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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

५६ स्वक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश स्वक्षेत्री अर्थात् अपनी राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। स्वक्षेत्रस्थ 'सूर्य' स्वक्षेत्रस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' स्वक्षेत्री (सिंह राशि का) हो, वह सुन्दर, सुखी, ऐश्वर्यवान्, पराक्रमी, व्यभिचारी, निरन्तर उद्योग तथा परिश्रम करने वाला, धैर्यवान, साहसी, तेजस्वी तथा अत्यन्त उग्रस्वभाव का होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' स्वक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्र' स्वक्षेत्री (कर्क राशि का) हो, वह सुन्दर, धनी, तेजस्वी, भाग्यवान्, विनम्र, साधु चरित्र, परोपकारी, दयालु, मनस्वी, यशस्वी तथा सहृदय होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'मंगल' स्वक्षेत्रस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' स्वक्षेत्री (मेष अथवा वृश्चिक राशि का) हो, वह साहसी, बलवान, यशस्वी, कृषक, भूस्वामी अथवा सैनिक, धनी तथा मध्यम स्वभाव वाला होता है।

५७ स्वक्षेत्रस्थ 'बुध' स्वक्षेत्रस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' स्वक्षेत्री (कन्या अथवा मिथुन राशि का) हो, वह विद्वान्, बुद्धि- मान्, सम्पादक, शास्त्रज्ञ, लेखक तथा अनेक कलाओं का ज्ञाता होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'गुरु' स्वक्षेत्रस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' स्वक्षेत्री (धनु अथवा मीन राशि का) हो, वह सुखी, शास्त्रज्ञ, वैद्य, काव्य-प्रेमी, कवि, विद्वान्, आत्मबली तथा धनवान होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'शुक्र' स्वक्षेत्रस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' स्वक्षेत्री (वृष अथवा तुला राशि का) हो, वह विद्वान्, गुणी, विचारक, धनवान्, स्वतन्त्र प्रकृति का, कृषि-सम्बन्धी व्यवसाय करने वाला तथा सुन्दर होता है। स्वक्षेत्रस्थ 'शनि' स्वक्षेत्रस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' स्वक्षेत्री (मकर अथवा कुम्भ राशि का) हो, वह पराक्रमी, कष्ट- सहिष्णु, उग्र स्वभाववाला, सुन्दर नेत्रोंवाला, यशस्वी तथा लोकप्रिय होता है।

५८ स्वक्षेत्रस्थ 'राहु' स्वक्षेत्रस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली से 'राहु' स्वक्षेत्री (कन्या राशि का) हो, वह सुन्दर, यशस्वी तथा भाग्य- वान् होता है । स्वक्षेत्रस्थ 'केतु' स्वक्षेत्रस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' स्वक्षेत्री (मिथुन राशि का) हो, वह धैर्यवान्, कष्ट-सहिष्णु, कर्मठ, चिन्ताशील तथा गुप्त-युक्तियों वाला होता है। मित्र क्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश अपने मित्रग्रह की राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्ना- नुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए । मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य' मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य' जिस जातक की कुण्डली में 'सूर्य' अपने मित्रग्रहों (चन्द्रमा, मंगल अथवा गुरु) की राशि (कर्क, मेष, धनु, वृश्चिक अथवा मीन) में स्थित हो, वह व्यवहारकुशल, यशस्वी, दानी, सौभाग्यवान्, शास्त्रज्ञ, सुप्रसिद्ध तथा दृढ़मैत्री करने वाला होता है ।

५६ मित्रक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' मित्रक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा' अपने मित्रग्रहों (सूर्य अथवा बुध) की राशि (सिंह, कन्या अथवा मिथुन) में बैठा हो, वह सुखी, धनी, गुणी, चतुर तथा भाग्यवान होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'मंगल' मित्रक्षेत्रस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' अपने मित्र ग्रहों (सूर्य, चन्द्र अथवा गुरु) की राशि (सिंह, कर्क, धनु अथवा मीन) में बैठा हो, वह धनी, मित्र-प्रेमी, तेजस्वी, पराक्रमी, शक्तिशाली, शस्त्र द्वारा जीविकोपार्जन करने वाला तथा उग्र स्वभाव वाला होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'बुध' मित्रक्षेत्रस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' अपने मित्रग्रहों (सूर्य अथवा शुक्र) की राशि (सिंह, वृष अथवा तुला) में बैठा हो, वह शास्त्रज्ञ, विनोदी-स्वभाव का, कार्यदक्ष, सुन्दरस्वरूप वाला, यशस्वी, ज्ञानी तथा धनवान् होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'गुरु' मित्रक्षेत्रस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' अपने जिस ग्रहों (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह सुखी, उन्नतिशील, बुद्धिमान, प्रसिद्ध यशस्वी, सत्कर्म करने वाला तथा श्रेष्ठ लोगों द्वारा पूजित होता है।

