भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

२२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

थे एवं वज्र की उपमा के आकार वाले थे तथा आयुधों के सहित एवं परि- च्छदों से युक्त थे दिए थे । २५। इसके अनन्तर उन दोनों शिवा और शिव का परम मंगल अभिषेक किया था। इसके उपरान्त एक विमान बनवाया था जिसका नाम कुसुमाकर था । २६। इसकी रचना विधाता ने की थी जो कि अम्लान मालाओं वाला था तथा नित्य ही आयुधों के द्वारा अभेद्य था । यह इच्छा के अनुरूप दिवलोक और भूलोक में गमन करने वाला तथा सुसमृद्धि से समन्वित था ।२७। जिसके केवल गन्ध से ही भ्रान्तिक्षुधा-रोग और आर्ति सब नष्ट हो जाया करती हैं और यह मन के आह्लाद को करने वाला तथा परम शुभ था । २८।

तद्विमानमथारोप्य तावुभौ दिव्यदंपती । चामरव्यजनच्छत्रध्वजयष्टिमनोहरम् ।।२९ वीणावेणुमृदंगादिविविधैस्तौर्यवादनैः । सेव्यमाना सुरगणैर्निर्गत्य नृपमन्दिरात् ।।३० ययौ वीथीं विहारेण शोभायन्ती निजौजसा । प्रतिहर्म्याग्रसंस्थाभिरप्सरोभिः सहस्रशः ।।३१ सलाजाक्षतहस्ताभिः पुरंध्रीभिश्च वर्षिता । गाथाभिर्मंगलार्थाभिर्वीणावेण्वादिनिस्वनैः । तुष्यन्ती वीथिवीथीषु मन्दमन्दमथाययौ ।।३२ प्रतिगृह्याप्सरोभिस्तु कृतं नीराजनाविधिम् । अवरुह्य विमानाग्रात्प्रविवेश महासभाम् ।।३३ सिंहासनमधिष्ठाय सह देवेन शम्भुना । यद्यद्वांछंति तत्रस्था मनसैव महाजनाः । सर्वज्ञा साक्षिपातेन तत्तत्कामानपूरयत् ।।३४ तद्दृष्ट्वा चरितं देव्या ब्रह्मा लोकपितामहः । कामाक्षीति तदाभिख्यां ददौ कामेश्वरीति च ।।३५

उस विमान पर ये दोनों शुभ दम्पती समारूढ़ होकर नृप मन्दिर से बाहिर निकले थे। इस विमान में चमर-व्यजन-छत्र-ध्वजा आदि से परम

वैवाहिकोत्सव वर्णन ] [ २२१

मनोहरता विद्यमान थी ।२६। उस समय में वीणा--वेणु-मृदङ्ग प्रभृति अनेक प्रकार के तौर्य वादनों से ये सेव्यमान हो रहे थे। सब सुरगण भी इनकी सेवा में समुपस्थित थे ।३०। विहार की स्वामिनी अपने ओज से शोभित करती हुई वीथी में गयी थी। वहाँ पर बड़े-बड़े धनियों के हर्म्य बने हुए थे। प्रत्येक हर्म्यों की छत पर सहस्रों अप्सरायें बैठी थीं ।३१। वहाँ पर जो पुरन्ध्रियां थीं उनके हाथों में लाजा और अक्षत थे जिनकी वे वर्षा कर रही थीं। परम मंगल अर्थों वाली गाथायें करती हुई थीं तथा वीणा-वेणु आदि की ध्वनियों से परम तोष को प्राप्त होती हुई वीथियों से अन्य वीथियों में धीरे-धीरे समागत हो रही थी ।३२। अप्सरायें जो मार्ग में आरती का विधान कर रही थीं उसका प्रति ग्रहण करके उस देवी ने विमान से अवरोहण करके सदा सभा में प्रवेश किया था ।३३। फिर देव शम्भु के ही साथ सिंहासन पर समधिष्ठित हुई थीं। वहाँ पर स्थित महा-जन समुदाय ने जो भी इच्छा की थी और मन में ही कामना की थी उस सबका ज्ञान रखने वाली महादेवी ने अपनी दृष्टि के पात के ही द्वारा उन-उन सब कामनाओं को पूरा कर दिया था ।३४। लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने उस चरित को देखकर ही उस देवी का उस समय में कामाक्षी और कामेश्वरी यह नाम रख दिया था ।३५।

ववर्षाश्चर्यमेघोऽपि पुरे तस्मिस्तदाज्ञया ।
महार्हाणि च वस्तूनि दिव्यान्त्याभरणानि च ॥३६
चिन्तामणिः कल्पवृक्षः कमला कामधेनवः ।
प्रतिवेश्म ततस्तस्थुः पुरो देव्या जयाय ते ॥३७
तां सेवैकरसाकारां विमुक्तान्यक्रियागुणाः ।
सर्वकामार्थसंयुक्ता हृष्यंतः सार्वकालिकम् ॥३८
पितामहो हरिश्चैव महादेवश्च वासवः ।
अन्ये दिशामधीशास्तु सकला देवतागणाः ॥३६
देवर्षयो नारदाद्याः सनकाद्याश्च योगिनः ।
महर्षयश्च मन्वाद्या वशिष्ठाद्यास्तपोधनाः ॥४०
गन्धर्वाप्सरसो यक्षा याश्चान्या देवजातयः ।

२२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दिवि भूम्यंतरिक्षेषु ससंबाधं वसन्ति ये ॥४१ ते सर्वे चाप्यसंबाधं निवसंति स्म तत्पुरे ॥४२

उसकी आज्ञा से उस पुर में आश्चर्य मेघ ने भी वर्षा की थी और उस वर्षा में बहुत अधिक मूल्यवान वस्तुयें तथा परम दिव्य आभरण बरसे थे ।३६। चिन्तामणि-कल्प वृक्ष-कमला और कामधेनु ये सब प्रति गृह में देवी के नगर में उसकी जय के लिए उपस्थित हो गये थे ।३७। सभी उसकी सेवा में ही तत्पर थे और उसकी सेवा का रस ही उनका सबका आकार था तथा अन्य क्रियाओं के गुणों का परित्याग कर दिया था । ये सभी समस्त कामों के अर्थ से संयुक्त थे तथा सर्व काल में प्रसन्न ही रहा करते थे ।३८। पितामह-श्रीहरि-महादेव-महेन्द्र—अन्य दिशाओं के स्वामी—सब देवगण-नारद आदि महर्षि—वसिष्ठ आदि तपस्वीगण-गन्धर्व—अप्सरायें—यक्ष और जो भी अन्य देवों की जातियां हैं जो भी दिव लोक भूमि और अन्तरिक्ष में बाधा-सहित निवास किया करते थे ।३६-४१। वे सभी उसके पुर में बिना ही किसी बाधा के निवास किया करते थे ।४२।

