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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • ब्राह्मपर्व *

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विद्वानोंकी संतुष्टिके निमित्त जो ब्राह्मणोंको भोजन कराया जाता है, वह शुद्धचर्य-श्राद्ध है। गर्भाधान, सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन-संस्कारोंके समय किया गया श्राद्ध कर्माङ्ग-श्राद्ध है। यात्रा आदिके दिन देवताके उद्देश्यसे घीके द्वारा किया गया हवनादि कार्य दैविक श्राद्ध कहलाता है। शरीरकी वृद्धि, शरीरकी पुष्टि तथा अश्ववृद्धिके निमित्त किया गया श्राद्ध औपचारिक श्राद्ध कहलाता है। सभी श्राद्धोंमें सांवत्सरिक श्राद्ध सबसे श्रेष्ठ है। इसे मृत व्यक्तिकी तिथिपर करना चाहिये। जो व्यक्ति सांवत्सरिक श्राद्ध नहीं करता, उसकी पूजा न मैं ग्रहण करता हूँ, न विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र एवं अन्य देवगण ही ग्रहण करते हैं। इसलिये प्रयत्नपूर्वक प्रत्येक वर्ष मृत व्यक्तिकी तिथिपर सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये। जो व्यक्ति माता-पिताका वार्षिक श्राद्ध नहीं करता, वह घोर तामिस्त्र नामक नरकको प्राप्त करता है और अन्तमें सूकर-योनिमें उत्पन्न होता है।

अरुणने पूछा— भगवन्! जो व्यक्ति माता-पिताकी मृत्युकी तिथि, मास और पक्षको नहीं जानता, उस व्यक्तिको किस दिन श्राद्ध करना चाहिये? जिससे वह नरकभागी न हो?

भगवान् आदित्यने कहा— पक्षिराज अरुण! जो व्यक्ति माता-पिताके मृत्युके दिन, मास और

पक्षको नहीं जानता, उस व्यक्तिको अमावास्याके दिन सांवत्सरिक नामक श्राद्ध करना चाहिये। जो व्यक्ति मार्गशीर्ष और माघमें पितरोंके उद्देश्यसे विशिष्ट भोजनादिद्वारा मेरी पूजा-अर्चना करता है, उसपर मैं अति प्रसन्न होता हूँ और उसके पितर भी संतुष्ट हो जाते हैं। पितर, गौ तथा ब्राह्मण—ये मेरे अत्यन्त इष्ट हैं। अतः विशेष भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये।

वेद-विक्रयद्वारा और स्त्रीद्वारा प्राप्त किया गया धन पितृकार्य और देव-पूजनादिमें नहीं लगाना चाहिये। वैश्वदेव कर्मसे हीन और भगवान् आदित्यके पूजनसे हीन वेदवेत्ता ब्राह्मणको भी निन्द्य समझना चाहिये। जो वैश्वदेव किये बिना ही भोजन कर लेता है वह मूर्ख नरकको प्राप्त करता है, उसका अन्न-पाक व्यर्थ है। प्रिय हो या अप्रिय, मूर्ख हो या विद्वान्, वैश्वदेव कर्मके समय आया हुआ व्यक्ति अतिथि होता है और वह अतिथि स्वर्गका सोपानरूप होता है। जो बिना तिथिका विचार किये ही आता है उसे अतिथि कहते हैं। वैश्वदेव-कर्मके समय जो न तो पहले कभी आया हो और न ही उसके पुनः आनेकी सम्भावना हो तो उस व्यक्तिको अतिथि जानना चाहिये। उसे साक्षात् विश्वेदेवके रूपमें ही समझना चाहिये। (अध्याय १८३-१८४)

मातृ-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि

भगवान् आदित्यने कहा— अरुण! रात्रिमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। रात्रिमें किया गया श्राद्ध राक्षसी श्राद्ध कहा जाता है। दोनों संध्याओंमें और सूर्यके अस्त होनेपर भी श्राद्ध करना निषिद्ध है।

अरुणने पूछा— भगवन्! माताका श्राद्ध किस प्रकार करना चाहिये और माता किन्हें माना गया है? नान्दीमुख-पितरोंका पूजन किस प्रकार करना

चाहिये, इन्हें मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् आदित्यने कहा— खगशार्दूल! मैं मातृ-श्राद्धकी विधि बतला रहा हूँ, उसे सुनिये।

मातृ-श्राद्धमें पूर्वहृ-कालमें आठ विद्वान् ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये तथा एक और अन्य नवम सर्वदैवत्य ब्राह्मणको भी भोजन देना चाहिये। इस प्रकार नौ ब्राह्मणोंको भोजन कराना

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

चाहिये। यव, तिल, दधि, गन्ध-पुष्पादिसे युक्त अर्घ्यद्वारा सबकी पूजा करनी चाहिये तथा सभी ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको मधुर मिष्ठान् भोजन कराना चाहिये। भोजनमें कटु पदार्थ नहीं होने चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पिण्डदान देना चाहिये। दही-अक्षतका पिण्ड बनाये। एक चौंस मण्डप बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करे। सव्य होकर हाथसे पूर्वाग्र कुशों तथा पुष्पोंको चढ़ाना चाहिये। माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता, पितामही, प्रपितामही, वृद्धप्रपितामही तथा अन्य अपने कुलमें जो भी माताएँ हों, उन्हें आदरपूर्वक निमन्त्रित करना चाहिये। इस प्रकार माताओंको उद्दिष्ट कर छः पिण्ड बनाकर पूजन

करना चाहिये। नान्दीमुखको उद्दिष्ट कर पाँच उत्तम ब्राह्मणोंको पाँच पितरोंके रूपमें भोजन कराना चाहिये। नान्दीमुख-श्राद्धमें ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये।

खगपते! श्राद्धमें दौहित्र अर्थात् नाती, कुतुप वेला (एक बजे दिनका समय) और तिल—ये तीन पवित्र माने गये हैं तथा तीन प्रशंसायोग्य कहे गये हैं—शुद्धि, अक्रोध और शीघ्रता न करना। एक वस्त्र धारण कर देव-पूजन और पितरोंके कर्म नहीं करने चाहिये। बिना उत्तरीय वस्त्र धारण किये पितर, देवता और मनुष्योंका पूजन, अर्चन तथा भोजन आदि सब कार्य निष्फल होता है। (अध्याय १८५)

सौर-धर्ममें शुद्धि-प्रकरण

भगवान् भास्करने कहा—खगाधिप! ब्राह्मणोंको नित्य पवित्र तथा मधुरभाषी होना चाहिये, उन्हें प्रतिदिन स्नानादिसे पवित्र हो चन्दनादि सुगन्धित द्रव्योंको धारणकर देवताओंका पूजन आदि करना चाहिये। सूर्यको निष्प्रयोजन नहीं देखना चाहिये और नग्न स्त्रीको भी नहीं देखना चाहिये। मैथुनसे दूर रहना चाहिये। जलमें मूत्र तथा विष्टाका परित्याग नहीं करना चाहिये। शास्त्रोक्त नियमोंके अनुसार कर्म करने चाहिये। शास्त्र-वर्णित कर्मानुष्ठानके अतिरिक्त कोई भी व्रतादि नहीं करने चाहिये।

खगाधिपते! अभक्ष्य-भक्षण सभी वर्णोंके लिये वर्जित है। द्रव्यकी शुद्धि होनेपर ही कर्मकी शुद्धि होती है अन्यथा कर्मके फलकी प्राप्तिमें संशय ही बना रहता है। जातिसे दुष्ट, क्रियासे दुष्ट, कालसे दुष्ट, संसर्गसे दुष्ट, आश्रयसे दुष्ट तथा सहल्लेख (स्वभावतः निन्दित एवं अभक्ष्य) पदार्थमें अथवा दूषित हृदयके एवं कपटी व्यक्तिके स्वभावमें परिवर्तन नहीं होता। लहसुन, गाजर, प्याज, कुकुरमुत्ता,

बैंगन (सफेद) तथा मूली (लाल) आदि जाल्या दूषित हैं। इनका भक्षण नहीं करना चाहिये। जो वस्तु क्रियाके द्वारा दूषित हो गयी हो अथवा पतितोंके संसर्गसे दूषित हो गयी हो, उसका प्रयोग न करे। अधिक समयतक रखा गया पदार्थ कालदूषित कहलाता है, वह हानिकर होता है, पर दही तथा मधु आदि पदार्थ कालदूषित नहीं होते। सुरा, लहसुन तथा सात दिनके अंदर ब्यायी हुई गायके दूधसे युक्त पदार्थ और कुत्तेद्वारा स्पर्श किये गये पदार्थ संसर्ग-दुष्ट कहे जाते हैं। इन पदार्थोंका परित्याग करना चाहिये। शूद्रसे तथा विकलाङ्ग आदिसे स्मृष्ट पदार्थ आश्रय-दूषित कहा जाता है। जिस वस्तुके भक्षण करनेमें मनमें स्वभावतः घृणा उत्पन्न हो जाती है, जैसे पुरीष (विष्टा)-के प्रति स्वभावतः घृणा उत्पन्न होती है—उसे ग्रहण नहीं करना चाहिये। वह सहल्लेख दोषयुक्त पदार्थ कहा गया है। खीर, दूध, पाकादिका भक्षण शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ही करना चाहिये।

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  • ब्राह्मपर्व *

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सपिण्डमें दस दिन, बारह दिन अथवा पंद्रह दिन और एक मासमें प्रेत-शुद्धि हो जाती है। सूतकाशौच तथा मरणाशौचमें दस दिनेके भीतर किसी व्यक्तिके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये। दशगात्र एवं एकादशाहके बीत जानेपर बारहवें दिन स्नान करनेसे शुद्धि हो जाती है। संवत्सर पूर्ण हो जानेपर स्नान-मात्रसे ही शुद्धि हो जाती है। सपिण्डमें जन्म और मृत्यु होनेपर अशौच लगता है। दाँत आनेतकके बालककी मृत्यु हो जानेपर सद्यः शुद्धि हो जाती है। चूडाकरणके पहले बालककी मृत्यु हो जानेपर एक दिन-रातकी अशुद्धि होती है तथा चूडाकरणके बाद और यज्ञोपवीत लेनेके पहले मृत्यु होनेपर त्रिरात्र अशुद्धि होती है और इसके अनन्तर दशरात्रकी

अशुद्धि होती है। गर्भस्नाव हो जानेपर तीन रात्रिके पश्चात् जलसे स्नान करनेके बाद शुद्धि होती है। असपिण्ड (एवं सगोत्री)-की मृत्यु होनेपर तीन अहोरात्रके बाद शुद्धि होती है। यदि केवल शव-यात्रा करता है तो स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है। द्रव्यकी शुद्धि आगमें तपाने, मिट्टी और जलसे धोने तथा मल हटाने, प्रक्षालन करने, स्पर्श और प्रोक्षण करनेसे होती है। द्रव्य-शुद्धिके पश्चात् स्नान करनेसे शुद्धि होती है। प्रातःकालका स्नान नित्य-स्नान है, ग्रहणमें स्नान करना काम्य-स्नान है तथा क्षौर और शौचादिके पश्चात् जो स्नान किया जाता है वह नैमित्तिक स्नान है, इससे पापादिकी निवृत्ति होती है।

(अध्याय १८६)

