाएँ हैं। उनपर फिर कोटि-कोटि विद्युतोंकी चंचल दीप्तिको तिरस्कृत करनेवाला सुवर्णोज्ज्वल चंचल पीतपट ऐसा उल्लसित हो रहा है, जैसे महेन्द्रनीलमणि पर्वतपर दिव्य विद्युत्-पुंज चमचमा रहा हो और उसमेंसे दिव्य मंगलमय विग्रहकी नीलिमा-दीप्ति भेदकर बाहर निकल रही हो। उज्ज्वल-नीलिमा-सम्पन्न वक्षःस्थलपर सुवर्णो- ज्ज्वल मंगलमय वामावर्त और दक्षिणावर्त रोमराजि दीख रही है। यहीं तो चपला चंचला श्रीमहालक्ष्मीका निवास है। भगवान्को भक्तोंने जो मालाएँ पहनायी हैं, वे लक्ष्मीजीको गड़ती हैं, पर भक्तोंपर आदर दिखानेके लिये भगवान् उन मालाओंको पहने ही रहते हैं और सपत्नीजन्य दुःख लक्ष्मीजीके पीछे लगा ही रहता है। गलेसे लेकर पादाम्बुजतक लटकनेवाले पुष्पहारोंके मध्यमें जो तुलसिका है, उसका तो भगवान् इतना आदर करते हैं कि लक्ष्मीजीसे वह देखा नहीं जाता। पादाम्बुजमें अवश्य ही लक्ष्मीजी तुलसीके साथ रहनेमें सुखी हैं, परंतु वक्षःस्थलपर नहीं; उसपर तो लक्ष्मीजी अकेली ही रहना चाहती हैं। वक्षःस्थलके मध्यमें भगवान् भृगु-चरण धारण किये हैं और लक्ष्मीजीसे मानो यह कह रहे हैं कि महालक्ष्मी ! यहाँ जो तेरी स्थिति है, वह ब्राह्मणके चरणसे ही है। यह हृदय 'हताहंस' होनेके कारण ही चंचला लक्ष्मी यहाँ
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अचला है। भगवान्के वक्षःस्थलपर रहनेवाले ब्राह्मणचरण और महालक्ष्मी दोनों ही एक स्वरसे मानो यह कह रहे हैं कि जहाँ ब्राह्मणोंके चरणोंकी रज पड़ेगी, वहीं चंचला लक्ष्मी स्थिर हो जायगी। लक्ष्मी वहाँ नहीं ठहरती, जहाँ ज्ञान, विद्या, तप आदि नहीं हैं; क्योंकि ज्ञान, विद्या, तप, भूति आदि लक्ष्मीके ही रूप हैं। अर्थात् श्रीभगवान् मानो यह सूचित करते हैं कि जहाँ ब्राह्मण-चरण निवास करेंगे, वहीं श्रीनिवास होंगे और वहीं सकल प्रकारकी श्रीका निवास होगा। भगवान्के दिव्यातिदिव्य कमलसे सुकोमल वक्षःस्थलमें ब्राह्मणके चरण कठोर नहीं प्रतीत हुए। उलटे भगवान्को यह क्लेश हुआ कि इस वक्षःस्थलकी कठोरतासे भृगुमहाराजके सुकोमल चरणोंमें कुछ चोट तो नहीं आयी। कारण, लक्ष्मीका जहाँ निवास होता है, वहाँ हृदयमें कठोरता आ जाती है। ब्राह्मण इस कठोरतापर पैर देकर भगवान्की स्तुति करते हैं, यही ब्राह्मणोंका ब्राह्मणत्व है। यह कठोरतारूप-अंहस भृगु-चरणोंसे धुला है और जहाँ कहीं यह अंहस है, वहाँ वह ब्राह्मणचरणोंसे ही धुल सकता है और महालक्ष्मीजीका जो दिव्यातिदिव्य सुकोमल भाव है, वह प्रकट हो सकता है। इस दिव्य मंगलमय विग्रहरूपमें अचिन्त्यानन्त ब्रह्मानन्द-सुधासिन्धुस्वरूप परमतत्त्व भगवान् ही श्यामीभूत होकर प्रकट हुए हैं। इनके गलेमें वक्षःस्थलपर गुंजाहार पड़ा हुआ है। ये गुंजाएँ कोई प्राकृत गुंजाएँ नहीं हैं, ये सब परम तपस्वी महामुनि हैं, जिन्होंने इस पुण्यारण्य वृन्दावनधाममें भगवदीय लीलामें योग देनेके लिये गुंजारूप धारण किया है। यहाँ मयूरपिच्छादिको भी भगवान्ने अपना दिव्यातिदिव्य धाम दिया है। इस वृन्दावन लीलाधामकी विलक्षण महिमा है, जिसे देखकर ब्रह्मा भी यहाँ 'गुल्मलताौषधी' बनकर निवास करनेकी इच्छा करते हैं। वामावर्त और दक्षिणावर्त उभय रोमराजियोंके मध्यमें ये भृगुचरण हैं। इनपर वक्षःस्थलमें जो दिव्य मालाएँ पड़ी हैं, उनसे भगवदीय अष्टगन्धसौगन्ध्यसे अतिमत्त हुए भ्रमरोंकी मधुर झंकार निकल रही है। नाभिप्रदेशमें अति सुन्दर मनोहर तीन रेखाएँ (त्रिवलि) हैं और मध्यमें यह दिव्य मनोहर सरोवर श्यामसलिला कालिन्दीका अति विलक्षण आकर्षणवाला भँवर-सा सोह रहा है। इसीसे तो सारे ब्रह्माण्डका प्रादुर्भाव हुआ है। भगवान्की भुजाएँ, भावुकोंकी कल्पनाके अनुसार दो भी हैं और चार भी। इनका गठन कैसा सुन्दर और कैसा गोल! और घुमाव, चढ़ाव तथा उतार भी अत्यन्त मनोहर! सर्वांगके समान इनपर भी कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित हरिचन्दनका शुभ्र लेप है। भुजाओंकी दीप्ति-विशिष्ट नीलिमा, हरिचन्दनकी शुभ्रता और करारविन्दके अन्तर्भागोंकी अरुणिमा-तीनों मिलकर नखमणि-ज्योतिके घाटपर कैसा दिव्य मनोहर गंगा- यमुना-सरस्वतीका संगम साध रहे हैं। इन दिव्य मनोहर भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म सुशोभित हैं। शंख जलतत्त्व है, कौमोदिकी गदा ओजतत्त्व है, सुदर्शन चक्र तेजस्तत्त्व अथवा यदि खड्ग देखें, तो नभस्तत्त्व है। भगवान्के कटितटकी शोभा भगवान्के दिव्य कटितटमें काँची (मेखला) है, जिसकी कई लड़ें हैं। कटितटसे गुल्फपर्यन्त पीताम्बर परिधान धारण किये हैं, जो अति सूक्ष्म और दिव्य है। उसमेंसे भगवान्की नीलकान्तिदीप्ति स्पष्ट ही उद्भासित हो रही है। पीतपटसे समाच्छन्न भगवदीय दीप्तिमत्ता और नीलिमासे युक्त वह नानाविध रत्नोंसे जटिल मुक्तामध्य मेखला नितम्ब-बिम्बपर आकर अत्यधिक सुशोभित हो रही है। काँचीकी बड़ी मधुर झनझनाहट है। भगवान् यहाँ ज्ञानमुद्रावाले परम शान्त गम्भीर पुरुष नहीं हैं। यहाँ तो चंचल चपल त्रिभंगी छविवाले वंशीधर श्रीकृष्ण हैं, जिनकी चंचलता व्रजांगनाओंके अंचल पकड़नेमें भी नहीं चूकती। वाह री! वह कामजित् दिव्य चंचलता, जिसको सम्बोधनकर चंचलताको प्राप्त व्रजांगना परम रसरसिकोंके विनोदार्थ
