ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
छठा अध्याय
मन, प्राण और वीर्य
मन, प्राण और वीर्य एक हैं। दूध और पानी की भांति मन और प्राण का संबंध है। मन, प्राण और वीर्य का एक ही संबंध है। यदि मन को अधीन कर लिया जाता है तो प्राण और वीर्य स्वयं अधीन हो जाते हैं। जो मनुष्य प्राण का निरोध करता है, तो उसके मन का व्यापार और वीर्य की गति आप ही आप कम हो जाती है। पुनः यदि वीर्य पर अधिकार किया जाता है और यदि उसे पवित्र विचारों और विपरीतकरनी मुद्राओं के द्वारा ऊर्ध्वरेता (यानी वीर्य को ऊपर की ओर मस्तिष्क में ले जाना) बनाया जाता है तो मन और प्राण स्वयं यश में हो जाते हैं। मन और इन्द्रियों में घनिष्ठ संबंध
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ब्रह्मचर्य
है। मन चेष्टा करता है और पंच-ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा इस संसार के अनुभवों को ग्रहण करता है। वह ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ही आनन्द को प्राप्त करता है। वह कर्मेन्द्रियों से दृष्टपूर्वक काम करवाता है। अतः इन्द्रियों को वश में करना वास्तव में मन ही को वश में करना है। यम, नियम, शम, दम, प्रत्याहार आदि के अभ्यास का उद्देश्य मन और इन्द्रियों को वश में करना ही है।
मन पंच ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के द्वारा आनन्द प्राप्त करता है। स्पर्श के द्वारा वह उत्तम आनन्द का अनुभव करता है। मैथुन का सुख ही मन के लिए एक विशिष्ट (सब से उत्तम) सुख है। प्रत्येक मनुष्य उसी सुख के पीछे दौड़ता है और उसी में समाप्त हो जाता है। अब रस (उत्तम खान पान) को लीजिए। रूप, आकार और सुन्दरता का सुख है। शब्द, वाद्य से प्राप्त होने वाला सुख है। अन्त में गंध को लीजिए। गंध की इन्द्रिय इतनी दुखदाई नहीं है जितनी रस की। यदि स्वादेन्द्रिय या जिह्वा वश में हो जाती है तो अन्य सब इन्द्रियां स्वयं वश में हो जाती हैं।
जिसने मन को वश में कर लिया उसने प्राण को भी वश में कर लिया। मन दो रूपों से कार्यनिमित्त होता है प्राण और वासनाओं के स्पन्दन से। यदि इन दोनों में से एक नष्ट हो जाय तो दूसरी वस्तु आप ही नष्ट हो जाती है। जब मन स्थिर होता है तो प्राण भी स्थिर हो जाता है। जब प्राण स्थिर होता है तो मन भी स्थिर होता है। जब मन और प्राण स्थिर नहीं होते तो सब इन्द्रियां चंचलता पूर्वक अपने अपने कार्यों में निमग्न रहती हैं।
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जीवन एक बहुत बड़ी सरिता है। इन्द्रियां उसमें पानी हैं। काम, क्रोध और लोभ रूपी उसमें बड़े बड़े मगर-मच्छ आदि जलचर हैं। जन्म और मरण रूपी दो भँवर हैं। ज्ञानी मनुष्य आत्म संयम और विचार रूपी नौका के द्वारा इस सरिता को पार करता है।
भूम शब्देन्द्रिय की प्रबलता के कारण जाल में फँस कर अपने प्राण गँवा देता है; इसी प्रकार हाथी, पतंग, मछली, तथा भ्रमर क्रमशः स्पर्श, रूप, रस तथा प्राणोन्द्रिय की प्रबलता के कारण अपने प्राणों को समाप्त कर देते हैं। जब एक ही इन्द्रिय की प्रबलता ऐसी है तो फिर मनुष्य की पंचेन्द्रियों के युक्त प्रभाव की प्रबलता किस प्रकार की होगी, उसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं।
जिस प्रकार खनिज पदार्थों की अशुद्धता धौकनी के द्वारा जलाकर भस्म कर दी जाती है, ठीक उसी प्रकार इन्द्रियों के कलंक भी प्राणों के निरोध के द्वारा दग्ध किये जाते हैं। अतः प्राणायाम का नियम अभ्यास करना चाहिये। वह अत्यन्त परिसोधक है।
