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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

३५७ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा कुछ कठिनाइयों के साथ पराक्रम में भी वृद्धि होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति करने के लिए कुछ कठिनाइयाँ आती हैं। धर्म का पालन भी कम ही होता है। भाग्योन्नति भी कम होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है जिसके कारण वह धनी समझा जाता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को आमदनी यथेष्ट रहती है। वह धर्मात्मा तथा भाग्यवान् होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि तथा वाणी के बल पर विशेष उन्नति करता है। परन्तु बुध के व्ययेश होने के कारण हर क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ भी आती रहती हैं।

३५८ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित उच्च के 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ कठिनाइयों के साथ भाव तथा सुख की प्राप्ति होती है। सातवीं नीच-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष में कुछ परेशानियां आती हैं तथा कुछ अनुचित उपायों के सहारे शत्रु-पक्ष में काम निकालना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति धनी तथा सुखी होता है। 'तुला' लग्न में 'गुरु' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक प्रभाव, पुरुषार्थ तथा प्रतिष्ठा की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी आती है। शत्रु-पक्ष में हिम्मत के बल पर प्रभाव स्थापित होता है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष से वैमनस्य रहता है, परन्तु विद्या-बुद्धि का लाभ होता है। सातवीं मित्र- दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के पुरुषार्थ द्वारा धन की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में कमी रहती है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से जातक अपने धन के बल से शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त करता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है। नवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में यश, शुभ सम्मान तथा लग्न लाभ प्राप्त होते हैं।

३५६ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों के सुख में सामान्य कमी आती है। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में खूब सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, धर्मात्मा तथा भाग्यशाली होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित नीच के 'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है तथा शत्रु-पक्ष में भी परेशानी उठानी पड़ती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का कुछ लाभ होता है। सातवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है तथा शत्रु-पक्ष में प्रभाव बढ़ता है। भाई-बहिनों से कुछ मतभेद भी रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से नवम भाव को देखने से पुरुषार्थ द्वारा भाग्य एवं धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी खूब होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक शक्ति, प्रभाव तथा बल की प्राप्ति होती है, परन्तु स्वास्थ्य में कुछ कमी बनी रहती है।

३६० 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में स्वराशिस्थ 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित करता है। भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है तथा पुरुषार्थ में भी कुछ कमी रहती है। पाँचवीं उच्च-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, व्यवसाय एवं राज्य के क्षेत्र में यथेष्ट सम्मान तथा सफलता की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन की वृद्धि होती है, परन्तु कुटुम्ब से कुछ मतभेद बना रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक पुरुषार्थ द्वारा व्यवसाय की उन्नति करता है तथा स्त्री की शक्ति भी पाता है, परन्तु स्त्री से कुछ मतभेद रहता है। पाँचवीं मित्र- दृष्टि से एकादशभाव को देखने से पुरुषार्थ द्वारा यथेष्ट धनोपार्जन होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में कुछ परेशानियां रहती हैं, परन्तु प्रभाव की वृद्धि होती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि के तृतीयभाव को देखने के कारण भाई-बहिन का सुख कुछ कमी के साथ मिलता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश तुला लग्नः अष्टमभावः गुरु आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक के पुरातत्त्व एवं आयु की वृद्धि होती है। परन्तु भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है। शत्रु-पक्ष में भी परेशानी रहती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। नवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कुछ कमी रहती है।

३६१ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की वृद्धि होती है तथा वह यशस्वी भी होता है। शत्रु-पक्ष अथवा अन्य झगड़ों के कारण भाग्योन्नति में कुछ कठिनाइयाँ भी आती हैं। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में कुछ कमजोरी रहती है, परन्तु प्रभाव में वृद्धि होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। नवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान से कुछ वैमनस्य रहता है, परन्तु विद्या एवं बुद्धि के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं। भाई-बहिन का सुख भी मिलता है, परन्तु कुछ मतभेद भी रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का सुख मिलता है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कुछ कमी आती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक परिश्रम द्वारा अपनी आय तथा ऐश्वर्य को बढ़ाता है। उसे शत्रु-पक्ष से भी लाभ होता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को स्वराशि में देखने से भाई-बहिन का सुख मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या तथा संतान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। परन्तु बुद्धि अधिक होती है। नवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है।

