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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

४१६ | भावप्रकाशनिघण्टुः

के बाहर निकले हुए (Exserted), नारंगरक्त रंग के, मुद्गराकार, अखण्ड या खण्डित रहते हैं। फल—सामान्य स्फोटी फल (Capsule) आयताकार एवं बीज गोल होते हैं। इन फूलों के स्त्री केशर के सूखे हुए अग्रभाग जिन्हें कुक्षि (Stigma) कहा जाता है उन्हें ही केशर कहते हैं। कुक्षि (Stigma) ३, कुक्षिवृन्त के ऊपर लगी हुई या अलग, करीब १ इञ्च लम्बी गहरे लाल से लेकर हलके रक्ताभ भूरे रंग की एवं सामान्य दन्तुर या लहरदार होती है। कुक्षिवृन्त (Styles) करीब १ से० मी० लम्बे, करीब-करीब रम्भाकार, ठोस, पीताभ भूरे से लेकर पीताभ नारंगी रंग के रहते हैं। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र सुगन्ध रहती है तथा इसका स्वाद सुगन्धित तथा कड़वापन लिये हुए होता है। केशर के पौधे को बीज या उसके कन्द द्वारा लगाया जा सकता है। साधारणतः १ एकड़ भूमि से करीब ५०- ५५ पौंड ताजा केशर प्राप्त होता है जो सूखने पर १०-११ पौंड रह जाता है। इसकी खेती तथा माल के तैयार करने में बहुत सावधानी की आवश्यकता रहती है। सूर्योदय के पहले जब फूल लगभग खिलने को होते हैं तब उनको तोड़ लेते हैं। उसमें से केशर को तोड़कर छलनी में डालकर मन्द आँच पर सुखाते हैं। केशर को हमेशा प्रकाशहीन बन्द पात्र में रखना चाहिये। रासायनिक संगठन—केशर में एक स्नेहीय तैल ८-१३%, करीब १% उड़नशील तैल, एक रंगहीन कडुआ पिक्रॉक्रोसिन (Picrocrocin) नामक ग्लाइकोसाइड् एवं क्रोसेटिन (Crocetin) नामक रंजक द्रव्य का क्रोसिन (Crocin) ग्लाइकोसाइड् ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्रोसेटिन नामक रवेदार रंजक द्रव्य ३ प्रकार का होता है। अॅल्फा क्रोसेटिन (a-crocetin, C₂₄ H₂₈ O₅) ०.७%, बीटा क्रोसेटिन (B-crocetin, C₂₅ H₃₀ O₅) ०.७%, एवं गामा क्रोसेटिन (V-crocetin, C₂₆ H₃₂ O₅) ०.३% रहता है। क्रोसिन (Crocin) यह लाल रंग का चूर्ण होता है जो जल तथा मद्यसार में आसानी से घुल जाता है। संकेन्द्रित गन्धक के तेजाब में इसका गहरे नीले रंग का घोल बनता है जो रखने पर नील लोहित, रक्त तथा अन्त में भूरे रंग का हो जाता है। शोरे के तेजाब से यह हरे रंग का हो जाता है। गुण और प्रयोग—केशर उष्ण, सुगन्धित, दीपन, पाचन, उद्वेष्टन-निरोधि, मनःप्रसादकर, रुचिकर, वर्ण्य, बल्य, कामोत्तेजक, विषघ्न, आर्तवजनक, मूत्रल एवं अल्प वेदनाहर है। आमाशयोत्तेजक एवं उद्वेष्टननिरोधि गुणों के लिये यह बहुत प्रसिद्ध है तथा यह श्रेष्ठ उत्तेजक एवं वृष्य औषध मानी जाती है। यह वातनाड़ियों के लिये शामक है। सुगन्धित रञ्जक द्रव्य के रूप में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। इसके उड़नशील तैल में अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही गुण होते हैं। इसका उपयोग अतिसार, शूल, मूत्रकृच्छ्र, अनार्तव, पीडितार्तव, कास, श्वास, कण्ठरोग, यकृतविकार, आमवात, नाड़ीशूल एवं शिरोरोगों में किया जाता है। (१) पीडितार्तव में इसको पूर्ण मात्रा में देने से शूल कम होता है तथा आर्तव स्राव ठीक होने लगता है। गर्भाशय के पीड़ा युक्त विकारों में इसकी गोली योनि में धारण कराई जाती है। स्तनों पर इसके लेप से दूध बढ़ता है। (२) मूत्राघात में १ तोला केशर मधुयुक्त जल में रात में भिगो कर सुबह उसे पिलाने से लाभ होता है। (सु. उ. अ. ५८-३०) (३) बच्चों की सरदी में गरम दूध में केशर खिलाते हैं तथा ललाट एवं छाती पर लगाते हैं। (४) केसर तथा शर्करा को घृत में भून कर उसके नस्य से सूर्यावर्त एवं अर्धावभेदक आदि में लाभ होता है। शिरःशूल में इसे मस्तक पर लगाते हैं।

कर्पूरादिवर्गः ४१७ (५) मसूरिका तथा रोमान्तिका आदि में दाने बाहर निकालने के लिये इसे देते हैं। (६) बच्चों के अतिसार, आध्मान तथा उदरशूल में इसे खिलाते हैं तथा पेट पर लगाते हैं। प्रमाप तथा परीक्षा-केशर बहुमूल्य होने के कारण इसमें अनेक चीजों की मिलावट रहती है, इसलिये इसको अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। कुछ परीक्षाएँ यहाँ दी जा रही हैं। स्पिरिट में केशर डालने पर यद्यपि स्पिरिट रंगीन हो जाता है तथापि केशर के तन्तु अपने प्राकृतिक रंग में ही रहते हैं। इसे गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) में डालने से गहरा नीला रंग उत्पन्न होता है। जल में घुलनशील पदार्थ ५८% से कम न हों। मद्यसार (९०%) में घुलनशील पदार्थ ६०% से कम न हों। राख ७.५०% से अधिक न हो। १००° उष्णता पर सुखाने से १४% से अधिक वजन कम न हो। कुक्षिवृन्त (Styles) १०% से अधिक न हों। इतर ऑर्गेनिक द्रव्य २% से अधिक न हों। रंग की तीव्रता-इसको ०.०२ ग्राम की मात्रा में १०० सी० सी० जल में मिलाने पर पीत वर्ण का घोल बनता है जिसके रंग की तीव्रता ०.१% पोटैशियम् डाइक्रोमेट (Potassium dichromate) के घोल के समान या उससे कम नहीं होनी चाहिये। व्यामिश्रण-इसमें केशर पुष्प के ही कुक्षिवृन्त, पुंकेशर, आभ्यन्तर कोश एवं गेंदा (कॅलेण्डुला ऑफिसिनेलिस्) के मेथिल् आरेञ्ज के द्वारा रंगे हुये पुष्प, कुसुम पुष्प के केशर तथा एक बीज पत्रीय पुष्प आदि मिलाये रहते हैं। कभी- कभी सत्त्व निकाला हुआ केसर रंग करके बेचा जाता है। केसर का वजन बढ़ाने के लिये जल, तैल, शर्करा, ग्लूकोज, ग्लिसरीन तथा पोटैशियम् या अमोनियम् नाइट्रेट के घोल आदि का उपयोग करते हैं। मात्रा-२-४ रत्ती। अथ गोरोचना। तस्या नामानि गुणांश्चाह गोरोचना तु मङ्गल्या वन्द्या गौरी च रोचना। गोरोचना हिमा तिक्ता वश्या मङ्गलकान्तिदा। विशालक्ष्मीग्रहोन्मादगर्भस्रावक्षतासुहृत् ।।७९।। गोरोचना के नाम तथा गुण-गोरोचना, मङ्गल्या, वन्द्या, गौरी और रोचना ये सब गोरोचन के संस्कृत नाम हैं। गोरोचन-शीतवीर्य, तिक्तरस युक्त, वश्य (वशीकारक), मङ्गल तथा कान्ति को बढ़ाने वाला एवं विष, अलक्ष्मी (दरिद्रता), ग्रहबाधा, उन्माद (पागलपन), गर्भस्राव तथा क्षतज रक्तस्राव को दूर करने वाला होता है। [७९] ३०. गोलोचन हिं०-गोलोचन, गोरोचन। बं०-गोरोचना। म०-गोरोचन। गु०-गोरूचन्दन, गोरोचन। ते०-गोरोचनमु। ता०-गोरोचनम्। फा०-संगगाव। अ०-इजरुल् बक्कर। अं०-Gall-stone (गॉल-स्टोन); Serpent stone (सर्पेण्ट स्टोन)। ले०-Bezoar (बेझ़ोर)। गाय अथवा बैल के पित्ताशय में से अश्मरी के समान सुपारी से लेकर नींबू तक का गोल अथवा कुछ गोलाई लिये त्रिकोणाकार जो पदार्थ निकलता है उसको गोरोचन कहते हैं। यह ऊपर से कुछ मटमैला पीला और तोड़ने पर भीतर से पर्तदार पीले रंग का होता है। यह कठोर नहीं, कुछ मुलायम होता है। किसी-किसी का रंग नारंगी या लाली युक्त होता है। इसी प्रकार किसी-किसी बकरी और ऊँट के पेट से भी कंकड़ी निकलती है, 'कुछ ग्रन्थों में गाय के मस्तक का पित्त गोरोचन है' ऐसा उल्लेख मिलता है। हाथी के मस्तक में मिलने वाली गजमुक्ता और सर्प के फण में मिलने वाली मणि के सादृश्य के लिए गो-मस्तक से इसकी उत्पत्ति की परिकल्पना की गई होगी। इसका स्वाद कुछ कड़वा होता है तथा इसमें कुछ सुगन्ध भी होती है। औषध के अतिरिक्त तंत्र शास्त्र में मोहन तथा वशीकरण के लिये इसका पर्याप्त उपयोग किया जाता है। गोपित्त में कुछ पदार्थों का मिश्रण कर बनाया हुआ नकली गोरोचन भी बिकता है। ३० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४१८ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- गोरोचन शीतल, सुगन्धि, मृदु विरेचक, तिक्त, श्वित्रहर, मूत्रल, अश्मरीघ्न, बृंहण, आर्तवजनक एवं विषहर है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतंत्रक, आक्षेप, रोमान्तिका, मसूरिका, कुकास, अतिसार, कफज्वर, कामला, पाण्डु, गर्भस्राव, पित्त की न्यूनता एवं आन्त्रिक विकार आदि में किया जाता है। (१) अपस्मार में इसको २ माशे की मात्रा में गुलाब जल में घिस कर पिलाने से पुनराक्रमण नहीं होता, ऐसा हकीम मानते हैं। यूनानी में इसका लेप श्वित्र, चेहरे के काले दाग, चर्म रोग तथा नेत्र के जाले में लाभदायक मानते हैं। (२) मसूरिका आदि में उष्णता कम करने के लिये इसको खिलाया जाता है। (३) बच्चों के अतिसार, कुकास एवं हरे दस्त आना आदि में इसको खिलाने से लाभ होता है। मात्रा- १-२ रत्ती। नोट- पाश्चात्य चिकित्सा में गोपित्त को शुद्ध करके व्यवहार करने की पद्धति है। गोरोचन के स्थान में उसका प्रयोग करना उचित नहीं है। प्रसंगतः उसका भी वर्णन यहाँ किया गया है। ले०- Extroctum