सामान्य मनुष्यों को मन पर अधिकार नहीं होता। मन इधर उधर भागता रहता है। वह विध्वंस करता है। वह मनुष्य पर अधिकार जमाता है। वह नियं हल चल और कलह की स्थिति में रहता है। उसमें भावनायें और प्रवृत्तियां उठती रहती हैं। वह इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये इच्छित पदार्थों के चित्रों से हर समय प्रभावित होता रहता है। प्रत्येक इन्द्रिय, अपनी वृत्ति के लिये मन को अपने विशेष भोग-पदार्थ की ओर खींचती रहती है। कर्ण जब कभी मीठी तान को सुन पाता है तो मन को अपनी
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ब्रह्मचर्य साधना
और र्खाचिता है। जिह्वा मन को काफी की बुकानों की ओर भगा कर ले जाती है। मन के लिए एक सूख भी विश्राम नहीं है? चित्ता, शोक, आकुलता, भय, व्याधियां, दुर्बल्य, घृणा, काम, कोष, आदि मन के भीतर हल चल मचाते रहते हैं तथा उसको निरन्तर संतप्त करते रहते हैं। जिसने अपने विचार, भावनायें, चित्त-वृत्तियां, प्रेरणायें तथा अपनी इन्द्रियों पर आधिपत्य प्राप्त किया है वह वास्तव में सम्राटों का सम्राट् है। वह धन्य है। ब्रह्मचर्य के पूर्णतया रक्षण के लिये सब इन्द्रियों पर सर्वथा आधिपत्य प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है।
प्रतिक्रिया के संबंध में आपको अत्यन्त सावधान रहना पड़ेगा। जिन इन्द्रियों को आपने महीनों और वर्षों पर्यन्त वश में रखा है वे ही इन्द्रियां तनिक ही असावधानी के कारण उपद्रवी हो सकती हैं। अबसर प्राप्त होते ही वे आप पर बलात् आक्रमण करेंगी। कुछ लोग जो एक या दी-वर्षों तक ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं वे ही अनन्तर अधिक कामी होकर अपनी वीर्य शक्ति का अधिक नाश करते हैं। अन्त में वे असाध्य दुराचार भी बन जाते हैं।
यह के एक भूत पर नियन्त्रण रखना कितना कठिन है। शरीर की एक इन्द्रिय को अपने आधीन रखना कितना अधिक कठिन है। पुनः यदि पांचों इन्द्रियों को एक साथ वश में रखना है, तो आप समझ सकते हैं कि वह और भी कितना अधिक कठिन होगा। वह योगी जो जितेन्द्रिय है वह इस संसार में एक प्रभान शास्त्री महाराजा ॥
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वासनाओं की इतिथी कीजिये
वासना, चित्त रूपी सरोवर में एक प्रकार की लहर है। पदार्थों के प्रति जो आकर्षण और आसक्ति होती है उसका कारण वासना है; वही बंधन का कारण है।
यदि आपके मन में वासना नहीं है तो आप का किसी भी व्यक्ति के प्रति आकर्षण नहीं होगा। मन में उत्पन्न होने वाली वासनाओं पर आक्रमण करने के लिए, विज्ञान-मय कोश साधक के लिए एक दुर्ग का कार्य करता है। शम के अभ्यास के द्वारा आप सब वासनाओं का एक एक करके नाश कर सकते हैं। आप बुद्धि के द्वारा विवेक से सहायता प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य की प्राप्ति में वासना के त्याग से पूरी पूरी सहायता मिलती है।
वासना ही मन की अशांति का कारण है। ज्योंही वासना प्रकट होती है, त्योंही विषय-वृत्ति-प्रवाह के द्वारा मन और इच्छित पदार्थ के बीच में एक आत्मीय संबंध स्थापित हो जाता है। मन कदापि पीछे नहीं हटेगा, जब तक कि वह बान्छित पदार्थ को प्राप्त कर उसका उपभोग न कर लेगा। जब तक भोग प्राप्त न होगा, तब तक मन में अशांति ज्यों की त्यों बनी रहेगी। वृत्ति पदार्थ की ओर भागी रहेगी जब तक वह उसे प्राप्त कर उसका उपभोग न कर ले। सामान्य मनुष्य दुर्बल इच्छा के कारण किसी भी वासना को दबा नहीं सकते। जिससे किसी भी वासना को दबा सकता है। परन्तु ज्यों-उपयुक्त प्रवृत्ति प्राप्त हुआ कि वह द्विगुण-शक्ति के द्वारा पुनः प्रकट हो जाती है। जब सब वासनाओं का सर्वथा नाश हो जायगा तो फिर किसी भी बाहरी पदार्थ के