एवं सद्वत्सला देवी नान्यत्रैत्यखिलाञ्जनात् । तोषयामास सततमनुरागेण भूयसा ॥४३ राज्ञो महति भूर्लोके विदुषः सकलेप्सिताम् । राज्ञी दुदोहाभीष्टानि सर्वभूतलवासिनाम् ॥४४ त्रिलोकैकमहीपाले सांबिके कामशङ्करे । दशवर्षसहस्राणि ययुः क्षण इवापरः ॥४५ ततः कदाचिदागत्य नारदो भगवानृषिः । प्रणम्य परमां शक्तिं प्रोवाच विनयान्वितः ॥४६ परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमेश्वरि । सदसद्भावसंकल्पविकल्पकलनात्मिका ॥४७ जगदभ्युदयार्थाय व्यक्तभावमुपागता । असज्जनविनाशार्था सज्जनाभ्युदयार्थिनी । प्रवृत्तिस्तव कल्याणि साधूनां रक्षणाय हि ॥४८ अयं भण्डोऽसुरो देवि बाधते जगतां त्रयम् ।

अमृत मंथन वर्णन ] [ २२३

त्वयैकयैव जेतव्यो न शक्यस्त्वपरैः सुरैः ॥४६

इस प्रकार से सब पर स्नेह एवं प्यार करने वाली वह देवी थी और अन्यत्र ऐसा कहीं भी नहीं था। उस देवी ने समस्त जनों को निरन्तर अत्यधिक अनुराग से सन्तुष्ट कर रक्खा था ॥४३॥ इस महान भूलोक में वह राज्ञी राजा हों चाहे विद्वान होवें सकल की ईप्सा रखने वाले समस्त भूतल के निवासीजनों के अभीष्ट पदार्थों का दोहन किया करती थी ॥४४॥ तीनों लोकों के एक ही महीपाल अम्बिका के सहित काम शङ्का के होने पर दश सहस्र वर्ष एक ही क्षण के समान व्यतीत हो गये थे॥४५॥ इसके अनन्तर देवर्षि नारद जी भगवान किसी समय में वहां पर समागत हुए थे और उस परमा शक्ति को प्रणाम करके उन्होंने विनय से समन्वित होकर कहा था था॥४६॥ आपतो परब्रह्म-परधाम और पवित्र हैं । हे परमेश्वरि ! आप सद-असत् भावों के कलन के स्वरूप वाली हैं ।४७। इस जगत के अभ्युदय के ही लिए आप इस व्यक्तभाव को प्राप्त हुई हैं। आप इस लोक में असज्जनों के विनाश के लिए और सज्जनों के अभ्युदय करने वाली हैं। हे कल्याणि ! आपकी जो प्रवृत्ति है वह साधु पुरुषों के रक्षण के ही लिए हैं ॥४८॥ यह एक भण्डासुर है हे देवि ! यह तीनों लोकोंको बाधा दे रहा है। यह केवल आप ही के द्वारा जीता जा सकता है ऐसी एक ही आप हैं और दूसरे सुरों के द्वारा तो यह कभी भी जीता नहीं जा सकता है ॥४६॥

त्वत्सेवकपरा देवाश्चिरकालमिहोषिताः ।
त्वदाज्ञया गमिष्यंति स्वानि स्वानि पुराणि तु ॥५०
अमंगलानि शून्यानि समृद्धार्थांनि संतवतः ।
एवं विज्ञापिता देवी नारदेनाखिलेश्वरी ।
स्वस्ववासनिवासाय प्रेषयामास चामरान् ॥५१
ब्रह्माणं च हरिं शम्भुं वानवादीन्दिशां पतीन् ।
यथार्हं पूजयित्वा तु प्रेषयामास चांबिका ॥५२
अपराधं ततस्त्यक्तुमपि संप्रेषिताः सुराः ।
स्वस्वांशैः शिवयोः सेवामादिपित्रोरकुर्वत ॥५३
एतदाख्यानमायुष्यं सर्वमंगलकारणम् ।

[ २२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आविर्भावं महादेव्यास्तस्या राज्याभिषेचनम् ॥५४ यः प्रातरुत्थितो विद्वान्भक्तिश्रद्धासमन्वितः । जपेद्धनससमृद्धः स्यात्सुधासंमितवाग्भवेत् ॥५५ नाशुभं विद्यते तस्य परत्रेह च धीमतः । यशः प्राप्नोति विपुलं समानोत्तमतामपि ॥५६

ये समस्त देवगण चिरकाल से यहां पर ही निवास किये हुए हैं और ये आपकी सेवा में तत्पर हो रहे हैं । ये आपकी ही आज्ञा से अपने-अपने पुरों में जायेंगे ।५०। इनके सब पुर इस समय में शून्य और मङ्गल से रहित हो रहे हैं । ऐसी कृपा कीजिए कि ये सब समृद्ध अर्थों वाले हो जावे । इस रीति से जब नारद मुनि के द्वारा देवी को बताया गया था तो उस अखिलेश्वरी देवी ने देवों को अपने-अपने निवास स्थानों को भेज दिया था ।५१। फिर उस अम्बिका ने ब्रह्मा—श्री हरि-शम्भु-इन्द्र आदिक और दिक्पाल देवों का यथोचित पूजन करके विदा कर दिया था ।५२। फिर अपराध का त्याग करने के भी लिए सुरगण प्रेषित किए थे आदि पिता-माता-शिवा-शिव की अपने-अपने अंशों से सेवा भी करते थे ।५३। यह आख्यान आयु की वृद्धि करने वाला है—यह सभी प्रकार के मङ्गलों की कारण है—उस महादेवी का आविर्भाव का होना तथा उसके राज्यासन पर अभिषेचन का होना मङ्गल प्रद है ।५४। जो कोई पुरुष प्रातःकाल में उठकर भक्तिभाव से संयुत होकर विद्वान् श्रद्धालु बनकर इसका जाप किया करता है वह धन से समृद्ध हो जाता है और उसकी वाणी सुधा के सदृश ही परम मधुर हो जाया करती है ।५५। उस धीमान का इस लोक में और परलोक में कहीं पर भी कुछ भी अशुभ नहीं होता है । वह विपुल यश को प्राप्त किया करता है—उसका मान बढ़ता है तथा वह उत्तमता का लाभ किया करता है ।५६।

अचला श्रीर्भवेत्तस्य श्रेयश्चैव पदे पदे । कदाचिन्न भयं तस्य तेजस्वी वीर्यवान्भवेत् ॥५७ तापत्रयविहीनश्च पुरुषार्थैश्च पूर्यते । त्रिसंध्यं यो जपेन्नित्यं ध्यात्वा सिंहासनैश्वरीम् ॥५८