fellis bovini (एक्स्टॅक्टम् फेलिस् बोह्विनि)। अं०- Purified Ox-Gall (प्युरिफाइड ऑक्स-गॉल)। हिं०- गौ या बैल का शुद्ध पित्त, जहरमोहरा। ताजे पित्त को सुखाकर जब चतुर्थांश शेष रहे तो उसमें मद्यसार (९०%) मिलाकर छानकर गोली बनाने लायक हो उतना सुखा लें। इसमें पित्त के लवण तथा रञ्जक पदार्थ पाये जाते हैं। यह गहरे पीताभ हरे रंग का लचीला पदार्थ होता है। इसका स्वाद कडुवा तथा अरुचिकर होता है। यह जल तथा मद्यसार दोनों में घुल जाता है। इसको विशिष्ट आवरण युक्त गोलियों के रूप में भोजन के २ घण्टे पश्चात् प्रयोग करते हैं। गुण और प्रयोग- यह कड़वा पदार्थ होते हुये भी वानस्पतिक कड़वे पदार्थों के उतना अच्छा दीपन पदार्थ नहीं है। इससे पित्त का स्राव ठीक होने लगता है। जिनमें पित्त का उचित स्राव न होने के कारण अपचन तथा विबन्ध रहता है उनमें इसका उपयोग करते हैं। यह अग्न्याशय के स्नेह पाचक स्रावों को बढ़ाता है तथा स्नेह द्रव्यों के प्रचूषण में सहायक होता है। स्नेह द्रव्यों का प्रचूषण ठीक होने के कारण उसमें घुलने वाले जीवतिक्ति (हिटामिन) 'ए', 'डि' तथा 'के' का भी ठीक प्रचूषण होता है। रक्तस्राव की अवस्था में रक्त को जमाने वाले पदार्थों में से रक्त में प्रोथ्राँबिन (Prothrombin) के निर्माण के लिये हिटामिन् 'के' की बहुत आवश्यकता रहती है। जब मल बहुत कड़ा हो जाता है तब इसको २०-३० ग्रेन की मात्रा में १ या २ औंस जल में घोल कर पिचकारी द्वारा बस्ति के रूप में देते हैं। मात्रा- ५-१५ ग्रेन। अथ नखं नखी च (गन्धद्रव्यम्) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह नखं व्याघ्रनखं व्याघ्रायुधं तच्चक्रकारकम् ।।८०।। नखं स्वल्पं नखी प्रोक्ता हनुर्हट्टविलासिनी। नखद्वयं ग्रहश्लेष्मवातास्रज्वरकुष्ठहृत् ।।८१।। लघूष्णं शुक्रलं वर्ण्यं स्वादु व्रणविषापहम्। अलक्ष्मीमुखदौर्गन्ध्यहृत्पाकरसयोः कटु ।।८२।। सुगन्धि द्रव्य नख तथा नखी के नाम तथा गुण- नख, व्याघ्रनख, व्याघ्रायुध और चक्रकारक ये सब संस्कृत नाम नख के हैं और दूसरा छोटा नख होता है उसे नखी कहते हैं उसके संस्कृत नाम-हनु तथा हट्टविलासिनी ये दो हैं। दोनों प्रकार के नख- ग्रहबाधा, कफ, वात, रक्तविकार (किंवा वातरक्त), ज्वर तथा कुष्ठ रोग को दूर करते हैं एवं लघु, उष्ण वीर्य, शुक्रजनक, वर्णकारक, स्वादिष्ट, व्रण तथा विषनाशक एवं अलक्ष्मी (दरिद्रता) तथा मुख का दुर्गन्ध को हरण करने वाले, पाक एवं एवं रस में कटु रसयुक्त होते हैं। [८०-८२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४१९ ३१. नख-नखी हिं०-नख, नखी, छोटा नख। बं०-नखी गन्ध द्रव्य, छोटा नखी। म०-नखला, बाघनख। ते०- नखमुचिप्प। गु०-नखला, सावजना नख। क०-नख बाधनख। फा०-नाखून पर्य्या। अ०-अजफारुतिब, इकलिलुलमुलुक। अं०-Land snail (लेंड स्नेल)। ले०-Helix aspera (हेलिक्स ॲस्पेरा); Achatina fulica (अॅर्चटिना फूलिका)। नख एक सुगन्धि द्रव्य है। यद्यपि इसे नख, व्याघ्रनख आदि नाम दिये गये हैं तथापि यह किसी जानवर का नाखून नहीं है। यह एक प्रकार के सीप की जाति के समुद्री जीव के मुख के ऊपर का आवरण है जो नख सदृश होने के कारण नख कहा जाता है। भावप्रकाशकार ने इनके दो भेद लिखे हैं। बड़े को नख या व्याघ्रनख तथा छोटे को नखी लिखा है। अन्य ग्रन्थों में नखी के आकृति के अनुसार पाँच भेद लिखे हैं। बेर के पत्ते के सदृश, कमलदल सदृश, कमलदल सदृश, घोड़े के खुर की आकृति के, हाथी के कान के समान आकार वाले तथा सुअर के कान के समान ये पाँच प्रकार होते हैं। इनमें से सुअर के कान के समान निषिद्ध माना गया है। कुछ लोगों ने हाथी के कान सदृश और घोड़े के खुर के समान आकृति वाले नख का उपयोग गन्धयोगों में तथा बेर या कमलदल सदृश नख का उपयोग धूपन में बंतलाया है। यह गहरे भूरे रंग का तथा अनेक पटलों से बना हुआ कठोर, अपारदर्शक तथा नख के सदृश होता है। इसके उन्नतोदर पृष्ठ पर परत साफ दिखलाई देते हैं। इसको जलाने से दुर्गन्ध आती है लेकिन तैल के साथ पकाने से तैल सुगन्धित होता है। अन्य ग्रन्थों में इसके शोधन का विधान मिलता है। भैंस के गोबरयुक्त जल, तिन्तिड़ी जल या मृत्तिकायुक्त जल के साथ स्वेदन करके, प्रक्षालन करने के पश्चात् भून कर गुडहरीतकी मिले जल में बुझाते हैं। फिर पीस कर उपयोग में लाते हैं। चरक में प्रायोगिक धूम्रपान की वर्ति के योग में (सू० अ० ५ श्लो० २०), श्वयथुचिकित्सा (चि० अ० १६) में शैलेयकादि तैल और प्रदेह में, महासुगन्धहस्ती नामक अगद के योग में (चि० अ० २३), अमृतादि तैल (चि० अ० २८) तथा वातरक्त चिकित्सा (चि० अ० २९) में शतपुष्पादि तैल के योग में अन्य द्रव्यों के साथ नख का प्रयोग लिखा है। सुश्रुत में एलादिगण में व्याघ्रनख का उल्लेख है। तैलों को सुगन्धित करने के लिये इसका अधिक उपयोग होता है। अथ बालम् (सुगन्धबाला) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बालं ह्रीबेरबर्हिष्ठोदीच्यं केशाम्बुनाम च। बालकं शीतलं रूक्षं लघु दीपनपाचनम् ।। हल्लासरुचिवीसर्पहृद्रोगामातिसारजित् ।।८३।। सुगन्धबाला के नाम तथा गुण—बाल, ह्रीबेर, बर्हिष्ठ, उदीच्य, केशनाम (केशवाचक सभी शब्द) एवं अम्बुनाम (जलवाची सभी शब्द) तथा बालक ये सब 'सुगन्धबाला' के संस्कृत नाम हैं। सुगन्धबाला—शीतवीर्य, रूक्ष, लघु अग्निदीपक तथा पाचक होती है और यह हल्लास (जीमिचलाना), अरुचि, वीसर्प, हृद्रोग, आम तथा अतिसार इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है। [८३] ३२. सुगन्धबाला हिं०-सुगन्धबाला, नेत्रवाला। बं०-बाला। म०-काला बाला। गु०-बालो, कालो बालो। क०-बलरकक्सी-गिडा। ते०-मुतुपलागमु, एर्कुटी। ता०-पेरामुटिवेर। ले०-Paonia odorata Willd. (पॅवोनिया ओडोरेटा विल्डा)। Fam. Malvaceae (मालवेंसी)। सुगन्धबाला—पश्चिमोत्तर प्रदेश, सिन्ध, पश्चिम प्रायद्वीप और सिलोन में अधिक उत्पन्न होती है। इसके क्षुप में थोड़ी सी कस्तूरी की सुगन्ध रहती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४२० भावप्रकाशनिघण्टुः इसका क्षुप-सीधा तथा १।।-३ फीट ऊँचा होता है और समस्त क्षुप पर बारीक रोवें होते हैं। पत्ते-१ से ३ इञ्च लम्बे गोलाकार हृदयाकृति, कंघी के पत्तों के आकार वाले, ३ से ५ भागों में थोड़ी दूर तक विभक्त और ऊपर के पत्ते दन्तुर होते हैं। पत्तों को मसलने से चिपचिपापन मालूम होता है। शाखाओं के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। पुष्पदल-किञ्चित् हलके गुलाबी रंग के होते हैं। फल-अण्डाकृति, छोटे एवं चने बराबर होते हैं। बीज-भूरे रंग के, तैल से युक्त लेकिन गन्धहीन होते हैं। मूल-७-८ इञ्च लम्बे, प्रायः ऐंठे हुए तथा अधिक से अधिक १/४ इञ्च मोटे, चिकने, भूरे रंग के तथा अनेक उपमूलों से युक्त रहते हैं। इसमें कस्तूरी के समान सुगन्ध रहती है। औषध में इन्हीं मूलों का व्यवहार किया जाता है। नोट-बाजार में सुगन्धबाला के नाम से मिलने वाला गाँठदार द्रव्य सुगन्धबाला नहीं है। उसे असली तगर मानते हैं। उसका वर्णन पहले किया गया है। कुछ लोगों ने इसके लैटिन नाम में खस का लेटिन नाम दिया है, वह उचित नहीं है। कुछ लोगों ने खस जाति के ही दूसरे तृण का लैटिन नाम सुगन्धबाला के लिए दिया है जिसको कुछ लोग खस का ही पर्याय मानते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें लुआबदार पदार्थ तथा उत्तेजक सुगन्धि द्रव्य हैं। गुण और प्रयोग-सुगन्धबाला शीतल, स्नेहन, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं बल्य है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, दाह, तृषा, हल्लास, वमन, अतिसार, व्रणशोथ एवं विसर्प में किया जाता है। (१) किसी भी प्रकार के ज्वर में षडंग पानीय के रूप में नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, श्वेत चन्दन, सुगन्धबाला एवं सोंठ का क्वाथ देने से ज्वर का दाह एवं प्यास कम हो जाती है। (२) बेल के साथ इसका उपयोग संग्रहणी में लाभकर होता है। अतिसार में आदी के साथ इसको फाण्ट बना कर पिलाते हैं। बच्चों के अतिसार में चावल के धोवन के साथ मिश्री, मधु तथा सुगन्धबाला देते हैं। वमन, हल्लास आदि में भी तण्डुलोदक के साथ इसको देते हैं। (३) रक्तपित्त में चन्दन, मिश्री तथा तण्डुलोदक के साथ इसका प्रयोग किया गया है। (४) विसर्प में इसके चूर्ण को घृत के साथ लेप करते हैं। श्वित्र में इसकी जली हुई काली राख का लेप लाभदायक माना जाता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ वीरणम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्याद्वीरणं वीरतरुर्वीरञ्च बहुमूलकम्। वीरणं पाचनं शीतं वान्तिहल्लघु तिक्तकम् ॥८४॥ स्तम्भनं ज्वरनुद् भ्रान्तिमदजित्कफपित्तहृत्। तृष्णाऽस्रविषवीसर्पकृच्छ्रदाहव्रणापहम् ॥८५॥ वीरण अर्थात् गांडर घास के नाम तथा गुण-वीरण, वीरतरु, वीर और बहुमूलक ये नाम संस्कृत में वीरण के हैं। वीरण-पाचक, शीतवीर्य, वमन को दूर करने वाला, लघु, तिक्त रसयुक्त एवम् स्तम्भक होता है। यह ज्वर, भ्रमरोग, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, मूत्रकृच्छ्र, दाह और व्रण को दूर करने वाला होता है। [८४-८५] अथोशीरम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वीरणस्य तु मूलं स्यादुशीरं नलदञ्च तत्। अमृणालञ्च सेव्यञ्च समगन्धिकमित्यपि ॥८६॥ उशीरं पाचनं शीतं स्तम्भनं लघु तिक्तकम् ॥८७॥