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प्रति आकर्षण व आसक्ति नहीं होगी। शम और दम साधक के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन हैं।
जिस प्रकार चीजों में पुष्प गुप्त रहते हैं, ठीक उसी प्रकार अन्तःकरण और कारण शरीर में वासनायें गुप्त रहती हैं। नित्य नये पुष्प खिलते हैं और पुनः एक या दो दिनों में वे सुरक्षा जाते हैं। ठीक इसी प्रकार वासनायें भी चित्त में एक के पीछे दूसरी उत्पन्न हो हो कर संकल्पों के द्वारा जीवों को अपने इच्छित पदार्थों को प्राप्त करने तथा उनका उपभोग करने के लिये निरन्तर उत्तेजित करती रहती हैं। वासनाओं से कार्य उत्पन्न होते हैं और कार्यों से पुनः वासनाओं को बल प्राप्त होता है। यह एक चक्रिका भी है। आत्म ज्ञान के उदय होते ही सब वासनायें सर्वथा दग्ध हो जाती हैं।
नाट्यशालाओं में जाने तथा चल-चित्रों के देखने की इच्छा एक प्रकार की अशुभ वासना है। गीता के अध्ययन तथा आध्यात्मिक साधनाभ्यास की इच्छा शुभ वासना है। शुभ वासनाओं की वृद्धि कीजिये। अशुभ वासनायें सारी आप ही नष्ट हो जायेंगी। आत्म साक्षात्कार की तीव्र इच्छा के द्वारा सर्व प्रकार की वासनायें नष्ट हो जायेंगी। शुद्ध वासनाओं की वृद्धि करने में कोई हानि नहीं है। आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में वे आपके लिए एक बहुमूल्य पूँजी हैं।
जब कभी आपके मन में कोई इच्छा उत्पन्न हो तो आप सदा अपने विवेक या विचार शक्ति से सम्मति प्राप्त करें। इस विवेक के द्वारा आप तुरत जान सकेंगे कि यह इच्छा दुःख पूर्ण है और वह एक निरर्थक प्रलोभन के
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अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है जो केवल इस उपद्रवी मन की ही रचना है। विवेक आपको उस इच्छा का तत्काल त्याग कर देने के लिए तथा आध्यात्मिक साधना का अभ्यास करने के लिए सुसम्मति प्रदान करेगा। वह संकल्प-शक्ति की सहायता के द्वारा आपकी इच्छा को तत्काल समूल नष्ट कर देगा। दुष्ट काम और प्रलोभन को नष्ट करने के लिए ज्ञान मार्ग के साधक के लिए विवेक और संकल्प-शक्ति ये दो प्रबल शस्त्र हैं।
यह आक्रमण आंतरिक आक्रमण है। बाहर की ओर से भी आक्रमण होना चाहिए। वह आक्रमण दम यानी इन्द्रिय-निग्रह के द्वारा किया जाता है। विषय-संवेदन को बाहर से इन्द्रियों के मार्गों द्वारा अपने मन के भीतर प्रवेश ही न होने दीजिए। यह भी आवश्यक है। केवल शम पर्याप्त नहीं है। दम के अभ्यास से इन्द्रियों को शान्त रखना चाहिए। उदाहरणार्थ ज्योंही आपके मन में कामवासना उत्पन्न हो, त्योंही आप उसे जहां का तहां भीतर ही भीतर शम (वासना त्याग) के द्वारा समूल नष्ट कर डालिये। जब कभी आपको इधर-उधर घूमते फिरते किसी लौ/पुरुष को देखने का अवसर प्राप्त हो तो आप दम के अभ्यास के द्वारा तुरंत अपनी काम-दृष्टि को यहां मे हटाकर अयोग्य कामेच्छा का सर्वथा त्याग कर दीजिए। मन के नियंत्रण में दम, शम का ही पूरक है। वासनाओं के त्याग में दम एक प्रकार से सहायता प्रदान करता है। मोक्ष की तीव्र कामना के द्वारा लौकिक इच्छायें, वासनायें और तृष्णाओं के नष्ट करने में अवश्य सहायता मिलती है। शुभ वासनाओं के द्वारा अशुभ वासनाओं
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जबन्धन साधना
का त्याग कीजिये । ईश्वर-साक्षात्कार के लिए एक ही तीव्र इच्छा के द्वारा इन शुभेच्छाओं का भी त्याग कर दालिये । अन्त में पुनः इस भगवत् प्राप्ति की इच्छा का भी त्याग कर दीजिये । यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार कि एक काटे को दूसरे काटे से निकाल कर पुनः दोनों काटों को फँक देना । यह रीति अत्यन्त सरल है ।