सेना सहित विजय यात्रा ] [ ३३

षण्मासान्महतीं लक्ष्मीं प्राप्नुयाज्जापकोत्तमः ॥५६

उसकी श्री चञ्चल होते हुए भी अचल हो जाती है और उसको पद-पद पर श्रेय होता है। उसको भय तो किसी भी समय में होता ही नहीं है और बहुत तेजस्वी तथा वीर्य वाला हो जाता है।५७। उसको तीनों प्रकार के ताप नहीं रहा करते हैं। आध्यात्मिक-आधिभौतिक और आधिदैविक—ये तीन ताप होते हैं और वह पुरुष पुरुषार्थों से परिपूरित होता या करता है। तीनों समयों में (प्रातः-मध्याह्न-सायम्) जो नित्य ही इसका जाप किया करता है और सिंहासननेश्वरी का ध्यान करता है वह उत्तम जापक छै मास में ही महती लक्ष्मी को प्राप्त कर लेता है।५८-५६।

—X—

सेना सहित विजय यात्रा

अथ सा जगतां माता ललिता परमेश्वरी ।
त्रैलोक्यकंटकं भंडं दैत्यं जेतुं विनिर्ययौ ॥१
चकार मर्दलाकारानंभोराशींस्तु सप्त ते ।
प्रभूतमद्दैलध्वानैः पूरयामासुरं बरम् ॥२
मृदंगमुरजाश्चैव पटहोऽन्तुकुलीगणाः ।
सेलुकाझल्लरीरांधाहुण्डकाहुण्डकाघटाः ॥३
आनकाः पणवाश्चैव गोमुखाश्चार्धचंद्रिकाः ।
यवमध्या मुष्टिमध्या मद्दैलांड्डिमा अपि ॥४
झर्झराश्च वरीताश्च इंग्यालिग्यप्रभेदजाः ।
उड्डं काश्चैतुहंडाश्च निःसाणा बर्बराः परे ॥५
हुंकारा काकतुण्डाश्च वाद्यभेदास्तथापरे ।
दध्वनुः शक्तिसेनाभिराहताः समरोद्यमे ॥६
ललितापरमेशान्या अंकुशास्त्रात्समुद्गता ।
संपत्करी नाम देवी चचाल सह शक्तिभिः ॥७

इसके अनन्तर वह जगतों की माता परमेश्वरी ललिता तीनों लोकों के कण्टक भण्ड दैत्य को जीतने के लिए वहाँ से विर्गत हुई थी ।१। बढ़ा

२२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हुआ जो मद्दर्द्लों का घोष था उसने उससे आकाश को भी पूरित कर दिया था ।२। मृदंग-मुरज-पटह-अनुकुलीगण-सेलुका-झल्लरी-रप्चा-हुडुका-हुण्डुक घटा-आनक-पणव-गोमुख-अर्ध चन्द्रिका-तममध्य मद्दर्दल-डिण्डिम-झर्झर-बरीत-इङ्ग्यातिंग्य भेदज-उद्धक-एउ हुण्ड-निःसाण-बर्बर-हुँकार-काकतुण्ड तथा ये सब वाद्य और अन्य वाद्यों को उस समर के आरम्भ में शक्ति की सेनाओं के द्वारा आहूत किया गया था और ये सभी बजाये गये थे ।३-६। परमेशानी ललिता के अंकुशास्त्र से समुद्गता सम्पत्करी नाम की देवी अपनी शक्तियों के साथ चलित हो गयी थी ।७।

अनेककोटिमातङ्गतुरंगरथपंक्तिभिः । सेविता तरुणादित्यपाटला संपदीश्वरी ॥८ मत्तमुद्दंडसंग्रामरसिकं शैलसन्निभम् । रणकोलाहलं नाम सारुरोह मतंगजम् ॥९ तामन्वगा ययौ सेना महती घोरराविणी । लोलाभिः केतुमालाभिरुल्लिखन्ती घनाघनात् ॥१० तस्याश्च संपन्नाथायाः पीनस्तनसुसंकटः । कंटको घनसंनाहो रुरुचे वक्षसि स्थितः ॥११ कंपमाना खड्गलता व्यरुचत्तत्करे धृता । कुटिला कालनाथस्य भ्रुकुटीव भयंकरा ॥१२ उत्पातवातसंपाताच्चलिता इव पर्वताः । तामन्वगा ययुः कोटिसंख्याकाः कुञ्जरोत्तमाः ॥१३ अथ श्रीललितादेव्या श्रीपाशायुधसंभवा । अतित्वरितविक्रान्तिरश्वारूढाचलत्पुरः ॥१४

अनेकों करोड़ गज—अश्व और रथों की पंक्तियों के द्वारा सेवित सम्पदीश्वरी तरुण सूर्य के समान पाटल थी ।८। शैल के सदृश मत्त सुदण्ड संग्राम में रसिक रण कोलाहल नामक एक गज पर वह समा रूढ़ हुई थी ।९। परम घोर राग वाली बड़ी भारी सेना उसके पीछे अनुगमन करने वाली थी और परम चञ्चल केतुओं की मालाओं से वह सेना घनों को उल्लिखित करती हुई जा रही थी ।१०। उस सम्पदा की स्वामिनी का पीन

सेना सहित विजय-यात्रा ] २७

(स्थूल) स्तनों में सुसंकट घन के समान कंटक वक्षः स्थल में स्थित शोभित हो रहा था ।११। उसके कर में धरी हुई कांपती हुई खड्गलता शोभायुक्त हो रही थी जो काल नाथ की परम भयंकर कुटिला भ्रुकुटी के ही समान थी ।१२। उत्पातों के बात की सम्पात वाली चलायमान पर्वतों के ही सदृश करोड़ों की संख्या वाले उत्तम कुञ्जर उस सम्पत्करी के पीछे अनुगमन करने वाले थे ।१३। इसके अनन्तर श्रीललिता देवी के श्रीपाशायुध से समुत्पन्न अतीव शीघ्र विक्रान्ति युक्त अश्व पर समारूढ़ आगे चल रही थी ।१४।

तया सह हयप्रायं सैन्यं हेषातरंगितम् ।
व्यचरत्खुरकुद्दालविदारितमहीतलम ॥१५॥
वनायुजाश्च कांबोजाः पारदाः सिंधुदेशजाः ।
टंकणाः पर्वतीयाश्च पारुसीकास्तथा परे ॥१६
अजानेया घट्टधरा दरदाः कालवंदिजाः ।
वाल्मीकयावनोद्भूता गान्धर्वाश्चाथ ये हयाः ॥१७
प्राग्देशजाताः कैराता प्रांतदेशोद्भवास्तथा ।
विनीताः साधुवोढारो वेगिनः स्थिरचेतसः ॥१८
स्वामिचित्तविशेषज्ञा महायुद्धसहिष्णवः ।
लक्षणैर्बहुभियुक्ता जितक्रोधा जितश्रमाः ॥१९
पञ्चधारासु शिक्षाढ्या विनीताश्च प्लवान्विता ॥२०
फलशुक्तिश्रिया युक्ताः श्वेतशुक्तिसमन्विताः ।
देवपद्मं देवमणि देवस्वस्तिकमेव च ॥२१

