भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

परशुराम का संवाद ] [ १३५

अधुनैवाश्रमादस्मात्तपसे धृतमानसः । तत्र गत्वा महाभाग कृत्वाऽश्रमपदं शुभम् ॥७५ आराध्य महादेवं तपसा नियमेन च । प्रीतिमुत्पाद्य तस्य त्वं भक्त्यानन्यगयाचिरात् ॥७६ श्रेयो महदवाप्नोषि नात्र कार्या विचारणा । तरसा तव भक्त्या च प्रीतो भवति शङ्करः ॥७७

मुनि ने कहा था—हे वत्स ! उपह्वर में आओ । वह रामभी उन मुनि के समीप में जाकर अपने हाथ जोड़कर उनका उसने अभिवादन किया था ।७१। राम परम प्रसन्न आत्मा से उनके आगे स्थित हो गया था और प्रसन्न मन वाले भृगु ने आशीर्वादों के द्वारा अभिनन्दन किया था ।७२। उसने न अधिगत अंश वाले राम को आदर के साथ देखकर कहा था। हे वत्स ! आप मेरा वचन श्रवण करो जो इस समय में मैं आपको कहूँगा ।७३। यह वचन समस्त लोकों के तुम्हारे और हमारे हित के लिये है। हे पुत्र ! मेरे आदेश से अब महान् पर्वत हिमवान् को चले जाओ ।७४। तपश्चर्या करने के लिये अपने मन में निश्चय करके इसी समय इस आश्रम से चले जाओ । हे महाभाग, वहाँ जाकर उस आश्रम के स्थान को शुभ बना दो ।७५। यहाँ पर तपस्या और नियम से महादेवजी की समाराधना करो । चिरकाल तक अनन्य भक्ति से आप उनकी प्रीति का समुत्पादन करो ।७६। इसके करने से आप महान् श्रेय की प्राप्ति करेंगे—इस विषय में लेशमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिए। शीघ्र ही आपकी भक्ति से भगवान् शङ्कर परम प्रसन्न हो जायेंगे ।७७।

करिष्यति च ते सर्वं मनसा यद्यदिच्छसि । तुष्टे तस्मिञ्जगन्नाथे शङ्करे भक्तवत्सले ॥७८ अस्त्रग्राममशेषं त्वं वृणु पुत्र यथेप्सितम् । त्वया हितार्थं देवानां करणीयं सुदुष्करम् ॥७९ विद्यतेऽभ्यधिकं कर्म शस्त्रसाध्यमनेकंशः । तस्मात्त्वं देवदेवेशं समाराधय शङ्करम् ॥८० भक्त्या परमया युक्तस्ततोऽभीष्टमवाप्स्यसि ॥८१

१३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वे भगवान् शङ्कर तुम्हारा सभी कुछ कार्य पूर्ण कर देंगे जो-जो भी आप अपने मन में चाहेंगे। उन भक्तों पर प्यार करने वाले जगत् के स्वामी भगवान् शङ्कर के सन्तुष्ट हो जाने पर तुम को यह करना चाहिए ।७८। हे पुत्र ! जो भी तुम्हारा अभीप्सित हो वह समस्त अस्त्रों के समुदाय को आप उनसे वरदान में माँग लेना। तुमको समस्त देवों की भलाई के लिए इस परम दुष्कर कार्य को कर ही लेना चाहिए ।७९। शस्त्रों के द्वारा साधन करने के योग्य अनेक कर्म होते हैं और विशेष अधिक होते हैं। इस कारण से तुम देवों के भी आराध्य देव भगवान् शङ्कर की आराधना करो। परमाधिक भक्ति से जब तुम संयुत हो जाओगे तो तुम सम्पूर्ण अपना प्राप्त कर लोगे ।८०-८१।


परशुराम की तपश्चर्या

वसिष्ठ उवाच-इत्येवमुक्तो भृगुणा तथेत्युक्त वा प्रणम्य तम् ।
रामस्तेनाभ्यनुज्ञातश्चकार गमने मनः ॥१
भृगुं ख्यातिं च विधिवत्परिक्रम्य प्रणम्य च ।
परिष्वक्तस्तथा ताभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः ॥२
मुनींश्च तान्नमसकृत्य तैः सर्वैरनुमोदितः ।
निश्चयक्रमाश्चमात्तस्मात्तपसे कृतनिश्चयः ॥३
ततो गुरुनियोगेन तदुक्तेनैव वर्त्मना ।
हिमवंतं गिरिवरं ययौ रामो महामनाः ॥४
सोऽतीत्य विविधान्देशान्पर्वतान्सरितस्तथा ।
वनानि मुनिमुख्यानामावासांश्चात्यगाच्छनैः ॥५
तत्र तत्र विवासेषु मुनीनां निवसन्पथि ।
तीर्थेषु क्षेत्रमुख्येषु निवसन्वा ययौ शनैः ॥६
अतीत्य सुवहून्देशान्पश्यन्नपि मनोरमान् ।
आससादाचलश्रेष्ठं हिमवंतमनुत्तमम् ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—भृगु मुनि के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर राम ने उनको प्रणाम किया था और

परशुराम की तपश्चर्या ] [ १३७

राम उनके द्वारा आज्ञा प्राप्त करके वहाँ पर गमन करने का मन वाला हो गया था ।१। भृगु के सुयश का गान कर तथा विधि पूर्वक उनकी परिक्रमा करते हुए प्रणाम करके राम ने प्रस्थान करने की तैयारी की थी । उन दोनों ने उसका परिष्वजन किया था और आशीर्वचनों से राम का अभिनन्दन किया था ।२। वहाँ पर जो भी मुनिगण थे उन सबके लिए राम ने प्रणाम किया था तथा वह उन सब के द्वारा वहाँ गमन करने के लिए अनुमोदन प्राप्त करने वाला हुआ था । फिर राम उस आश्रम के स्थल से तपश्चर्या करने के लिए मन में पूर्ण निश्चय वाला होकर निकल दिया था ।३। इसके अनन्तर गुरु देव के नियोग से और उनके द्वारा बताये हुए बताये हुए मार्ग से महान् मन वाले राम ने गिरियों में परम श्रेष्ठ हिमवान् को गमन किया था ।४। मार्ग में उसको अनेक देश—पर्व्वत—नदियाँ—वन और प्रमुख मुनियों के आवास-स्थल मिले थे । उन सबका उसने धीरे-धीरे अतिक्रमण किया था ।५। मार्ग में जहाँ-जहाँ पर मुनियों के निवास स्थलों में विश्राम करते हुए और जो मुख्य क्षेत्र थे तथा तीर्थ स्थल मिले थे उनमें निवास करते हुए धीरे-धीरे वह वहाँ पर चलते चला गया था ।५। मार्ग में अनेक देशों का अतिक्रमण करके और परम मनोरथ देशों का अवलोकन करते हुए अन्त में परमोत्तम और पर्वतों में श्रेष्ठ हिमवान् पर वह पहुँच गया था ।७।