ही मानो यह कहती है कि—‘मुञ्चाञ्चलं चञ्चल पश्य लोकं बालोऽसि नालोकयसे कलङ्कम्। भावं न जानासि विलासिनीनां गोपाल गोपाल- नपण्डितोऽसि॥’ भगवान्ने किसी व्रजांगनाका मानो अंचल पकड़ा। उसपर व्रजांगना ठिठककर कहती है कि ‘अरे चंचल ! मेरा अंचल क्यों पकड़ा है ? छोड़, छोड़; लोग देखेंगे तो तुझे या मुझे क्या कहेंगे ? लोकलाजका तुझे कुछ ध्यान नहीं, तू कैसा गँवार है ?’ इसपर भगवान्ने उस व्रजवनिताका अंचल छोड़ दिया और दूसरी ओर देखने लगे। तब व्रजांगना कहती है—‘आखिर तू है वही गौएँ चरानेवाला चरवाहा! तू विलासिनियोंका भाव क्या समझे ? ‘गोपाल! गोपालनपण्डितोऽसि’—गोपाल! तू गोपालनका ही पण्डित है।’ अथवा ‘गोपाल! गोपाल! न पण्डितोऽसि!’ अरे गोपाल ! इधर तो देख ! तू तो कुछ समझता ही नहीं। इस दिव्य चांचल्यकी लीलासे मुग्ध होकर जो इस गोपालन-पण्डित गोपालबालके निष्कलंक दिव्य क्रीडनमें अनन्य होकर सम्मिलित हुए, वे ही संसारमें धन्य हुए। अन्योंके लिये तो यहाँ झाँकना भी निषेध है। भगवान्के ऊरु कदलीस्तम्भ-से कहे जाते हैं। कदलीस्तम्भोंमें जो स्थूलता-सूक्ष्मताका तारतम्य तथा जो चिक्कणता होती है, वही यहाँ विवक्षित है। यहाँ भी वही दीप्तिविशिष्ट नीलिमा है, जो पीताम्बरकी मनोहर पीतिमाको भेदकर बाहर निकल रही है। श्रीभगवान्के अतसिका-कुसुमके-से उज्ज्वल नील ऊरुद्वय श्रीगरुड़जीके स्कन्धोंपर अति शोभायमान हो रहे हैं। यह गरुड़जी साक्षात् ऋक्, साम, यजुः- स्वरूप शब्दब्रह्म हैं, जिनपर शब्दातीत अशेष विशेषातीत सच्चिदानन्दघन अक्षर परब्रह्म परमात्मा अधिष्ठित हैं— ‘त्रिवृद्वेदः सुपर्णाख्यो यज्ञं वहति पूरुषम्॥’ (श्रीमद्भा० १२।११।१९) भगवान्के वाम स्कन्धके ऊपर दक्षिण स्कन्धके नीचे कटितटतक वर्तुलाकार त्रिवृत सुवर्णोज्ज्वल पीत यज्ञोपवीत सुशोभित है। यह ब्रह्मसूत्र एकाक्षर प्रणव है, जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्डका मूलसूत्र है। भगवान् जो केवल सविशेष नहीं, केवल निर्विशेष भी नहीं, प्रत्युत सविशेष-निर्विशेष दोनों मिले हुए पूर्ण परब्रह्म हैं, वही इस मंगलमय विग्रहरूपमें प्रकट हुए हैं। गरुड़, शेष तथा शंख-चक्रादि अंग जो इस लीलाविग्रहमें प्रकट हैं, वे भी उनके पूर्ण परब्रह्म स्वरूपमें अभिन्नरूपसे अन्तर्गत हैं। सांगोपांग परम भगवत्तत्त्व ही इस लीलामय विग्रहमें प्रादुर्भूत है। इस लीलामय विग्रहकी स्थिति अव्याकृतमें है। कुछ आचार्योंका ऐसा मत है कि यहाँ भी उनका निवास अक्षर ब्रह्ममें है। परब्रह्मके अक्षर रूप तीन हैं—(१) माया, (२) मायाविशिष्ट चैतन्य और (३) परात्पर पूर्णब्रह्म। अव्याकृत मायाविशिष्ट चैतन्य ही शेष भगवान् हैं, उन्हींमें श्रीभगवान्का निवास है— ‘अव्याकृतमनन्ताख्यमासनं यदधिष्ठितः।’ (श्रीमद्भा० १२।११।१३) तमोरजोलेशसे असंस्पृष्ट, महावाक्यजन्य ब्रह्माकारा वृत्तिरूपमें परिणत विशुद्ध सत्त्व ही कमल है—‘धर्मज्ञानादिभिर्युक्तं सत्त्वं पद्ममिहोच्यते॥’ (श्रीमद्भा० १२।११।१३) ओजः तत्त्व गदा है, अप्तत्त्व शंख है, तेजस्तत्त्व सुदर्शन है और नभोनिभ कृपाण नभस्तत्त्व है। भगवान्के जानुद्वय श्रीमहालक्ष्मीके अति सुकोमल अरुण कर-कमलोंसे लालित हैं। गुल्फोंमें अनेकविध आभूषण और रत्नजटित नूपुर हैं, जिनकी झंकारसे त्रिभुवन आह्लादित होता है। आत्मज्योतिविग्रह कौस्तुभमणिसुशोभित उज्ज्वल-नील कण्ठदेशसे गुल्फप्रदेशपर्यन्त नील पदारविन्द-पारदर्शी उज्ज्वल पीतपट उभय पार्श्वमें विद्युल्लताओं-सा चमक-दमक रहा है और उसका नानाविध रत्नोंसे जटिल किनारा अपनी रंग-बिरंगी छटा उसमें मिलाकर एक अति विलक्षण शोभा उत्पन्न कर रहा है। उसे देख-देखकर भावुक अपने नयनोंकी आस पूरी करना चाहते हैं, पर भगवदीय दिव्य-मंगलमय विग्रहकी यह सारी शोभा अनन्त और नित्य नवीन होनेसे सदा ही उस सौन्दर्य- सुधारस-पानकी प्यास अधिकाधिक बढ़ानेवाली है।
गत तुलसी-सौगन्ध्यके वायुसे संसृष्ट होकर L65: सनकादि मुनीन्द्रोंके हृदयमें प्रविष्ट होनेसे उनके भी L66: तन-मन-प्राण क्षुब्ध हुए और भगवान्के चरणोंकी L67: ओर उनको राग हुआ। इसी दिव्य क्षोभसे सात्त्विक L68: अष्टभाव प्रादुर्भूत होते हैं। भगवान्के अन्य अंगोंने L69: मुनीन्द्रोंको इतना नहीं मोहा, जितना कि चरणाम्बुजोंने। L70: इन चरणोंकी दिव्य सौगन्ध्यमय शोभापर वे मानो
Check line 54: "किंचित् अरुण हो रही है। ऊपर चरणोंके पृष्ठभाग" Wait, does it say पृष्ठभाग or पृष्ठभागकी? In image: "ऊपर चरणोंके पृष्ठभाग" "नीलिमा, पृष्ठ और नखोंकी सन्धिकी अरुणिमा और" Yes, exactly "पृष्ठभाग"!