उस देवी के साथ ऐसी सेना थी जिसमें प्रायः अश्व थे जिनकी हिनहिनाहट से वह तरंगित थी । उन अश्वों के खुरों की टापों से सम्पूर्ण महीतल विदीर्ण हो रहा था । ऐसी सेना चली थी ।१५। उस सेना में विभिन्न प्रकार की जाति के अश्व विद्यमान थे । उनमें वनायुज-काम्बोज-पारद-सिन्धु देश में उत्पन्न होने वाले-टकण-पर्वतीय-पारसीक थे ।१६। अजानेय-घट्टधर-दरद-कालवन्दिज-वाल्मीक-यावनोद्भूत और गान्धर्व हय थे ।१७। उन अश्वों में कुछ प्राग्देशज थे कैरात तथा प्रान्त देशोद्भव

२२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

थे । ये सब अश्व बड़े ही विनीत-अच्छी तरह से वहन करने वाले-वेगगति से समन्वित और स्थिर चित्तों वाले थे ।१८। वे अश्व सभी ऐसे थे जो अपने स्वामी के मन का भाव जानने वाले थे और महान् युद्ध में परम सहिष्णु रहने वाले थे । उनमें बहुत से अच्छे-अच्छे लक्षण विद्यमान थे तथा ये सभी क्रोध को जीत लेने वाले और परमाधिक परिश्रमी थे ।१६। पञ्च धाराओं में शिक्षित—विनीत और प्लवन से संयुत थे ।२०। ये फल शुक्ति की श्री से सम्पन्न तथा श्वेत शुक्ति से समन्वित थे । उनमें देव पद्म—देव मणि और देव स्वस्तिक ये सुन्दर लक्षण विद्यमान थे ।२१।

अथ स्वस्तिकशुक्तिञ्च गड्डुरं पुष्पगंडिकाम् । एतानि शुभलक्ष्मणि जयराज्यप्रदानि च । वहंतो बातजवना वाजिनस्तां समन्वयुः ॥२२ अपराजितनामानमतितेजस्विनं चलम् । अत्यंतोत्तुंगवष्माणं कविकाविलसन्मुखम् ॥२३ पार्श्वद्वयेऽपि पतितस्फुरत्केसरमंडलम् । स्थूलबालधिविक्षेपक्षिप्यमाणपयोधरम् ॥२४ जंघाकांडसमुन्नद्धमणिकिङ्किणिभासुरम् । वादयंतमिवोच्चण्डैः खुरनिष्ठुरकुट्टनैः ॥२५ भूमंडलमहावाद्यं विजयस्य समृद्धये । घोषमाणं प्रति मुहुः संदर्शितगतिक्रमम् ॥२६ आलोलचामरव्याजाद्वहंतं पक्षती इव । भांडैर्मनोहरैर्युक्तं घर्धरीजालामंडितम् ॥२७ एषां घोषस्य कपटाद्धु कुर्वंतीमिवासुरान् । अश्वारूढा महादेवी समारूढा हयं ययौ ॥२८

इसके उपरान्त उनमें स्वस्तिक शुक्ति—गड्डुर और पुष्प गणिका—ये परम शुभ चिह्न विद्यमान थे जो जय और राज्य के प्रदान कराने वाले थे । ऐसे अश्व गण थे जो वहन करने वाले—वायु के समान वेग वाले थे । ऐसे अश्व उस देवी के पीछे गमन करने वाले थे ।२२। वह देवी एक ऐसे अश्व समारूढ़ थी जो अत्यन्त तेजस्वी था और अपराजित उसका नाम था

सेना सहित विजय-यात्रा ] [ २२६

एवं बड़ा चञ्चल था। उस अश्व का कलेवर बहुत ही ऊंचा था और उसके मुख में लगाम शोभित हो रही थी ।२३। उस अश्व के दोनों ओर केशरों का मण्डल स्फुरित हो रहा था । उसकी पूँछ बहुत ही स्थूल थी जिसके दिक्षेप से पयोधर क्षिप्यमाण हो रहे थे ।२४। जंघाओं के भाग में समुन्नद्ध मणियों की धीमी किन किनाहट की ध्वनि से भासुर था । उसके खुरों के निष्ठुर कुह्नों से जो बहुत ही तेज थे वादन सा कर रहा था ।२५। मानों ऐसा प्रतीत हो रहा था कि विजय की समृद्धि के ही लिए यह महान् वाद्य बजाया जा रहा था बार-बार गति के क्रम से छोटा करता हुआ वह संदर्शित हो रहा था ।२६। चञ्चल पूँछ जो उसकी बार-बार ऊपर की ओर उठ रही थी वह ऐसी ही प्रतीत हो रही थी मानों दोनों ओर चमर ढुलाये जा रहे हों । वह अश्व मनोहर भाण्डों से युक्त था और घर्धरी के जाल से समलंकृत था ।२७। इनकी जो महाध्वनि हो रही थी उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वह सभी असुरों को हुँकार की तर्जना दे रही थी । यह महा देवी अश्व पर समारूढ़ होकर वहां से गमन कर रही थी ।२८।

चतुर्भिर्बाहुभिः पाशमंकुशं वेत्रमेव च ।
हयवल्गां च दधती बहुविक्रमशोभिनी ॥२६
तरुणादित्यसङ्काशा ज्वलत्काञ्चीतरंगिणी ।
सञ्चचाल हयारूढा नर्तयन्तीव वाजिनम् ॥३०
अथ श्रीदण्डनाथाया निर्याणपटहध्वनिः ।
उद्दंडसिन्धुनिस्वानश्चकार बधिरं जगत् ॥३१
वज्रबाणैः कठोरैश्च भिदंत्यः ककुभो दश ।
अत्युद्धतभुजाश्मानः शक्तयः काश्चिदुच्छ्रिताः ॥३२
काश्चिच्छ्रीदंडनाथायाः सेनानासीरसङ्गताः ।
खड्गं फलमादाय पुप्लुवुश्चंडशक्तयः ॥३३
अत्यंतसैन्यसम्बाधं वेत्रसंताडनैः शतैः ।
निवारयंत्यो वेत्रिण्यो व्युच्चलंति स्म शक्तयः ॥३४
अथ तुंगध्वजश्रेणीर्महिषांको मृगांकिकाम् ।
सिंहांकांश्चैव बिभ्राणाः शक्तयो व्यचलन्पुरा ॥३५