स गत्वा पर्व्वतवरं नानाद्रुमलतास्थितम् ।
ददर्श विपुलैः शृङ्गैरुलिखंतमिवांबरम् ॥८
नानाधातुविचित्रैश्च प्रदेशैरुपशोभितम् ।
रत्नौषधीभिरभितः स्फुरद्‌भिरभिशोभितम् ॥९
मरुत्संघट्टनावह्नीरसान्घ्रिपजन्मना ।
सानिलेनानलेनोच्चैर्दह्यमानं नवं क्वचित् ॥१०
क्वचिद्रविकरामर्शज्वलदकौपलाग्निभिः ।
द्रवद्धिमशिलाजातुजलशांतदवानलम् ॥११
स्फटिकांजनदुर्वर्णस्वर्णराशिप्रभाकरैः ।
स्फुरत्परस्परच्छायाशरैर्दीप्तवनं क्वचित् ॥१२
उपत्यकशिलापृष्ठबालातपनिषेविभिः ।
तुषारक्लिन्नसिद्धौघैरुद्भासितवनं क्वचित् ॥१३

१३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

क्वचिदकॊ शुसंभिन्नश्चामीकरशिलाश्रितैः । यक्षौघैर्भासितोपांतं विशद्भिरिव पावकम् ॥१४

वह उस श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँच गया था जहां पर अनेक प्रकार के वृक्ष और लताएं थीं । उसने वहाँ पर देखा था कि बहुत से ऐसे ऊँचे शिखर विद्यमान हैं जो मानों अम्बर का स्पर्श करके उस पर कुछ लिख रहे हों ।८। वहाँ पर अनेक ऐसे प्रदेश हैं जिनमें विचित्र प्रकार की बहुत सी धातुएं विद्यमान हैं और उनसे वह परम शोभा शाली हो रहा है । वहाँ अनेक प्रकार के रत्न तथा दिव्य ओषधियां हैं जो निरन्तर स्फुरण किया करते हैं और उनसे उसकी अद्भुत शोभा हो रही है ।९। कहीं पर वायु के संघटन से रगड़ खाये हुए शुष्क वृक्षों से समुत्पन्न और वायु के संयोग वाले अग्नि से कहीं पर वह दाह भी करने वाला दिखाई दे रहा था ।१०। कहीं पर सूर्य की किरणों के प्रखर स्पर्श से जलती हुई अर्कोप्लाग्नि से पिघले हुए हिम की शिलाओं के जल से वह दवानल एकदम शान्त हो गया है ।११। कहीं पर स्फटिक अञ्जन से बुरे वर्ण वाले स्वर्ण के समूह की प्रभा की किरणों के द्वारा स्फुरण करते हुए परस्पर में छाया शरों से प्रसिद्ध था ।१२। उपत्यकाओं की शिलाओं के पृष्ठ भाग पर बालातप का सेवन करने वाले तुषार से क्लिन्न सिद्धों के समुदाय से वह वह वन कहीं पर उद्भासित हो रहा था । किसी-किसी जगह पर सूर्य की किरणों से संभिन्न सुवर्ण की शिलाओं पर समाश्रय ग्रहण करने वाले यक्षों के समुदायों से पावक में प्रवेश करने वालों की तरह उसका उपान्त भासित हो रहा था ।१४।

दरीमुखविनिष्क्रांततरक्षूत्पतनाकुलः । मृगयूथार्त्तसन्नादैरापूरितगुहं क्वचित् ॥१५ युद्धद्यद्वराहशार्दूलयूथपेरितरेतरम् । प्रसभोन्मृष्टकांतोरुशिलातरुतटं क्वचित् ॥१६ कलभोन्मेषणाकृष्टकारिणीभिरनुद्रुतः । गवयैः खुरसंक्षुण्णशिलाप्रस्थतटं क्वचित् ॥१७ वासितार्थेऽभिसंवृद्धमदोन्मत्तमतंगजैः । युद्धद्यद्भिश्चूर्णितानेकगंडशैलवनं क्वचित् ॥१८ बृंहितश्रवणामर्षान्मातंगानभिधावताम् ।

परशुराम की तपश्चर्या } [ १३६

सिंहानां चरणक्षुण्णनखभिन्नोपलं क्वचित् ॥१६
सहसा निपतत्सिंहनखनिर्भिन्नमस्तकः ।
गजैराक्रन्दनादेन पूर्यमाणं वनं क्वचित् ॥२०
अष्टपादबलाकृष्टकेसरा दारुणाप्रवैः ।
भेद्यमानाखिलशिलागंभीरकुहरं क्वचित् ॥२१

कहीं पर दरियों के मुख से निकले हुए तरक्षुओं के उत्पतन ऊपर की ओर (उछाल) से समाकुल मृगों के आत्त नादों से जिसकी गुहा समापूरित हो रही थी ।१५। किसी स्थल पर एक दूसरे से परस्पर में युद्ध करते हुए वराह और शार्दूलों के यूथपतियों के द्वारा बलात् उन्मृष्ट सुन्दर एवं विशाल शिला एवं तटके तरुवर जिसमें विद्यमान थे ।१६। कहीं पर कलभों के उन्मेषण से आकृष्ट हुई करिणियों के द्वारा भागे हुए गवयों के खुर से वहाँ के तट प्रस्थ संक्षुण्ण थे ।१७। किसी स्थान पर वासित अर्थ में विशेष बढ़े हुए मद से उन्मत्त गजों से जो कि परस्पर में युद्ध कर रहे थे गण्ड स्थलों के द्वारा अनेक शैल के वनों को वहाँ पर चूर्णित कर दिया था ।१८। कहीं पर हाथियों की ध्वनि के श्रवण से जो क्रोध हुआ उसके कारण गजों को खदेड़ते हुए सिंहों के चरणों के क्षुण्ण नखों से पाषाण भिन्न हो गये थे ।१६। कहीं पर वहाँ ऐसा स्थल था कि अचानक आक्रमण करने वाले सिंहों के नाखूनों से युक्त हाथियों के क्रन्दन की ध्वनि से सम्पूर्ण वन पूरित होरहा था ।२०। अष्टपादों के द्वारा बलपूर्वक जिनके केसर खींच लिए गये हैं उनके परम दारुण शब्द से कहीं कहीं पर पर्वत की गम्भीर गुफाएँ भी सब भेद्यमान थी ।२१।

संरब्धानेक शबरप्रसक्त ऋक्षयूथपैः ।
इतरेतरसंमर्द विप्रभग्नदृषत्क्वचित् ॥२२
गिरिकुंजेषु संक्रीडत्करिणीमद्विपं क्वचित् ।
करेणुमद्रबन्मत्तगजाकलितकाननम् ॥२३
स्वपत्सिंहमुखश्वासमरूत्पूर्णदरीशतम् ।
गहनेषु गुरुत्राससाशंकविहरन्मृगम् ॥२४
कंटकशिलष्टलांगूललोमत्रुटनकातरैः ।
क्रीडितं चमरीयूथैर्मदमंदविचारिभिः ॥२५