Everything is clear, accurate, and faithful to the original image.भगवान्के चरणारविन्दोंकी शोभा श्रीभगवान्के चरणारविन्दमें कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनके नानाविध अति सुन्दर मनोहर चित्र अंकित हैं। पादांगुलियोंपर जो नख हैं, वे मानो दिव्यातिदिव्य मोती हैं या इन्हें दिव्यातिदिव्य नखमणि
बिक गये और उन्होंने यही प्रार्थना की कि हमारा यह मन मत्तभृंगके समान आपके चरणारविन्दमें लालायित रहकर सदा यह दिव्य मकरन्द पान करता रहे। भगवान्के चरणतल दिव्य कमलपर न्यस्त- सुशोभित हैं। विशुद्ध सत्त्व ही यह कमल है, विशुद्ध अन्तःकरणपर ही तो भगवान्का प्रादुर्भाव होता है। सुकोमल कमलकी अति कोमल पंखुड़ियोंकी अनन्तकोटि गुणित सुकोमलता भी महालक्ष्मीके चरणाम्बुजोंकी सुकोमलताकी बराबरी नहीं कर सकती। महालक्ष्मीके कर-कमलोंकी सुकोमलता उससे भी सूक्ष्म है और उससे भी कहीं अधिक सूक्ष्म भगवान्के चरणोंकी सुकोमलता है, जिसकी किसी प्राकृत उपमानसे कल्पना नहीं हो सकती। हाँ, इन उपमानोंसे कल्पना करनेमें सहायता मिलेगी, यथार्थ बोध तो भगवत्कृपासे ही सम्भव है। भगवान्के चरणचिह्नोंकी शोभा श्रीभगवान्के चरणचिह्न अलौकिक श्रीशोभा और सौन्दर्य-स्वरूप हैं। जिस किसीने इन चरणचिह्नोंका सौन्दर्य देखा, उसीकी दृष्टि सदाके लिये उनमें स्थिर हो गयी। भगवान्के भक्त इन्हीं चरणचिह्नोंको देख- देखकर अपने कामादि दुर्भावोंको नष्ट करनेमें समर्थ होते हैं। ये चिह्न किसी आचार्यके मतसे १५, किसीके मतसे १६ और किसीके मतसे १९ हैं। श्रीभगवान्के दक्षिण पादांगुष्ठमें एक दिव्य चक्र है। इस चक्रके ध्यानसे चिद्ग्रन्थिका छेदन होता है। अंगुष्ठके पर्वमें यवका ध्यान है, जो सुख-सम्पदाका देनेवाला है। अंगुष्ठ और तर्जनीके बीचमेंसे चरणके मध्यतक एक ऊर्ध्व रेखा है। अंगुष्ठके चक्रके अधोभागमें तीन चिह्न हैं—पर्वमें यव, मूलमें चक्र और नीचेकी ओर तापनिवारक छत्र है। मध्यमांगुलीके मूलमें कमल है। यह अति शोभन है। यहाँ ध्याताका मन-मधुप मुग्ध हो जाता है। इस कमलके नीचे ध्वज है, जिसके अनुसन्धानसे सब अनर्थोंका नाश होता है। कनिष्ठिकाके मूलमें वज्र है, जिसके ध्यानसे भक्तोंके पाप-पर्वत नष्ट हो जाते हैं। एड़ीके मध्यमें अंकुश है, जो भक्तचित्तके मत्तगयन्दको वशमें करनेवाला है। श्रीभगवान्के दक्षिण पादका परिमाण लम्बाईमें १४ अंगुल है और चौड़ाईमें ६ अंगुल है। पदके मध्य भागमें ४ अंगुल स्थानमें कलश-चतुष्टय हैं और उनके अगल-बगल ४ जम्बूफल हैं। अधोभागमें द्वितीयाका चन्द्र अंकित है, जो भक्तोंके शुभका सूचक है। उससे भक्तके आह्लादकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। चन्द्रमाके नीचे गोपदी है, जो भवसागरको गोपदके समान कर देता है अर्थात् भगवत्समाश्रयण करनेवाले भवसागरको गोपदके समान बिना प्रयास ही पार कर जाते हैं। श्रीभगवान्के वामपादांगुष्ठके मूलमें दिव्य शंख है। उसका ध्यान करनेसे पार्थिव जड़त्व दूर होता है और सब मल धुल जाते हैं तथा ऋक्, साम, यजुरादि शुद्धातिशुद्ध मानसी-वृत्तिरूपा समस्त विद्याएँ ऐसे स्वच्छ अन्तःकरणमें प्रस्फुरित होती हैं, जैसे कि ध्रुवके कपोलमें शंखस्पर्श होते ही उसे समस्त विद्याएँ एक क्षणमें प्राप्त हो गयीं। वामचरणकी मध्यमांगुलीके मध्यमें अम्बरका अनुसन्धान है। अम्बर (आकाश) जैसे असंग है, वैसे ही इसके ध्यानसे ध्याताका चित्त भी विषय-रागसे विमुक्त और असंग होकर व्यापक परब्रह्माकाराकारित हो जाता है। वामपादारविन्दमें चार स्वस्तिक हैं, ये सकल शुभके सूचक हैं। स्वस्तिकोंके बीचमें अष्टकोण हैं। किसीके मतसे ये अष्ट- महासिद्धियोंके देनेवाले हैं और किसीके मतसे यह अष्ट लोकपाल हैं, जो यहाँ भक्तोंकी प्रतीक्षा किया करते हैं। वामपादकी कनिष्ठिकामें सूर्यतत्त्व अंकित है, जिसके अनुसन्धानसे अनेक प्रकारके ध्वान्त तिरोहित होते हैं। वामपादारविन्दमें ज्यारहित इन्द्र-धनुषका अनुसन्धान है। धनुषके पीछे चार कलश हैं। इनके बीचमें त्रिकोण है, जो त्रिलोकैश्वर्याधिकार सूचित करता है। त्रिलोकैश्वर्यकी प्राप्तिके लिये इस त्रिकोणका अनुसन्धान है, पर भगवद्भक्ति जिनमें पूर्ण होती है, वे भगवान्को छोड़ त्रैलोक्यके पीछे नहीं भटका करते। परम भक्त तो वही है, जिसकी भक्ति-गंगाकी धारा
अनवरत श्रीकृष्णचन्द्ररूप आनन्दसुधा-सिन्धुकी ओर ही प्रधावित होती है। भगवदीय कथासुधाका पान करते-करते कुछ कालमें भगवत्कथासे अनुराग होता है और यह अनुराग बढ़ते-बढ़ते प्रभु-चरणोंमें अनन्य हो जाता है। ऐसी अनन्य भक्ति जिसे प्राप्त हुई, वह लवनिमेषार्धके लिये भी त्रैलोक्यैश्वर्यके लिये भी प्रभु- चरणोंसे पृथक् नहीं होता। त्रिकोणसे दूसरा अभिप्राय त्रैगुण्य-विषय भी ले सकते हैं— मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ (गीता १४।२६) अथवा यह कहिये कि ऋक्-साम-यजुः—इन तीनों वेदोंसे प्रतिपाद्य जो तत्त्व है, उसकी प्राप्तिका यह सूचक है—'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः।' (गीता १५।१५) मनोवाक्काय तीनोंसे भगवान् ही वन्द्य हैं और तीनों अवस्थाओंमें भी वे ही एक आराध्य हैं। ऐसी अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ इस विषयमें भावुक कर सकते हैं। श्रीभगवान्के चरणचिह्न श्रीविष्णुपुराणमें १५ ही मिले। जीवगोस्वामी आदि आचार्योंने १९ निश्चित किये हैं। श्रीचरणोंके अंगुलादि परिमाण भी हैं। इन परिमाणोंको देखें तो १६ ही चिह्न रहते हैं। श्रीभगवान्के रूप और वर्ण आदिकी भावनाके अनुसार ही कल्पना करनी चाहिये। सगुणरूपमें भगवान् स्वतन्त्र नहीं होते—भक्त-भावनाके अधीन होते हैं; क्योंकि भक्तकी भावना-सिद्धिके लिये ही उनका प्रादुर्भाव होता है। स्वयं ब्रह्माजीने भगवान्की स्तुति करते हुए कहा है कि— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) भगवान् भक्तोंके पराधीन हैं। स्वेच्छामय हैं अर्थात् स्वकीयोंकी इच्छाके अधीन हैं। 