कर्पूरादिवर्गः ४२१ खस के नाम तथा गुण— 'वीरण' नामक घास के जड़ को 'खस' कहते हैं। उसके संस्कृत नाम-उशीर, नलद, अमृणाल, सेव्य और समगन्धिक ये सब हैं। खस—पाचक, शीतवीर्य, स्तम्भन, लघु, तिक्त तथा मधुर रस युक्त होता है और यह ज्वर, वमन, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, दाह, मूत्रकृच्छ्र और व्रण को दूर करने वाला होता है। [८६-८८] ३३ वीरण-खस हिं०-खस, वीरन मूल, गांडर, बेना। बं०-वेणर मूल, खसखस। म०-वाला। गु०-वालो। क०- मुडिवाल। ते०-वेट्टिवेलु। फा०-रेशये वाला, बीखेवाला। अं०-Cuscus grass (कस्कस ग्रास) ले०-Andropgon muricatus Retz. (एण्ड्रोपोगोन् म्यूरिकैटस् रेझ); Vetiveria zizanioides (Linn.) Nash (वेटिवेरिया झाइझेनिओइडिस् (लिन) नॅश)। Fam. Gramineae (ग्रॅमिनी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। यह अधिकतर खुले हुये दलदल वाले स्थानों में होता है। खस—तृणजातीय औषधि का क्षुप २ से ५ फुट तक ऊँचा एवं दृढ़ होता है। यह गुच्छबद्ध और समूह बद्ध होकर उगता है। पत्ते—सरकण्डे के समान १-२ फुट लम्बे और पतले होते हैं। ये दो कतारों में तथा आधार पर परस्पराच्छादित रहते हैं। मूलीयपत्र कुछ अधिक लम्बे रहते हैं। मध्यशिरा दबी हुई तथा पत्तों के किनारों पर दूर-दूर पर तीक्ष्ण काँटे रहते हैं। फूलों का घनहरा पीलापन या किंचित् लाली युक्त होता है। इसकी जड़ सुगन्धित होती है। इसी को खस कहते हैं। औषध के अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में इसके बने परदे एवं पंखों आदि का उपयोग किया जाता है। सुगन्धि के लिये इसके इत्र का भी बहुत व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल, राल, रंजक पदार्थ, अम्लद्रव्य, चूने का लवण, लौहभस्म तथा काष्ठयुक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—खस शीतल, तिक्त, स्तम्भक, पाचक, पित्तनाशक, मूत्रजनक, पसीने की दुर्गन्ध दूर करने वाला, ज्वरहर, दाहशामक, स्तन्यजनक, वमन को रोकने वाला, श्रमहर एवं जल को सुगन्धित करने वाला है। इसका उपयोग फांट के रूप में पित्तज्वर, प्रसूति ज्वर, तृष्णा, दाह, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, विष, स्वेद दुर्गन्धि, वमन, कुष्ठ एवं आमाशयिक प्रक्षोभ आदि में किया जाता है। इसका लेप दाह, त्वचा के रोग तथा पसीने को रोकने वाला है। (१) वमन को रोकने के लिये १/२ तो० खस को १ पाव उबलते जल में डालकर उसके फांट को पिलाते हैं। इसके साथ धनियाँ का भी उपयोग लाभदायक है। विसूचिका में वमन रोकने के लिये २ बूँद इत्र बताशा में भरकर खिलाते हैं। (२) पसीने की अधिकता तथा मसूरिका में इसका लेप किया जाता है। (३) लोहबान के साथ चिलम में रखकर या सिगरेट बनाकर इसका धूम्रपान करने से शिरःशूल दूर होता है। मात्रा-२-४ माशा। अथ जटामांसी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह जटामांसी भूतजटा जटिला च तपस्विनी। मांसी तिक्ता कषाया च मेध्या कान्तिबलप्रदा। स्वाद्धी हिमा त्रिदोषास्रदाहवीसर्पकुष्ठनुत् ।।८९।। जटामांसी (बालछड़) के नाम तथा गुण—जटामांसी, भूतजटा, जटिला, तपस्विनी और मांसी ये सब संस्कृत नाम जटामांसी के हैं। जटामांसी (बल छड़)—तिक्त तथा कषाय रस युक्त, मेधाजनक, कान्तिकारक, बलप्रद, स्वादिष्ट और शीतवीर्य होता है और यह त्रिदोष, रक्तप्रकोप, दाह, वीसर्प एवम् कुष्ठ को दूर करने वाली होती है। [८९] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४२२ भावप्रकाशनिघण्टुः ३४. जटामांसी हिं०—जटामांसी, बालछड़ । बं०, गु०, म०—जटामांसी । ते०—जटामांशी । क०—जेटामवाशा । पं०— बिल्लीलोटन । ता०—जटामाशी । का०—भूतिजटा । सु०—सम्बुल । फा०—नारदे हिन्दी । अ०—सुंबुलुत्तीबे हिन्दी, सुम्बुले हिन्दी । अं०—Spikenard (स्पाइकनार्ड); Indian Nard (इण्डियन नार्ड); Nardus root (नार्डस् रूट) । ले०—Nardostachys jatamansi DC. (नार्डोस्टॅकिस् जटामांसी डीसी.) । Fam. Valerianaceae (वॅलेरियॉनंसी) । जटामांसी—यह हिमालय के जङ्गलों में कुमाऊँ से सिक्किम तक १७ हजार फीट की ऊँचाई पर तथा भूटान में उत्पन्न होती है । इसका बहुवर्षायु क्षुप सीधा खड़ा रहता है । राइजोम (भौमिक तना) काष्ठमय, लम्बा, मजबूत एवं सूखे हुये रेशेदार पर्णवृन्त से युक्त रहता है । भूमि के ऊपर जड़ से कई शाखाएँ निकलती हैं और वे ६-७ इञ्च तक सघन बारीक जटाकार रोवें से भरी रहती है । पत्ते—जटा को छोड़कर ऊपर ६-७ इञ्च लम्बे तथा १ इञ्च चौड़े, जड़ की ओर संकुचित, मृदु रोमश या चिकने मूलीय पत्ते रहते हैं । काण्डपत्र—एक या दो जोड़े, १-३ इञ्च लम्बे, अवृन्त, आयताकार या उपलट्त्वाकार होते हैं । डंडियों के अन्त में सफेद या किंचित् गुलाबी रंग के छोटे-छोटे फूलों के गुच्छे लगते हैं । फल—छोटे-छोटे गोल, सफेद रोएँदार तथा उनके ऊपर बाह्यकोष के अंडाकार, तीक्ष्ण, दन्तुर बाह्यदल लगे रहते हैं । इसके सूखे हुए राइजोम (भौमिक तना) तथा मूल का औषध में व्यवहार किया जाता है । इसका मूल गहरे धूसर (Grey) रंग का, छोटी अंगुली के बराबर मोटा तथा रक्ताभ भूरे रंग के रोओं से युक्त होता है । ये रोएँदार तन्तु इसके सूखे हुये पर्णवृन्त तथा मूल के भाग हैं जिनके आपस में मिलने से जटासी बन जाती है । अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की होती है । इसमें एक प्रकार की विशिष्ट गन्ध (असली तगर के समान) होती है तथा इसका स्वाद सुगन्धियुक्त कडुवा होता है । इसको हमेशा ताजी खरीदना चाहिये । नोट—अन्य निघण्टुओं में गन्धमांसी, आकाशमांसी, कृष्णा सुगन्धमांसी आदि भेद लिखे हुए हैं । प्राचीन ग्रन्थों में इसके स्वतन्त्र उपयोग बहुत कम मिलते हैं । रासायनिक संगठन—इसमें का प्रधान तत्त्व एक उड़नशील तैल है जो ०.३-०.४% पाया जाता है । यह तैल हलके पीले रंग का कुछ हरिताभ, जल से हलका, हवा में जमने वाला, कपूर के समान गन्ध वाला, कड़वा तथा तीता होता है । इस तैल में ईस्टर, अल्कोहल तथा सेस्क्वी टर्पेन हाइड्रोकार्बन पदार्थ होते हैं । इस तैल के अतिरिक्त जटामांसी में ३% एक रवेदार किन्तु जल में न घुलने वाला अम्ल द्रव्य तथा राल पाई जाती है । गुण और प्रयोग—जटामांसी शीतल, सुगन्धित, दीपन, पाचन, बल्य, रक्ताभिसरणोत्तेजक, उद्वेष्टननिरोधि, वातानुलोमक, मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, वातनाड़ीशामक, संज्ञास्थापन, मेध्य, त्रिदोषघ्न, केश्य, ज्वरहर, त्वग्दोषहर, कान्तिवर्धक, वेदनास्थापन, हृदयबल्य एवं सौमनस्य जनन है । इसके सेवन से क्षुधा बढ़ती है, पाचन ठीक होता है किन्तु कोष्ठबद्धता नहीं होती । इसके सेवन से उदर में उष्णता मालूम होती है, डकार आती है, संपूर्ण शरीर में उष्णता मालूम होकर पसीना आता है, मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा नाड़ी सबल होती है । मस्तिष्क एवं नाड़ी तन्तुओं पर इसकी पोषक तथा उत्तेजक क्रिया होती है । अल्प मात्रा में बहुत दिन देते रहने से मन की चञ्चलता शान्त होती है, काम करने में उत्साह बढ़ता है तथा नाड़ी का बल बढ़ता है । अपस्मार, अपतन्त्रक तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है । (१) मस्तिष्क तथा नाड़ी तन्तुओं के विकारों में जटामांसी बहुत लाभप्रद होती है । शराबियों को व्रण होने पर या उन पर कोई शस्त्रक्रिया करने पर उनको एक तरह का भ्रमणयुक्त कम्प उत्पन्न होता है । ऐसी अवस्था में जटामांसी के प्रयोग से पर्याप्त लाभ होता है । अत्यन्त मानसिक परिश्रम या अस्थैर्य से थकावट उत्पन्न होने पर इसका सेवन नाड़ियों