जब वासना दूर हो जाती है तो इच्छा शक्ति बढ़ती है । यदि आपने पाँच वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली तो आपके लिए छठी वासना पर विजय प्राप्त करना अत्यंत सरल होगा, क्योंकि आप में अधिकाधिक शक्ति का संचार हो रहा है आप इसका वास्तव में अनुभव कर सकते हैं । वासनाओं के नाश का अर्थ मनोनाश से ही है । मन, वासनाओं के समूह के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं ।
अधिकांश मनुष्यों में मैथुन की लालसा अत्यन्त तीव्र रहती है । उनमें यह इच्छा पूर्ण रूप से विद्यमान रहती है । कुछ मनुष्यों में काम-वासना कभी कभी उत्पन्न होती है, परन्तु शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं । केवल मन में थोड़ा उद्वेग प्रतीत होता है । उचित प्रकार की आध्यात्मिक साधना के द्वारा यह भी सर्वथा नष्ट किया जा सकता है ।
उत्पत्ति का बीज (कारण) तृष्णा है ! इन तृष्णाओं से संकल्प-और कर्म उत्पन्न होते हैं । इन्हीं से संसार चक्र चलता रहता है । तृष्णायें मन को उत्तेजित करती हैं और आप कामी बन जाते हैं । मुनि वाल्मीकि योग वाशिष्ठ में लिखते हैं “आप अखिल समुद्र का पान कर सकते हैं । आप अग्नि को निगल सकते हैं । आप हिमालय पर्वत को अपने हाथ में धारण कर सकते हैं । परन्तु वासनाओं को
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नष्ट करना अत्यन्त कठिन है।” दृढ़ प्रतिज्ञा, धैर्य तथा तीव्र वैराग्य और विवेक से युक्त मनुष्य के लिए यह कार्य कुछ भी नहीं है। वह एक पल भर में किया जा सकता है। उचित साधना के द्वारा वासना का त्याग कीजिये। श्रन्तःकरण में गोता लगाकर तृष्णाओं के कार्यों को दृढ़िये और उन्हें समूल नष्ट कीजिये।
जिस प्रकार एक स्वर्णकार, कुस्तित स्वर्ण को बारंबार तपाकर तथा उसमें अम्पलीय पदार्थ मिला कर उसे निर्मल (शुद्ध) बना देता है, ठीक उसी प्रकार आपकी भी अपने अपवित्र मन और शरीर को निरंतर साधना के द्वारा पवित्र बनाना होगा।
एक बार कलकत्ते में गंगा पार करते हुए एक बंगाली महाराज ने क्रोध में आकर एक सिक्का महाराज के प्रति “साला नदमास” शब्द का प्रयोग किया। सिक्का महाराज ने उद्द्वेग में आकर तुरत उस बंगाली महाराज को पकड़ कर गंगा में फेंक दिया। वे बंगाली महाराज डूब कर मर गये। देखिये ! वे सिक्का महानुभाव मन से कितने दुर्बल थे, यद्यपि वे शरीर से बलवान थे। एक ही शब्द के भ्रमण से उनके मन की स्थिरता नष्ट हो गई। वे क्रोध के गुलाम बन गये। यदि उच्चमं ब्रह्मचर्य, विवेक और विचार होता तो वे पृथ्वी पूर्वक इस असम्य कार्य को कदापि नहीं करते।
काम एक प्रकार की तीव्र इच्छा है। बार बार दुहराते रहने से कोमल इच्छा तीव्र इच्छा बन जाती है। विचार ही वास्तविक कर्म है। मैथुन से चित्त में संस्कार उत्पन्न होता है। यह संस्कार मन में वृत्ति (विचारधारा) उत्पन्न
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करता है और यह वृत्ति पुनः संस्कार को उत्पन्न करती है। भोग से वासनायें प्रबल होती हैं। स्मरणशक्ति और विचार के द्वारा पुनः कामवासना उत्पन्न हो जाती है।
कामेच्छा को नष्ट करने में पूर्ण साधना रहिये। संसार का सृजनहार ब्रह्मा भी नहीं जानता कि काम का यथार्थ स्थान कहाँ है। गीता में आपको मिलेगा कि इन्द्रियां, मन और बुद्धि काम के वासस्थान हैं। प्राणमय कोष उसका अन्य स्थान है। काम, शरीर, मन और इन्द्रियों में सर्वत्र व्यापक है। शरीर के रग-रग, अणु-अणु और कण-कण में काम व्यापक रहता है। काम रूपी महासागर के बाह्य तथा अन्तस्थ-धारा-प्रवाहों में तृष्णा रूपी मगर तैरते रहते हैं। आपको इन सभी स्थानों में काम को संपूर्णता से नष्ट करना पड़ेगा।
