भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२६५ 'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ६६१ से ७६८ के बीच देखना चाहिए । गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए । 'कन्या' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६६१ से ६७२ के बीच देखना चाहिए । २—'कन्या' लग्न वालों को अपनी गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६६१ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६६२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६६३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६६४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६६५ (ख) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६६६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६६७ (ख) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६६८ (क) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६६९ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६७० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६७१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६७२ 'कन्या' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १

२६६ २—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६७३ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६७४ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६७५ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६७६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६७७ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६७८ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६७९ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६८० (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६८१ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६८२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६८३ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६८४ 'कन्या' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६८५ से ६९६ के बीच देखना चाहिए। २—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६८५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६८६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६८७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६८८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६८९ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६९० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६९१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६९२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६९३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६९४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६९५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६९६

२९७ 'कन्या' लग्न में 'बुध' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६९७ से ७०८ के बीच देखना चाहिए। २—'कन्या' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६९७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६९८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६९९ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७०० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७०१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७०२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७०३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७०४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७०५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७०६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७०७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७०८ 'कन्या' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७०९ से ७२० के बीच देखना चाहिए। २—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७०९ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७१० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७११

२६८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७१२ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७१३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७१४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७१५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७१६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७१७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७१८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७१६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७२० 'कन्या' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुंडली संख्या ७२१ से ७३२ के बीच देखना चाहिए । २—'कन्या' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७२१ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७२२ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७२३ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७२४ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७२५ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७२६ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७२७ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७२८ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७२९ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७३० (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७३१ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७३२ 'कन्या' लग्न में 'शनि' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७३३ से ७४४ के बीच देखना चाहिए ।

२६६ २—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७३३ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७३४ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७३५ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७३६ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७३७ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७३८ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७३९ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७४० (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७४१ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७४२ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७४३ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७४४ 'कन्या' लग्न में 'राहु' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में 'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७४५ से ७५६ के बीच देखना चाहिए। २—'कन्या' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७४५ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७४६ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७४७ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७४८ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७४९ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७५० (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७५१ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७५२ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७५३ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७५४ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७५५ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७५६

३०० 'कन्या' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७५७ से ७६८ के बीच देखना चाहिए। २—'कन्या' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७५७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७५८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७५६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७६० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७६१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७६२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७६३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७६४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७६५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७६६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७६७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७६८ 'कन्या' लग्न में 'सूर्य' 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में जिस बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक दुर्बल शरीर वाला, खूब खर्च करने वाला तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। परन्तु कभी-कभी खर्च के कारण उसे परेशानी उठानी पड़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ हानि का सामना भी करना पड़ता है तथा असन्तोष भी बना रहता है।


कुण्डली विवरण (संख्या ६६१):

  • लग्न (प्रथम भाव): ६ (कन्या), सूर्य
  • द्वितीय भाव: ७ (तुला)
  • तृतीय भाव: ८ (वृश्चिक)
  • चतुर्थ भाव: ९ (धनु)
  • पंचम भाव: १० (मकर)
  • षष्ठ भाव: ११ (कुम्भ)
  • सप्तम भाव: १२ (मीन)
  • अष्टम भाव: १ (मेष)
  • नवम भाव: २ (वृष)
  • दशम भाव: ३ (मिथुन)
  • एकादश भाव: ४ (कर्क)
  • द्वादश भाव: ५ (सिंह)

३०१ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब की हानि होती है। बाहरी स्थानों से आर्थिक लाभ कम होता है, तथा खर्च के कारण परेशानी भी होती है। सातवीं दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की पुरातत्त्व तथा आयु का लाभ प्राप्त ६६२ होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ न्यूनता आती है। ऐसा व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा जीवन में सफलताएँ प्राप्त करता है तथा अत्यन्त हिम्मती और प्रभावशाली होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन सामान्य ढंग से व्यतीत होता है। ६६३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। उसे बाहरी स्थानों से सुख तथा खर्च के लिए धन प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने के कारण पिता, राज्य एवं व्यवसाय-पक्ष से भी कुछ असन्तोष रहता है। ६६४

३०२ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि तथा सन्तान में कमी रहती है तथा खर्च चलाने के लिए दिमाग में परेशानी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने के कारण सामान्य लाभ होता रहता है। ऐसा व्यक्ति चक्करदार बातें करने वाला तथा चंचल होता है। ६६४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रुओं से परेशान रहता है तथा अधिक खर्च करके ही उन पर प्रभाव स्थापित कर पाता है। वह परिश्रम द्वारा अपना खर्च चलाता है तथा बाहरी सम्बन्धों से सामान्य लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक बना रहता है। ६६५ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में कुछ हानि उठानी पड़ती है। बाहरी स्थानों से लाभ के अतिरिक्त हानि भी होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के जातक का शरीर दुर्बल होता है तथा वह स्वभाव से चंचल, क्रोधी एवं धन की ओर से चिन्तित बना रहने वाला होता है। ६६६