श्रद्धाकी महिमा, खखोल्ल-मन्त्रका माहात्म्य तथा गौकी महिमा

अरुणने पूछा—भगवन्! आदित्यदेव! मनुष्य किस पुण्यकर्मका सम्पादन कर स्वर्ग जाते हैं? कर्मयज्ञ, तपोयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ध्यानयज्ञ और ज्ञानयज्ञ—इन पाँच यज्ञोंमें सर्वोत्तम यज्ञ कौन है? इन यज्ञोंका क्या फल है और इनसे कौन-सी गति प्राप्त होती है? धर्म और अधर्मके कितने भेद कहे गये हैं? उनके साधन क्या हैं और उनसे कौन-सी गति होती है। नारकी पुरुषोंके पुनः पृथ्वीपर आनेपर भोगसे शेष कर्मोंके कौन-कौनसे चिह्न उपलब्ध रहते हैं। इस धर्माधर्मसे व्याप्त भवसागर तथा गर्भमें आगमनरूपी दुःखसे कैसे मुक्ति प्राप्त होती है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् सूर्य बोले—अरुण! स्वर्ग और अपर्ग (मोक्ष)-के फलको देनेवाले तथा नरकरूपी समुद्रसे पार करानेवाले, पापहारी एवं पुण्यप्रद धर्मको सुनो।

धर्मके पूर्वमें तथा मध्यमें और उसके अन्तमें श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धानिष्ठ ही धर्म प्रतिष्ठित होता है, अतः धर्म श्रद्धामूलक ही है। वेद-मन्त्रोंके अर्थ अतीव गूढतम हैं। उनमें प्रधान पुरुष परमेश्वर अधिष्ठित हैं, अतः इन्हें श्रद्धाके आश्रयसे ही ग्रहण किया जा सकता है। ये इस बाह्य चक्षुसे नहीं देखे जाते। श्रद्धारहित देवता भी भाँति-भाँतिके शरीरको कष्ट देनेपर तथा अत्यधिक अर्थव्यय करनेपर भी धर्मके सूक्ष्मरूप वेदमय परमात्माको नहीं प्राप्त कर सकते। श्रद्धा परम सूक्ष्म धर्म है, श्रद्धा यज्ञ है, श्रद्धा हवन, श्रद्धा तप, श्रद्धा ही स्वर्ग और मोक्ष है। यह सम्पूर्ण जगत् श्रद्धामय ही है, अश्रद्धासे सर्वस्व जीवन देनेपर भी कुछ फल नहीं होता। बिना श्रद्धाके किया गया कार्य सफल नहीं होता। अतः मानवको श्रद्धा-सम्पन्न होना चाहिये*।

  • श्रद्धापूर्वः सदा धर्मः श्रद्धामध्यान्तसंस्थितः । श्रद्धानिष्ठप्रतिष्ठश्च धर्मः श्रद्धा प्रकीर्तिता ॥ श्रुतिमन्त्रसः सूक्ष्माः प्रधानपुरुषेश्वरः । श्रद्धामात्रेण गूढन्ते न परेण च चक्षुषा ॥

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हे खगश्रेष्ठ ! अब मेरे मण्डलके विषयमें सुनो । मेरा कल्याणमय मण्डल खखोलक नामसे विख्यात है । यह तीनों देवों एवं तीनों गुणोंसे परे एवं सर्वज्ञ है । यह सर्वशक्तिमान् है । 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रमें यह मण्डल अवस्थित है । जैसे घोर संसार-सागर अनादि है वैसे ही खखोलक भी अनादि और संसार-सागरका शोधक है । जैसे व्याधियोंके लिये औषधि होती है वैसे ही यह संसार-सागरके लिये औषधि है । मोक्ष चाहनेवालोंके लिये मुक्तिका साधन और सभी अर्थोंका साधक है । खखोलक नामका यह मेरा मन्त्र सदा उच्चारण एवं स्मरण करने योग्य है । जिसके हृदयमें यह 'ॐ नमः खखोलकाय' मन्त्र स्थित है, उसीने सब कुछ पढ़ा है, सुना है और सब कुछ अनुष्ठित किया है—ऐसा समझना चाहिये ।

मनीषियोंने इस खखोलकको मार्तण्डके नामसे कहा है । उसके प्रति श्रद्धायुक्त होनेपर पुण्य प्राप्त होता है और अश्रद्धासे अधःपतन होता है । सूर्य-सम्बन्धी वचनको कहनेवाले गुरुकी सूर्यके समान पूजा करनी चाहिये । वह गुरु भवसागरमें निमग्न व्यक्तिका उद्धार कर देता है । सौरधर्मरूपी शीतल जलके द्वारा जो अज्ञानरूपी वहिसे संतप्त मनुष्यको शान्त करता है, उसके समान गुरु कौन होगा ? जो भक्तोंको ज्ञानरूपी अमृतसे आप्लावित करते हैं, भला उनकी कौन पूजा नहीं करेगा । स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष)-की प्राप्तिके लिये देवाधिदेव सूर्यके द्वारा जो वाक्य कहे गये हैं, वे अतिशय कल्याणकारी हैं । राग, द्वेष, अक्षमा, क्रोध, काम, तृष्णाका अनुसरण करनेवाले व्यक्तिका कहा हुआ वाक्य नरकका साधन होनेसे दुर्भाषित कहा जाता

है । अविद्यात्मक संसारके क्लेश-साधक मुदुल आलापवाले संस्कृत वाक्यसे भी क्या लाभ है ? जिस वाक्यके सुननेसे राग-द्वेष आदिका नाश एवं पुण्य प्राप्त होता है, वह कठोर वाक्य भी अतिशय शोभाजनक है । स्मृतियाँ, महाभारत, वेद, महान् शास्त्र यदि धर्म-साधक न बन सकें तो इनका अध्ययनमात्र अपनी आयुके व्यतीत करनेके लिये ही है । सहस्रों वर्षकी आयु प्राप्त करनेपर भी शास्त्रका अन्त नहीं मिलता । अतः सभी शास्त्रोंको छोड़कर अक्षर तन्मात्र (परमात्मा)-का ज्ञान कर परलोकके अनुरूप आचरण करना चाहिये । मनुष्योंके समर्थ शरीरसे भी क्या लाभ है जो पारलौकिक पुण्य-भारको वहन करनेमें असमर्थ है । जो सौर-ज्ञानके माहात्म्यको उच्चारण करनेमें असमर्थ है, वह शक्तिसम्पन्न और पण्डित होते हुए भी मूर्ख है । इसलिये जो सौर-ज्ञानके सद्भावकी महिमामें तत्पर रहता है, वही पण्डित, समर्थ, तपस्वी और जितेन्द्रिय है । जो नृप गुरुको सम्पूर्ण पृथिवी, धन और सुवर्ण आदि देकर भी यदि अन्यायपूर्वक सौर-ज्ञानकी जिज्ञासा करता है अर्थात् अन्यायाचरण करते हुए पूछता है तो उसे षडक्षर-मन्त्रका उपदेश गुरुको नहीं देना चाहिये । जो भगवान् सूर्यके धर्मको न्यायपूर्वक विनम्र भावसे सुनता है और कहता है, वह उचित स्थानको प्राप्त करता है, अन्यथा उसके विपरीत नरकको जाता है ।

जो भगवान् सूर्यके षडक्षर-मन्त्रसे विधानपूर्वक गोदुग्धद्वारा सूर्यकी पूजा करता है वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ है । देवासुरोंद्वारा मन्थन करनेपर क्षीरसागरसे सभी लोकोंकी मातृस्वरूपा पाँच गौएँ उत्पन्न हुईं—नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुमना तथा शोभनावती ।

कायकलेशीर्न बहुभिर्न चैवार्थस्य राशिभिः । धर्मः सम्प्राप्यते सूक्ष्मः श्रद्धाहीनेः सुरैरपि ॥

श्रद्धा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा यज्ञाहुतं तपः । श्रद्धा मोक्षश्च स्वर्गश्च श्रद्धा सर्वमिदं जगत् ॥

सर्वस्व जीवितं वापि दद्यादश्रद्धया च यः । नागृह्यात् स फलं किंचित् तस्माच्छ्रद्धापरो भवेत् ॥ (ब्राह्मपर्व १८७।१-१३)

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  • ब्राह्मपर्व *

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गौएँ तेजमें सूर्यके समान हैं। ये सम्पूर्ण संसारका उपकार करनेके लिये एवं देवताओंकी तृप्तिके लिये और मुझे स्नान करानेके लिये उत्पन्न हुई हैं। ये मेरा ही आधार लेकर स्थित हैं। गौओंके सभी अङ्ग पवित्र हैं। उनमें छहों रस निहित हैं। गायके गोबर, मूत्र, गोरोचन, दूध, दही तथा घृत—ये छः पदार्थ परम पवित्र हैं तथा सभी सिद्धियोंको देनेवाले हैं। सूर्यका परम प्रिय बिल्ववृक्ष गोमयसे ही उत्पन्न हुआ है, उस वृक्षपर कमलहस्ता लक्ष्मी विराजमान रहती हैं, अतः यह श्रीवृक्ष कहा जाता है। गोमयसे पङ्क उत्पन्न होता है और उससे कमल उत्पन्न हुए हैं। गोरोचन परम मङ्गलमय, पवित्र और सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। गोमूत्रसे सभी देवोंका आहार-स्वरूप विशेषकर भास्करके लिये भोग्य एवं प्रियदर्शन सुगन्धित गुग्गुल उत्पन्न हुआ है। जगत्के सभी बीज क्षीरसे उत्पन्न हुए हैं। कामनाकी सिद्धिके लिये सभी माङ्गल्य वस्तु दहीसे उत्पन्न समझें। देवोंका अतिशय प्रिय अमृत घृतसे उत्पन्न है, अतः घी, दूध, दहीसे भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। अनन्तर उष्ण जल और कषायसे स्नान कराना चाहिये। फिर शीतल जलसे स्नान कराकर गोरोचनका लेपन एवं बिल्वपत्र, कमल और नीलकमलसे

पूजन करना चाहिये। शर्करायुक्त गुग्गुलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। दूध, दही, भात, मधुके साथ शर्करा एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंको निवेदित करे। इसके बाद भगवान् भास्करकी प्रदक्षिणा कर उनसे क्षमा-याचना करे।

इस विधिसे जो दिनपति भगवान् भानुकी पडङ्ग-पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्तकर अपने कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंको स्वर्गमें ले जाता है तथा उन्हें वहाँ प्रतिष्ठित कर स्वयं ज्योतिष्क नामक स्थानको प्राप्त करता है। भगवान् भास्करकी पूजामें पत्र, पुष्प, फल, जल जो भी अर्पित होता है वह सब तथा सूर्य-सम्बन्धी गौएँ भी सूर्यलोकको प्राप्त करती हैं, इसमें संदेह नहीं है। देश, काल तथा विधिके अनुरूप श्रद्धापूर्वक सुपात्रको दिया गया अल्प भी दान अक्षय होता है। हे वीर! तिलका अर्धपरिमाणमात्र सत्पात्रको दिया गया श्रद्धापूर्वक दान सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। जिसने ज्ञानरूपी जलसे स्नान कर लिया है और शीलरूपी भस्मसे अपनेको शुद्ध कर लिया है, वह सभी पात्रोंमें उत्तम सत्पात्र माना गया है। जप, इन्द्रियदमन और संयम मनुष्यको संसार-सागरसे पार उतारनेवाले साधन हैं। (अध्याय १८७)

पञ्चमहायज्ञ एवं अतिथि-माहात्म्य-वर्णन, सौर-धर्ममें दानकी महत्ता और पात्रापात्रका निर्णय तथा पञ्च महापातक

समाश्रवाहन ( भगवान् सूर्य )-ने कहा—हे वीर! जो प्राणी सूर्य, अग्नि, गुरु तथा ब्राह्मणको निवेदन किये बिना स्वयं जो कुछ भी भक्षण

करता है वह पाप-भक्षण करता है। गृहस्थ मनुष्योंके कृषिकार्यसे, वाणिज्यसे, क्रोध और असत्य आदिके आचरणसे तथा पञ्चसूना*-दोषसे