'तं यथायथोपासते तथैव भवति' ऐसी श्रुति है और गीताका भी यह वचन प्रसिद्ध है कि— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११) अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके निदान भगवान् और भगवान्के निदान भक्त। इसलिये सर्वजगन्नियामक भक्त ही हुए। ये यदि श्रीभगवान्के पदचिह्नोंको जरा इधर-उधर कर दें तो ऐसा करनेमें वे स्वतन्त्र हैं। वे जो भी कल्पना करेंगे, वह सत्य है। वह कल्पना सत्य होती है, इसीसे तो भक्तोंकी कल्पनाके अनुसार भगवान् नित्य नये रूपमें प्रकट होते हैं। मनुष्यके मनका यह स्वभाव है कि वह नित्य नयी बात चाहता है। इसलिये भावुकोंको नित्य नूतन कल्पना करनी आवश्यक ही है। भगवान्के रूप ही नहीं, भगवान्के चरित्र भी भावुकोंको नित्य नवीन प्रतीत होते हैं—'तस्यांघ्रियुगं नवं नवम्।' श्रीभगवत्तत्त्व तो अनन्त है। जैसे-जैसे जिसका मन विशुद्ध होता जाता है, वैसे-वैसे नव-नव रूप- चमत्कृति देखनेको मिलती है। भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहमें नित्य नवीन कल्पना करनेमें सच्चे भावुक स्वतन्त्र हैं। उन्हें भगवान्के भूषणवसनादिमें नित्य नयी-नयी कल्पना करनी ही चाहिये। सगुण उपासकोंके लिये यह आवश्यक है। जैसे भगवान्के पीतपटको कहीं विद्युत्का उपमान दिया गया है तो कहीं कदम्ब-किंजल्ककी-सी आभा बतायी गयी है और कहीं रविकिरणकी उपमा दी गयी है। इसी प्रकार नखमणि कहीं मुक्तापंक्ति है तो कहीं नीलिमा, अरुणिमा और स्वच्छताके दिव्य सम्मेलनका ध्यान है और कहीं उसमें अँगूठियोंकी दीप्तिमत्ता भी मिली हुई है और नखमणि-मण्डलकी ज्योत्स्ना ऊर्ध्वमें उच्छ्वसित हो रही है। भगवान्के युगलस्वरूपके चिन्तनसे अन्तःकरणकी निर्मलता भगवान्के श्रृंगारके सम्बन्धमें इसी प्रकार आठों यामकी अष्टविध कल्पनाएँ हैं। भगवान्का रूपसौन्दर्य- माधुर्य प्रतिक्षण नवीन होता रहता है, इसलिये कम- से-कम ८ पहरमें ८ बार तो नवीन कल्पना करनी ही
'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४१ चाहिये। इसी प्रकार मुक्ता-माल, गुंजा, किरीट, मयूरपिच्छ आदिके विषयमें बड़ी-बड़ी कल्पनाएँ भक्तोंने की हैं। भगवान्का मयूरपिच्छ-विनिर्मित मुकुट बंक होता है, अर्थात् कहीं दक्षिण और कहीं वाम ओर झुका रहता है। यह दक्षिण-वाम ओरका बाँकपन श्रीकृष्ण और श्रीराधिकाजीका परस्पर स्वात्मार्पण सूचित करता है। दोनोंके आभूषण भी परस्पर स्वात्मार्पणका भाव लिये हुए रहते हैं। आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीवृषभानु-नन्दिनीके परस्पर स्वात्मार्पण और मिलनके अनेक भाव हैं। श्रीवृषभानुनन्दिनीके बिना श्रीकृष्णचन्द्रका ध्यान पूर्ण नहीं, क्योंकि श्रीराधिकाजीका सौन्दर्य-माधुर्य ही श्रीकृष्णचन्द्रका दृग्विषय है। उसका वर्णन सनकादि मुनीन्द्र भी नहीं कर सके। वह वर्णनातीत है। श्रीराधिकाजीका गौर तेज श्रीकृष्णचन्द्रकी श्याम कान्तिमें और श्रीकृष्णकी श्याम कान्ति श्रीवृषभानु- नन्दिनीकी गौर कान्तिमें भावुकोंके देखनेकी वस्तु है। अस्तु, इस प्रकार युगल मूर्तिका नानाविध भावोंसे अनुसन्धान करते-करते मल सर्वथा धुल जानेपर विशुद्ध अन्तःकरणमें भगवत्स्वरूपका प्राकट्य होता है।
'साक्षान्मन्मथमन्मथः'
भगवान् तथा कामदेवका संवाद ब्रह्म-इन्द्रादि देव-शिरोमणियोंपर विजय प्राप्त कर लेनेसे कामदेवको अखर्व गर्व हुआ और उसे रुचि हुई कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्णचन्द्रपर विजय प्राप्त करूँ। ऐसा सोचकर भगवान्के पास जा उसने अपना मनोगत भाव प्रकट किया। भगवान्ने कहा कि तुम मुझसे कैसे लड़ना चाहते हो, दुर्गके आश्रयणसे या मैदानमें। कामने कहा—'भगवन्! इन दोनों युद्धोंका स्वरूप क्या है?' भगवान् बोले कि दुर्गका युद्ध यह है कि मैं विरक्त होकर, एकान्त निर्जन वनमें समाधिस्थ हो जाऊँ और फिर तुम यदि अपनी माया और कलाओंसे मुझे मोहित और क्षुब्ध कर सको, तब तुम्हारी विजय है, और न क्षुब्ध कर सको तो मेरी विजय होगी। मैदानका युद्ध दूसरे प्रकारका है। वह तब सम्भव है, जब श्रीमद्वृन्दावनधामके यमुनाका स्वच्छ सुकोमल पुलिन हो, अमृतमय पूर्ण चन्द्रमाकी दिव्य ज्योत्स्ना फैली हो, शीतल-मन्द-सुगन्ध पवनका संचार हो, विविध विहंगोंके कलरव एवं भ्रमरमण्डलियोंके गुंजारसे निनादित पुष्पित वनराजिकी लोकोत्तर सुहावनी छटा व्यक्त हो रही हो, हंस- सारसशोभित सरोवरकी अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य- सौरस्य-सम्पन्न, रतिके गर्वको दूर करनेवाली अपरिगणित व्रज-बालाओंके मध्यमें उनके मुखचन्द्रका चुम्बन करते हुए और उनके अवयवोंका आलिंगन करते हुए भी यदि मेरे मनमें विकार न हो तो मैं विजयी रहूँगा; और यदि मलयानिल तथा कान्ताओंके हाव-भाव और विलासोंसे मेरे मनमें क्षोभ हो जाय तो जीत तुम्हारी है। कामदेव मन-ही-मन विचार करने लगे कि यदि इन्होंने दुर्गका आश्रयण किया तो फिर मेरी विजय नहीं होगी, क्योंकि जिस समय ये नरनारायण- रूपसे योगासनासीन होकर बदरिकाश्रममें तप कर रहे थे, उस समय इन्द्रको यह भ्रम हुआ कि ये मेरे ऐन्द्र पदके लिये तपस्या कर रहे हैं, तब मैं इन्द्रका भेजा हुआ वसन्त-ऋतु तथा अप्सराओंके साथ नरनारायणके आश्रममें गया। अप्सराओंके अशेष हावभाव, वसन्तकी सहायता और मेरे बाण सब निष्फल हुए, फिर भी इनमें क्रोधका संचार नहीं हुआ, पुनः इन्होंने हम सबोंका आतिथ्य किया। तब अप्सराओंने कहा था कि 'हे नाथ! जिस भाँति सद्योजात बालिका हाव- भाव कटाक्षोंसे अपने प्रपितामहको मोहित करना चाहे, उसी भाँति आपकी मायासे मोहित होकर, हम सब आपको मोहित करने चली हैं।'
४२ भक्तिसुधा भगवान्ने आश्वासन करके सबको विदा किया, सो किलेबन्दीके युद्धमें इन्हें कौन पायेगा? अतः कामने कहा—'भगवान् ! आप मैदानमें ही मुझसे युद्ध कीजिये।' भगवान्ने कहा—'तथास्तु, मैं मैदानमें ही तुमसे युद्ध करूँगा।' कामदेव भी 'बहुत अच्छा' कहकर चला तो गया, पर उसने जाकर श्रीव्रजांगनाओंके शरीररूप कांचन दुर्गका आश्रयण किया। इधर श्रीकृष्णचन्द्रने विचार किया कि द्वितीयासे चतुर्दशीतक चन्द्रमा अपूर्ण रहते हैं, अतः उनपर राहु भी आक्रमण नहीं करता, सो भगवान् शंकरकी कोपाग्निसे दग्धप्राय अपूर्ण कन्दर्पपर विजय प्राप्त कर लेनेमें कौन-सी महत्ता है? अतः कन्दर्पको पूर्ण करके ही उसको जीतना युक्त है। बस, यह सोचकर श्रीकृष्णभगवान्ने मुरलीको, अपने अमृतमय मुखचन्द्रपर धारण करके उसे अधर- सुधासे पूरित किया और वेणुछिद्रोंद्वारा निःसृत गीतपीयूषको श्रोत्रपुटोंद्वारा व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाकर दग्धप्राय कन्दर्पको पुनरुज्जीवित किया। श्रीकृष्णकी अधरसुधासे दग्धप्राय काम उत्तेजित हो उठा। वेणुवादन व्याजसे मानो फूत्कारद्वारा कामाग्निको उत्तेजित करके उसमें अधर-सुधा-सिंचनद्वारा मानो घृतकी आहुति दी। इतनेपर