१४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गिरिकंदरसंसक्तकिन्नरीसमुदीरितैः । सतालनादैरुदितैर्भूताशेषदिशामुखम् ।।२६ अरण्यदेवतानां च चरंतीनामितस्ततः । अलक्तकरसक्लिन्नचरणांकितभूतलम् ।।२७ मयूरकेकिनीवृन्दैः संगीतमधुरस्वरैः । प्रवृत्तनृत्तं परितो विततोदग्रबर्हिभिः ।।२८ किसी स्थल पर संरब्ध बहुत से शबरों के द्वारा प्रसक्त रीछों के यूथ पतियों के आनस में एक दूसरे के साथ संमर्द में शिलाएं भग्न हो गयीं थीं ।२२। कहीं पर पर्वत की कुञ्जों में करिणियां क्रीड़ाएं कर रही थीं और वहाँ पर कोई करी नहीं था तब करेणु पर मत्तगज दौड़कर चले जा रहे थे इस प्रकार से वहाँ कानन समाकलित था ।२३। कहीं पर वहाँ ऐसा भी बल था जहाँ पर सोते हुए सिंहों के मुखों के श्वासों की वायु से सैकड़ों गुहाएं पूरित हो रहीं थीं और वनों में बड़े भारी भय के कारण मृगगण शङ्कित होकर ही विहार कर रहे थे ।२४। किसी जगह पर यह वन चमरी गौओं के द्वारा क्रीड़ा का स्थल बना हुआ था जिनके पूँछों में कांटे लगे हुए थे और उनसे लोम टूट गये थे । जिसके कारण वे भयभीत होकर मन्दगति से विच-रण कर रही थीं ।२५। कहीं पर गिरि की कन्दराओं में से सक्त किन्नरियों के समुदाय थे और उनके द्वारा कहे हुए ताल के नादों तथा गीतों से सभी दिशाएँ पूरित थीं ।२६। उस महान् गिरि पर का वन इधर-उधर विचरण करती हुईं अरण्य देवताओं के चरणों में लगे हुए महावर के रस से वह भूतल चरणों के चिह्नों से अङ्कित हो रहा था ।२७। सङ्गीत के मधुर स्वरों से समन्वित-मयूर-मयूरियों के झुण्ड अपनी पंखों को फैलाकर कहीं पर आनन्द पूर्वक नृत्य कर रहे थे ।२८।

रामो मतिमतां श्रेष्ठस्तपसे च मनो दधे । शाकमूलफलाहारो नियतं नियतेंद्रियः ।।२६ तपश्चचार देवेशं विनिवेश्यात्ममानसे । भृगूपदिष्टमार्गेण भक्त्या परमया युतः ।।३० पूजयामास देवेशमेकाग्रमनसा नृप । अनिकेतः स वर्षासु शिशिरे जलसंश्रयः ।।३१

परशुराम की तपश्चर्या ] [ १४१

ग्रीष्मे पंचाग्निमध्यस्थः श्चचारैवं तपश्चिरम् ।
रिपून्निर्जित्य कामादीनूर्मिष्ट्कं विधूय च ॥३२
द्वंद्वैरनुद्वेजितधीस्तापदोषैरनाकुलः ।
यमैः सनियमैश्चैव शुद्धदेहः समाहितः ॥३३
वशीचकार पवनं प्राणायामेन देहगम् ।
जितपद्मासनो मौनी स्थिरचित्तो महामुनिः ॥३४
वशीचकार चाक्षाणि प्रत्याहारपरायणः ।
धारणाभिः स्थिरीचक्रे मनश्चंचलमात्मवान् ॥३५

ऐसे अनेक परम मनोरथ दृश्यों से परिपूर्ण उस हिमवान् गिरि पर एक आश्रम अपना बनाकर मतिमानों में परमश्रेष्ठ राम ने तपस्या करने का मन में विचार किया था और वह तपश्चर्या करने के लिये शाकों तथा मूलों के आहार करने वाला होकर नियत इन्द्रियों वाला बन गया था ।२६। उसने देवेश भगवान् शङ्कर को अपने मन में विनिवेशित करके तपस्या की थी । भृगुमुनि ने जो भी मार्ग बताया था उसी के अनुसार वह परमाधिक भक्ति से युक्त हो गया था ।३०। हे नृप ! उसने एक निष्ठ मन से देवेश्वर की पूजा की थी । वर्षा काल में भी वह बिना कहीं पर आश्रय ग्रहण किये हुए खुले में तप करने लगा था और शिशिर ऋतु में भी जल में स्थित रहा करता ।३१। ग्रीष्म में पाँच अग्नियों के मध्य में बैठा रहता था । इस रीति से राम ने तप किया था और चिरकाल वह तपश्चर्या की थी । जिसमें षट् ऊर्मियों का विधूनन करके काम क्रोध-लोभ-मोह आदि शत्रुओं को भली भाँति जीत लिया था ।३२। जितने भी शीत-उष्ण आदि द्वन्द्व हैं इनसे उसकी बुद्धि उद्वेजित नहीं होती थी और वह ताप के दोषों से कभी व्याकुल भी नहीं होता था । यमों और नियमों के द्वारा उसका देह परम शुद्ध था तथा वह बहुत ही समाहित रहता था ।३३। उसके देह में जो वायु था उसको उसने प्राणायामों के द्वारा अपने वश में कर लिया था । वह महान् मुनि मौनधारी-पद्मासन को जीत लेने वाला और परम स्थिर चित्त वाला था ।३४। प्रत्याहार में तत्पर रहकर उसने अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया था । आत्मवान् उस राम ने धारणाओं के द्वारा परम चञ्चल तथा प्रमथन शील बलवान् मन को भी स्थिर कर लिया था जो कभी भी साधारण या काबू में नहीं आया करता है ।३५।

१४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ध्यानेन देवदेवेशं ददर्श परमेश्वरम् । स्वस्थांतःकरणो मैत्रः सर्वबाधाविवर्जितः ॥३६ चिंतयामास देवेशं ध्याने दृष्ट्वा जगद्गुरुम् । ध्येयावस्थितचित्तात्मा निश्चलेंद्रियदेहवान् ॥३७ आकालावधि सोऽतिष्ठन्निवातस्थप्रदीपवत् । जपंश्च देवदेवेशं ध्यायंच्च स्वमनीषया ॥३८ आराधयदमेयात्मा सर्वभावस्थमीश्वरम् । ततः स निष्फल रूपमेश्वरं यन्निरंजनम् ॥३६ परं ज्योतिरचिंत्यं यद्योगिध्येयमनुत्तमम् । नित्यं शुद्धं सदा शांतमतींद्रियमनौपमम् । आनंदमात्रमचलं व्याप्ताशेषचराचरम् ॥४० चिंतयामास तद्रूपं देवदेवस्य भार्गवः । सुचिरं राजशार्दूल सोऽहंभावसमन्वितः ॥४१