२३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ततः श्रीदण्डनाथायाः श्वेतच्छत्रं सहस्रशः ।
स्फुरत्ककराः प्रचलिताः शक्तयः काश्चिदाददुः ॥३६

अत्यधिक विक्रम की शोभा वाली वह महा देवी अपने चारों करों में पाश-अंकुश-नेत्र और अश्व की वल्गा को लिये हुई थीं ।२६। तरुण सूर्य के समान जाज्वल्यमान चमकती हुई काञ्ची की तरङ्ग वाली वह अपने अश्व को नचाती हुई-सी अश्व पर समारूढ़ वह वहाँ से चली थी ।३०। इसके अनन्तर श्री दण्ड स्वामिनी की जो निर्माण के पटहकी ध्वनि हो रही थी वह परम उद्दण्ड सागर के घोष के ही समान थी जो कि सम्पूर्ण जगत् को बधिर कर रही थी ।३१। बहुत सी शक्तियाँ उसके आगे चल रही थीं जो कठोर वज्रोपम बाणों के द्वारा दशों दिशाओं का विहनन कर रही थीं । उनकी भुजाएं अतीव उद्धत अश्म के समान थीं और परम उच्छ्रित कोई अद्भुत शक्तियाँ थी ।३२। कुछ शक्तियाँ उस श्री दण्ड नाथा के सेना नासीर के साथ थीं । ये परम चण्ड शक्तियाँ खड्ग को और फलक को लेकर उछाल खा रही थीं ।३३। सैकड़ों ही नेत्रों के सन्ताड़नों से उस सेना की जो सम्बाधा थी उसका क्षेत्रिणी निवारण करती हुई शक्तियाँ ऊपर की ओर चल रही थीं ।३४। इसके पश्चात् ऐसी शक्तियाँ आगे चली थी जो तुङ्ग ध्वजाओं की श्रेणी और महिष के चिन्हों वाली थीं तथा मृगों के चिह्नों को और सिंह के अङ्गों को धारण करने वाली थीं ।३५। इसके पश्चात् कुछ ऐसी शक्तियाँ थी जो श्रीदण्ड नाथा के सहस्रों छत्रों को जो श्वेत थे धारण करके चल रहीं थीं जिन छत्रों से उनके कर कमल स्फुरित हो रहे थे ।३६।

॥ दण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ॥

दण्डनाथाविनिर्याणे संख्यातीतैः सितप्रभैः ।
छत्रैर्गगनमारेजे निःसंख्यशशिमण्डितम् ॥१

अन्योन्यसक्तैर्धवलच्छत्रै रंतर्घनीभवत् ।
तिमिरं नुनुदे भूयस्तत्काण्डमणिरोचिषा ॥२

वज्रप्रभाधग्धगच्छायापूरितदिङ्मुखाः ।
तालवृन्ताः शतविधाः क्रोडमुख्या बलेऽचलन् ॥३

दण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ] [ २३१

चण्डो चण्डदयस्तीव्रा भैरवाः शूलपाणयः । ज्वलत्केशपिशङ्गाभास्तडिद्भासुरदिङ्मुखाः ॥४ दहत्य इव दैत्यौघांस्तीक्ष्णैर्मार्गणवह्निभिः । प्रचेलुर्दण्डनाथायास्सेना नासीग्धाविताः ॥५ अथ पोत्रीमुखीदेवीसमानाकृतिभूषणाः । तत्समानायुधकरास्तत्समानस्ववाहनाः ॥६ तीक्ष्णदंष्ट्रविनिष्ठ्यूतवह्निधूमामितांबराः । तमालश्यामलाकाराः कपिलाः क्रूरलोचनाः ॥७

इस दण्डनाथा का जो विशेष निर्माण हुआ था उसमें संख्यातीत अर्थात् अगणित छत्र थे जिनकी श्वेत प्रभा थी। उनसे नभोमण्डल ऐसा शोभित हो रहा था मानों उसमें अगणित चन्द्रमा उदित हो गये होवें ।१। वे परम धवल छत्र एक दूसरे से परस्पर में सट से रहे थे जिनसे उनका अन्तर बहुत ही घना हो गया था। उनके समुदाय में जो मणियाँ थीं उनकी कान्ति से अन्धकार का विनाश हो गया था ।२। उस बल में वज्र की प्रभा को भी पराजित करने वाली कान्ति से समस्त दिशाओं के मुखों को पूरित करने वाले सैकड़ों ही प्रकार के क्रोड़ मुख्य ताल वृत्त चले थे ।३। उस दण्डनाथा की सेनाएं नासीर से धावित होती हुई वहाँ से चली थीं उसमें जो सैनिक थे वे चण्ड दण्ड आदिक थे तथा परम तीव्र—भैरव और हाथों में शूल लिये हुए थे। वे जलते हुए केशों के समान पिशंग आभा से समन्वित थे तथा तड़ित् के समान भासुर थे जिनसे सभी दिशाएं भी भासुर हो रही थीं। अपनी परम तीक्ष्ण बाणों की अग्नि से दैत्यों के समूहों को दग्ध कर रहीं थीं ।४-५। इसके अनन्तर बहुत-सी शक्तियां भी उसमें चलीं थीं जो पोत्री मुखों वाली थीं और उसी के समान आकृति और भूषणों से संयुत थी। उसी के समान उनके करों में आयुध थे तथा उसी के तुल्य उनके अपने वाहन भी थे ।६। उनकी बहुत तीक्ष्ण दाढ़ें थी जिनसे वे वह्नि और धूम को निकाल रहीं थी जिससे सम्पूर्ण आकाश परिवृत हो गया था। तमाल वृक्ष के समान उनका श्यामल आकार था तथा कपिल और क्रूर नेत्रों वाली थीं ।७।

२३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सहस्रमहिषारूढाः प्रचेलुः सूकराननाः ।
अथ श्रीदंडनाथा च करिचक्ररथोत्तमात् ॥८
अवरुह्य महासिंहमारुरोह स्ववाहनम् ।
वज्रघोष इति ख्यातं धूतकेसरमंडलम् ॥९
व्यक्तास्यं विकटाकारं विशंकटविलोचनम् ।
दंष्ट्राकटकटत्कारबधिरीकृतदिक्तटम् ॥१०
आदिकूर्मकठोरास्थि खर्परप्रतिमैर्नखैः ।
पिबंतमिव भूचक्रमापातालं निमज्जिभिः ॥११
योजनत्रयमुत्तुंगं वेगादुद्धूतबालधिम् ।
सिंहवाहनमारुह्य व्यचलद्दंडनायिका ॥१२
तस्यामसुरसंहारे प्रवृत्तायां ज्वलत्क्रुधि ।
उद्वेगं बहुलं प्राप त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१३
किमसौ धक्ष्यति रुषा विश्वमद्यैव पोत्रिणी ।
किं वा मुसलघातेन भूमिं द्वेधा करिष्यति ॥१४