६० मित्रक्षेत्रस्थ 'शुक्र' मित्रक्षेत्रस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' अपने मित्र ग्रहों (बुध अथवा शनि) की राशि (कन्या, मिथुन, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह सुखी, गुणी, सन्ततिवान्, धनवान् तथा बन्धु-बान्धवों को प्रिय होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'शनि' मित्रक्षेत्रस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' अपने मित्र ग्रहों (बुध अथवा शुक्र) की राशि (कन्या, मिथुन, वृष अथवा तुला) में बैठा हो, वह सुखी, धनी, परान्न- भोजी, प्रेमी-स्वभाव का, कुकर्म करने वाला तथा कभी- कभी दुःख पाने वाला होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'राहु' मित्रक्षेत्रस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' अपने मित्र ग्रहों (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह धनी, गुप्त योजना- कर्ता, सुखी, मिथ्यावादी, बुद्धिमान, पराक्रमी, साहसी तथा कुकर्म-रत होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'केतु' मित्रक्षेत्रस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' अपने मित्र ग्रहों (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह भ्रमणशील, दुःखी तथा परोपकारी होता है।

६१ शत्रुक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश अपने शत्रु की राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्ना- नुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। लग्न लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। जिस जातक की जन्मकुण्डली में जितने अधिक ग्रह शत्रुक्षेत्री होते हैं, वह उतना ही दुःखी, दरिद्र, भाग्यहीन, चिन्तित तथा निराश रहता है। यदि तीन या इससे अधिक ग्रह शत्रुक्षेत्री हों, तो वह जीवनभर दुःखी रहकर अन्तिम भाग में सुख पाता है।

शत्रुक्षेत्रस्थ 'सूर्य' शत्रुक्षेत्रस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' अपने शत्रु (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह सदैव दुःख पाने वाला, नौकरी करने वाला, विषयों से पीड़ित तथा नीच स्वभाव का होता है।

शत्रुक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' शत्रुक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा' अपने शत्रु (राहु अथवा केतु) की राशि (कन्या अथवा मिथुन) में बैठा हो, वह हृदयरोगी तथा अपनी माता के कारण दुःख पाने वाला होता है।

शत्रुक्षेत्रस्थ 'मंगल' शत्रुक्षेत्रस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' अपने शत्रु (बुध) की राशि (मिथुन अथवा कन्या) में बैठा हो, वह विकलांग, व्याकुल, दीन-मलीन तथा स्त्रियों के वश में रहने वाला होता है।

६२ शत्रुक्षेत्रस्थ 'बुध' शत्रुक्षेत्रस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' अपने शत्रु ग्रह (चन्द्रमा) की राशि (कर्क) में बैठा हो, वह सामान्य सुख पाने वाला, वासनाशील, कर्त्तव्यहीन, दुःखी, मूर्ख परन्तु अपनी बात का धनी होता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'गुरु' शत्रुक्षेत्रस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' अपने शत्रु (शुक्र अथवा बुध) की राशि (वृष, तुला, कन्या अथवा मिथुन) में बैठा हो, वह भाग्यशाली, क्रोधी, चतुर, क्षुधातुर तथा अपनी आजीविका को स्वयं ही नष्ट कर लेने वाला होता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'शुक्र' शत्रुक्षेत्रस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' अपने शत्रु (बुध अथवा चन्द्रमा) की राशि (सिंह अथवा कर्क) में बैठा हो, वह दास्य-वृत्ति (नौकरी) करके अपनी आजी- विका का उपार्जन करने वाला, दुःखी तथा दुर्बुद्धि होता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'शनि' शत्रुक्षेत्रस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' अपने शत्रु (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह किसी-न-किसी कारण से निरंतर चिन्तित एवं दुःखी बना रहने वाला, मलिन-हृदय वाला, रोगी तथा धनहीन होता है।