कर्पूरादिवर्गः ४२३ के लिए बलकारक तथा श्रमहर होता है। अपतन्त्रक में इससे आवेग कम होते हैं। शिरःशूल के लिये यह उत्कृष्ट औषध है। मानसिक आघात में यह बहुत जल्दी काम करती है। हिंग, कस्तूरी आदि की अपेक्षा जटामांसी इन विकारों में अधिक उपयोगी तथा शीघ्र कार्यकर मानी जाती है। भूतावेश जैसी चेष्टाओं में जटामांसी, ब्राह्मी स्वरस तथा घोड़बच का मधु के साथ प्रयोग करते हैं। अपस्मार, अपतन्त्रक, हृदय की धड़कन, कम्पवात तथा अन्य आक्षेपयुक्त व्याधियों में इसका फाण्ट बहुत प्रभावशाली माना जाता है। इनमें इसे १ से २ औंस की मात्रा में दिन में ३ बार पिलाते हैं। अपस्मार में इसके तैल का २-५ बूँद की मात्रा में सेवन कराया जाता है। (२) रक्ताभिसरण ठीक न होता हो तो यह बहुत ही उपयुक्त औषध है। इससे मस्तिष्कगत रक्तप्रवाह सन्तुलित- होता है जिससे सर का भारीपन, चक्कर, मूर्च्छा, आँखों के सामने अँधियारी, सुनाई कम पड़ना आदि में लाभ होता है। हृदय की धड़कन, कमजोरी तथा हृदय के कारण उदर में वायु सञ्चित होने पर इसे सुगन्ध द्रव्य तथा नवसादर के साथ खिलाते हैं। इससे रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तपित्त, विसर्प तथा रक्तस्राव से लाभ होता है। (३) जटामांसी ४, दालचीनी १, शीतलचीनी १, सौंफ १, सोंठ १ तथा मिश्री ८ भाग इनके चूर्ण को ३-९ माशे की मात्रा में आध्मान, शूल, आमाशयिक शूल तथा आक्षेप-युक्त विकारों में देते हैं। बच्चों के आध्मान, उदरशूल, सुशिक्षितों तथा नाजुक प्रकृति की स्त्रियों के मन्दशूल, कुपचन आदि पाचन संस्थान के विकारों में जटामांसी और नवसादर के साथ सुगन्धि द्रव्यों को मिलाकर देते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर पाचन सुधरता है। (४) औपसर्गिक शोथयुक्त ज्वरों में त्रिदोष की वृद्धि होने से रोगी प्रलाप करता है तथा सन्निपात के लक्षण दिखलाई देने लगते हैं। इन अवस्थाओं में इसके प्रयोग से शीघ्र लाक्षणिक लाभ होता है। इससे रक्ताभिसरण ठीक होता है, नाड़ी तन्तुओं को बल मिलता है, कफ ढीला होता है, दाह कम होता है तथा शोथ में भी लाभ होता है। विषम ज्वर में भी इससे पर्याप्त लाभ होता है। (५) विस्फोट एवं व्रणों में इसके लेप से जलन तथा पीड़ा कम होती है। मुखपाक में भी इससे जलन तथा पीड़ा का शमन होता है। झाँई-व्यङ्ग आदि त्वग्दोषों में उबटन के रूप में व्यवहार करने से त्वचा की कान्ति बढ़ती है। यह बालों के लिये भी लाभदायक है। शिरःशूल में इसका लेप करते हैं। दन्तशूल में इससे मञ्जन कराते हैं। मुखदुर्गन्ध में इसे चबाते हैं। स्वेदाधिक्य में इसके चूर्ण का उपयोग मर्दन के लिये करते हैं। बेहोशी में इसे पीसकर आँखों पर लेप करते हैं। (६) पीड़ितार्तव में इसके सेवन से पीड़ा कम होती है तथा आर्तव स्राव ठीक होने लगता है। स्त्रियों में रजोनिवृत्ति के काल में कुछ विशिष्ट मानसिक तथा शारीरिक अवसाद के लक्षण उत्पन्न होते हैं ऐसी अवस्थाओं में जटामांसी बहुत उपयोगी होती है। मात्रा-५-१० रत्ती। अथ शैलेयम् (भूरिछरीला)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह शैलेयन्तु शिलापुष्पं वृद्धं कालानुसार्यकम् ।। ९० ।। शैलेयं शीतलं हृद्यं कफपित्तहरं लघु। कण्डूकुष्ठाश्मरीदाहविष¹ हृद् गुदरक्तहृत् ।। ९१ ।। शैलेय (भूरिछरीला) के नाम तथा गुण- शैलेय, शिलापुष्प, वृद्ध और कालानुसार्यक ये सब संस्कृत नाम भूरिछरीला के हैं। भूरिछरीला-शीतवीर्य, हृद्य (हृदय को हितकर), कफ तथा पित्तनाशक, लघु एवम् खुजली, कुष्ठ, पथरी, दाह, विष तथा गुदा से रक्त गिरना इन सबको दूर करने वाला है। १. विषहृल्लासरक्तजित् इति पाठ०।

४२४ भावप्रकाशनिघण्टुः ३५. छरीला हिं०—छरीला, भूरिछरीला, पत्थरफूल । बं०—शैलज । म०—दगडफूल । गु०—पत्थरफूल, छडीलो । क०— कल्लूहुवु । ते०—शैलेय मनेद्रव्यमु, रतिपंचे । ता०—कलपसी । फा०—उशनह, गुलेसंग । अ०—उश्नः । अं०— Stone flowers (स्टोन फ्लावर्स); Yellow Lichen (यलो लाइचेन) । ले०—Parmelia perlata Ach. (पार्मेलिया परलॅटा आक०) । Fam. Parmeliaceae (पार्मेलियॅसी) । छरीला—यह क्षुद्र वनस्पति पहाड़ी जमीन के पत्थरों पर उत्पन्न होती है और जान पड़ता है मानो यह पत्थर से ही अपना आहार लेती है। यह हिमालय और नीलगिरि के पहाड़ों पर पाई जाती है। यह वृक्षों और दीवालों पर भी पाई जाती है । यह हरी पेडीसी सञ्चित होकर जब सूख कर उतरती है तब इसके ऊपर का पृष्ठ काला और नीचे का सफेद होता है । जो अधिक सफेद होती है वही अच्छी समझी जाती है । इसकी कई जातियाँ पाई जाती हैं । इसका स्वाद फीका तिक्त-कषाय होता है । औषध के लिये हमेशा नया तथा सुगन्धयुक्त छरीला काम में लेना चाहिये । रासायनिक संगठन—इसमें पीत रवेदार पदार्थ, गोंद, लाइचेनिन एवं क्राइसोफेनिक् एसिड, ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—छरीला शीतल, सुगन्धित, हृद्य, सौम्य, मूत्रल, दीपन, वेदनास्थापन, ग्राही एवं शोथहर है । यह कफ, पित्त, दाह, तृषा, वमन, श्वास, व्रण, कण्डू, अश्मरी, विष, हल्लास, गुदरक्तस्राव एवं रक्तविकार दूर करने वाला है । पेशाब रुकने पर १ तो० छरीला के फांट में मिश्री एवं जीरा मिलाकर पिलाते हैं तथा इसे गरम जल में भिंगोकर कमर पर बाँधते हैं। इसे ठण्डे जल में पीस कर सर पर लेप करने से शिरःशूल दूर होता है । व्रण पर इसे लगाने से लाभ होता है । यकृत् शूल निवारण के लिये इसका उपयोग करते हैं । अञ्जन के योगों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा—२-४ माशा । अथ मुस्तकं-नागरमुस्तकञ्च । (मोथा-नागरमोथा) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह मुस्तकं न स्त्रियां मुस्तं त्रिषु वारिदनामकम् । कुरुविन्दश्च संख्यातोऽपरः क्रोडकसेरुकः ।।९२।। भद्रमुस्तश्च गुन्द्रा च तथा नागरमुस्तकः । मुस्तं कटु हिमं ग्राहि तिक्तं दीपनपाचनम् ।।९३।। कषायं कफपित्तास्रतृड्ज्वरारुचिजन्तुहृत् । अनूपदेशे यज्जातं मुस्तकं तत्प्रशस्यते । तत्रापि मुनिभिः प्रोक्तं वरं नागरमुस्तकम् ।।९४।। मोथा तथा नागरमोथा के नाम और गुण—मुस्तक (इसका स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर शेष लिङ्गों में प्रयोग होता है, मुस्तं (यह तीनों लिङ्गों में होता है), वारिदनामक (मेघवाची सभी शब्द) और कुरुविन्द ये सब संस्कृत नाम मोथा के हैं । दूसरे प्रकार का जो मोथा है जिसे नागरमोथा कहते हैं, उसके संस्कृत नाम—क्रोडकसेरुक, भद्रमुस्त, गुन्द्रा तथा नागरमुस्तक ये सब हैं । मोथा—कटुतिक्त तथा कषाय रस युक्त, शीतवीर्य, ग्राही, अग्निदीपक तथा पाचक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तकोप, तृषा, ज्वर, अरुचि और कृमि का नाशक होता है । जो 'मोथा' अनूप देश में उत्पन्न होता है वही श्रेष्ठ होता है । उसमें भी मुनियों ने 'नागरमोथा' को ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है । ३६. मोथा हिं०—मोथा । बं०—मुता, मुथा । म०—मोथा, बिम्बल भद्रमुष्टि । गु०—मोथ । क०—कोरनारि । ते०—तुंगमुस्ते । ता०—कोरइ किलांगु । फा०—मुष्के जमीं । अ०—सोअ(अ)द कूपी । अं०—Nutgrass (नट्ग्रास) । ले०—Cyperus rotundus Linn. (साइपेरस् रोटण्डस् लिन.) । Fam. Cyperaceae (साइपेरॅसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४२५ मोथा इस देश के सब प्रान्तों में बहुलता से होता है। यह तृणजातीय वनस्पति बारहो मास पायी जाती है किन्तु बरसात में सर्वत्र देखने में आती है। इसमें मूलीय पत्रगुच्छ होता है जो एक कठोर कन्द सदृश भौमिककाण्ड से निकलता है। नीचे सूत्राकार अन्तर्भूमिशायी कांड भी प्रायः होते हैं जिनसे पौन से एक इञ्च के घेरे में अंडाकार कंद निकले रहते हैं जो कसेरू के समान ऊपर से काले रंग के और भीतर से लालीयुक्त सफेद होते हैं और इनमें सुगन्ध आती है। डंडी- पतली, ६ से २४ इञ्च तक ऊँची, त्रिकोणाकार तथा पत्तों के बीच से निकली रहती है। पत्ते-लम्बे और पतले होते हैं। डंडी के अग्र पर समस्थमूर्धजक्रम में पुष्पवाहक शाखायें निकलती हैं जो छोटे-छोटे अवृन्त काण्डजव्यूहों का संयुक्तव्यूह होती हैं। पुष्पव्यूह का आधार भाग तीन पत्र सदृश कोणपुष्पकों से घिरा रहता है। इसके काले-काले कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। नोट-भावप्रकाशकार ने मोथा एवं नागरमोथा ये दो भेद यहाँ लिखे हैं तथा मुस्ता का एक अन्य कैवर्तमुस्ता (जलजमुस्ता, केवटीमोथा) भेद आगे लिखा है। नागरमोथा का ही दूसरा नाम भद्रमुस्ता लिखा है। अन्य निघण्टुओं में भद्रमुस्ता अलग लिखा है। सब मोथे के गुण करीब-करीब समान ही हैं तथा एक दूसरे के स्थान पर इनका उपयोग किया जा सकता है। अनूप देश में होने वाला नागर मोथा अधिक प्रशस्त माना