३०३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित उच्च 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु एवं पुरातत्त्व में कुछ कठिनाइयों के साथ वृद्धि होती है। खर्च की अधिकता एवं बाहरी संबंधों से लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन की हानि होती है एवं कौटुम्बिक सुख में कमी आती है। ऐसी गृह-स्थिति का जातक धन के विषय में बहुत चिन्तित बना रहता है। ६६८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कमी रहती है। ऐसे लोग प्रायः नास्तिक होते हैं। उन्हें बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख में कमी रहती है तथा पराक्रम की भी अधिक वृद्धि नहीं होती। ६६९ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं। खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी कुछ कमी बनी रहती है। ६७०

३०४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की पर्याप्त आमदनी होते हुए भी खर्च चलाने की चिन्ता बनी रहती है तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से लाभ, सुख तथा सम्मान मिलता है। सातवीं शत्रु दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि का क्षेत्र भी कमजोर रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ एवं सम्मान भी मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष एवं रोग आदि से काफी परेशानी होती है तथा खर्च भी अधिक होता है। फिर भी जातक अपना साहस बनाये रख कर शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित कर लेता है। 'कन्या' लग्न में 'चन्द्रमा' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की शारीरिक सौन्दर्य, प्रसन्नता एवं मनोबल का लाभ होता है। वह परिश्रम द्वारा धन तथा यश कमाता है और प्रभावशाली बनता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से सुन्दरी स्त्री मिलती है तथा स्त्री-पक्ष एवं व्यवसाय से यथेष्ट लाभ होता है।

३०५ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के धन-कुटुम्ब में वृद्धि होती है तथा धन का संचय भी होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से पुरातत्त्व एवं आयु में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, सम्पन्न तथा यशस्वी जीवन बिताता है। ६७४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में कमी आती है, धनोपार्जन में कठिनाइयां आती हैं तथा चिन्ताएं बनी रहती हैं। सातवीं उच्च दृष्टि से नवमभाव को देखने से परिश्रम द्वारा भाग्योन्नति होती है तथा धर्म-पालन में भी रुचि बनी रहती है। ६७५ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन आदि का पर्याप्त सुख प्राप्त होता है और सदैव प्रसन्न बना रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी यश, सम्मान, सफलता, उन्नति एवं प्रभाव की वृद्धि होती है। ६७६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की सन्तान तथा विद्या-बुद्धि पक्ष की वृद्धि होती है तथा उसी के द्वारा धन-लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादशभाव को देखने से आमदनी में भी वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति, सुखी जीवन बिताता है। ६७७

३०६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को शत्रु पक्ष द्वारा मानसिक अशान्ति बनी रहती है, परन्तु वह अपनी विनम्रता द्वारा शत्रु-पक्ष पर सफलता पाता है और उससे लाभ भी उठाता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी मिलता रहता है। ६७८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को सुन्दर पत्नी मिलती है, भोगादि के श्रेष्ठ साधन प्राप्त होते हैं तथा व्यवसाय में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, शक्ति एवं प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक सुन्दर, स्वस्थ, सुखी तथा सम्पन्न होता है। ६७९ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्यालग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की दीर्घायु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। आय के साधनों में कुछ कठिनाइयां आती हैं, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है। ६८०

३०७ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : चन्द्र नवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन का यथेष्ट लाभ होता है तथा आकस्मिक दैवी सहायताएँ भी मिलती रहती हैं। सातवीं नीच-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी आती है तथा पराक्रम की भी अधिक वृद्धि नहीं हो पाती। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को राज्य, पिता एवं व्यवसाय के पक्ष से पूर्ण लाभ तथा सम्मान मिलता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से भूमि, भवन तथा माता का सुख भी पर्याप्त मिलता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : 'चन्द्र ग्यारहवें भाव में स्वराशिस्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी रहती है और वह अपने मनोबल द्वारा पर्याप्त धन कमाता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या में कमी रहती है तथा सन्तानों से वैमनस्य रहता है, परन्तु वह अपनी चतुराई द्वारा अन्य क्षेत्रों में उन्नति करता रहता है।

३०८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से पर्याप्त लाभ भी होता है। खर्च के कारण कभी-कभी मन में चिन्ताएं बनी रहती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु- पक्ष में धन के खर्च एवं विनम्रता से सफलता मिलती है। बीमारी तथा अन्य झगड़ों में भी खर्च होता है। 'कन्या' लग्न में मंगल 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी आती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने से आयु की वृद्धि तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन संघर्षपूर्ण रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी आती है। परन्तु धन का लाभ होता है। चौथी उच्च दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में प्रयत्न करने से लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं शत्रु-दृष्टि से देखने से धर्म-पालन तथा भाग्योन्नति में कुछ कमियां बनी रहती हैं।