सूकर के समान जिनका मुख था ऐसी अनेक शक्तियां सहस्रों महिषों पर समारूढ़ होकर वहाँ पर चली थीं। इसके अनन्तर वह श्रीदण्डनाथा देवी अपने करिचक्र उत्तम रथ से नीचे उतरीं औप अपने प्रमुख वाहन महासिंह के ऊपर समारूढ़ हो गयी थीं। उसका नाम वज्र घोर प्रसिद्ध था जो अपने केसरों के मण्डल को कम्पित कर रहा था। इसका मुख खुला हुआ था तथा परम भीषण आकार वाला था एवं उसके लोचन विशंकट थे। वह अपनी दाढ़ों को कटकटा रहा था जिसकी कटकटा हट से सभी दिशाएं वधिरीभूत हो गयी थीं ।८-१०। उसकी अस्थियां आदि कूर्म के सदृश कठोर थीं और उसके नख खर्पर के समान विशाल थे। जो पाताल तक निमज्जित होकर इस भूमण्डल को पी से रहे थे ।११। यह तीन योजन तक ऊंचा था और बड़े वेग से अपनी पूंछ को हिला रहा था। ऐसे अपने सिंह के वाहन पर समारूढ़ होकर वह महादेवी दण्ड नायिका चली थीं ।१२। समस्त असुरों के संहार करने में जब वह प्रवृत्त हुई थी तो उस समय में उसकी क्रोध प्रज्वलित हो गया था और उसके प्रभाव से चराचर तीनों

दण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ] [ २३३

लोक बड़े भारी उद्वेग को प्राप्त हो गये थे ।१३। सभी लोग यह कह रहे थे किया यह पोत्रिणी अपने क्रोध से आज ही सबको दग्ध कर देगी अथवा अपने मुसल की चोट से इस भूमण्डल के दो टुकड़े कर देगी ? ।१४।

अथ वा हलनिर्घातैः क्षोभयिष्यति वारिधीन् ।
इति त्रस्तहृदः सर्वे गगने नाकिनां गणाः ॥१५
दूराद्द्रुतं विमानैश्च सत्रासं ददृशुर्गताः ।
ववंदिरे च तां देवा बद्धांजलिपुटान्विताः ।
मुहुर्द्वादशनामानि कीर्तयंतो नभस्तले ॥१६

अगस्त्य उवाच-

कानि द्वादशनामानि तस्या देव्या वद प्रभो ।
अश्वानन महाप्राज्ञ येषु मे कौतुकं महत् ॥१७

हयग्रीव उवाच-

शृणु द्वादशनामानि तस्या देव्या घटोद्भव ।
यदाकर्णनमात्रेण प्रसन्ना सा भविष्यति ।
पञ्चमी दंडनाथा च संकेता समयेश्वरी ॥१८
तथा समयसंकेता वाराही पोत्रिणी तथा ।
वार्ताली च महासेनाप्याज्ञा चक्रेश्वरी तथा ॥१९
अरिघ्नी चेति सम्प्रोक्तं नामद्वादशकं मुने ।
नामद्वादशकाभिख्यवज्रपञ्जरमध्यगः ।
संकटे दुःखमाप्नोति न कदाचन मानवः ॥२०
एतैर्नामभिरभ्रस्थाः संकेतां बहु तुष्टुवुः ।
तेषामनुग्रहार्थाय प्रचचाल च सा पुनः ॥२१

अथवा यह अपने हल के निर्घात से समुद्रों को क्षुब्ध कर देगी । इस प्रकार से सभी स्वर्ग वासियों के गण डरे हुए हृदय वाले गगन मण्डल में संस्थित थे ।१५। बड़े ही त्रास के साथ शीघ्र ही दूर से विमानों के द्वारा गये हुओं ने देखा था । फिर उन देवगणों ने दोनों करों को जोड़कर उसके लिए

२३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वन्दना की थी । वे बार-बार उसके द्वादश नामों का नभस्तल में कीर्त्तन कर रहे थे ।१६। अगस्त्य जी ने कहा—हे प्रभो ! वे उस देवीके बारह नाम कौन से हैं उनको कृपया बतलाइए। हे अश्वानन ! आप तो महान् विद्वान् हैं। मेरे हृदय में इनके ज्ञान प्राप्त करने का बड़ा भारी कौतुक विद्यमान है। ।१७। श्री हयग्रीवजी ने कहा—हे घटोद्भव ! अब आप उस देवी के द्वादश नामों का श्रवण कीजिए जिन नामों के केवल श्रवण करने ही से वह परम प्रसन्न हो जाया करती है। पञ्चमी—दण्डनाथा—संकेता—समयेश्वरी— समय संकेता—वाराही—पोत्रिणी—वार्त्ताली—महासेना—आज्ञा-चक्रेश्वरी —और अरिध्वनी—हे मुने ! ये ही उस देवी के द्वादश नाम हैं जिनको मैंने आपके सामने कहकर बता दिया है। यह द्वादश नामों का एक वज्र का पञ्जर है। इसके मध्य में रहने वाला अर्थात् इन बारह नामों का पाठ करने वाला बहुत ही सुरक्षित रहता है जैसे मानों वह वज्र निर्मित पञ्जर में बैठा होवे। वह मानव संकट में भी कभी दुःख नहीं पाता है। इन्हीं नामों के द्वारा गगन में संस्थित देवों ने उस देवी संकेता की बहुत स्तुति की थी। उन सब पर अनुग्रह करने के लिए उसका हृदय पसीज गया था और फिर वह प्रचलायमान हो उठी थी ।१८-२१।

अथ संकेतयोगिन्या मंत्रनाथा पदस्पृशः । निर्याणसूचनकरी दिवि दध्वान काहली ॥२२ शृङ्गारप्रायभूषाणां शार्दूलश्यामलत्विषाम् । वीणासंयतपाणीनां शक्तीनां निर्ययौ बलम् ॥२३ काश्चिद्गायन्ति नृत्यंति मत्तकोकिलनिःस्वनाः । वीणावेणुमृदंगाद्याः सविलासपदक्रमाः ॥२४ प्रचेलुः शक्तयः श्यामा हर्षयंत्यो जगज्जनान् । मयूरवाहनाः काश्चित्कतिचिद्धंसवाहनाः ॥२५ कतिचिन्नकुलारूढाः कतिचित्कोकिलासनाः । सर्वाश्च श्यामलाकाराः काश्चित्कर्णीरथस्थिता ॥२६ कादंबमधुमत्ताश्च काश्चिदारूढसैंधवाः । मंत्रनाथां पुरस्कृत्य संप्रचेलुः पुरः पुरः ॥२७