३६२ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश तुलालग्न : द्वादशभाव : गुरु $\quad$ बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। भाई-बहिन के सुख में कमी आती है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है । पाँचवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी कुछ कमी आती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से गुप्त युक्तियों द्वारा तथा कुछ दबकर शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। नवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पुरातत्त्व एवं आयु का लाभ होता है। 'तुला' लग्न में 'शुक्र' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्न : प्रथमभाव : शुक्र $\quad$ पहले भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के शारीरिक तथा आत्मिक बल एवं प्रभाव में वृद्धि होती है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी मिलता है, परन्तु शुक्र के अष्टमेश होने के कारण कभी-कभी शरीर में परेशानी का अनुभव भी होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के सुख में कुछ कमी रहती है तथा व्यवसाय की उन्नति के लिए भी कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्न : द्वितीयभाव : शुक्र $\quad$ दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को धन-संचय के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है, परन्तु उसे कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है। कभी-कभी उसे कठिनाइयां भी आती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति अमीरी ढंग का जीवन बिताता है।

३६३ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति प्रभाव- शाली जीवन बिताता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थ भाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को कुछ कमी के साथ माता, भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान, लाभ तथा सहयोग की प्राप्ति होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान के पक्ष में कुछ कम- जोरी रहती है। आयु तथा पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से लाभ भी अच्छा रहता है। ऐसा जातक अपने बुद्धि-बल से उन्नति करता है।

३६४ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर विशेष प्रभाव रखता है तथा बड़ी-बड़ी कठिनाइयों पर भी विजय पा लेता है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व का सामान्य लाभ भी होता है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च तथा बाहरी सम्बन्धों के कारण कुछ परेशानी रहती है। ऐसा व्यक्ति ठाठ-बाट का जीवन बिताता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को स्त्री के पक्ष में कुछ कठिनाइयों के रहते हुए भी उनसे शक्ति प्राप्त होती है तथा शारीरिक परिश्रम द्वारा दैनिक व्यवसाय में भी सफलता मिलती है और आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशिस्थ प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, आत्म-बल एवं प्रभाव की प्राप्ति भी होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कुछ कमी आती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से जातक को धन-संचय के लिए चतुराई का सहारा लेना पड़ता है तथा कुटुम्बियों से उसका कुछ मतभेद बना रहता है।

३६५ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की उन्नति कुछ कमी के साथ होती है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति भी प्राप्त होती है। शारीरिक सौन्दर्य एवं शील भी मिलता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में तो वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से सामान्य मतभेद बना रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। सफलता का मूल कारण चातुर्य एवं शारीरिक श्रम होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख यथेष्ट प्राप्त होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक शारीरिक श्रम तथा चातुर्य के द्वारा पर्याप्त लाभ कमाता है। उसे आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति भी मिलती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है, परन्तु विद्या-बुद्धि तथा वाणी की शक्ति में पर्याप्त वृद्धि होती है।

३६६ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश तुलालग्नः द्वादशभावः शुक्र बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं तथा बाहरी सम्बन्धों से भी कष्ट होता है। आयु, पुरातत्त्व तथा शारीरिक क्षेत्र में भी कुछ कमी रहती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु पक्ष पर विशेष प्रभाव रहता है तथा झगड़े-झंझटों में हिम्मत तथा चतुराई से सफलता मिलती है। 'तुला' लग्न में 'शनि' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश 'तुलालग्नः प्रथमभावः शनि पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक स्थूल शरीर का तथा प्रभाव शाली होता है। उसे माता, भूमि, भवन, सन्तान तथा विद्या का सुख भी उत्तम रहता है। तीसरी शत्रुदृष्टि से तीसरे भाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम भी कठिनाई से ही बढ़ पाता है। सातवीं नीच-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री से कुछ मतभेद रहता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। दसवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता के सुख में कमी रहती है, परन्तु व्यवसाय तथा राज्य के क्षेत्र में सफलता मिलती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में 'शत्रु' 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन-संचय में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा कुटुम्बियों से कुछ मत- भेद रहता है। सन्तान के पक्ष में कमी तथा विद्या-बुद्धि के पक्ष में लाभ होता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ आम- दनी अच्छी रहती है।

३६७ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में विशेष वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ मतभेद रहता है। माता द्वारा भी शक्ति मिलती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने से विद्या तथा सन्तान की यथेष्ट शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु सन्तान से कुछ मतभेद भी रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। दसवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरीस्थानों से लाभ मिलता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में स्वक्षेत्री शनि के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर विशेष प्रभाव रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता से मतभेद रहते हुए भी सुख मिलता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। दसवीं उच्च-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, यशस्वी, मानी तथा प्रभावशाली होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है। तीसरी नीचदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्रीसे मतभेद रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में कठिनाइयाँ आती हैं। सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-संचय में भी कठिनाइयाँ आती हैं तथा कुटुम्ब से मतभेद बना रहता है।