ध्यान के द्वारा राम ने देवों के भी देवेश्वर भगवान् शङ्कर का दर्शन प्राप्त कर दिया था । उनका अन्तःकरण परम स्वस्थ था तथा वह सबका मित्र और समस्त बाधाओं से रहित था ।३६। इन जगद्गुरु को ध्यान में देखकर उसने देवेश्वर का चिन्तन किया था । वह अपने ध्येय प्रभु में अवस्थित चित्त और आत्मा वाला था । उसकी इन्द्रियां और देह निश्चल थे ।३७। वह अपने काल की अवधि तक निर्वात स्थान में दीपक के समान वहाँ पर स्थित रहा था । वह अपनी बुद्धि से देवदेव का जप तथा ध्यान करता हुआ वहाँ पर स्थित था ।३८। उस अमेय आत्मा वाले ने सब भावों में स्थित ईश्वर की आराधना की थी । इसके अनन्तर उस प्रभु का चिन्तन किया था जो फल रहित रूप है—ईश्वर और जो निरंजन है ।३६। जो परम ज्योति स्वरूप अचिन्तनीय-योगियों के द्वारा ध्यान करने के योग्य और सर्वोत्तम है । जो नित्य शुद्ध, सदा शान्त-इन्द्रियों की पहुँच से परे और उपमा से रहित है । जो केवल आनन्द के स्वरूप वाला अचल और समस्त चर और अचर में व्याप्त है ।४०। ऐसे देवों के देव के उस रूप का उस भार्गव ने हे राज शार्दूल ! बहुत समय ध्यान किया था और वह सोऽहं भाव में समन्वित हो गया था अर्थात् ध्येय और ध्याता की एक रूपता हो गयी थी ।४१। ❀

परशुराम परीक्षा ] [ १४३

परशुराम परीक्षा

तपस्विनं तदा राममेकाग्रमनसं भवे ।
रसस्यैकांतनिरतं नियतं शंसितव्रतम् ॥१
श्रुत्वा तमृषयः सर्वे तपोनिर्धूतकल्मषाः ।
ज्ञानकर्मवयोवृद्धा महांन्तः शंसितव्रताः ॥२
दिदृक्षवः समाजग्मुः कुतूहलसमन्विताः ।
ख्यापयंतस्तपः श्रेष्ठं तस्य राजन्महात्मनः ॥३
भृग्वत्रिक्रतुजाबालिवामदेवमृकंडवः ।
संभावयंतस्ते रामं मुनयो वृद्धसंमताः ॥४
आजग्मुराश्रमं तस्य रामस्य तपसस्तपः ।
दूरादेव महांत्तस्ते पुण्यक्षेत्रनिवासिनः ॥५
गरीयं सर्वलोकेषु तपोऽग्र्यं ज्ञानमेव च ।
प्रशस्यं तस्य ते सर्वे प्रययुः स्वं स्वमाश्रमम् ॥६
एवं प्रवर्त्तितस्तस्य रामस्य भगवाञ्छिवः ।
प्रसन्नचेता नितरां बभूव नृपसत्तम ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—उस समय में भगवान् शिव में एकाग्र मन वाले—एकान्त में एक निष्ठ होकर निरत रहने वाले—नियत और शंसित व्रत से युक्त उस तपस्वी राम का श्रवण करके तप से निर्धूत कल्मष वाले ऋषियों ने जो ज्ञान और कर्मों में वृद्ध महान् और शंसित व्रत वाले थे सभी दर्शन की इच्छा वाले हुए थे ।१-२। देखने की इच्छा से समन्वित वे सब कुतूहल वाले वहाँ पर आये थे । हे राजन् ! वे सब महान् आत्मा वाले उस राम के परम श्रेष्ठ तप का वर्णन करने वाले थे ।३। बड़े-बड़े मुनियों के द्वारा संमत भृगु—अत्रि—क्रतु—जाबालि-वामदेव और मृकण्डु सब उस राम की प्रशंसा करने वाले थे ।४। तपस्या का तपन करने वाले उस राम के आश्रम में सब समागत हुए थे । ये सब बहुत महान् और पुण्य क्षेत्र के निवास करने वाले बहुत ही दूर से वहाँ आये थे ।५। समस्त लोकों में यह तप बहुत बड़ा उत्तम है और ज्ञान भी है । इस रीति से उन सब ने उसके तप की प्रशंसा की थी और फिर वे सभी अपने-अपने आश्रम को चले गये थे ।६। हे नृपों

१४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

में श्रेष्ठ ! इस प्रकार से तपश्चर्या में प्रवृत्त होते हुए राम के ऊपर भगवान् शिव बहुत ही प्रसन्न चित्त वाले हो गये थे ।७।

जिज्ञासुस्तस्य भगवान् भक्तिमात्मनि शङ्करः । मृगव्याधवपुर्भूत्वा ययौ राजंस्तदंतिकम् ॥८ भिन्नांजनचयप्रख्यो रक्तांतायतलोचनः । शरचापधरः प्रांशुर्वज्रसंहननो युवा ॥६ उत्तुंगहनुबाह्वंसः पिंगलश्मश्रुमूद्धर्जः । तांसविस्रवसागंधी सर्वप्राणिविहिंसकः ॥१० सकंटकुलतास्पर्शक्षतारूषितविग्रहः । सासृक्संचर्व्वमाणश्च मांसखंडमनेकणः ॥११ मांसभारद्वयालंविविधानानतकंधरः । आरुजंस्तर सा वृक्षानूरुवेगेन संघशः ॥१२ अभ्यवर्त्तत तं देशं पादचारीव पर्वतः । आसाद्य सरसस्तस्य तीरं कुसुमितद्रुमम् ॥१३ न्यदधान्मांसभारं च स मूले कस्यचित्तरोः । निषसाद क्षणं तत्र तरुच्छायामुपाश्रितः ॥१४

हे राजन् ! भगवान् शंकर आत्मा में उसकी भक्ति के विषय में जानने की इच्छा वाले होकर पशुओं के व्याध का रूप धारण करके उस राम के समीप में गये थे ।८। तब व्याध के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—वह पिसे हुए अञ्जन के ढेर के समान कृष्ण वर्ण वाला था । उसके बड़े और लाल वर्ण के नेत्र थे—वह शर और चाप धारण किये हुए था—लम्बे कद वाला तथा वज्र के समान सख्त शरीर वाला और युवा था ।६। उस शबर के बाहु-कन्धे और ठोड़ी ऊँचे थे तथा उसके माथे के केश और मूँछें पिङ्गल वर्णके थे । वह मांस, विस्र और वसा (चर्बी) की गन्ध वाला था अर्थात् उसके शरीर से बुरी गन्ध आ रही थी । वह सभी प्राणियों की हिंसा करने वाला था ।१०। काँटों के समुदाय के निरन्तर स्पर्श करते रहने से बहुत से क्षतों के होने कारण उसका शरीर रूषित था । वह रुधिर के सहित अनेक मांस के टुकड़ों को चबा रहा था ।११। मांस के भार से जो कि उसके दोनों ओर लदा हुआ था उसकी गरदन कुछ नीचे की ओर झुकी हुई थी । बहुत