  • भोजन पकानेका स्थान (चूल्हा), आटा आदि पीसनेका स्थान (चक्की आदि) मसाला आदि कूटने-पीसनेका स्थान (लोढ़ा, सिलवट आदि), जल रखनेका स्थान तथा झाडू देनेका काम—इनमें अनजाने ही हिंसाकी सम्भावना रहती है। अतः गृहस्थके लिये इन्हें ही पञ्चसूना-दोष कहा गया है।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पाप होते हैं। सूर्य, गुरु, अग्नि और अतिथि आदिके सेवारूप पञ्चमहायज्ञोंसे ये पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार अन्य पापोंसे भी वह लिस नहीं होता, अतः इनकी नित्य पूजा करनी चाहिये। देवाधिदेव दिवाकरके प्रति जो इस प्रकार भक्ति करता है, वह अपने पितरोंको सभी पापोंसे विमुक्त कर स्वर्ग ले जाता है।

हे खग! भगवान् सूर्यके दर्शनमात्रसे ही गङ्गा-स्नानका फल एवं उन्हें प्रणाम करनेसे सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है तथा सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। संध्या-समयमें सूर्यकी सेवा करनेवाला सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। एक बार भी भगवान् सूर्यकी आराधना करनेसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, पितृगण तथा सभी देवगण एक ही साथ पूजित एवं संतुष्ट हो जाते हैं।

श्राद्धमें भगवान् सूर्यकी पूजा करने तथा सौर-भक्तोंको भोजन करानेसे पितृगण तृप्त हो जाते हैं। पुराणवेत्ताको आते हुए देखकर सभी ओषधियाँ यह कहकर आनन्दसे नृत्य करने लगती हैं कि आज हमें अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा। पितृगण एवं देवगण अतिथिके रूपमें लोकके अनुग्रह और श्रद्धाके परीक्षणके लिये आते हैं, अतः अतिथिको आया हुआ देखकर हाथ जोड़कर उसके सम्मुख जाना चाहिये तथा स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अन्न आदिद्वारा उसकी सेवा करनी चाहिये। अतिथि रूप-सम्पन्न है या कुरूप, मलिन वस्त्रधारी है अथवा स्वच्छ वस्त्रधारी इसपर विद्वान् पुरुषको विचार नहीं करना चाहिये; उसका यथेष्ट स्वागत करना चाहिये।

अरुण! दान सत्पात्रको ही देना चाहिये, जैसे कच्चे मिट्टीके पात्रमें रखा हुआ द्रव—जल आदि पदार्थ नष्ट हो जाता है, जैसे ऊधर-भूमिमें बोया गया बीज और भस्ममें हवन किया गया हव्य

पदार्थ निष्फल हो जाता है, वैसे ही अपात्रको दिया गया दान भी निष्फल हो जाता है।

खगश्रेष्ठ! जो दान करुणापूर्वक श्रद्धाके साथ प्राणियोंको दिया जाता है, वह सभी कर्मोंमें उत्तम है। हीन, अन्ध, कृपण, बाल, वृद्ध तथा आतुरको दिये गये दानका फल अनन्त होता है। साधु पुरुष दाताके दानको अपने स्वार्थका उद्देश्य न रखकर ग्रहण करते हैं। इससे दाताका उपकार होता है। कोई अर्था यदि घरपर आये तो कौन ऐसा व्यक्ति है जो उसका आदर नहीं करेगा। घर-घर याचना करनेवाला याचक पूज्य नहीं होता। कौन दाता है और कौन याचक इसका भेद देने और लेनेवालेके हाथसे ही सूचित हो जाता है। जो दाता व्यक्ति याचकको आया हुआ देखकर दान देनेकी अपेक्षा उसकी पात्रतापर विचार करता है, वह सभी कर्मोंको करता हुआ भी पारमार्थिक दाता नहीं है। संसारमें यदि याचक न हों तो दानधर्म कैसे होगा? इसलिये याचकको 'स्वागत है, स्वागत है'—यह कहते हुए दान देना चाहिये।

याचकको प्रेमपूर्वक आधा ग्रास भी दिया जाय तो वह श्रेष्ठ है, किंतु बिना प्रेमका दिया हुआ बहुत-सा दान भी व्यर्थ है, ऐसा मनीषियोंने कहा है। इसलिये अनन्त फल चाहनेवाले व्यक्तिको सत्कारपूर्वक दान देना चाहिये। इससे मरनेपर भी उसकी कीर्ति बनी रहती है। प्रिय एवं मधुर वचनोंद्वारा दिया गया दान कल्याणकारी है, किंतु कठोरतासे असत्कारपूर्वक दिया गया दान युक्त दान नहीं है। अन्तरात्मासे क्रुद्ध होकर याचकको दान देनेसे न देना अच्छा है। प्रेमसे रहित दान न धर्म है, न धन है, न प्रीति है। दान, प्रदान, नियम, यज्ञ, ध्यान, हवन और तप—ये सभी क्रोधके साथ करनेपर निष्फल हो जाते हैं*।

  • न तद्दानमसत्कारपारुष्यमलिनीकृतम् । वरं न दत्तमर्थिभ्यः संकृद्देनान्तरात्मना ॥ न तद्दानं न च प्रीतिर्न धर्मः प्रियवर्जितः । दानप्रदाननियमयज्ञध्यानं हृतं तपः । यत्नेनापि कृतं सर्वं क्रोधोऽस्य निष्फलं खग ॥ (ब्राह्मपर्व १८९।१९-२०)

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  • ब्राह्मपर्व *

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श्रद्धाके साथ आदरपूर्वक ग्रहीताका अर्चन कर दान देनेवाले तथा श्रद्धा एवं आदरपूर्वक दान ग्रहण करनेवाले—दोनों स्वर्ग प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत देना और लेना ये दोनों नरक-प्रासिके कारण बन जाते हैं। उदारता, स्वागत, मैत्री, अनुकम्पा, अमत्सर—इन पाँच प्रकारोंसे दिया गया दान महान् फल देनेवाला होता है।

हे खगश्रेष्ठ! वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, पुष्कर, गङ्गा और समुद्रतट, नैमिषारण्य, महापुण्य, मूलस्थान, मुण्डीरस्वामी (उड़ीसाका कोणार्कक्षेत्र), कालप्रिय (कालपी), क्षीरिकावास—ये स्थान देवताओं और पितरोंसे सेवित कहे गये हैं। सभी सूर्याश्रम, पर्वतोंसे युक्त सभी नदियाँ, गौ, सिद्ध और मुनियोंसे प्रतिष्ठित स्थान पुण्यक्षेत्र कहे गये हैं। सूर्यमन्दिरसे युक्त स्थानोंमें रहनेवालेको दिया गया थोड़ा भी दान क्षेत्रके प्रभावसे अनन्त फलप्रद होता है। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, उत्तरायण विषुव, व्यतीपात, संक्रान्ति—ये सब पुण्यकाल कहे गये हैं। इनमें दान देनेसे पुण्यकी वृद्धि होती है। भक्तिभाव, परमप्रीति, धर्म, धर्मभावना तथा प्रतिपत्ति—ये पाँच श्रद्धाके पर्याय हैं। श्रद्धापूर्वक विधानके साथ सुपात्रको दिया गया दान उत्तम एवं अनन्त फलप्रद कहा गया है, अतः अक्षय पुण्यकी इच्छासे श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये। इसके विपरीत दिया गया दान भारस्वरूप ही है। आर्त, दीन और गुणवान्को श्रद्धाके साथ थोड़ा भी दिया गया दान सभी कामनाओंका पूरक और सभी श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त करानेवाला होता है। मनीषियोंने श्रद्धाको ही दान माना है। श्रद्धा ही दान, श्रद्धा ही परम तप तथा श्रद्धा ही यज्ञ और श्रद्धा ही परम उपवास है। अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, श्रद्धा, इन्द्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप तथा ध्यान

—ये दस धर्मके साधन हैं।

पर-स्त्री तथा पर-द्रव्यकी अपेक्षा करनेवाला और गुरु, आर्त, अशक्त, विदेशमें गये हुए तथा शत्रुसे पराभूत व्यक्तिको कष्ट देनेवाला पापकर्मा कहा जाता है। ऐसे व्यक्तियोंका परित्याग कर देना चाहिये, किंतु उसकी भार्या तथा उसके मित्र एवं पुत्रका अपमान नहीं करना चाहिये? उनका अवमान करना गुरुनिन्दाके समान पातक माना गया है। ब्राह्मणको मारनेवाला, सुरा-पान करनेवाला, स्वर्ण-चोर, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला एवं इनके साथ सम्पर्क रखनेवाला—ये पाँच महापातकी कहे गये हैं। जो क्रोध, द्वेष, भय एवं लोभसे ब्राह्मणका अपमान करता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है। जो याचना करनेवालेको और ब्राह्मणको बुलाकर 'मेरे पास कुछ नहीं है' ऐसा कहकर बिना कुछ दिये लौटा देता है, वह चाण्डालके समान है। देव, द्विज और गौके लिये पूर्वप्रदत्त भूमिका जो अपहरण करता है, वह ब्रह्मघाती है। जो मूर्ख सौरज्ञानको प्राप्तकर उसका परित्याग कर देता है अर्थात् तदनुकूल आचरण नहीं करता, उसे सुरा-पान करनेवालेके समान जानना चाहिये। अग्निहोत्रके परित्यागी, माता और पिताके परित्यागी, कुकर्मके साक्षी, मित्रके हन्ता, सूर्यभक्तोंके अप्रियको और पञ्चयज्ञोंके न करनेवाले, अभक्ष्य-भक्षण करनेवाले तथा निरपराध प्राणियोंको मारनेवालेको सर्वाधिपत्यकी प्राप्ति नहीं होती। सर्वजगत्पति भानुकी आराधनासे आत्मलोकका आधिपत्य प्राप्त होता है। अतः मोक्षकामीको भोगकी आसक्तिका परित्याग कर देना चाहिये। जो विरक्त हैं, शान्तचित्त हैं, वे सूर्यसम्बन्धी लोकको प्राप्त करते हैं।

(अध्याय १८८-१८९)

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२१६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पातक, उपपातक, यममार्ग एवं यमयातनाका वर्णन

समाश्रतिलक भगवान् सूर्यने कहा—खगश्रेष्ठ! मानसिक, वाचिक तथा कायिक-भेदसे पाप अनेक प्रकारके होते हैं, जो नरक-प्राप्तिके कारण हैं, उन्हें मैं संक्षेपमें बतला रहा हूँ—

गौओंके मार्गमें, वनमें नगरमें और ग्राममें आग लगाना आदि सुरापानके समान महापातक माने गये हैं। पुरुष, स्त्री, हाथी एवं घोड़ोंका हरण करना तथा गोचरभूमिमें उत्पन्न फसलोंको नष्ट करना, चन्दन, अगरू, कपूर, कस्तूरी, रेशमी वस्त्र आदिकी चोरी करना और धरोहर (थाती) वस्तुका अपहरण करना—ये सभी सुवर्णस्तेयके समान महापातक माने गये हैं। कन्याका अपहरण, पुत्र एवं मित्रकी स्त्री तथा भगिनीके प्रति दुराचरण, कुमारी कन्या और अन्त्यजकी स्त्रीके साथ सहवास, सवर्णोंके साथ गमन—ये सभी गुरु-शय्यापर शयन (गुरुपत्नी-गमन)-के समान महापातक माने गये हैं।