६३ शत्रुक्षेत्रस्थ 'राहु' शत्रुक्षेत्रस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' अपने शत्रु (सूर्य, चन्द्र, अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह शत्रुक्षेत्री शनि जैसा फल प्राप्त करता है। सूर्य अथवा चन्द्रमा की राशि पर बैठा हो तो उनके प्रभाव को अधिक हानि पहुँचाता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'केतु' शत्रुक्षेत्रस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' अपने शत्रु (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह शत्रुक्षेत्री शनि जैसा फल प्राप्त करता है। सूर्य अथवा चन्द्रमा की राशि पर बैठा हो तो उनके प्रभाव में बहुत कमी ला देता है। नीच राशिस्थ ग्रहों का फलादेश नीच राशिस्थ विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। जिस जातक की जन्मकुण्डली में जितने अधिक ग्रह नीच राशिस्थ होते हैं, वह उतना ही अशुभ फल प्राप्त करता है। यदि तीन या अधिक ग्रह नीच राशि के हों तो वह जातक मूर्ख होता है। नीचराशिस्थ 'सूर्य' नीचराशिस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' नीच राशि (तुला) का हो, वह बन्धु-सेवी, पाप कर्म करने वाला, कटुभाषी, आत्म-बलहीन, किसी पर विश्वास न करने वाला, अल्पकेशी तथा विकृत दांतों वाला होता है।

?" Let's check if there is any other word: ढोल? No. बाजा? If an OCR program read it, it would read वाला. Wait, what if the book author meant: "नाचने तथा बजाने वालों की संगति करने वाला" and accidentally wrote "वाला बजाने वालों"? Wait! "नाचने तथा वाला बजाने वालों" -> "नाचने वाला तथा बजाने वालों"! YES! LOOK AT THAT! "नाचने वाला तथा बजाने वालों" -> The typesetter swapped "तथा" and "वाला"! "नाचने तथा वाला बजाने वालों" = "नाचने वाला तथा बजाने वालों की संगति करने वाला होता है।"! OF COURSE! "नाचने वाला तथा बजाने वालों की संगति करने वाला होता है।" The typesetter wrote: "नाचने तथा वाला बजाने वालों की संगति करने वाला होता है।" That completely explains why the word is वाला! It is 100% वाला! Because the original sentence was: "नाचने वाला तथा बजाने वालों की संगति..." or the typesetter swapped them! Mystery solved! It is definitely printed as वाला. So transcribing it as वाला is 100% accurate to the printed text: नाचने तथा वाला बजाने वालों की संगति करने वाला

Now let's check every single word in the text to ensure 100% precision:

६५ नीचराशिस्थ 'शुक्र' नीचराशिस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' नीचराशि (कन्या) का हो, वह किसी-न-किसी कारणवश निरन्तर दुःखी बना रहने वाला, विनोदी, कौतुकी, चतुर, पंडित तथा सब कलाओं में कुशल होता है। नीचराशिस्थ 'शनि' नीचराशिस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' नीचराशि (मेष) का हो, वह स्वतन्त्र-विचारक, बन्धु-बान्धवों से युक्त, स्वेच्छाचारी, दृढ़ शरीर बाला, उच्च अधिकारी, ग्राम आदि का अधिपति, सुखी, सुन्दर तथा चंचल स्वभाव का होता है। मतान्तर से वह दुःख एवं दरिद्रता भी भोगता है। नीचराशिस्थ 'राहु' नीचराशिस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' नीचराशि (धनु, मतान्तर से वृश्चिक) का हो, वह कुरूप, पापी, दुर्बुद्धि, बन्धु-बान्धवों से हीन, खल तथा दुष्ट हृदय वाला होता है। नीचराशिस्थ 'केतु' नीचराशिस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' नीचराशि (मिथुन, मतान्तर से वृष) का हो तो वह सुशील, दुःखी, काना, कामी, शत्रुजयी तथा स्त्री-विहीन होता है।