परशुराम परीक्षा ] [ १४५

बड़े वेग से युक्त तेजी के साथ चलने से वृक्षों के समूह को वह हिलाता हुआ चल रहा था ।१२। वह पदों से गमन करने वाले पर्वत के समान ही उस स्थल पर उपस्थित हो गया था । वह पुष्पों से समन्वित उस सरोवर के तट पर समागत हुआ था ।१३। उसने किसी वृक्ष की जड़ में उस मांस के भार को उतार कर रख दिया था और कुछ क्षणों के लिए वहां पर उसने वृक्ष की छाया का आश्रय ग्रहण किया था ।१४।

तिष्ठन्तं सरसस्तीरे सोऽपश्यद्भृगुनंदनम् । ततः स शीघ्रमुत्थाय समीपमुपसृत्य च ॥१५ रामाय सेषुचापाभ्यां कराभ्यां विदधैऽजलिम् । सजलांभोदसन्नादगंभीरेण स्वरेण च ॥१६ जगाद भृगुशार्दूलं गुहांतरविसर्पिणा । तोषप्रवर्षव्याधोऽयं वसाम्यस्मिन्महावने ॥१७ ईशोऽहमस्य देशस्य सप्राणितरुवीरुधः । चरामि समचित्तात्मा नानासत्वामिषाशनः ॥१८ समश्च सर्वभूतेषु न च पित्रादयोऽपि मे । अभक्ष्यागम्यपेयादिच्छंदवस्तुषु कुत्रचित् ॥१६ कृत्याकृत्यविधौ चैव न विशेषितधीरहम् । प्रपन्नो नाभिगमनं निवासमपि कस्यचित् ॥२० शक्रस्यापि बलेनाहमनुमन्ये न संशयः । जानते तद्यथा सर्वे देशोऽयं मदुपाश्रयः ॥२१

उस महान् भयङ्कर स्वरूपवान शवर ने वहाँ पर सरोवर के तट पर ध्यान में बैठे हुए उस भृगु नन्दन को देखा था । इसके उपरान्त वह बहुत शीघ्र उठकर उस राम के समीप में आ गया था ।१५। उसने राम के लिये बाण और चाप से युक्त करों से अञ्जलि की थी और जल से परिपूर्ण मेघ के समान परम गम्भीर स्वर से उस भृगु शार्दूल से कहा था जो कि स्वर पर्वत की गुहाओं में फैल गया था । मैं तोष-प्रवर्ष व्याध हूँ और इसी महा-वन में निवास किया करता हूँ ।१६-१७। इस स्थल के समस्त प्राणी और वनस्पतियों का मैं स्वामी हूँ । अनेक जीवों के मांस का भोजन करने वाला

१४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मैं समचित और आत्मा वाला हूँ और यहाँ पर सञ्चरण किया करता हूँ ।१८। मैं सब प्राणियों के साथ समान व्यवहार करने वाला हूँ और मेरे कोई भी माता-पिता आदि नहीं हैं। मैं कहीं पर भी अभक्ष्य-अगम्य और अपेय आदि वस्तुओं में स्वतन्त्रता से उनका सेवन करने वाला हूँ ।१९। कृत्य और अकर्त्तव्य कार्यों की विधि में मेरी कुछ भी विशेषता वाली बुद्धि नहीं है। किसी के भी निवास स्थान पर मैं अभिगमन करने वाला नहीं हूँ ।२०। इन्द्र के भी बल से मैं नहीं डरता हूँ—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। सभी लोग इस बात को भली भांति जानते हैं कि यह स्थल मेरे ही आश्रय वाला है अर्थात् यहाँ पर केवल मैं ही रहा करता हूँ ।२१।

तस्मान्न कश्चिदायाति ममात्रानुमतिं विना ।
इत्येष मम वृत्तान्तः कार्त्स्न्येन कथितस्तव ॥२२
त्वं च मे ब्रूहि तत्त्वेन निजवृत्तमशेषतः ।
कस्त्वं कस्मादिहायातः किमर्थमिहाधिष्ठितः ।
उद्यतोऽन्यत्र वा गंतुं किं वा तव चिकीर्षितम् ॥२३
वसिष्ठ उवाच—इत्येवमुक्तः प्रहसंस्तेन रामो महाद्युतिः ।
तूष्णीं क्षणमिव स्थित्वा दध्यौ किंचिदवाङ्मुखः ॥२४
कोऽयमेव दुराधर्षः सजलाम्भोदनिस्वनः ।
ब्रवीति च गिरोऽत्यर्थं विस्पष्टार्थपदाक्षराः ॥२५
किं तु मे महतीं शंकां तनुरस्य तनोति वै ।
विजातिसंश्रयत्वेन रमणीया यथा शराः ॥२६
एवं चिंतयतस्तस्य निमित्तानि शुभानि वै ।
बभूवुर्भुवि देहे च स्वाभिप्रेतार्थदान्यलम् ॥२७
ततो विमृश्य बहुशो मनसा भृगुपुंगवः ।
उवाच शनकैर्व्याधं वचनं सूनृताक्षरम् ॥२८

इस कारण से मेरी अनुमति के बिना यहाँ पर कोई भी नहीं आया करता है। यही मेरा वृत्तान्त है जो पूर्णतया तुम्हारे सामने मैंने कह दिया है ।२२। और अब आप अपना पूरा हाल तात्त्विक रूप से मुझे बतलाइए। आप कौन हैं—किस कारण से यहाँ पर समागत हुए हैं और किस प्रयोजन

परशुराम परीक्षा ] [ १४७

की सिद्धि के लिये यहाँ पर समधिष्ठित हो रहे हैं ? अथवा यहाँ से किसी अन्य स्थान में जाने के समुद्यत हैं अथवा आपकी क्या करने की इच्छा है ।२३। श्री वसिष्ठ जी ने कहा—जब उसके द्वारा इस प्रकार से कहा गया तो महान् द्युति से सम्पन्न राम ने हँसकर एक क्षण के लिए चुप होकर कुछ नीचे की ओर मुख करके चिन्तन किया था ।२४। उसने अपने मन में विचार किया था कि यह दुराधर्ष कौन है जिसकी ध्वनि सजल मेघ के सदृश है और अधिक सुस्पष्ट अर्थ वाले पदों से युक्त वाणी बोलता है ।२५। इसका वपु मेरे हृदय में बहुत अधिक शङ्का समुत्पन्न कर रहा है । यह विजातीय है और नीच जाति का समाश्रय पाकर भी इसका शरीर शर की ही भाँति परम रमणीय है ।२६। इस तरह से चिन्तन करते हुए उसको परम शुभ निमित्त हो रहे थे जो भूमि में—देह में अपने अभीष्ट अर्थ के लिये पूर्ण रूप से प्रदान करने वाले थे ।२७। इसके अनन्तर उस भृगु कुल में श्रेष्ठ ने मन से बहुत बार विचार करके धीरे से उस व्याध से सूनृत अक्षरों वाले वचन कहे थे ।२८।