गया है। यह हमेशा ताजा तथा सुगन्धयुक्त खरीदना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल, वसा, शर्करा, गोंद, कार्बोहाइड्रेट, ॲल्ब्यूमिन सदृश पदार्थ, तन्तु तथा राख एवं अत्यल्प मात्रा में क्षाराम आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-मोथा ग्राही, दीपक, पाचक, स्वेदजनक, मूत्रजनक, स्तन्यवर्धक, आर्तवजनक, किञ्चित गर्भाशयोत्तेजक, केशवर्धक, व्रणरोपक एवं कृमिघ्न है। (१) कुपचन, वमन एवं अतिसार यदि आमाशय तथा आन्त्र के विकारों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आमातिसार में ताजे कन्द को आर्द्रक के साथ पीसकर मधु मिला कर खिलाते हैं। इसमें २० मोथे के कन्दों को ३ गुने दूध तथा जल में उबाल कर दूध शेष रहने पर छानकर पिलाते हैं। सभी प्रकार के अतिसार में इसके क्वाथ में (क्वाथ ठंडा होने पर) मधु मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। (२) स्वेदजनक, मूत्रजनक एवं उत्तेजक होने से यह ज्वर, ज्वरातिसार एवं पित्त ज्वर में उपयोगी है। (३) विसूचिका तथा मदात्यय में तृषा शान्ति के लिये इसके शीतल क्वाथ को पिलाते हैं। (४) अक्षिव्रण में इसे घृत में भूनकर पीसकर लगाने से ३, ४ दिन में लाभ होता है। आँख की फूली एवं लालिमा में बकरी के मूत्र में इसे पीसकर उसका अंजन किया जाता है। (५) इसकी ताजी जड़ को घिसकर गोघृत मिलाकर व्रण पर लगाते हैं तथा इसको जल में पीसकर दुग्धवृद्धि के लिये स्तन पर लेप करते हैं। (६) रोमन लोग आर्तवजनन औषध के रूप में गर्भाशय की बीमारियों में इसका व्यवहार करते थे। मात्रा-३-६ माशा। ३७. नागर मोथा हिं०-नागर मोथा। बं०-नागरमथा। म०-नागरमोथा, लवाला। मा०-नागर मोथो। गु०-नागरमोथ। क०- कोन्नरि गड्डे। ते०-नागमुस्तेलु। ता०-मुट्टाकाचि। फा०-मुष्के जमीं। अ०-सोअद कूपी। ले०-Cyperus scariosus R. Br. (साइपेरस् स्कॅरिओसस् आर. ब्र.)। Fam. Cyperaceae (साइपेरेंसी)।

४२६ भावप्रकाशनिघण्टुः नागरमोथा-मोथे के समान तृणजातीय वनौषधि बंगाल, पेगु, उत्तर प्रदेश एवं पूर्व तथा दक्षिण के भागों के तालाब तथा सजल स्थान में पाया जाता है। इसकी डंडी १६ से ३६ इञ्च तक ऊँची, पतली त्रिकोणाकार होती है। जड़ के नीचे कंदवत् लम्बे-लम्बे, अंगुली प्रमाण मोटे, दबे हुये गहरे भूरे रंग के जो अन्तर्भूमिशायी काण्ड होते हैं उन्हीं को नागरमोथा कहते हैं जिनका चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-मोथा के समान। गुण और प्रयोग-नागरमोथा शीतल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही, स्वेदजनन, कफघ्न, मेध्य, तृष्णानिग्रहण, स्तन्यजनन, स्तन्यशोधन, कण्डूघ्न, मूत्रजनन, उत्तेजक तथा जन्तुनाशक है। इसका उपयोग मोथे के समान ही किया जाता है। यद्यपि इसमें इतने उपयुक्त धर्म हैं तथापि इसका प्रयोग अन्य औषधों के साथ अधिक किया जाता है। (१) अरुचि, आमातिसार, वमन, रक्तार्श तथा कुपचन में नागरमोथा गुणकारी है। संग्रहणी में इससे बहुत लाभ होता है। (२) ज्वर, प्रसूतिज्वर तथा पैत्तिक ज्वर में हमेशा इसका प्रयोग करना चाहिये। इससे प्यास कम होती है, पसीना आता है, उत्तेजना आती है, जीभ का स्वरूप अच्छा होता है, पेशाब साफ होता है तथा गर्भाशय का थोड़ा सा संकोच भी होता है। प्रसूता को दुग्ध शुद्धि तथा वृद्धि के लिये इसको खिलाते हैं तथा जल में घिस कर स्तन पर लेप करते हैं। इससे स्तन की दूध की गाँठें कम होती हैं। (३) परमा में नागरमोथा बहुत लाभदायक है। यह प्रथम एवं द्वितीयावस्था में दिया जाता है। (४) अपस्मार में उत्तर दिशा में होने वाले मोथे को पीसकर समान वर्ण वाली सबत्सा गौ के दुग्ध के साथ पिलाने से लाभ होता है। (५) इसका जन्तुघ्न धर्म अधिक मात्रा में देने से ही मालूम होता है। कंडू में इसका लेप किया जाता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ कर्चूरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कर्चूरो वेधमुख्यश्च द्राविड कल्पकः शटी। कर्चूरो दीपनो रुच्यः कटुकस्तिक्त एव च ।।९५।। सुगन्धिः कटुपाकः स्यात्कुष्ठाशोंव्रणकासनुत् । उष्णो लघुहरेच्छ्वासं गुल्मवातकफक्रिमीन् ।।९६।। कचूर के नाम तथा गुण-कर्चूर, वेधमुख्य, द्राविड, कल्पक और शटी ये सब संस्कृत नाम कचूर के हैं। कचूर-कटु तथा तिक्त रस युक्त, अग्निदीपक, रुचिकारक, सुगंध युक्त, पाक में कटुरस युक्त, उष्णवीर्य और लघु होता है एवं यह कुष्ठ, बवासीर, व्रण, खाँसी, श्वास, गुल्म, वात, कफ और कृमि इन सब रोगों का नाशक होता है। [९५-९६] ३८. कचूर हिं०-कचूर। बं०-शटी, एकांगी, शोरी, कचूरा। म०-कचोरा। गु०-कचूरो, षट् कचूरो। ते०-कचोरमु। ता०-किच्छिलिक किझंगु। क०-कचोरा। अ०-जरंबाद, एरकुल् काफुर। फा०-कजूर। अं०-Zedoary (झिडोअरी)। ले०-Curcuma zedoaria Rosc. (कर्क्युमा झेडोरिआ रास्) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरॅसी) । पूर्व हिमालय, सिंहल द्वीप, कनारा का तटीय प्रदेश तथा वर्मा के पश्चिम में यह आप ही आप उत्पन्न होता है और कई प्रान्तों में रोपित किया हुआ भी पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४२७ इसका क्षुप-तीन चार फीट ऊँचा हल्दी के समान होता है और जड़ के नीचे अनेक कंद होते हैं। उनको कचरा कर सुखा लेते हैं। इसी को कचूर कहते हैं। पत्ते-१-२ फीट लम्बे, आयताकार, लम्बाग्र और नीचे की ओर क्रमशः संकुचित होकर पत्रवृन्त में परिणत हो जाते हैं। ये कुछ कालापन लिये हुये तथा मध्य शिरा पर नीलारुण रंगीन धब्बों से युक्त होते हैं। पुष्पदंड पत्तियों के पहले निकलता है। कोणपुष्पक रक्ताभ और ऊपर के अपुष्प पत्र अधिक लाल होते हैं। फूल-नलिकाकार पीले रंग के आते हैं। फल-त्रिकोणाकार और बीज अंडाकार और सफेद होते हैं। अन्तर्भूमिशायी कन्द लंबगोल, भीतर हलके पीले और पूर्णतः विकसित रहते हैं। मूलाग्र कन्द अनेक और भीतर मुक्तावर्ण के होते हैं। अन्तर्भूमिशायी कंद कर्पूर तुल्य प्रियगंध वाले होते हैं। इन्हीं कंदों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों को मछली भूनने के काम में लाते हैं। इसी क्षुप के समान काली हल्दी का क्षुप होता है जिसका वर्णन पृ० ११८ पर किया गया है। कचूर का पर्याय शटी क्यों पड़ा इस सम्बन्ध में श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है कि प्राचीन ग्रन्थों में 'कचूर' का उल्लेख नहीं है, शठी का है। इस शठी (कपूरकचरी) की उपलब्धि कम होने के कारण उसके स्थान पर प्रतिनिधिरूप में कचूर का उपयोग होने लगा तथा उसे भी शठी नाम दे दिया गया। शटी (कचूर) और शठी (कपूरकचरी) यह थोड़ा सा नामभेद कोई योजनापूर्वक पार्थक्य दिखलाने के लिये नहीं रखा होगा। बल्कि गलती से ऐसे दो नाम पड़ गये होंगे। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, कटु मुलायम राल, गोंद, स्टार्च, शर्करा एवं ऑर्गेनिक अम्ल आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-कचूर सुगंधित, रुचिकर, दीपन, स्वर्य, कफहर, वातहर, मूत्रजनन एवं हृद्य है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अर्श, हिक्का, ज्वर, संग्रहणी, प्लीहा, गुल्म, कुष्ठ, कृमि एवं व्रण में किया जाता है। (१) मुख को साफ करने के लिये इसको चबाते हैं। गायक इसको आवाज साफ करने के लिये चूसते हैं। इससे खाँसी एवं गले की खराश में लाभ होता है। (२) इसके ताजे कंदों का पाक या खण्ड प्रसूता के लिए पौष्टिक माना जाता है। (३) विषमज्वर, प्रतिश्याय तथा शरीर में पीड़ा हो तो कचूर, छोटी पीपल एवं दालचीनी का क्वाथ मधु मिलाकर पिलाते हैं तथा पीड़ा में इसका लेप करते हैं। (४) श्वेत प्रदर तथा पूयमेह में यह बहुत लाभप्रद है। परमा में इसके फांट से जलन कम होकर पेशाब साफ होता है। (५) जलोदर में इसके पत्तों का रस पिलाया जाता है। गाँठों तथा फोड़े आदि पर इसके पत्तों को पीसकर बाधा जाता है। अर्श तथा अतिसार में इसका शाक के रूप में प्रयोग लाभप्रद माना जाता है। (६) बच्चों के आक्षेप में कंबोडियन माताएँ इसको चबाकर सर तथा शरीर पर लगाती हैं। (७) मोच में इसको पीसकर फिटकिरी मिलाकर लगाते हैं। मात्रा-१-४ माशा। अथ मुरा (मुरहरी, एकाङ्गी) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह मुरा गन्धकुटी दैत्या सुरभिः शालपर्णिका ।।९७।। मुरा तिक्ता हिमा स्वाद्वी लघ्वी पित्तानिलापहा। ज्वरासृग्भूतरक्षोघ्नी कुष्ठकासविनाशिनी ।।