अज्ञानी मनुष्य संस्कार और कर्मों का वंच (निमित्त) बना रहता है। आध्यात्मिक साधना के अभ्यास तथा वासना व अहंकार के त्याग के द्वारा वह अपने वास्तविक स्वभाव को समझने लगता है और तदनुसार वह धीरे धीरे बल प्राप्त करता है।
ब्रह्मचर्य का अर्थ नियन्त्रण से न कि काम-वासना को दवाने-से। यदि आप ध्यान, जप, प्रार्थना, स्वाध्याय, आत्मचिन्तन (मैं कौन हूँ ?) के द्वारा अपने मन में शुद्ध सात्विक विचार भरें तो आप अपनी कामवासना को मन के शमन के द्वारा निर्जांव करने में समर्थ होंगे। मन भी क्रमशः सूक्ष्म हो जायगा। अवरोधित कामेच्छा आप पर पुनः पुनः आक्रमण करेगी जिससे आपको स्वप्नदोष, चिह-चिहपन और मन में अशांति उत्पन्न होगी। पुनः आपको
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ध्यान, कीर्तन और प्रार्थना आदि के द्वारा मन को शुद्ध करना पड़ेगा। प्रथम मन पर नियंत्रण करना चाहिए। मन को शिक्षित कीजिये। तब आपके लिये मन पर नियंत्रण करना सरल हो जायगा। तत्पश्चात् दम का अभ्यास कीजिए। मन के बिना इन्द्रियों अकेली कार्य नहीं कर सकती। इसीलिए ब्रह्मचर्य के लिये प्रथम मन को वश में करना चाहिए न कि इन्द्रियों को। ह उत्तम उपाय है।
परन्तु नये साधकों के लिये मन को वश में करना कठिन है; क्योंकि जब इन्द्रियां इधर उधर भागती रहती हैं तो मन को वश में करना अत्यन्त कठिन होता है। यही कारण है कि भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं— “हे अर्जुन ! प्रथम तू इन्द्रियों को वश में करके पुनः इस बुद्धि और ज्ञान के नष्ट करने वाले पापी काम को मार।” अध्याय ३ श्लोक ४१।
“प्रथम मन को वश में करना चाहिए” यह सिद्धांत सर्वथा सही है। इसका अभ्यास उत्तम साधकों के लिए प्रशस्त है। सामान्य (मध्यम श्रेणी के) साधकों को प्रथम इन्द्रियों को वश में करना चाहिए। इन्द्रियों की प्रवृत्ति सदा बाहर की ओर रहती है। मन इन्द्रियों के द्वारा कार्य करता है। एक को वश में करना दूसरे को वश में करना है। इन्द्रियों को वश में करने से भी मन वश में हो जाता है, क्योंकि मन केवल इन्द्रियों का ही तो गहर (समूह) है। बिना इन्द्रियों के मन का कुछ भी प्रतित्व नहीं है।
“मन को प्रथम वश में कीजिए, इन्द्रियां सहज ही वश में हो जायंगी।” (एक दृष्टि कोण), “पहले इन्द्रियों
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को वश में कीजिए, मन आप ही वश में हो जाएगा।” (दूसरा दृष्टि कोण); इस प्रकार से कहना ठीक वैसे ही है जैसा कि यह कहना कि प्रथम बीज की उत्पत्ति हुई या वृक्ष की। अथवा यह कहना “यदि आप वासनाओं को वश में कर लेंगे तो आप आत्म ज्ञान को प्राप्त लेंगे, या यदि आप आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेंगे तो आप अपनी सब वासनाओं को वश में कर लेंगे।” यह अटिल चक्र है।
आध्यात्मिक जीवन में भोग पदार्थों का निरन्तर चिंतन करते रहना, वास्तविक इन्द्रिय-सुख (भोग) से अधिक हानिकारक है। यदि साधना के द्वारा मन शुद्ध नहीं किया गया तो केवल बाहरी इन्द्रियों के संयम से यथोचित लाभ नहीं प्राप्त हो सकता। यद्यपि बाहरी इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लिया गया तथापि उनके सहकारी अंग जो अभी तक उत्तेजित और प्रबल हैं, मन पर प्रत्याक्रमण कर उसकी मानसिक ग्यथा को बढ़ाने में समर्थ होंगे।
काम-दृष्टि से वासनायें उत्पन्न होती हैं। यदि आप वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि अलंकारों से सुसज्जित अपनी सुन्दर माता और बहिन को देखते हैं तो आपकी दृष्टि कामातुर नहीं होती। आप उनकी ओर शुद्ध प्रेम की भावना से देखते हैं। यह शुद्ध भावना है। वहाँ कामुक विचार नहीं है। अन्य स्त्रियों की ओर भी आपको दृष्टि कोण से देखना चाहिए। इसी शुद्ध भावना की वृद्धि करने का अभ्यास कीजिए। किसी भी स्त्री की ओर काम दृष्टि से देखना, मैथुन के सुख के ही तुल्य है। यह एक प्रकार का मैथुन ही है। यही कारण है कि महात्मा जीसस कहते हैं “यदि आपने किसी स्त्री को कामभरी नसना दी