दण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ] [ २३५

अथारुह्य समुत्तुंगध्वजचक्रं महारथम् । बालार्कवर्णकवचा मदालोलविलोचना ॥२८

इसके उपरान्त संकेत योगिनी की मन्त्र नाथा चरणों के स्पर्श करने वाली तथा निर्याण की सूचना करने वाली दिवलोक में काहली बजी थी। ।२२। शृङ्गार प्राय भूषा वाली—शार्दूल श्यामल कान्ति वाली—वीणा से संयत करों वाली शक्तियों की सेना निकल गयी थी ।२३। उनमें कुछ तो गान करती हैं जिनकी ध्वनि मत्त कोकिलों के समान थी—कुछ नृत्य करती हैं। वीणा-वेणु और मृदंग आदि लिये हुई थीं और उनका चरणों का विन्यास का क्रम विलास से युक्त था ।२४। जगत के जनों को हर्षित करती हुई श्यामा शक्तियां वहां से चल दी थीं। कुछ का वाहन मयूर था और कुछ हंसों को वाहन बनाये हुई थीं ।२५। कुछ नकुल पर समारूढ़ थीं और कुछ कोकिलों पर विराजमान थीं। ये सभी श्यामल आकार वाली थी। इनमें कुछ कर्णी रथों पर सब संस्थित थीं ।२६। ये कादम्ब मधु मत्ता थीं और कुछ सैन्धवों पर समारूढ़ थीं। मन्त्रनाथ को अपने आगे करके ही वहाँ से रवाना हो गयीं थीं ।२७। इसके उपरान्त समुत्तुंगध्वजा वाले रथ पर आरूढ़ होकर बाल सूर्य के वर्ण के समान कवच वाली तथा मद से आलोल लोचनों वाली थी ।२८।

ईषत्प्रस्वेदकणिकामनोहरमुखांबुजा । प्रेक्षयंती कटाक्षौघैः किंचिद्भ्रू वल्लितांडवैः ॥२९

समस्तमपि तत्सैन्यं शक्तीनामुद्धतोद्धतम् । पिच्छत्रिकोणच्छत्रेण विरुदेन महीयसा ॥३०

आसां मध्ये न चान्यासां शक्तीनाभुज्ज्वलोदया । निर्जगाम घनश्यामश्यामला मन्त्रनायिका ॥३१

तां तुष्टुवुः षोडशभिर्नामभिर्नाकवासिनः । तानि षोडशनामानि शृणु कुम्भसमुद्भव ॥३२

संगीतयोगिनी श्यामा श्यामला मन्त्रनायिका । मन्त्रिणी सचिवेशी च प्रधानेशी शुकप्रिया ॥३३

वीणावती वैणिकी च मुद्रिणी प्रियकप्रिया । नीपप्रिया कदंबेशी कदंबवनवासिनी ॥३४

२३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सदामदा च नामानि षोडशैतानि कुम्भज । एतैयैः सचिवेशानीं सकृत्स्तौति शरीरवान् । तस्य त्रैलोक्यमखिलं हस्ते तिष्ठत्यसंशयम् ॥३५

थोड़ी २ प्रस्वेद की कणिकाओं से मनोहर मुख कमल वाली-कुछ भ्रुकुटियों को नचाकर कटाक्ष पातोंसे प्रेक्षण करती हुईथीं।२९। उन शक्तियों का सम्पूर्णउद्धत भी उद्धत सैन्यबल था जो पिच्छ त्रिकोण महान् विरुद वाले छत्र से संयुत था ।३०। इनके और अन्यों के मध्य में अर्थात् शक्तियों के बीच में उज्ज्वल उदय वाली-घन के समान श्यामला मन्त्र नायिका निकली थी । ।३१। स्वर्गवासियों ने उसका भी सोलह नामों के द्वारा स्तवन किया था । हे कुम्भोद्भव ! उन सोलह नामों का भी अब मुझसे श्रवण कर लो ।३२। संगीत योगिनी-श्यामा-श्यामल-मन्त्र नायिका—मन्त्रिणी—सचिवेशी—प्रधानेशी—शुक प्रिया—वीणावती—वैणिकी-मुद्रिणी--प्रियकप्रिया—नीप प्रिया—कदम्बेशी—कदम्ब वन वासिनी-सदामदा-हे कुम्भज ! ये ही सोलह नाम हैं। इनके द्वारा जो सदा शरीरधारी एक बार सचिवेशानी की स्तुति किया करता है उसके हाथ में सम्पूर्ण त्रैलोक्य निःसंशय स्थित रहा करता है ।३३-३५।

मन्त्रिनाथा यत्र यत्र कटाक्षं विकिरत्यसौ । तत्र तत्र गताशंकं शत्रुसैन्यं पतत्यलम् ॥३६ ललितापरमेशान्या राज्यचर्चा तु यावती । शक्तीनामपि चर्चा या सा सर्वत्र जयप्रदा ॥३७ अथ संगीतयोगिन्याः करस्थाच्छुकपोतकात् । निर्जगाम धनुर्वेदो वहन्सज्जं शरासनम् ॥३८ चतुर्बाहुयुतो वीरस्त्रिशिरास्त्रिविलोचनः । नमस्कृत्य प्रधानेशीमिदमाह स भक्तिमान् ॥३६ देवि भंडासुरेंद्रस्य युद्धाय त्वं प्रवर्त्तसे । अतस्तव मया साह्यं कर्तव्यं मन्त्रिनायिके ॥४० चित्रजीवमिमं नाम कोदण्डं सुमहत्तरम् । गृहाण जगतामंब दानवानां निबर्हणम् ॥४१