९८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४२८ भावप्रकाशनिघण्टुः मुरा (एकाङ्गी) के नाम तथा गुण- मुरा, गन्धकुटी, दैत्या, सुरभि और शालपर्णिका ये सब संस्कृत नाम मुरा के हैं। मुरा- तिक्त रस युक्त, शीतवीर्य, स्वादिष्ट और लघु होती है एवं यह पित्त, वात, ज्वर, रक्तविकार, भूत और राक्षस सम्बन्धी बाधा, कुष्ठ तथा खाँसी इन सबों को दूर करने वाली होती है। [९७-९८] ३९. मुरा मुरा नामक गन्धद्रव्य के सम्बन्ध में मतभेद है। कुछ लोग इसे मरोड़फली (Helicteres isora Linn. हेलिक्टेरिस् आइसोरा लिन.) मानते हैं, जो उचित नहीं मालूम होता। डॉ० कर्नल चोपरा की पुस्तक में एरिथ्रिना स्ट्रिक्टा राक्सब. (Erythrina stricta Roxb.) का संस्कृत नाम सुरा लिखा मिलता है। पंजाबी में मुरा नाम साइनॅन्थस् का दिया है जिसके पुष्पों का दमे में उपयोग होता है। कुछ लोग इसे कचूर, कपूरकचरी या जटामांसी का भेद मानते हैं। अधिक संभव है यह कपूरकचरी का भेद हो। अथ गन्धपलाशी (कपूरकचरी) (सुगन्धिद्रव्यं काश्मीरे प्रसिद्धम्) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह- शठी पलाशो षड्ग्रन्था सुव्रता गन्धमूलिका । गन्धारिका गन्धवधूर्वधूः पृथुपलाशिकाः ॥९९॥ भवेदगन्धपलाशी तु कषाया ग्राहिणी लघुः । तिक्ता तीक्ष्णा च कटुकाऽनुष्णाऽऽस्यमलनाशिनी । शोथकासव्रणश्वासशूलसिध्मग्रहापहा१ ॥१००॥ कपूर कचरी जो कि काश्मीर देश में प्रसिद्ध एक प्रकार का सुगन्धित द्रव्य है, उसके नाम तथा गुण- शठी, पलाशो, षड्ग्रन्था, सुव्रता, गन्धमूलिका, गन्धारिका, गन्धवधू, वधू, पृथुपलाशिका और गन्धपलाशी ये सब संस्कृत नाम 'कपूर कचरी' के हैं। कपूर कचरी- कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, ग्राही, लघु, तीक्ष्ण तथा थोड़ा उष्णवीर्य होती है एवम् यह मुख के मल को दूर करने वाली, शोथ, खाँसी, व्रण, श्वास, शूल, सिध्म (या हिक्का) और ग्रहबाधा इन सबों को दूर करने वाली है। [९९-१००] ४०. कपूर कचरी हिं०- गंधपलाशी, कपूर कचरी, सितरूटी। बं०- शठी, गन्ध शटी। म०- कपूर कचरी। गु०- कपूर काचरी। क०- गन्ध शठी। ता०- शिमैकिचिलिक् किशंगु। पं०- कचूर कचु, शेदूरी। ले०- Hedychium spicatum Ham. ex Smith (हेडिचिअम् स्पाइकैटम् हॅम्. एक्स स्मिथ)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेॅसी)। यह हिमालय के साधारण प्रान्त, पंजाब, नेपाल और कुमाऊँ में अधिक उत्पन्न होती है। यह क्षुप- जाति की वनौषधि है। जड़- बहुवर्षायु, कन्दवत् भूमि के भीतर समतल बढ़ती है। इसी को सुखा कर कार्य में लेते हैं। डंठल- लम्बा पत्रयुक्त होता है। पत्ते- हल्दी के पत्तों के समान एक फुट लम्बे, अनियमित चौड़े एवं आयताकार-मालाकार होते हैं। फूल- सफेद आते हैं। फल- त्रिकोष्ठयुक्त, गोलाकार और चिकना होता है। इसके मूलस्तंभ (मूल) को काटकर सुखाये हुये, छोटे-बड़े सुगंधित टुकड़े बाजार में बिकते हैं। यह सफेद रंग के एवं पिष्टमय रहते हैं। इनका बाह्यत्वक् रक्ताभ भूरे रंग का होता है। इसका स्वाद कड़वा एवं तीता रहता है। अबीर के निर्माण एवं गुडाखु को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है। कपूर कचरी नाम से इसी वर्ग के १. हिध्म इति पाठा० ।

कर्पूरादिवर्गः ४२९ ‘चन्द्रमूल’ (Kaempferia galangal Linn. केम्प्फेरिआ गॅलन्गल् लिन)¹ के मूल के टुकड़े भी व्यवहार में लाये जाते हैं। जो इसी के समान होते हैं। बाजार में एक चीनी कपूर कचरी नामक औषध भी बिकती है जो देखने में अच्छी होते हुये भी उसमें सुगन्ध कम रहती है। रासायनिक संगठन—इसमें स्टार्च, गोंद, सेल्युलोज, अल्ब्यूमिन्, तैल, राल एवं सुगन्धित द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—कपूरकचरी उष्ण, ग्राही, लघु, कटु, तिक्त, दीपन एवं वातानुलोमक होती है। इसका उपयोग कास, श्वास, हिचकी, वमन, अपतन्त्रक, शूल एवं व्रण में किया जाता है। दंतशूल में इसके मंजन से लाभ होता है। इससे मुख की दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा—१-४ माशा। अथ प्रियंगुर्गन्धप्रियंगुश्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह प्रियङ्गुः फलिनी कान्ता लता महिलाऽऽह्वया ।। १०१ ।। गुन्द्रा गन्धफला श्यामा विष्वक्सेनाङ्ग नाप्रिया । शीतला तिक्ता तुवराऽनिलपित्तहृत् ।। १०२ ।। ²रक्तातीसारदौर्गन्ध्यस्वेददाहज्वरापहा । (वान्तिभ्रान्त्यतिसारघ्नी वक्त्रजाड्यविनाशिनी ।। गुल्मतृड्विषमोहघ्नी³ तद्वद् गन्धप्रियंगुका ।। १०३ ।। ‘प्रियंगु’ तथा ‘गन्धप्रियंगु’ के नाम और गुण—प्रियंगु, फलिनी, कान्ता, लता, महिलाह्वया (स्त्रीवाचक सभी शब्द), गुन्द्रा, गन्धफला, श्यामा, विष्वक्सेनाङ्गना और प्रिया ये सब संस्कृत नाम ‘प्रियंगु’ के हैं। प्रियंगु—तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और शीतवीर्य होती है। यह वात, पित्त, रक्तातिसार, दुर्गन्ध, पसीना, दाह, ज्वर, (वमन, चक्कर, अतिसार, मुँह की जड़ता) गुल्म, तृषा, विष और मोह इन सब रोगों को दूर करती है। इसी भाँति ‘गन्धप्रियंगु’ के भी गुण होते हैं। [१०१-१०३] अथ तत्फलगुणानप्याह तत्फलं मधुरं रूक्षं कषायं शीतलं गुरु । विबन्धाध्मानबलकृत्संग्राहि कफपित्तजित् ।। १०४ ।। प्रियङ्गु का फल—मधुर तथा कषाय रसयुक्त, रूक्ष, शीतवीर्य और गुरु होता है। यह विबन्धकारक, आध्मानकारक, बलकारक एवं संग्राही तथा कफपित्त नाशक होता है। [१०४] ४१. प्रियंगु प्रियंगु के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। इसी निघण्टु के धान्यवर्ग में कंगु (कंगुनी धान्य) के पर्याय में भी प्रियंगु नाम दिया हुआ है। इससे भ्रम होता है कि क्या यहाँ पर वर्णित प्रियंगु तथा धान्यवर्गोक्त प्रियङ्गु एक ही हैं ? प्रियंगु से कौन-सा प्रियंगु लिया जाय ? वास्तव में कंगु के पर्याय में केवल प्रियंगु नाम देने से ही प्रियंगु से कंगु धान्य लेना उचित नहीं है। दोनों के गुण बिलकुल भिन्न हैं। जहां पर टीकाकारों ने स्पष्ट रूप से प्रियंगु के लिये कंगु लेने का निर्देश किया १. चन्द्रमूल के क्षुप दक्षिण की तरफ बगीचों में लगाये मिलते हैं। इसमें १४% द्रव्य, सुगंधि तैल, ४% गोंद तथा अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ रहते हैं। यह मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं कफनिःसारक है। सर्दी-खाँसी में इससे सिद्ध तैल को नाक तथा छाती पर लगाते हैं एवं मधु के साथ १-२ रत्ती चूर्ण चटाते हैं। मुख को सुवासित करने के लिये इसके छोटे टुकड़े को मुख में रखते हैं। इसके उबटन का भी प्रयोग किया जाता है। २. रक्तातियोग इति पाठा०। ३. मेहघ्नी इति पाठा०।

४३० भावप्रकाशनिघण्टुः हो वहीं पर प्रियंगु के लिये कंगु का उपयोग किया जा सकता है अन्यथा प्रियंगु से कर्पूरादिवर्गोक्त प्रियंगु ही लेना उचित है। कुछ लोगों ने कंगु से पार्थक्य करने के लिये इसको गंधप्रियंगु लिखा है लेकिन भावप्रकाशकार ने यहाँ पर प्रियंगु तथा गंधप्रियंगु दो द्रव्यों का उल्लेख किया है। यहाँ पर इन दोनों के गुण समान बतलाये हैं। धान्यवर्गोक्त कंगु, जिसका एक पर्याय प्रियङ्गु है, उसके तथा यहाँ पर उल्लिखित प्रियङ्गु के गुण समान नहीं हैं, यह बात ध्यान में रखने की है। निम्नलिखित वर्णन केवल यहीं पर वर्णित प्रियंगु का है कंगु (धान्य) का नहीं। यहाँ पर उपर्युक्त श्लोकों में जिन दो द्रव्यों का उल्लेख किया गया है, उनके लिये गंधप्रियंगु नाम देना ठीक है। हो सकता है कि प्रियङ्गु के संदिग्ध द्रव्य रहने के कारण दो विभिन्न प्रकार के द्रव्यों का उपयोग भावप्रकाशकार के समय होता रहा हो, जिनमें से एक में गंध हो तथा दूसरे में गंध न हो या बहुत कम हो अथवा एक ही प्रकार के दो क्षुप हों जिनमें से एक में गंध हो और दूसरा निर्गंध हो, जिसका आगे स्पष्टीकरण होगा। आजकल इसी उपर्युक्त 'प्रियंगु, गंधप्रियंगु' के लिये तीन प्रकार के द्रव्यों का उपयोग किया जा रहा है। बंबई की तरफ घऊँला नाम से प्रूनस् महालिब् (Prunus mahaleb) की फलमज्जा बिकती है, जिसका उपयोग प्रियंगु के रूप में वहाँ पर करते हैं। बंबई प्रान्त में श्वेतचंदन, घऊँला एवं कपूरकचरी को जल में पीस कर सुगंधित लेप के लिये प्रयोग किया जाता है। चरक ने रक्तपित्त में दाहशांति के लिये चन्दन और प्रियंगु के लेपन से उपलिप्त स्त्रियों के स्पर्श का विधान किया है। १ यह मज्जा छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूमवर्ण की, स्वाद में तिक्त एवं सुगन्धित होती है। दूसरा द्रव्य ॲग्लेइआ रॉक्सबर्धियाना (Aglaia roxburghiana) के फल हैं जो कुछ गोल, छोटे, निंब फल सदृश एवं सूखने पर सिकुड़नदार दिखलाई देते हैं। इनका व्यवहार बहुत दिनों से होता आ रहा है लेकिन इसमें