जामदग्न्योऽस्मि भद्रं ते रामो नाम्ना तु भार्गवः । तपश्चर्तुं मिहायातः सांप्रतं गुरुशासनात् ॥२९ तपसा सर्वलोकेशं भक्त्या च नियमेन च । आराधयितुमस्मिंस्तु चिरायाहं समुद्यतः ॥३० तस्मात्सर्वेश्वरं सर्वशरण्यमभयप्रदम् । त्रिनेत्रं पापदमनं शङ्करं भक्तवत्सलम् ॥३१ तपसा तोषयिष्यामि सर्वज्ञं त्रिपुरान्तकम् । आश्रमेऽस्मिन्सरस्तीरे नियमं समुपाश्रितः ॥३२ भक्तानुकंपी भगवा न्यावत्प्रत्यक्षतां हरः । उपैति तावदत्रैव स्थास्यामीति मतिर्मम ॥३३ तस्मादितस्त्वयाद्यैव गन्तुमन्यत्र युज्यते । न चेद्भवति मे हानिः स्वकृतेर्नियमस्य च ॥३४ माननीयोऽथ वाहं ते भक्त्या देशांतरातिथिः । स्वनिवासमुपायातस्तपस्वी च तथा मुनिः ॥३५

१४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आपका कल्याण हो—मैं जमदग्नि का पुत्र नाम से मैं भार्गव राम हूँ । इस समय में मैं अपने गुरुदेव के आदेश से यहाँ पर तपश्चर्या का समाचरण करने के ही लिए आया हूँ ।२९। तपस्या-भक्ति और नियम से इस पर्वत पर सर्वलोकेश्वर की आराधना करने को चिरकाल के लिये मैं समुद्यत हुआ हूँ ।३०। इस कारण से सर्वेश्वर—सबकी रक्षा करने वाले—अभय के देने वाले—समस्त पापों के दमन करने वाले—अपने भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले तीन नेत्रों से समन्वित भगवान् शङ्कर को मैं प्रसन्न करूँगा ।३१। मैं अपने तप के द्वारा सर्वज्ञ भगवान् त्रिपुरारि को को सन्तुष्ट करूँगा मैं इस सरोवर के तट पर स्थित आश्रम में नियम से समुपाश्रित हुआ हूँ ।३२। अपने भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले भगवान् शङ्कर जब तक प्रत्यक्ष मुझे दर्शन नहीं देते हैं तब तक मैं यहीं पर स्थित रहूँगा—यही मेरा विचार है ।३३। इस कारण से आप यहाँ से नहीं जाते हैं तो मेरे अपने कृत्य में और नियम में हानि होती है ।३४। अथवा यों समझ लीजिए कि मैं अन्य देश से आया हुआ आपका एक अतिथि हूँ अतएव भक्ति से मैं आपका माननीय होता हूँ । मैं आपके ही अपने निवास स्थल में उपगत हो गया हूँ जो कि मैं एक तपस्वी तथा मुनि हूँ ।३५।

त्वत्संनिधौ निवासो मे भवेत्पापाय केवलम् ।
तव चाप्यसुखोदकं मत्समीपनिषेवणम् ॥३६॥

स त्वं मदाश्रमोपांते परिचक्रमणादिकम् ।
परित्यज्य सुखी भूया लोकयोरुभयोरपि ॥३७॥

वसिष्ठ उवाच—इति तस्य वचः श्रुत्वा स भयो भृगुपुंगवम् ।
उवाच रोषताम्राक्षस्ताम्राक्षमिदमुत्तरम् ॥३८॥

ब्रह्मन् किमिदमत्यर्थं समीपे वसति मम ।
परिगर्ह्यसे येन कृतघ्नस्येव सांप्रतम् ॥३९॥

किं मयापकृतं लोके भवतोऽन्यस्य वा क्वचित् ।
अनागस्कारिणं दांतं कोऽवमन्येत नामतः ॥४०॥

सन्निधिः परिहर्त्तव्यो यदि मे विप्रपुंगव ।
दर्शनं सह संवासः संभाषणमथापि च ॥४१॥

परशुराम परीक्षा ] [ १४६

आयुष्मताऽधुनेवास्मादपसर्त्तव्यमाश्रमात् । स्वसंश्रयं परित्यज्य क्वाहं यास्ये बुभुक्षितः ॥४२॥

आपके समीप में मेरा निवास होना केवल पाप के ही लिए होगा और आपका भी मेरे निकट रहना भविष्य में असुख देने वाला ही होगा अर्थात् मेरे समीप में रहने से आपको भी कष्ट ही होगा ।३६। ऐसे आप मेरे आश्रम के समीप में इधर-उधर घूमने-फिरने के चक्र काटने को त्यागकर आप भी दोनों लोकों में सुखी होइये ।३७। वसिष्ठ जी ने कहा—उस राम के इन वचनों का श्रवण करके वह रोष से लाल नेत्रों को करके रक्त नेत्रों वाले भृगु श्रेष्ठ से यह उत्तर देते हुए कहा ।३८। हे ब्रह्मन् ! मेरे समीप में रहने की आप इतनी अधिक अब क्यों बुराई कर रहे हैं जैसे कोई कृतघ्न किया करता है ।३६। मैंने इस लोक में आपका अथवा कहीं पर अन्य किसी का क्या अपकार किया है ? जो पाप या अपराध नहीं करने वाला है उसका नाम से ही कौन अपमान किया करता है अर्थात् ऐसा तो कोई भी करता है ।४०। हे श्रेष्ठ विप्र ! यदि आपको मेरा समीप में रहना हटाना है और मेरा देखना—साथ में वार्तालाप और एक जगह पर साथ रहना भी दूर करना है तो आयुष्मान् आपको इसी समय में इस आश्रम से अपसरण कर जाना चाहिए । मैं तो बुभुक्षित हूँ और अपने निवास स्थान का परित्याग करके कहाँ पर जाऊँगा ।४१-४२।

स्वाधिवासं परित्यज्य भवता चोदितः कथम् । इतोऽन्यस्मिन् गमिष्यामि दूरे नाहं विशेषतः ॥४३॥ गम्यतां भवताऽन्यत्र स्थीयतामत्र वेच्छया । नाहं चालयितुं शक्यः स्थानादस्मात्कथंचन ॥४४॥ वसिष्ठ उवाच—तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य किंचित्कोपसमन्वितः तमुवाच पुनर्वाक्यमिदं राजन्भृगूद्वहः ॥४५॥ व्याघ्रजातिरियं क्रूरा सर्वसत्त्वभयावहा । खलकर्मरता नित्यं धिक्कृता सर्वजंतुभिः ॥४६॥ तस्यां जातोऽसि पापीयान्सर्वप्राक्षिविहिंसकः । स कथं न परित्याज्यः सुजनैः स्यात्तु दुर्मते ॥४७॥

१५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शरीरत्राणकारुण्यात्समीपं नोपसर्पसि । यया त्वं कंटकादीनामसहिष्णु तया व्यथाम् ॥४६