भी व्रजेन्द्रनन्दनने यह सोचा कि यह कन्दर्प मनसे उत्पन्न होनेवाला है, इसीलिये मनसिज या मनोज कहलाता है। श्रीव्रजांगनाओंका मन मेरा भक्त है, अतः भगवद्भक्त पिताके सन्निधानसे कन्दर्पके प्रागल्भ्यमें प्रतिबन्ध हो सकता है। यही सोचकर भगवान्ने वेणुगीतपीयूषप्रवाहसे श्रीव्रजांगनाओंके मनको हरण कर लिया, यथा—'व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीत- मानसाः'। इतरप्रवाह स्वसंसृष्ट वस्तुको गन्तव्य स्थानमें ले जाता है, परंतु वेणुगीतपीयूषप्रवाह तो स्वसंसृष्ट पदार्थोंको अपने उद्गम-स्थान श्रीकृष्णके सन्निधानमें पहुँचाता है अथवा श्रीकृष्णचन्द्रके मुखपंकजसे निर्गत वेणुपीयूष व्रजांगनाओंके अनावृत कर्णकुहरमें प्रविष्ट होकर उनके हृदयमें विद्यमान धैर्य-वैराग्य-विवेक- लज्जादि रत्नोंसे पूरित मंजूषाको हर ले गया, इसलिये काम अत्यन्त स्वच्छ हो गया और वेणुगीतपीयूषसे आप्यायित होकर अत्यन्त प्रगल्भ हो गया। इधर वसन्तने भी सोचा कि मित्रका अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक विश्वपति भगवान्से संग्राम है, मुझे भी अपने मित्रकी सहायता करनी चाहिये। मेरे मित्र मनोज पुष्पधन्वा हैं, पुष्प ही इनके अस्त्र-शस्त्र हैं। विरहीजनोंके हृदय विदारण करनेके कारण ही मानो रक्तरंजित लाल किंशुक बरछीका काम करता है। कमल, कुन्द; कुड़मल, केतकी आदि ही भालाका कार्य करते हैं। ऐसे ही अन्यान्य पुष्प भी अस्त्र- शस्त्रका काम करते हैं। यह समझकर ही वसन्तने विविध प्रकारके कमल, कमलिनी, कुमुद, कुमुदिनी, केतकी, चम्पक, मालती आदि अनेक प्रकारके पुष्पोंको विकसित किया। इस भाँति मित्रकी सहायतासे सम्पन्न, हृष्ट-पुष्ट हो तथा शस्त्रसे सुसज्जित होकर व्रजांगनाओंके श्रीअंगोंके ही दिव्य कांचनमय कामगामी दुर्गमें अधिष्ठित हुआ और श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें श्रीकृष्णचन्द्रसे संग्राम करनेके लिये गया। भगवान् उस दिव्य धाममें आयी हुई श्रीव्रजांगनाओंके मध्यमें निर्विकार भावसे धर्म-तत्त्वका उपदेश करने लगे। तब कन्दर्पने कहा कि इन व्रजसुन्दरियोंके संगमें अंग-संग एवं विविध प्रकारके रास-विलासोंमें यदि आपका मन क्षुब्ध और मोहित न हो, तभी आप विजयी हो सकते हैं। श्रीकृष्णजीने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही किया। श्रीव्रजांगनाओंके श्रीअंगरूप कामदुर्गपर आक्रमण करके ब्रह्मादि-जय-संरूढ़-दर्प कन्दर्पके दर्पका दलन कर दिया। इतना ही नहीं, अपने स्वरूपभूत ब्राह्मसंस्पर्शसे व्रजांगनाओंको आत्मसात् करके उन्हें सर्वथा निर्विकार कर दिया। परिरम्भण करके, अलक-उरु-नीवी- स्तनका स्पर्श करके, परिहास, नखपात, क्ष्वेलि,
'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४३ अवलोक हाससे भी कन्दर्पको निगृहीत करके ही व्रजसुन्दरियोंको रमण कराया, यथा— बाहुप्रसारपरिरम्भकरालकोरु- नीवीस्तनालभननर्मनखाग्रपातैः । क्ष्वेल्यावलोकहसितैर्व्रजसुन्दरीणा- मुत्तम्भयन् रतिपतिं रमयाञ्चकार॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४६) श्रीव्रजांगनाओंके साथ श्रीकृष्णजीके नानाविध हाव-भाव, कटाक्षों तथा कन्दर्प, वसन्त आदिके अस्त्र-शस्त्रप्रयोग सब व्यर्थ हो गये और आत्माराम श्रीकृष्ण ज्यों-के-त्यों निर्विकार रह गये। अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत कामबिन्दुका उद्गमस्थान, जो साक्षात् मन्मथ है, उसके भी मनको श्रीकृष्णचन्द्रने मथ डाला, इसलिये वे साक्षात् मन्मथमन्मथ कहलाते हैं। वस्तुतः प्रेममयी व्रजांगनाओंके स्मरणसे कामका दर्प दलित हो सकता था। भावुकोंका मत है कि श्रीकृष्णके नखमणिचन्द्रिकाकी एक रश्मिछटाके ही दर्शनसे साक्षात् मन्मथ मोहित हो गया। इतना ही नहीं, उसने उत्कट उत्कण्ठासे यह दृढ़ संकल्प कर डाला कि सहस्रों जन्मोंतक तीव्रातितीव्र तपस्याओंके द्वारा व्रजांगनाभावको प्राप्त करके प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी नखमणिचन्द्रिकाकी रश्मिछटाका सेवन करूँगा। इसलिये ही तो भगवान् साक्षात् मन्मथमन्मथ हुए। ब्रह्मसाक्षात्कार तथा ब्राह्मसंस्पर्शसे कामादि विकारोंका आत्यन्तिक क्षय हो जाना स्वाभाविक ही है, फिर प्रेममयी व्रजांगनाओं और उनके प्रियतम प्राणधन भगवान्में कामका प्रभाव क्या पड़ सकता था ? काम पराजित होकर ही प्रद्युम्नरूपसे श्रीकृष्णका पुत्र बना, अतएव श्रीकृष्ण और व्रजांगनाओंके रमणमें कामका उपयोग नहीं है, किंतु वहाँ तो प्रेमका ही उपयोग होता है और वही प्रेम कामपद व्यपदेश्य होता है, तभी तो भावुकोंने कहा है—'प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्।' गोपांगनाका प्रेम ही काम नामसे प्रसिद्ध हुआ। वस्तुतः कृष्णविषयक काम काम ही नहीं हो सकता। भगवान्ने कहा है कि मुझमें जिसकी बुद्धि प्रविष्ट हो चुकी है, उन लोगोंका काम काम नहीं है, जैसे भर्जित किंवा क्वथित बीज अंकुरित नहीं होता, वैसे ही श्रीकृष्णविषयक काम संसारका मूल नहीं होता, यथा— न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते। भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।२६) नायिका-नायक परस्पर मिलनका मूलभूत स्नेहविशेष ही काम है। शृंगाररस सभी रसोंमें श्रेष्ठ और सबका अंगी है। उसे उज्ज्वल रस कहते हैं। किसी पदार्थकी तृष्णा प्राणीके हृदयको कण्टकके समान उद्वेजित करती है। तृष्णारूप कण्टकसे व्यथित अतएव चंचल मनपर व्यापक अखण्ड अनन्त ब्रह्मानन्दका प्राकट्य नहीं होता। यहीं अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिसे, क्षणिक-तृष्णा वृत्तिकी निवृत्तिसे शान्त अन्तःकरणपर ब्रह्मात्मक सुखकी अभिव्यक्ति होती है। नायक-नायिकाके परस्पर सम्मिलनकी तृष्णा सर्वातिशायिनी होती है, अतएव उस समय तृष्णासे व्यथित हृदयमें अशान्ति, चंचलता भी अधिक होती है, ऐसे अवसरमें परस्पर सम्मिलनसे तृष्णाकण्टकके निकलनेसे क्षणभरके लिये शान्त अन्तःकरणपर ब्रह्मानन्दके प्राकट्यकी भी विशेषता रहती है। इसीलिये और रसोंकी अपेक्षा शृंगाररसकी प्रधानता है। तत्पश्चात् शिशुओंके समर्पणके ब्याजसे एवं दृष्टियोंसे प्रियतमका अंगसंग प्राप्त करके दुरन्त भावसे भरी हुई अन्तरात्मासे उन्होंने अपने प्राणनाथका परिरम्भण किया— पत्यः पतिं प्रोष्य गृहानुपागतं विलोक्य सज्जातमनोमहोत्सवाः। उत्तस्थुरारात् सहसासनाशयात् साकं व्रतैर्व्रीडितलोचनाननाः ॥ तमात्मजैर्दृष्टिभिरन्तरात्मना दुरन्तभावाः पररेभिरे पतिम्।