ब्राह्मणको अर्थ देनेका वचन देकर नहीं देनेवाले, सदाचारिणी पत्नीका परित्याग करनेवाले, साधु, बन्धु एवं तपस्वियोंका त्याग करनेवाले, गौ, भूमि, सुवर्णको प्रयत्नपूर्वक चुरानेवाले, भगवद्भक्तोंको उत्पीडित करनेवाले, धन, धान्य, कूप तथा पशु आदिकी चोरी करनेवाले तथा अपूज्योंकी पूजा करनेवाले—ये सभी उपपातकी हैं।

नारियोंकी रक्षा न करना, ऋषियोंको दान न देना, देवता, अग्नि, साधु, साध्वी, गौ तथा ब्राह्मणकी निन्दा करना, पितर एवं देवताओंका उच्छेद, अपने कर्तव्य-कर्मका परित्याग, दुःशीलता, नास्तिकता, पशुके साथ कदाचार, रजस्वलासे दुराचार, अप्रिय बोलना, फूट डालना आदि उपपातक कहे गये हैं।

जो गौ, ब्राह्मण, सस्य-सम्पदा, तपस्वी और साधुओंके दूषक हैं, वे नरकगामी हैं। परिश्रमसे

तपस्या करनेवालेका छिद्रान्वेषण करनेवाला, पर्वत, गोशाला, अग्नि, जल, वृक्षोंकी छाया, उद्यान तथा देवायतनमें मल-मूत्रका परित्याग करनेवाला, काम, क्रोध तथा मदसे आविष्ट पराये दोषोंके अन्वेषणमें तत्पर, पाखण्डियोंका अनुगामी, मार्ग रोकनेवाला, दूसरेकी सीमाका अपहरण करनेवाला, नीच कर्म करनेवाला, भृत्योंके प्रति अतिशय निर्दयी, पशुओंका दमन करनेवाला, दूसरोंकी गुप्त बातोंको कान लगाकर सुननेवाला, गौको मारने अथवा उसे बार-बार त्रास देनेवाला, दुर्बलकी सहायता न करनेवाला, अतिशय भारसे प्राणीको कष्ट देनेवाला और असमर्थ पशुको जोतनेवाला—ये सभी पातकी कहे गये हैं तथा नरकगामी होते हैं। जो परोक्षमें किसी प्रकार भी सरसोंके बराबर किसीका धन चुराता है, वह निश्चित ही नरकमें जाता है। ऐसे पापियोंको मृत्युके उपरान्त यमलोकमें यातना-शरीरकी प्राप्ति होती है। यमकी आज्ञासे यमदूत उसे यमलोकमें ले जाते हैं और वहाँ उसे बहुत दुःख देते हैं। अधर्म करनेवाले प्राणियोंके शास्ता धर्मराज कहे गये हैं। इस लोकमें जो पर-स्त्रीगामी हैं, चोरी करते हैं, किसीके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार करते हैं तो इस लोकका राजा उन्हें दण्ड देता है। परंतु छिपकर पाप करनेवालोंको धर्मराज दण्ड देते हैं। अतः किये गये पापोंका प्रायश्चित्त करना चाहिये। अनेक प्रकारके शास्त्र-कथित प्रायश्चित्तोंके द्वारा पातक नष्ट हो जाते हैं। शरीरसे, मनसे और वाणीसे किये गये पाप बिना भोगे अन्य किसी प्रकारसे कोटि कल्पोंमें भी नष्ट नहीं होते। जो व्यक्ति स्वयं अच्छा कर्म करता है, कराता है या उसका अनुमोदन करता है, वह उत्तम सुख प्राप्त करता है।

समाश्रतिलक भगवान् सूर्यने पुनः कहा—हे

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  • ब्राह्मपर्व *

२१७

खगश्रेष्ठ ! पाप करनेवालोंको अपने पापके निमित्त घोर संत्रास भोगना पड़ता है। गर्भस्थ, जायमान, बालक, तरुण, मध्यम, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, नपुंसक सभी शरीरधारियोंको यमलोकमें अपने किये गये शुभ और अशुभ फलोंको भोगना पड़ता है। वहाँ सत्यवादी चित्रगुप्त आदि धर्मराजको जो भी शुभ और अशुभ कर्म बतलाते हैं, उन कर्मोंका फल उस प्राणीको अवश्य ही भोगना पड़ता है। जो सौम्य-हृदय, दया-समन्वित एवं शुभकर्म करनेवाले हैं, वे सौम्य पथसे और जो मनुष्य क्रूर कर्म करनेवाले एवं पापाचारमें संलग्न हैं, वे घोर दक्षिण-मार्गसे कष्ट सहन करते हुए यमपुरीमें जाते हैं। वैवस्वतपुरी छियासी हजार अस्सी योजनामें है। शुभ कर्म करनेवाले व्यक्तियोंको यह धर्मपुरी समीप ही प्रतीत होती है और रौद्रमार्गसे जानेवाले पापियोंको अतिशय दूर। यमपुरीका मार्ग अत्यन्त भयंकर है, कहीं काँटे बिछे हैं और कहीं बालू-ही-बालू है, कहीं तलवारकी धारके समान है, कहीं नुकीले पर्वत हैं, कहीं असह्य कड़ी धूप है, कहीं खाइयाँ और कहीं लोहेकी कीले हैं। कहीं वृक्षों तथा पर्वतोंसे गिराया जाता हुआ वह पापी व्यक्ति प्रेतोंसे युक्त मार्गमें दुःखित हो यात्रा करता है। कहीं ऊबड़-खाबड़, कहीं कँकरीले और कहीं तस बालुकामय मार्गोंसे चलना पड़ता है। कहीं अन्धकाराच्छन्न भयंकर कष्टमय मार्गसे बिना किसी आश्रयके जाना पड़ता है। कहीं सींगसे परिव्याप्त मार्गसे, कहीं

दावागिनसे परिपूर्ण मार्गसे, कहीं तस पर्वतसे, कहीं हिमाच्छादित मार्गसे और कहीं अग्नियमय मार्गसे गुजरना पड़ता है। उस मार्गमें कहीं सिंह, कहीं व्याघ्र, कहीं काटनेवाले भयंकर कीड़े, कहीं भयंकर जोंक, कहीं अजगर, कहीं भयंकर मक्षिकाएँ, कहीं विष वमन करनेवाले सर्प, कहीं विशाल बलोन्मत्त प्रमादी गजसमूह, कहीं भयंकर बिच्छू, कहीं बड़े-बड़े शृंगोंवाले महिष, रौद्र डाकिनियाँ, कराल राक्षस तथा महान् भयंकर व्याधियाँ उसे पीड़ित करती हैं, उन्हें भोगता हुआ पापी व्यक्ति यममार्गमें जाता है। उसपर कभी पाषाणकी वृष्टि होती है, कभी बिजली गिरती है तथा कभी वायुके झंझावातोंमें वह उलझाया जाता है और कहीं अंगारोंकी वृष्टि होती है। ऐसे भयंकर मार्गोंसे पापाचरण करनेवाले भूख-प्याससे व्याकुल मूढ़ पापीको यमदूत यमलोककी ओर ले जाते हैं।

अतः पाप छोड़कर पुण्य-कर्मका आचरण करना चाहिये। पुण्यसे देवत्व प्राप्त होता है और पापसे नरककी प्राप्ति होती है। जो थोड़े समयके लिये भी मनसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह कभी भी यमपुरी नहीं जाता। जो इस पृथिवीपर सभी प्रकारसे भगवान् भास्करकी पूजा करते हैं, वे पापसे वैसे ही लिस नहीं होते, जैसे कमलपत्र जलसे लिस नहीं होता। इसलिये सभी प्रकारसे भुवनभास्करकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिये। (अध्याय १९०-१९२)

ससमी-व्रतमें दन्तधावन-विधि-वर्णन

भगवान् सूर्यने कहा—विनतानन्दन अरुण ! अयनकाल, विषुवकाल, संक्रान्ति तथा ग्रहणकालमें सदा भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। ससमीमें तो विशेषरूपसे उनकी पूजा करनी चाहिये। ससमियोंँ

सात प्रकारकी कही गयी हैं—अर्कसम्पुटिका-ससमी, मरीचि-ससमी, निम्ब-ससमी, फल-ससमी, अनोदना-ससमी, विजय-ससमी तथा सातवीं कामिका-ससमी। माघ मास या मार्गशीर्ष मासमें

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२१८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

शुक्ल पक्षकी सप्तमीको उपवास ग्रहण करना चाहिये। आर्त व्यक्तिके लिये मास और पक्षका नियम नहीं है। रात बीतनेमें जब आधा प्रहर शेष रहे, तब दन्तधावन करना चाहिये। महुएकी दतुवनसे दन्तधावन करनेपर पुत्र-प्राप्ति, भँगैरियासे दुःखनाश, बदरी (बेर) और बृहती (भटकटैया)-से शीघ्र ही रोगमुक्ति, बिल्वसे ऐश्वर्य-प्राप्ति, खैरसे धन-संचय, कदम्बसे शत्रुनाश, अतिमुक्तसे अर्थप्राप्ति, आटरूपक (अडूसा)-से गुरुता प्राप्त होती है। पीपलके दातूनसे यश और जातिमें प्रधानता तथा करवीरसे अचल परिज्ञान प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं। शिरीषकी दातूनसे विपुल लक्ष्मी और प्रियंगुके दातूनसे परम सौभाग्यकी प्राप्ति होती है।

अभीप्सित अर्थकी सिद्धिके लिये सुखपूर्वक बैठकर वाणीका संयम करके निम्र लिखित मन्त्रसे दातूनके वृक्षकी प्रार्थना कर दातून करे—

वरं त्वामभिजानामि कामदं च वनस्पते। सिद्धिं प्रयच्छ मे नित्यं दन्तकाष्ठ नमोऽस्तु ते ॥

(ब्राह्मपर्व ११३।१३)

‘वनस्पते! आप श्रेष्ठ कामनाओंको प्रदान करनेवाले हैं, ऐसा मैं भलीभाँति जानता हूँ। हे दन्तकाष्ठ! मुझे सिद्धि प्राप्त करायें। आपको नमस्कार है।’

इस मन्त्रका तीन बार जप करके दन्तधावन करना चाहिये।

दूसरे दिन पवित्र होकर भगवान् सूर्यको प्रणाम कर यथेष्ट जप करे। तदनन्तर अग्निमें हवन करे। अपराह्न-कालमें मिट्टी, गोबर और जलसे स्नानकर विधिपूर्वक नियमके साथ शुक्ल वस्त्र धारण कर पवित्र हो, देवाधिदेव दिवाकरकी भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा और गायत्रीका जप करे।

(अध्याय ११३)

स्वप्न-फल-वर्णन तथा उदक-सप्तमी-व्रत

भगवान् सूर्यने कहा—हे खगश्रेष्ठ! व्रतीको चाहिये कि जप, होम आदि सभी क्रियाओंको विधिपूर्वक सम्पन्न कर देवाधिदेव भगवान् सूर्यका ध्यान करता हुआ भूमिपर शयन करे। स्वप्नमें यदि मनुष्य भगवान् सूर्य, इन्द्रध्वज तथा चन्द्रमाको देखे तो उसे सभी समृद्धियाँ सुलभ होती हैं। शृङ्गार, चँवर, दर्पण, स्वर्णालंकार, रुधिरस्त्र तथा केशपातको देखे तो ऐश्वर्यलाभ होता है। स्वप्नमें वृक्षाधिरोपण शीघ्र ऐश्वर्यदायक है। महिषी, सिंहही तथा गौका अपने हाथसे दोहन और इनका बन्धन करनेपर राज्यका लाभ होता है। नाभिका स्पर्श करनेपर दुर्बुद्धि होती है। भेड़ एवं सिंहको तथा जलमें उत्पन्न जन्तुको मारकर स्वयं खानेसे,