६६ ग्रहों का दृष्टि-सम्बन्ध और स्थान-सम्बन्ध ग्रहों के दृष्टि सम्बन्ध दो प्रकार के होते हैं—(१) सामान्य दृष्टि सम्बन्ध और (२) पारस्परिक दृष्टि सम्बन्ध । इनके विषय में नीचे लिखे अनुसार समझना चाहिए— सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध जब कोई ग्रह अपने स्थान से किसी अन्य स्थान (भाव) को देखता है अथवा उस स्थान (भाव) में बैठे हुए किसी ग्रह को देखता है तो उसे 'सामान्य दृष्टि- सम्बन्ध' कहा जाता है । उदाहरण कुण्डली में एकादश भाव में बैठा हुआ शनि अपने स्थान से दसवें अष्टम भाव में बैठे हुए गुरु को देख रहा है, अतः इसे गुरु के साथ शनि का 'सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध' कहा जाएगा । इसी प्रकार अन्य ग्रहों के 'सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध' के विषय में भी समझ लेना चाहिए । कौन-सा ग्रह अपने स्थान से किन-किन भावों को किन दृष्टियों से देखता है, इस विषय का वर्णन पहले ही किया जा चुका है । पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध जब कोई दो ग्रह अलग-अलग भावों में बैठे हुए एक दूसरे के ऊपर अपनी दृष्टि डालते हैं तो उसे उन ग्रहों का 'पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध' कहा जाता है । उदाहरण कुण्डली में लग्न में बैठा हुआ मंगल सप्तम भाव में बैठे हुए शनि पर अपनी पूर्ण दृष्टि डाल रहा है तथा सप्तम भाव में बैठा हुआ शनि लग्न में बैठे हुए मंगल को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है । अतः यह दोनों ग्रहों का पारस्परिक दृष्टि- सम्बन्ध हुआ । इसी प्रकार अन्य ग्रहों के बारे में भी समझ लेना चाहिए । स्थान सम्बन्ध स्थान-सम्बन्ध जब कोई दो ग्रह अलग-अलग एक दूसरे के स्थान (भाव) में बैठे हों, तो उसे उन ग्रहों का 'स्थान-सम्बन्ध' कहा जाएगा । उदाहरण कुण्डली में चन्द्रमा की कर्क राशि में शुक्र बैठा है तथा शुक्र की वृष राशि में चन्द्रमा बैठा है । इस प्रकार ये दोनों ग्रह एक-दूसरे के स्थान में बैठे हैं ।

६७ फलतः इनमें 'स्थान-सम्बन्ध' हो गया । इसी भाँति अन्य ग्रहों के 'स्थान-सम्बन्ध' के बारे में भी समझ लेना चाहिए । ग्रहों का जातक के जीवन पर प्रभाव उक्त 'सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध', 'पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध' तथा 'स्थान- सम्बन्ध' के कारण ग्रह अपने गुण-कर्म-स्वभाव आदि का एक दूसरे से मिलकर, जातक के जीवन पर प्रभाव डालते हैं । तात्पर्य यह कि ऐसे सम्बन्धों से एक ग्रह का स्वभाव दूसरे में सम्मिलित हो जाता है । ऐसी स्थिति में, यदि दोनों ग्रह परस्पर 'मित्र' हुए तो वे जातक के जीवन पर अपना विशेष प्रभाव प्रदर्शित करेंगे, यदि 'शत्रु' हुए तो एक-दूसरे के विपरीत प्रभाव डालेंगे, और यदि 'सम' हुए तो संयुक्त सामान्य-प्रभाव डालेंगे । ग्रहों के उक्त पारस्परिक सम्बन्धों का विचार करते समय उनकी उच्च-नीच, स्वक्षेत्री, शत्रुक्षेत्री आदि स्थितियों पर भी विचार करना आवश्यक है । उन सबके समन्वय स्वरूप जो निष्कर्ष निकलेगा, वही सच्चा फलादेश होगा । लग्न और राशि जन्मकुण्डली में द्वादश भाव होते हैं। जातक के जन्म के समय जो राशि आकाशमण्डल में दिखाई दे रही होती है, उसी को 'लग्न' मान कर कुण्डली के प्रथम भाव में स्थापित किया जाता है, शेष राशियों को क्रमशः उससे आगे के भावों में स्थापित किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी जातक का जन्म आकाशमण्डल में सिंह राशि के दिग्दर्शन के समय हुआ तो सिंह राशि के सूचक अंक ५ को जन्म- कुण्डली के प्रथम भाव में लिखा जाएगा और वह कहा जाएगा कि जातक का जन्म सिंह लग्न में हुआ है । उसी समय भचक्र में चन्द्रमा यदि सिंह राशि में ही भ्रमण कर रहा होगा तो चन्द्रमा को भी कुंडली के पहले भाव अर्थात् लग्न वाले खाने में ही लिखा जाएगा और यह कहा जाएगा कि जातक का जन्म सिंह लग्न तथा सिंह राशि में ही हुआ है । परन्तु यदि चन्द्रमा उस समय भचक्र की तुला राशि में भ्रमण कर रहा होगा तो चन्द्रमा की कुंडली के तीसरे खाने अर्थात् अंक ७ वाली जगह में लिखा जायगा और यह कहा जायगा कि जातक का जन्म सिंह लग्न में तथा तुला राशि में हुआ है । लग्न और राशि के इस अन्तर को खूब अच्छी तरह समझ लेना चाहिए । जातक की जन्मकुंडली के प्रथम भाव में जिस राशि का अंक होगा, उसे जातक की 'लग्न' कहा जाएगा तथा जिस भाव में चन्द्रमा की स्थिति होगी, उसे जातक की 'राशि' कहा जाएगा ।