४४ भक्तिसुधा निरुद्धमप्यास्त्रवदम्बु नेत्रयो- र्विलज्जतीनां भृगुवर्य वैक्लवात्॥ (श्रीमद्भा० १।११।३१-३२) जल और तरंगका सम्मिलन ही यथार्थमें अत्यन्त व्यवधानशून्य सम्मिलन है। हाँ, कुछ भावुकोंका कहना है कि सुकोमल कमलका मकरन्दमधु पान करनेवाला मधुप होता है, परंतु वास्तवमें यदि कमलको ही रसना और घ्राण हो, तभी व्यवधानशून्य उसके सौगन्ध्य और सौरस्यका अनुभव किया जा सकता है। जीवात्मा और परमात्माका मिलन जीवात्मा और परमात्माके मिलनका अनेक भावोंसे शास्त्रोंमें वर्णन किया गया है। यद्यपि शुद्ध प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परमात्मा नित्यप्राप्त वस्तु है तथापि जब प्राप्तिका वर्णन किया जाता है, तब कहीं तो 'अत्र ब्रह्म समश्नुते' ब्रह्मविदका यहाँ ही ब्रह्म- सम्भोग करना कहा जाता है और कहीं 'सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तसुखमश्नुते' बाह्य संस्पर्शसे अत्यन्त विरक्त, ज्ञानीका ब्रह्मसंस्पर्शजन्य लोकोत्तर सुखका भोग करना कहा जाता है। निर्विशेष चित्सुखस्वरूप ब्रह्मके संस्पर्शकी कल्पना अद्भुत है। कहीं श्रुतियोंने इसे अन्य दृष्टान्तसे स्पष्ट किया है—'तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्।' (बृहदारण्यक० ४।३।२१) जैसे कान्त अपनी प्रियतमा भार्यासे परिरम्भण करके प्रेमानन्दके उद्रेकमें बाह्याभ्यन्तर प्रपंचको भूल जाता है, भेदमें व्यवधानकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होती। अतः भेदयुक्त सम्मिलनसे रसिकोंको सन्तोष नहीं होता। पुत्र, देह, मन, अन्तरात्मासे जितनी अन्तरंगता, व्यवधानशून्यता उपलब्ध होती है, उतनी अधिक प्रीति व्यक्त होती है। सर्वान्तर सर्वापेक्षया सन्निहित अन्तरात्मासे ही प्राणियोंको निरतिशय एवं निरुपाधिकपर प्रेम होता है, अतः भगवान्के साथ घनिष्ठ प्रेम तभी होता है, जब उनकी नितान्त अन्तरंगता व्यक्त हो। अतः अभेद बोध आवश्यक होता है, फिर भी अत्यन्त अभेदमें ब्रह्मसे स्पर्श या प्राज्ञात्माका परिष्वंग नहीं बनता, अतः काल्पनिक भेद और पारमार्थिक अभेद स्वीकार किया जाता है। घटाकाशका यथा महाकाशके साथ सम्मिलन है, तथैव जीवात्माका परमात्माके साथ सम्मिलन होता है, परंतु इससे भी सरस सुन्दर दृष्टान्त है, तरंग- जलका। जैसे वीचीके भीतर, बाहर, मध्य या सर्वांगमें जल भरपूर रहता है, इसी तरह जीवात्मामें ब्रह्मात्माका सम्मिलन है। वीची और वारिके निर्जीव दृष्टान्तको सजीवरूपमें लाते हुए उसीको नायिका और नायकका रूपक दे दिया गया। सजीव दृष्टान्तोंमें नायिका- नायकसे बढ़कर कोई भी ऐसा दृष्टान्त नहीं है, जहाँ
'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४५ यद्यपि पूर्ण विरक्त एवं शान्त समाहित महापुरुष वेदान्तोंके श्रवण-मनन-निदिध्यासनसे परम तत्त्वका साक्षात्कार कर सकते हैं तथापि शीघ्रातिशीघ्र तत्त्व- साक्षात्कारके लिये किसी विशेष स्वरूपकी उपासना अत्यन्त आवश्यक है, कारण कि प्राणियोंके चित्तमें नाना प्रकारके शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध एवं अन्धकार, प्रकाश आदि दृश्योंका स्फुरण ही बना रहता है, निद्रा या विक्षेपसे शून्य अवस्था दुर्लभ है। दृश्यके स्फुरणनिरोध बिना, दृश्यातीत निर्दृश्य विशुद्ध तत्त्वका स्फुरण अत्यन्त असम्भव है। जगत् यद्यपि दुःखमय है तथापि मोहवश जगत्के चिन्तनमें मिठास प्रतीत होती है और प्रपंचातीत भगवान् परमानन्दमय एवं सर्वानर्थनिवर्तक हैं तथापि उनमें जीवका आकर्षण नहीं होता। जैसे ज्वराक्रान्त व्यक्तिको तिग्म आतपमें स्वाद किंवा सर्पदंशनके विष
४६ भक्तिसुधा ब्रह्ममहेन्द्रप्रभृति देवाधिदेवसे लेकर खग, मृग, वन, गिरि, सरित, सरोवर, वृक्ष-लताओंमें भी उस मधुर मनोरम मंगलमय स्वरूपदर्शन-स्पर्शसे आनन्दोद्रेकमें पुलकावली और आनन्दाश्रुओंका संचार होता है। तभी व्रजांगनाओंने कहा है— का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४०) हे जीवनधन! वृन्दावनचन्द्र मनमोहन! आपके अमृतमय मुखचन्द्रसे निःसृत कलपदायत गीत-मूर्च्छनासे कौन स्त्री आर्यचरितसे चलायमान नहीं हो सकी, त्रैलोक्यसौभग जिस मंगलमय वपुका निरीक्षण करके गौ, द्विज, मृगद्रुमोंमें भी पुलकावलीका संचार होता है, जहाँ प्राणियोंका मन प्राकृत शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी ओर आकर्षित होता था, वहाँ अपनी दिव्यलीला शक्तिसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप, वेदान्तवेद्य सदानन्दघन भगवान् ही निखिलरसामृतमूर्ति धारणकर अपने दिव्य ब्रह्मरसात्मक शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धोंसे हठात् प्राणियोंके मनको आकर्षित करते हैं। जो भगवान् भक्तोंके सर्वस्व एवं ज्ञानियोंके एकमात्र परमतत्त्व हैं, वे ही नास्तिक-से-नास्तिकके भी सब कुछ हैं, भेद इतना ही है कि वे अपने सर्वस्वमें निरतिशय प्रेम करते हुए भी उन्हें पहचानते नहीं। यद्यपि यह बात असम्भव-सी प्रतीत होती है, परंतु विवेचन करनेमें अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। चाहे कैसा भी नास्तिक क्यों न हो, वह अपने अभाव (या मरने)- से घबड़ाता है। वह यही चाहता है कि मैं सदा रहूँ। जब किसी साधारण-से-साधारणकी आत्मरक्षा और अस्तित्वके लिये व्यग्रता होती है, तब एक मनुष्य, चाहे नास्तिक ही क्यों न हो, क्या अपना अस्तित्व नहीं चाहता? क्या वह अपने अस्तित्वको मिटाना पसन्द करेगा? यदि नहीं तो फिर ब्रह्म अस्तित्वका पूर्णानुरागी हुआ या नहीं? अब यह बात दूसरी है कि वह अपने-आप कौन है, जिसका अस्तित्व चाहता है। यदि सौभाग्यवश कभी इस ओर दृष्टि जायगी, बस तभी वह समझ लेगा कि विनश्वर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार—ये सभी दृश्य हमारे हैं। हम इनसे पृथक् इनके द्रष्टा हैं और उसी निर्विकार स्वरूप स्वात्माका ही सदा अस्तित्व चाहते हैं। विवेचन करनेसे यह विदित हो जाता है, स्वप्रकाश दृक्का अस्तित्व तत् स्वरूप ही है, अतएव आत्मा स्वप्रकाश कहा जाता है। इसलिये जगत्को अनेकानेक वस्तुओंमें चाहे जितना भी संदेह, विपर्यय या अज्ञान हो, परंतु स्वात्मा है या नहीं या नहीं ही है, इस प्रकार आत्मविषयक संदेहादि किसीको नहीं है। जीवनगत परमेश्वर, धर्म, कर्म सभीका अभाव साबित करनेवाले शून्यवादीको भी अनिच्छया