३६८ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : षष्ठभाव : शनि उसे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को बुद्धि-बल द्वारा शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। माता, भूमि तथा भवन के सुख एवं विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता भी कुछ कठिनाइयों के बाद प्राप्त होती है। तीसरी मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों से कुछ वैमनस्य रहता है, परन्तु पुरुषार्थ की वृद्धि होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित नीच के शनि के प्रभाव से जातक को स्त्री, गृहस्थी तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ कठिनाई और अशान्ति का सामना करना पड़ता है। विद्या तथा सन्तान का पक्ष भी कमजोर रहता है। तीसरी मित्र- दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। सातवीं उच्च दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से जातक के शरीर का कद लम्बा होता है तथा उसे शारीरिक सुख भी मिलता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कठिन परिश्रम द्वारा प्राप्त होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुलालग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का अच्छा लाभ होता है। माता, भूमि, भवन, सन्तान तथा विद्या के पक्ष में कमी आती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय में कमी रहती है तथा कौटुम्बिक सुख में भी व्यवधान पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने विद्यासे एवं सन्तान का सामान्य साथ होता है।

३६६ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक बुद्धि द्वारा भाग्योन्नति करता है तथा धर्म का पालन भी करता है । विद्या, सन्तान, भूमि, भवन एवं माता का सुख भी अच्छा मिलता है । तीसरी शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी के मार्ग में रुकावटें आती हैं । सातवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों से मतभेद रहता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है । दसवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से बुद्धि-बल द्वारा शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त होती है । 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' (शनि) का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है । वह स्वयं विद्वान् होता है, परन्तु सन्तान से मतभेद बना रहता है। तीसरी मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है । सातवीं दृष्टि से स्वराशि के चतुर्थभाव में देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख भी मिलता है। दसवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के सुख में कुछ कमी रहती है तथा व्यवसाय में भी कठिनाइयाँ आती रहती हैं । 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी कुछ कठिनाइयों के साथ खूब होती है । माता, भूमि तथा भवन आदि का भी यथेष्ट सुख मिलता है । तीसरी उच्च तथा मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि होती है । सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष में सफलता प्राप्त होती है । दसवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति बढ़ती है । ऐसा व्यक्ति मनमोजी, लापरवाह तथा स्वार्थी स्वभाव का होता है।

३७० 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश तुला लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा उसे बाहरी संबंधों से लाभ होता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन के संचय में कमी आती है तथा कुटुम्ब से मतभेद रहता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर सामान्य प्रभाव बना रहता है। दसवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि तथा वाणी कुछ भ्रम-युक्त भी बनी रहती है। 'तुला' लग्न में 'राहु' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल होता है। वह परेशान भी रहता है। वह अपनी उन्नति के लिए गुप्त चातुर्य का आश्रय लेता है तथा कठिन परिश्रम करता है। कभी-कभी उसे बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अपनी सूझ-बूझ से उन पर विजय भी पा लेता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को धन के संग्रह करने में बड़ी कठिनाइयां आती हैं। कभी आकस्मिक रूप से धन-प्राप्ति होती है तो कभी घोर आर्थिक संकट भी आते हैं। वह गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर किसी प्रकार अपना काम चलाता है। उसे कुटुम्बियों द्वारा भी कष्ट प्राप्त होता है।

३७१ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कमी आती है, परन्तु वह युक्तियों का आश्रय लेकर उसमें वृद्धि करता है तथा अनुचित मार्ग भी अपनाता है। उसे भाई-बहिनों से कष्ट मिलता है तथा जीवन में कभी-कभी अन्य प्रकार के घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। चातुर्य, युक्ति और पुरुषार्थ के बल पर ही वह कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर पाता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है, परन्तु गुप्त युक्तियों, साहस तथा दृढ़ता के बल पर वह संकटों का सामना करके धन पर विजय पा लेता है। उसका जीवन बड़ा संघर्षपूर्ण बना रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्याध्ययन में भी कठिनाइयां आती हैं। वह सदैव चिन्तित तथा परेशान बना रहता है। स्वार्थ-सिद्धि के लिए वह उचित-अनुचित का विचार नहीं करता तथा गुप्त युक्तियों से काम लेकर ऊपर से बड़ी दृढ़ता प्रदर्शित करता है।