गंध नाम मात्र की होती है। तीसरा द्रव्य कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला (Callicarpa macrophylla) नामक गुल्म (झाड़ी) की पुष्प कलिकायें हैं जो छोटी-छोटी कंगुनी धान्य सदृश होती हैं। इसका वर्णन अभिनव बूटी दर्पण में है लेकिन वहाँ पर इसका लेटिन नाम नहीं लिखा है। इसके लेटिन नाम के साथ इसका वर्णन श्रीमान् ठा० बलवन्त सिंह जी ने 'वनौषधिदर्शिका' एवं 'बिहार की वनस्पतियाँ' इन पुस्तकों में किया है। मूल श्लोक एवं अन्य निघंटुओं में दिये हुए फलिनी, कृष्णपुष्पी, गन्धफला, कृशांगी, महिलाह्वया, पर्णभेदनी आदि इसके रूपपरिचयात्मक पर्याय इससे कुछ मिलते होने के कारण इसको प्रियंगु मानते हैं। एक बात ध्यान देने की है कि इसकी झाड़ी या गुल्म होता है। यह लता नहीं है। पुष्प भी श्वेत वर्ण के होते हैं। श्रीमान् बाबू भीमचन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित 'दि एकॉनॉमिक बोटॅनी ऑफ इण्डिया' से 'अभिनव बूटी दर्पण' में कुछ अंश उद्धृत किया गया है जिसमें वे लिखते हैं कि 'नेपाल, चटगाँव तथा पूर्व बंगाल के कुछ भागों में इसी का व्यवहार प्रियंगु के रूप में लोग करते हैं। नेपाल में दयालो तथा श्वेतदयालो नाम से उपयोग में लाई जाने वाली लताओं का वर्णन उपर्युक्त लता से ठीक मिलता है। श्वेतदयालो तथा दयालो एक ही समान हैं किन्तु अन्तर इतना ही है कि श्वेतदयालो गन्धयुक्त होती है एवं इसके पत्ते कुछ बड़े, अधिक श्वेत तथा स्पर्श में खुरदरे होते हैं। इससे मालूम होता है कि भावप्रकाशोक्त प्रियंगु तथा गन्धप्रियंगु यह दयालो तथा श्वेतदयालो हैं। जिला गढ़वाल और अल्मोडा में दहिया के नाम से यह प्रसिद्ध है तथा कुमाऊँ प्रान्त के वैद्य इसको प्रियंगु मानते हैं।' इन तीन द्रव्यों के अतिरिक्त मेंहदी के फूल, कुमुदनी, सरसों के फूल, मालकांगुनी एवं गोंदनी आदि को भी कुछ लोग प्रियंगु मानते हैं। चरक में संधानीय, शोणितास्थापन, पुरीष संग्रहणीय एवं मूत्रविरजनीय गणों में तथा सुश्रुत में अञ्जनादि, एलादि तथा प्रियंग्वादिगणों में प्रियंगु का उल्लेख है। चरक ने रक्त और पित्त की अतिवृद्धि को शान्त करने वालों में गन्धप्रियंगु को श्रेष्ठ माना है (च० सू० अ० २५) उपर्युक्त तीन द्रव्यों का वर्णन यहाँ दिया जा रहा है। १. प्रियङ्गुकाचन्दनरूषितानां स्पर्शाः प्रियाणं च वराङ्गनानाम्। (च. चि. अ. ४)

कर्पूरादिवर्गः ४३१ प्रियंगु - १ (फूलप्रियंगु) हिं०-प्रियंगु । फूलप्रियंगु, गन्धप्रियंगु, बुंडुड, बूढीघासी, डइया, दहिया। बं०-मधुरा। नेपा०-दयालो, श्वेतदयालो । पं०-सुमाली । ले०-Callicarpa macrophylla Vahl (कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला वाह.)। Fam. Verbenaceae (ह्वर्बिनेसी) । यह जंगलों के किनारे, घाट और ऊँची चढ़ाइयों तथा खुले हुये जंगल और परती भूमि में होता है। यह नेपाल, देहरादून के जलप्राय स्थानों, बंगाल तथा बिहार के अनेक स्थानों में पाया जाता है। बलिया स्टेशन के अहाते में लगे हुए इसी प्रकार के एक क्षुप का उल्लेख चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय से प्रकाशित 'सचित्र अभिनव बूटीदर्पण' में किया हुआ है। इसका गुल्म-४ से ८ फीट ऊँचा और तूल रोमश होता है। शाखाएँ-अनियमित रूप से फैली रहती हैं। पत्ते- ५ से १० इंच लम्बे, अंडाकार या अंडाकार-भालाकार, लम्बाग्र, ऊपर चिकने, नीचे तूलरोमश एवं किनारा गोल दन्तुर होता है। पुष्प-गुलाबी, सघन द्विविभक्त १ से ३ इंच व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-सफेद एवं .१२-.१८ इंच व्यास के होते हैं। डालियाँ पुष्पगुच्छों के बोझ से झुक जाती हैं। इसकी छोटी-छोटी प्रियंगु धान्य सदृश पुष्प कलिकाएँ फूल प्रियंगु के नाम से मिलती हैं। इनमें मसलने पर गन्ध भी होती है। शास्त्रीय गन्धप्रियंगु यही मालूम होती है। ग्रामीण लोग गठिया में इसकी पत्तियों से सेंक करते हैं। प्रियंगु - २ (घऊँला) हिं०-प्रियंगु, महालिव । म०-गडुला, गावल। गु०-घऊँला । अ०-महलिव । Prunus Mahaleb Linn. (प्रूनस् महालिब् लिन.) । Fam. Rosaceae (रोज़ेसी) । यह बलोचिस्तान में पाया जाता है। इसका गुल्म अनेक फैली हुई तथा सीधी शाखाओं से युक्त होता है। पत्ते- कुछ लम्बाई लिये अंडाकार एवं दन्तुर होते हैं। पुष्प-श्वेत रंग के; फल-छोटे, अंडाकार एवं नोकीले होते हैं। घऊँला नाम से प्रियंगु की मज्जा बंबई के बाजार में बिकती है। यह छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूम वर्ण की, कड़वी और सुगंधित होती है। सुगंधि लेप में श्वेतचन्दन तथा कपूर कचरी के साथ इसका उपयोग बंबई प्रान्त में लोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में अल्प मात्रा में पद्मकाष्ठ में पाया जाने वाला हाइड्रोसायेनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहने के कारण इसका उपयोग सावधानी के साथ करना चाहिये। इसके अतिरिक्त इसमें काउमॅरिन् (Coumarin), सॅलीसिलिक् एसिड (Salicylic acid) एवं ॲमिग्डॅलिन् (Amygdalin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, वेदनाहर, दीपन एवं मूत्रल है। इसका उपयोग पीड़ायुक्त कुपचन, आमाशय के क्षत तथा आमाशय के अर्बुद में करते हैं। मात्रा-२-५ रत्ती। प्रियंगु - ३ हिं०-प्रियंगु । कं०-तेतिलकामि । ले०-Aglaia roxburghiana Miq. (ॲग्लेइआ राक्स बर्घियाना मिक्,)। Fam. Meliaceae (मेलियॅसी) । यह पश्चिमी प्रायद्वीप में कोंकण और मिदनापूर से दक्षिण की ओर सिलोन तक ६००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४३२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका साधारण वृक्ष होता है। छाल किंचित् खाकी रंग की और चिकनी होती है। लकड़ी मजबूत तथा चमकीले लाल रंग की होती है। पत्ते-पक्षवत् पत्ते ३-१० इञ्च लम्बे और उनके पत्रक संख्या में ५, १ १/२ से ५ १/२ इञ्च लम्बे, पतले अंडाका-प्रासवत् और चिकने होते हैं। पुष्प-व्यास में १ इञ्च से कम, पीताभ और पत्ती के बराबर लम्बी मञ्जरियों में होते हैं जो पत्र कोण के ऊपर निकलती हैं। फल-कुछ-कुछ गोल, निम्बफल सदृश, १/४-३/४ इञ्च व्यास के, रोमश तथा हरिण के रंग के रहते हैं जो सूखने पर भूरे रंग के सिकुड़नदार तथा आकार में छोटे हो जाते हैं। इसमें १ या २ बीज रहते हैं जो चिपटे करीब १/२ इञ्च लम्बे (ताजी अवस्था में) तथा एक तरफ से उन्नतोदर रहते हैं। बीज का स्वाद खट्टा तथा कसैला रहता है। ताजी अवस्था में इसमें सुगन्ध रहती है जो सूखने पर नहीं रहती। इसके फलों का उपयोग बहुत दिनों से प्रियंगु के नाम से किया जा रहा है। हो सकता है कि भावप्रकाशकार ने प्रियंगु का जो फल लिखा है वह यही हो। गुण और प्रयोग-यह शीतल एवं ग्राही होता है। इसका उपयोग ज्वर, पित्त तथा शोथयुक्त रोगों में किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। अथ रेणुका। तस्या नामानि गुणाँश्चाह रेणुकाराजपुत्री च नन्दिनी कपिला द्विजा। भस्मगन्धा पाण्डुपुत्री स्मृता कौन्ती हरेणुका ।।१०५।। रेणुका कटुका पाके तिक्ताऽनुष्णा कटुर्लघुः। पित्तला दीपनी मेध्या पाचनी गर्भपातिनी। बलासवातकृच्चैव१ तृट्कण्डूविषदाहनुत् ।।१०६।। रेणुका के नाम तथा गुण-रेणुका, राजपुत्री, नन्दिनी, कपिला, द्विजा, भस्मगन्धा, पाण्डुपुत्री, कौन्ती तथा हरेणुका ये सब पर्यायवाची शब्द रेणुका के हैं। रेणुका-पाक में कटुरसयुक्त, किंचित् उष्णवीर्य, तिक्त तथा कटुरसयुक्त और लघु होती है एवम् यह पित्तजनक, अग्निदीपक, मेधा के लिये हितकर, पाचक, गर्भ गिराने वाली, कफ तथा वातकारक होती है। यह तृषा, खुजली, विष और दाह को दूर करती है। [१०५-१०६] ४२. रेणुका रेणुका एक संदिग्ध औषध है। रेणुक बीज नाम से होने वाली निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फल बिकते हैं। लेकिन संभवतः ये फल शास्त्रीय रेणुका नहीं हैं। शास्त्रीय रेणुका शायद पिप्पलीवर्ग की पाइपर ऑरेण्टिएकम् वाल् (Piper aurantiacum Wall.) के फल हैं। कुछ लोग निर्गुण्डी के बीज को ही रेणुका कहते हैं जो उसके प्रतिनिधि हो सकते हैं। चरक में शिरोविरेचन एवं वमनोपग गणों में रेणुक बीज का पाठ है। ग्रहणी के मध्वरिष्ट में एवं व्रणपीडन रूप में रेणुका का उल्लेख है। चरक, सुश्रुत तथा रा० नि० इसको गर्भपातक नहीं मानते। सुश्रुत में हरेणुका का उल्लेख एलादिगण, पिप्पल्यादिगण में तथा रेणुका का उल्लेख कटुवर्ग में एवं भगंदर, नाड़ी, उपदंश व्रण तथा विष में इसका प्रयोग किया गया है। यहाँ पर वर्णन विदेश से आने वाले निर्गुण्डी की जाति के वृक्ष के फलों का किया गया है। हिं०-रेणुका, रेणुक, संभालू का बीज। गु०-हरेणु। म०-रेणुक बीज। इरा०-पंजनगुस्त। अ०-अथलक्। ले०-Vitex agnus- castus Linn. (वाइटेक्स एग्नस्-कास्टस् लिन.)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनॅसी)। १. बलासवातवैकल्य इति पाठ०। तृष्णादाहविषक्लैव्यकफवातविनाशिनी॥ (नि. र.) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