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देखा है तो आप अपने हृदय में परखीगमन द्वारा व्यभि- चार कर चुके हैं।’ यद्यपि पहिले सात प्रकार के मैथुन से वीर्य की वास्तविक हानि नहीं होती तथापि वीर्य रक्त से पृथक हो जाता है और वह या तो निद्रा में या अन्य किसी भी रीति से अवसर प्राप्त होते ही बाहिर निकल आने का प्रयत्न करता है। पहले सात प्रकार के मैथुनों में मनुष्य मन से भोगों का उपभोग करता है।
यदि आप काम को वश में करना चाहते हैं तो जिह्वा को वश में करना आवश्यक है। प्रथम जिह्वा को वश में कीजिये; पुनः काम को वश में करना सरल हो जायगा। स्वादिष्ट राजसिक भोजन से जननेन्द्रिय को उत्तेजना प्राप्त होती है। इन्द्रियां अधिक प्रबल हो जाती हैं। जिस प्रकार डाक्टर मालिश, इंजेक्शन, मिक्स्चर (वेय-श्रोपधि), चूर्ण आदि नाना प्रकार के प्रयोगों द्वारा टी० वी० नाम के कीटाणु (जो यक्ष्मा या क्षय रोग का कारण है) के उपर चारों ओर से आक्रमण करता हैं, ठीक उसी प्रकार से व्रत, नियमित भोजन (मिताहार), प्राणायाम, जप, कीर्तन, ध्यान, विचार (में कौन हूँ ?) प्रत्याहार, दम, आसन, वंछ, मुद्रा, विचार- नियन्त्रण, वासना-क्षय आदि विविध उपायों द्वारा इन्द्रियों को वश में करना चाहिए।
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प्रकाश के सम्मुख ग्रंथकार नहीं रह सकता। इसी प्रकार इन्द्रिय-मुख भोगों के रहते हुये आत्मानन्द की प्राप्ति नहीं होती। मंगारी लोग विषय-मुख भोग तथा आत्मानन्द का मुग एक ही समय में साथ साथ उठाना चाहते
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हैं। यह निराश असंभव है। वे संसार के विषय भोगों का त्याग नहीं कर सकते। उनके हृदय में वास्तविक वैराग्य नहीं होता। वे बातें अधिक किया करते हैं। संसारी लोगों का यही विचार रहता है कि वे सदा सुखी हैं, क्योंकि उन्हें कुछ बिसकुट, कुछ रुपये पैसे तथा स्त्री-सुख भोग मिलता रहता है। संसार में काम के द्वारा अधिक भिख-मंगों की वृद्धि होती है। संसार के सुख-भोग आरम्भ में तो अमृत की भांति मधुर प्रतीत होते हैं, परन्तु अन्त में वे ही विष की भांति घातक हो जाते हैं। जब कोई मनुष्य विवाह करके गृहस्थाश्रम में फँस जाता है तो फिर उसके लिए मोह के विविध बंधनों को तोड़ना अत्यन्त कठिन हो जाता है। एक कुंवारा कामी मनुष्य विचारता रहता है कि वह महा दुःखी है, क्योंकि उसके कोई देवाहिता स्त्री नहीं है। इस दृष्टि भंगुर जीवन के पीछे पड़े रहने के कुत्सभाव का त्याग कीजिये। निर्भय बनिये। इन्द्रियां और मन पर नियन्त्रण प्राप्त कीजिये। आप में वैराग्य की उत्पत्ति होगी। आप ब्रह्मचर्य में पूर्णतया स्थित होंगे।
क्या प्राकृत वस्तुयें सब नाशवान नहीं हैं? आप अपने शरीर के द्वारा नित्य अपने जीवन में पाप-कर्म, दुखदाई कार्य तथा अनेक अमानुषिक (अधर्मी) व्यवहार किया करते हैं। बचपन में आप अज्ञान से आघात (दुके दुये) रहते हैं। युवा अवस्था में आप काम के चंगुलों (जाल) में फँसे रहते हैं। बुढ़ापे में आप संसार के भार (बोभ) तथा शारीरिक दुर्बलता के कारण विलाप करते हैं। अन्त में आप दुखदाई मृत्यु को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार निरन्तर संलग्न आपको कब समय मिलेगा कि आप