स्वात्माका अस्तित्व मानना पड़ेगा; क्योंकि जो सबके अभावका सिद्ध करनेवाला है, अगर वह रह गया, तब तो स्वातिरिक्त ही सबका अभाव सिद्ध होगा। अपना अभाव नहीं हो सकता, सर्व निराकर्ता सर्व निषेधकी अवधि एवं साक्षिभूतके अस्वीकार करनेपर शून्य भी अप्रामाणिक होगा। अतः वही अत्यन्त अबाधित, सर्व-बाधका अधिष्ठान एवं साक्षिभूत, अस्तित्व या सत्ता भगवान्का रूप है, साथ ही बोध और प्रकाशके लिये प्राणीमात्रमें उत्सुकता दिखायी देती है, पशु- पक्षी भी स्पर्शसे, आघ्राणसे, किसी-न-किसी तरहसे ज्ञानके प्रेमी हैं। यह ज्ञानकी वांछा प्राणीमें उत्तरोत्तर बढ़ती दिखायी देती है कि हमें अब अमुक तत्त्वका ज्ञान हो, अब अमुकका ज्ञान हो। इतिहास, भूगोल, खगोल, भूततत्त्व एवं अधिभूत, अध्यात्म, अधिदैव सभी तत्त्वोंको जाननेके लिये मन चाहता है, किं बहुना, सर्वज्ञता बिना ज्ञानसे संतोष नहीं होता। पूरी-पूरी सर्वज्ञता कहाँ हो सकती है, यह विवेचन करनेसे स्पष्ट हो जाता है कि सर्व (पदार्थ) जिस स्वप्रकाश अखण्ड विशुद्ध भान (बोध)-में कल्पित है, वही सर्वावभासक एवं सर्वज्ञ हो सकता है; क्योंकि प्रकाश या भान अत्यन्त असंग एवं
निरवयव और अनन्त है, दृश्यके साथ सिवाय आध्यात्मिक सम्बन्धके और संयोग, समवाय आदि सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः यदि सर्वज्ञ होनेकी वांछा है तो सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान विशुद्ध अखण्ड बोध होनेकी क्या वांछा है? यह अखण्ड बोध ही सच्चिदानन्द भगवान्का चिद्रूप है। जैसे पूर्वोक्त अखण्ड अनन्त स्वप्रकाश सत्ता या अस्तित्व ही अपना तथा सबका निजी रूप है, वैसे ही यह अबाध्य अखण्ड बोध भी सबका अन्तरात्मा है। आनन्दकी अभिलाषा इसी तरह आस्तिक-नास्तिक ही नहीं, किंतु पशु-कीटपर्यन्त भी आनन्दके लिये व्यग्र हैं, प्राणिमात्रके देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदिकी जितनी चेष्टाएँ एवं हलचलें हैं, वे सभी आनन्दके लिये हैं। बिना किसी प्रयोजनके किसीकी भी प्रवृत्ति नहीं होती, किं बहुना उन्मत्त भी, चाहे भ्रान्ति या अज्ञानसे ही सही, आनन्दके लिये ही समस्त चेष्टाएँ करता है, समस्त वस्तुओंमें संदिहान एवं भ्रान्त होता हुआ भी प्राणी, जिसके लिये नाना चेष्टाएँ करता है, उसके विषयमें उसे संदेह या भ्रम अथवा अज्ञान हो, यह कैसे कहा जा सकता है। इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द अत्यन्त प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो, अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही आनन्द होता है। देखते ही हैं कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री-पुत्रादिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही वे द्वेष्य हो जाते हैं, परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहता है। कभी किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह नास्तिकसे-भी-नास्तिक, आनन्दको चाहता है, उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील होता है और उसके लिये लालायित होता है, परंतु उसमें पहचाननेकी ही कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन, स्त्री-पुत्रादि, शब्द-स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। विवेचन करनेसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम, कभी द्वेष होता है, वह सुख नहीं है, सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। जागतिक सम्भोग- साधन-पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं हैं, किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णा-प्रशमनके अनन्तर, जिस शान्त अन्तर्मुख मनपर सुखका आभास पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो शुद्ध अन्तरात्मा है, वही आनन्द है; क्योंकि जो लक्षण आनन्दका है वही अन्तरात्माका है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं होता, ठीक ऐसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता; अतः अन्तरात्मा ही आनन्द है और निरतिशय निरुपाधि परप्रेमका आस्पद है, उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे अहं सुखी इत्यादि व्यवहार होता है। यही सुख किंवा अन्तरात्मा है। इसीके लिये समस्त कार्य- करण-संघातकी प्रवृत्ति होती है, यही सुख-दुःख- मोहात्मक संघातसे विलक्षण, सुख-दुःख-मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही—सच्चिदानन्दका आनन्दरूप है एवं प्राणीमात्र स्वतन्त्रता (बन्धनसे छूटना) चाहता है। एक चींटीको भी पकड़नेपर वह व्याकुलताके साथ हाथ-पैर चलाती है, शुक-सारिका आदि विहंगम सुवर्णके भी पिंजरमें रहकर सुन्दर मधुर भक्ष्य-पेयको नहीं पसन्द करते, किंतु बन्धनमुक्त होकर स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलको भी खाकर जीवन बिताना अच्छा समझते हैं, इस तरह प्राणीमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित हैं। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा, परंतु स्वतन्त्रताका वास्तविक रूप विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी
४८ भक्तिसुधा भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि बिना असंग सच्चिदानन्द भगवान्को प्राप्त किये, बन्धनमुक्ति स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निरालम्बन है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारणदेहका सम्बन्ध विद्यमान है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी ? भले ही कोई माता, पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, दरिद्रता, विपत्ति, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ता है; क्योंकि जबतक कुछ स्वतन्त्रताको त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना तथा ज्ञानद्वारा, मल-विक्षेप-आवरणको शरीरत्रय बन्धन किंवा जीव भावसे मुक्त होकर, निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर लें, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल सकता नहीं। विवेचनसे स्पष्ट होता है कि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त असंग-अनन्त-स्वप्रकाश-प्रत्यगभिन्न सच्चिदानन्द भगवान्का ही स्वरूप है। ऐसे ही प्राणीमात्रको यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ, यहाँतक कि माता, पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। यह सभी भाव जीव भावके रहते नहीं हो सकते, समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्के ही परतन्त्र हो सकते हैं, इस तरह परमार्थतः पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य एवं पूर्ण नियामकत्व भगवान्में ही होता है। जब आस्तिक- नास्तिक, सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यतया सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, वह तत्त्व भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय-ज्ञेय परमाराध्य परब्रह्म भगवान् नहीं हैं, क्योंकि प्राणीमात्र किंवा तत्त्वमात्रके अन्तरात्मा भगवान् ही हैं, फिर उनसे विमुख होकर निःसत्त्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिकी उक्ति है कि ‘लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः' लोकमें ऐसा कोई हुआ नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। निजी सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणीमात्रकी भगवदनुगामिता है, भेद यही है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे जानते नहीं। भागवतके द्वितीय स्कन्धमें भी विराट् आदि भगवान्के स्थूलरूपके ध्यानके अनन्तर, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक प्रभुकी मधुर मंगलमयी मूर्तिका ध्यान बतलाया गया है। ध्यानसे चित्तकी पूर्ण एकाग्रता होनेपर भगवान्के अनन्त अखण्ड स्वप्रकाश बोधस्वरूपका साक्षात्कार कहा गया है। उक्त स्वरूपमें दृढ़ निष्ठाके लिये भगवान्के मधुरस्वरूपके श्रीचरणोंका पुनः ध्यान और अनुरागसहित परिरम्भण कहा गया है—‘हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे॥' (श्रीमद्भा० २।२।१८) भगवान्के अचिन्त्य अनन्त मधुर मंगलमय स्वरूपमें प्रेम और भजन सर्व साधन तथा सर्व फलस्वरूप है। अतएव इसमें साधकों तथा सिद्धों दोनोंकी ही प्रवृत्ति होती है। साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥ (रा०च०मा० २।२८९।८) भक्तियोगके विधानके लिये भगवान्का अवतरण प्रभुके श्रीचरणारविन्द सौगन्ध्यामृत सिन्धुके एक बिन्दुके भी समास्वादन करनेसे सनकादिक शुकादिक- जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं। तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह तत्त्वनिष्ठोंकी
'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४९ यह अनुभूतियाँ हैं— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५, ३) ठीक ही है, तभी तो यह कहा जाता है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको ही भक्तियोग विधान करनेके लिये अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत-सौन्दर्यमाधुर्यसुधाजलनिधि दिव्यमूर्ति धारण करते हैं, अन्यथा छोटे कार्योंके लिये प्रभुका अवतार ऐसा ही अनुचित होगा, जैसे मशक-निवारणार्थ भुशुण्डीका प्रयोग (मच्छर हटानेके लिये तोप चलाना) अनुचित होता है, परंतु समस्त नामरूपक्रियात्मकप्रपंचसे व्यावृतमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्य स्वरूप धारण परमावश्यक है। अद्वैत ब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना, यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्य सिद्धान्तके अनुसार प्रकृति प्राकृत प्रपंचसे पृथक्, असंग अनन्त चेतन तत्त्वका विवेचन कर लेनेवाले हंस कहे जा सकते हैं, परंतु वेदान्त सिद्धान्तके अनुसार तो दृक्-दृश्य, आत्मा- अनात्मा, परात्पर पूर्णतम सर्वभासक भगवान् और प्रकृति प्राकृत प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे दिव्य मणिमाला और उसमें कल्पित सर्पका, अर्थात् सत्य एवं अनृतका जैसे आध्यासिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्का आध्यासात्मिक सम्बन्ध है। अतः सत्यानृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, इसी तरह दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृत स्वरूप दृश्य प्रकृतिका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान् ही अवशेष रहते हैं। ऐसे वेदान्तसिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप क्षीर- नीरका विवेचन है, नीर-स्थानीय दृश्यको मिटाकर परमसत्य भगवान्में ही स्थित होनेवाले परमहंस कहे जा सकते हैं, परंतु 'नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।' (श्रीमद्भा० १।५।१२) 'सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।' (रा०च०मा० २।२७७।५) इत्यादि अभियुक्तोक्तियोंके अनुसार विदित होता है कि बिना भगवान्के मधुर मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए उनका ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता। अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना, बस यही मुख्य प्रयोजन प्रभुके मधुर मंगलमय स्वरूप धारण करनेका है; क्योंकि भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्के और क्या हो सकता है ? रहा भगवान्का अचिन्त्य अनन्त अव्यपदेश्य निराकार स्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं, महावाक्यजन्य परब्रह्माकारवृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन-बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम-रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपनी हिंसा किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूः।' महर्षि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने स्नेहभरी दृष्टिसे श्रीरामचन्द्रको नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा करती है—'यश्च रामं न पश्येत्तु रामो यं नाभिपश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माऽप्येनं विगर्हति॥' जैसे कमलनयन पुरुषके वे अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, यदि कभी उनके रूपदर्शनमें उनका उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्धभोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार आदि व्यर्थ और नीरस ही रहे, यदि उन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ। इसीलिये श्रीव्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवानोंके नेत्रादि करणग्रामोंकी