आपने अपने स्थान को जो कि आवास का स्थल है मुझे कैसे प्रेरित किया है ? मैं तो यहाँ से विशेष दूरी पर नहीं जाऊँगा ।४३। आपको ही अन्य स्थान में चले जाना चाहिए अथवा इच्छा से यहाँ पर स्थित रहिए । मैं तो इस स्थान से किसी भी प्रकार से भेजा नहीं जा सकता हूँ ।४४। बसिष्ठ जी ने कहा—उस शबर वेषधारी के इस वचन का श्रवण करके वह भृगु कुल के उद्वहन करने वाले राम को कुछ क्रोध आ गया था और हे राजन् ! राम ने उससे यह वाक्य फिर कहा था ।४५। यह व्याध की जो जाति है वह बहुत ही क्रूर है और समस्त प्राणियों को भय देने वाली है । यह जाति नित्य ही दुष्ट कर्मों के करने वाली होती है और सभी जन्तुओं द्वारा यह धिक्कृत है ।४६। उसी व्याध जाति में तुमने जन्म ग्रहण किया है अतः आप समस्त प्राणियों की हिंसा करने वाले अधिक पापी हैं । हे दुष्ट बुद्धि वाले ! वह आप सुजनों के द्वारा कैसे नहीं परित्याग करने के योग्य होते हैं ? ।४७। इस कारण से अपने आपको विशेष हीन जाति वाला समझ कर यहाँ से शीघ्र ही अन्य किसी स्थानमें चले जाओ । इस विषय में अधिक सोच विचार करने की आवश्यकता नहीं करनी चाहिए ।४८। अपने शरीर के परित्राण करने की दया से मेरे समीप मैं नहीं आते हो क्योंकि आपको कण्टक आदि की व्यथा है उसको आप सहन नहीं कर रहे हैं । अपने दुःख के ही समान दूसरे प्राण धारियों का दुःख हुआ करता है ।४६।

तथाऽवेहि समस्तानां प्रियाः प्राणाः शरीरिणाम् । व्यथा चाभिहतानां तु विद्यते भवतोऽन्यथा ॥५०

अहिंसा सर्वभूतानिमिति धर्मः सनातनः । एतद्विरुद्धाचरणान्नित्यं सद्भिर्विगर्हितः ॥५१

आत्मप्राणाभिरक्षार्थं त्वमशेषशरीरिणः । हनिष्यसि कथं सत्सु नाप्नोषि वचनीयताम् ॥५२

तस्माच्छीघ्रं तु भो गच्छ त्वमेव पुरुषाधम । त्वया मे कृत्यदोषस्य हानिश्च न भविष्यति ॥५३

न चेत्स्वयमितो गच्छेस्ततस्तव बलादपि ।

परशुराम परीक्षा ] [ १५१

अपसर्पणताबुद्धिमहमुत्पादये स्फुटम् ॥५४
क्षणाद्धंमपि ते पाप श्रेयसी नेह संस्थितः ।
विरुद्धाचरणो नित्यं धर्मद्विट् को लभेच्च शम् ॥५५
वसिष्ठ उवाच—रामस्य वचनं श्रुत्वा प्रीतोऽपि तमिदं वचः ।
उवाच संक्रुद्ध इव व्याघ्ररूपी पिनाकधृक् ॥५६

उसी भाँति से समस्त प्राणधारियों को अपने प्राण परम प्रिय हुआ करते हैं—ऐसा ही अपने मन में समझ लो। आप जिनका हनन किया करते हैं उनकी भी व्यथा इसी प्रकार से हुआ करती है और अन्य प्रकार की नहीं होती है ।५०। प्राणिमात्र की हिंसा न करना ही सनातन अर्थात् सदा से चले आने वाला धर्म है। इसके विरुद्ध कार्यों का समाचरण करना ही नित्य सत्पुरुषों के द्वारा बुरा माना जाता है ।५१। अपने प्राणों की अभिरक्षा के ही लिए हम सब शरीर धारियों का हनन किया करेंगे। फिर आगे क्यों नहीं सत्पुरुषों में निन्दा को प्राप्त होंगे ।५२। हे अधम पुरुष ! इस कारण से आप बहुत शीघ्र ही यहाँ से चले जाओ। तुम्हारे द्वारा किए कृत्यों के दोष से मेरे कार्य की कोई हानि नहीं होगी ।५३। यदि आप स्वयं ही यहाँ से नहीं गमन करते हैं तो मैं बलपूर्वक भी स्पष्टतया तुम्हारे अपसर्पण की बुद्धि समुत्पन्न कर देता हूँ ।५४। हे पापात्मन् ! यहाँ पर आधे क्षण भी आपकी संस्थिति अच्छी नहीं है। विरुद्ध आचरण वाला धर्म का द्वेषी ऐसा कौन है जो सदा कल्याण को प्राप्त किया करता है अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं होता है ।५५। श्री वसिष्ठजी ने कहा—राम के ऐसे वचनों को सुनकर मन में बहुत प्रसन्न होते हुए भी वे स्वरूपधारी भगवान् शंकर क्रुद्ध के ही समान उस राम से यह वचन बोले थे ।५६।

सर्वमेतदहं मन्ये व्यर्थं व्यवसितं तव ।
कुतस्त्वं प्रथमो ज्ञानी कुतः शंभुः कुतस्तपः ॥५७
कुतस्त्वं क्लिश्यसे मूढ तपसा तेन तेऽधुना ।
ध्रुवं मिथ्याप्रवृत्तस्य न हि तुष्यति शङ्करः ॥५८
विरुद्धलोकाचरणः शंभुस्तस्य वितुष्ये ।
प्रतपत्यबुधो मर्त्यस्तबां विना कः सुदुर्मते ॥५९
अथवा च गतं मेऽद्य युक्तमेतदसंशयम् ।

१५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

संपूज्य पूजकविधौ शंभोस्तव च संगमः ॥६० त्वया पूजयितुं युक्तः स एव भुवने रतः । संपूजकोऽपि तस्य त्वं योग्यो नात्र विचारणा ॥६१ पितामहस्य लोकानां ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । शिरश्छित्त्वा पुनः शम्भुर्ब्रह्महत्यामवाप्तवान् ॥६२ ब्रह्महत्याभिभूतेन प्रायस्त्वं शंभुना द्विज । उपदिष्टोऽसि तत्कर्तुं नोचेदेवं कथं कृथाः ॥६३