अपने अङ्ग, अस्थि, अग्नि-भक्षण, मदिरा-पान, सुवर्ण, चाँदी और पद्मपत्रके पात्रमें खीर खानेपर उसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। द्यूत या युद्धमें विजय देखना सुखप्रद होता है। अपने शरीरके प्रज्वलन तथा शिरोबन्धन देखनेसे ऐश्वर्य प्राप्त होता है। माला, शुक्ल वस्त्र, अश्व, पशु, पक्षीका लाभ और विष्टाका अनुलेपन प्रशंसनीय माना गया है। अश्व या रथपर यात्राका स्वप्न देखना शीघ्र ही संततिके आगमनका सूचक है। अनेक सिर और भुजाएँ देखनेपर घरमें लक्ष्मी आती है। वेदाध्ययन देखना श्रेष्ठ है। देव, द्विज, श्रेष्ठ वीर, गुरु, वृद्ध तपस्वी स्वप्नमें मनुष्यको जो कुछ कहें उसे सत्य ही मानना चाहिये*। इनका दर्शन एवं

  • देवद्विजश्रेष्ठवीरगुरुवृद्धतपस्विनः

॥ यद्दन्ति नरं स्वप्ने सत्यमेवेति तद्विदुः ।

(ब्राह्मपर्व ११४।११-१२)

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  • ब्राह्मपर्व *

११९

आशीर्वाद श्रेष्ठ फलदायक है। पर्वत, अश्व, सिंह, बैल और हाथीपर विशिष्ट पराक्रमके साथ स्वप्नमें जो आरोहण करता है, उसे महान् ऐश्वर्य एवं सुखकी प्राप्ति होती है। ग्रह, तारा, सूर्यका जो स्वप्नमें परिवर्तन करता है और पर्वतका उन्मूलन करता है, उसे पृथ्वीपति होनेका संकेत मिलता है। शरीरसे आँतोंका निकालना, समुद्र एवं नदियोंका पान करना ऐश्वर्य-प्राप्तिका सूचक है। जो स्वप्नमें समुद्रको एवं नदीको साहसके साथ पार करता है, उसे चिरजीवी पुत्र होता है। यदि स्वप्नमें कृमिका भक्षण करना देखता है तो उसे अर्थकी प्राप्ति होती है। सुन्दर अङ्गोंको देखनेसे लाभ होता है। मङ्गलकारी वस्तुओंसे योग होनेपर

आरोग्य और धनकी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं।

भगवान् भास्कर अज्ञानान्धकारको दूरकर अपनी अचल भक्ति प्रदान करते हैं, उनके विधिपूर्वक पूजन करनेके पश्चात् सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम कर प्रदक्षिणा करनी चाहिये। जो व्यक्ति भगवान् भास्करकी पूजा करता है, वह उत्तम विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाता है। विधिपूर्वक पूजन करनेके पश्चात् उनके यथेष्ट मन्त्रोंका जप तथा हवन करना चाहिये। सप्तमीके दिन भगवान् सूर्यनारायणका विधिपूर्वक पूजन कर केवल आधी अञ्जलि जल पीकर व्रत करनेको उदक-सप्तमी कहते हैं, वह सदैव सुख देनेवाली है। (अध्याय १९४-१९७)

सूर्यनारायणकी महिमा, अर्घ्य प्रदान करनेका फल तथा आदित्य-पूजनकी विधियाँ

महाराज शतानीकने कहा—सुमन्तु मुने! इस लोकमें ऐसे कौन देवता हैं, जिनकी पूजा-स्तुति करके सभी मनुष्य शुभ-पुण्य और सुखका अनुभव करते हैं। सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म कौन है? आपके विचारसे कौन पूजनीय है तथा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवता किसकी पूजा-अर्चना करते हैं और आदिदेव किस देवताको कहा जाता है?

सुमन्तुजी बोले—राजन्! मैं इस विषयमें भगवान् वेदव्यास और भीष्मपितामहके उस संवादको कह रहा हूँ जो सभी पापोंका नाश करनेवाला तथा सुख प्रदान करनेवाला है, उसे आप सुनें।

एक समय गङ्गाके किनारे वेदव्यासजी बैठे हुए थे। वे अग्निके समान जाज्वल्यमान, तेजमें आदित्यके समान, साक्षात् नारायणतुल्य दिखायी दे रहे थे। भगवान् वेदव्यास महाभारतके कर्ता तथा वेदके अर्थोंको प्रकाशित करनेवाले हैं और ऋषियों तथा राजर्षियोंके आचार्य हैं, कुरुवंशके

स्वष्ट हैं, साथ ही मेरे परमपूज्य हैं। इन वेदव्यासजीके पास कुरुश्रेष्ठ महातेजस्वी भीष्मजी आये और उन्हें प्रणाम कर कहने लगे।

भीष्मपितामहने पूछा—हे महामते पराशरनन्दन! आपने सम्पूर्ण वाङ्मयकी व्याख्या मुझसे की है, किंतु मुझे भगवान् भास्करके सम्बन्धमें संशय उत्पन्न हो गया है। सर्वप्रथम भगवान् आदित्यको नमस्कार करनेके पश्चात् ही अन्य देवताओंको नमस्कार किया जाता है। इसमें क्या कारण है? ये भगवान् भास्कर कौन हैं? कहाँसे उत्पन्न हुए हैं? हे द्विजश्रेष्ठ! इस लोकके कल्याणके लिये उस परम तत्त्वको कहिये। मुझे जाननेकी बड़ी ही अभिलाषा है।

व्यासजीने कहा—भीष्म! आप अवश्य ही किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान् भास्करकी स्तुति, पूजन-अर्चना सभी सिद्ध और ब्रह्मादि देवता करते हैं। सभी देवताओंमें

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२२०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

आदिदेव भगवान् भास्करको ही कहा जाता है। ये संसार-सागरके अन्धकारको दूरकर सब लोकों और दिशाओंको प्रकाशित करते हैं। ये सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्मस्वरूप हैं। ये पूज्यतम हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सभी देवता आदिदेव भगवान् आदित्यकी ही पूजा करते हैं। आदित्य ही अदिति और कश्यपके पुत्र हैं। ये आदिकर्ता हैं, इसलिये भी आदित्य कहे जाते हैं। भगवान् आदित्यने ही सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न किया है। देवता, असुर, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, पक्षी आदि तथा इन्द्रादि देवता, ब्रह्मा, दक्ष, कश्यप सभीके आदिकारण भगवान् आदित्य ही हैं। भगवान् आदित्य सभी देवताओंमें श्रेष्ठ और पूजित हैं।

भीष्मपितामहने पूछा —पराशरनन्दन महर्षि व्यासजी! यदि भगवान् सूर्यनारायणका इतना अधिक प्रभाव है तो प्रातः, मध्याह्न और सार्यकाल—इन तीनों कालोंमें राक्षसादि कैसे इन्हें संत्रस्त करते हैं तथा भगवान् आदित्य फिर कैसे चक्रवत् घूमते रहते हैं? हे द्विजोत्तम! राहु उन्हें कैसे प्रसित करता है?

व्यासजीने कहा —पिशाच, सर्प, डाकिनी, दानव आदि जो क्रोधसे उन्मत्त हो भगवान् सूर्यनारायणपर आक्रमण करते हैं, भगवान् सूर्यनारायण उन्हें प्रताडित करते हैं। यह मुहुर्तादि कालस्वरूप भगवान् सूर्यका ही प्रभाव है। संसारमें धर्म एकमात्र भगवान् सूर्यका आधार लेकर प्रवर्तित होता है। ब्रह्मादि देवता सूर्यमण्डलमें स्थित रहते हैं। भगवान् सूर्यनारायणको नमस्कार करनेमात्रसे ही सभी देवताओंको नमस्कार प्राप्त हो जाता है। तीनों कालोंमें संध्या करनेवाले ब्राह्मणजन भगवान् आदित्यको ही प्रणाम करते हैं। भगवान् भास्करके बिम्बके नीचे राहु स्थित है। अमृतकी इच्छा करनेवाला राहु विमानस्थ अमृत-घटसे थोड़ा भी अमृत छलकनेपर उस अमृतको प्राप्त करनेके

उद्देश्यसे जब विमानके अति संनिकट पहुँचता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि राहुने सूर्यनारायणको प्रसित कर लिया है, उसे ही ग्रहण कहा जाता है। आदित्यभगवान्को कोई प्रसित नहीं कर सकता; क्योंकि वे ही इस चराचर जगत्का विनाश करनेवाले हैं। दिन, रात्रि, मुहुर्त आदि सब आदित्यभगवान्के ही प्रभावसे प्रकाशित होते हैं। दिन, रात्रि, धर्म, अधर्म जो कुछ भी इस संसारमें दृष्टिगोचर हो रहा है, उन सबको भगवान् आदित्य ही उत्पन्न करते हैं। वे ही उसका विनाश भी करते हैं। जो व्यक्ति भगवान् आदित्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, उस व्यक्तिको भगवान् आदित्य शीघ्र ही संतुष्ट होकर वर प्रदान करते हैं तथा बल, वीर्य, सिद्धि, ओषधि, धन-धान्य, सुवर्ण, रूप, सौभाग्य, आरोग्य, यश, कीर्ति, पुत्र, पौत्रादि और मोक्ष आदि सब कुछ प्रदान करते हैं, इसमें संदेह नहीं है।

भीष्मने कहा —महात्मन्! अब आप मुझसे सौर-धर्मके स्नानकी विधि रहस्यसहित बतलायें। जिससे भगवान् आदित्यकी पूजा कर मनुष्य सभी प्रकारके दोषोंसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है।

व्यासजी बोले —भीष्म! मैं सौर-स्नानकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ, जो सभी प्रकारके पापोंको दूर कर देती है। सर्वप्रथम पवित्र स्थानसे मृत्तिका ग्रहण करे, तदनन्तर उस मृत्तिकाको शरीरमें लगाये। फिर जलको अभिमन्त्रित कर स्नान करे। शङ्ख, तुरही आदिसे ध्वनि करते हुए सूर्यनारायणका ध्यान करना चाहिये। भगवान् सूर्यके 'हौं हौं सः' इस मन्त्रराजसे आचमन करना चाहिये। फिर देवताओं एवं ऋषियोंका तर्पण और स्तुति करनी चाहिये। अपसव्य होकर पितरोंका तर्पण करे। अनन्तर संध्या-वन्दन करे। उसके बाद भगवान् भास्करको अञ्जलिसे जल देना चाहिये। स्नान करनेके बाद त्र्यक्षर-मन्त्र 'हौं हौं सः' अथवा

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  • ब्राह्मपर्व *

२२१

षडक्षर-मन्त्र 'खखोल्लकाय नमः' का जप करना चाहिये। जिस मन्त्रराजको पूर्वमें कहा है उस मन्त्रराजसे हृदयादि- न्यास करना चाहिये। मन्त्रको हृदयङ्गम कर भगवान् सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। एक ताम्रपात्रमें गन्ध, लाल चन्दन आदिसे सूर्य-मण्डल बनाकर उसमें करवीर (कनेर) आदिके पुष्प, गन्धोदक, रक्त चन्दन, कुश, तिल, चावल आदि स्थापित कर घुटनेको मोड़ उस ताम्रपात्रको उठाकर सिरसे लगाये और भक्तिपूर्वक 'हां हों सः' इस मन्त्रराजसे भगवान् सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करे। जो व्यक्ति इस विधिसे भगवान् आदित्यको अर्घ्य निवेदन करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। हजारों संक्रान्तियों, हजारों चन्द्रग्रहणों, हजारों गोदानों तथा पुष्कर एवं कुरुक्षेत्र आदि तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल केवल सूर्यनारायणको अर्घ्य प्रदान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। सौरदीक्षाविहीन व्यक्ति भी यदि भगवान् आदित्यको संवत्सरपर्यन्त अर्घ्य प्रदान करता है तो उसे भी वही फल प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। फिर दीक्षाको ग्रहण कर जो विधिपूर्वक अर्घ्य प्रदान करता है, वह व्यक्ति इस संसार-सागरको पारकर भगवान् भास्करमें विलीन हो जाता है।