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धार्मिक कार्यों के करने में भी प्रवृत्त हों। आपका मन रूपी पिशाच इस संसार रूपी नाख्थशाला में इन्द्रियां रूपी वार्यों के साथ तान में तान मिलाकर नाचता रहता है।
धन, जो केवल आपके विचार समूहों को हवा में अमलग करने के योग्य बना सकता है, आपको नित्यानन्द की प्राप्ति नहीं करा सकता। जिस प्रकार किसी कृत्रिम में सर्पावेशित-लता में खिला हुआ पुष्प किसी अर्थ का नहीं होता, ठीक उसी प्रकार यह धन जिसके लिये मन सदा लात्तायित रहता है और जो क्षण भर में नष्ट होने वाला है, संपूर्णतः निरर्थक या अनुपयोगी है। यह जीवन, शरद काल के बादल, घृत-हीन दीपक या सागर की तरंगों की भांति क्षण भंगुर है। यह जीवन जो स्वभावतः नाशवान है तथा जो भोग पदार्थों के प्रतिपादन में क्षण भंगुर है। एक अत्यन्त घातक वस्तु है। यह शरीर जो मूत्र, विषा, मांस, हड्डी का बना हुआ है और जो कभी दुबला और कभी मोटे पन को प्राप्त होता हुआ सदा परिवर्तनशील है इस मिथ्या संसार में केवल दुःखों को भोगने के लिये ही चमत्कमाता हुआ सुन्दर सा प्रतीत होता है।
नवयुवक डाक्टर तथा अन्य कई अंगरेजी पढ़े लिये धुरन्धर विद्वान गेरुवावल्ल धारण किये हुये भूमिपिशा में आकर पछुताछ करते हैं यदि उन्हें कहीं उत्तरफाशी या गंगोत्त्री में ध्यान व योगाभ्यास के निमित्त शान्तिप्रद गुहायें प्राप्त हो सकें। राजकुमार तथा कुछ विद्वान में अनुमन्धान करने वाले नव युवक विवाहों, टॉफ, फोलर तथा रेशमी वस्त्र पहिने हुये पंजाब की ओर जाते हैं। केवल दश उद्देश्य से कि उन्हें कहीं सुन्दर
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ब्रह्मचर्य साधना
कुमारी कन्याओं की प्राप्ति हो। क्या इस संसार में दुःख है या सुख है? यदि सुख है तो फिर पढ़े लिखे व्यक्ति जंगलों में क्यों भ्रमण करते हैं? यदि दुःख है तो फिर नवयुवक धन, पद और युवतियों के पीछे क्यों भागते हैं? माया विचित्र है। जीवन तथा विश्व की पहली को समझने का प्रयत्न कीजिये।
इन्द्रिय सुख में कई दोष या विकार हैं। उसमें विविध प्रकार के पाप; दुःख, दुर्बलता, आसक्ति, दाम्बत्व, मूर्खता, अधिक परिश्रम, वासना तथा मन की अशांति आदि दोष भरे रहते हैं। जिस प्रकार गली में इधर उधर भटकने वाला कुत्ता हर समय पंथरों की मार खाते रहने पर भी घर घर द्वार द्वार जाने से बाज नहीं आता, ठीक उसी प्रकार संसारी लोग भी बार बार धक्के, लातें, मुक्के खाते व अस्वस्थ दुःख पाते थके, विचार-परायण हो यथार्थ ज्ञान को प्राप्त नहीं करते।
काम से अधिक घातक विष संसार में नहीं है। विष तो केवल एक ही शरीर को दूषित करता है, परन्तु काम जन्म-जन्म में उत्पन्न होने वाले शरीरों को ग्रह करता है। संसार में एक और विन्धुओं की भर मार है तो दूसरी ओर सपों की। आपको मक्खियां, पिस्स, खटमल, मच्छर, तथा कंटकों का दुःख अलग ही है। शीष्म भ्रष्ट में आपको धूप तप्त करती है, तो जाड़े में सर्दी सताती है। इन्मनुएन्जा, प्लेग, रॉमल-पोकस, (चेचक या शितला) भूकंप, भय, अज्ञान, दुःख, शोक आदि अनेक प्रकार के रोग और चिन्तायें आपको हर समय मत्स्य करने की ताक में रहते हैं।
ब्रह्मचर्य का अभ्यास सौ पुरुष दोनों को करना
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चाहिये। स्त्रियों को भी पुरुष के नाशवान शरीर के अंगों का मानसिक चिंतन करते रहना चाहिए। ताकि उन्हें पुरुष के मांसल स्थूल शरीर से घृणा व वैराग्य की उत्पत्ति होती रहे।
काम एक प्रबल शक्ति है जिससे बचना अत्यन्त कठिन है। कुसंगति तथा आमक आधुनिक असम्भ्यता के कारण युवक युवतियों के मनस अशुद्ध संस्कारों व वासनाओं से सने रहते हैं। केवल कामसंबंधी वार्तालाप में ही वे निमग्न रहते हैं। इसलिए मैं जनता को यह सूचित कर देना चाहता हूँ कि कामोत्तेजक सभी वस्तुओं का त्याग कीजिये।