३०६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित व्ययेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में तो वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है। आयु तथा पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ होता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव के देखने से शत्रु- पक्ष पर प्रभाव रहता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवम- भाव को देखने से भाग्योन्नति तथा धर्म-पालन में कठिनाइयाँ आती हैं। आठवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक परिश्रम करने पर भी थोड़ी सफलता मिलती है तथा पिता का सुख भी कम ही रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन तथा भाई-बहिनों के सुख में कमी आती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ होता है। चौथी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ के मार्ग में रुकावटें आती हैं। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की कुछ कठिना- इयों के साथ सन्तान-पक्ष की शक्ति तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरा- तत्त्व की शक्ति बनती है। सातवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आय के मार्ग में कठिनाइयाँ आती हैं। आठवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा प्रभाव बढ़ता है।

३१० 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विजय पाता है। वह परिश्रमी तथा पुरुषार्थी होता है, परन्तु भाई- बहिनों में कुछ विरोध रहता है । आयु तथा पुरातत्त्व का अच्छा लाभ होता है । चौथी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य एवं धर्म के क्षेत्र में कमजोरी रहती है । सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है । आठवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक स्वास्थ्य में कमी तथा रक्त-विकार आदि रोग रहते हैं । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कष्ट मिलता है तथा आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है । पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिनों के सुख मे न्यूनाधिकता बनी रहती है । चौथी मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति होती है । सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथम- भाव को देखने से शरीर में कुछ परेशानियां रहती हैं । आठवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय- भाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी बनी रहती है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव मे स्वराशि में स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है । चौथी नीच दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव' को देखने मे धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ असंतोष रहता है । आठवीं दृष्टि से स्वराशि के तृतीयभाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है तथा गुप्त हिम्मत बढ़ती है ।

३११ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित अष्टमेश 'मंगल' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के पक्ष में कुछ कमी आती है तथा आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। चौथी मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले तृतीय भाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा कुछ कठिनाइयों के साथ भाई-बहिनों का सुख मिलता है। आठवीं मित्र दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से कुछ कमी के साथ माता, भूमि एवं भवन का सुख भी प्राप्त होत है। सामान्यतः जीवन शानदार बना रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होत है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है। चौथी शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर विकार-ग्रस्त रहता है, जब कि हिम्मत बढ़ी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है। आठवीं उच्चदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष में कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है तथा विद्या-बुद्धि की पर्याप्त वृद्धि होती है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को लाभ के क्षेत्र में कुछ कठिनाई आती है, परन्तु आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। चौथी शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कमी आती है। सातवीं उच्च दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या एवं बुद्धि की उन्नति होती है तथा सन्तान के पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। ऐसा जातक बड़ा हिम्मती, बहुत बोलने वाला तथा बहादुर होता है।

३१२ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से कुछ शक्ति भी मिलती है। आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ आती रहती हैं। चौथी दृष्टि से स्वराशि वाले तृतीयभाव को देखने से पराक्रम एवं भाई- बहिन के सुख में सामान्य वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर कुछ कठिनाइयों के बाद प्रभाव स्थापित हो पाता है। आठवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री पक्ष में कुछ कठिनाई रहती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में परिश्रम तथा कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। 'कन्या' लग्न में 'बुध' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में स्वराशि-स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि होती है। राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। सातवीं नीच-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक आय के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति अत्यधिक स्वाभिमानी होता है, इस कारण व्यवसाय में अधिक उन्नति नहीं कर पाता। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख में वृद्धि होती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति प्राप्त होती है। ऐसे व्यक्ति का रहन-सहन ऐश्वर्यशाली होता है। वह धनी तथा सुखी भी रहता है।

३१३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है। राज्य, व्यवसाय तथा पिता के पक्ष में भी सफलता मिलती है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, धर्मात्मा, यशस्वी तथा प्रभावशाली होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। शारीरिक सौन्दर्य तथा सुख में भी वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादशभाव को देखने से राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सब प्रकार की सफलताएँ प्राप्त होती हैं। 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का पर्याप्त सुख मिलता है और उच्च पद की प्राप्ति होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने के कारण आमदनी के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ वृद्धि होती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति सुन्दर, सुखी, धनी तथा स्वाभिमानी होता है।

३१४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में विवेक एवं युक्तियों के द्वारा सफलताएँ मिलती हैं । ननिहाल-पक्ष से भी लाभ होता है । परन्तु शारीरिक सौन्दर्य तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ असन्तोष रहता है । सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से अच्छा लाभ एवं सुख प्राप्त होता है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक अपनी पत्नी के व्यक्तित्व के समक्ष स्वयं को कुछ हीन-सा अनुभव करता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिन परिश्रम करना पड़ता है । पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य सफलताएँ प्राप्त होती हैं । सातवीं उच्चदृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव एवं मानसिक सुख-शान्ति में भी कुछ कमी रहती है । 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती रहती हैं । बाहरी सम्बन्धों से आजीविका चलती रहती है । सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण गुप्त युक्तियों के आश्रय से धन की वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब से प्रेम रहता है ।