भीष्मने कहा—ब्रह्मन्! आपने पाप-हरण करनेवाली स्नान-विधि तो बता दी, अब कृपाकर उनकी पूजा-विधि बतायें, जिससे मैं भगवान् सूर्यकी पूजा कर सकूँ।

व्यासजी बोले—भीष्म! अब मैं आदित्य-पूजनकी विधि कह रहा हूँ, आप सुनें। आदित्यपूजकको चाहिये कि स्नानादिसे पवित्र होकर किसी शुद्ध एकान्त स्थानमें प्रसन्न होकर भास्करकी पूजा करे। वह श्रेष्ठ सुन्दर आसनपर पूर्वाभिमुख बैठे। सूर्य-मन्त्रोंसे करन्यास एवं हृदयादि-

न्यास करे। इस प्रकार आत्मशुद्धिकर न्यासद्वारा भगवान् सूर्यकी अपनेमें भावना करे। अपनेको भास्कर समझकर स्थण्डिलपर भानुकी स्थापना करके विधिवत् पूजा करे। दक्षिण पार्श्वमें पुष्पकी टोकरी एवं वाम पार्श्वमें जलसे परिपूर्ण ताम्रपात्र स्थापित करे। पूजाके लिये उपकल्पित सभी द्रव्योंका अर्घ्यपात्रके जलसे प्रोक्षण कर पूजन करे, अनन्तर मन्त्रवेता एकाग्रचित्त होकर सूर्यमन्त्रोंका जप करे।

भीष्मने कहा—भगवन्! अब आप भगवान् सूर्यकी वैदिक अर्चाविधि बतलायें।

व्यासजी बोले—भीष्म! आप इस सम्बन्धमें सुरज्येष्ठ ब्रह्मा तथा विष्णुके मध्य हुए संवादको सुनें। एक बार ब्रह्माजी मेरूपर्वतपर स्थित अपनी मनोवती नामकी सभामें सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय विष्णुभगवान्ने प्रणाम कर उनसे कहा—'ब्रह्मन्! आप भगवान् भास्करकी आराधनाविधि बतायें और मण्डलस्थ भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये, इसे कहें।'

ब्रह्माने कहा—महाबाहो! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है, आप एकाग्रचित्त होकर भगवान् भास्करकी पूजनविधि सुनिये।

सर्वप्रथम शास्त्रोक्त विधिसे भूमिका विधिवत् शोधनकर केसर आदि गन्धोंसे सात आवरणोंसे युक्त कर्णिकासमन्वित एक अष्टदलकमल बनाये। उसमें दीसा आदि सूर्यकी दिव्य अष्ट शक्तियोंको पूर्वादि-क्रमसे ईशानकोणतक स्थापित करे। बीचमें सर्वतोमुखी देवीकी स्थापना करे। दीसा, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता और सर्वतोमुखी—ये नौ सूर्यशक्तियाँ हैं। इन शक्तियोंका आवाहन कर पद्मकी कर्णिकाके ऊपर भगवान् भास्करको स्थापित करना चाहिये। 'उदु त्वं जातवेदसं' (यजु० ७।४१) तथा 'अग्निं दूतं' (यजु० २२।१७)—ये मन्त्र आवाहन और उपस्थानके

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२२२* संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कहे गये हैं। ‘आ कृष्णेन रजसा०’ (यजु० ३३। ४३) तथा ‘हꣵ सः शुचिषद०’ (यजु० १०। २४) इन मन्त्रोंसे भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। ‘अपसे तारकं०’ मन्त्रसे दीप्तादेवीकी पूजा करे। ‘अदृश्रमस्य केतवो०’ (यजु० ८। ४०) मन्त्रसे सूक्ष्मादेवीकी, ‘तरणिर्विश्वदर्शतो०’ (यजु० ३३। ३६)—से जयाकी, ‘प्रत्यङ्देवाना०’ इस मन्त्रसे भद्राकी, ‘येना पावक चक्षसा०’ (यजु० ३३। ३२) इस मन्त्रसे विभूतिकी, ‘विद्यामेषि०’ इस मन्त्रसे विमलादेवीकी पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकारसे अमोघा, विद्युता तथा सर्वतोमुखी देवियोंकी भी पूजा करनी चाहिये। अनन्तर वैदिक मन्त्रोंसे ससावरण-पूजनपूर्वक मध्यमें भगवान् सूर्यकी पूजा करे। भगवान् सूर्य एक चक्रवाले रथपर बैठकर श्वेत कमलपर स्थित हैं। उनका लाल वर्ण है। वे सर्वाभरणभूषित तथा सभी लक्षणोंसे समन्वित और महातेजस्वी हैं। उनका बिम्ब वर्तुलाकार है। वे अपने हाथोंमें कमल और धनुष लिये हैं। ऐसे उनके स्वरूपका ध्यानकर नित्य श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये।

भगवान् विष्णुने कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मण्डलस्थ भगवान् भास्करकी प्रतिमारूपमें किस प्रकारसे पूजा की जाय, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।

ब्रह्माजी बोले—हे सुव्रत! आप एकाग्रचित्त-मनसे प्रतिमा-पूजन-विधिको सुनिये। ‘इषे त्वो०’ (यजु० १। १) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके सिर-प्रदेशका पूजन करना चाहिये। ‘अग्निमीळे०’ (ऋ० १। १। १) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके दक्षिण हाथकी पूजा करनी चाहिये। ‘अग्न आ याहि०’ (ऋ० ६। १६। १०) इस मन्त्रसे सूर्यभगवान्‌के दोनों चरणोंकी पूजा करनी चाहिये। ‘आ जिघ्र०’ (यजु० ८। ४२) इस मन्त्रसे पुष्पमाला समर्पित करनी चाहिये। ‘योगे योगे०’ (यजु० ११। १४) इस मन्त्रसे पुष्पाञ्जलि देनी चाहिये। ‘समुद्रंगच्छ०’ (यजु० ६। २१) तथा ‘इमं मे गङ्गे०’ (ऋ० १०। ७५। ५) तथा ‘समुद्रज्येष्ठाः०’ (ऋ० ७। ४९। १) इन मन्त्रोंसे उन्हें अङ्गराग लगाये। ‘आप्यायस्व०’ (यजु० १२। ११२) इस मन्त्रसे दुग्ध-स्नान, ‘दधिक्राव्णो०’ (यजु० २३। ३२) इस मन्त्रसे दधिस्नान, ‘तेजोऽसि शुक्रं०’ (यजु० २२। १) इस मन्त्रसे घृत-स्नान तथा ‘या ओषधीः०’ (यजु० १२। ७५) इस मन्त्रद्वारा ओषधि-स्नान कराये। इसके बाद ‘द्विपदा०’ (यजु० २३। ३४) इस मन्त्रसे भगवान्‌का उद्वर्तन करे। फिर ‘मा नस्तोके०’ (यजु० १६। १६) इस मन्त्रसे पुनः स्नान कराये। ‘विष्णो रराट०’ (यजु० ५। २१) इस मन्त्रसे गन्ध तथा जलसे स्नान कराये। ‘स्वर्ण घर्मः०’ (यजु० १८। ५०) इस मन्त्रसे पाद्य देना चाहिये। ‘इदं विष्णुर्वि चक्रमे०’ (यजु० ५। १५) इस मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। ‘वेदोऽसि०’ (यजु० २। २१) इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत और ‘बृहस्पते०’ (यजु० २६। २३) इस मन्त्रसे वस्त्र-उपवस्त्र आदि भगवान् सूर्यको चढ़ाना चाहिये। इसके अनन्तर पुष्पमाला चढ़ाये। ‘धूरसि धूर्व०’ (यजु० १। ८) इस मन्त्रसे गुग्गुलसहित धूप दिखाना चाहिये। ‘समिद्धो०’ (यजु० २९। १) इस मन्त्रसे रोचना लगाये। ‘दीर्घायुस्त०’ (यजु० १२। १००) इस मन्त्रसे आलक्त (आलता) लगाये। ‘सहस्रशीर्षा’ (यजु० ३१। १) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके सिरका पूजन करना चाहिये। ‘संभावया०’ इस मन्त्रसे दोनों नेत्रों और ‘विश्वतश्चक्षु०’ (यजु० १७। १९) इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यके सम्पूर्ण शरीरका स्पर्श करना चाहिये। ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च’ (यजु० ३१। २२) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक भगवान् सूर्यनारायणका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन-अर्चन करना चाहिये। (अध्याय १९८—२०२)

  • ब्राह्मपर्व *

२२३

भगवान् भास्करके व्योम-पूजनकी विधि तथा आदित्य-माहात्म्य

विष्णुभगवान्ने पूछा—हे सुरश्रेष्ठ चतुरानन! अब आप भगवान् आदित्यके व्योम-पूजनकी विधि बतलायें। अष्ट-शृङ्गयुक्त व्योमस्वरूप भगवान् भास्करकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये।

ब्रह्माजीने कहा—महाबाहो! सुवर्ण, चाँदी, ताम्र तथा लोहा आदि अष्ट धातुओंसे एक अष्ट शृङ्गमय व्योम बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिये। सर्वप्रथम उसके मध्यमें भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये। 'महिषा वोः' इस मन्त्रसे अनेक प्रकारके पुष्पोंको चढ़ाना चाहिये। 'त्रातारमिन्द्रः' (यजु० २०।५०) तथा 'उदीरतामवरः' (यजु० १९।४९) इत्यादि वैदिक मन्त्रोंसे शृङ्गोंकी तथा 'नमोऽस्तु सर्पेभ्योः' (यजु० १३।६) इस मन्त्रसे व्योमपीठकी पूजा करनी चाहिये। जो व्यक्ति ग्रहोंके साथ सब पापोंको दूर करनेवाले व्योम-पीठस्थ भगवान् सूर्यको नमस्कार कर उनका पूजन करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।

भगवान् भास्करकी पूजा करके गुरुको सुन्दर वस्त्र, जूता, सुवर्णकी अँगूठी, गन्ध, पुष्प, अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थ निवेदित करने चाहिये। जो व्यक्ति इस विधिसे उपवास रखकर भगवान् सूर्यकी पूजा-अर्चना करता है, वह बहुत पुत्रोंवाला, बहुत धनवान् और कीर्तिमान् हो जाता है। भगवान् सूर्यके उत्तरायण तथा दक्षिणायन होनेपर उपवास रखकर जो व्यक्ति उनकी पूजा करता है,

उसे अश्वमेध-यज्ञ करनेका फल, विद्या, कीर्ति और बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय जो व्यक्ति उपवास रखकर भगवान् भास्करकी पूजा-अर्चना आदि करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।

इसी प्रकार भगवान् भास्करके रत्नमय व्योमकी प्रतिमा बनाकर उसकी प्रतिष्ठा और वैदिक मन्त्रोंसे विविध उपचारोंद्वारा उसकी पूजा करे। पूजनके अनन्तर ऋग्वेदकी पाँच ऋचाओंसे भगवान् आदित्यकी परास्तुति करे*। इसके बाद भास्करको अव्यङ्ग निवेदित करे। अनन्तर भगवान् सूर्यकी दीसा, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता तथा सर्वतोमुखी नामवाली नौ दिव्य शक्तियोंका पूजन करे।