काम से घृणा करनी चाहिये न कि स्त्रियों से। वास्तव में स्त्री मां शक्ति के रूप में पूजने योग्य है। वही इस विश्व को उत्पन्न कर उसका पोषण करने वाली है। आरम्भ से जब तक पूर्ण विवेक और वैराग्य प्राप्त न हो जाय, तब तक स्त्री संघ को विप की भांति घातक समझना चाहिये। जब आप विवेक और वैराग्य प्राप्त कर लेंगे तो पुनः काम आपका कुछ भी नहीं विगाड़ सकता। आप यह जानने और अनुभव करने लगेंगे “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”—यह सब केवल ब्रह्म है। यदि आप इस पुस्तक में जहां-जहां पढ़ें “दृष्टि कोण को बदलिये” तो आप इस विषय को अच्छी प्रकार से समझ लेंगे।
एक विद्यायां ने मुझे लिखा है “स्त्री का अपवित्र मांसल शरीर मुझे अत्यन्त पवित्र व उत्तम प्रतीत होता है : “मैं कामातुर हो जाता हूँ। मैं मानव-भाव को हृदयांकित करने का पूर्ण प्रयत्न करता हूँ। मैं स्त्री को देखते ही उसके वाली का स्वरूप मान कर उसे मानसिक प्रणा
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ब्रह्मचर्य साधना
करता हूँ, परन्तु इस पर भी मेरा मन कामासक्त रहता है। ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिये? मुझे मैं सुन्दर स्त्रियों की और गुप्त-दृष्टिपात करने की लालसा ज्यों की त्यों बनी हुई।” उसके मन में विवेक और वैराग्य का उदय नहीं हुआ है। पूर्व के दूषित संस्कार और वासनायें अत्यन्त प्रबल हैं।
इंद्रिय सुख भोगों के प्रति उदासीन रहना ही वैराग्य है। किसी संबंधी की मृत्यु, धन के नारा तथा जीवन में नैराश्य आदि आकस्मिक घटनाओं के कारण जो क्षणिक वैराग्य होता है, उसे कारण वैराग्य कहते हैं। इस वैराग्य से आध्यात्मिक उन्नति में पर्याप्त सहायता नहीं मिल सकती। मन अक्सर हड़ता रहता है। और ज्योंही अक्सर प्राप्त हुआ कि वह विषय-पदार्थ को ग्रहण कर लेगा। जिन मनुष्यों में व्यवहार ज्ञान और इच्छा शक्ति की मात्रा अधिक होती है, केवल वे ही समय पर वास्तविक वैराग्य को प्राप्त करते हैं, अन्य नहीं। ऐसे बहुत कम होते हैं।
निरंतर स्मरण रखिये “भगवान की कृपा के द्वारा मैं दिनोंदिन पवित्र होता जा रहा हूँ।” सुख भोग ज्ञाते हैं, परंतु सदा रहने के लिये नहीं। यह अनित्य शरीर मृतिका मात्र है। प्रत्येक वस्तु नाशवान है। ब्रह्मचर्य ही एक मात्र उपाय है। विवेक और वैराग्य की वृद्धि कीजिये।
यदि आप वैराग्य की वृद्धि करें, यदि आप अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करें और यदि आप इस क्षण-भंगुर संसार के अवास्तविक और अशिक्षा ईन्द्रिय-सुख भोगों का, विषा या विपकी भाँति त्याग कर दें तो फिर संसार का अन्य कोई भी पदार्थ आपको प्रलोभन में नहीं
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डाल सकता । काम तथा अन्य सांसारिक पदार्थों की ओर आप का तनिक भी आकर्षण नहीं होगा । काम आप को बाधित नहीं करसकता । आपको नित्य और अनंत सुख व शान्ति की प्राप्ति होगी ।
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सातवां अध्याय
आहार संबंधी नियम
“जैसे खावे अन्न वैसो होवे मन”—भोजन आहार की शुद्धि से मन की शुद्धि होती है। भोजन जो हम खाते हैं उस में वह शक्ति विद्यमान है जो मन और शरीर को संयोजित करती है। विविध प्रकार के भोजन मन पर विविध प्रकार के प्रभाव डालते हैं। कुछ ऐसे आहार हैं जो मन और शरीर दोनों को बलवान और स्थिर बनाते हैं। इसलिए यह परमावश्यक है कि हम सदा शुद्ध और सात्विक भोजन करें। आहार का ब्रह्मचर्य के साथ घनिष्ठ संबंध है। यदि भोजन की शुद्धि पर उचित ध्यान दिया जाय तो
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