मैं यह सब कुछ मानता हूँ तथापि आपका ऐसा निश्चय कि भगवान् शङ्कर का दर्शन प्राप्त करूंगा यह सब व्यर्थ है। कहाँ तो प्रथम ज्ञानी हैं—कहाँ भगवान् देवों के देव शम्भु हैं तथा कहाँ उनको प्राप्त करने के लिए यह तुम्हारी तपस्या है ? अर्थात् भगवान् शम्भु के प्रत्यक्ष करने के लिए कहीं अत्यधिक ज्ञान और विशेष तपस्या होनी चाहिए क्योंकि वे साधारण साधन से प्राप्त होने वाले नहीं हैं। आपकी साधना सर्वथा अकिञ्चित्कर है ।५७। हे मूढ़ ! इस समय में इस तप के द्वारा आप क्यों क्लेशित हो रहे हैं ? यह निश्चय है कि इस तरह से मिथ्याप्रवृत्ति वाले आपसे भगवान् शङ्कर कभी भी सन्तुष्ट नहीं होंगे ।५८। हे सुदुर्मते ! शम्भु तो लोक के आचरण के सर्वथा विरुद्ध हैं । उनकी विशेष तुष्टि के लिए तुमको छोड़कर कौन अबुद्ध ऐसी प्रकृष्ट तपस्या किया करता है अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं करता है ।५६। और अथवा मैं आज गया और यह बिना ही संशय के युक्त है । पूज्य और पूजन की विधि में भगवान् शम्भु का और आपका सङ्गम है ।६०। आपके द्वारा उनकी पूजा करना युक्त है । वे ही समस्त भुवन में रत हैं। उनकी भली भाँति पूजा करने वाले आप भी योग्य हैं—इसमें कोई संशय नहीं है ।६१। समस्त लोकों के पिता यह परमेष्ठी ब्रह्माजी के शिर का छेदन करके शम्भु ने फिर ब्रह्म हत्या प्राप्त की थी ।६२। हे द्विज ! ब्रह्महत्या से अभिभूत शम्भु ने प्रायः आपको उपदेश दिया है कि ऐसा करें । यदि ऐसा नहीं है तो आप इस रीति से कैसे कर रहे हैं ।६३।

तादात्म्यगुणसंयोगान्मन्ये रुद्रस्य तेऽधुना । तप सिद्धिरनुप्राप्ता कालेनाल्पीयसा मुने ॥६४ प्रायोऽद्य मातरं हत्वा सर्वैर्लोकैर्निराकृतः ।

परशुराम परीक्षा ] [ १५३

तपोव्याजेन गहने निर्जने संप्रवर्त्तसे ॥६५॥
गुरुस्त्रीब्रह्महत्योत्थपातकक्षपणाय च ।
तपश्चरसि नानेन तपसा तत्प्रणश्यति ॥६६॥
पातकानां किलान्येषां प्रायश्चित्तानि सन्त्यपि ।
मातृद्रुहामवेहि त्वं न क्वचित्किल निष्कृतिः ॥६७॥
अहिंसालक्षणो धर्मो लोकेषु यदि ते मतः ।
स्वहस्तेन कथं राम मातरं कृत्तवानसि ॥६८॥
कृत्वा मातृवधं घोरं सर्वलोकविगर्हितम् ।
त्वं पुनर्धार्मिको भूत्वा कामतोऽन्यान्र्विनिन्दसि ॥६९॥
पश्यता हसतामोघं आत्मदोषमजानता ।
अपर्याप्तमहं मन्ये परं दोषविमर्शनाम् ॥७०॥

मैं ऐसा मानता हूँ कि अब भगवान् रुद्र के तादाम्य के संयोग से सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं। हे मुने ! यह सिद्धि की प्राप्ति बहुत ही थोड़े समय में हो जायगी ।६४। बहुधा आप आज अपनी माता का हनन करके सभी लोगों के द्वारा निरादृत हो गये हैं और तपस्या के करने के बहाने से इस निर्जन वन में सबसे निरादर पाकर प्रवृत्त हो गये हैं ।६५। गुरु-स्त्री और ब्रह्महत्या से समुत्पन्न पातक के दूर करने के लिए ही आप तपश्चर्या का समाचरण कर रहे हैं सो वह पातक इस तप से कभी भी विनष्ट नहीं होता है ।६६। अन्य प्रकार के किये हुए पातकों के निश्चित रूप से प्रायश्चित्त भी हैं। आप यह समझ लेवें कि जो माता से द्रोह करने वाले हैं कहीं भी उनके पातकों का प्रायश्चित्त नहीं है।६६। हे राम ! यदि आपको यह सम्मत है कि अहिंसा के लक्षण वाला धर्म है जो कि सभी लोकों में माना गया है तो फिर आपने ही अपने ही हाथ से अपनी माता को कैसे काट दिया था ? ।६८। समस्त लोकों में परमाधिक निन्दित घोर माता का वध करके फिर बड़े धार्मिक बनकर अपनी इच्छा से अन्य लोगों की विशेष निन्दा कर रहे हैं ।६९। इस अमोघ अपने दोष को देखते हुए भी उसको नहीं जानते हैं और हँस रहे हैं। मैं तो इस दूसरों के दोषों के विर्शना को पर्याप्त नहीं मानता हूँ ।७०।

१५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वधर्मं यद्यहं त्यक्त्वा वर्त्तेयमकुतोभयम् । तर्हि गर्ह्य मां कामं निरूप्य मनसा स्वयम् ॥७१ मातापितृसुतादीनां भरणायैव केवलम् । क्रियते प्राणिहननं निजधर्मतया मया ॥७२ स्वधर्मादामिषेणाहं सकुटुम्बो दिनेदिने । वर्त्तामि साऽपि मे वृत्तिर्विधात्रा विहिता पुरा ॥७३ मांसेन यावता मे स्यान्नित्यं पित्रादि पोषणम् । हनिष्ये चेत्तदधिकं तर्हि युज्येयमेनसा ॥७४ यावत्पोषणघातेन न वयं स्याम निन्दिताः । तदेतत्संप्रधार्य्य त्वं वा मां प्रशंस वा ॥७५ साधु वाऽधु वा कर्म यस्य यद्विहितं पुरा । तदेव तेन कर्त्तव्यमापद्यपि कथंचन ॥७६ निरूपय स्वबुद्ध्या त्वमात्मनो मम चांतरम् । अहं तु सर्वभावेन मित्रादिभरणे रतः ॥७७

यदि मैं अपने धर्म का त्याग कर अकुतोभय अर्थात् निर्भीकता वाला होते हुए बरताव करूँ तो स्वयं मन से निरूपण करके मुझे इच्छा पूर्वक निन्दित कहिए ।७१। मैं तो अपने माता-पिता और पुत्र आदि के भरण-पोषण के ही लिए केवल अपने धर्म के कारण ही प्राणियों का वध किया करता हूँ ।७३। अपने ही धर्म होने से प्रतिदिन अपने कुटुम्ब का भरण मांस से किया करता हूँ और यह भी मेरी वृत्ति पहिले ही विधाता ने बना दी है ।७२। जितने मांस से नित्य ही मेरे माता-पिता और पुत्र आदि का भरण हो जाता है उतने ही प्राणियों का में हनन किया करता हूँ। इससे भी अधिक मैं हनन करूँ तो मैं पाप से युक्त होऊँगा ।७४। जितने मांस से सबका पोषण होते उतने ही प्राणियों के घात करने से हम लोग कभी भी निन्दित नहीं होते हैं। यह सबका विचार करके ही आप मेरी निन्दा करें या प्रशंसा करें ।७५। अच्छा हो या बुरा ही जिसका जो कर्म पहिले ही विधाता ने बना दिया है वही कर्म किसी भी प्रकार से आपत्काल में भी उसे करना चाहिए ।७६। अब आप स्वयं अपनी ही बुद्धि से मेरे कर्म में जो भी अन्तर हो उसका