इस विधिसे जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह इस लोक और परलोकमें सभी मनःकामनाओंको पूर्ण कर लेता है। पुत्र चाहनेवालेको पुत्र तथा धन चाहनेवालेको धन प्राप्त हो जाता है। कन्यार्थीको कन्या और वेदार्थीको वेद प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति निष्कामभावसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इतना कहकर ब्रह्माजी शान्त हो गये।

व्यासजीने पुनः कहा— हे भीष्म! अब आप ध्यान करने योग्य ग्रहोंके स्वरूपका तथा भगवान् आदित्यके माहात्म्यका श्रवण करें। भगवान् सूर्यका वर्ण जपाकुसुमके समान लाल है। वे महातेजस्वी

  • उक्षणं पुश्चिमपञ्चत्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ॥

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ इन्द्रं मित्रं वरुणमनिमामाहुर्यो दिव्यः स सुपर्णां गरुत्मान् । एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पत्तन्ति । त आववृत्रन् त्पदनादृतस्यादिद् घूतेन पृथिवी व्युद्यते ॥ यो रत्नधा वसुविद् यः सुदत्रः सरस्वति तमिह धातवे कः ॥

(ऋग्वेद १।१६४।४३, ४५-४७, ४९)

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२२४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

श्वेत पद्मपर स्थित हैं। सभी लक्षणोंसे समन्वित हैं। सभी अलंकारोंसे विभूषित हैं। उनके एक मुख है, दो भुजाएँ हैं। रक्त वस्त्र धारण किये हुए वे ग्रहोंके मध्यमें स्थित हैं। जो व्यक्ति तीनों समय एकाग्रचित्त होकर उनके इस रूपका ध्यान करता है, वह शीघ्र ही इस लोकमें धन-धान्य प्राप्त कर लेता है और सभी पापोंसे छूटकर तेजस्वी तथा बलवान् हो जाता है। श्वेत वर्णके चन्द्रमा, रक्त वर्णके मंगल, रक्त तथा श्याम-मिश्रित वर्णके बुध, पीत वर्णके बृहस्पति, शङ्खु तथा दूधके समान श्वेत वर्णके शुक्र, अञ्जनके समान कृष्ण वर्णके शनि, लाजावर्तके समान नील वर्णके राहु और केतु कहे गये हैं। इन ग्रहोंके साथ ग्रहोंके अधिपति भगवान् सूर्यनारायणका जो व्यक्ति ध्यान एवं पूजन करता है, उसे शीघ्र ही महसिद्धि प्राप्त हो जाती है, सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं तथा महादेवत्वकी प्राप्ति हो जाती है।

सूर्यनारायणके समान कोई देवता नहीं और न ही उनके समान कोई गति देनेवाला है। सूर्यके समान न तो ब्रह्मा हैं और न अग्नि। सूर्यके धर्मके समान न कोई धर्म है और न उनके समान कोई धन। सूर्यके अतिरिक्त कोई बन्धु नहीं है और न तो कोई शुभचिन्तक ही है। सूर्यके समान कोई माता नहीं और न तो कोई गुरु ही है। सूर्यके समान न तो कोई तीर्थ है और न उनके समान कोई पवित्र ही है। समस्त लोकों, देवताओं तथा पितरोंमें एक भगवान् सूर्य ही व्याप्त हैं, उनका ही स्तवन, अर्चन तथा पूजन करनेसे परम गतिकी प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक

सूर्यनारायणकी आराधना करता है, वह इस भवसागरको पार कर जाता है। भगवान् सूर्यके प्रसन्न हो जानेपर राजा, चोर, ग्रह, सर्प आदि पीड़ा नहीं देते तथा दरिद्रता और सभी दुःखोंसे भी निवृत्ति हो जाती है।

रविवारके दिन श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा कर नक्तव्रत करनेवाला व्यक्ति अमरत्वको प्राप्त करता है। भगवान् मार्तण्डकी प्रीतिके लिये जो संक्रान्तिमें विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। जो व्यक्ति भास्करकी प्रीतिके लिये उपवास रखकर षष्ठी या सप्तमीके दिन विधिवत् श्राद्ध करता है, वह सभी दोषोंसे निवृत्त होकर सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति सप्तमीके दिन विशेषकर रविवार अथवा ग्रहणके दिन भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा करता है, उसकी सभी मनःकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। ग्रहणके दिन भगवान् भास्करका पूजन करना उन्हें अतिप्रिय है। भगवान् आदित्य परमदेव हैं और सभी देवताओंमें पूज्य हैं। उनकी पूजा कर व्यक्ति इच्छित फलको प्राप्त कर लेता है। धन चाहनेवालेको धन, पुत्र चाहनेवालेको पुत्र तथा मोक्षार्थीको मोक्ष प्राप्त हो जाता है और वह अमर हो जाता है।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! भीष्मसे ऐसा कहकर वेदव्यासजी अपने स्थानको चले गये और भीष्मने भी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यनारायणकी विधि-विधानसे पूजा की। राजन्! आप भी भगवान् भास्करकी पूजा करें, इससे आपको शाश्वत स्थान प्राप्त होगा। (अध्याय २०३—२०७)

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  • ब्राह्मपर्व *

२२५

सप्त-सप्तमी तथा द्वादश मास-सप्तमी-व्रतोंका वर्णन

शतानीकने कहा—मुने! भगवान् भास्करको अति प्रिय जिन अर्कसम्पुटिका आदि सात सप्तमी-व्रतोंकी आपने पूर्वमें चर्चा की है, उन्हें बतलानेकी कृपा करें।

सुमन्तुजी बोले—महामते! मैं सात सप्तमियोंका वर्णन कर रहा हूँ, उन्हें सुनिये। पहली सप्तमी अर्कसम्पुटिका नामकी है। दूसरी मरिच-सप्तमी, तीसरी निम्ब-सप्तमी, चौथी फल-सप्तमी, पाँचवीं अनोदना-सप्तमी, छठी विजय-सप्तमी तथा सातवीं कामिका नामकी सप्तमी है। इनकी संक्षिप्त विधि इस प्रकार है—

उत्तरायण या दक्षिणायनमें, शुक्ल पक्षमें, रविवारके दिन ग्रहणमें, पुँल्लिङ्गवाची नक्षत्रमें—इन सप्तमी-व्रतोंको ग्रहण करना चाहिये। व्रतीको जितेन्द्रिय, पवित्रता-सम्पन्न और ब्रह्मचारी होकर सूर्यकी अर्चनामें रत रहना चाहिये तथा जप-होमादिमें तत्पर रहना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि पञ्चमीके दिन एकभुक्त रहकर षष्ठीके दिन जितेन्द्रिय रहे एवं निन्द्य पदार्थोंका भक्षण न करे। अर्क-सेवनसे पहली सप्तमी, मरिचसे दूसरी सप्तमी तथा निम्बपत्रसे तीसरी सप्तमी व्यतीत करे। फलसप्तमीमें फलोंका भक्षण करना चाहिये। अनोदना-सप्तमीके दिन अन्न-भक्षण न करके उपवास करे। विजय-सप्तमीके दिन वायु भक्षण कर उपवास करे। कामिका-सप्तमीको भी हविष्य भोजनकर यथाविधि सम्पन्न करना चाहिये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन सप्तमी-व्रतोंको करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है।

अर्कसम्पुटिका-व्रतसे सात पीढ़ीतक अचल सम्पत्ति बनी रहती है। मरिच-सप्तमीके अनुष्ठानसे प्रिय पुत्रादिका साथ बना रहता है। निम्बसप्तमीके पालनसे सभी रोग नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है और फल-सप्तमी-व्रतके करनेसे

व्रती अनेक पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हो जाता है। अनोदना-सप्तमीके व्रतसे धन-धान्य, पशु, सुवर्ण, आरोग्य तथा सुख सदा सुलभ रहते हैं। विजय-सप्तमीका व्रत करनेसे शत्रुगण नष्ट हो जाते हैं। कामिका-सप्तमीका विधिवत् अनुष्ठान करनेसे पुत्रकी कामना करनेवाला पुत्र, अर्थकी कामना करनेवाला अर्थ, विद्या-प्राप्तिकी कामना करनेवाला विद्या और राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है। पुरुष हो या स्त्री इस व्रतको विधिपूर्वक सम्पन्न कर परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं। उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। उनके कुलमें न कोई अंधा होता है, न कुष्ठी, न नपुंसक और न कोई विकलाङ्ग तथा न निर्धन। लोभवश, प्रमादवश या अज्ञानवश यदि व्रत-भङ्ग हो जाय तो तीन दिनतक भोजन न करे और मुण्डन कराकर प्रायश्चित्त करे। पुनः व्रतके नियमोंको ग्रहण करे।

सुमन्तुजीने कहा—रजन्! चैत्रादि बारह मासोंकी शुक्ल सप्तमियोंमें गोमय, यावक, सूखे पत्ते, दूध अथवा भिक्षान्न भक्षण कर या एकभुक्त रहकर उपवास करना चाहिये। भगवान् सूर्यकी पूजा कमल-पुष्प, नाना प्रकारके गन्ध, चन्दन, गुगुल धूप आदि विविध उपचारोंसे करनी चाहिये तथा इन्हीं उपचारोंसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी भी पूजा कर उन्हें दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। इससे व्रतीको अपार दक्षिणावाले यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह सूर्यलोकमें पूजित होता है। चैत्रादि बारह महीनोंमें पूजित होनेवाले भगवान् सूर्यके बारह नाम इस प्रकार हैं—चैत्रमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में दिवाकर, श्रावणमें पर्जन्य, भाद्रपदमें वरुण, आश्विनमें मार्तण्ड, कार्तिकमें भार्गव, मार्गशीर्षमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमें भग तथा फाल्गुनमें त्वष्टा।

(अध्याय २०८-२०९)

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२२६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अर्कसम्पुटिका-ससमीव्रत-विधि, ससमी-व्रत-माहात्म्यमें कौथुमिका आख्यान

सुमन्तुजी बोले—राजन्! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको अर्कससमी कहते हैं। इसमें षष्ठीको उपवास रहकर स्नान करके गन्ध, पुष्प, गुग्गुल, अर्क-पुष्प, श्वेत करवीर एवं चन्दनादिसे भगवान् दिवाकरकी पूजा करनी चाहिये। रविकी प्रसन्नताके लिये नैवेद्यमें गुडोदक समर्पित करे। इस प्रकार दिनमें भानुकी पूजा करके रातमें निद्रारहित होकर उनके मन्त्रका जप करे।

शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यका प्रिय मन्त्र कौन-सा है? उसे बतायें और धूप-दीपका भी निर्देश करें; जिससे उस मन्त्रका जप करता हुआ मैं दिवाकरकी पूजा कर सकूँ।

सुमन्तुजीने कहा—हे भरतश्रेष्ठ! मैं इस विधिको संक्षेपसे कह रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि एकाग्रचित्त होकर षडक्षर-मन्त्रका जप, होम तथा पूजा आदि सभी कर्म सम्पादित करे। सर्वप्रथम यथाशक्ति गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। सौरी गायत्री-मन्त्र इस प्रकार हैं—‘ॐ भास्कराय विचक्षे सहस्वरश्मि धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥’ इसे भगवान् सूर्यने स्वयं कहा है। यह सौरी गायत्री-मन्त्र परम श्रेष्ठ है। इसका श्रद्धापूर्वक एक बार जप करनेसे ही मानव पवित्र हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। ससमीके दिन प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो इस मन्त्रका जप करे और भक्तिपूर्वक भास्करकी पूजा करे। राजन्! यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराये। धनकी कंजूसी न करे। जो सूर्यके प्रति श्रद्धा-सम्पन्न नहीं हैं, उन्हें भोजन नहीं कराना चाहिये। शाल्योदन, मूँग, अपूप, गुड़से बने पुरे, दूध तथा दहीका भोजन कराना चाहिये। इससे भास्कर तृप्त होते हैं। भोजनके वज्य पदार्थ इस प्रकार हैं—कुलथी, मसूर, सेम तथा बड़ी। उड़द आदि, कड़वा तथा दुर्गन्धयुक्त