कर्पूरादिवर्गः ४३३ यह बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, भूमध्यसागरीय प्रदेश आदि प्रदेशों में होता है। देहरादून के 'वैज्ञानिक बाग' में यह लगाया हुआ है। इसका गुल्म या वृक्ष होता है जिसकी शाखाएँ चौपहल होती हैं। **पत्ते—**लम्बे पत्रनाल से युक्त, करतलाकार संयुक्त, पत्रक पाँच कभी-कभी सात भी, भालाकार और लम्बे नोक वाले होते हैं। **फल—**साधारण मटर के बराबर, अंडाकृति तथा धूसर वर्ण के होते हैं। बाह्य दल एवं वृन्त इसमें लगा रहता है। ये फल बहुत कड़े रहते हैं तथा काटने पर इसके अन्दर चार खण्ड दिखलाई देते हैं जिनमें एक-एक छोटा चिपटा बीज रहता है। भारतीय निर्गुण्डी के फल से ये फल करीब आधे छोटे होते हैं। **रासायनिक संगठन—**इसमें कास्टाइन (Castine) नामक एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील दाहजनक पदार्थ, अम्लद्रव्य एवं तैल, ये पदार्थ पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग—**ईरानी रेणुक बीज स्तम्भन, शोथघ्न, आनुलोमिक, मूत्रजनन एवं उत्तेजक हैं। प्लीहावृद्धि तथा यकृत रोग के कारण उत्पन्न जलोदर में इसको देते हैं। हिचकी में छोटी पीपल के साथ इसको खिलाते हैं। **मात्रा—**४ र०-१ मा०। अथ ग्रन्थिपर्णम् (गठिवन)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह ग्रन्थिपर्णं ग्रन्थिकञ्च काकपुच्छञ्च गुच्छकम् । नीलपुष्पं सुगन्धञ्च कथितं तैलपर्णकम् ॥१०७॥ ग्रन्थिपर्णं तिक्ततीक्ष्णं कटूष्णं दीपनं लघु । कफवातविषश्वासकण्डूदौर्गन्ध्यनाशनम् ॥१०८॥ **गठिवन के नाम तथा गुण—**ग्रन्थिपर्ण, ग्रन्थिक, काकपुच्छ, गुच्छक, नीलपुष्प, सुगन्ध और तैलपर्णक ये सब संस्कृत नाम गठिवन के हैं। **गठिवन—**तिक्त तथा कटुरस युक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक तथा लघु होता है। यह कफ, वात, विष, श्वास, खुजली और दुर्गन्ध इन सबों को दूर करनेवाला होता है। [१०७-१०८] ४३. गठिवन गठिवन का स्वरूप भी संदिग्ध ही है। आगे स्थौणेयक तथा चोरक नामक दो ग्रन्थिपर्ण के भेद दिये हुये हैं वे भी संदिग्ध ही हैं। कुछ विद्वान् इन तीनों नामों का एक दूसरे का पर्याय मानते हैं। तालीसपत्र के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में से एक द्रव्य का स्थानिक नाम थुनेर होने से कुछ विद्वान् उसे ही स्थौणेयक मानते हैं। इस तरह यदि ग्रन्थिपर्ण एवं चोरक को थुनेर सजातीय माना जाय तो ये सब द्रव्य तालीसपत्र (थुनेर) के वर्ग के हो जाते हैं। श्री शालिग्राम जी ने इसे आसाम की ओर बहुत उत्पन्न होने वाली तृण जाति की गाँठदार सुगन्धित वनस्पति माना है जिसमें पत्ते अंगुली के समान लम्बे-लम्बे और फूल नीले गुच्छों में आते हैं। कुछ लोग वनतुलसी को गठिवन मानते हैं। श्री डॉ० वा० ग० देसाई ने ग्रन्थितृण नाम से एक वनस्पति का वर्णन किया है। उसके गुण शास्त्रीय ग्रन्थिपर्ण से मिलते नहीं फिर भी सादृश्य होने से उसका संक्षेप में यहाँ वर्णन दिया जाता है। **सं०—**ग्रन्थितृण। **हिं०—**केस्त्री, मचोटी। **पं०—**मचूटि, केस्तु। **काश्मी०—**द्रोब। **सिं०—**एंद्राणी। इरा०— इझार, बंदुक। **अं०—**Knot-grass (नॉट्-ग्रास)। ले०—Polygonum aviculare Linn. (पॉलिगोनम् एविक्युलेरे लिन.)। Fam. Poly-gonaceae (पॉलिगोनेसी)। यह काश्मीर से कुमाऊँ तक ६ से १२ हजार फीट की ऊँचाई में होता है। इसका छोटा सा क्षुप होता है। जड़— लम्बी, कुछ काष्ठमय एवं चिमड़ी होती है तथा उससे अनेक उपमूल निकले रहते हैं। **शाखाएँ—**बहुत सी, जमीन पर फैली हुई एवं गोल होती हैं। इसकी टहनियों की ग्रंथियाँ बहुत गाँठदार होती हैं तथा वहीं से पत्र निकलते हैं। पत्र— ३१ भावं.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

४३४ भावप्रकाशनिघण्टुः एकान्तर, शल्याकृति, अखण्ड, धूसर रंग के एवं १ इञ्च से छोटे होते हैं। पुष्प-श्वेत या लाल रंग के होते हैं। फल- त्रिकोणयुक्त, हरे एवं अग्रपर सूक्ष्म झुर्रीदार, चमकीले एवं काले होते हैं। सिन्ध में बीजों को बीजबंद कहते हैं। बला के बीजों को भी अनेक स्थानों में बीजबंद कहा जाता है। चिकित्सा में इसके मूल, पंचाग एवं बीजों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें पोलिगोनिक् अम्ल तथा सुगन्धित तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ रक्तसंग्राहक, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, आनुलोमिक, ज्वरघ्न एवं कफघ्न है। बीज सं्रसन, मूत्रजनन एवं वामक होते हैं। (१) अश्मरी या मूत्रकृच्छ्र में इसके पंचाग के क्वाथ या मूल रस का प्रयोग अधिक मात्रा में करने से बहुत लाभ होता है। (२) जीर्ण अतिसार में मूल रस या पंचाग रस देते हैं। (३) विषमज्वर में मूल रस का उपयोग करते हैं। (४) फुप्फुस विकारों में विशेष कर श्वसनिका शोथ एवं कुकास में पंचाग क्वाथ पिलाते हैं। (५) सूखी हुई जड़ को पीसकर लगाने से वेदना कम होती है। विसर्प, बस्तिपीड़ा एवं आँव की पीड़ा में पत्तों का लेप किया जाता है। अथ स्थौणेयकम्। (ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः, ईषत्सुगन्धं 'थुनेर' इति लोके प्रसिद्धम्) तस्य नामानि गुणांश्चाह स्थौणेयकं बर्हिबर्हं शुकबर्हञ्च कुक्कुरम्। शीर्णरोमशुकञ्चापि शुकपुष्पं शुकच्छदम्।।१०९।। स्थौणेयकं कटु स्वादु तिक्तं स्निग्धं त्रिदोषनुत् ।।११०।। मेधाशुक्रकरं रुच्यं रक्षोघ्नं ज्वरजन्तुजित्। हन्ति कुष्ठास्रतृड्दाहद्दौर्गन्ध्यतिलकालकान् ।।१११।। 'गठिवन' के ही भेद में थोड़ी सुगन्ध से युक्त जो 'थुनेर' नाम से लोक में प्रसिद्ध औषध है, उसके नाम तथा गुण-स्थौणेयक, बर्हिबर्ह, शुकबर्ह, कुक्कुर, शीर्णरोम, शुक, शुकपुष्प और शुकच्छद ये सब संस्कृत नाम 'थुनेर' के हैं। थुनेर-कटु, तिक्तरस युक्त, स्वादिष्ट, स्निग्ध, तीन दोषों को दूर करने वाला, मेधा तथा शुक्र को बढ़ाने वाला, रुचिकारक, रक्षोग्रहनाशक एवं ज्वर, कृमि, कुष्ठ, रक्तविकार, तृषा, दाह, दुर्गन्ध और तिलकालक नामक रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है। [१०९-१११] ४४. थुनेर स्थौणेयक भी एक संदिग्ध औषध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है लेकिन जब ग्रन्थिपर्ण ही संदिग्ध है तब इसका निर्णय कैसे किया जा सकता है। तालीसपत्र नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक का स्थानिक नाम थुनेर है। इसलिये कुछ लोग इस थुनेर को स्थौणेयक मानते हैं। थुनेर का वर्णन तालीसपत्र के साथ किया गया है। चरक में स्थौणेयक का उपयोग अगुर्वादि तैल में (चि० अ० ३), मृतसञ्जीवन अगद में (चि० अ० २३), बलातैल में (चि० अ० २८) एवं मदनफल उत्कारिकामोदक योग में (क० अ० १) किया गया है। सुश्रुत में एलादिगण) सू० अ० ३८) में इसका पाठ है। कुछ लोगों ने ले०-Clerodendrum infortunatum, Linn.; Fam. Verbenaceae (क्लेरोडेण्ड्रम् इन्फोर्च्युनेटम् लिन, हर्बिनेसी), हि०-भांट, सं०-कारी, भाण्डीर को स्थौणेयक लिखा है। इसके १२ फीट तक ऊँचे

कर्पूरादिवर्गः ४३५ क्षुप—प्रायः सभी स्थानों में पाये जाते हैं । प्रत्येक भाग कटु एवं लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं । बाह्यपुट स्थायी, वर्धनशील और लाल होता है । आभ्यन्तर पुट रक्ताभ श्वेत होता है । इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है । **गुण और प्रयोग—**भांट तिक्त पौष्टिक, उत्तम, आनुलोमिक, पित्तसारक, कृमिघ्न एवं ज्वरघ्न है । तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर में यह लाभदायक है । बच्चों को इसके पत्र का चूर्ण २-५ रत्ती मधु एवं सुगन्ध द्रव्यों के साथ दिया जाता है । केंचुवे में इसके पत्र-रस को पिलाते हैं तथा बस्ति भी देते हैं । उदरशूल एवं अतिसार में इसकी जड़ को मट्ठे में पीस कर देते हैं । त्वचा के रोगों (खुजली) में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं । अथ ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः । 'भटेउर' इति नेपालदेशे भवेत् तस्य नामानि गुणाँश्चाह **निशाचरो धनहरः कितवो गणहासकः । चोरकः शङ्कितश्चण्डो दुष्पत्रः क्षे