६८ आगे १२ उदाहरण कुण्डलियों के माध्यम से यह बताया गया है कि विभिन्न लग्नों की कुंडलियों का स्वरूप कैसा होता है। कुण्डली में कौन-सा ग्रह कहाँ बैठेगा, इसका निर्णय जातक के जन्म के समय तथा उस समय भचक्र में विभिन्न ग्रहों की स्थिति के अनुसार पञ्चांग के आधार पर किया जाता है। इस विषय के सम्यक्-ज्ञान के लिए या तो किसी ज्योतिषी से सम्पर्क करना चाहिए अथवा हमारी लिखी पुस्तक 'ज्योतिष शास्त्र' का अध्ययन करना चाहिए। 'मेष' लग्न की कुण्डली 'वृष' लग्न की कुण्डली [चित्र: मेष लग्न कुण्डली] [चित्र: वृष लग्न कुण्डली] 'मिथुन' लग्न की कुण्डली 'कर्क' लग्न की कुण्डली [चित्र: मिथुन लग्न कुण्डली] [चित्र: कर्क लग्न कुण्डली] 'सिंह' लग्न की कुण्डली 'कन्या' लग्न की कुण्डली [चित्र: सिंह लग्न कुण्डली] [चित्र: कन्या लग्न कुण्डली]

६६ 'तुला' लग्न की कुण्डली 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली 'धनु' लग्न की कुण्डली 'मकर' लग्न की कुण्डली 'कुम्भ' लग्न की कुण्डली 'मीन' लग्न की कुण्डली विभिन्न राशियों की कुण्डली के स्वरूप को नीचे प्रदर्शित उदाहरण कुण्डलियों के आधार पर समझ लेना चाहिए। ये सभी कुण्डलियां मेष लग्न की हैं, परन्तु इनमें 'चन्द्रमा' की स्थिति को अलग-अलग भावों में दिखाया गया है। जिस कुण्डली के जिस भाव में चन्द्रमा बैठा है उस भाव में स्थित राशि ही जातक की जन्मकालीन 'राशि' मानी जायेगी। इन कुण्डलियों के आधार पर अन्य लग्न वाली कुण्डलियों से भी राशि का निश्चय किया जा सकता है।

७० 'मेष' राशि की कुण्डली १ (चं.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ 'वृष' राशि की कुण्डली १, २ (चं.), ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ 'मिथुन' राशि की कुण्डली १, २, ३ (चं.), ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ 'कर्क' राशि की कुण्डली १, २, ३, ४ (चं.), ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ 'सिंह' राशि की कुण्डली १, २, ३, ४, ५ (चं.), ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ 'कन्या' राशि की कुण्डली १, २, ३, ४, ५, ६ (चं.), ७, ८, ९, १०, ११, १२ 'तुला' राशि की कुण्डली १, २, ३, ४, ५, ६, ७ (चं.), ८, ९, १०, ११, १२ 'वृश्चिक' राशि की कुण्डली १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८ (चं.), ९, १०, ११, १२