३७२ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में कठिनाइयाँ उठाकर भी विजय प्राप्त करता है । ऐसा व्यक्ति बड़ा बहादुर, हिम्मती तथा गुप्त युक्तियों का ज्ञाता होता है । अपना प्रभाव स्थापित करने में उसे सफलता मिल जाती है । 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से संकटों का सामना करना पड़ता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं । व्यवसाय में भी कभी-कभी बड़े संकट आते हैं, परन्तु यह अपनी गुप्त युक्ति, धैर्य और साहस के बल पर उन सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है । 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को आयु पर उसे बड़े संकट आते हैं, परन्तु मृत्यु नहीं होती । पुरातत्त्व की हानि भी होती है । दैनिक जीवन में भी अनेक संघर्ष, चिन्ता व परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।

३७२ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक गुप्त युक्तियों के बल पर अपने भाग्य की विशेष उन्नति करता है तथा धर्म का पालन भी करता है। उसकी भाग्योन्नति में कभी-कभी बाधाएँ आती हैं, परन्तु वह अपने चातुर्य, धैर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर उन सब पर विजय पा लेता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को पिता के सुख में कमी रहती है। राज्य के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी संकट आते हैं। उन्नति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार करने के बाद ही उसे सफलता मिलती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग में कठिनाइयाँ आती हैं, जिन पर वह गुप्त युक्तियों, चतुराई, धैर्य एवं हिम्मत के बल पर विजय पाता है तथा उन्नति करता है। कभी-कभी उसे विशेष संकटों का सामना भी करना पड़ता है।

३७४ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुलालग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा कभी-कभी बड़े संकटों का शिकार भी बनना पड़ता है। उसे बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ लाभ भी मिल जाता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा विवेकी, कूट- नीतिज्ञ, परिश्रमी, धैर्यवान् तथा हिम्मती होता है। 'तुला' लग्न में 'केतु' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को कभी-कभी विशेष शारीरिक संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु वह अपने गुप्त चातुर्य तथा साहस के बल पर उन पर विजय पाता है और भीतर से गुप्त कमजोरी रहते हुए भी ऊपर से बड़ा हिम्मती दिखाई देता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को धन-प्राप्ति एवं धन- संचय के मार्ग में बड़े संकट आते हैं। वह गुप्त युक्तियों के बल पर ही धनोपार्जन करता है, परन्तु हमेशा चिंतित तथा परेशान ही बना रहता है। उसे अपने कुटुम्बियों द्वारा भी कष्ट मिलता है। फिर भी वह बड़ा हिम्मती तथा धैर्य वाला होता है।

३७५ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी खूब मिलता है। कभी-कभी भाई-बहिनों के कारण उसे कष्ट भी उठाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, परिश्रमी तथा धैर्य- वान् होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। घरेलू झगड़े भी बहुत रहते हैं, फिर भी वह अपने धैर्य, साहस तथा गुप्त युक्तियों के बल से कठिनाइयों पर विजय पाने का प्रयत्न करता है और कुछ सफलता भी पा लेता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की संतान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती हैं। ऐसा व्यक्ति अनेक कठिनाइयों के बाद विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में थोड़ी-बहुत सफलता पाता है, फिर भी उसके संकट बने ही रहते हैं।

३७६ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक झगड़े-झंझट, रोग तथा शत्रु-पक्ष में बड़ी हिम्मत, बहादुरी तथा धैर्य से काम लेकर सफलता प्राप्त करता है और कभी डरता या घबराता नहीं है। उसे अपने उद्देश्य में सफलता भी मिलती है। ऐसे व्यक्ति का ननसाल-पक्ष प्रायः कमजोर रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से विशेष कष्ट मिलता है तथा दैनिक आमदनी में भी बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं। वह स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में सफलता पाने के लिए धैर्य, हिम्मत, पराक्रम तथा गुप्त युक्तियों का सहारा लेता है और थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त करता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु पर अनेक बार संकट आते हैं तथा उसे पुरातत्त्व की भी हानि उठानी पड़ती है। पेट में कुछ विकार भी रहता है। ऐसा व्यक्ति सदैव चिन्तातुर रहता है तथा अपने साहस, धैर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर कुछ सफलता भी प्राप्त कर लेता है।