पदार्थ भी निवेदित नहीं करने चाहिये।

अर्कवृक्षकी ‘ॐ खरखोल्लाक्य नमः’ से पूजा कर अर्क-पल्लवोंको ग्रहण करे। फिर स्नानकर अर्क-पुष्पसे रविकी पूजा करके ब्राह्मणको भोजन कराये और ‘अकों मे प्रीयताम्’ सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों, ऐसा कहे। तदनन्तर देवताके सम्मुख दाँत और ओठसे स्पर्श किये बिना निमल्लिखित मन्त्रसे अर्कसम्पुटकी प्रार्थना करते हुए जलके साथ पूर्वाभिमुख होकर अर्कपुट निगल जाय।

ॐ अर्कसम्पुट भद्रं ते सुभद्रं मेऽस्तु वै सदा।

ममापि कुरु भद्रं वै प्राशनाद् वित्तदो भव॥

(ब्राह्मपर्व २१०।७३)

इस मन्त्रका जप करते हुए जो अर्कका ध्यान करता है तथा अर्कसम्पुटका प्राशन करता है, वह श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है।

दाँतसे स्पर्श न किये जानेके कारण अर्कपुट अर्कसम्पुट कहलाता है। जो इस विधिसे वर्षभर सूर्यनारायणकी प्रसन्नताके लिये श्रद्धापूर्वक ससमी-व्रत करता है, उस मनुष्यका धन सात पीढ़ीतक अक्षय तथा अचल हो जाता है। हे राजन्! इस व्रतके अनुष्ठानसे सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमि कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये तथा सिद्धि प्राप्त की। साथ ही बृहदवल्लक, राजा जनक, महर्षि याज्ञवल्क्य तथा कृष्णपुत्र साम्ब—इन सबने भी भगवान् सूर्यकी पूजा करके और इस व्रतके अनुष्ठानसे उनकी साम्यता प्राप्त कर ली। यह अर्क-ससमी पवित्र, पापनाशिनी, पुण्यप्रद तथा धन्य है। अपने कल्याणके लिये इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये।

शतानीकने पूछा—मुने! जनक आदिने भगवान् सूर्यकी पूजा करके जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की, उसे तो मैंने बहुधा सुना है, किंतु महर्षि कौथुमिने किस प्रकार अर्ककी आराधना कर सिद्धि प्राप्त

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  • ब्राह्मपर्व *

२२७

की और वे कैसे कुछ-रोगसे मुक्त हुए, इसका मुझे ज्ञान नहीं है। वे कौथुमि कौन थे, उन्हें कैसे कुछ हुआ? हे द्विजश्रेष्ठ! किस प्रकार उन्होंने देवाधिदेव दिवाकरकी आराधना की? इन सभी बातोंको मुझे संक्षेपमें सुनायें।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! आपने बहुत अच्छी जिज्ञासा की है। इस विषयको आप श्रवण करें। प्राचीन कालमें हिरण्यनाभ नामके एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे अपने पुत्रके साथ महाराजा जनकके आश्रमपर गये। वहाँ अनेक ब्राह्मणोंके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। क्रोधवश कौथुमिसे एक ब्राह्मणका वध हो गया। पुत्रके द्वारा विप्रको मारा गया देखकर पिताने कौथुमिका परित्याग कर दिया। सज्जनों तथा कुटुम्बियोंने भी उनका बहिष्कार कर दिया। शोक और दुःखसे दुःखी होकर वे दिव्य देवालयोंमें गये और उन्होंने अनेक तीर्थोंकी यात्राएँ कीं, किंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिल सकी। ब्रह्महत्याके कारण उन्हें भयंकर कुछ नामक व्याधिने ग्रस्त कर लिया। नाक, कान आदि अङ्ग गलकर गिर गये। शरीरसे पीब और रक्त बहने लगा। समस्त पृथ्वीपर घूमते हुए वे पुनः अपने पिताके घर आये। दुःखसे व्याकुलचित्त हो उन्होंने अपने पितासे कहा—'तात! मैं पवित्र तीर्थों और अनेक देवालयोंमें गया, किंतु इस क्रूर ब्रह्महत्यासे मुक्त नहीं हो सका। प्रायश्चित्त करनेपर भी मुझे इससे छुटकारा नहीं मिला है। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कैसे मैं रोगसे मुक्ति पाऊँ? हे अनघ! अल्प परिश्रम-साध्य जिस कर्मके करनेसे इस ब्रह्महत्यारूपी व्याधिसे मुझे छुटकारा मिले, उस उपायको आप शीघ्र बतायें और मेरा कल्याण करें।'

हिरण्यनाभने कहा—पुत्र! पृथ्वीमें घूमते हुए तुमने जो क्लेश प्राप्त किया है, उसे मैं भलीभाँति जानता हूँ। तुम अनेक तीर्थोंमें गये और प्रायश्चित्त भी किये, परंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिली, अब मैं एक उपाय बताता हूँ, उस उपायसे तुम अनायास ही ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाओगे।

कौथुमिने कहा—विभो! मैं ब्रह्मादि देवोंमें किसकी आराधना करूँ? मैं तो शरीरसे भी विकल हूँ, अतः सभी कर्मोंका यथावत् सम्पादन मुझसे सम्भव नहीं है, फिर किस प्रकार मैं देवताको संतुष्ट कर सकूँगा।

हिरण्यनाभने कहा—ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, वरुण आदि देवताओंने भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा की है और इसी कारण वे स्वर्गलोकमें आनन्दित हो रहे हैं। हे पुत्र! मैं भगवान् सूर्यके समान किसी भी देवताको नहीं जानता हूँ। वे सभी कामनाओंको देनेवाले और माता-पिता तथा सभीके मान्य हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिये तुम उनके मन्त्रका जप करते हुए तथा सामवेदके मन्त्रोंका गान करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करो और उनसे सम्बन्धित इतिहास-पुराण आदिका श्रवण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही रोगसे मुक्ति मिलेगी और तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।

सुमन्तुजीने कहा—राजन्! सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमिने श्रद्धा-समन्वित हो अपने पिताद्वारा निर्दिष्ट सूर्योपासनाकी विधिसे भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् भास्करकी कृपासे महर्षि कौथुमि दिव्य मूर्तिमान् हो गये और उन्होंने भगवान् भास्करके दिव्य मण्डलमें प्रवेश किया*। (अध्याय २१०-२११)

  • महर्षि कौथुमि एक वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। सामवेद-संहिताकी कौथुमी शाखा अत्यन्त प्रसिद्ध है और इस समय वही प्राप्त है। उसके द्रष्टा ऋषि यही हैं। ये प्राच्य सामग भी कहलाते हैं। शौनकीय चरणव्यूह-ग्रन्थमें सामवेदकी प्रायः एक हजार शाखाओंकी विस्तृत चर्चा है।

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२२८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मरिच-ससमी-व्रत-वर्णन

सुमन्तुजीने कहा—हे वीर! मैंने तुमको अर्कसम्पुटिका-व्रतकी संक्षिप्त विधि बतलायी। अब मरिच-ससमीका वर्णन कर रहा हूँ, इसमें मरिचका भक्षण किया जाता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिको उपवास रहकर सौर-धर्मकी विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये। 'ॐ वं फट्' यह महाबलशाली मन्त्र साक्षात् सूर्यस्वरूप ही है। इसका बारम्बार स्मरण एवं जप करनेसे मानव एक वर्षमें ही देवेश भगवान् भास्करका दर्शन प्राप्त कर लेता है और अन्तमें व्याधि तथा मृत्युसे मुक्त हो सूर्यलोकको प्राप्त करता है। व्रती आत्मशुद्ध्यर्थ मरिच-ससमीके दिन सौर-मन्त्रों एवं मुद्राओंसे हृदयादि अङ्गन्यास कर प्राणायाम आदि करे। भगवान्को अर्घ्य प्रदान करे। विविध पुष्पोंको अर्पित करे। स्नान कराये, नैवेद्य अर्पित करे। संयत होकर सूर्यमन्त्रोंका जप करे। व्योममुद्रा दिखाकर प्रदक्षिणा करे, हवन करे और हृदयमुद्रासे भगवानका विसर्जन करे। भगवान्के पूजन आदि कर्मोंमें तत्तद मुद्राओंको दिखाये। मुद्राओंके नाम इस प्रकार हैं—किंकिणी, व्योम, अस्त्र, पञ्चिनी, अर्किणी, ज्वालिनी, तेजनी, गभस्तिनी, शंखिनी, सूर्यवक्त्रा, सहस्रकिरण, उदया, मध्यमा, अस्तमनी, मालिनी, तर्जनी तथा कुम्भमुद्रा। इन मुद्राओंके

साथ जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उससे वे प्रसन्न हो जाते हैं। इस विधिसे ब्रह्मणे भगवान् सूर्यकी पूजा की थी। राजन्! तुम भी इस विधिसे भास्करकी पूजा करो। इस विधिसे जो सदा रविकी पूजा करता है, वह भगवान् सूर्यदेवके दिव्य धामको प्राप्त कर लेता है। नृप! इस विधिसे देवेशकी पूजा कर यथाशक्ति ब्राह्मणको विधिपूर्वक भोजन कराकर ससमीके दिन मन्त्रपूर्वक सूर्यका स्मरण करते हुए मौन होकर भोजन करे और भोजनसे पहले मरिचकी इस प्रकार प्रार्थना करे— ॐ खखोल्लेकाय स्वाहा। प्रीयतां प्रियसङ्गद्वो भव स्वाहा॥

ऐसा करनेसे व्रतीको प्रिय व्यक्तिका समागम उसी क्षण प्राप्त हो जाता है। यह मरिच-ससमी प्रियसंगमदायिनी और पुण्यको प्रदान करनेवाली तथा कामनाओंकी पूर्ति करनेवाली है। एक वर्षतक इस ससमी-व्रतका पालन करनेसे पुत्रादिकोंसे वियोग नहीं होता। इसलिये महाबाहो! इस प्रियदायिनी ससमीको तुम भी करो। देवराज इन्द्रने इस मरिच-सप्तमीको उपवास कर महाराज्ञी शचीका सङ्ग प्राप्त किया था। महाबलशाली राजा नलने भी इस ससमीको उपवास कर दमयन्तीको प्राप्त किया था और श्रीरामने भी इस ससमीके दिन उपवास कर भगवती सीताको प्राप्त किया था।

(अध्याय २१२—२१४)

निम्ब-ससमी तथा फलससमी-व्रतका वर्णन

सुमन्तुजीने कहा—हे वीर! अब मैं तृतीय निम्ब-ससमी (वैशाख शुक्ला ससमी)-की विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें। इसमें निम्ब-पत्रका सेवन किया जाता है। यह ससमी सभी तरहके व्याधियोंको हरनेवाली है। इस दिन हाथमें शार्ङ्गधनुष, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किये हुए

भगवान् सूर्यका ध्यान कर उनकी पूजा करनी चाहिये। भगवान् सूर्यका मूल मन्त्र है—'ॐ खखोल्लेकाय नमः'। 'ॐ आदित्याय विद्महे विश्वभागाय धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥' यह सूर्यका गायत्री-मन्त्र है।

पूजामें सर्वप्रथम समाहित-चित्त होकर प्रयत्नपूर्वक

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