७१ 'धनु' राशि की कुण्डली 'मकर' राशि की कुण्डली [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), नवम भाव में धनु (९) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), दशम भाव में मकर (१०) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] १०७ १०८ 'कुम्भ' राशि की कुण्डली 'मीन' राशि की कुण्डली [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), एकादश भाव में कुम्भ (११) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), द्वादश भाव में मीन (१२) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] १०९ ११० स्थानाधिपति जातक की जन्मकुण्डली में जो राशि जिस स्थान (भाव या खाने) में स्थित होती है, उस राशि का स्वामी ग्रह ही उस स्थान भाव का अधिपति अर्थात् 'स्थाना- धिपति' होता है। जैसे—किसी कुण्डली के चतुर्थभाव में सिंह राशि (५) स्थित है तो सिंह राशि के स्वामी 'सूर्य' को ही उस स्थान अर्थात् भाव का अधिपति अर्थात् 'सुखेश' माना जायेगा, फिर चाहे वह सूर्य कुण्डली के अन्य किसी भी भाव में स्थित क्यों न हो। मान लीजिए कि वह चतुर्थभाव में न रह कर दशमभाव में बैठा है तो यह कहा जायेगा कि 'चतुर्थेश या सुखेश राज्य अर्थात् दशमभाव में चला गया है।' इसी प्रकार सब भावों, राशियों तथा ग्रहों के सम्बन्ध में समझ कर किस भाव का स्थानाधिपति कहाँ बैठा है, इसकी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। स्थानाधिपतियों के नाम विभिन्न भावों के स्वामियों को निम्नलिखित नामों से पुकारा जाता है : १. प्रथम भाव के स्वामी को—प्रथमेश, लग्नेश, देहाधीश । २. द्वितीयभाव के स्वामी को—द्वितीयेश, धनेश, द्रव्येश । ३. तृतीयभाव के स्वामी को—तृतीयेश, सहजेश, पराक्रमेश ।

७२ ४. चतुर्थभाव के स्वामी को—चतुर्थेश, सुखेश, सुहृदेश । ५. पंचमभाव के स्वामी को—पंचमेश, सन्तानेश, विद्येश । ६. षष्ठ भाव के स्वामी को—षष्ठेश, द्वेषेश, शत्र्वेश । ७. सप्तमभाव के स्वामी को—सप्तमेश, जायेश, मदनेश । ८. अष्टमभाव के स्वामी को—अष्टमेश, जीवनेश, कालेश । ९. नवमभाव के स्वामी को—नवमेश, भाग्येश, धर्मेश । १०. दशमभाव के स्वामी को—दशमेश, राज्येश, कर्मेश । ११. एकादशभाव के स्वामी को—एकादशेश, लाभेश, उत्तमेश । १२. द्वादशभाव के स्वामी को—द्वादशेश, व्ययेश, दण्डेश । विशिष्ट ज्ञातव्य-विषय १. भावों की गणना लग्न से आरंभ की जाती है। लग्न को पहला भाव (घर) मान कर क्रमशः उसके बाईं ओर को गिनते हुए द्वादश भावों की गणना करनी चाहिए। लग्न कोई भी क्यों न हो, इससे क्रमिक-गणना में कोई अन्तर नही आता। २. जन्मकुण्डली के द्वादश भावों में स्थित विभिन्न राशियों के भावों की उनके लिए निश्चित अंकों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। जैसे—मेष के लिए १, वृष के लिए २, मिथुन के लिए ३, कर्क के लिए ४, सिंह के लिए ५, कन्या के लिए ६, तुला के लिए ७, वृश्चिक के लिए ८, धनु के लिए ९, मकर के लिए १०, कुम्भ के लिए ११ और मीन के लिए १२। ३. उच्चस्थ, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री अथवा उच्चक्षेत्र एवं स्वक्षेत्र पर दृष्टि डालने वाले ग्रह जिस स्थान पर बैठे होते हैं अथवा जहां दृष्टि डालते हैं, उस स्थान के फल की वृद्धि करते हैं। यथा— 'सूर्य' सिंह, मेष, वृश्चिक, धनु अथवा मीन राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो। 'चन्द्रमा' कर्क, वृष, सिंह, मिथुन अथवा कन्या राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो। 'मंगल' मेष, वृश्चिक, मकर, सिंह, कर्क, धनु अथवा मीन राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो। 'बुध' मिथुन, कन्या, सिंह, वृष अथवा तुला राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो। 'गुरु' धनु, मीन, कर्क, सिंह, मेष अथवा वृश्चिक राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो 'शुक्र' वृष, तुला, मीन, कन्या, मिथुन, मकर अथवा कुंभ राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो।