दण्डनाथा श्यामला सेना यात्रा ] [ २३७

इमौ चाक्षयबाणाढ्यौ तूणीरौ स्वर्णचित्रितौ । गृहाण दैत्यनाशाय ममानुग्रहहेतवे ॥४२

वह मन्त्रनाथा जहाँ-जहाँ पर अपने कटाक्ष को विकीर्ण किया करती है वहाँ पर शत्रु की सेना गताशंक होकर पूर्णतया पतन को प्राप्त हो जाया करती है।३६। परमेशानी ललिता की जितनी भी राज्य चर्चा होती है और उसकी शक्तियों की जो चर्चा है वह सर्वत्र विजय के प्रदान करने वाली होती है।३७। इसके अनन्तर संगीत योगिनी के कर में स्थित शुक पोत (शिशु) से सज्जित शरासन का वहन करता हुआ धनुर्वेद निकला था।३८। वह चार बाहुओं से संयुत था—तीन उसके शिर थे और उस वीर के तीन ही नेत्र थे। उसने प्रधानेशी को प्रणिपात करके यह उस भक्तिमान ने प्रार्थना की थी।३६। हे मन्त्रिनायिके ! हे देवि ! इस समय में आप भण्डासुरेन्द्र के साथ युद्ध करने के लिए प्रवृत्त हो रही हैं। अतएव मेरे द्वारा आपकी सहायता करनी चाहिए।४०। हे जगतों की जननि ! यह चित्र जीव नाम वाला को दण्ड बहुत ही अधिक महान् है। यह समस्त दानवों का निवहंण करने वाला है। इसको आप ग्रहण कीजिए।४१। ये दोनों तूणीर हैं जिनमें कभी भी वाणों का क्षय नहीं होता है और ये स्वर्ण से चित्रित हैं इनको भी आप केवल मुझ पर अनुग्रह करने के लिए ही ग्रहण कीजिए।४२।

इति प्रणम्य शिरसा धनुर्वेदेन भक्तितः । अर्पितांश्चापतूणीराञ्जग्राह प्रियकप्रिया ॥४३

चित्रजीवं महाचापमादाय च शुकप्रिया । विस्फारं जनयामास मौर्वीमुद्वाह्य भूरिशः ॥४४

संगीतयोगिनी चापध्वनिना पूरितं जगत् । नाकाल्यानां च मनोनयनानंदसंपदा ॥४५

यंत्रिणी तंत्रिणी चेति द्वे तस्याः परिचारिके । शुकं वीणां च सहसा वहन्त्यौ परिचेरतुः ॥४६

आलोलवलयक्वाणधिष्णुगुणनिस्वनम् । धारयंती घनश्यामा चकारातिमनोहरम् ॥४७

चित्रजीवशरासेन भूषिता गीतयोगिनी । कदंबिनीव रुरुचे कदम्बच्छत्रकार्मुका ॥४८

२३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराणे

कालीकटाक्षवत्तीक्ष्णो नृत्यद्भुजगभीषणः । उल्लसन्दक्षिणे पाणौ विललास शिलीमुखः ॥४६ गेयचकरथारूढां तां पश्चाच्च सिषेविरे । तद्वच्छ्यामलशोभाढ्या देव्यो बाणधनुर्धराः ॥५० सहस्राक्षौहिणीसंख्यास्तीव्रवेगा मदालसाः । आपूरयंत्य ककुभं कलैः किलिकिलारवैः ॥५१

इस प्रकार से प्रार्थना पूर्वक धनुर्वेद ने भक्ति भाव से प्रार्थना की थी और शिर टेककर प्रणाम किया था तथा चाप और तूणीर समर्पित किये थे । उनको प्रियक प्रिया ने सादर ग्रहण कर लिया था ।४३। उस शुकप्रिया ने उस महाचाप को ग्रहण कर जिसका नाम चित्रग्रीव था उसका विस्फार समुत्पन्न किया था और विपुल रूप उसकी मुर्वी का उद्वादन किया था ।४४। उस संगीत योगिनी ने चाप की ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को पूरित कर दिया था । वह देवों के मन और नयनों के आनन्द की सम्पदा थी ।४५। मन्त्रिणी और तन्त्रिणी—ये दो उसकी परिचारिकाएं थीं । वे शुक और वीणा का वहन करती हुई सहसा उसकी परिचर्या किया करती थीं ।४६। थोड़ा चञ्चल अर्थात् हिलने वाला जो वलय था उसके क्वणन से बढ़ने के स्वभाव वाला गुणों का निःस्वन था । वह घन के सदृश श्यामा उसको धारण करती हुई अति मनोहर ध्वनि कर रही थी ।४७। गीतयोगिनी चित्र जीव नामक शरासन से परम भूषित हो रही थी और कदम्ब छत्र कार्मुंक का कदम्बिनी की ही भांति शोभित हुई थी ।४८। काली के कटाक्ष के सदृश परम तीक्ष्ण नृत्य करता हुआ भुजंग भीषण दक्षिण कर में उल्लसित होता हुआ शिली-मुख विलास कर रहा था ।४६। गेय चक्र वाले रथ पर समारूढ़ उसका पीछे सेवा कर रहे थे । उसी के समान श्यामल और शोभा से समन्वित वाण और धनुष को धारण करने वाली देवियाँ थीं ।५०। ये तीव्र वेगवाली और महालसा थीं जिनकी संख्या एक सहस्र अक्षौहिणी थी । परम मधुर जो किल किल की ध्वनि थी उससे दिशा पूरित कर रहीं थीं ।५१।

—×—

ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा ] [ २३६

ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा

अथ राजनायिका श्रिता ज्वलितांकुशा फणिसमानपाशभृत् ।
कलनिक्कणद्वलयमैक्षवं धनुर्दधती प्रदीप्तकुसुमेषुपंचका ॥१

उदयत्सहस्रमहसा सहस्रतोऽप्यतिपाटलं निजवपुः प्रभाझरम्
किरती दिशासु वदनस्य कांतिभिः सृजतीव
चन्द्रमयमभ्रमंडलम् ॥२

दशयोजनायतिमती जगत्त्रयीमभिवृण्वता
विशदमौक्तिकात्मना ।
धवलातपत्रवलयेन भासुरा शशिमंडलस्य सखितामुपेयुषा ॥३

अभिवीजिता च मणिकांतशोभिना
विजयादिमुख्यपरिचारिकागणैः ।
नवचन्द्रिकालहरिकांतिकंदलीचतुरेण चामरचतुष्टयेन च ॥४

शक्तर्चकराज्यपदवीमभिसूचयन्ती साम्राज्य-
चिह्नशतमंडितसैन्यदेशा ।
संगीतवाद्यरचनाभिरथामरीणां संस्तूयमानविभवा
विशदप्रकाशा ॥५

वाचामगोचरमगोचरमेव बुद्धेरीदृक्तया न
कलनीयमनन्यतुल्यम् ॥६

त्रैलोक्यगर्भपरिपूरितशक्तिचक्रसाम्राज्यसं-
पदभिमानमभिस्पृशंती ।
आबद्धभक्तिविपुलांजलिशेखराणामारादहंप्रथमिका
कृतसेवनानाम् ॥७

इसके अनन्तर वह राज नायिका वहाँ पर विराजमान थी जिसका अंकुश ज्वलित था और जो सर्प के ही तुल्य पाश को धारण करने वाली थी। मधुर क्वणन करने वाला वलय और इक्षु का धनुष धारण किये हुए थी। उसके बाण पाँच कुसुमों के थे ।१। उदित सूर्य के तेज से भी अत्यधिक