७३ 'शनि' मकर, कुम्भ, तुला, कन्या, मिथुन, वृष अथवा तुला राशि पर बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो। 'राहु' मिथुन (मतान्तर से वृष) राशि पर बैठा हो, अथवा लग्न से तीसरे, छठे अथवा ग्यारहवें में से किसी भी ऐसे स्थान में बैठा हो, जहाँ धनु राशि न हो। 'केतु' धनु (मतान्तर से वृश्चिक) राशि पर बैठा हो अथवा लग्न से तीसरे, छठे अथवा ग्यारहवें में से किसी भी ऐसे स्थान में बैठा हो, जहाँ मिथुन राशि न हो। केन्द्र अर्थात् पहले, चौथे, सातवें एवं दसवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह विशेष शक्तिशाली होने के कारण अपना पूर्ण प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। ५. त्रिकोण अर्थात् पांचवें एवं नवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक के धन की वृद्धि करते हैं। ६. दूसरे तथा ग्यारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक के धन की वृद्धि करते हैं। विशेषतः ग्यारहवें भाव में बैठा हुआ प्रत्येक ग्रह विशेष लाभकारी होता है। ७. तृतीय भाव में बैठे हुए ग्रह जातक के पराक्रम की बढ़ाते हैं। ८. प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम तथा एकादश भाव में बैठे हुए ग्रह उत्तम फल देते हैं। ६. षष्ठ, अष्टम तथा द्वादश भाव में बैठे हुए ग्रह जातक के लिए कठिनाइयों उपस्थित करते हैं। १०. लग्न से तीसरे, छठे तथा ग्यारहवें भाव में क्रूर ग्रहों—शनि, केतु का बैठना शक्ति एवं शुभफल देने वाला होता है। ११. ग्यारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह शुभफल देते हैं। १२. आठवें तथा बारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक को थोड़ी-बहुत हानि अवश्य पहुँचाते हैं। १३. जिस भाव का जो ग्रह कारक माना गया है, वह यदि अकेला उसी भाव में बैठा हो तो उस भाव को बिगाड़ देता है। १४. जिस भाव का स्वामी उच्च राशिस्थ, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री अथवा मूल त्रिकोण स्थित होता है, उस भाव का शुभ फल प्राप्त होता है। १५. जिस भाव में शुभ ग्रह बैठा हो, उसका फल उत्तम होता है तथा जिसमें पाप ग्रह बैठा हो, उसके शुभ फल की हानि पहुँचती है। १६. जो ग्रह सूर्ये के बराबर अथवा उमके निकटवर्ती अंशों पर होता है, उसे 'पूर्ण अस्त' माना जाता है। जो ग्रह सूर्य से ८ अंश की दूरी पर होता है, उसे 'आधा अस्त' माना जाता है तथा जो ग्रह सूर्य के 15 अंश की दूरी पर होता है उसे 'पूर्ण उदय'. माना जाता है।

७४ पूर्ण उदय ग्रह पूर्ण प्रभाव देता है, आधा अस्त ग्रह आधा प्रभाव देता है तथा पूर्ण अस्त ग्रह प्रभावहीन होता है । १७. जिस भाव का अधिपति किसी शुभग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो, अथवा जिस भाव में शुभ ग्रह बैठा हो अथवा जिस भाव को शुभग्रह देख रहा हो, उसका फल शुभ होता है । १८. जिस भाव में कोई पाप ग्रह बैठा हो अथवा उस भाव के अधिपति के साथ कोई पाप ग्रह बैठा हो अथवा उस भाव या उस भाव के अधिपति पर पाप ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो तो उसका फल अशुभ होता है । १९. किसी भाव का स्वामी पाप ग्रह हो और वह लग्न से तृतीय स्थान में बैठा हो तो शुभ फल देगा, परन्तु किसी भाव का स्वामी शुभ ग्रह हो और वह उस भाव से तीसरे स्थान पर बैठे तो मध्यम फल देगा । २०. जिस भाव में उसका अधिपति ग्रह अथवा शुक्र, बुध या गुरु में से कोई बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि पड़ रही हो अथवा वह अपने भाव के स्वामी के अतिरिक्त किसी अन्य ग्रह संयुक्त अथवा दृष्ट न हो तो वह शुभ फल देनेवाला सिद्ध होगा । २१. आठवें भाव में जो राशि हो, उसका स्वामी जिस भाव में बैठा होता है, उसे बिगाड़ देता है । २२. राहु, केतु जिस भाव में रहते हैं, उसे बिगाड़ देते हैं । २३. चन्द्रमा, बुध, शुक्र, केतु तथा गुरु—ये सब क्रमशः एक दूसरे से अधिक शुभ ग्रह हैं । ये ग्रह यदि अपनी राशियों में बैठे हों तो अधिक शुभ फल देते हैं और यदि पाप ग्रहों (सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु) की राशि में बैठे हों तो अल्प शुभ फल देते हैं । स्मरणीय है कि फल का विचार करते समय केतु को प्रायः पापग्रह माना जाता है, परन्तु वैसे केतु की गणना शुभ ग्रहों में की जाती है । २४. सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु—ये सब क्रमशः एक दूसरे से अधिक पाप ग्रह हैं । ये ग्रह यदि अपनी राशि में बैठे हों तो अधिक शुभ फल देते हैं । यदि अपने मित्र की राशि, अपनी उच्च राशि अथवा किसी शुभ ग्रह की राशि में बैठे हों तो न्यून मात्रा में अशुभ फल देते हैं । २५. राहु जिसे अशुभ फल देता है, केतु उसे शुभ फल देता है तथा केतु जिसे अशुभ फल देता है, राहु उसे शुभ फल देता है—यह इन दोनों ग्रहों की एक विशिष्टता है । २६. आठवें भाव का अधिपति अर्थात् अष्टमेश जिस भाव में बैठा होता है, उस भाव को बिगाड़ता है । २७. राहु-केतु जिस भाव में बैठे होते हैं, उसे बिगाड़ देते हैं ।

७६ दैनिक ग्रहगोचर का प्रभाव जन्मकुण्डली जातक के जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति की परिचायक होती है तथा उन ग्रहों की स्थिति का जातक के जीवन पर स्थायी प्रभाव पड़ता रहता है, परन्तु आकाशमण्डल में विभिन्न ग्रह निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं जिनका तात्कालिक-अस्थायी प्रभाव भी जातक के दैनिक-जीवन पर पड़ता रहता है। इस प्रकार प्रत्येक ग्रह प्रत्येक प्राणी के जीवन पर अपना दो प्रकार से प्रभाव डालता है। अस्तु, स्थायी प्रभाव के साथ ही ग्रहों के अस्थायी प्रभाव का विचार करना भी आवश्यक होता है। दैनिक ग्रह गोचर में किस समय कौनसा ग्रह किस स्थान पर चल रहा है, इसका ज्ञान 'पंचांग' द्वारा प्राप्त किया जाता है। इस विषय की जानकारी किसी ज्योतिषी से पूछ कर, अथवा एतद् विषयक हमारी अन्य पुस्तकों का अध्ययन करके प्राप्त की जा सकती है। इस पुस्तक के द्वितीय खण्ड में जन्मकुण्डली के जिस भाव तथा राशि में स्थित स्थायी ग्रहों के जिस फलादेश का उल्लेख किया गया है, दैनिक ग्रहगोचर कुण्डली के विभिन्न भावों तथा राशियों में स्थित विभिन्न ग्रहों का फलादेश भी ठीक वैसा ही होता है। किस दिन, मास अथवा वर्ष में दैनिक ग्रह गोचरस्थ ग्रहों का फलादेश किस उदाहरण कुण्डली द्वारा ज्ञात करना चाहिए, इसका उल्लेख द्वितीय खण्ड में प्रत्येक लग्न की उदाहरण-कुण्डलियों का फलादेश आरम्भ करने से पूर्व ही कर दिया गया है। जन्म कुण्डलीस्थ ग्रह के स्थायी तथा दैनिक ग्रहगोचर के अस्थायी फलादेश के समन्वय स्वरूप जो भी निष्कर्ष निकले, उसी को सच्चा फलादेश समझना चाहिए। 'वर्ष कुण्डली' स्थित ग्रहों के फलादेश का ज्ञान भी जन्मकुण्डली स्थित ग्रहों के फलादेश की भाँति इसी पुस्तक की सहायता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। वर्षकुण्डली स्थित 'मुंथा' एवं 'वर्षेश' के विशिष्ट फलादेश के विषय में किसी ज्योतिषी द्वारा जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। अथवा हमारी लिखी पुस्तक 'वर्षकुण्डली फल विचार' का अध्ययन करना चाहिए। सम्मिलित परिवार का फलादेश सम्मिलित परिवार होने पर उस परिवार के सभी सदस्यों की जन्मकुण्डली के ग्रहों का थोड़ा-बहुत प्रभाव एक दूसरे पर पड़ता रहता है। अतः सम्मिलित-परिवार के किसी सदस्य के विषय में ग्रहों का फलादेश ज्ञात करते समय यदि उस परिवार के अन्य सदस्यों की जन्मकुण्डलियों का भी सम्यक् अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला जाय तो उचित रहेगा। इस पुस्तक की सहायता से किसी भी स्त्री, पुरुष, बालक, युवा अथवा वृद्ध मनुष्य की जन्मकुण्डलीस्थ ग्रहों के शुभाशुभ प्रभाव की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त की जा सकती है।